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Tuesday, February 3, 2026

मीडिया विमर्श में लेख प्रकाशित







जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका 'मीडिया विमर्श'  ने RSS के 100 वर्षों पर केंद्रित एक संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित किया है। इसमें संघ से जुड़ी लगभग सभी जिज्ञासाओं और विचारों को प्रकाश में लाया गया है। 
Indian Institute of Mass Communication के पूर्व निदेशक एवं वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. Sanjay Dwivedi  जी और विशेषांक के संपादक डॉ. Lokendra Singh Rajput जी का इस अंक हेतु अभिनंदन।

Thursday, July 10, 2025

अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक गौरवशाली एवं समृद्ध सभ्यताओं में एक है। विश्व के अनेक देशों में जब बर्बरता का युग था, उस समय भी हमारी भारतीय सभ्यता अपने शीर्ष पर थी। इसका सबसे प्रमुख कारण है शिक्षा। हमारे पूर्वजों ने शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत उन्नति की। शिक्षा के माध्यम से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ। इस पवित्र भारत भूमि पर वेद-पुराणों की रचना हुई तथा यह सब शिक्षा के कारण ही संभव हो सका। मनुष्य के लिए जितने आवश्यक वायु, जल एवं भोजन है, उतनी ही आवश्यक शिक्षा भी है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु समान है।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पुज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः।।
अर्थात विद्या मनुष्य का विशेष रूप है, विद्या गुप्त धन है। वह भोग की दाता, यश की दाता एवं उपकारी है। विद्या गुरुओं की गुरु है। विद्या विदेश में बंधु है। विद्या देवता है। राजाओं के मध्य विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्या विहीन मनुष्य पशु है।
निसंदेह किसी भी सभ्य समाज के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के लिए नहीं होती कि विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय से शैक्षिक प्रमाण-पत्र प्राप्त कर राजकीय या अराजकीय नौकरी प्राप्त कर ली जाए। शिक्षा का उद्देश्य तो मानव के संपूर्ण जीवन का विकास करना होता है। हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षित व्यक्ति के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते।।
अर्थात विद्या, तर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं दक्षता, जिसके पास ये छह गुण हैं, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। विद्या अथवा शिक्षा प्रकाश का वह स्त्रोत है, जो मानव जीवन को प्रकाशित करता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति थी। किन्तु कालांतर में शिक्षा पद्धति में परिवर्तन आया तथा शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करने तक ही रह गया। बहुत समय से वर्तमान शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की बात उठ रही थी तथा ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके। साथ ही बच्चों के कंधों से बस्ते का भार कुछ कम किया जा सके।
  
उत्तम शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम में चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को विकसित करने के विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से केवल मनुष्य की भौतिक उन्नति होती है, किन्तु औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होने चाहिए, जिससे नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। वर्तमान युग में मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिक उन्नति कर रहा है, त्यों-त्यों वह जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आपसी पारिवारिक संबंध टूटते जा रहे हैं। किसी को किसी की तनिक भी चिंता नहीं है। परिवार के वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है तथा बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिए जाते हैं। ग्रामों की पैतृक संपत्ति को बेचकर महानगरों में छोटे-छोटे आवासों में भौतिक सुख-सुविधा में जीने को ही मनुष्य ने जीवन की सफलता मान लिया है। यदि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना है, तो सबसे पहले वर्मान शिक्षा पद्धति में सुधार करना होगा। इसी उद्देश्य के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के सभी विद्यालयों में प्रथम कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक अनुभूति पाठ्यक्रम लागू करने जा रही है।
  
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात पर चिंता प्रकट की जा रही है कि मानव का जीवन- मूल्यों से विश्वास उठता जा रहा है। वह चरित्र की अपेक्षा धन को महत्त्व दे रहा है। इससे उसका नैतिक पतन हो रहा है। मनुष्य के चारित्रिक पतन के कारण समाज में अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे मनुष्य का नैतिक विकास हो तथा वह एक सुसभ्य समाज का निर्माण करने में सहायक सिद्ध हो सके। नि:संदेह शिक्षा इसका सबसे सशक्त माध्यम है। नई शिक्षा पद्धति का उद्देश्य ऐसे सदाचारी मनुष्यों का विकास करना है, जिनमें दया, करुणा, सहानुभूति एवं साहस हो। जो नैतिक मूल्यों से संपन्न हों, जिनके लिए मानवीय मूल्य सर्वोपरि हों।  
 
