Wednesday, December 17, 2025
उत्तर प्रदेश में डिजिटल क्रांति
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण युवाओं को आधुनिक शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी का अवसर देने के लिए योगी सरकार ने बड़ी पहल की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पहले चरण में प्रदेश की 11,350 ग्राम पंचायतों में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा रही है, जिससे गांव के छात्र अब शहरों पर निर्भर हुए बिना सिविल सर्विसेज सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकेंगे।
हर डिजिटल लाइब्रेरी पर चार लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। इसमें दो लाख रुपये की पुस्तकों की व्यवस्था होगी, जबकि 1.30 लाख रुपये के आईटी इक्यूपमेंट और 70 हजार रुपये के आधुनिक फर्नीचर लिए जाएंगे। लाइब्रेरी में ई-बुक्स, वीडियो लेक्चर, ऑडियो कंटेंट, क्विज और लगभग 20 हजार डिजिटल शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध रहेगी।
योगी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत 35 जिलों में पुस्तकों का चयन पूरा कर लिया गया है। राजधानी लखनऊ समेत इन जिलों की पंचायतों में शीघ्र ही डिजिटल लाइब्रेरी शुरू होंगी। योगी सरकार की यह पहल ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में ग्रामीण प्रतिभाओं को डिजिटल शक्ति देने का मजबूत कदम मानी जा रही है।
पंचायती राजमंत्री ओपी राजभर ने 17 दिसम्बर 2025 को यह जानकारी देते हुए कहा कि डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना से ग्रामीण युवाओं को अपने गांव में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का अवसर मिलेगा। यह योजना गांव और शहर के बीच शिक्षा के अंतर को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। पंचायतों को शिक्षा का केंद्र बनाकर हम ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का कार्य कर रहे हैं।
पंचायती राज निदेशक अमित कुमार सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी एवं पंचायती राजमंत्री ओम प्रकाश राजभर के निर्देश पर प्रदेश के सभी जिलों की पंचायतों में चरणबद्ध तरीके से डिजिटल लाइब्रेरी खोली जाएंगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर सुधरेगा और युवा रोजगार के लिए अधिक सक्षम बन सकेंगे। डिजिटल लाइब्रेरी का प्रबंधन ग्राम प्रधान और सचिव करेंगे, जबकि सहायक अधिकारी इसकी नियमित देखरेख करेंगे। इन जिलों में अमरोहा, आजमगढ़, बांदा, बलिया, बागपत, बदायूं, बरेली, बिजनौर, चित्रकूट, एटा, फतेहपुर, फर्रूखाबाद, फिरोजाबाद, गाजियाबाद, गाजीपुर, हरदोई, हापुड़, जालौन, कानपुर देहात, कन्नौज, कौशाम्बी, कासगंज, लखनऊ, मऊ, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, रायबरेली, सम्भल, शामली, सिद्धार्थनगर, श्रावस्ती, सुल्तानपुर और सीतापुर सम्मिलित हैं।
लखनऊ: 17 दिसम्बर 2025
Tuesday, October 28, 2025
समारोह
शिक्षा केवल ज्ञान या जानकारी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र, विचार, व्यवहार और नैतिक मूल्यों का विकास करती है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को संवेदनशील, अनुशासित, विवेकशील और समाजोपयोगी बनाना है।
Sunday, September 21, 2025
संस्कारयुक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रही है विद्या भारती : डॉ. सौरभ मालवीय
रामनगर, अम्बेडकर नगर। जय बजरंग इंटरमीडिएट कॉलेज मे एक दिवसीय प्रचार प्रमुख कार्यशाला सम्पन्न हुई। कार्यशला मे अवध प्रान्त के 12 जनपदों के नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों के संकुल व जिला प्रचार प्रमुख सम्मिलित हुए। कार्यशाला का प्रारम्भ माँ शारदा के चित्र के समक्ष क्षेत्रीय मंत्री विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र डॉ. सौरभ मालवीय, क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ किया। उद्घाटन सत्र में अतिथि परिचय एवं स्वागत आयोजक विद्यालय के प्रधानाचार्य राजेंद्र सिंह ने किया।
कार्यशाला में उपस्थित प्रचार प्रमुखों के मध्य अपने विचार साझा करते हुए क्षेत्रीय मंत्री विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र एवं विभागाध्यक्ष पत्रकारिता विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय डॉ. सौरभ मालवीय ने कहां कि हम विश्व के सबसे बड़े अशासकीय संगठन के घटक है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में भारत, भारतीयता, राष्ट्र प्रेम के साथ-साथ आध्यात्मिकता के भाव को शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित करने के लिए विद्या भारती के विद्यालय निरंतर क्रियाशील है। श्री मालवीय ने कहा कि यह वर्ष हमारे मातृ संगठन का शताब्दी वर्ष है जिसमें हम विभिन्न गतिविधियों, कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के अधिकाधिक जनों से संपर्क कर अपने कार्यों, योजनाओं, गतिविधियों को पहुंचाने हेतु सतत संपर्क अभियान चलाएंगे। सप्त शक्ति संगम के माध्यम से हम एक विशेष अभियान चलाने जा रहे हैं जो 5 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 5 फरवरी 2026 तक चलेगा जिसमें हमारा लक्ष्य है कि देश के 75 लाख मातृ शक्तियों से संपर्क कर उनके बीच कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के माध्यम से उन्हें अपने से जोड़ने का प्रयास करेंगे। हमारे पूर्व छात्र लाखों की संख्या में देश -विदेश में समाज के नवनिर्माण में अपना अहम योगदान दे रहे हैं। हम समाज को कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से भी जोड़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।
इस अवसर पर डॉ. योगेंद्र सिंह, प्रान्त प्रचार प्रमुख, सुनील सिंह, अरुणेश कुमार, वीरेंद्र वर्मा, सहित अन्य उपस्थित रहे।
Saturday, September 13, 2025
मातृभाषा पर गर्व करें
डॉ. सौरभ मालवीय
मातृभाषा का अर्थ है मातृ की भाषा अर्थात वह भाषा जो बालक अपनी माता से सीखता है। बाल्यकाल से ही मातृभाषा में बोलने और सुनने के कारण व्यक्ति अपनी भाषा में निपुण हो जाता है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान होती है। मातृभाषा का जीवन में अत्यंत महत्व होता है। कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा में अपने विचारों को सरलता से व्यक्त करने में सक्षम होता है, क्योंकि व्यक्ति सदैव अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिए उसे अपनी मातृभाषा में कोई भी विषय समझने में भी सुगमता होती है, जबकि किसी अन्य भाषा में उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है। मातृभाषा व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की आधारशिला है।
मातृभाषा व्यक्ति को उसकी संस्कृति से जोड़ने में सक्षम होती है। मातृभाषा द्वारा व्यक्ति को अपनी मूल संस्कृति एवं संस्कारों का ज्ञान होता है। मातृभाषा द्वारा व्यक्ति अपने समाज से भी जुड़ा रहता है। उदाहरण के लिए यदि किसी की मातृभाषा भोजपुरी है, तो वह व्यक्ति उन लोगों से मिलकर अपनत्व का अनुभव करेगा, जो भोजपुरी बोलते हैं। लोग अपने दैनिक जीवन में अपनी मातृभाषा ही बोलते हैं। मातृभाषा के लिए कहा गया है कि
कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर वाणी अर्थात पीने वाला पानी का स्वाद एक कोस की दूरी पर बदल जाता है। साथ ही मातृभाषा तीन कोस की दूरी पर बदलती है। लोग बचपन में स्थानीय भाषा में कहानियां-कथाएं सुनते हैं, जो उन्हें जीवन में सदैव याद रहती हैं। स्थानीय बोलचाल व्यक्ति को स्थान विशेष से जोड़कर रखती है। मातृभाषा का चिंतन हमें हमारे मूल्यों से जोड़ता है। मातृभाषा व्यक्ति के मानसिक विकास के लिए बहुत आवश्यक है। मातृभाषा में ही विचारों का प्रवाह हो सकता है, जो किसी अन्य भाषा में संभव नहीं है।
भारत ही नहीं, अपितु विश्वभर के विद्वान भी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान किए जाने को महत्व देते हैं। शिक्षा शास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मातृभाषा में सोचने से, विचार करने से, चिंतन मनन करने से बालकों में बुद्धि तीक्ष्ण होकर कार्य करती है। संवाद की सुगम भाषा मातृभाषा है। मातृभाषा व्यक्ति के आत्मिक लगाव, विश्वास मूल्य और संबंध मूल्य को मजबूत करती है। सर सीवी रमन के अनुसार- “हमें विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में देनी चाहिए, अन्यथा विज्ञान एक छद्म कुलीनता और अहंकार भरी गतिविधि बनकर रह जाएगा। और ऐसे में विज्ञान के क्षेत्र में आम लोग कार्य नहीं कर पाएंगे।“ भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुसार- “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।“
अर्थात मातृभाषा की उन्नति के बिना किसी भी समाज की उन्नति संभव नहीं है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना भी कठिन है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित गिरधर शर्मा के अनुसार- “विचारों का परिपक्व होना भी तभी संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो।“ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी मातृभाषा के महत्त्व से भली-भांति परिचित थे। वे कहते थे कि "मनुष्य के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही जरूरी है, जितना की बच्चे के शारीरिक विकास के लिए माता का दूध। बालक पहला पाठ अपनी माता से ही पढ़ता हैं, इसलिए उसके मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त कोई दूसरी भाषा लादना मैं मातृभूमि के विरुद्ध पाप समझता हूं।" नेल्सन मंडेला के अनुसार- “यदि आप किसी से ऐसी भाषा में बात करते हैं जो उसे समझ में आती है तो वह उसके मस्तिष्क तक पहुंचती है, परन्तु यदि आप उससे उसकी मातृभाषा में बात करते हैं तो बात उसके हृदय तक पहुंचती है।“ ब्रिघम यंग के अनुसार “हमें अपने बच्चों को पहले उनकी मातृभाषा में समुचित शिक्षा देनी चाहिए, उसके पश्चात ही उन्हें उच्च शिक्षा की किसी भी शाखा में जाना चाहिए।“
