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Thursday, July 10, 2025

अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक गौरवशाली एवं समृद्ध सभ्यताओं में एक है। विश्व के अनेक देशों में जब बर्बरता का युग था, उस समय भी हमारी भारतीय सभ्यता अपने शीर्ष पर थी। इसका सबसे प्रमुख कारण है शिक्षा। हमारे पूर्वजों ने शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत उन्नति की। शिक्षा के माध्यम से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ। इस पवित्र भारत भूमि पर वेद-पुराणों की रचना हुई तथा यह सब शिक्षा के कारण ही संभव हो सका। मनुष्य के लिए जितने आवश्यक वायु, जल एवं भोजन है, उतनी ही आवश्यक शिक्षा भी है। शिक्षा के बिना मनुष्य पशु समान है।
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्।
विद्या राजसु पुज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः।।
अर्थात विद्या मनुष्य का विशेष रूप है, विद्या गुप्त धन है। वह भोग की दाता, यश की दाता एवं उपकारी है। विद्या गुरुओं की गुरु है। विद्या विदेश में बंधु है। विद्या देवता है। राजाओं के मध्य विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्या विहीन मनुष्य पशु है।
निसंदेह किसी भी सभ्य समाज के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के लिए नहीं होती कि विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय से शैक्षिक प्रमाण-पत्र प्राप्त कर राजकीय या अराजकीय नौकरी प्राप्त कर ली जाए। शिक्षा का उद्देश्य तो मानव के संपूर्ण जीवन का विकास करना होता है। हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए शिक्षा अति आवश्यक है। शिक्षित व्यक्ति के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
विद्या वितर्का विज्ञानं स्मति: तत्परता किया।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते।।
अर्थात विद्या, तर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता एवं दक्षता, जिसके पास ये छह गुण हैं, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। विद्या अथवा शिक्षा प्रकाश का वह स्त्रोत है, जो मानव जीवन को प्रकाशित करता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ शिक्षा पद्धति थी। किन्तु कालांतर में शिक्षा पद्धति में परिवर्तन आया तथा शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करने तक ही रह गया। बहुत समय से वर्तमान शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की बात उठ रही थी तथा ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके। साथ ही बच्चों के कंधों से बस्ते का भार कुछ कम किया जा सके।
  
उत्तम शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम में चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को विकसित करने के विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से केवल मनुष्य की भौतिक उन्नति होती है, किन्तु औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होने चाहिए, जिससे नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। वर्तमान युग में मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिक उन्नति कर रहा है, त्यों-त्यों वह जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आपसी पारिवारिक संबंध टूटते जा रहे हैं। किसी को किसी की तनिक भी चिंता नहीं है। परिवार के वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है तथा बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिए जाते हैं। ग्रामों की पैतृक संपत्ति को बेचकर महानगरों में छोटे-छोटे आवासों में भौतिक सुख-सुविधा में जीने को ही मनुष्य ने जीवन की सफलता मान लिया है। यदि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना है, तो सबसे पहले वर्मान शिक्षा पद्धति में सुधार करना होगा। इसी उद्देश्य के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के सभी विद्यालयों में प्रथम कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक अनुभूति पाठ्यक्रम लागू करने जा रही है।
  
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात पर चिंता प्रकट की जा रही है कि मानव का जीवन- मूल्यों से विश्वास उठता जा रहा है। वह चरित्र की अपेक्षा धन को महत्त्व दे रहा है। इससे उसका नैतिक पतन हो रहा है। मनुष्य के चारित्रिक पतन के कारण समाज में अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे मनुष्य का नैतिक विकास हो तथा वह एक सुसभ्य समाज का निर्माण करने में सहायक सिद्ध हो सके। नि:संदेह शिक्षा इसका सबसे सशक्त माध्यम है। नई शिक्षा पद्धति का उद्देश्य ऐसे सदाचारी मनुष्यों का विकास करना है, जिनमें दया, करुणा, सहानुभूति एवं साहस हो। जो नैतिक मूल्यों से संपन्न हों, जिनके लिए मानवीय मूल्य सर्वोपरि हों।  
 
शिक्षा का प्रथम उद्देश्य विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण करना होता है। भारतीय संस्कृति में चरित्र निर्माण पर सर्वाधिक बल दिया गया है। मनुस्मृति के अनुसार सभी वेदों का ज्ञाता विद्वान भी सच्चरित्रता के अभाव में श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु केवल गायित्री मंत्र का ज्ञाता पंडित यदि चरित्रवान है, तो श्रेष्ठ है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है, ताकि वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को उसके अधिकारों के साथ-साथ उसके कर्त्तव्यों के बारे में भी बताना है, ताकि वह अपने अधिकारों को प्राप्त कर सके तथा परिवार एवं समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का भी निर्वाहन कर सके। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के जीवन स्तर को उन्नत व समृद्ध बनाना भी है। शिक्षा के माध्यम से वह अपने जीवन को सुगम, उन्नत एवं समृद्ध बना सके। विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ व्यवसायिक कार्यों का भी प्रशिक्षण दिया जाता था, ताकि वे अपने-अपने कार्यों में भी निपुणता प्राप्त कर सकें। एक नैतिकता से परिपूर्ण चरित्रवान व्यक्ति ही अपने कुल तथा देश का नाम ऊंचा करता है।
 
उत्तर प्रदेश में ऐसी ही शिक्षा पद्धति को लागू किया जा रहा है। कम शब्दों में बात की जाए, तो मूल रूप से शिक्षा के दो ही उद्देश्य हैं, प्रथम यह कि व्यक्ति शिक्षा ग्रहण कर समृद्धि प्राप्त करे एवं प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन करे तथा द्वितीय यह कि वह दूसरों को प्रसन्नता एवं सहायता प्रदान करने योग्य हो। छोटी कक्षाओं से लेकर महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय तक की शिक्षा का कुल उद्देश्य यही है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब वर्तमान शिक्षा का उद्देश्य समृद्धि ही है तो फिर अनुभूति पाठ्यक्रम की आवश्यकता क्यों है? 