शिक्षा का प्रथम उद्देश्य विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण करना होता है। भारतीय संस्कृति में चरित्र निर्माण पर सर्वाधिक बल दिया गया है। मनुस्मृति के अनुसार सभी वेदों का ज्ञाता विद्वान भी सच्चरित्रता के अभाव में श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु केवल गायित्री मंत्र का ज्ञाता पंडित यदि चरित्रवान है, तो श्रेष्ठ है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है, ताकि वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को उसके अधिकारों के साथ-साथ उसके कर्त्तव्यों के बारे में भी बताना है, ताकि वह अपने अधिकारों को प्राप्त कर सके तथा परिवार एवं समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का भी निर्वाहन कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के जीवन स्तर को उन्नत व समृद्ध बनाना भी है। शिक्षा के माध्यम से वह अपने जीवन को सुगम, उन्नत एवं समृद्ध बना सके। विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ व्यवसायिक कार्यों का भी प्रशिक्षण दिया जाता था, ताकि वे अपने-अपने कार्यों में भी निपुणता प्राप्त कर सकें। एक नैतिकता से परिपूर्ण चरित्रवान व्यक्ति ही अपने कुल तथा देश का नाम ऊंचा करता है।
 
उत्तर प्रदेश में ऐसी ही शिक्षा पद्धति को लागू किया जा रहा है। कम शब्दों में बात की जाए, तो मूल रूप से शिक्षा के दो ही उद्देश्य हैं, प्रथम यह कि व्यक्ति शिक्षा ग्रहण कर समृद्धि प्राप्त करे एवं प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करे तथा द्वितीय यह कि वह दूसरों को प्रसन्नता एवं सहायता प्रदान करने योग्य हो। छोटी कक्षाओं से लेकर महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय तक की शिक्षा का कुल उद्देश्य यही है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब वर्तमान शिक्षा का उद्देश्य समृद्धि ही है तो फिर अनुभूति पाठ्यक्रम की आवश्यकता क्यों है? 

वास्तव में हम सुख-सुविधाओं को जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। आज उच्च शिक्षा प्राप्त करके तथा उसके माध्यम से उच्च पद प्राप्त करना। तत्पश्चात अकूत धन-संपदा एकत्रित करना ही जीवन का उद्देश्य बनकर रह गया है। इस भागदौड़ में मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। इन्हीं मानवीय मूल्यों के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश में अनुभूति पाठ्यक्रम लागू किया जा रहा है।  राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। बात चाहे प्राथमिक शिक्षा की हो, माध्यमिक शिक्षा की हो, व्यावसायिक शिक्षा की हो या उच्च शिक्षा की, सभी क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किए जा रहे हैं। आशा है कि राज्य के शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के माध्यम से अनुभूति पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में नई ऊर्जा का संचार करेगा तथा यह विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगो सिद्ध होगा। 

Thursday, May 15, 2025

अनुभव से ही सीखना प्रारम्भ करते हैं बालक

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
मनुष्य जन्म से लेकर मृत्य तक कुछ न कुछ सीखता रहता है। उसके जन्म के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। प्रकृति सबसे बड़ी शिक्षक होती है। बालक को कोई कष्ट होता है, तो वह रोने लगता है। उसके रोने की आवाज सुनकर उसकी माता उसके पास आती है और उसका कष्ट दूर करती है। बालक भूखा होता है, तब भी वह रोने लगता है और उसकी माता उसे दुग्धपान करवाती है। बालक भली भांति समझ जाता है कि उसे कुछ चाहिए तो उसे क्या करना है। सर्वविदित है कि बालक अपनी मांग मनवाने के लिए पहले जिद करते हैं और जब कभी जिद पूर्ण नहीं हो पाती है, तो वे रोने लगते हैं। जन्म से ही उनमें समझ का विकास होने लगता है और यह प्राकृतिक एवं नैसर्गिक है। 
 