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट से भी यह सिद्ध होता है कि अपनी मातृभाषा में चिकित्सा एवं विज्ञान आदि विषयों में पढ़ाई करवाने वाले देशों में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत अच्छी स्थिति में है। देश के पड़ोसी देश चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस एवं जापान आदि देश अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। ये सभी देश लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी हैं एवं उन्नति के शिखर को छू रहे हैं। इन सभी देशों ने अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करके ही सफलता प्राप्त की है। यदि स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश में भी क्षेत्रीय भाषाओं में चिकित्सा, विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा प्रदान की जाती तो आज भारत भी उन्नति के शिखर पर होता। परन्तु अब भी समय है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी देश की क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं को अत्यंत महत्त्व दिया जा रहा है। देश में हिंदी में चिकित्सा की पढ़ाई प्रारंभ होना भी इसी दिशा में उठाया हुआ एक कदम है। आशा है कि इससे देश में बड़ा सकारात्मक परिवर्तन आएगा। लाखों छात्र अपनी भाषा में अध्ययन कर सकेंगे तथा उनके लिए कई नए अवसरों के द्वार भी खुलेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि मां और मातृभाषा मिलकर जीवन को मजबूती प्रदान करते हैं तथा कोई भी इंसान अपनी मां एवं मातृभाषा को न छोड़ सकता है और न ही इनके बिना उन्नति कर सकता है। मैं तो मातृभाषा के लिए यही कहूंगा कि जैसे हमारे जीवन को हमारी मां गढ़ती है, वैसे ही मातृभाषा भी हमारे जीवन को गढ़ती है। मां और मातृभाषा दोनों मिलकर जीवन के आधार को मजबूत बनाते हैं, चिरंजीव बनाते हैं। जैसे हम अपनी मां को नहीं छोड़ सकते, वैसे ही अपनी मातृभाषा को भी नहीं छोड़ सकते। मुझे बरसों पहले अमेरिका में एक बार एक तेलुगू परिवार में जाना हुआ और मुझे एक बहुत खुशी का दृश्य वहां देखने को मिला। उन्होंने मुझे बताया कि हम लोगों ने परिवार में नियम बनाया है कि कितना ही काम क्यों न हो, लेकिन अगर हम शहर के बाहर नहीं हैं तो परिवार के सभी सदस्य भोजन की मेज पर बैठकर तेलुगू भाषा बोलेंगे। जो बच्चे वहां पैदा हुए थे, उनके लिए भी ये नियम था। अपनी मातृभाषा के प्रति ये प्रेम देखकर इस परिवार से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी कुछ लोग ऐसे द्वन्द्व में हैं जिसके कारण उन्हें अपनी भाषा, अपने पहनावे, अपने खान-पान को लेकर संकोच होता है, जबकि विश्व में कहीं और ऐसा नहीं है। मातृभाषा को गर्व के साथ बोला जाना चाहिए और हमारा देश तो भाषाओं के मामले में इतना समृद्ध है कि उसकी तुलना ही नहीं हो सकती। हमारी भाषाओं की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कोहिमा तक सैंकड़ों भाषाएं, हजारों बोलियां एक दूसरे से अलग लेकिन एक दूसरे में रची-बसी हैं। हमारी भाषा अनेक, लेकिन भाव एक है।
भाषा, केवल अभिव्यक्ति का ही माध्यम नहीं, बल्कि भाषा समाज की संस्कृति और विरासत को भी सहेजने का काम करती है। हमारे यहां भाषा की अपनी खूबियां हैं, मातृभाषा का अपना विज्ञान है। इस विज्ञान को समझते हुए ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर जोर दिया गया है।
आज देखने को मिल रहा है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में गिनती नहीं करते, अपितु अंग्रेजी में गणना करते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि यह भी समय की मांग है। किन्तु अपनी मातृभाषा को तुच्छ समझना उचित नहीं है। माता-पिता भी बच्चों को अपनी मातृभाषा की बजाय अंग्रेजी में बात करते हुए देखकर प्रसन्न होते हैं। वे अपने बच्चों को इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। ऐसा करने से बच्चे भी अंग्रेजी को उच्च मानने लगते हैं। उन्हें अपनी मातृभाषा तुच्छ लगने लगती है। इस प्रकार वे अपनी संस्कृति से भी दूर होने लगते हैं। उन्हें अंग्रेजी के साथ-साथ पश्चिमी सभ्यता अच्छी लगने लगती है। वे स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगते हैं तथा उन्हें अपनी लोकभाषा अर्थात मातृभाषा में बात करने वाले लोग तुच्छ लगने लगते हैं।
हमारे विशाल भारत देश में अनेक भाषाएं हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 121 भाषाएं हैं तथा 1369 मातृभाषा हैं। वर्ष 2001 की जनगणना की तुलना में वर्ष 2011 में हिंदी को अपनी मातृभाषा की बताने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। वर्ष 2001 में 43.03 प्रतिशत लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था, जबकि वर्ष 2011 में 43.6 प्रतिशत लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया। देश की सूचीबद्ध भाषाओं में संस्कृत सबसे कम बोली जाने वाली भाषा बनी हुई है। मात्र 24821 लोगों ने संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताया। गैर सूचीबद्ध भाषाओं में अंग्रेजी को लगभग 2.6 लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा बताया। इसमें लगभग 1.60 लाख लोग महाराष्ट्र के हैं।
मातृभाषा के महत्त्व के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ने सर्वप्रथम 17 नवंबर 1999 को प्रतिवर्ष 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की थी। उसके पश्चात वर्ष 2000 से विश्वभर में प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन के अनुसार मातृभाषा को बढ़ावा देने से न केवल सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा मिलता है, अपितु जातीय परंपराओं और भाषा विज्ञान पर भी अधिक ध्यान पैदा होता है। इसके अतिरिक्त मान्यता समझ, संवाद और सहिष्णुता के आधार पर एकता को बढ़ावा देती है।
(लेखक- मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
Sunday, July 27, 2025
विद्या भारती के स्कूलों में हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत के साथ एक क्षेत्रीय भाषा की होगी पढ़ाई
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। विद्या भारती मूल्य आधारित और समावेशी शिक्षा से राष्ट्र निर्माण में लगा है। संस्कृति युक्त शिक्षा प्रदान करने के लक्ष्य से संगठन देशभर के 684 जिलों में 12118 विद्यालयों का संचालन कर रहा है। 8,000 से अधिक अनौपचारिक शिक्षा केंद्र भी हैं। यहां वंचित वर्ग को निश्शुल्क शिक्षा दी जा रही है। वर्तमान में 35.33 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं विद्या भारती के स्कूलों में हैं। नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठ्यक्रम को अपनाया जा रहा है। इन स्कूलों में हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी के साथ एक क्षेत्रीय भाषा पढ़ाने की तैयारी है। वर्तमान सत्र से इस दिशा में प्रयास शुरू हो रहा है। यह जानकारी संगठन के क्षेत्रीय मंत्री डा. सौरभ मालवीय ने दी।
ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कालेज में आयोजित पत्रकार वार्ता में उन्होंने बताया कि ज्वाला देवी व रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कालेज में इसी सत्र से गुजरानी भाषा पढ़ाई जाएगी। अन्य जिलों में उपलब्ध शिक्षकों व अभिभावकों की अपेक्षा के अनुरूप क्षेत्रीय भाषा का चयन किया जाएगा।
विद्या भारती के 10 लाख 30 हजार से अधिक पूर्व छात्र पोर्टल पर पंजीकृत हैं, जिससे यह विश्व का सबसे बड़ा पूर्व छात्र संगठन बन गया है। संबद्ध विद्यालयों में एआई सक्षम लर्निंग प्लेटफार्म, डिजिटल क्लासरूम की उपलब्धता है। 507 से अधिक विद्यालयों में अटल टिंकरिंग लैब की व्यवस्था है। संस्था का नैतिक मानदंड भारतीय दर्शन पर केंद्रित है।
प्रदेश निरीक्षक शेषधर द्विवेदी ने बताया कि विजन 2047 व पंच परिवर्तन पर संस्था कार्य कर रही है। सामाजिक समरसता जाति, वर्ग और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर सभी के लिए शिक्षा सुलभ कराना हम सब का लक्ष्य है। प्रधानाचार्य विक्रब बहादुर सिंह परिहार ने कहा, कुटुंब प्रबोधन परिवार शिक्षा केंद्र की इकाई है। उनके प्रबोधन से भारतीय परिवार को मूल्यों, भावनात्मक स्थिरता और नागरिक शिक्षा का केंद्र बनाना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्य बोध, स्व भारतीय भाषाओं, संस्कृति और लोक ज्ञान के माध्यम से आत्म चेतना का विकास विद्यालयों की विशेषता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना आवश्यककाशी प्रांत की प्रचार विभाग की एक दिवसीय कार्यशाला भी हुई। इसमें संगठन के क्षेत्रीय मंत्री डा. सौरभ मालवीय ने कहा, शिक्षा ज्ञानार्जन या रोजगार से आगे बढ़कर नैतिक मूल्य, जीवनोपयोगी गुण के साथ भारतीय संस्कृति के आदर्श को लेकर चलने वाली होनी चाहिए। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना होगा। हम सब इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शेषघर द्विवेदी ने कहा, प्रचार विभाग महत्वपूर्ण इकाई है। आप सब समाज से जीवंत संवाद करें। विशिष्ट अतिथि योगेंद्र ने सोशल मीडिया व अन्य वेबसाइट से जुड़ने पर बल दिया। डा. किरनलता डंगवाल ने भी प्रचार विभाग के कार्यों को रेखांकित किया। इस दौरान डा.राम मनोहर, संदीप गुप्त सहित विभिन्न जिलों से आए प्रचार विभाग के सदस्य मौजूद रहे।
Sunday, July 13, 2025
नये शिक्षा सत्र का हम करें अभिनंदन
डॉ. सौरभ मालवीय
शिक्षण संस्थानों में नया शिक्षा सत्र प्रारंभ हो चुका है। प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में प्राय: नया शिक्षा सत्र अप्रैल महीने में आरंभ हो जाता है, किन्तु उच्च शिक्षा के संस्थानों में जुलाई से ही नये शिक्षा सत्र का प्रारंभ होता है। यदि देखा तो वास्तव में सभी शिक्षण संस्थानों में नया शिक्षा सत्र जुलाई महीने में ही आरंभ होता है। इससे पूर्व का समय तो शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेने, पुस्तकें, स्टेशनरी, बैग और यूनिफॉर्म आदि खरीदने में व्यतीत हो जाता है। जो समय मिलता है, उसमें विद्यार्थी अपनी नई पुस्तकों से परिचय करते हैं। प्राय: विद्यार्थी भाषा की पुस्तकें पढ़ते हैं, क्योंकि उनमें कहानियाँ और कविताएं होती हैं, जो बच्चों को अति प्रिय हैं।
कुछ समय विद्यालय जाने के पश्चात ग्रीष्म कालीन अवकाश आ जाता है। यह ग्रीष्म कालीन अवकाश ग्रीष्म ऋतु के मध्य में आता है। इस समयावधि में अत्यधिक भीषण गर्मी पड़ती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश मई के अंतिम सप्ताह से लेकर पूरे जून तक रहता है। इस समयावधि में उच्च तापमान के कारण सभी विद्यालय एवं महाविद्याल बंद रहते हैं।
बच्चे ग्रीष्मकालीन अवकाश की वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि इसमें उन्हें सबसे अधिक दिनों का अवकाश प्राप्त होता है। बच्चों के लिए ग्रीष्म कालीन अवकाश किसी पर्व से कम नहीं होता। इस समयावधि में उन्हें कोई चिंता नहीं होती अर्थात उन्हें न तो प्रात:काल में शीघ्र उठकर विद्यालय जाने की चिंता होती है और न ही गृहकार्य करने की कोई चिंता होती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपनी नानी के घर जाते हैं। वहां वे अपने ननिहाल के लोगों से मिलते हैं। सब उन्हें बहुत लाड़-प्यार करते हैं। नानी उन्हें बहुत सी कहानियां सुनाती हैं। नाना और मामा उन्हें घुमाने के लिए लेकर जाते हैं और उन्हें उनके पसंद के खिलौने दिलवाते हैं। आज के एकल परिवार के युग में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपने दादा-दादी के घर भी जाते हैं। वहां भी उन्हें बहुत ही लाड़- प्यार मिलता है। नानी की तरह दादी भी बच्चों को कहानियां सुनाती हैं। इन कथा- कहानियों के माध्यम से वे बच्चों में संस्कार पोषित करती हैं, जो उनके चरित्र का निर्माण करते हैं। यही संस्कार जीवन में उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा नगरों में जाने से वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। अपने सगे-संबंधियों से मिलते हैं। इससे उन्हें अपने संबंधों का पता चलता है। उनमें अपने संबंधियों के प्रति स्नेह का भाव पैदा होता है। वे अपने संबंधियों के प्रति अपने दायित्व को भी समझते हैं। बच्चों में संबंध मूल्य और जीवन मूल्य की समझ बनती है। सम्मान और स्नेह का भाव उपजता है।
ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चे अपने माता- पिता के साथ पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं। अधिकतर लोग ऐसे स्थानों पर जाते हैं, जहां तापमान कम रहता है। ये पहाड़ी क्षेत्र होते हैं। इससे वे वहां की संस्कृति एवं रीति- रिवाजों के बारे में जान पाते हैं। इसके अतिरिक्त वे धार्मिक स्थलों एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों पर भी घूमने जाते हैं। घूमने का अर्थ केवल सैर सपाटा और मनोरंजन करना नहीं है, अपितु पर्यटन से बहुत सी शिक्षाएं मिलती हैं। धार्मिक स्थलों पर जाने से मन को शान्ति प्राप्त होती है तथा बच्चे अपने गौरवशाली संस्कृति से जुड़ पाते हैं। उन्हें अपने ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है। उनमें आस्था का संचार होता है। उनका आत्मबल एवं आत्म विश्वास बढ़ता है। ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से उन्हें अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होता है। ये व्यवहारिक ज्ञान है, जो उन्हें आने- जाने से प्राप्त होता है। यह उनके लिए आवश्यक भी है। वे जिन चीजों के बारे में पुस्तकों में पढ़ते उनके बारे में उन्हें सहज जानकारी प्राप्त होती है। इसका उनके मन- मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
शिक्षकों द्वारा ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए भी विद्यार्थियों को गृहकार्य दिया जाता है। इस दौरान विद्यालय अवश्य बंद रहते हैं, किन्तु ट्यूशन सेंटर खुले रहते हैं। बच्चे ट्यूशन के लिए जाते हैं और अपना गृहकार्य भी करते हैं। इसके अतिरिक ग्रीष्म कालीन अवकाश के दौरान बहुत से संस्थान अनेक प्रकार के कम समयावधि वाले कोर्स प्रारंभ करते हैं, उदाहरण के लिए चित्रकला, संगीत, गायन, नृत्य, मिट्टी के खिलौने बनाने, सजावटी सामान बनाना आदि। इस समयावधि में बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने एवं नई- नई चीजें सीखने का अवसर प्राप्त होता है। बहुत से बच्चे खेलों की ओर रुझान करते हैं। समय अभाव के कारण वे खेल नहीं पाते थे, किन्तु अवकाश में उन्हें अपनी पसंद के खेल खेलने का अवसर मिल जाता है। क्षेत्र के बच्चे अपनी-अपनी टीमें बना लेते हैं और आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं. इससे उनमें खेल भावना का विकास होता है। किसी भी खिलाड़ी के खेल का प्रारंभ इसी प्रकार होता है। पहले वे अपने मित्रों के साथ खेलता है. फिर इसी प्रकार वह खेल स्पर्धाओं में खेलने लगता है। इस प्रकार एक दिन वह देश के लिए पदक जीतने वाला खिलाड़ी बन जाता है। वास्तव में यह समय बच्चों के नैसर्गिक गुणों को निखारने का कार्य करता है।
ग्रीष्म कालीन अवकाश व्यतीत होने के पश्चात विद्यालय व अन्य शिक्षण संस्थान पुन: खुल जाते हैं। विद्यार्थियों की दिनचर्या पुनः पूर्व की भांति हो जाती है। वे प्रात:काल में शीघ्र उठ जाते हैं। नित्य कर्म से निपटने के पश्चात विद्यालय जाने के लिए तैयार होते हैं। वे नाश्ता करके घर से निकल जाते हैं। दिनचर्या केवल बच्चों की ही परिवर्तित नहीं होती, अपितु उनके साथ- साथ उनके माता- पिता की दिनचर्या भी परिवर्तित हो जाती है। उनकी माता प्रातः काल में शीघ्र उठकर उनके लिए नाश्ता बनाती है। उनके लिए टिफिन तैयार करती है। उन्हें विद्यालय या स्कूल बस तक छोड़ने जाती है। बहुत सी माताएं बच्चों को विद्यालय लेकर भी जाती हैं और उन्हें वापस भी लाती हैं। बहुत से विद्यालयों के बाहर दोपहर में महिलाएं अपने बच्चों की प्रतीक्षा में खड़ी रहती हैं। बहुत से बच्चों को उनके पिता विद्यालय छोड़ने जाते हैं।
नये शिक्षा सत्र में बच्चे बहुत प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनकी कक्षा का एक स्तर बढ़ जाता है। वे स्वयं को पहले से श्रेष्ठ अनुभव करते हैं। पिछली कक्षा में भी उन्होंने कड़ा परिश्रम किया था। उसके कारण ही परीक्षा में वे सफलता प्राप्त कर पाए। परिणामस्वरूप अब वह उससे अगली कक्षा में अर्थात उससे ऊंची कक्षा में हैं। जब विद्यालय खुले थे, तब बहुत अधिक गर्मी थी। बच्चे गर्मी से व्याकुल थे, किन्तु उनके चेहरे पर उत्साह के भाव दिखाई दे रहे थे। बहुत से विद्यालयों में रोली एवं तिलक लगाकर बच्चों का स्वागत किया गया है। यह एक अच्छी पहल है। इससे बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति लगाव उत्पन्न होता है।
Thursday, July 10, 2025
अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास
हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक गौरवशाली एवं समृद्ध सभ्यताओं में एक है। विश्व के अनेक देशों में जब बर्बरता का युग था, उस समय भी हमारी भारतीय सभ्यता अपने शीर्ष पर थी। इसका सबसे प्रमुख कारण है शिक्षा। हमारे पूर्वजों ने शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत उन्नति की। शिक्षा के माध्यम से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ। इस पवित्र भारत भूमि पर वेद-पुराणों की रचना हुई तथा यह सब शिक्षा के कारण ही संभव हो सका। मनुष्य के लिए जितने आवश्यक वायु, जल एवं भोजन है, उतनी ही आवश्यक शिक्षा भी है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु समान है।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पुज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः।।
अर्थात विद्या मनुष्य का विशेष रूप है, विद्या गुप्त धन है। वह भोग की दाता, यश की दाता एवं उपकारी है। विद्या गुरुओं की गुरु है। विद्या विदेश में बंधु है। विद्या देवता है। राजाओं के मध्य विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्या विहीन मनुष्य पशु है।
निसंदेह किसी भी सभ्य समाज के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के लिए नहीं होती कि विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय से शैक्षिक प्रमाण-पत्र प्राप्त कर राजकीय या अराजकीय नौकरी प्राप्त कर ली जाए। शिक्षा का उद्देश्य तो मानव के संपूर्ण जीवन का विकास करना होता है। हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षित व्यक्ति के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते।।
अर्थात विद्या, तर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं दक्षता, जिसके पास ये छह गुण हैं, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। विद्या अथवा शिक्षा प्रकाश का वह स्त्रोत है, जो मानव जीवन को प्रकाशित करता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति थी। किन्तु कालांतर में शिक्षा पद्धति में परिवर्तन आया तथा शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करने तक ही रह गया। बहुत समय से वर्तमान शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की बात उठ रही थी तथा ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके। साथ ही बच्चों के कंधों से बस्ते का भार कुछ कम किया जा सके।
उत्तम शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम में चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को विकसित करने के विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से केवल मनुष्य की भौतिक उन्नति होती है, किन्तु औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होने चाहिए, जिससे नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। वर्तमान युग में मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिक उन्नति कर रहा है, त्यों-त्यों वह जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आपसी पारिवारिक संबंध टूटते जा रहे हैं। किसी को किसी की तनिक भी चिंता नहीं है। परिवार के वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है तथा बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिए जाते हैं। ग्रामों की पैतृक संपत्ति को बेचकर महानगरों में छोटे-छोटे आवासों में भौतिक सुख-सुविधा में जीने को ही मनुष्य ने जीवन की सफलता मान लिया है। यदि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना है, तो सबसे पहले वर्मान शिक्षा पद्धति में सुधार करना होगा। इसी उद्देश्य के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के सभी विद्यालयों में प्रथम कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक अनुभूति पाठ्यक्रम लागू करने जा रही है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात पर चिंता प्रकट की जा रही है कि मानव का जीवन- मूल्यों से विश्वास उठता जा रहा है। वह चरित्र की अपेक्षा धन को महत्त्व दे रहा है। इससे उसका नैतिक पतन हो रहा है। मनुष्य के चारित्रिक पतन के कारण समाज में अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे मनुष्य का नैतिक विकास हो तथा वह एक सुसभ्य समाज का निर्माण करने में सहायक सिद्ध हो सके। नि:संदेह शिक्षा इसका सबसे सशक्त माध्यम है। नई शिक्षा पद्धति का उद्देश्य ऐसे सदाचारी मनुष्यों का विकास करना है, जिनमें दया, करुणा, सहानुभूति एवं साहस हो। जो नैतिक मूल्यों से संपन्न हों, जिनके लिए मानवीय मूल्य सर्वोपरि हों।
शिक्षा का प्रथम उद्देश्य विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण करना होता है। भारतीय संस्कृति में चरित्र निर्माण पर सर्वाधिक बल दिया गया है। मनुस्मृति के अनुसार सभी वेदों का ज्ञाता विद्वान भी सच्चरित्रता के अभाव में श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु केवल गायित्री मंत्र का ज्ञाता पंडित यदि चरित्रवान है, तो श्रेष्ठ है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है, ताकि वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को उसके अधिकारों के साथ-साथ उसके कर्त्तव्यों के बारे में भी बताना है, ताकि वह अपने अधिकारों को प्राप्त कर सके तथा परिवार एवं समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का भी निर्वाहन कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के जीवन स्तर को उन्नत व समृद्ध बनाना भी है। शिक्षा के माध्यम से वह अपने जीवन को सुगम, उन्नत एवं समृद्ध बना सके। विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ व्यवसायिक कार्यों का भी प्रशिक्षण दिया जाता था, ताकि वे अपने-अपने कार्यों में भी निपुणता प्राप्त कर सकें। एक नैतिकता से परिपूर्ण चरित्रवान व्यक्ति ही अपने कुल तथा देश का नाम ऊंचा करता है।
उत्तर प्रदेश में ऐसी ही शिक्षा पद्धति को लागू किया जा रहा है। कम शब्दों में बात की जाए, तो मूल रूप से शिक्षा के दो ही उद्देश्य हैं, प्रथम यह कि व्यक्ति शिक्षा ग्रहण कर समृद्धि प्राप्त करे एवं प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करे तथा द्वितीय यह कि वह दूसरों को प्रसन्नता एवं सहायता प्रदान करने योग्य हो। छोटी कक्षाओं से लेकर महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय तक की शिक्षा का कुल उद्देश्य यही है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब वर्तमान शिक्षा का उद्देश्य समृद्धि ही है तो फिर अनुभूति पाठ्यक्रम की आवश्यकता क्यों है?
