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Tuesday, June 30, 2026

सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित राधेश्याम की प्रतिमा का अनावरण


डॉ. सौरभ मालवीय  
उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के कलाकारों को पूर्ण सादर-सम्मान दे रही है। इसका नवीनतम उदाहरण हिन्दी साहित्य एवं लोकनाट्य परंपरा के महान नाटककार एवं सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित राधेश्याम कथावाचक हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने 30 जून 2026 को बरेली में पंडित राधेश्याम कथावाचक स्मृति भवन ऑडिटोरियम में पंडित राधेश्याम कथावाचक की प्रतिमा का अनावरण किया।

ज्ञातव्य है कि पंडित राधेश्याम कथावाचक का जन्म 25 नवम्बर 1890 को बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में पंडित बांकेलाल के परिवार में हुआ था। पंडित राधेश्याम हिन्दी साहित्य के महान नाटककार एवं प्रसिद्ध कथावाचक थे। उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कृति ‘राधेश्याम रामायण‘ है, जिसे उन्होंने खड़ीबोली और लोकनाट्य शैली में 25 खंडों में पद्यबद्ध किया। मात्र 17 वर्ष की आयु में रचित इस अमर कृति ने देशभर में अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त की। उनके जीवनकाल में ही इसकी हिन्दी एवं उर्दू में कुल मिलाकर लगभग पौने दो करोड़ से अधिक प्रतियां प्रकाशित एवं विक्रय हुईं। पंडित राधेश्याम कथावाचक को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर 15 दिनों तक श्रीराम कथा का श्रवण किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह के दौरान उन्होंने अपनी एक वर्ष की संपूर्ण आय महामना मदन मोहन मालवीय जी को समर्पित कर दी थी। अपनी आत्मकथा ‘मेरा नाटक काल‘ का लेखन भी पंडित राधेश्याम ने अपने जीवन के अंतिम चरण में किया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विरासत का सम्मान हमारी प्रगति का आधार है। जो समाज अपनी विरासत का सम्मान व संरक्षण करता है, उसी समाज के विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। जो अपने पूर्वजों तथा अपनी विरासत की दुर्गति करता है, वह अपनी उन्नति की दुर्गति करता है। आज पंडित राधेश्याम कथावाचक की प्रतिमा के अनावरण का सौभाग्य उनके लिए अत्यंत प्रसन्नता की बात है। उनकी कथा सुनते-सुनते हम बड़े हुए हैं।

उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण ने देश को जोड़ने का कार्य किया। संत तुलसीदास जी ने श्रीराम नाम की ताकत का एहसास हमें कराया। जब तुलसीदास जी से लोगों ने कहा कि आप राज दरबार में जाएंगे, तो आपको भी नवरत्नों में शामिल किया जाएगा, तब उन्होंने कहा कि ‘मेरे राजा एक ही हैं और वह प्रभु श्रीराम हैं। जो कार्य संत तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से लोगों को जोड़कर किया, वहीं कार्य पंडित राधेश्याम ने किया। उनके संवाद रामलीला मंचन का आधार बने। सनातन धर्म में पंडित राधेश्याम की महत्वपूर्ण भूमिका है, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा दायित्व है। जटायु हों या हनुमान जी, प्रभु श्रीराम की भक्ति जिसने भी की, उसका उद्धार हुआ है।

उन्होंने कहा कि त्रेतायुग में जो कार्य महर्षि वाल्मीकि और मध्यकाल में जो कार्य संत तुलसीदास ने किया, वही कार्य आधुनिक काल में पंडित राधेश्याम कथावाचक ने किया है। सनातन भारत की आत्मा है। पंडित राधेश्याम का सनातन धर्म के प्रति बहुत बड़ा योगदान है। पंडित राधेश्याम जी ने राम नाम की महत्ता से हम सबको बहुत ही सरल भाषा में, सहजता के साथ संवादों के माध्यम से जागरूक किया। रामायण को लोक व्यवहार की बहुत सरल भाषा में प्रस्तुत किया। आज हमें उनकी मूर्ति के अनावरण के माध्यम से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

उन्होंने कहा कि पंडित राधेश्याम ने अपनी लेखनी और कथावाचन से भारतीय संस्कृति, श्रीराम कथा एवं सनातन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। उनका साहित्यिक योगदान भावी पीढ़ी के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनेगा। ऐसे महान साहित्यकारों और सांस्कृतिक विभूतियों का सम्मान करना समाज और शासन, दोनों का दायित्व है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1963 में पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अपने भौतिक व नश्वर देह से मुक्ति प्राप्त की, लेकिन उनको वह सम्मान नहीं मिल सका, जो आज मिला है। पंडित राधेश्याम के घरको पर्यटन विभाग के माध्यम से म्यूजियम बनाया जाए। इस कार्य में राज्य सरकार पूरा सहयोग करेगी। इस म्यूजियम में पंडित जी की समस्त स्मृतियां संग्रहीत की जाएगी, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी उसका लाभ प्राप्त कर सकती हैं।
इस अवसर पर वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री सुरेश कुमार खन्ना, पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री श्री धर्मपाल सिंह, वन एवं पर्या वरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अरुण कुमार सक्सेना, सहकारिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जेपीएस राठौर, बरेली के महापौर डॉ. उमेश गौतम सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण, पंडित राधेश्याम कथावाचक के परिजन तथा अन्य सदस्यगण उपस्थित थे।

Monday, June 1, 2026

टीवी पर लाइव




"उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कानून के राज और न्याय के सिद्धांत पर चलने वाली सरकार है। अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करना और पीड़ित को न्याय दिलाना सरकार की प्राथमिकता है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अपराध और अपराधियों के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाएगी तथा निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि रहेगी।"
"योगी सरकार की पहचान—न्याय का सम्मान, अपराधियों पर कानून का प्रहार।"

Wednesday, April 29, 2026

महादेव मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रभु श्रीराम के इष्ट देवावाधिदेव महादेव शिव शम्भू थे। लंका में जाने से पूर्व प्रभु श्रीराम ने रामेश्वरम् में भगवान शिव की अराधना की थी। भगवान शिव माता पार्वती को प्रभु श्रीराम की कथा सुनाते हैं और प्रभु श्रीराम अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए भगवान शिव की अराधना कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम के आराध्य भगवान शिव के इस भव्य मंदिर में आज सनातन धर्म का पताका फहर रहा है। यह भारत के गौरव को आगे बढ़ाने वाला पताका है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  29 अप्रैल, 2026 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, अयोध्या परिसर स्थित श्री शम्भू महादेव मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजारोहण करने के उपरांत आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इससे पूर्व, उन्होंने ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, श्री हनुमानगढ़ी मंदिर तथा श्री शम्भू महादेव मंदिर में दर्शन-पूजन किया। 

उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अभियान रहा है। दुनिया में कहीं भी इस प्रकार का आयोजन नहीं हुआ होगा। दुनिया के प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी के मन में एक ही भाव होता था कि हमारे प्रभू श्रीराम का भव्य मंदिर बने। वह शान हमें प्राप्त हो और उस कार्यक्रम को वह अपनी आंखों से देख सकें। आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व, प्रभु श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को अपवित्र करके एक विवादित ढांचा खड़ा कर दिया गया था, लेकिन बिना किसी रोक-टोक, दबाव तथा बिना भय के भारत के सनातन धर्मावलम्बी लगातार दृढ़ संकल्पित होकर इस आंदोलन से जुड़े रहे। स्वर्गीय अशोक सिंघल जी उस बिखरी हुई ताकत को एक करने के लिए आगे आए।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1983 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जब इस आंदोलन को अपने हाथों में लिया, तो आंदोलन अपने चरम की ओर बढ़ता गया। जाति, क्षेत्र व भाषा की दीवारें टूट गईं। अरूणाचल प्रदेश, उड़ीसा, नागालैंड, मिजोरम, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ सहित देश के किसी भी कोने में जाते हैं, तो हम लोगों को देखते ही सबसे पहले वहां के लोगों के मुख से ‘जय श्रीराम’ शब्द निकलता है। इसी माह पश्चिम बंगाल के चुनाव में वहां के दूरदराज के गांवों में भ्रमण के दौरान वहां के लोग भी मुझे देखते ही ‘जय श्रीराम’ का संबोधन करते थे।

उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम देश को जोड़ने के माध्यम हैं। त्रेता युग से ही प्रभु श्रीराम उत्तर से दक्षिण, भगवान श्रीकृष्ण पूरब से पश्चिम तथा भगवान शिवशंकर द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माध्यम से पूरे भारत को जोड़ रहे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि जब तक प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण और शिव शंकर हैं, तब तक भारत का र्कोइ  बाल-बांका नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि आज हम सभी इस पूरे पड़ाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहे हैं। हम सभी गुलामी का ढांचा हटने के भी साक्षी है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने व्यापक हित, देशहित तथा भारत के सनातन धर्म की भावनाओं के अनुरूप साक्ष्यों एवं प्रमाणों के आधार पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर सर्वसम्मत फैसला दिया था। इस फैसले का स्वागत देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने किया था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कर-कमलों से 5 अगस्त 2020 को प्रभु श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन तथा 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। इसके बाद श्रीराम दरबार की मूर्ति-प्रतिष्ठा, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर धर्मध्वजा का आरोहण तथा 19 मार्च 2026 को श्रीराम यंत्र की स्थापना कार्य संपन्न हुआ था। यह भारतीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाने वाली तिथियां हैं। हम सभी इन तिथियों के साक्षी हैं।