माता बालक की प्रथम गुरु होती है और उसकी गोद बालक का प्रथम गुरुकुल होता है। इसके पश्चात बालक अपने परिवारजनों को देखकर सीखते हैं। उनसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि किस व्यक्ति के साथ उनका कैसा संबंध है। कौन संबंधी है और कौन अपरिचित है। अपने संबंधियों के साथ उन्हें किस प्रकार का व्यवहार करना है। किस प्रकार उनका आदर-सत्कार करना है। सभी बालक अपने परिवार से ही सीखते हैं। उन्हें परिवार से जैसी शिक्षा एवं संस्कार मिलते हैं, वे उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। कहा जाता है कि बालक कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जिस आकार में ढालो, वे ढल जाते हैं। बालकों के मन एवं मस्तिष्क पर उनके आसपास के परिवेश एवं वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है।     
अमेरिकी लेखक डोरोथी नाल्ट के अनुसार बच्चे वही समझते हैं, जो वे जीते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्धांत एवं विवेक दोनों इस पर सहमत हैं। बालकों के बाल्यकाल के अनुभवों से उनके सीखने, समझने और विकास का क्रम प्रभावित होता है।        
 
विगत कुछ समय से अनुभव आधारित शिक्षा की चर्चा हो रही है। अनुभव आधारित शिक्षण क्या है? सर्वप्रथम यह समझना अति आवश्यक है। अनुभव के आधार पर जो ज्ञान अर्जित किया जाता है, उसे ही अनुभव आधारित शिक्षण कहा जाता है। यदि कोई बालक किसी चीज को देखकर, सुनकर या स्वयं के अभ्यास के द्वारा सीखता है तो उसे अनुभव के आधार पर सीखना कहा जाएगा। उदाहरण के लिए कोई बालक किसी को साईकिल चलाते हुए देखता है और फिर स्वयं भी उसे चलाने का प्रयास करता है। इस अभ्यास के दौरान वह कई बार गिर जाता है, परन्तु वह अपना अभ्यास निरंतर जारी रखता है। परिणाम स्वरूप एक दिन वह साईकिल चलाना सीख जाता है। जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान व्यक्ति को अनुभव के आधार पर ही प्राप्त होता है। बालिकाएं अपनी माता को भोजन बनाते हुए देखती हैं। फिर वे भी भोजन बनाने का प्रयास करती हैं। आरम्भ में वे स्वादिष्ट भोजन नहीं बना पाती हैं। कई बार नमक या मिर्च कम या अधिक हो जाती है। इसी प्रकार रोटी भी टेढ़ी-मेढ़ी बनती हैं, परन्तु अभ्यास से वे स्वादिष्ट भोजन और गोल रोटी बनाना सीख जाती हैं। इस भोजन बनाने के अभ्यास के दौरान बालिकाओं के परिवारजन उनका उत्साहवर्द्धन करते हैं तथा उनका मनोबल बढ़ाते हैं। भोजन स्वादिष्ट न होने के पश्चात भी वे उसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते हैं तथा बालिका की प्रशंसा भी करते हैं। इस प्रशंसा से प्रसन्न होकर बालिका पहले से भी अधिल परिश्रम करती है। ऐसे बहुत से कार्य हैं, जो बालक अपने परिवारजनों से सीखते हैं।  
अक्षर ज्ञान आवश्यक एवं उत्तम है, परन्तु व्यवहारिक ज्ञान सर्वोत्तम है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि मनुष्य शनै- शनै सीखता है। सीखने की गति समय एवं परिस्थितियों पर निर्भर करती है। उसके अनुभव उसके जीवन की दशा एवं दिशा प्रशस्त करते हैं। अनुभव उसे वह पाठ पढ़ा जाते हैं, जो वह कभी नहीं भूलता। 
 
विद्वान मानते हैं कि अनुभवों से लाभान्वित होना ही अधिगम है। इसलिए छात्रों को अनुभव आधारित शिक्षा प्रदान करने को अधिक से अधिक महत्व देना चाहिए। इसके लिए ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, जो विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित व्यापक अनुभव प्रदान करने में सक्षम हो।
अमेरिकी शिक्षक गैलेन सायलर एवं विलियम अलेक्जेंडर के अनुसार- “अनुभव आधारित पाठ्यक्रम वह है, जिसमें अधिगम अनुभव की इकाइयां विद्यार्थियों के द्वारा शिक्षक के निर्देशन में स्वयं चुनी तथा योजनाबद्ध की जाती हैं।“
 