वास्तव में हम सुख-सुविधाओं को जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। आज उच्च शिक्षा प्राप्त करके तथा उसके माध्यम से उच्च पद प्राप्त करना। तत्पश्चात अकूत धन-संपदा एकत्रित करना ही जीवन का उद्देश्य बनकर रह गया है। इस भागदौड़ में मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। इन्हीं मानवीय मूल्यों के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश में अनुभूति पाठ्यक्रम लागू किया जा रहा है। राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। बात चाहे प्राथमिक शिक्षा की हो, माध्यमिक शिक्षा की हो, व्यावसायिक शिक्षा की हो या उच्च शिक्षा की, सभी क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किए जा रहे हैं। आशा है कि राज्य के शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के माध्यम से अनुभूति पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में नई ऊर्जा का संचार करेगा तथा यह विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगो सिद्ध होगा।
Friday, June 20, 2025
Friday, May 30, 2025
Thursday, May 15, 2025
अनुभव से ही सीखना प्रारम्भ करते हैं बालक
मनुष्य जन्म से लेकर मृत्य तक कुछ न कुछ सीखता रहता है। उसके जन्म के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। प्रकृति सबसे बड़ी शिक्षक होती है। बालक को कोई कष्ट होता है, तो वह रोने लगता है। उसके रोने की आवाज सुनकर उसकी माता उसके पास आती है और उसका कष्ट दूर करती है। बालक भूखा होता है, तब भी वह रोने लगता है और उसकी माता उसे दुग्धपान करवाती है। बालक भली भांति समझ जाता है कि उसे कुछ चाहिए तो उसे क्या करना है। सर्वविदित है कि बालक अपनी मांग मनवाने के लिए पहले जिद करते हैं और जब कभी जिद पूर्ण नहीं हो पाती है, तो वे रोने लगते हैं। जन्म से ही उनमें समझ का विकास होने लगता है और यह प्राकृतिक एवं नैसर्गिक है।
माता बालक की प्रथम गुरु होती है और उसकी गोद बालक का प्रथम गुरुकुल होता है। इसके पश्चात बालक अपने परिवारजनों को देखकर सीखते हैं। उनसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि किस व्यक्ति के साथ उनका कैसा संबंध है। कौन संबंधी है और कौन अपरिचित है। अपने संबंधियों के साथ उन्हें किस प्रकार का व्यवहार करना है। किस प्रकार उनका आदर-सत्कार करना है। सभी बालक अपने परिवार से ही सीखते हैं। उन्हें परिवार से जैसी शिक्षा एवं संस्कार मिलते हैं, वे उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। कहा जाता है कि बालक कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। उन्हें जिस आकार में ढालो, वे ढल जाते हैं। बालकों के मन एवं मस्तिष्क पर उनके आसपास के परिवेश एवं वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है।
अमेरिकी लेखक डोरोथी नाल्ट के अनुसार बच्चे वही समझते हैं, जो वे जीते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सिद्धांत एवं विवेक दोनों इस पर सहमत हैं। बालकों के बाल्यकाल के अनुभवों से उनके सीखने, समझने और विकास का क्रम प्रभावित होता है।
विगत कुछ समय से अनुभव आधारित शिक्षा की चर्चा हो रही है। अनुभव आधारित शिक्षण क्या है? सर्वप्रथम यह समझना अति आवश्यक है। अनुभव के आधार पर जो ज्ञान अर्जित किया जाता है, उसे ही अनुभव आधारित शिक्षण कहा जाता है। यदि कोई बालक किसी चीज को देखकर, सुनकर या स्वयं के अभ्यास के द्वारा सीखता है तो उसे अनुभव के आधार पर सीखना कहा जाएगा। उदाहरण के लिए कोई बालक किसी को साईकिल चलाते हुए देखता है और फिर स्वयं भी उसे चलाने का प्रयास करता है। इस अभ्यास के दौरान वह कई बार गिर जाता है, परन्तु वह अपना अभ्यास निरंतर जारी रखता है। परिणाम स्वरूप एक दिन वह साईकिल चलाना सीख जाता है। जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान व्यक्ति को अनुभव के आधार पर ही प्राप्त होता है। बालिकाएं अपनी माता को भोजन बनाते हुए देखती हैं। फिर वे भी भोजन बनाने का प्रयास करती हैं। आरम्भ में वे स्वादिष्ट भोजन नहीं बना पाती हैं। कई बार नमक या मिर्च कम या अधिक हो जाती है। इसी प्रकार रोटी भी टेढ़ी-मेढ़ी बनती हैं, परन्तु अभ्यास से वे स्वादिष्ट भोजन और गोल रोटी बनाना सीख जाती हैं। इस भोजन बनाने के अभ्यास के दौरान बालिकाओं के परिवारजन उनका उत्साहवर्द्धन करते हैं तथा उनका मनोबल बढ़ाते हैं। भोजन स्वादिष्ट न होने के पश्चात भी वे उसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते हैं तथा बालिका की प्रशंसा भी करते हैं। इस प्रशंसा से प्रसन्न होकर बालिका पहले से भी अधिल परिश्रम करती है। ऐसे बहुत से कार्य हैं, जो बालक अपने परिवारजनों से सीखते हैं।
अक्षर ज्ञान आवश्यक एवं उत्तम है, परन्तु व्यवहारिक ज्ञान सर्वोत्तम है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि मनुष्य शनै- शनै सीखता है। सीखने की गति समय एवं परिस्थितियों पर निर्भर करती है। उसके अनुभव उसके जीवन की दशा एवं दिशा प्रशस्त करते हैं। अनुभव उसे वह पाठ पढ़ा जाते हैं, जो वह कभी नहीं भूलता।
विद्वान मानते हैं कि अनुभवों से लाभान्वित होना ही अधिगम है। इसलिए छात्रों को अनुभव आधारित शिक्षा प्रदान करने को अधिक से अधिक महत्व देना चाहिए। इसके लिए ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, जो विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित व्यापक अनुभव प्रदान करने में सक्षम हो।
अमेरिकी शिक्षक गैलेन सायलर एवं विलियम अलेक्जेंडर के अनुसार- “अनुभव आधारित पाठ्यक्रम वह है, जिसमें अधिगम अनुभव की इकाइयां विद्यार्थियों के द्वारा शिक्षक के निर्देशन में स्वयं चुनी तथा योजनाबद्ध की जाती हैं।“
संयुक्त राज्य अमेरिका के शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी के अनुसार- “अनुभव एवं ज्ञान क्रिया के परिणाम हैं।“ वह ज्ञान एवं अनुभव में कोई भेद नहीं मानते हैं। उनके अनुसार- “ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है और अनुभव स्वयं करके प्राप्त होता है। इसलिए पाठ्यक्रम अनुभव प्रधान होना चाहिए। मनुष्य किसी भी परिस्थिति में रहे, परिस्थितियों में क्रिया करते हुए ही मनुष्य अनुभव प्राप्त करता है और यह भी सत्य है कि एक अनुभव से दूसरा तथा दूसरे से तीसरा और इसी प्रकार आगे के अनुभव हमें प्राप्त होते रहते हैं। प्रत्येक अनुभव हमें आगे के अनुभव प्राप्त करने में सहायक होता है। अतः पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को अधिक से अधिक अनुभव प्रदान करना होना चाहिए।“
आज हम विदेशों से बहुत सी चीजें ग्रहण कर रहे हैं। यद्यपि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति अत्यधिक प्रभावशाली एवं उत्तम थी। प्राचीन काल से ही हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में विख्यात रहा है। भारत शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। इस पवित्र भूमि पर पवित्र ग्रन्थों की रचना हुई। यहां वेद-पुराणों की रचना हुई। ये महान ग्रन्थ यहां की उच्च कोटि की पद्धति के प्रमाण हैं। यह सब व्यवहारिक शिक्षा के कारण ही संभव हो सका। इसे सर्वोत्तम कहना भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारतीय संस्कृति में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए शिक्षा को अति आवश्यक माना गया है। शिक्षित व्यक्ति के लिए विश्व का कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते।।
अर्थात विद्या, तर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं दक्षता, जिसके पास ये छह गुण हैं, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। विद्या अथवा शिक्षा प्रकाश का वह स्त्रोत है, जो जीवन को प्रकाशमान करता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति थी, किन्तु कालांतर में शिक्षा पद्धति में परिवर्तन आया। आज फिर ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता अनुभव की जा रही है, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।
दादी और नानी बालकों को भिन्न-भिन्न प्रकार की कहानियां सुनाती हैं। इन कथा- कहानियों के माध्यम से वे बालकों में संस्कार पोषित करती हैं। ये संस्कार उनके चरित्र का निर्माण करने में सहायक सिद्ध होते हैं। यही संस्कार संकट के समय दीपक बनकर उनके जीवन में प्रकाश का कार्य करते हैं तथा उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा पैतृक नगरों में जाते हैं तो वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। उनके वहां की बहुत सी चीजों को जानने और समझने का अवसर प्राप्त होता है। ऐतिहासिक धरोहरों से वे इतिहास से परिचित होते हैं। तीज-त्यौहारों से वे अपनी धार्मिक संस्कृति से परिचित होते हैं। अक्षर ज्ञान से बच्चे इतनी शीघ्रता से नहीं सीख पाते, जितने शीघ्रता से वे अनुभव के आधार पर सीख जाते हैं। उदाहरण के लिए जिस बालक ने कभी दीपावली का त्यौहार मनाते हुए नहीं देखा, उसे पुस्तक के माध्यम से दीपावली के बारे में बताया जाए और फिर उससे दीपावली के बारे में लिखने के लिए कहा जाए, तो वह इतना अच्छा नहीं लिख पाएगा, जितना अच्छा वह बालक लिख पाएगा, जिसने दीपावली मनाई है या मनाते हुए देखा है। इसका कारण यह है कि पहले बालक ने केवल शब्दों के माध्यम से दीपावली के बारे में ज्ञान अर्जित किया है, जबकि दूसरे बालक ने दीवापली मनाकर या देखकर व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है। इस व्यवहारिक ज्ञान में उसका अनुभव एवं अनुभूति भी सम्मिलत है। इसलिए दूसरे बालक ने दीपावली के बारे में वह ज्ञान प्राप्त किया, जो उसे सदैव स्मरण रहेगा।