वास्तव में हम सुख-सुविधाओं को जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। आज उच्च शिक्षा प्राप्त करके तथा उसके माध्यम से उच्च पद प्राप्त करना। तत्पश्चात अकूत धन-संपदा एकत्रित करना ही जीवन का उद्देश्य बनकर रह गया है। इस भागदौड़ में मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। इन्हीं मानवीय मूल्यों के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश में अनुभूति पाठ्यक्रम लागू किया जा रहा है।  राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हो रहे हैं। बात चाहे प्राथमिक शिक्षा की हो, माध्यमिक शिक्षा की हो, व्यावसायिक शिक्षा की हो या उच्च शिक्षा की, सभी क्षेत्रों में सराहनीय कार्य किए जा रहे हैं। आशा है कि राज्य के शिक्षकों एवं शिक्षाविदों के माध्यम से अनुभूति पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में नई ऊर्जा का संचार करेगा तथा यह विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगो सिद्ध होगा। 

Friday, March 11, 2022

समाचार पत्र में


अनुभूति पाठ्यक्रम - बेसिक शिक्षा परिषद,
उत्तर प्रदेश
नवभारत टाइम्स

Wednesday, October 1, 2008

भाजपा की विचारधारा- पंचनिष्‍ठा, अंतिम भाग


प्रो ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। प्रस्तुत है अंतिम भाग-

मूल्याधारित राजनीतिमूल्य का अर्थ है यह दृष्टि या विवेक कि क्या सही है और क्या गलत है, क्या महत्वपूर्ण है और क्या महत्वहीन, क्या मूल्यवान है, ग्राह्य है, वांछनीय है, क्या मूल्यहीन है, अग्राह्य है, अवांछनीय है। मूल्य उन उच्च मानदण्डों का नाम है जिनके पालन से श्रेष्ठता का सृजन होता है, आदर्शों का निर्माण होता है। मूल्य वह विवेक दृष्टि है जो अच्छे और बुरे का बोध जगाती है। जो अच्छा है उसका आचरण करने और जो बुरा है उससे निवृत्त होने की प्रेरणा देती है। संक्षेप में श्रेष्ठता का मानदण्ड मूल्य कहलाते हैं।राजनीति का क्षेत्र सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसकी श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा के लिए जिन मानदण्डों का पालन ज़रूरी है, वे ही मूल्य हैं। भारतीय जनता पार्टी राजनीति में उच्च मानदण्डों के पालन के प्रति प्रतिबध्द है। मूल्यों के आग्रह के कारण ही किसी समय राजनीति, राजनेता और राजनैतिक कार्यकर्ताओं को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त था। मूल्यों का आग्रह छूट जाने से, राजनीति विकृत हो गई और राजनेता तथा राजनैतिक कार्यकर्ता की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची है। हमें राजनीति को पुन: मूल्यों पर अधिष्ठित करने की अपनी प्रतिबध्दता को सुदृढ़ करना होगा।भाजपा मात्र एक राजनीतिक दल नहीं है। यह सिध्दान्तों, विचारधाराओं और मान्यताओं पर आधारित एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण।

भाजपा मात्र एक राजनीतिक दल नहीं है। यह सिध्दान्तों, विचारधाराओं और मान्यताओं पर आधारित एक आन्दोलन है जिसका उद्देश्य है सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण। स्वतंत्रता पूर्व की राजनीति का तात्कालिक उद्देश्य था देश को ब्रिटिश दासता से मुक्त करना, भारत माता के पाँव में पड़ी बेड़ियों को काटना। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का उद्देश्य है राष्ट्रीय विकास, पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय अभ्युदय। इसी से विश्व के देशों की मालिका में भारत को गौरवपूर्ण स्थान मिल सकेगा। कहीं स्वतन्त्रता के बाद की राजनीति अपने इस महान ध्‍येय से भटक तो नहीं गई है? श्री दीनदयालजी ने सलाह दी थी कि 'राष्ट्र को क्षीण करने वाली राजनीति को त्याज्य ही मानना चाहिए। उनका मत था कि 'राजनीति अन्तत: राष्ट्र के लिए ही होती है। राष्ट्र का विचार त्याग दिया-अर्थात् राष्ट्र की अस्मिता, इतिहास, संस्कृति एवं सभ्यता का विचार ही नहीं किया- तो राजनीति किस काम की'?आज के राजनीतिक दलों के व्यवहार और कार्यकलापों पर दृष्टि डालें तो लगता है कि राजनीति राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और सामाजिक परिवर्तन के ध्‍येय से विमुख होकर सत्ताभिमुखी हो गई है। राष्ट्रसेवा का स्थान सत्ता की आंकाक्षा और सत्ता के भोग ने ले लिया है। इसमें से अनेक प्रकार की विकृतियां उत्पन्न हुई हैं, सत्ता प्राप्ति की महत्वाकांक्षा, दलबदल, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, विशेषरूप से सार्वजनिक जीवन के उच्च स्थानों पर व्याप्त भ्रष्टाचार, सहकार नहीं विरोध, सामंजस्य नहीं वैमनस्य, रचना नहीं विध्‍वंस, तात्कालिक लाभ के लिए जनभावनाओं को भड़काने की प्रवृत्ति, वोट बैंक की राजनीति जिसके चलते जातीय, साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काकर सामाजिक विभाजन को तीव्र किया जाता है, तुष्टीकरण की विभाजनकारी राजनीति। उक्त विकृतियों के कारण आज भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शुचिता की भारी कमी आ गई है।भाजपा प्रचलित विकृत राजनीतिक संस्कृति के स्थान पर वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति विकसित करने के लिए प्रयत्नशील है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यकर्ताओं का संस्कार और शिक्षण आवश्यक है। भाजपा ने विभिन्न स्तरों पर कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और संस्कार की व्यवस्था की है ताकि वे निजी और सार्वजनिक जीवन में शुचिता का आग्रह रखें।