संयुक्त राज्य अमेरिका के शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी के अनुसार- “अनुभव एवं ज्ञान क्रिया के परिणाम हैं।“ वह ज्ञान एवं अनुभव में कोई भेद नहीं मानते हैं। उनके अनुसार- “ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है और अनुभव स्वयं करके प्राप्त होता है। इसलिए पाठ्यक्रम अनुभव प्रधान होना चाहिए। मनुष्य किसी भी परिस्थिति में रहे, परिस्थितियों में क्रिया करते हुए ही मनुष्य अनुभव प्राप्त करता है और यह भी सत्य है कि एक अनुभव से दूसरा तथा दूसरे से तीसरा  और इसी प्रकार आगे के अनुभव हमें प्राप्त होते रहते हैं। प्रत्येक अनुभव हमें आगे के अनुभव प्राप्त करने में सहायक होता है। अतः पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को अधिक से अधिक अनुभव प्रदान करना होना चाहिए।“
 
आज हम विदेशों से बहुत सी चीजें ग्रहण कर रहे हैं। यद्यपि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति अत्यधिक प्रभावशाली एवं उत्तम थी। प्राचीन काल से ही हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में विख्यात रहा है। भारत शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। इस पवित्र भूमि पर पवित्र ग्रन्थों की रचना हुई। यहां वेद-पुराणों की रचना हुई। ये महान ग्रन्थ यहां की उच्च कोटि की पद्धति के प्रमाण हैं। यह सब व्यवहारिक शिक्षा के कारण ही संभव हो सका। इसे सर्वोत्तम कहना भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारतीय संस्कृति में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए शिक्षा को अति आवश्यक माना गया है। शिक्षित व्यक्ति के लिए विश्व का कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते।।
अर्थात विद्या, तर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं दक्षता, जिसके पास ये छह गुण हैं, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। विद्या अथवा शिक्षा प्रकाश का वह स्त्रोत है, जो जीवन को प्रकाशमान करता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति थी, किन्तु कालांतर में शिक्षा पद्धति में परिवर्तन आया। आज फिर ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता अनुभव की जा रही है, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।
 
दादी और नानी बालकों को भिन्न-भिन्न प्रकार की कहानियां सुनाती हैं। इन कथा- कहानियों के माध्यम से वे बालकों में संस्कार पोषित करती हैं। ये संस्कार उनके चरित्र का निर्माण करने में सहायक सिद्ध होते हैं। यही संस्कार संकट के समय दीपक बनकर उनके जीवन में प्रकाश का कार्य करते हैं तथा उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा पैतृक नगरों में जाते हैं तो वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। उनके वहां की बहुत सी चीजों को जानने और समझने का अवसर प्राप्त होता है। ऐतिहासिक धरोहरों से वे इतिहास से परिचित होते हैं। तीज-त्यौहारों से वे अपनी धार्मिक संस्कृति से परिचित होते हैं। अक्षर ज्ञान से बच्चे इतनी शीघ्रता से नहीं सीख पाते, जितने शीघ्रता से वे अनुभव के आधार पर सीख जाते हैं। उदाहरण के लिए जिस बालक ने कभी दीपावली का त्यौहार मनाते हुए नहीं देखा, उसे पुस्तक के माध्यम से दीपावली के बारे में बताया जाए और फिर उससे दीपावली के बारे में लिखने के लिए कहा जाए, तो वह इतना अच्छा नहीं लिख पाएगा, जितना अच्छा वह बालक लिख पाएगा, जिसने दीपावली मनाई है या मनाते हुए देखा है। इसका कारण यह है कि पहले बालक ने केवल शब्दों के माध्यम से दीपावली के बारे में ज्ञान अर्जित किया है, जबकि दूसरे बालक ने दीवापली मनाकर या देखकर व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है। इस व्यवहारिक ज्ञान में उसका अनुभव एवं अनुभूति भी सम्मिलत है। इसलिए दूसरे बालक ने दीपावली के बारे में वह ज्ञान प्राप्त किया, जो उसे सदैव स्मरण रहेगा।     
 