विश्व की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सरोकारों के लिए गठित संगठन यूनेस्को के अनुसार समझने की प्रक्रिया के चार स्तंभ हैं। प्रथम स्तंभ है जानने के लिए सीखना एवं समझना- अपने आसपास के परिवेश और विश्व में जो कुछ भी है उसे सीखना एवं समझना, उसे भावना और तर्क के साथ समझना। यह जानना कि जो कुछ सीखा एवं देखा उसका भावनाओं के उदात्तीकरण और उन्नयन की दृष्टि से क्या महत्त्व है और यह कितना व्यवहारिक है।
द्वितीय है करने के लिए सीखना एवं समझना- जो परिस्थितियों, परिवेश और वातावरण में मिले उसे स्वीकार करना और उन परिस्थितियों को समाज और स्वयं के लिए उपयोगी कैसे बनाया जाए- यह सुनिश्चित करना है।
तृतीय है होने के लिए सीखना एवं समझना- होने का यहां अर्थ अपने अस्तित्व को सिद्ध करना है अर्थात एक मनुष्य, एक नागरिक के रूप में मेरा कहां क्या दायित्व है और उस व्यक्ति के रूप में मेरा उपस्थित होना कितना प्रभावी है- यह निर्धारण करना है। क्या समाज और परिस्थितियों में मेरे व्यक्तित्व के लिए कोई स्थान है या मैं यहां अनुपयुक्त हूं। इस संबंध में सचेत रहना है।
चतुर्थ है साथ रहने के लिए सीखना एवं समझना- सभी धर्मों, जातियों, आयु वर्ग के लोगों, लिंग संबंधी भिन्नता रखने वाले लोगों के साथ सहिष्णुता पूर्वक रह सकना। संपूर्ण विश्व की विविधताओं, संस्कृतियों, भाषाओं एवं भौगोलिकताओं को आदर देना। उनके साथ सहिष्णुता पूर्वक रह सकने की क्षमता और आदत विकसित करना।
वास्तव में जिस व्यक्ति में प्रेम और सद्भाव आदि गुण होते हैं, वह विश्व के किसी भी क्षेत्र में आराम से रह सकता है। ये गुण बालकों में बाल्यकाल से ही रोपित करने होते हैं। महामना मदनमोहन मालवीय का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र के व्यक्तित्व के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक पहलुओं को विकसित करना होना चाहिए। शिक्षा को न केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, अपितु व्यावहारिक प्रशिक्षण और कौशल विकास भी प्रदान करना चाहिए।
इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द भी व्यावहारिक शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार- “जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सके और विचारों का सामंजस्य कर सकें वहीं वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।”
Sunday, May 11, 2025
Sunday, May 4, 2025
'गौरव' का विमोचन
मा.यतींद्र जी शर्मा
मा.हेमचंद्र जी
मा.दिव्यकान्त जी
डॉ . राममनोहर जी
Thursday, May 1, 2025
Friday, April 18, 2025
अहिल्यबाई होलकर भारतीयता की प्रतीक थी : डॉ.सौरभ मालवीय
शिक्षा का क्षेत्र ही सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम माध्यम होता है। उसमें साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साहित्य ही ज्ञान को संरक्षित करता है। संस्कारयुक्त शिक्षा हमारा उद्देश्य है। विद्या भारती अनेक वर्षों से समाज में भारतीयता पूर्ण शिक्षा एवं आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़े रहने का लक्ष्य लेकर काम कर रही है।
उक्त बातें विद्या भारती के क्षेत्रीय मंत्री डॉ.सौरभ मालवीय ने भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत द्वारा प्रकाशित 'लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर' विशेषांक के विमोचन करते हुए कही।
सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज दामोदर नगर कानपुर में भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत द्वारा तीन दिवसीय प्रधानाचार्य समीक्षा एवं कार्य योजना बैठक आयोजित की गई जिसमें सभी संकुल से प्रधानाचार्य ने सहभाग किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री भवानी जी प्रांत संघ चालक , डॉ. सौरभ मालवीय क्षेत्रीय मंत्री पूर्वी उत्तर प्रदेश, श्री रजनीश जी प्रांत संगठन मंत्री कानपुर प्रांत ने दीप प्रज्ज्वलित किया। डॉक्टर सौरभ मालवीय, भवानी जी प्रांत संघ चालक जी ने श्री रजनीश जी ने अनुभव पत्रिका का विमोचन संकुल प्रमुख व प्रांत प्रमुख श्री रामकृष्ण बाजपेई जी के साथ किया इसके बाद मा सौरभ मालवीय जी ने कानपुर प्रांत की बेवसाइट का लोकार्पण किया इसके बाद डॉ.मालवीय ने कहा कि हम योजना बनाकर कार्य करते हैं हमारी प्रमुख भूमिका विद्यालय को श्रेष्ठ बनाना है विद्यालय जीवंत है इसके हम प्रेरक हैं तब विद्यालय समाज केंद्रित होता है। छात्रों के सर्वांगीड़ और समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे कार्यक्रम और गतिविधियों की योजना भी हम विद्यालय स्तर पर करते है।
भवानी जी ने कहा कि हम राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का कार्य करते हैं अतः हमको अपने कार्य के प्रति समर्पित होकर कार्य करना चाहिए इस कार्यक्रम में मा ,डॉक्टर राकेश निरंजन जी अध्यक्ष, श्री अयोध्या प्रसाद जी मिश्र प्रदेश निरीक्षक, श्री आर के सिंह जी सह मंत्री जी श्री अजय जी ,श्री शिवकरण जी संभाग निरीक्षक श्री शिव सिंह जी सेवा प्रमुख,विद्यालय के प्रबंधक श्री ओम प्रकाश अग्रवाल जी तथा समस्त प्रधानाचार्य बंधु एवं भगिनी उपस्थित रहे।
Sunday, January 12, 2025
Wednesday, January 1, 2025
दो दिवसीय क्षेत्रीय बैठक प्रारंभ
बैठक का उद्घाटन क्षेत्रीय संगठन मंत्री मान्यवर हेमचंद्र जी भाईसाहब, प्रभुनाथ सिंह मयंक क्षेत्रीय संयोजक विद्वत परिषद द्वारा हुआ। इस क्षेत्रीय बैठक में पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के विभिन्न विषयों के विषय संयोजक एवं सह संयोजक प्रतिभाग कर रहे है।
Sunday, November 10, 2024
शिक्षा से एक उज्जवल भविष्य का निर्माण
शिक्षा के माध्यम से भारत में बदलाव
भारत सरकार ने विभिन्न उपक्रमों और सांवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से शिक्षा तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। संविधान के 86वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21-ए के माध्यम से निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत को सुदृढ़ किया गया। यह छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मौलिक अधिकार के रूप में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 जो 1 अप्रैल, 2010 को लागू हुआ, यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बच्चे को एक औपचारिक स्कूल में गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त हो जो निर्धारित मानदंडों को पूरा करती हो। सरकारी योजनाओं और पहलों द्वारा समर्थित ये कानूनी ढांचे सभी के लिए एक समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली के निर्माण के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
एनईपी 2020 : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जुलाई, 2020 को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को मंजूरी दी। एनईपी 21वीं सदी की जरूरतों के साथ बेहतर तालमेल बनाने के लिए भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार करना चाहती है, जिससे अधिक समावेशी और आगे की सोच वाले दृष्टिकोण को बढ़ावा मिल सके।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 7 सितंबर 2022 को पीएम श्री स्कूल (पीएम स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) योजना को मंजूरी दी। इस पहल का उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के घटकों को प्रदर्शित करते हुए पूरे भारत में 14,500 से अधिक स्कूलों को मजबूत करना है। यह योजना छात्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, ज्ञान संबंधी विकास और 21वीं सदी के कौशल को बढ़ावा देगी। 27, 360 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत के साथ इसे पांच वर्षों (2022-2027) में लागू किया जाएगा। जिसमें 18,128 करोड़ रुपये केंद्रीय हिस्सेदारी के रूप में दिया जाएगा।
समग्र शिक्षा : एनईपी 2020 की सिफारिशों के साथ अनुरूप समग्र शिक्षा का उद्देश्य सभी बच्चों के लिए एक समावेशी और न्यायसंगत कक्षा वातावरण के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है, जो उनकी विविध पृष्ठभूमि और जरूरतों को पूरा करता है। 1 अप्रैल 2021 को शुरू की गई यह योजना पांच साल तक जारी रहेगी। यह योजना 31 मार्च, 2026 को समाप्त होगी। यह विभिन्न छात्र समूहों में सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देने और शैक्षणिक क्षमताओं को बढ़ाने पर केंद्रित है।
प्रेरणा: 15 जनवरी, 2024 से 17 फरवरी, 2024 तक गुजरात के वडनगर के एक स्थानीय स्कूल में इसका प्रायोगिक चरण शुरू किया गया। यह पहल एक सप्ताह तक चलने वाला आवासीय कार्यक्रम है जो कक्षा IX से XII तक के चयनित छात्रों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका उद्देश्य अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से विरासत को नवाचार के साथ मिश्रित करते हुए एक अनुभवात्मक और प्रेरणादायक शिक्षण अनुभव प्रदान करना है। प्रत्येक सप्ताह देश भर से 20 छात्रों (10 लड़के और 10 लड़कियों) का एक बैच कार्यक्रम में भाग लेगा।
उल्लास : इसे नव भारत साक्षरता कार्यक्रम (न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम-एनआईएलपी) के रूप में भी जाना जाता है। उल्लास को भारत सरकार द्वारा वित्त वर्ष 2022-2027 की अवधि के लिए शुरू किया गया था। यह केंद्र प्रायोजित पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुरूप है। इसका उद्देश्य 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को सशक्त बनाना है, विशेष रूप से उन लोगों को जो औपचारिक स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य उनकी साक्षरता को बढ़ाना है, जिससे वे समाज में बेहतर ढंग से एकीकृत हो सकें और देश के विकास में सक्रिय रूप से योगदान कर सकें।