भाजपा प्रचलित विकृत राजनीतिक संस्कृति के स्थान पर वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति विकसित करने के लिए प्रयत्नशील है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यकर्ताओं का संस्कार और शिक्षण आवश्यक है। भाजपा ने विभिन्न स्तरों पर कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और संस्कार की व्यवस्था की है ताकि वे निजी और सार्वजनिक जीवन में शुचिता का आग्रह रखें। भाजपा की पहचान एक अनुशासित कैडर वाली पार्टी के रूप में होती आई है। आज अनुशासन में कुछ शिथिलता दिखाई पड़ती है, जो भाजपा के कर्णधारों के लिए चिन्ता का विषय है। अनुशासन के पहले जैसे ऊँचे मानदण्डों का आग्रह बढ़ाने की दिशा में ठोस उपाय किए जा रहे हैं। भाजपा दल-बदल की विरोधी हैं, क्योंकि दलबदल से जहां एक ओर राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, वहीं यह मतदाताओं से विश्वासघात भी है। इसके लिए हमारे चुनाव कानूनों में सुधार किए जाने की ज़रूरत है। भारतीय राजनीति में धनबल, बाहुबल और अपराधी तत्वों का प्रभाव बढ़ा है।परिणामत: चुनाव भयमुक्त और निष्पक्ष वातावरण में नहीं हो पाते और इनसे उपजा जनादेश कई बाद छद्म जनादेश होता है। इसके लिए जहाँ एक ओर राजनीतिक दलों में आमसहमति से आचार संहिता विकसित किया जाना जरूरी है, वहीं चुनाव कानूनों में आवश्यक सुधार करने होंगे। भारतीय राजनीति की एक विकृति अवसरवादी राजनीतिक गठबंधन है। राजनीतिक गठबंधन समय की आवश्यकता होने पर भी, ये कुछ सिध्दान्तों और मर्यादाओं पर आधारित होने चाहिए। चुनाव परिणाम के बाद महज़ सत्ता प्राप्त करने के लिए किए गए सिध्दान्तविहीन संगठन जहां टिकाऊ नहीं होते वहाँ वे मतदाता से भी छल होता है। यूपीए सरकार कांग्रेस के कुछ अन्य दलों और वामपंथी दलों से गठबन्धान का परिणाम है। लेकिन वामपंथी दल और कांग्रेस में न आर्थिक नीतियों को लेकर और न ही वैदेशिक नीतियों को लेकर सामंजस्य है। उलटे वामपंथी दल यूपीए सरकार पर न्यूनतम सांझा कार्यक्रम से भटक जाने का आरोप लगाते रहते हैं। ऐसे अवसरवादी गठबन्धनों से लोकविश्वास आहत होता है। सार्वजनिक जीवन में उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार के प्रसंग अक्सर समय-समय पर सामने आते रहते हैं। इन प्रसंगों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को कठोर दण्ड देने के बजाय अक्सर इनकी जांच को अनावश्यक रूप से वर्षों-वर्षों लटकाया जाता है और कार्रवाई के नाम पर लीपापोती की जाती है। भ्रष्टाचार विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। कांग्रेस और कुछ अन्य सत्ताालोलुप दल आरक्षण की राजनीति और अल्संख्यक तुष्टीकरण को हवा देने में लगे रहते हैं। राष्ट्रीय हित गौण और दलीय हित प्रमुख हो गए हैं। जातीय और सामाजिक विभाजन की राजनीति की प्रचण्ड प्रतिस्पर्धा चल रही है। इस अन्धी प्रतिस्पर्धा में राष्ट्रीय हितों की भी अनदेखी हो रही है- फिर वह चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सरोकार हों या आंतरिक सुव्यवस्था के सरोकार। दलीय हितों की पूर्ति के लिए लोकतान्त्रिक परम्पराओं और संस्थाओं का अवमूल्यन करने से परहेज़ नहीं किया जाता, राज्यपाल के पद का दुरूपयोग कर सरकारें गिराई जाती हैं, न्यायपालिका और संसद के निर्णयों और भावनाओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित किया जाता है, कानून में रातोंरात संशोधन या परिवर्तन कर न्यायपालिका के सुविचारित निर्णयों को प्रभावहीन बना दिया जाता है। उक्त विकृतियों के चलते मतदाताओं का राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग होता जा रहा है। इस स्थिति का समय रहते कठोरतापूर्वक उपचार करना ज़रूरी है। पटरी से उतर गई राजनीतिक संस्कृति को पुन: पटरी पर बैठाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने को शुचिता के मूल्य के प्रति प्रतिबध्द करें।