विश्व की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सरोकारों के लिए गठित संगठन यूनेस्को के अनुसार समझने की प्रक्रिया के चार स्तंभ हैं। प्रथम स्तंभ है जानने के लिए सीखना एवं समझना- अपने आसपास के परिवेश और विश्व में जो कुछ भी है उसे सीखना एवं समझना, उसे भावना और तर्क के साथ समझना। यह जानना कि जो कुछ सीखा एवं देखा उसका भावनाओं के उदात्तीकरण और उन्नयन की दृष्टि से क्या महत्त्व है और यह कितना व्यवहारिक है। 
द्वितीय है करने के लिए सीखना एवं समझना- जो परिस्थितियों, परिवेश और वातावरण में मिले उसे स्वीकार करना और उन परिस्थितियों को समाज और स्वयं के लिए उपयोगी कैसे बनाया जाए- यह सुनिश्चित करना है।
तृतीय है होने के लिए सीखना एवं समझना- होने का यहां अर्थ अपने अस्तित्व को सिद्ध करना है अर्थात एक मनुष्य, एक नागरिक के रूप में मेरा कहां क्या दायित्व है और उस व्यक्ति के रूप में मेरा उपस्थित होना कितना प्रभावी है- यह निर्धारण करना है। क्या समाज और परिस्थितियों में मेरे व्यक्तित्व के लिए कोई स्थान है या मैं यहां अनुपयुक्त हूं। इस संबंध में सचेत रहना है।
चतुर्थ है साथ रहने के लिए सीखना एवं समझना- सभी धर्मों, जातियों, आयु वर्ग के लोगों, लिंग संबंधी भिन्नता रखने वाले लोगों के साथ सहिष्णुता पूर्वक रह सकना। संपूर्ण विश्व की विविधताओं, संस्कृतियों, भाषाओं एवं भौगोलिकताओं को आदर देना। उनके साथ सहिष्णुता पूर्वक रह सकने की क्षमता और आदत विकसित करना।    
 
वास्तव में जिस व्यक्ति में प्रेम और सद्भाव आदि गुण होते हैं, वह विश्व के किसी भी क्षेत्र में आराम से रह सकता है। ये गुण बालकों में बाल्यकाल से ही रोपित करने होते हैं। महामना मदनमोहन मालवीय का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र के व्यक्तित्व के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक पहलुओं को विकसित करना होना चाहिए। शिक्षा को न केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, अपितु व्यावहारिक प्रशिक्षण और कौशल विकास भी प्रदान करना चाहिए।   
इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द भी व्यावहारिक शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार- “जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सके और विचारों का सामंजस्य कर सकें वहीं वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।”  

Thursday, April 6, 2023

मूल्य आधारित शिक्षा है सुख की अनुभूति का आधार

  


Tuesday, April 4, 2023

मूल्य आधारित शिक्षा है सुख की अनुभूति का आधार


-डॉ. सौरभ मालवीय  
हमारी प्राचीन गौरवशाली भारतीय संस्कृति समस्त   विश्व के सुख, समृद्धि एवं शान्ति की कामना करती है। भारतीय चिन्तन में व्यष्टि से समष्टि तक का विचार किया गया है। भारतीय पर्व इस बात का प्रतीक हैं। यहां पर प्राय: प्रतिदिन कोई न कोई लोकपर्व, व्रत, पूजा एवं अनुष्ठान का दिवस होता है, जो इस बात का प्रतीक है कि भारतीय अपने जीवन में कितने प्रसन्न रहते हैं। हमारे धर्म ग्रन्थों में भी सुख पर अनेक श्लोक एवं मंत्र हैं।  
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
अर्थात सभी सुखी रहें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े।
किन्तु आज भारतीय प्रसन्नता के मामले बहुत पिछड़ गए हैं। अब भारतीय पूर्व की भांति प्रसन्न नहीं रहते। वे दुखी रहने लगे हैं। एक सर्वे में यह बात सामने आई है।     