उन्होंने कहा कि जब हम प्रभु की शरण में भक्त व याचक बन कर जाते हैं, तो प्रभु हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। प्रभु जब अपना काम कराना चाहते हैं, तभी सफलता भी प्राप्त होती है। इतने बड़े आंदोलन के पश्चात अंततः विजय प्राप्त हुई। ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात् जहां धर्म है, वहीं विजय है। जहां अयोध्या तथा प्रभु श्रीराम होंगे, वहां विजय अवश्य होगी। सम-विषम परिस्थितियों में हम झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं, डिगेंगे नहीं तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे, अयोध्या ने इसे पूरी दुनिया को बताया है। आज अयोध्या में लाखों श्रद्धालु दर्शन कर रहे हैं। यहां रेलवे तथा एयर कनेक्टिविटी की बेहतरीन सुविधा है। अयोध्या में चारों तरफ 4-लेन सड़कें बन चुकी हैं। यह नई अयोध्या त्रेता युग की याद दिला रही है।

उन्होंने कहा कि सभी सनातन धर्मावलम्बियों के एक साथ तथा एक स्वर में आवाज उठाने के परिणामस्वरूप ही प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण संभव हो पाया है। हम बंटे थे, तभी विधर्मी उसका लाभ उठा पाये थे। आज हम एकजुट होकर उनका मुकाबला कर रहे हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित है। अपनी विरासत को गौरव के साथ हम आने वाली पीढ़ी को बताने की स्थिति में हैं कि हमारे सामने प्रभु श्रीराम मंदिर पर फैसला,  प्रभु श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि-पूजन, प्रभु श्रीरामलला व श्रीराम दरबार की प्राण-प्रतिष्ठा, मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा का आरोहण तथा श्रीराम यंत्र की स्थापना कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। हम सभी ने इन सभी ऐतिहासिक क्षणों तथा रामनवमी के दिन प्रभु श्रीरामलला को सूर्य तिलक लगते हुए अपनी आखों से देखा है। यह आंदोलन दुनिया के लिए एक अनूठा उदाहरण है। दुनिया इसका अनुसरण करने के लिए लालायित है।

उन्होंने कहा कि आज प्रभु श्रीराम जन्मभूमि परिसर में भगवान शिव मंदिर में भगवा ध्वज का आहोरण भव्यता के साथ संपन्न हुआ है। माता पार्वती को प्रभु श्रीराम की कथा भगवान शिव ही सुना रहे हैं। काक भुशुंडी उसका वाचन कर रहे हैं। कौन सी योनि है, जो राम कथा की पिपासी न हो। आज हम साक्षात प्रभु श्रीराम मंदिर में दर्शन कर रहे हैं। हम सभी को सनातन धर्म की एकता के माध्यम से भारत की एकता-अखंडता को बनाए रखने में अपना योगदान देना होगा। अपनी विरासत को मजबूती के साथ आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्पित होना होगा। अपने महापुरुषों को जातीयता के दायरे में बांटने वालों से सावधान रहना होगा। आज प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी अपनी विरासत पर गौरव की अनुभूति कर रहा है। जिस दिन 140 करोड़ भारतवासी अपने नेतृत्व पर मजबूती से विश्वास कर आगे बढ़ेंगे, दुनिया की कोई ताकत उनका सामना नहीं कर सकेगी। नये भारत को इसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए हम सभी को संकल्पित होना होगा।

इस अवसर पर कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ न्यास क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय, अयोध्या के महापौर गिरीशपति त्रिपाठी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

Sunday, April 5, 2026

भोजन मंत्र





ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः
ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं
ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
पहला श्लोक भगवद्गीता से है, और दूसरा मंत्र उपनिषदों का शांति मंत्र है।
यह पूरा मंत्र भोजन को ईश्वर को अर्पित करने और मिलकर, प्रेमपूर्वक भोजन करने की भावना व्यक्त करता है।
भोजन मंत्र केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी सामूहिक जीवन पद्धति का सशक्त प्रतीक है। इसमें सहजता, सादगी और समरसता का गहरा भाव निहित है। भोजन के समय सभी स्वयंसेवक एक साथ बैठकर, बिना किसी भेदभाव के, समानता और एकात्मता का अनुभव करते हैं। यह परंपरा हमें न केवल अनुशासन सिखाती है, बल्कि सामाजिक समता और पारस्परिक आत्मीयता का भी संस्कार प्रदान करती है।

Tuesday, March 17, 2026

कैलाश मानसरोवर यात्रा


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रदेश सरकार श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बढ़ाने के लिए पूरी तरह संवेदनशील व प्रतिबद्ध है। श्री कैलाश मानसरोवर यात्रा प्राचीन काल से ही भारतीय सनातन धर्म की परम्परा, समाज तथा राष्ट्र की एकता व एकात्मता को सशक्त रूप से जोड़ने का माध्यम रही है। सुखद संयोग है कि ऋषि-मुनियों ने जिस भाव के साथ हमें जोड़ने का कार्य किया, आज हम सभी उसे बनाए रखने के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री 17 मार्च 2026 को लखनऊ स्थित लोक भवन सभागार में श्री कैलाश मानसरोवर यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को अनुदान राशि वितरण कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने श्रद्धालुओं को एक-एक लाख रुपये की अनुदान राशि के प्रतीकात्मक चेक प्रदान किये। ज्ञातव्य है कि राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के 555 तीर्थ  यात्रियों को एक लाख रुपये प्रति व्यक्ति यात्रा अनुदान राशि प्रदान की गई है।

उन्होंने कहा कि पहले तीर्थाटन जीवन का हिस्सा माना जाता था। लोग अपनी सामान्य दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर यात्रा पर निकलते थे। लोगों के पास संग्रह की वृत्ति नहीं थी, बल्कि अपनी मेहनत व पुरूषार्थ से जो कुछ अर्जित करते थे, उससे किसी न किसी धार्मिक यात्रा पर निकलकर जरूरतमंदों की सहायता करते थे। उस यात्रा के माध्यम से पुण्य के भागीदार बनने के साथ समाज को जोड़ने, समझने का कार्य  करते थे। यह भाव आदिकाल से बना हुआ है। जब आदि शंकर ने केरल से निकलकर देश के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना की थी, तब देश में कोई सरकार नहीं थी। राजा-रजवाड़ों का शासन था। राजनीतिक इकाइयां अलग-अलग थीं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से संपूर्ण भारत एक था। आज भी वह भाव प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी के मन में रहता है।

उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं ने श्री कैलाश मानसरोवर यात्रा की कठिनाइयां, चुनौतियों और आपदाओं का मुकाबला करते हुए गत वर्ष  इस यात्रा को सकुशल पूर्ण किया। प्रदेश के श्रद्धालुजनों को कोई समस्या न हो, इसके लिए प्रदेश सरकार ने वर्ष  2017-18 में गाजियाबाद में कैलाश मानसरोवर यात्रा भवन का निर्माण कराया है, जो निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण हुआ। विदेश मंत्रालय की औपचारिकताएं पूर्ण करने के दौरान यह भवन श्रद्धालुओं के ठहराव का प्रथम पड़ाव होता है। शेष समय इस यात्रा भवन का उपयोग अन्य धार्मिक यात्रा से संबंधित श्रद्धालुओं के लिए भी सुनिश्चित किया जाए। कैलाश मानसरोवर यात्रा भवन के उपयोग के साथ-साथ इसका संरक्षण व बेहतर रख-रखाव भी किया जाए, क्योंकि अपनी परम्परा व धार्मिक स्थलों के प्रति यही हमारी कृतज्ञता है।

उन्होंने कहा कि श्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा में राज्य सरकार प्रदेश के अंदर तथा भारत सरकार संपूर्ण भारत में अच्छी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। लेकिन यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को दूसरे देशों से भी जुड़ना होता है और उनका व्यवहार जगजाहिर है। लेकिन उस असुविधा में भी हमारी आस्था भारी पड़ती है और लोग देवाधिदेव महादेव का दर्शन करते हैं। जब भाव होता है, तो व्यक्ति प्रत्येक कठिन चुनौती का सामना करते हुए भी मंजिल को प्राप्त कर लेता है। हमारी सरकार विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय कर आने वाले समय में गाजियाबाद में ही श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं में और वृद्धि करने का प्रयास करेगी। पासपोर्ट कार्यालय जनपदों में बनाए जा रहे हैं। कई सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