भाजपा की विचारधारा- पंचनिष्ठा- भाग-4


प्रो ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। प्रस्तुत है चौथा भाग-
सकारात्मक पंथनिरपेक्षताभारत बहुधार्मिक-बहुपांथिक देश है। इसमें विविध विश्वासों और आस्थाओं वाले लोग रहते है। उपासना पध्दतियों की बहुलता है। ऐसे समाज को धार्मिक उदारता का दृष्टिकोण अपनाकर ही एक रखा जा सकता है। धार्मिक उदारता पंथनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म का आधारभूत तत्व है। लेकिन सेकुलरिज्म शब्द के अर्थ को लेकर विभ्रम व्याप्त है।सेकुलरिज्म की एक व्याख्या धर्म के विरोध के रूप में की जाती है। यह व्याख्या लौकिकता को स्वीकार करती है और आध्‍यात्मिकता का निषेध करती है। ईश्वरीय सत्ता या अव्यक्त सत्ता को नकार कर लौकिक सत्ता और मानव सत्ता का स्वीकार सेकुलरिज्म माना जाता है। धर्म के अस्वीकार वाली सेकुलरिज्म की कल्पना भाजपा को स्वीकार नहीं।यूरोप में चर्च और राज्य के बीच टकराव में से सेकुलरवाद का उद्भव हुआ। राज्य ने चर्च द्वारा लौकिक या पार्थिव मामलों में दखल के विरूध्द आवाज़ उठाई। इसलिए सेकुलरवाद का अर्थ हुआ राज्य की धर्मनिरपेक्षता। इसके विपरीत भारत में धर्म को कर्तव्य या नीति के रूप में स्वीकार किया गया और इसे जीवन के सभी अंगों के लिए ग्राहय माना गया, यहां तक कि राज्य के लिए भी। भारत की सोच धर्मनिरपेक्ष राज्य की नहीं धर्माधारित राज्य की रही है।
यूरोप में चर्च और राज्य के बीच टकराव में से सेकुलरवाद का उद्भव हुआ। राज्य ने चर्च द्वारा लौकिक या पार्थिव मामलों में दखल के विरूध्द आवाज़ उठाई। इसलिए सेकुलरवाद का अर्थ हुआ राज्य की धर्मनिरपेक्षता। इसके विपरीत भारत में धर्म को कर्तव्य या नीति के रूप में स्वीकार किया गया और इसे जीवन के सभी अंगों के लिए ग्राहय माना गया, यहां तक कि राज्य के लिए भी। भारत की सोच धर्मनिरपेक्ष राज्य की नहीं धर्माधारित राज्य की रही है। सेकुलरिज्म की एक अन्य व्याख्या धर्म के मामले में राज्य की तटस्थता के रूप में की जाती है। राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए, राज्य को धार्मिक मामलों से स्वयं को अलग रखना चाहिए, इत्यादि। सेकुलरिज्म की एक अन्य व्याख्या यह है कि राज्य सभी धर्मों से समान व्यवहार करे, राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हों और राज्य विभिन्न धार्मिक समुदायों में भेदभाव न करे।हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति स्वभाव से ही पंथनिरपेक्ष है। इसमें विविध धर्माचरणों, विश्वासों और उपासना पध्दतियों का स्वीकार है। एक ईश्वर को पाने के, उस तक पहुंचने के मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, ईश्वर की उपासना के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। एक ही तत्व को विद्वान् भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं-- एकं सद्विप्रा बहुध वदन्ति'। भारतीय संस्कृति के इस धार्मिक उदारवाद के स्वभाव का ही परिणाम है कि भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहां धार्मिक मामलों में न भेदभाव किया जाता रहा है और नहीं धार्मिक आधार पर किसी धार्मिक समुदाय का उत्पीड़न।किन्तु सेकुलरिज्म के राजनीतिक इस्तेमाल ने इसका रूप विकृत कर दिया है। सेकुलरिज्म के नाम पर वोट की राजनीति का चलन बढ़ता गया है। इसके लिए मुख्यत: कांग्रेस पार्टी का एक वर्ग, कम्युनिस्ट और कुछ अन्य हिन्दू विरोधी ताकतें जिम्मेदार हैं। इनका सकुलरिज्म हिन्दू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण मात्र है। मुस्लिम वोट पर नज़र रखने वाले राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए हिन्दू विरोध ही धर्मनिरपेक्षता है, फिर वे हिन्दू विरोध में चाहे किसी भी सीमा तक क्यों न बह जाएं। हमारे देश में ऐसे तत्व भी हैं, जिन्हें वंदे मातरम् गाना या सरस्वती वंदना करना धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का उल्लंघन लगता है। ये ताकतें इस्लामी कट्टरवाद को अनदेखा कर देती हैं, बहुसंख्यक हिन्दू समाज के अधिकारों की उपेक्षा करती है, अल्पसंख्यक समाज के विशेषाधिकारों का समर्थन करती हैं और इस प्रकार समाज को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में विभाजित कर देती हैं। इन्हें सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिकता ही दिखायी पड़ती है, मुस्लिम साम्प्रदायिकता के प्रति ये आखें बंद किए रहते हैं।
हमारे देश में ऐसे तत्व भी हैं, जिन्हें वंदे मातरम् गाना या सरस्वती वंदना करना धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का उल्लंघन लगता है। ये ताकतें इस्लामी कट्टरवाद को अनदेखा कर देती हैं, बहुसंख्यक हिन्दू समाज के अधिकारों की उपेक्षा करती है, अल्पसंख्यक समाज के विशेषाधिकारों का समर्थन करती हैं और इस प्रकार समाज को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में विभाजित कर देती हैं। इन्हें सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिकता ही दिखायी पड़ती है, मुस्लिम साम्प्रदायिकता के प्रति ये आखें बंद किए रहते हैं। सेकुलरिज्म का लबादा ओढ़े ये छद्म सेकुलरिस्ट घोर साम्प्रदायिक हैं। कश्मीर की अखंडता का प्रश्न हो या बंगलादेशी घुसपैठ और इस्लामी आतंकवाद, ये ऐसे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के प्रश्नों को भी साम्प्रदायिकता के चश्मे से ही देखते हैं। इनकी धर्मनिरपेक्षता छद्म धर्मनिरपेक्षता है, सत्ता प्राप्ति का शार्टकट है। ये ताकतें हिन्दू भावनाओं को आहत करने का कोई मौका नहीं चूकती। हिन्दू धर्म, लोकाचार तथा हिन्दू धर्म से सम्बन्धित किसी भी मान्यता या विश्वास को साम्प्रदायिक घोषित कर देती हैं। इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों की धर्मनिरपेक्षता का धार्मिक सहिष्णुता से कोई वास्ता नहीं। ये घोर असहिष्णु हैं।भारतीय जनता पार्टी जिस सेकुलरिज्म में निष्ठा रखती है उसमें पंथीय राजतन्त्र या थियोक्रेसी के लिए कोई स्थान नहीं है। भाजपा की सेकुलरिज्म की कल्पना का अर्थ हैं सभी धर्मों का आदर, सभी को न्याय, तुष्टीकरण किसी का नहीं। भाजपा की यह मान्यता भारत के प्राचीन चिन्तन और परम्परा पर आधारित है।