उल्लेखनीय है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस पर जारी वार्षिक प्रसन्नता रिपोर्ट के अनुसार 137 देशों की सूची में भारत 125वें स्थान पर है। वर्ष 2022 में भारत इस सूची में 144वें स्थान पर था तथा वर्ष 2021 में 139वें स्थान पर था। प्रसन्नता के संबंध में पड़ोसी देशों की स्थिति भारत से अच्छी है। पाकिस्तान 108वें स्थान पर है, जबकि म्यांमार 72वें, नेपाल 78वें, बांग्लादेश 102वें और चीन 64वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड विश्व का सर्वाधिक प्रसन्नता वाला देश है। विगत छह वर्षों से वह अपने इस स्थान पर बना हुआ है। डेनमार्क द्वितीय और आइसलैंड तृतीय स्थान पर है। इस सूची में इजराइल चौथे स्थान पर है, जबकि नीदरलैंड्स पांचवें, स्वीडन छठे, नार्वे सातवें, स्विटजरलैंड आठवें, लक्जमबर्ग नौवें और न्यूजीलैंड दसवें स्थान पर है। सबसे कम प्रसन्न देशों की सूची में लेबनान, जिम्बॉब्वे, द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो आदि देश सम्मिलित हैं। इस सूची में अफगानिस्तान अंतिम स्थान पर है। उसे 137वां स्थान प्राप्त हुआ है।

उल्लेखनीय है कि विगत एक वर्ष से रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध चल रहा है। फिर भी इन देशों की स्थिति भारत से अच्छी है। इस सूची में रूस 70वें स्थान पर है, जबकि यूक्रेन को 92वें स्थान पर है। यह रिपोर्ट यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट 150 से अधिक देशों के लोगों पर किए गए ग्लोबल सर्वे डाटा के आधार पर बनाई जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस
प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 2011 में प्रसन्नता के संबंध में एक प्रस्ताव अपनाया था। इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली ने 12 जुलाई 2012 को प्रस्ताव के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाने की घोषणा की थी। इस संबंध में अप्रैल 2012 में भूटान की राजसी सरकार ने विश्वभर के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई थी। इसमें इस बात पर चर्चा की गई कि लोगों की प्रसन्नता और कल्याण को भी आर्थिक दृष्टिकोण की तरह देखने की आवश्यकता है। बैठक में इसके लिए एक आयोग नियुक्त करने की भी अनुशंसा की गई। भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले ने इस अनुशंसा को स्वीकार किया। उनका कहना था कि सभी देशों की सरकारों को लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ-साथ उनकी प्रसन्नता और कल्याण को भी अधिक से अधिक महत्त्व देना चाहिए। 
उन्होंने बैठक में प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र भी इस आयोग का सह-स्वामित्व करे और यह आयोग यूएन महासचिव के सहयोग से इस दिशा में कार्य करे। 

विश्वभर के प्रसन्नता वाले नगरों में उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर सम्मिलित है। यहां के लोग प्रसन्न रहने वाले तथा मित्र बनाने वाले हैं। यह नगर समस्त भारत के लिए प्रेरणा बन गया है। इससे यह बात सामने आती है कि मित्रों के साथ रहने से व्यक्ति प्रसन्न रहता है। मित्र दुख- सुख के साथी होते हैं। मित्रों से बात करने पर मन हल्का हो जाता है। मित्र निराशा के समय आशा की किरण दिखाते हैं। मित्र प्रोत्साहित करते हैं। मित्रों के साथ व्यक्ति अपने जीवन का बहुत अच्छा समय व्यतीत करता है। मित्रों के साथ रहने से प्रसन्नता प्राप्त होती है।   
          
प्रसन्नता क्या है?
प्रसन्नता एक अनुभूति है। यह मानव मस्तिष्क में पाई जाने वाली भावनाओं में सबसे सकारात्मक अनुभूति है। इस अनुभूति के उत्पन्न होने के अनेक कारण हैं। इनमें अपनी किसी इच्छा की पूर्ति होने पर होने वाली संतुष्टि की अनुभूति सर्वोपरी है। 