उन्होंने कहा कि धार्मिक पर्यटन की मर्यादा को श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ाने का दायित्व हम सबका होना चाहिए। धार्मिक यात्रा श्रद्धा भाव के साथ करनी चाहिए, पर्यटन व मनोरंजन गौण होना चाहिए। इससे हम धार्मिक स्थलों की पवित्रता, मर्यादा और गरिमा को बनाए रख सकेंगे। इन धार्मिक स्थलों की गरिमा के अनुरूप हमारा आचरण आगे आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करने में भी सहायक होगा। प्रदेश सरकार का प्रयास रहा है कि प्रत्येक तीर्थस्थल पर श्रद्धालुओं को आज के समय के अनुरूप अच्छी सुविधाएं प्राप्त हों। डबल इंजन सरकार का इस पर विशेष फोकस है। वर्ष 2025 में प्रदेश में 164 करोड़ श्रद्धालु अलग-अलग धर्मस्थलों व तीर्थ स्थलों पर आए। इसमें 66 करोड़ श्रद्धालु केवल प्रयागराज महाकुम्भ-2025 में ही आए थे। काशी में श्री काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में प्रभु श्रीराम जन्मभूमि, मथुरा-वृन्दावन सहित अलग-अलग क्षेत्रों में करोड़ों श्रद्धालुओं का आगमन हुआ। यह चुनौती होने के साथ-साथ एक अवसर भी है। सरकार अपने स्तर पर आवागमन व जनसुविधाओं से संबंधित अच्छी व्यवस्था देने का लगातार प्रयास कर रही है। पर्यटन क्षेत्र की सम्भावनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाए। उन सम्भावनाओं के माध्यम से प्रदेश के विकास व रोजगार के नये अवसर भी उपलब्ध कराए जाएं। प्रदेश सरकार ने विगत नौ वर्षों में लखनऊ, काशी, अयोध्या, प्रयागराज, चित्रकूट, माँ विन्ध्यवासिनी धाम, नैमिषारण्य, मथुरा-वृन्दावन, शुकतीर्थ, बौद्ध व जैन पर्यटन से संबंधित केंद्रों व अन्य तीर्थ  स्थलों पर पर्यटकों के लिए अच्छी जनसुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। इन सुविधाओं को और बेहतर करने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में चार धाम हैं। इसके साथ देश में भी चार धाम हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने उत्तर-दक्षिण को जोड़ने के अनेक प्रयास किए हैं। विगत चार-पांच वर्षों से काशी में काशी-तमिल संगमम् का कार्यक्रम चल रहा है। यह कार्यक्रम तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश को जोड़ने का बेहतरीन माध्यम बना है। उत्तर प्रदेश में श्री काशी विश्वनाथ धाम है, तो तमिलनाडु में श्री रामेश्वरम धाम है। हमारा प्रयास होगा कि प्रदेश के श्रद्धालु काशी से गंगा जल लेकर बाबा विश्वनाथ का दर्शन कर रामेश्वरम की यात्रा पर जाएं। इस यात्रा को सुगम बनाने के लिए रेल मंत्रालय द्वारा अनेक सुविधाएं दी जाती हैं। उत्तर-दक्षिण के जुड़ने से ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के निर्माण में सहायता प्राप्त होगी।

उन्होंने कहा कि पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग का प्रयास होना चाहिए कि श्री कैलाश मानसरोवर यात्रा का सोशल, डिजिटल, विजुअल एवं प्रिंट मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। यात्रा के समय हमारे पास एक ऐप हो। ऐसे नवाचारों से धार्मिक यात्राओं एवं प्रदेश के पर्यटन को एक नई पहचान प्राप्त होगी तथा अर्थव्यवस्था और मजबूत होगी।

वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री सुरेश कुमार खन्ना ने कहा कि डबल इंजन सरकार ने देश व प्रदेश के गौरव को लौटाया है। मुख्यमंत्री जी ने प्रदेश में सनातन संस्कृति को मजबूत किया है। उन्होंने एक शायर की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कि ‘काबिले तारीफ है अन्दाज़ एक-एक काम का, और गा रहा है गीत यूपी योगी जी के नाम का’।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री जयवीर सिंह ने कहा कि देश और प्रदेश के श्रद्धालु श्री कैलाश मानसरोवर भवन के निर्माण के लिए मुख्यमंत्री जी के प्रति आभारी है। प्रदेश विरासत के सम्मान के साथ विकास की यात्रा को आगे बढ़ा रहा है।
इस अवसर पर प्रदेश की धार्मिक यात्रा वृत्तान्त पर आधारित लघु फिल्म प्रदर्शित की गई।
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Sunday, March 15, 2026

नारी के शौर्य का प्रतीक है जौहर


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की अमर गाथा नारी अस्मिता, सम्मान और स्वावलंबन की प्रेरणा प्रदान करती है। वे 15 मार्च 2026 को राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में आयोजित ‘जौहर श्रद्धांजलि समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में समिलित हुये। इस अवसर पर उन्होंने चित्तौड़गढ़ के वीरों से संबंधित पुस्तिका का विमोचन किया। इसके पूर्व मुख्यमंत्री ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कालिका माता मंदिर में दर्शन-पूजन किया तथा चित्तौड़गढ़ दुर्ग जौहर स्थल पर यज्ञ की पूर्णाहुति कार्यक्रम में सम्मिलित हुये।

जौहर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कार्यक्रम हमें भारतीय नारी के शौर्य, स्वाभिमान तथा अस्मिता को सम्मान करने का अवसर प्रदान कर रहा है। हम लोग नारी गौरव को नई ऊंचाई प्रदान करने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं। इतिहास में कई बार हमारी माताओं और बहनों को जौहर व्रत धारण करना पड़ा। अब ऐसी स्थिति मत आने देना कि हमारी माताओं-बहनों को जौहर व्रत धारण करना पड़े। आज का यह दिन हम सभी के लिए यह उद्घोष करता है कि सनातन की मर्यादा सदैव अमर है और अमर रहेगी। सनातन धर्म कभी पददलित नहीं हो सकता। यद्यपि चुनौतियां आ सकती हैं। हमने अनेक चुनौतियों का सामना किया है और आगे भी करेंगे, लेकिन कोई हमारी अमरता पर उंगली नहीं उठा सकता। चित्तौड़गढ़ का दुर्ग हमें याद दिलाता है कि मातृ शक्ति का साहस अजेय है तथा स्वाभिमान की जो ज्वाला सन् 1303 में प्रज्ज्वलित हुई कि वह शाश्वत बनी रहेगी। इसके लिए हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा।

उन्होंने कहा कि हम लोग जो कुछ उत्तर प्रदेश में कर रहे हैं, वह राजस्थान के तेज से संभव हुआ है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्श न में उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहे परिवर्तन के पीछे राजस्थान की इस वीर भूमि का भी योगदान है, क्योंकि मेरे पूज्य दादागुरु इसी भूमि से गए थे। जब हम राजस्थान के चित्तौड़गढ़ व मेवाड़ के शौर्य तथा पराक्रम की बात होती है, तब हम वीरांगनाओं के जौहर को स्मरण करते हैं। मीराबाई की भक्ति से संपूर्ण भारत अभिभूत होता है। हम सब इससे नई प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

उन्होंने कहा कि इस वीर भूमि ने भारत को नई पहचान प्रदान की है। चित्तौड़गढ़ का किला केवल पत्थरों से बना हुआ दुर्ग मात्र नहीं, बल्कि यह भारत की अस्मिता का प्रतीक है, जो इतिहास निर्माण का साक्षी होने के साथ त्याग और बलिदान का भी प्रतीक है। कौन ऐसा भारतीय होगा, जिसके मन में इस वीर भूमि के राणाओं के शौर्य व पराक्रम तथा देश के लिए किये गये बलिदान के प्रति श्रद्धा का भाव न उत्पन्न होता हो। जब भी भारत संकट में होता है, देश का अभिभावक अपने पुत्र को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, तो प्रत्येक भारतीय के मन में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज का स्मरण अनायास हो जाता है। इन राष्ट्र नायकों ने अपना बलिदान स्वयं व स्वयं के परिवार के लिए नहीं दिया, बल्कि इनका संघर्ष देश व धर्म के लिए था।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, महारानी पद्मिनी, महाराणा कुम्भा तथा बप्पा रावल की गौरवशाली परम्परा को नमन करता है। राष्ट्र के लिए योगदान देने वाले लोगों का स्मरण लम्बे समय तक किया जाता है। हम आज इतिहास बनाने वाली धरती का साक्षात्कार कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि आज का यह समारोह हम सभी को प्रेरणा प्रदान कर रहा है कि आने वाले समय में किसी बेटी व बहन को इस प्रकार के दौर से न गुजरना पड़े। जौहर की गाथा सुनाते समय केंद्रीय मंत्री श्री गजेन्द्र शेखावत जी कह रहे थे कि सन् 1303, सन् 1535 तथा सन् 1568 में तीन बड़े जौहर यहां संपन्न हुए थे। भारत का इतिहास इन वीरांगनाओं के जौहर से परिपूर्ण है। महाराणा सांगा के शरीर पर लगे अस्सी घाव भारत की अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उनके शौर्य व पराक्रम के प्रतीक हैं। भले ही वह अनेक संकटों सामना करते रहे हों, लेकिन उन्होंने विधर्मियों को देश में घुसने नहीं दिया। जब महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपना पहला युद्ध लड़ा, उस समय उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष थी। 

उन्होंने कहा कि महाराणा रतन सिंह को वीरगति प्राप्त होने के पश्चात गोरा और बादल जैसे उनके वीर सेनापतियों ने भी लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके पश्चात महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में हजारों वीरांगनाओं ने नारी अस्मिता की रक्षा के लिए परिस्थितिवश जौहर व्रत ग्रहण किया। माता सीता ने धरती माता के सामने व्रत लेते हुए कहा कि उनका सतित्व अखंड है, माता मुझे अपनी गोद में समाहित करें। जो संकल्प माता सीता ने लिया था, वही संकल्प यहां महारानी पद्मिनी ने प्रकट किया था। यह संकल्प नारी गरिमा तथा भारत की धरती को विधर्मियों से मुक्त करने का था। यह संकल्प हम सभी को आज भी प्रेरणा प्रदान कर रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में हमेशा इस शौर्य का स्मरण किया गया है। भारत की पीढ़ियां इसे सम्मान प्रदान करती हैं। प्रभु श्रीराम असल मायने में राम तब बन सके, जब उन्होंने ‘निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह’ का संकल्प लिया। लाखों युवाओं ने श्रीराम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जब अपने पूर्वजों के प्रति हमारे मन में श्रद्धा भाव होता है, तो अच्छे परिणाम आने में देर नहीं लगती।