निपुण भारत : समझ के साथ पढ़ने और अंकगणित में दक्षता के लिए राष्ट्रीय पहल राष्ट्रीय पहल (निपुण भारत) 5 जुलाई 2021 को स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा शुरू की गई थी। मिशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में प्रत्येक बच्चा ग्रेड 3 के अंत तक मूलभूत साक्षरता और अंकगणित में दक्षता प्राप्त करे। 2026-27 तक इसका लक्ष्य पूरा करना है।
विद्या प्रवेश : ग्रेड-I के बच्चों के लिए तीन महीने के खेल-आधारित स्कूल तैयारी मॉड्यूल के लिए विद्या प्रवेश दिशानिर्देश 29 जुलाई 2021 को जारी किए गए थे। इस पहल का उद्देश्य ग्रेड-I में प्रवेश करने वाले बच्चों के लिए एक गर्मजोशी भरा और स्वागत योग्य वातावरण प्रदान करना, सहज परिवर्तन सुनिश्चित करना और सकारात्मक सीखने के अनुभव को बढ़ावा देना है।
विद्यांजलि: प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 7 सितंबर 2021 को शुरू किए गए स्कूल स्वयंसेवक प्रबंधन कार्यक्रम का उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना है। साथ ही देश भर में कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) पहल और निजी क्षेत्र से योगदान को प्रोत्साहित करके स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाना है।
दीक्षा: भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू द्वारा 5 सितंबर 2017 को इसे शुरू किया गया था। इस मंच का उद्देश्य शिक्षा में नवीन समाधानों और प्रयोगों में तेजी लाकर शिक्षक प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास को बढ़ाना है। दीक्षा राज्यों और शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) को उनकी विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए मंच को रुचि के अनुसार लचीलेपन के साथ सशक्त बनाती है। इससे देश भर के शिक्षकों, शिक्षािवद्ों और वैसे छात्र जो आगे चलकर शिक्षक बनना चाहते हैं उनको लाभ होता है।
स्वयं प्लस: स्वयं प्लस, जिसे आधिकारिक तौर पर 27 फरवरी 2024 को माननीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा शुरू किया गया था। यह पहल उच्च शिक्षा में क्रांति लाने और उद्योग-प्रासंगिक पाठ्यक्रमों के लिए एक अभिनव क्रेडिट मान्यता प्रणाली को लागू करके कौशल विकास, रोजगार क्षमता और मजबूत उद्योग साझेदारी बनाने पर जोर देकर रोजगार क्षमता में सुधार करना चाहती है।
निष्ठा: 21 अगस्त 2019 को शिक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई निष्ठा (स्कूल प्रमुखों और शिक्षकों की समग्र उन्नति के लिए राष्ट्रीय पहल) का उद्देश्य 42 लाख प्राथमिक शिक्षकों और स्कूल प्रमुखों के व्यावसायिक विकास को बढ़ाना है। कोविड-19 महामारी को देखते हुए कार्यक्रम को 6 अक्टूबर 2020 को निष्ठा-ऑनलाइन में परिवर्तित कर दिया गया, जिसे दीक्षा प्लैटफॉर्म के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया गया। इस सफलता को देखते हुए 2021-22 में माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों के लिए निष्ठा 2.0 को शुरू किया गया था। वहीं, मूलभूत साक्षरता और अंकगणित पर ध्यान केंद्रित करते हुए 7 सितंबर 2021 को निष्ठा 3.0 पेश किया गया था।
एनआईआरएफ रैंकिंग: शिक्षा मंत्रालय द्वारा 29 सितंबर 2015 को शुरू की गई राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) ने भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। एनआईआरएफ ने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों के मूल्यांकन और रैंकिंग, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और शिक्षा और बुनियादी ढांचे में सुधार को प्रोत्साहित करने के लिए एक संरचित और पारदर्शी प्रणाली शुरू की है।
पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना: प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करके मेधावी छात्रों का सहयोग करने के लिए पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना को मंजूरी दी। यह योजना भारत भर के शीर्ष 860 संस्थानों में प्रवेश पाने वाले छात्रों के लिए शिक्षा ऋण प्रदान करती है, जिससे हर साल 22 लाख से अधिक छात्र लाभान्वित होते हैं। 2024-25 से 2030-31 तक 3,600 करोड़ रुपये के बजट आवंटन के साथ इस योजना का लक्ष्य अतिरिक्त 7 लाख छात्रों की सहायता करना है। पूरी तरह से डिजिटल, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित प्लेटफॉर्म के माध्यम से कार्यान्वित पीएम-विद्यालक्ष्मी देश भर के छात्रों के लिए आसान पहुंच और सुचारू अंतरसंचालनीयता (पारस्परिकता) सुनिश्चित करता है।
उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षा में निवेश
वैश्विक नेतृत्व के लिए भारत का मार्ग इसकी शिक्षा प्रणाली की ताकत से निकटता से जुड़ा हुआ है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करने और एक सुदृढ़ शिक्षण वातावरण तैयार करने के लिए वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग को रिकॉर्ड 73,498 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। यह वित्त वर्ष 2023-24 के संशोधित अनुमान की तुलना में 12,024 करोड़ रुपये (19.56%) की पर्याप्त वृद्धि दर्शाता है, जो शिक्षा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को उजागर करता है।
विशेष रूप से प्रमुख स्वायत्त निकायों को अब तक का सबसे अधिक आवंटन किया गया है। इसमें केंद्रीय विद्यालयों (केवीएस) को 9,302 करोड़ रुपये और नवोदय विद्यालयों (एनवीएस) को 5,800 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह पर्याप्त निवेश भारत की शिक्षा प्रणाली को और ऊपर उठाने के स्पष्ट इरादे को रेखांकित करता है।
वित्त वर्ष 2024-25 के लिए उच्च शिक्षा विभाग का बजट आवंटन 47,619.77 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है, जिसमें 7,487.87 करोड़ रुपये योजनाओं के लिए और 40,131.90 करोड़ रुपये गैर-योजना व्यय के लिए समर्पित हैं। यह पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 3,525.15 करोड़ रुपये या 7.99% की उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। विशेष रूप से विशिष्ट योजनाओं के लिए आवंटन में 1,139.99 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है, जो उच्च शिक्षा के भीतर लक्षित पहलों पर मजबूत ध्यान केंद्रित करता है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकन में वृद्धि : एआईएसएचई रिपोर्ट 2021-22
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने जनवरी 2024 में उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (एआईएसएचई) 2021-2022 जारी किया। 2011 में अपनी स्थापना के बाद से एआईएसएचई देश भर के सभी पंजीकृत उच्च शैक्षणिक संस्थानों (एचईआई) से व्यापक डेटा एकत्र कर रहा है, जिसमें छात्र नामांकन, संकाय (फैकल्टी) और बुनियादी ढांचे जैसे प्रमुख मापदंडों को शामिल किया गया है। सर्वेक्षण में पिछले कुछ वर्षों में हुए महत्वपूर्ण सुधारों पर प्रकाश डाला गया है, जो भारत के शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक प्रगति को दर्शाता है। इसमें नामांकन में बढ़ोतरी, समावेशिता में वृद्धि और मजबूत बुनियादी ढांचा शामिल है, जो एक अधिक मजबूत और गतिशील उच्च शिक्षा व्यवस्था में योगदान देता है।
महिला नामांकन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 2014-15 में 1.57 करोड़ से बढ़कर 2021-22 में 2.07 करोड़ हो गई है। इसमें 32% की वृद्धि दर्ज की गई है। एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों सहित वंचित समूहों के छात्रों के नामांकन में काफी वृद्धि हुई है, जिसमें सभी श्रेणियों में महिला नामांकन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है। 2021-22 में लिंग समानता सूचकांक (जीपीआई) 1.01 तक पहुंच गया, जो पुरुषों की तुलना में उच्च शिक्षा में अधिक महिला छात्रों के नामांकन की निरंतर प्रवृत्ति को उजागर करता है।
अध्ययन के क्षेत्रों के संदर्भ में एसटीईएम विषयों में नामांकन में लगातार वृद्धि देखी गई है। 2021-22 में यूजी, पीजी और पीएचडी स्तरों पर 98.5 लाख छात्रों ने दाखिला लिया है। तमाम चुनौतियों के बावजूद महिलाएं चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कला जैसे विषयों में अग्रणी हैं। माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर भी 2013-14 में 21% से घटकर 2021-22 में 13% हो गई है।
वित्त वर्ष 2024-25 में उच्च शिक्षा विभाग ने वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में 3,525.15 करोड़ रुपये (7.99%) की बजट वृद्धि देखी जो उच्च शिक्षा क्षेत्र को और मजबूत करने और समावेशी विकास का समर्थन करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।
शिक्षा बाधाओं को तोड़ने, अवसरों के द्वार खोलने और व्यक्तियों को समाज में सार्थक योगदान करने के लिए सशक्त बनाने की शक्ति रखती है। निरंतर नवाचार और व्यापक सुधारों के माध्यम से एक मजबूत प्रणाली का निर्माण करते हुए भारत का शैक्षिक परिदृश्य महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुआ है। नए विचारों, प्रौद्योगिकियों और शिक्षण विधियों को एकीकृत करने वाले समग्र 360-डिग्री दृष्टिकोण को अपनाकर भारत एक ऐसा वातावरण बना रहा है जहां युवा आगे बढ़ सकते हैं और उन्हें देश के विकास के लिए प्रमुख संपत्ति में बदल सकते हैं।