प्राय: जीवन बहुत विशाल होता है। जीवन से सदैव सुख प्राप्त नहीं होता। मनुष्य को अनेक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है। यह अतिशय नहीं है कि जीवन में सुख कम और दुख अधिक होता है। इसके अनेक कारण है। मनुष्य जीवन में सदैव सुख की कामना करता है। वह समृद्धि प्राप्त करना चाहता है। वह अपार धनराशि संचय करना चाहता है, अर्थात वह जीवन में सबकुछ प्राप्त करना चाहता है, परन्तु सदैव ऐसा नहीं होता। उसकी कुछ इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं तथा कुछ इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं। उसकी जो इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं, वह उसके बारे में विचार नहीं करता, अपितु उससे अधिक की कामना करने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में वह दुख का भागीदार बन जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी जो इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं वह उनके बारे में भी चिंता करता रहता है। इस चिंता के कारण वह मानसिक तनाव से ग्रस्त हो जाता है। यह मानसिक तनाव उसे अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त कर देता है। इस प्रकार के मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या करके अपना जीवन भी समाप्त कर लेता है। उल्लेखनीय है कि आत्महत्या की सभी घटनाओं के पीछे मानसिक तनाव ही कारण होता है। यह स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है। वयस्क ही नहीं, अपितु बालक भी आत्मह्त्या जैसा जघन्य अपराध कर रहे हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आती रहती हैं। 

तनाव के कारण -
मानसिक तनाव के क्या कारण हैं? इस पर चिंतन मनन किया जाना चाहिए। बाल्यकाल जीवन का सबसे उत्तम समय होता है। यह तनाव मुक्त होता है। बच्चों पर किसी भी प्रकार का कोई दायित्व नहीं होता। उन्हें केवल शिक्षा प्राप्त करनी होती है तथा अपना शेष समय खेलकूद में व्यतीत करना होता है। फिर आज के बच्चे तनाव ग्रस्त क्यों हैं? इसके अनेक कारण हो सकते हैं।    

प्राय: देखने में आता है कि माता-पिता बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव बनाते हैं। सभी बच्चे पढ़ाई में श्रेष्ठ नहीं हो सकते। बच्चे प्रातःकाल में अपने विद्यालय जाते हैं। वहां से आने के पश्चात ट्यूशन के लिए जाते हैं। वहां से आने पर विद्यालय एवं ट्यूशन का कार्य करते हैं। ऐसे में बच्चों के पास अपने स्वयं के लिए समय ही नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त बच्चों को जबरन अन्य गतिविधियों में डालना एवं उन पर श्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव डालना भी उन्हें मानसिक तनाव से ग्रस्त कर देता है। 

माता-पिता के लिए अत्यावश्यक है कि वे अपने बच्चों की मनोस्थिति को समझें तथा उनकी पसंद एवं नापसंद का ध्यान रखें। वे बच्चों को विपरीत परिस्थितियों में भी सुख से रहने की शिक्षा दें। वे बच्चों को बताएं कि सुख और दुख दोनों ही जीवन के अभिन्न अंग हैं। हमें दुखों से घबराना नहीं चाहिए, अपितु ऐसे समय में संयम और धैर्य बनाए रखना चाहिए। यदि हम दुखों को चुनौती मानेंगे तथा स्वयं को योद्धा मानकर उसका सामना करेंगे, तो अवश्य ही हम विजय प्राप्त कर सकेंगे तथा विजेता सिद्ध होंगे। बच्चों को धार्मिक कथाएं सुनानी चाहिए कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का सामना किया। इसी प्रकार भगवान राम का उदाहरण भी है कि किस प्रकार उन्होंने अपने पिता का वचन पूर्ण करने के लिए चौदह वर्षों का वनवास सहर्ष स्वीकार किया, किस प्रकार उन्होंने रावण का संहार किया। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की कथा भी प्रेरणा देने वाली है कि किस प्रकार राजा हरिश्चंद्र ने अनेक कष्टों का सामना किया, परन्तु सत्य को नहीं त्यागा। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियां बच्चों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं तथा प्रेरक प्रसंग एवं महापुरुषों की जीवनी का ज्ञान बच्चों को करानी चाहिए। 

आज के वातावरण में बच्चे टीवी या मोबाईल में ही अधिक लगे रहते हैं। ऐसे में बच्चों को टीवी पर ऐसे कार्यक्रम देखने के लिए प्रोत्साहित करें, जो उनके लिए उपयोगी हैं। दूरदर्शन के अनेक चैनलों पर शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, विद्यार्थियों के लिए बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त बच्चे मोबाईल पर भी केवल शिक्षा संबंधी चीजें ही देखें। कोरोना काल से मोबाइल भी बच्चों की शिक्षा का एक अंग बन चुका है। माता-पिता को चाहिए कि वे इस पर पूर्ण दृष्टि बनाए रखें कि उनके बच्चे मोबाईल में क्या देख रहे हैं, क्योंकि बहुत से ऐसे खेल सामने आ रहे हैं, जो बच्चों को मानसिक तनाव से ग्रस्त कर रहे हैं। इस खेलों के कारण बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के अनेक मामले में भी सामने आ चुके हैं। इतना ही नहीं, यूट्यूब पर अनेक ऐसी चीजें हैं, जो बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए हंसी-मजाक के अनेक वीडियो ऐसे हैं, जिनमें अशिष्टता के साथ-साथ अश्लीलता भी है।            