उन्होंने कहा कि अब अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हो चुका है। अब अयोध्या में गुलामी का कोई चिह्न नहीं बचा है। अयोध्या अब राममय हो चुकी है। जब देश एकजुट होकर एक स्वर में एक दिशा में चलता है, तो श्रीराम मंदिर जैसा उपहार सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त होता है। कंस के अत्याचार से त्रस्त मथुरा को अभय प्रदान करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण को ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ का संकल्प लेना पड़ा था। उन्होंने कहा था कि वह सज्जन शक्ति का संरक्षण तथा दुर्जनों का संहार करने के लिए अवतरित हुए हैं। आज भगवान श्रीकृष्ण हम सबके पूज्य हैं।

उन्होंने कहा कि खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने कहा था कि ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’। उनके चार-चार पुत्र बलिदान को प्राप्त हुए थे। जब उनसे कहा गया कि आपके चार पुत्र बलिदान हो चुके हैं, तो उन्होंने कहा कि ‘चार मुये तो क्या हुआ, जीवित कई हजार’, वह पूरे समाज को अपना पुत्र मानते थे।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का स्मरण करता है। उनके बारे में कहा जाता है कि ‘सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’ जब उन्होंने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध शंखनाद किया था, उस समय उनकी आयु मात्र 26 वर्ष थी। 27 वर्ष की आयु में वह बलिदान हो गई थीं। यह भारत की नारी थी, और भारत की नारी ने उसी रूप में भारत का आह्वान किया था।

उन्होंने कहा कि कौन ऐसा भारतीय होगा, जो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्मरण न करता हो। उन्होंने आह्वान किया था कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ यह नारा केवल बंगाल के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की आजादी, अस्मिता और युवा चेतना के लिए था। आज अगर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस होते तो भारत का विभाजन नहीं होता। पाकिस्तान का भी अस्तित्व नहीं होता। भारत से बाहर जापान, म्यांमार व सिंगापुर तथा भारत के पोर्ट ब्लेयर में आजादी के लिए किये गये उनके योगदान का स्मारक आज भी हम सभी को प्रेरित करता है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में देश की आजादी के लिए काकोरी टेªन एक्शन हुआ था। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रान्तिकारी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये। इन क्रान्तिकारियों ने जो खजाना लूटा था, उसकी कीमत मात्र 4,600 रुपये थी, जबकि इन क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करने में अंग्रेजों ने दस लाख रुपये लगा दिये। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल तथा ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को जेल में बन्द किया गया
और फांसी की सजा दी गई। जिस दिन इन क्रान्तिकारियों को फांसी की सजा होनी थी, उससे दो दिन पूर्व ही उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। इन क्रान्तिकारियों से अंतिम इच्छा पूछी गई, उन्होंने बताया कि उनकी अंतिम इच्छा यही है कि हर बार इस भारतवर्ष में उनका जन्म हो और उनकी मृत्यु का कारण देशोपकारक कर्म हो।

उन्होंने कहा कि शिकागो की धर्म सभा में सन् 1893 में स्वामी विवेकानन्द ने इतिहास रचा था। धर्म सभा में उन्होंने यह नहीं कहा कि वह किस जाति से हैं। उन्होंने पंथ और संप्रदाय की बात भी नहीं की। उन्होंने कहा था कि ‘गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं।’ उनका यह उद्घोष आज भी भारत को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करता है। जब हम नेपाल जाते हैं, तो हिन्दू का यह भाव तोड़ता नहीं, बल्कि जोड़ता है। यह देश इसलिए कमजोर हुआ, क्योंकि जातिवाद ने समाज की नींव को कमजोर कर दिया। जातिवाद की राजनीति भारत की नींव को कमजोर कर रही है। बांटने की यह राजनीति हम सभी को गुलामी की ओर ढकेल रही है, जिससे बचने के लिए आज हम सभी को एकता के भाव के साथ आगे बढ़ना होगा।

उन्होंने कहा कि जौहर स्मृति संस्थान और यहां के स्थानीय जनप्रतिनिधि ने अपने पूर्वजों की स्मृतियों को नमन करने के लिए सर्वसमाज के इस कार्यक्रम का आयोजन किया है। महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियां ‘मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का, पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।’ इस संबंध में अत्यंत प्रासंगिक हैं। जिनको कुछ नहीं करना होता है, वह जातिवाद के आधार पर सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने का कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत का प्राचीन वैभव हमेशा हम सभी को आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। वैदिक कालीन भारत आदर्श भारत था। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित था। यहां का अन्नदाता किसान, उत्पादक, कारीगर उद्यमी तथा व्यापारी राष्ट्र को जोड़ने का सेतु था। ग्राम स्वराज्य हमारी पहचान थी। माल, उत्पादन, आमदनी गाँव की ही थी तथा गांव एक आत्मनिर्भर इकाई था। जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी आत्मनिर्भर और विकसित भारत की बात करते हैं, इसकी आधारभूत इकाई हमारी ग्राम पंचायतें व कस्बे हैं। गांव और शहर जब आत्मनिर्भर होंगे, तब आत्मनिर्भर भारत बनेगा।

उन्होंने कहा कि कि जो लोग जातिवाद के आधार पर समाज को बांट रहे हैं तथा अफवाह के आधार पर देश में विश्वास का संकट खड़ा कर रहे हैं, वही लोग राम, कृष्ण एवं राम सेतु के आस्तित्व को नकारते थे तथा श्रीराम मंदिर के विरुद्ध एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। यह लोग भारत की संवैधानिक संस्थाओं को भी कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वयं के आस्तित्व पर संकट होने के कारण यह लोग देश के आस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहे है। आज का दिन हम सभी के लिए संकल्प का दिवस होना चाहिए। हमारे मन में वह संकल्प होना चाहिए, जो सैकड़ों वर्षों से इस वीर भूमि ने हम सभी को दिया है।

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में जौहर भूमि को नमन कर माँ कालिका के दर्शन किए, तो वह अभिभूत थे तथा उनकी भाषा अवरुद्ध थी। उस समय श्याम नारायण पांडेय की पंक्तियां ‘यह एकलिंग का आसन है, इस पर न किसी का शासन है, नित सिहक रहा कमलासन है, यह सिंहासन सिंहासन है’ याद आ रही थीं। 

Saturday, March 7, 2026

ब्रज भारत की आस्था, संस्कृति कृति और आध्यात्मिक परम्परा का केंद्र


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि ब्रज क्षेत्र भारत की आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। प्रदेश सरकार यहाँ की परम्परा और श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान करते हुए ब्रज क्षेत्र के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। तीर्थ स्थलों के संरक्षण के साथ ही, श्रद्धालुओं की सुविधा, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, आधारभूत ढांचे के विकास और सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे ब्रज क्षेत्र की पहचान और अधिक सुदृढ़ होगी तथा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी।

मुख्यमंत्री 7 मार्च 2026 को जनपद मथुरा स्थित वृन्दावन में गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी परिसर स्थित यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के क्षेत्रीय कार्यालय सभागार में आयोजित उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद की अष्टम बोर्ड बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। बैठक में लगभग 300 करोड़ रुपये के कार्यों को स्वीकृति प्रदान की गई। ब्रज क्षेत्र के समग्र विकास, तीर्थ स्थलों के संरक्षण तथा श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं के विस्तार से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। बैठक में मथुरा-वृन्दावन रेल मार्ग के 11.80 किलोमीटर लम्बे ट्रैक को 4-लेन मार्ग में विकसित करने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई। इस संबंध में मुख्यमंत्री ने लोक निर्माण विभाग, ब्रज तीर्थ विकास परिषद तथा जिला प्रशासन को रेलवे विभाग से समन्वय स्थापित कर भूमि अथवा भूमि मूल्य से संबंधित आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पॉड रैपिड ट्रांजिट सिस्टम की व्यवहारिकता का अध्ययन किया जाए। उन्होंने ब्रज की प्रसिद्ध 84 कोस परिक्रमा मार्ग के विकास के लिए संबंधित विभागों को कार्ययोजना तेजी से लागू करने के निर्देश दिए।

बैठक में गोवर्धन, मथुरा और वृन्दावन में पार्किंग, टीपीओ तथा अन्य जनसुविधाओं को विकसित करने के लिए चिन्हित भूमि पर पीपीपी मॉडल के तहत कार्य कराने का निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री ने छाता क्षेत्र के ग्राम अजीजपुर में प्रस्तावित वाटर म्यूजियम के लिए चिन्हित भूमि को सिंचाई विभाग से परिषद को हस्तान्तरित करने की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कराने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्रीने ब्रज क्षेत्र में 36 वनों के ईको-रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए आगामी वर्षा ऋतु में वन महोत्सव के दौरान व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाने के निर्देश दिए। उन्होंने इस अभियान में जल संरक्षण, खारे पानी के उपचार तथा जनसहभागिता को भी शामिल करने पर बल दिया। बैठक में यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अंतर्गत विकसित होने वाली हेरिटेज सिटी पर भी चर्चा हुई। बैठक में यमुना रिवरफ्रंट परियोजना के अंतर्गत मथुरा से वृन्दावन के बीच जलमार्ग विकसित कर पीपीपी मॉडल पर क्रूज और नौका संचालन शुरू करने की योजना पर भी सहमति बनी। उन्होंने ने गोवर्धन स्थित पारसौली में सूरदास ब्रज अकादमी के संचालन के लिए आवश्यक कार्मिकों की तैनाती सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने परिषद की वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना में प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए बजट स्वीकृत करते हुए कहा कि परिषद द्वारा अनुमोदित परियोजनाओं के बजट में किसी प्रकार की कटौती न की जाए और उन्हें शीघ्र धरातल पर उतारा जाए। नगर निकायों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्वच्छता, सुरक्षा और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। उन्होंने जल निगम और नगर निगम द्वारा एसटीपी, एसपीएस तथा पम्पिंग स्टेशन के निर्माण कार्यों को तेजी से पूरा कर यमुना नदी में प्रदूषण कम करने के निर्देश दिए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के माध्यम से विभिन्न विभागों को निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे ब्रज क्षेत्र में सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाए।