जैसा कि हम मौलाना अबुल कलाम आजाद की विरासत का सम्मान करते हैं, आइए हम सभी के लिए एक उज्जवल, अधिक समावेशी भविष्य की आधारशिला के रूप में शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साबित करें।
Saturday, September 14, 2024
हिन्दी बने राष्ट्र भाषा
ये शब्द बहुभाषाविद और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषा वैज्ञानिक जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के हैं। नि:संदेह हिन्दी देश के एक बड़े भू-भाग की भाषा है। महात्मा गांधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा कहा था। वह कहते थे कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।
भारत में अनेकों भाषायें एवं बोलियां हैं। इसलिए यहां यह कहावत बहुत प्रसिद्ध है- कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी। भाषा एक संवाद का माध्यम है। भारतीय संविधान में भारत की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। यद्यपि केंद्र सरकार ने 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसमें केंद्र सरकार या राज्य सरकार अपने स्थान के अनुसार किसी भी भाषा का आधिकारिक भाषा के चयन कर सकती है। केंद्र सरकार ने अपने कार्यों के लिए हिन्दी तथा रोमन भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया है। इसके अतिरिक्त राज्यों ने स्थानीय भाषा के अनुसार भी आधिकारिक भाषाओं का चयन किया है। इन 22 आधिकारिक भाषाओं में असमी, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संतली, सिंधी, तमिल, तेलुगू, बोड़ो, डोगरी, बंगाली एवं गुजराती सम्मिलित है। भारत की राष्ट्र भाषा को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होता रहा है। इस संबंध में महात्मा गांधी कहते थे- “अगर हमें एक राष्ट्र होने का अपना दावा सिद्ध करना है, तो हमारी अनेक बातें एक-सी होनी चाहिए। भिन्न-भिन्न धर्म और सम्प्रदायों को एक सूत्र में बांधने वाली हमारी एक सामान्य संस्कृति है। हमारी त्रुटियां और बाधाएं भी एक-सी हैं। मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारी पोशाक के लिए एक ही तरह का कपड़ा न केवल वांछनीय है, बल्कि आवश्यक भी है। हमें एक सामान्य भाषा की भी जरूरत है- देशी भाषाओं की जगह पर नहीं, परन्तु उनके सिवा। इस बात में साधारण सहमति है कि यह माध्यम हिन्दुस्तानी ही होना चाहिए, जो हिन्दी और उर्दू के मेल से बने और जिसमें न तो संस्कृत की और न फारसी या अरबी की ही भरमार हो। हमारी रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट हमारी देशी भाषाओं की कई लिपियां हैं। अगर एक सामान्य लिपि अपनाना संभव हो, तो एक सामान्य भाषा का हमारा जो स्वप्न है- अभी तो वह स्वप्न ही है- उसे पूरा करने के मार्ग की एक बड़ी बाधा दूर हो जाएगी।“
यह दुखद है कि देश की एक बड़ी जनसंख्या द्वारा बोले जाने वाली हिन्दी अब तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है।
कुछ लोग कहते हैं कि गैर हिन्दी विशेषकर दक्षिण भारत के लोगों के विरोध के कारण हिन्दी को उसका वास्तविक स्थान नहीं मिल पाया है, परन्तु यह कथन उचित नहीं लगता, क्योंकि महात्मा गांधी गुजरात से थे तथा उनकी मातृभाषा गुजराती थी, फिर भी वह हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने के प्रबल समर्थक थे। महाराष्ट्र के वर्धा में आयोजित राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि देश कि बहुसंख्यक आबादी न केवल हिन्दी लिखती-पढ़ती, अपितु भाषाई समझ रखती है, इसलिए हिन्दी ही देश की राष्ट्र भाषा होनी चाहिए। उनका मानना था कि स्वतंत्रता के पश्चात यदि हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाया जाता है, तो देश की बहुसंख्यक जनता को आपत्ति नहीं होगी। इसी प्रकार दक्षिण भारत के राजनेता राजगोपालाचार्य भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में देखना चाहते थे। उनके अनुसार हिन्दी में ही देश की राष्ट्र भाषा होने के सभी गुण हैं। सीमान्त गांधी के नाम से प्रसिद्ध खां अब्दुल गफ़्फ़ार खां भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के समर्थक थे।
वास्तव में हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं बन पाई, तो इसके लिए अंग्रेजी मानसिकता वाले भारतीय नेता ही उत्तरदायी थे। देश में सदैव अंग्रेजी भाषा एवं हिन्दी भाषा को लेकर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा भ्रम की स्थिति उत्पन्न की गई। इसके कारण हिन्दी का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया। दिन-प्रतिदिन हिन्दी पिछड़ती गई, जबकि अंग्रेजी अपना वर्चस्व स्थापित करती गई। आज स्थिति यह है कि भारत के शिक्षित समाज में हिन्दी बोलने वाले लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ें। इसके लिए वे मोटी से मोटी फीस देने को तत्पर हैं। अंग्रेजी स्टेटस सिंबल बन गई है। बहुत से लोग मानते हैं कि अंग्रेजी उन्नति की भाषा है। अंग्रेजी के बिना कोई उन्नति नहीं कर सकता, परन्तु ऐसा नहीं है। विश्व के अनेक देशों में लिपि के नाम पर केवल चित्रात्मक विधियां हैं, तब भी वे देश उन्नति के मामले में शीर्ष पर हैं। रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, जापान, नीदरलैंड आदि देशों के उदाहरण सबके सामने हैं।
सत्य तो यह है कि हिन्दी भारत की आत्मा, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति एवं सभ्यता से जुड़ी हुई भाषा है। भारत का दुर्भाग्य यह रहा है कि सहृदयता के नाम पर कुछ भारतीय प्रतिनिधि ही इसकी स्मिता की जड़ों को खोखला करने का कार्य करते आए हैं। हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप मे राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिलने के पीछे भी इसी प्रकार की सोच वाले नेताओं की प्रमुख भूमिका रही है। दुर्भाग्यवश इसी मानसिकता के लोगों का बाहुल्य आज भी कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक निर्णायक स्थिति में है।
बोली की दृष्टि से हिन्दी विश्व में द्वितीय स्थान पर है, जबकि प्रथम बड़ी बोली मंदारीन है जिसका प्रभाव दक्षिण चीन के ही क्षेत्र में सीमित है। चूंकि उनका जनघनत्व और जनबल बहुत है। इस नाते वह विश्व की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है, पर वह आचंलिक ही है। हिन्दी का विस्तार भारत के अतिरिक्त लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं। विश्व में लगभग 50 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है।
देश का लगभग 60 प्रतिशत बाजार हिन्दी बोलने वाले लोगों का है। भारत विश्व में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के नाते भी विश्व वाणिज्य की सभी संस्थाएं हिन्दी के प्रयोग को अपरिहार्य मान रही हैं। आज प्रत्येक कंपनी के विज्ञापन का आधार केवल हिन्दी है। इतना ही नहीं विदेशी कंपनियों के मोबाइल फोन भी हिन्दी में टाइपिंग की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी हिन्दी का वर्चस्व दिखाई देता है।
किन्तु किसी भाषा की सबलता केवल बोलने वाले पर निर्भर नहीं होती, अपितु उस भाषा में जनोपयोगी एवं विकास के कार्य कितने होते हैं, इस पर निर्भर होती है। उसमें विज्ञान, तकनीकि और श्रेष्ठतम आदर्शवादी साहित्य की रचना कितनी होती है? साथ ही तीसरा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस भाषा के बोलने वाले लोगों का आत्मबल कितना महान है? परन्तु यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि हिन्दी अपने ही देश में तुच्छ समझी जा रही है। हमें केवल इतना ही करना है कि हम अपना आत्मविश्वास जगाएं और अपने भारत पर अभिमान करें। हम विश्व में श्रेष्ठतम भाषा विज्ञान एवं परंपराओं वाले देश के नागरिक हैं। केवल हीन भावना के कारण हम स्वयं को तुच्छ समझ रहे हैं, अपितु आज के इस वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत का भाषा विज्ञान कंप्यूटर के लिए सर्वोत्तम पाया गया है।
यद्यपि सरकारी स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य किए जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन अर्थात 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा बनाने का निर्णय लिया था। हिन्दी को देश के अधिकतर क्षेत्रों में हिन्दी बोली एवं पढ़ी जाती है, इसलिए हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया था। यह भारतीय संविधान के भाग-17 के अध्याय की अनुच्छेद-343(1) में वर्णित है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अन्तरराष्ट्रीय होगा।
हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए वर्ष 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हिन्दी दिवस के अवसर पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान हिन्दी निबन्ध लेखन, वाद-विवाद, हिन्दी टंकण प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही 14 सितम्बर से हिन्दी सप्ताह मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।