मानव को बाल्यकाल से ही जीवन मूल्यों की शिक्षा देना हमारी भारतीय परम्परा का अंग रहा है। यह हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता है। विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जो उन्हें अक्षर ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों को समझने में भी सहायक सिद्ध हो। बच्चे जीवन में प्रसन्न रहना सीखें। बच्चा विद्यालय में कम समय व्यतीत करता है, परन्तु अधिक समय अपने घर में ही परिवारजनों के साथ रहता है। इसलिए यह अत्यावश्यक है कि माता- पिता स्वयं भी प्रसन्न रहें तथा अपने बच्चों को प्रसन्न रहना सिखाएं।

Saturday, February 4, 2023

भारत की ज्ञान परम्परा का दर्शन कराती है राष्ट्रीय शिक्षा नीति










04 फरवरी 2023 को स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज लखनऊ में प्रिंसपाल कॉन्क्लेव 2023 . चैलेंजेज इन इम्प्लीमेंटेशनश् का आयोजन किया गया। श्री भगवती सिंह, संयुक्त निदेशक माध्यमिक शिक्षा परिषद, लखनऊ मुख्य अतिथि तथा डॉ मनोरमा सिंह, इग्नू लखनऊ की क्षेत्रीय निदेशक एवं अनुभूति पाठ्यचर्या बेसिक शिक्षा विभाग के राज्य प्रभारी डॉ.सौरभ मालवीय मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
एसएमएस लखनऊ के सचिव तथा मुख्‍यकार्यकारी अधिकारी श्री शरद सिंह, निदेशक डॉ मनोज मेहरोत्रा, महानिदेशक. तकनीकी प्रो. डॉ बीआर सिंह के साथ एसोसिएट डायरेक्टर. डॉ धर्मेंद्र सिंह एसएमएस लखनऊ ने भाग लिया। कॉन्क्लेव में लखनऊ और आसपास के जिलों के विभिन्न स्कूल और कॉलेज  तथा एसएमएस लखनऊ के फैकल्टी सहित सौ से अधिक प्राचार्यों ने भाग लिया।

Sunday, November 27, 2022

कार्यशाला















सामाजिक भावनात्मक अधिगम मानवीय शिक्षा में मूल्य शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। बदलते परिवेश के दृष्टिगट अनुभूति पाठ्यक्रम की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जिस प्रकार विद्यार्थियों को विज्ञान, गणित इतिहास, भाषा आदि में विभिन्न तरीकों से पारंगत करते है, उसी प्रकार उनमें खुशी और शांति की समझ के लिए  अनुभूति, विचारों व चिंतन द्वारा ऐसा दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है। जिससे वह खुश रहें और दूसरों की प्रसन्नता में सहयोगी बनें।
अनुभूति कार्यक्रम शिक्षक हस्तपुस्तिका विकास कार्यशाला।
समापन सत्र।

Thursday, November 24, 2022

कार्यशाला






अनुभूति कार्यक्रम के अन्तर्गत "शिक्षक हस्तपुस्तिका विकास" कार्यशाला

Wednesday, November 23, 2022

कार्यशाला

 








राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अलोक में "भारतीय ज्ञान परम्परा और हैप्पीनेस कार्यक्रम" विषयक कार्यशाला इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्विद्यालय, क्षेत्रीय केन्द्र- लखनऊ द्वारा किया गया। वक्ता के रूप में सहभागिता का अवसर.

Tuesday, November 22, 2022

शिक्षक हस्तपुस्तिका विकास कार्यशाला









अनुभुति कार्यक्रम के अन्तर्गत शिक्षक हस्तपुस्तिका विकास कार्यशाला - प्रथम सत्र 

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है