बैठक में लिए गए प्रमुख निर्णयों के अनुसार मथुरा-वृन्दावन रेल ट्रैक के स्थान पर 11.80 किलोमीटर लम्बा 4-लेन मार्ग विकसित करने की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा। ब्रज की 84 कोस परिक्रमा मार्ग के विकास के लिए लोक निर्माण विभाग और धर्मार्थ कार्य विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। मथुरा, वृन्दावन और गोवर्धन में पार्किंग तथा अन्य जनसुविधाओं का विकास पीपीपी मॉडल के माध्यम से किया जाएगा। यमुना नदी में मथुरा से वृन्दावन के बीच जलमार्ग विकसित कर क्रूज और नौका संचालन की योजना को भी आगे बढ़ाया जाएगा। साथ ही, ब्रज क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए 36 वनों के ईको-रेस्टोरेशन और व्यापक वृक्षारोपण अभियान को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा छाता क्षेत्र के ग्राम अजीजपुर में प्रस्तावित वाटर म्यूजियम के लिए चिन्हित भूमि को सिंचाई विभाग से परिषद को हस्तान्तरित करने की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कराई जाएगी।

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के डोनेशन मैनेजमेंट डिजिटल सिस्टम का शुभारम्भ किया। मथुरा भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर में दर्शन-पूजन किया। उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ फूलों की होली खेली। उन्होंने गीता शोध संस्थान के निर्माणाधीन स्वामी हरिदास प्रेक्षागृह का निरीक्षण किया। उन्होंने अन्नपूर्णा भवन की पाकशाला का अवलोकन किया तथा भोजन हेतु लोगों के बैठने की व्यवस्था का जायजा लिया।

मुख्यमंत्री जी ने मथुरा के थाना पर्यटन में आवासीय एवं अनावासीय भवनों के निर्माण कार्यों का उद्घाटन किया। यह थाना अपराध नियंत्रण के साथ-साथ तीर्थयात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधा और सहायता प्रदान करने के लिए एक अत्याधुनिक केंद्र के रूप में कार्य करेगा।


Wednesday, February 4, 2026

वैदेही आर्ट गैलरी की स्थापना के निर्देश


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 04 फरवरी 2026 को लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में श्री अयोध्या धाम में माता सीता के जीवन-चरित पर केन्द्रित वैदेही आर्ट गैलरी’ की स्थापना के निर्देश दिए। उन्होंने आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के कार्यों की समीक्षा के दौरान कहा कि सीता माता भारतीय संस्कृति, मर्यादा और नैतिक आदर्शों की अनुपम प्रेरणा हैं। उनके उज्ज्वल चरित्र से नई पीढ़ी को गहराई से परिचित कराना समय की आवश्यकता है।

उन्होंने आर्ट गैलरी की परिकल्पना साझा करते हुए कहा कि यह अत्याधुनिक गैलरी केवल एक कला-संग्रहालय न होकर, सीता माता के जीवन, त्याग, करुणा, मर्यादा, धैर्य और शक्ति का आधुनिक तकनीक के माध्यम से पुनर्पाठ प्रस्तुत करने वाली एक जीवन्त सांस्कृतिक अनुभव-स्थली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस गैलरी की कथा-वस्तु, डिजाइन, विजुअल भाषा, कला और तकनीक सहित सभी आयाम इस भावना को प्रकट करें कि हम एक दिव्य विरासत का पुनर्पाठ कर रहे हैं, जिसे नई पीढ़ी के सामने प्रेरणास्रोत के रूप में स्थापित किया जाना है। वैदेही आर्ट गैलरी की मूल भावना यही हो कि आगन्तुक सीता माता के जीवन-सन्देश को केवल देखें ही नहीं, बल्कि उसका अनुभव करें, समझें और आत्मसात करें। 

अयोध्या विकास प्राधिकरण के साथ संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि यह परियोजना अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर के निकट वशिष्ठ भवन परिसर में विकसित की जा सकती है, जहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस गैलरी का विकास अयोध्या के वैश्विक सांस्कृतिक नगर के रूप में उभरने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण चरण होगा। इस गैलरी में मिथिला की संस्कृति, लोकपरम्परा और कला के विविध आयामों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए।

Sunday, February 1, 2026

रविदास जयंती पर प्रतिमा का अनावरण


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी महाराज जी का प्रकटीकरण काशी के सीर गोवर्धन में माघी पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनकी दिव्य आभा से आलोकित होकर समाज ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सद्गुरु रविदास जी महाराज ने प्रत्येक नागरिक को वैष्णव परम्परा के अनुरूप जिस उपासना के लिए प्रेरित किया, वह जीवन में कर्म की प्रधानता व मन की शुद्धता को महत्व देता है तथा प्रत्येक नागरिक को लोक कल्याण के प्रति आग्रही बनाता है।

मुख्यमंत्री ने 1 फरवरी 2026 को लखनऊ में संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी महाराज की 649वीं जयंती के अवसर पर सद्गुरु रविदास जी की प्रतिमा का अनावरण व सभागार का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने सद्गुरु रविदास जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। उन्होंने कहा कि रविदास जी का स्पष्ट मानना था कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अर्थात यदि आपका मन साफ है, तो सभी कुछ आपके कर्म पर निर्भर करता है। यदि आप अच्छा कर्म करेंगे, तो अच्छा फल पाएंगे तथा बुरा कर्म करेंगे, तो पाप से आपको कोई नहीं बचा सकता। जब सद्गुरु रविदास जी महाराज का इस धरा धाम पर प्रकटीकरण हुआ, वह गुलामी का कालखंड था। देश विदेशी आक्रान्ताओं से आतंकित व त्रस्त था। उस समय भी उन्होंने साधना की पवित्रता और साधना को कर्म की साधना के रूप में बदलने का कार्य किया।

उन्होंने कहा कि संत रामानंद जी से दीक्षा प्राप्त करने के उपरान्त सद्गुरु रविदास जी महाराज ने अपने कर्म की साधना के माध्यम से लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। जगदगुरु रामानंदाचार्य ने मध्यकाल में 12 शिष्य बनाए, जो 12 अलग-अलग जातियों से थे। उन्होंने एक महिला को भी अपना शिष्य बनाया था। उस कालखंड में  भी समाज को जोड़ने का जितना बड़ा कार्य हमारे इन संतों ने किया, वह अद्भुत था। उसी नींव पर वर्तमान भारत का निर्माण हुआ है। वही प्रेरणा गुलामी के बंधन को तोड़ने में हम सभी की प्रेरणा रही है।

उन्होंने कहा कि सद्गुरु रविदास जी महाराज ने 600 वर्ष पूर्व कहा था कि राज ऐसा होना चाहिए, जहां सभी को अन्न प्राप्त हो, अर्थात कोई भूखा न सोए और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सके। कहा जाता है कि ‘वृथा न जाहिं देव ऋषि वाणी’ अर्थात एक संत की वाणी कभी व्यर्थ नहीं होती। इस भाव को मुगलों, ब्रिटिशर्स तथा आजादी के बाद में विभिन्न सरकारों ने भुला दिया, लेकिन वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में सबसे पहले देश के प्रत्येक गरीब के बैंक अकाउंट खुलवाए गये, जिससे शासन की योजनओं का लाभ सीधे उनके अकाउंट में प्राप्त हो सके।

विगत 6 वर्षों से प्रत्येक जरूरतमंद को निःशुल्क राशन और स्वास्थ्य सुविधा का लाभ ‘सबका साथ और सबका विकास’ के भाव से प्रदान किया जा रहा है। यह सतगुरु रविदास जी महाराज की प्रेरणा से सम्भव हो पाया है। प्रत्येक घर में शौचालय का निर्माण कराया गया, ताकि हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने की प्रेरणा दी जा सके। गरीबों को अपना सिर ढकने के लिए आवास उपलब्ध कराया गया। रसोई गैस तथा बिजली के निःशुल्क कनेक्शन उपलब्ध कराए गये। आज यहां सद्गुरु रविदास जी महाराज की भव्य प्रतिमा और सभागार के लोकार्पण का अवसर प्राप्त हुआ। अब सर्दी, गर्मी, बरसात आदि किसी भी मौसम में संत रविदास सेवा समिति को कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। यहां पर आराम से बैठकर कार्यक्रम सम्पन्न किए जा सकेंगे। भजन मंडली तथा भक्तगण आराम से बैठ पाएंगे। वक्तागण मंच से उद्बोधन कर सकेंगे। वर्ष 2017 के पूर्व संत रविदास जी महाराज की पावन जन्मभूमि सीर गोवर्धन, काशी में जाने का रास्ता नहीं था। लंगर का हॉल नहीं था। आज वहां देश भर से लगभग दो लाख श्रद्धालु आए हैं। 