हिन्दी दिवस पर हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए उत्कृष्ट कार्य करने हेतु राजभाषा गौरव पुरस्कार और राजभाषा कीर्ति पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को प्रदान किया जाता है। इसमें दस हजार रुपये से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को दो लाख रुपये, द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपये तथा तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को 75 हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोगों को धनराशि के साथ प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न भी प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य तकनीकी एवं विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है। राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति, मंडल आदि को उनके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इस पुरस्कार के अंतर्गत कुल 39 पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इसका उद्देश्य सरकारी कार्यालयों में हिन्दी भाषा के उपयोग को बढ़ावा देना है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि स्वतंत्रता के लगभग साढ़े सात दशक बाद भी देश की अपनी राष्ट्र भाषा नहीं है। जब देश का एक राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक है। यहां तक कि राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी एक है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि देश की अपनी राष्ट्र भाषा क्यों नहीं होनी चाहिए? भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी की पिछलग्गू भाषा के रूप में क्यों बने रहना चाहिए? इस पर विचार किया जाना चाहिए। देशहित में हिन्दी को न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका की भाषा बनाया जाना चाहिए।
Wednesday, July 24, 2024
नये शिक्षा सत्र का उत्साह
डॉ. सौरभ मालवीय
शिक्षण संस्थानों में नया शिक्षा सत्र प्रारंभ हो चुका है। प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में प्राय: नया शिक्षा सत्र अप्रैल महीने में आरंभ हो जाता है, किन्तु उच्च शिक्षा के संस्थानों में जुलाई से ही नये शिक्षा सत्र का प्रारंभ होता है। यदि देखा तो वास्तव में सभी शिक्षण संस्थानों में नया शिक्षा सत्र जुलाई महीने में ही आरंभ होता है। इससे पूर्व का समय तो शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेने, पुस्तकें, स्टेशनरी, बैग और यूनिफॉर्म आदि खरीदने में व्यतीत हो जाता है। जो समय मिलता है, उसमें विद्यार्थी अपनी नई पुस्तकों से परिचय करते हैं। प्राय: विद्यार्थी भाषा की पुस्तकें पढ़ते हैं, क्योंकि उनमें कथाएं होती हैं, जो बच्चों को अति प्रिय हैं।
कुछ समय विद्यालय जाने के पश्चात ग्रीष्म कालीन अवकाश आ जाता है। यह ग्रीष्म कालीन अवकाश ग्रीष्म ऋतु के मध्य में आता है। इस समयावधि में अत्यधिक भीषण गर्मी पड़ती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश मई के अंतिम सप्ताह से लेकर पूरे जून तक रहता है। इस समयावधि में उच्च तापमान के कारण सभी विद्यालय एवं महाविद्याल बंद रहते हैं।
बच्चे ग्रीष्मकालीन अवकाश की वर्षभर प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि इसमें उन्हें सबसे अधिक दिनों का अवकाश प्राप्त होता है। बच्चों के लिए ग्रीष्म कालीन अवकाश किसी पर्व से कम नहीं होता। इस समयावधि में उन्हें कोई चिंता नहीं होती अर्थात उन्हें न तो प्रात:काल में शीघ्र उठकर विद्यालय जाने की चिंता होती है और न ही गृहकार्य करने की कोई चिंता होती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपनी नानी के घर जाते हैं। वहां वे अपने ननिहाल के लोगों से मिलते हैं। सब उन्हें बहुत लाड़-प्यार करते हैं। नानी उन्हें बहुत सी कहानियां सुनाती हैं। नाना और मामा उन्हें घुमाने के लिए लेकर जाते हैं और उन्हें उनके पसंद के खिलौने दिलवाते हैं। आज के एकल परिवार के युग में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपने दादा-दादी के घर भी जाते हैं। वहां भी उन्हें बहुत ही लाड़- प्यार मिलता है। नानी की तरह दादी भी बच्चों को कहानियां सुनाती हैं। इन कथा- कहानियों के माध्यम से वे बच्चों में संस्कार पोषित करती हैं, जो उनके चरित्र का निर्माण करते हैं। यही संस्कार जीवन में उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा नगरों में जाने से वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। अपने सगे-संबंधियों से मिलते हैं। इससे उन्हें अपने संबंधों का पता चलता है। उनमें अपने संबंधियों के प्रति स्नेह का भाव पैदा होता है। वे अपने संबंधियों के प्रति अपने दायित्व को भी समझते हैं।
ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चे अपने माता- पिता के साथ पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं। अधिकतर लोग ऐसे स्थानों पर जाते हैं, जहां तापमान कम रहता है। ये पहाड़ी क्षेत्र होते हैं। इससे वे वहां की संस्कृति एवं रीति- रिवाजों के बारे में जान पाते हैं। इसके अतिरिक्त वे धार्मिक स्थलों एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों पर भी घूमने जाते हैं। घूमने का अर्थ केवल सैर सपाटा और मनोरंजन करना नहीं है, अपितु पर्यटन से बहुत सी शिक्षाएं मिलती हैं। धार्मिक स्थलों पर जाने से मन को शान्ति प्राप्त होती है तथा बच्चे अपने गौरवशाली संस्कृति से जुड़ पाते हैं। उन्हें अपने ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है। उनमें आस्था का संचार होता है। उनका आत्मबल एवं आत्म विश्वास बढ़ता है। ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से उन्हें अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होता है। ये व्यवहारिक ज्ञान है, जो उन्हें आने- जाने से प्राप्त होता है। यह उनके लिए आवश्यक भी है। वे जिन चीजों के बारे में पुस्तकों में पढ़ते उनके बारे में उन्हें सहज जानकारी प्राप्त होती है। इसका उनके मन- मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
शिक्षकों द्वारा ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए भी विद्यार्थियों को गृहकार्य दिया जाता है। इस दौरान विद्यालय अवश्य बंद रहते हैं, किन्तु ट्यूशन सेंटर खुले रहते हैं। बच्चे ट्यूशन के लिए जाते हैं और अपना गृहकार्य भी करते हैं। इसके अतिरिक ग्रीष्म कालीन अवकाश के दौरान बहुत से संस्थान अनेक प्रकार के कम समयावधि वाले कोर्स प्रारंभ करते हैं, उदाहरण के लिए चित्रकला, संगीत, गायन, नृत्य, मिट्टी के खिलौने बनाने, सजावटी सामान बनाना आदि। इस समयावधि में बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने एवं नई- नई चीजें सीखने का अवसर प्राप्त होता है। बहुत से बच्चे खेलों की ओर रुझान करते हैं। समय अभाव के कारण वे खेल नहीं पाते थे, किन्तु अवकाश में उन्हें अपनी पसंद के खेल खेलने का अवसर मिल जाता है। क्षेत्र के बच्चे अपनी-अपनी टीमें बना लेते हैं और आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं. इससे उनमें खेल भावना का विकास होता है। किसी भी खिलाड़ी के खेल का प्रारंभ इसी प्रकार होता है। पहले वे अपने मित्रों के साथ खेलता है. फिर इसी प्रकार वह खेल स्पर्धाओं में खेलने लगता है। इस प्रकार एक दिन वह देश के लिए पदक जीतने वाला खिलाड़ी बन जाता है। वास्तव में यह समय बच्चों के नैसर्गिक गुणों को निखारने का कार्य करता है।
ग्रीष्म कालीन अवकाश व्यतीत होने के पश्चात विद्यालय व अन्य शिक्षण संस्थान पुन: खुल जाते हैं। विद्यार्थियों की दिनचर्या पुनः पूर्व की भांति हो जाती है। वे प्रात:काल में शीघ्र उठ जाते हैं। नित्य कर्म से निपटने के पश्चात विद्यालय जाने के लिए तैयार होते हैं। वे नाश्ता करके घर से निकल जाते हैं। दिनचर्या केवल बच्चों की ही परिवर्तित नहीं होती, अपितु उनके साथ- साथ उनके माता- पिता की दिनचर्या भी परिवर्तित हो जाती है। उनकी माता प्रातः काल में शीघ्र उठकर उनके लिए नाश्ता बनाती है। उनके लिए टिफिन तैयार करती है। उन्हें विद्यालय या स्कूल बस तक छोड़ने जाती है। बहुत सी माताएं बच्चों को विद्यालय लेकर भी जाती हैं और उन्हें वापस भी लाती हैं। बहुत से विद्यालयों के बाहर दोपहर में महिलाएं अपने बच्चों की प्रतीक्षा में खड़ी रहती हैं। बहुत से बच्चों को उनके पिता विद्यालय छोड़ने जाते हैं।
नये शिक्षा सत्र में बच्चे बहुत प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनकी कक्षा का एक स्तर बढ़ जाता है। वे स्वयं को पहले से श्रेष्ठ अनुभव करते हैं। पिछली कक्षा में भी उन्होंने कड़ा परिश्रम किया था। उसके कारण ही परीक्षा में वे सफलता प्राप्त कर पाए। परिणामस्वरूप अब वह उससे अगली कक्षा में अर्थात उससे ऊंची कक्षा में हैं। जब विद्यालय खुले थे, तब बहुत अधिक गर्मी थी। बच्चे गर्मी से व्याकुल थे, किन्तु उनके चेहरे पर उत्साह के भाव दिखाई दे रहे थे। बहुत से विद्यालयों में रोली एवं तिलक लगाकर बच्चों का स्वागत किया गया है। यह एक अच्छी पहल है। इससे बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति लगाव उत्पन्न होता है।
मेरे प्रेरणास्रोत: स्वामी विवेकानंद
डॉ. सौरभ मालवीय
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शहर, कुत्ते और हमारी ज़िम्मेदारी - “पॉटी उठाना शर्म नहीं, संस्कार है, शहर की सड़कों पर पॉटी नहीं, जिम्मेदारी चाहिए” भारत में पालतू कुत्तों की संख्या 2023 में लगभग 3.2 करोड़ आंकी गई, और यह ...1 year ago
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नमो-नमो.....आंखों ने जो देखा ! - अपन गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय को आदर्श राजनेता मानकर राजनीति में सक्रिय हैं। सादगी, शुचिता, विनम्रता, अध्ययनशीलता...ये सब गुण ऐसे हैं, जो ज्यादा आ...13 years ago


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