भाजपा की विचारधारा- पंचनिष्ठा, भाग-3


प्रो. ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतोंमें भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। प्रस्तुत है तीसरा भाग-भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंच निष्ठाएं हैं: राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकतालोकतंत्रगांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापनासकारात्मक पंथनिरपेक्षतामूल्य आधारित राजनीतिसमतामूलक समाज की स्थापनाविश्व के विभिन्न चिन्तकों ने ऐसे समाज की स्थापना का विचार किया है जो शोषणमुक्त हो, और जिसमें मानव-मानव के बीच समानता हो। भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही ऐसे समाज की कामना करती आई है जिसमें सभी सुखी हों, रोगमुक्त एवं स्वस्थ हो, सबका कल्याण हो। समतामूलक समाज की स्थापना की दो दृष्टियां रही हैं- आध्‍यात्मिक और भौतिक।
गांधीजी के सामाजिक-आर्थिक दर्शन और दीनदयालजी के एकात्ममानववाद से प्राप्त दृष्टि के कारण ही भाजपा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखती है। आध्‍यात्मिक दृष्टि सभी प्राणियों में, जड़ चेतन में एक परमसत्ता की विद्यमानता को स्वीकार करती है - 'सर्वं खलु इदं ब्रह्मं,' फिर मानव-मानव में अन्तर क्यों? भोग की अधिकता ही विषमता और शोषण का कारण बनती है। संयम का आचरण कर हम विषमता और शोषण को मिटा सकते है अथवा कम कर सकते हैं। गांधीजी ने इच्छाओं और आवश्यकताओं के बहुलीकरण का विरोध किया है। उपनिषद् ने संयमित और मर्यादित भोग को आदर्श जीवन का लक्षण माना है। त्याग भावना के बिना मर्यादित भोग सम्भव नहीं। उपनिषद त्यागपूर्वक भोग की सलाह देते हैं-- त्यक्तेन भुंजीथ:।शोषणमुक्त समतायुक्त समाज की स्थापना मानव समाज के समक्ष निरन्तर एक चुनौती रही है। मार्क्‍स और उनके अनुयायियों ने निजी सम्पत्ति को शोषण और विषमता का कारण बताया और इसका उपचार बताया सम्पत्ति पर से निजी स्वामित्व की समाप्ति और उस पर राज्य का स्वामित्व। मान लिया गया कि उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व होने से व्यक्ति के हाथ में पूंजी का संचय नहीं होगा और शोषण भी नहीं हो सकेगा। इस व्यवस्था में राजशक्ति द्वारा कठोर दमनकारी उपायों का अवलम्बन लिया गया। सारी शक्तियां राज्य के हाथ में केन्द्रित होने से राज्य क्रूर, निर्मम और दमनकारी हो गया। इस व्यवस्था ने व्यक्ति का पूर्ण तिरस्कार किया।
पूंजीवाद ने व्यक्ति द्वारा अमर्यादित उत्पादन, संचयन और उपभोग के सिध्दान्त को स्वीकार किया। परिणाम हुआ व्यक्ति द्वारा आत्यान्तिक उपभोग और उसमें से जन्मी विषमता, शोषणकारी व्यवस्था और साम्राज्यवाद। इसी की प्रतिक्रिया में मार्क्‍सवाद का आविर्भाव हुआ था जिसने व्यक्ति की स्वायत्त सत्ता को पूर्णत: नकार दिया था और राज्य को सर्वसत्ता का अधिष्ठान बनाकर सर्वसत्तात्मक राज्य व्यवस्था को जन्म दिया था। यह व्यवस्था भी पूंजीवादी व्यवस्था के समान ही उत्पीड़नकारी सिध्द हुई।उधर इसकी पूर्ववर्ती व्यवस्था पूंजीवाद ने व्यक्ति द्वारा अमर्यादित उत्पादन, संचयन और उपभोग के सिध्दान्त को स्वीकार किया। परिणाम हुआ व्यक्ति द्वारा आत्यान्तिक उपभोग और उसमें से जन्मी विषमता, शोषणकारी व्यवस्था और साम्राज्यवाद। इसी की प्रतिक्रिया में मार्क्‍सवाद का आविर्भाव हुआ था जिसने व्यक्ति की स्वायत्त सत्ता को पूर्णत: नकार दिया था और राज्य को सर्वसत्ता का अधिष्ठान बनाकर सर्वसत्तात्मक राज्य व्यवस्था को जन्म दिया था। यह व्यवस्था भी पूंजीवादी व्यवस्था के समान ही उत्पीड़नकारी सिध्द हुई।गांधीजी भी मानव समाज में व्याप्त शोषण को मिटाकर समतामूलक समाज के निर्माण के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने व्यक्ति के स्वायत्त व्यक्तित्व को नहीं नकारा लेकिन व्यक्ति की चेतना के उन्नयन और समाजीकरण पर बल दिया जिसका अर्थ है व्यक्ति का सामाजिक दायित्वबोध। व्यक्ति जिस समाज में रहता है उसके प्रति उसका नैतिक कर्तव्य या दायित्व है। इसे ममत्व भी कह सकते हैं। यही आत्मविस्तार है। मां अपनी संतान के कल्याण के प्रति जिस भावना से प्रेरित होती है वह भावना ममता कहलाती है। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े, दलित, शोषित, अस्पृश्य और वंचित-निर्धन समाज बन्‍धुओं के प्रति गांधीजी ने इसी ममता भावना को उद्दीप्त करने का प्रयत्न किया। गरीब की ऑंखों से ऑंसू पोंछना उनकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की प्रेरणा बनी। उन्होंने दरिद्र में नारायण के दर्शन किए और दलितोध्दार और दरिद्रोध्दार को ईश्वरीय कार्य माना। गांधीजी की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था करूणा, प्रेम, नैतिकता, धार्मिकता, ईश्वरीय भावना पर आधारित है। उन्होंने नर सेवा को नारायण सेवा माना।गांधीजी ने ट्रस्टीशिप के सिध्दान्त पर ज़ोर दिया, जिसका अर्थ वास्तव में अपने लिए मर्यादित उपभोग और शेष सम्पत्ति का समाजहित के लिए उपयोग था। इसमें व्यक्ति के सम्पत्ति के उपार्जन पर कोई सीमा या रोक नहीं, लेकिन उपार्जित सम्पत्ति के अपने लिए उपभोग पर रोक की व्यवस्था थी। यह रोक किसी वाह्य शक्ति द्वारा, राजसत्ता द्वारा लागू न होकर व्यक्ति की अन्त:प्रेरणा, नैतिक चेतना, सामाजिक दायित्व बोध द्वारा लागू होगी, ऐसी विचार गांधीजी ने रखा। गाँधीजी के सामाजिक-आर्थिक चिन्तन का अधिष्ठान भारतीय संस्कृति का मूलाधार अध्‍यात्मवाद ही है।श्री दीनदयालजी ने जिस एकात्ममानववाद के दर्शन का प्रतिपादन किया और जिसे भाजपा ने अपने संगठन के दर्शन के रूप में स्वीकार किया वह व्यक्ति और समाज को परस्पर विरोधी सत्ता नहीं बल्कि अन्योन्याश्रित सत्ता मानता है। वस्तुत: पूंजीवाद और समाजवाद के एकांगी समाजदर्शन से मानव कल्याण होता न देखकर श्री दीनदयालजी ने एकात्ममानववाद के रूप में ऐसे समग्र दर्शन का प्रतिपादन किया जो मानव का समग्र विचार करता है, उसके शरीर, मन, बुध्दि और आत्मा सभी पक्षों का समावेश करता है। यह दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और मानवता को एक दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि अन्योन्याश्रित और पूरक मानता है। यह दर्शन संघर्ष और टकराव पर आधारित नहीं है, परस्पर पूरकता पर आधारित है। इसकी मूल दृष्टि आत्मविस्तार की आध्‍यात्मिक दृष्टि है। व्यक्ति और समष्टि एक ही चेतना से व्याप्त है। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु य: पश्यति स: पण्डित:।' जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में मनु से कहलवाया है:हम अन्य न और कुटुम्बीहम केवल एक हमीं हैंतुम सब मेरे अवयव होइसमें कुछ भी न कमी है।यह समरसता की दृष्टि है, एकरूपता की दृष्टि है, अविच्छिन्नता की दृष्टि है, अभेद और एकात्म की दृष्टि है।एकात्ममानववाद दर्शन का मूल तत्व है समरसता।
भाजपा ने सामाजिक प्रश्नों के प्रति समरसता का दृष्टिकोण अपनाया है। यह दृष्टिकोण भाजपा कार्यकर्ताओं को समाज के सभी वर्गो को, सभी जातियों को, सभी पंथों को और विशेष रूप से वंचित, दलित और अस्पृश्य कहे जाने वाले तथा वनवासी बन्धुओं के प्रति आत्मीयता और ममत्व का भाव रखने, उनकी सेवा और कल्याण में प्रवृत्त होने और अन्त्योदय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।भाजपा ने सामाजिक प्रश्नों के प्रति समरसता का दृष्टिकोण अपनाया है। यह दृष्टिकोण भाजपा कार्यकर्ताओं को समाज के सभी वर्गो को, सभी जातियों को, सभी पंथों को और विशेष रूप से वंचित, दलित और अस्पृश्य कहे जाने वाले तथा वनवासी बन्धुओं के प्रति आत्मीयता और ममत्व का भाव रखने, उनकी सेवा और कल्याण में प्रवृत्त होने और अन्त्योदय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है। यही दृष्टिकोण भाजपा को समाज के कमज़ोर वर्गो के प्रति बन्धुभाव, ममत्वभाव अपनाने और उनके कल्याण के लिए रचनात्मक कार्यो, सेवा कार्यो में, प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता है।गांधीजी के सामाजिक-आर्थिक दर्शन और दीनदयालजी के एकात्ममानववाद से प्राप्त दृष्टि के कारण ही भाजपा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखती है। पंचायती राज को सुदृढ़ करना, विकास के केन्द्र में गांव को और कमज़ोर वर्गो को रखना और केन्द्र-राज्यों की संघीय व्यवस्था को सुदृढ़ करना इसी निष्ठा की अभिव्यक्तियां हैं। यह निष्ठा सामाजिक सौहार्द और सद्भावना को प्रेरित करने वाली और असमानता तथा शोषण मिटाने वाली है।