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से डबल इंजन सरकार ने सद्गुरु रविदास जी महाराज की जन्मभूमि सीर गोवर्धन को चार लेन सड़क से जोड़ा है। वहां संत रविदास जी महाराज के नाम पर भूमि क्रय कर विभिन्न कार्यक्रमों के लिए जमीन उपलब्ध करवाई गयी। लंगर हॉल का निर्माण किया गया, जहां 500 लोग एक साथ लंगर प्राप्त कर सकते हैं। संत रविदास जी महाराज की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई, जिसे पांच किलोमीटर दूर से भी देखा जा सकता है। आज सीर गोवर्धन भव्य स्वरूप युक्त धाम बन गया है। उन्होंने कहा कि हमें अपने महापुरुषों व संतों के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखना चाहिए। गुलामी के कालखंड का स्मरण कर विभाजनकारी ताकतों  को फिर से सिर उठाने का अवसर नहीं देना चाहिए। हम सभी को एकजुट होकर समाज की संरचना को मजबूत करते हुए आगे बढ़ना है। हमारी एकता इन पूज्य संतों की दिव्य साधना और उससे प्राप्त सिद्धि का प्रतिफल इस देश को प्रदान करेगी। देश की एकता व सम्प्रभुता के लिए हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा। यही सद्गुरु रविदास जी महाराज की प्रेरणा थी।

उन्होंने कहा कि डबल इंजन सरकार द्वारा प्रदेश भर में सनातन धर्म से जुड़े स्थलों के पुनरोद्धार का कार्य किया जा रहा है। इनमें लालापुर में महर्षि वाल्मीकि, राजापुर में संत तुलसीदास, चित्रकूट धाम, माँ विन्ध्यवासिनी धाम, अयोध्या धाम, नैमिषारण्य धाम, सुकतीर्थ, मथुरा- वृंदावन तथा भगवान बुद्ध से जुड़े बौद्ध सर्किट आदि 1200 से 1500 स्थानों पर किया गया कार्य सम्मिलित है। यह सभी कार्य प्रधानमंत्री जी के मंत्र ‘सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ मंत्र पर चलकर प्रदेश के प्रत्येक जनपद में बिना भेदभाव किए गये। इस मंत्र की प्रेरणा का प्रभाव आज यहां हम सभी को देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आज माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयागराज त्रिवेणी में प्रातः 10 बजे तक लगभग एक करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके हैं। प्रयागराज में लाखों की संख्या में कल्पवासी विगत एक माह से व्रत, साधना तथा भगवत भजन में लीन थे। आज उनकी साधना का एक माह पूर्ण हुआ है। कठिन परिस्थितियों में सर्दी, गर्मी तथा बरसात की परवाह किए बिना कठिन साधना से जूझते हुए तपा हुआ शरीर ही संकट के समय चुनौती का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगा। श्रद्धालुजन माँ गंगा, माँ यमुना तथा माँ सरस्वती की त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाकर अपने घर को प्रस्थान करेंगे। यह संतों की प्रेरणा तथा भारत की सनातन परम्परा है। माघी पूर्णिमा के अवसर पर दिव्य स्नान का लाभ लेने वाले श्रद्धालुजन को बधाई एवं मंगलमय शुभकामनाएं। माँ गंगा से प्रार्थना है कि वह उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करें। सद्गुरु रविदास जी महाराज से प्रार्थना है कि वह अपने सभी भक्तों का कल्याण करें।

उन्होंने सद्गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य वाणी और दिव्य सिद्धि का उदाहरण देते हुए कहा कि जब रविदास जी के सहयोगी ने उनसे कहा कि चलो रविदास गंगा स्नान करते हैं, तो उन्होंने कहा कि मेरे पास आज ज्यादा काम है। इस कार्य को पूर्ण करना आवश्यक है। मेरी ओर से माँ गंगा को दमड़ी समर्पित कर देना। उनके सहयोगी संत ने माँ गंगा में स्नान कर उनकी पूजा अर्चना की, लेकिन इसका कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही, उन्होंने रविदास जी द्वारा प्रदान की गई दमड़ी माँ गंगा को समर्पित की, तो माँ गंगा ने वह दमड़ी अपना हाथ बढ़ाकर स्वीकार की। जब उन्होंने माँ गंगा से पूछा कि यह कैसे सम्भव हुआ, तो उन्होंने उत्तर दिया कि रविदास मेरे सच्चे भक्त हैं। 

उन्होंने कहा कि माँ गंगा भी अपने सच्चे भक्तों को पहचानती हैं। कहा गया है कि ‘जैसी चाह, वैसी राह’ अर्थात
हम जैसा भाव अपने मन में रखेंगे, हमें उसी प्रकार के परिणाम प्राप्त होंगे। 
कार्यक्रम को उपमुख्यमंत्री श्री ब्रजेश पाठक ने भी सम्बोधित किया।

Wednesday, January 28, 2026

मेरा गांव - मेरा तीर्थ









पटनेजी ग्राम में शतचंडी यज्ञ का पूर्णाहुति पर्व : अध्यात्म, संस्कार और लोकमंगल का संदेश
मेरे पिताश्री की अभिलाषा, जिजीविषा और निष्ठा से उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. 
मेरे गांव -मेरे घर की पुण्यभूमि पर सम्पन्न हुआ शतचंडी यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परम्परा के उस शाश्वत चिंतन का सजीव उदाहरण रहा, जिसमें आध्यात्म, संस्कार, समाज और लोककल्याण एक सूत्र में पिरोए जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, अग्नि की पवित्र ज्वालाएँ और श्रद्धालुओं की सामूहिक साधना ने पूरे वातावरण को दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया।
शतचंडी यज्ञ का मूल उद्देश्य आत्मिक शुद्धि, मानसिक संतुलन और सामाजिक समरसता की स्थापना है। माँ चंडी की उपासना शक्ति, साहस और धर्मरक्षा का प्रतीक है। यह यज्ञ हमें यह संदेश देता है कि जब समाज आध्यात्मिक चेतना से जुड़ता है, तब व्यक्ति का अहंकार गलता है और सेवा, करुणा व त्याग का भाव जाग्रत होता है।
आज के भौतिकतावादी युग में ऐसे यज्ञ समाज को आंतरिक शांति और नैतिक दिशा प्रदान करते हैं। शतचंडी यज्ञ भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत है। यज्ञ की अग्नि में आहुतियाँ केवल सामग्री की नहीं होतीं, बल्कि यह हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों—क्रोध, लोभ और अहंकार—की भी आहुति है।
 नारी शक्ति, वृद्धजन का अनुभव और समाज के प्रत्येक वर्ग का सम्मान ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। आध्यात्मिक आयोजनों में जब सामाजिक संवेदनशीलता जुड़ती है, तब धर्म केवल कर्मकांड न रहकर जीवन पद्धति बन जाता है।
शतचंडी यज्ञ का समापन हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म का अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण के साथ-साथ समाज का उत्थान है।
 ग्राम पटनेजी में सम्पन्न यह यज्ञ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने—कि जब गाँव, समाज और राष्ट्र आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ते हैं, तब संस्कृति जीवित रहती है और राष्ट्र सशक्त होता है।
यही यज्ञ का सार है—स्व से समाज और समाज से राष्ट्र की चेतना का जागरण। 

Tuesday, January 27, 2026

सप्तचंडी यज्ञ सम्पन्न















देवरिया। लार. पटनेजी.
शासकीय अधिवक्ता श्री नवनीत मालवीय के आवास पर ग्राम पटनेजी में आयोजित सप्तचंडी यज्ञ का समापन धार्मिक एवं सामाजिक गरिमा के साथ हुआ। 
समापन अवसर पर जिला अधिकारी श्रीमती दिव्या मित्तल ने शारीरिक रूप से पूर्णतः विकलांग विनय शर्मा को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन किया। 
इसके साथ ही समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं एवं बुजुर्गों को भी सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर एसडीएम सलेमपुर अलका सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष गिरीश तिवारी सहित अनेक गणमान्य नागरिक, जनप्रतिनिधि एवं क्षेत्रवासी उपस्थित रहे। 
कार्यक्रम में आध्यात्मिक वातावरण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और सेवा भाव का संदेश दिया गया।
आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए नवनीत मालवीय ने कहा  कि ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा, सहयोग और संस्कारों को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यानन्द दुबे ने की.

Friday, January 23, 2026

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व


डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.
वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है. कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष मह्त्व है.
प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.
वसंत का धार्मिक महत्व भी है. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी. शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.
मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.
"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।
अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.
पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.
वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.
इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.
वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है. कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है-
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर
हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।
वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए.

Saturday, January 10, 2026

मेला सेवा ऐप लॉन्च


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 जनवरी 2026 को जनपद प्रयागराज में आहूत एक बैठक में माघ मेला-2026 के आगामी स्नान पर्वों की तैयारियों की समीक्षा की। उन्होंने माघ मेले को सकुशल सम्पन्न कराने के लिए सभी अधिकारियों को पूरी तत्परता व लगन के साथ कार्य करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आगामी 14 से 18 जनवरी के बीच कम समय में दो महत्वपूर्ण स्नान पर्वों को सकुशल सम्पन्न कराना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए अभी से सभी अधिकारी पूरी जिम्मेदारी व तत्परता के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए स्नान पर्वों को सकुशल सम्पन्न करायें। उन्होंने पौष पूर्णिमा स्नान पर्व को सकुशल सम्पन्न कराने के लिए माघ मेले के आयोजन से जुड़े अधिकारियों की सराहना की।

उन्होंने कहा कि मेले में साफ-सफाई की व्यवस्था बेहतर रहे। श्रद्धालुओं के स्नान के लिए घाटों के स्नान क्षेत्र व सर्कुलेटिंग एरिया को और बढ़ाया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालु एक साथ स्नान कर सकें तथा उन्हें स्नान करने में कोई समस्या न हो। मुख्य स्नान पर्वों पर संगम नोज पर अत्यधिक दबाव रहेगा, जिसके दृष्टिगत पहले से ही सभी आवश्यक प्रबन्ध कर लिए जाएं। कोई भी श्रद्धालु कपड़े, प्लास्टिक थैली अथवा पूजा सामग्री गंगा जी में न फेंके तथा स्नान के समय साबुन इत्यादि का इस्तेमाल न करे, जिससे जल की स्वच्छता बनी रहे और सभी स्नानार्थी स्वच्छ एवं निर्मल जल में आस्था की पावन डुबकी लगा सकें।

उन्होंने ठंड के मौसम के दृष्टिगत पर्याप्त संख्या में अलाव की व्यवस्था तथा जरूरतमंदों को कम्बल वितरित करने के निर्देश दिए। मेले में आने वाले संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं एवं स्नानार्थियों के साथ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी अच्छा व्यवहार करें। किसी भी दशा में रोड पर अतिक्रमण न होने पाये। रोड व पाथ-वे को खुला रखा जाए, जिससे माघ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कठिनाई न हो।

उन्होंने मुख्य स्नान पर्वों के दृष्टिगत बेहतर ट्रैफिक व्यवस्था बनाए जाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि अत्यधिक भीड़ का दबाव होने पर सीमावर्ती जनपदों में होल्डिंग एरिया में उनके ठहरने के प्रबंध किए जाएं। सभी सम्बन्धित अधिकारी प्रमुख स्नान पर्वों पर मेले की मॉनीटरिंग करें तथा पुलिस विभाग श्रद्धालुओं की सुरक्षा हेतु नियमित रूप से पेट्रोलिंग करे। मेले में कहीं पर भी मादक पदार्थों की बिक्री न होने पाए तथा कोई भी अराजक तत्व मेले में अराजकता न फैलाने पाए, इस पर पुलिस विभाग निरन्तर कड़ी निगरानी रखे। 

उन्होंने कहा कि माघ मेले से जुड़े स्वच्छाग्रहियों के मानदेय का समय से भुगतान तथा उन्हें अन्य सभी आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। साथ ही, उनके बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था भी की जाए। उन्होंने अनावश्यक एवं अवैध रूप से लगी होर्डिंगों को हटाए जाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मेले में शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार कराया जाए, ताकि लोगों को सरकार की योजनाओं की जानकारी प्राप्त हो सके।

उन्होंने कहा कि संत-महात्माओं द्वारा जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी का स्मारक बनाए जाने का अनुरोध किया गया है। प्रयागराज अनेक ऋषियों, मुनियों, महात्माओं की धरती है। मुख्यमंत्री ने बैठक में जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी का भव्य स्मारक बनाए जाने हेतु प्रशासन को जमीन चिन्हीकरण सहित अन्य आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए।

बैठक में जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री जी को अपने प्रस्तावों व सुझावों से अवगत कराया। मंडलायुक्त प्रयागराज ने मुख्यमंत्री जी को माघ मेले के आयोजन की तैयारियों के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी दी। बैठक के पूर्व, मुख्यमंत्री जी ने माघ मेला-2026 के लिए तैयार किए गए ‘मेला सेवा ऐप’ को लॉन्च किया। इस ऐप के क्यूआर कोड को स्कैन करके श्रद्धालु अपनी जरूरतों व सुझावों का साझा कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री जी ने प्रयागराज भ्रमण कार्यक्रम के दौरान सबसे पहले संगम नोज पहुंचकर वहां पर स्नान किया तथा पूजा-अर्चना की। उन्होंने माँ त्रिवेणी से माघ मेला-2026 के सकुशल सम्पन्न होने की मंगल कामना की। इसके पश्चात मुख्यमंत्री जी ने बड़े हनुमान जी मंदिर में दर्शन-पूजन किया।

मुख्यमंत्री जी ने प्रयागराज में निर्माणाधीन डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को सभी निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण, समयबद्ध व मानक के अनुसार पूर्ण कराने के निर्देश दिए। बैठक में जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, औद्योगिक विकास मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता ‘नन्दी’ सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण तथा शासन-प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

श्रीमद् जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य भगवान का प्राकोटत्सव


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोई व्यक्ति अचानक महान नहीं बन जाता है। महानता के लिए दिव्य गुणों को स्वयं में आत्मसात करने का सामर्थ्य, दृढ़ संकल्प व दिव्य दृष्टि होना आवश्यक है। एक सामान्य मनुष्य की दृष्टि सीमित होती है। उसकी दुनिया उसके परिवार तक सीमित रहती है। लेकिन एक महामानव की दृष्टि ईश्वरीय गुणों से भरपूर, दिव्य तथा कल्याणमयी होती है। उनका भाव स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए होता है। यही कार्य इस धराधाम पर प्रकट होकर पूज्यपाद श्रीमद् जगद्गुरु रामानंदाचार्य भगवान ने किया था।

मुख्यमंत्री 10 जनवरी 2026 को जनपद प्रयागराज में श्रीमद् जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य भगवान के 726वें प्राकट्योत्सव समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 726 वर्ष पूर्व जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी जब इस धरा पर जन्में थे, तब उस कालखंड में विदेशी हमले हो रहे थे। आक्रमणकारी सनातन धर्म को रौंदना चाहते थे। इसके लिए विदेशी आक्रान्ताओं ने साजिश रची थी। सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की साजिशें हो रही थीं। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी ने उस समय सबसे पहले मत और सम्प्रदायों को एकजुट करने का आह्वान करते हुए कहा था कि ‘सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणो मताः’ यानी सभी
जन ईश्वर के चरणों में शरणागति के अधिकारी हैं। मत और सम्प्रदाय के आधार पर किसी को मत बांटो।
उन्होंने कहा कि जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी ने अलग-अलग जाति के द्वादश शिष्य बनाए। इन शिष्यों में श्री अनन्ताचार्य जी महाराज, श्री कबीरदास जी महाराज, सतगुरु रविदास जी महाराज, सतगुरु पीपाजी महाराज, श्री सुरसरानन्द जी महाराज, स्वामी सुखानन्द जी महाराज, स्वामी नरहर्यानन्द जी महाराज, स्वामी भावानन्द जी महाराज, श्री धन्ना जी, श्री सेन जी, श्री गालवानन्द जी, श्री योगानन्द जी सम्मिलित हैं। इन सभी शिष्यों में समाज को जोड़ने का कार्य किया। रामानन्द परम्परा से निकली हुई अलग-अलग धाराएं आज भी समाज को जोड़ने का अद्भुत कार्य कर रही हैं। यह अद्भुत संयोग है कि यह शिष्य सगुण व निर्गुण दोनों उपासना
विधियों से जुड़े हुए हैं।

उन्होंने कहा कि रविदासी परम्परा से जुड़े संत सात्विक भाव से कुटिया बनाकर तथा केवल कंठी धारण कर प्रभु की उपासना के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं। कबीरदासी परम्परा से जुड़े संतों ने जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी की
परम्परा को मजबूती के साथ आगे बढ़ाया। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी ने कहा था कि ‘जाति-पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’। यह मंत्र समाज को जोड़ने वाला है। हमने सतुआ बाबा तथा अन्य सन्तों से कहा है कि दारागंज में जिस स्थल पर जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी का प्राकट्य हुआ था वहां उनका स्मारक और मंदिर बनना चाहिए। प्रदेश सरकार इस कार्य में पूरा सहयोग करेगी।

उन्होंने कहा कि प्रयागराज आज फिर उद्घोष कर रहा है कि जाति, मत और सम्प्रदाय के आधार पर विभाजन हमारे लिए उसी प्रकार से सर्वनाश का कारण बन जाएगा जैसे बांग्लादेश में देख रहे हैं। सेकुलरिज्म का ठेका लेने वाले लोग, जिनकी दुकानें सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश पर चलती है, बांग्लादेश की घटना पर उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा है। कोई कैंडल मार्च नहीं निकाला जा रहा है। यह घटना हम सभी के लिए चेतावनी है।

उन्होंने कहा कि हमारा संत समाज, समाज को जोड़ने के लिए पूरी युक्ति करता है। जब सन्त समाज एक मंच पर आकर उद्घोष करता है तो उसके अच्छे परिणाम दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर
भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण पूज्य सन्तों की उसी साधना और एकता का परिणाम है, जिसे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मूर्त रूप देकर भारत की परम्परा को गौरवान्वित किया है। अब तक देश में कई प्रधानमंत्री हुए सभी ने देश के विकास में अपना योगदान दिया। लेकिन भारत की मूल आत्मा हो सम्मान दिलाने का कार्य के केवल प्रधानमंत्री जी ने ही किया। मोदी जी पहले प्रधानमंत्री हैं जो श्रीराम जन्मभूमि में दर्शन करने गए थे। वह श्रीराम मंदिर के शिलान्यास तथा श्रीरामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में सम्मिलित हुए। प्रधानमंत्री जी सनातन धर्म की ध्वजा पताका के मंदिर शिखर पर आरोहण के समारोह में स्वयं भागीदार बने।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने दुनिया को दिखा दिया कि कार्य करने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए। जो लोग आज आपको बांट रहे हैं वह आपके हितैषी कभी नहीं हो सकते। यह लोग जब सत्ता में थे तो स्वयं के परिवार के बारे
में सोचते थे। इस सोच से बाहर उनकी दृष्टि नहीं थी। इनको जब भी मौका मिलेगा, यह वही करेंगे जो इन्होंने पहले किया था। पहचान का संकट खड़ा करेंगे। अराजकता पैदा करेंगे। सनातन धर्म पर प्रहार करेंगे। दंगों की आड़ में फिर से प्रत्येक व्यक्ति को झुलसाने का कार्य करेंगे। किसी भी स्थिति में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होने देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश और दुनिया से आने वाले सनातन धर्मावलम्बी प्रयागराज की पावन धरा पर त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर जीवन के आदिदैविक, आदिभौतिक तथा आध्यात्मिक तापों से मुक्त होने के संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं। देश के अलग-अलग कोने से आए जिज्ञासु प्रयागराज की धरा पर धर्म, न्याय और ज्ञान के साथ उपस्थित होते हैं। जब कोई राम व गंगा भक्त देश की सत्ता में रहता है, तभी ऐसा दिव्य अवसर प्राप्त होता है। प्रधानमंत्री जी ने नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से माँ गंगा के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उन्हें स्वच्छ व निर्मल
बनाने का कार्य किया है। भारत माता का सच्चा पुत्र ही ऐसा काम कर सकता है। माँ गंगा में स्नान कर दिव्य अनुभूति हो रही है। जो स्नान कर रहा है, प्रधानमंत्री जी को आशीर्वाद दे रहा है व उनके प्रति आभार व्यक्त कर रहा है।

इस अवसर पर जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, औद्योगिक विकास मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता ‘नंदी’, पूज्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी राघवाचार्य जी महाराज, जगद्गुरु विदेहवल्लभ देवाचार्य, पूज्य जगद्गुरु विष्णुस्वामी सम्प्रदायाचार्य, स्वामी सन्तोषाचार्य (सतुआ बाबा) जी महाराज, परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष पूज्य स्वामी
चिदानंद सरस्वती जी महाराज, दिगम्बर अखाड़ा के श्री महंत श्री वैष्णोदास जी महाराज, निर्मोही अखाड़ा के श्री महंत राजेंद्रदास जी महाराज, महंत मोहनदास जी महाराज, महामण्डलेश्वर जनार्दन दास जी महाराज, बाघम्बरी पीठ के पीठाधीश्वर श्री महंत बलवीर गिरी जी महाराज, बड़ा भक्तमाल अयोध्या के पूज्य महंत श्री अवधेश दास जी महाराज, रसिक पीठ के श्री महंत जन्मेजय शरण जी महाराज सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

Wednesday, January 7, 2026

आगरा के बटेश्वर में नाविक सुनाएंगे लोक कथाएं


यमुना तट पर बसे ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन ग्राम बटेश्वर में ग्रामीण पर्यटन को नई दिशा देने का महत्वाकांक्षी प्रयास किया गया है। स्थानीय नाविकों को केवल नाव संचालन तक सीमित न रखते हुए उन्हें कहानी कहने की कला से जोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे पर्यटकों को बाह बटेश्वर की संस्कृति, इतिहास और आस्था से परिचित कराया जा सके। मान्यवर कांशीराम पर्यटन प्रबंधन संस्थान (एमकेआईटीएम) लखनऊ के सहयोग से एसडीआरएफ टीम द्वारा आयोजित तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम 5 से 7 जनवरी तक नाविकों को आपदा प्रबंधन, आपात स्थितियों में प्राथमिक उपचार तथा ऑनलाइन पेमेंट जैसी आधुनिक सुविधाओं संबंधी प्रशिक्षण भी दिया गया।

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 7 जनवरी 2026 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए बताया कि बटेश्वर में ग्रामीण पर्यटन को सशक्त बनाना हमारी प्राथमिकता है। नाविकों को स्टोरी टेलिंग, आपदा प्रबंधन और आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से जोड़कर हम उन्हें केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि बटेश्वर की संस्कृति, इतिहास और आस्था का संवाहक बना रहे हैं। इससे पर्यटकों का अनुभव और अधिक परिपक्व होगा, वहीं स्थानीय समुदाय के लिए आजीविका के नए अवसर भी सृजित होंगे।

नाविक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मान्यवर काशीराम इंस्टीट्यूट, लखनऊ के स्टोरी टेलर गौरव श्रीवास्तव ने प्रशिक्षुओं को बाह बटेश्वर की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन विरासत के संबंध में विस्तृत जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार स्टोरी टेलिंग के माध्यम से यहां आने वाले पर्यटकों को घाटों, नौका विहार एवं प्रमुख पर्यटन स्थलों की जानकारी प्रभावी ढंग से दी जा सकती है। स्थानीय पर्यटन स्थल से जुड़ी कहानी किस प्रकार पर्यटकों की यात्रा को यादगार बनाने में अहम होती है। प्रशिक्षुओं को सैलानियों के साथ शिष्टाचारपूर्ण संवाद के साथ पेश आने का प्रशिक्षण दिया गया।


उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 से उत्तर प्रदेश पर्यटन द्वारा लगातार नाविकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, अब तक 2500 से ज्यादा लोगों को उनके द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। एसडीआरएफ की टीम ने आपात स्थितियों से निपटने के व्यावहारिक तरीके सिखाए। वहीं चिकित्सकों ने संकट के समय सीपीआर एवं त्वरित प्राथमिक उपचार की जानकारी दी। इसके साथ ही ऑनलाइन पेमेंट जैसी आधुनिक सुविधाओं का प्रशिक्षण देकर नाविकों को पर्यटन की बदलती जरूरतों के अनुरूप तैयार किया गया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर सभी नाविकों को पहचान और एकरूपता देने दे उद्देश्य से टीशर्ट व सदरी का वितरण किया गया। बटेश्वर के अटल संकुल केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 32 नाविकों को प्रशिक्षित किया गया। 

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में पर्यटन को हम केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित न रखते हुए स्थानीय समुदायों को भी सहभागी बना रहे हैं। नाविकों के निरंतर प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें कौशल, आत्मविश्वास और पहचान मिल रही है। हमारा लक्ष्य समावेशी पर्यटन को बढ़ावा देते हुए जन सहभागिता और सामुदायिक भागीदारी को पर्यटन विकास की मजबूत आधारशिला बनाना है, ताकि पर्यटन का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।


Thursday, January 1, 2026

देव दर्शन





देव दर्शन 1 जनवरी 2026
बासुकीनाथ (बासुकीनाथ धाम) झारखंड राज्य के दुमका ज़िले में स्थित भगवान शिव का एक प्रमुख तीर्थ है। इसे बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) का “सहचर/उप-पीठ” भी माना जाता है। 
1. बासुकीनाथ का महत्व
भगवान शिव का पवित्र धाम: यहाँ बाबा बासुकीनाथ (शिव) की पूजा होती है।
बैद्यनाथ धाम से संबंध: मान्यता है कि देवघर में जल अर्पण के बाद बासुकीनाथ में दर्शन किए बिना यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।
श्रावणी मेला: सावन महीने में लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। कांवरिये देवघर से जल चढ़ाने के बाद बासुकीनाथ पहुँचते हैं।
मनोकामना पूर्ति: भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से पूजा करने पर बाबा इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बासुकीनाथ धाम प्राचीन काल से आस्था का केंद्र रहा है।
स्थानीय परंपराओं और पुराण-कथाओं के अनुसार यह स्थल नागों के राजा वासुकी से जुड़ा हुआ है।
समय के साथ यहाँ मंदिर का निर्माण और विस्तार हुआ; वर्तमान मंदिर लोक-आस्था और क्षेत्रीय राजाओं/भक्तों के सहयोग से विकसित हुआ।
यह क्षेत्र आदिवासी संस्कृति और शैव परंपरा का संगम माना जाता है।
3. बासुकीनाथ की कथा (पौराणिक मान्यता)
वासुकी नाग की कथा: वासुकी नाग, नागों के राजा, भगवान शिव के परम भक्त थे। कहा जाता है कि उन्होंने यहाँ घोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया। उसी स्थान पर शिव बाबा बासुकीनाथ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन में प्रयुक्त वासुकी नाग से भी इस धाम का नाम जुड़ा है, जो शिव से अभिन्न संबंध दर्शाता है।
4. पूजा-पद्धति और परंपराएँ
जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग अर्पण किया जाता है।
सावन, महाशिवरात्रि और सोमवारी व्रत के दिनों में विशेष भीड़ रहती है।
देवघर–बासुकीनाथ यात्रा को पूर्ण शैव यात्रा माना जाता है।

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें










नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें-2026
बाबा बैधनाथ (बैद्यनाथ धाम) भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। इसे बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है।
स्थान: देवघर, झारखंड
मान्यता: यहाँ भगवान शिव वैद्य (चिकित्सक) रूप में पूजे जाते हैं, इसलिए “बैधनाथ/वैद्यनाथ”
विश्वास: रोग, कष्ट और मानसिक पीड़ा से मुक्ति की कामना के लिए भक्त यहाँ जलाभिषेक करते हैं
श्रावण मेला: श्रावण मास में लाखों कांवड़िए सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा पर चढ़ाते हैं
पौराणिक कथा (संक्षेप में):
कहा जाता है कि रावण भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता था। शिव ने शर्त रखी कि जहाँ लिंग रखोगे, वहीं स्थापित हो जाएगा। देवताओं की लीला से रावण ने यहाँ लिंग रख दिया और वही बैद्यनाथ धाम बना।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है