Monday, September 29, 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठा भाग-2



प्रो. ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंचनिष्ठाएं हैं:
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
लोकतंत्र
हमारे संविधान ने राजसत्ता के संचालन के लिए लोकतांत्रिक पध्दति स्वीकार की है। लोकतंत्र मतदाता की इच्छा का आदर करने वाला तन्त्र है। भिन्न भिन्न देशों में यद्यपि निर्वाचन की भिन्न भिन्न पद्धतियों का प्रचलन है, किन्तु उन सबमें समान तत्व है लोक की सामूहिक इच्छा के आधार पर सरकार का चुना जाना। भाजपा लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्ठा रखती है, तानाशाही को अस्वीकार करती है और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के पक्ष में है।


लोकतंत्र के प्रति भाजपा की निष्ठा पार्टी के त्रिवार्षिक संगठनात्मक चुनाव में अभिव्यक्त हुई है। पार्टी के कार्यकर्ता स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय अधयक्ष तक का चुनाव करते हैं। हर तीन वर्ष के बाद विभिन्न इकाइयों- स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के अधयक्ष बदल जाते हैं। संगठन की पुनर्रचना या नवीकरण होता है।

भाजपा ने समय-समय पर तानाशाही का और लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्तियों का विरोध किया है। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और सब प्रकार की स्वतंत्रताओं को स्थगित कर दिया तो भारतीय जनसंघ ने लोकतन्त्र की पुन:स्थापना के लिए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई। कांग्रेस ने निर्वाचित राज्य सरकारों को गिराने के लिए जब-जब राज्यपाल के पद का दुरूपयोग किया, हमने उसका कड़ा प्रतिकार किया है।

लोकतंत्र जनादेश पर आधारित राज्य व्यवस्था है। संसद और विधान मंडल, स्वतन्त्र प्रैस, स्वतन्त्र न्यायपालिका, स्वायत्ता निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं लोकतन्त्र के सुचारू संचालन के लिए ज़रूरी है। कांग्रेस ने समय-समय पर इन लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाने का प्रयत्न किया है और इनका अवमूल्यन किया है। भाजपा ने ऐसे सभी प्रसंगों में लोकतान्त्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए आवाज़ उठाई है।


लोकतन्त्र में असहमति का सम्मान किया जाता है। सत्तापक्ष बहुमत में होने पर भी विपक्ष के विचारों का सम्मान करता है। विपक्ष के लिए भी रचनात्मक भूमिका निभाना ज़रूरी है। लोकतन्त्र में प्रतिशोध, टकराव और असहिष्णुता के लिए स्थान नहीं है। नीतिभेद रहते हुए भी दलों के बीच सहिष्णुता लोकतन्त्र को पुष्ट करती है।

निष्पक्ष चुनाव लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण तत्तव है। बाहुबल और धानबल का इस्तेमाल कर जनादेश को हाइजैक कर लेना लोकतन्त्र को कमज़ोर करता है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में बाहुबल, अपराधीकरण और पैसे का प्रभाव बढ़ने से लोकतन्त्र विकृत हो गया है।

जाति और पंथ आधारित राजनीति लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्ति है। कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने जाति आधारित और साम्प्रदायिक राजनीति का अनुसरण कर सामाजिक विभाजन को तीव्र किया है। वोट बैंक की राजनीति के चलते सामाजिक और राष्ट्रीय एकता कमज़ोर हुई है। भाजपा ने इन दलों की नकारात्मक प्रवृत्तियों को बराबर बेनकाब किया है।

लोकतंत्र के लिए लोकशिक्षण और लोक संस्कार का बहुत महत्व है। राजनीतिक दलों का यह कर्तव्य है कि वे लोक शिक्षण और लोक संस्कार द्वारा ऐसे लोकमत का पुरस्कार करें जिसकी नींव पर टिका लोकतंत्र स्वस्थ और मज़बूत हो सके। श्री दीनदयाल उपाध्‍याय ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए लोक शिक्षण को बहुत महत्व दिया है।

राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेन्द्रीकरण के बिना आम आदमी को सच्चे लोकतंत्र की अनुभूति नही हो सकती। सत्ता का केन्द्रीकरण लोकतंत्र की प्रकृति से मेल नहीं खाता। नीचे की इकाइयों को अधिक अधिकार देकर प्रभावी करना होगा। भारतीय जनसंघ और भाजपा ने पंचायती राज को मज़बूत बनाने का आग्रह रखा है। गांधी जी की ग्राम स्वराज्य की कल्पना भी राजसत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है।

Sunday, September 28, 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठाएं भाग-1



प्रो. ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो। ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित करेंगे। प्रस्तुत है पहला भाग-

भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती जनसंघ अन्य राजनैतिक दलों से अपनी अलग पहचान रखते हैं। यह पहचान राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के प्रति उनके आग्रह के कारण है। जहां साधारणतया अन्य राजनैतिक दलों का उद्देश्य राजसत्ता प्राप्त करना है, वहीं भारतीय जनता पार्टी सत्ता को वृहत उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन मानती है। वह वृहत् उद्देश्य है सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्रचना। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जो स्वप्न देखा गया था वह अभी अधूरा पड़ा है। अधूरे सपने को पूरा करना भारतीय जनता पार्टी अपना उद्देश्य मानती है। सामाजिक- राष्ट्रीय पुनर्रचना के उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है जब पार्टी उच्च निष्ठाओं, सिध्दान्तों और आग्रहों को लेकर चले।

भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंच निष्ठाएं हैं:
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
भारत जैसे विशाल और विविधतायुक्त देश को बांधाने वाले तत्‍व क्या हैं? क्या एक शासन सत्ता देश को एक सूत्र में बांध सकती हैं?क्या संपूर्ण देश में एक संविधान और शासन होना एकता की गारंटी हो सकती है? क्या सुस्पष्ट भौगोलिक सीमाओं में बंधा होना अथवा भौगोलिक इकाई होना एकता की गारंटी हो सकती है? ये तत्व राष्ट्र की एकता के पोषक या सहायक तो हो सकते हैं राष्ट्रीय एकता के मूल अधिष्ठान नहीं हो सकते। मूल अधिष्ठान तो इस विविधातायुक्त देश में रहने वाले जन की प्रकृति चिति, या जीवन-पध्दति है जिसे आमतौर पर संस्कृति कहा जाता है। दीनदयाल उपाध्‍याय जी का कथन है कि 'व्यक्ति की भांति राष्ट्र की भी अपनी आत्मा होती है। उस आत्मा के अस्तित्व के कारण ही सारा राष्ट्र एकात्म बनता है। राष्ट्र की उस आत्मा को हमारे शास्त्रकारों ने ''चिति'' कहा है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक ''चिति'' होती है। ''चिति'' ही राष्ट्रीयता का चिह्न है। इसी ''चिति'' के कारण प्रत्येक राष्ट्र की संस्कृति को भिन्न व्यक्तित्व प्राप्त होता है। साहित्य, कला, धर्म, भाषा, सब इसी ''चिति'' की अभिव्यक्तियां हैं।' जाति, पंथ, भाषा आदि की विविधता होते हुए भी समान संस्कृति विविधतायुक्त भारत को एक सूत्र में बांधाने वाला तत्‍व है। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद की कल्पना न कोरी राजनीतिक कल्पना है, न संवैधानिक कल्पना, न भौगोलिक कल्पना यह सांस्कृतिक कल्पना है। इस कल्पना पर आधारित राष्ट्रवाद ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। भारतीय जनता पार्टी के कार्य के विभिन्न आयाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

देश में ऐसी बहुत सी शक्तियां है जिनकी मान्यता उक्त मान्यता से भिन्न है। वे मानते हैं कि भारत बहुसंस्कृतियों वाला देश है, इसलिए यह बहुराष्ट्रीयताओं का देश है। कांग्रेस के कुछ तत्तवों और वामपंथी तत्वों के ऐसे ही विचार है। भारतीय जनता पार्टी को यह विचार सर्वथा अस्वीकार्य है।

हम इस वास्तविकता की उपेक्षा नहीं कर सकते कि द्विराष्ट्रवाद की संकल्पना ने देश का विभाजन किया। जिन्ना, मुसलिम लीग और उसके अनुयायियों की यह मान्यता थी कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएं हैं और इसलिए ये दोनों समुदाय अलग-अलग राष्ट्र हैं। केवल एक भौगोलिक इकाई का हिस्सा होने मात्र से वे एक राष्ट्र नहीं हो जाते। इसमें से द्विराष्ट्र - हिन्दू राष्ट्र - मुस्लिम राष्ट्र - का विचार बल पकड़ता गया। परिणाम हुआ देश का विभाजन। देश के विभाजन ने हिन्दू-मुसलिम समस्या का समाधान नहीं किया। द्विराष्ट्रवादी या बहुराष्ट्रवादी सोच स्वतंत्रता के बाद भी जारी है जो बार-बार मुस्लिम तुष्टीकरण, अल्पसंख्यकवाद और वोट बैंक की राजनीति के रूप में प्रतिबिंबित होती है। भारतीय जनता पार्टी इस सोच का बराबर विरोध करती है और अपनी सोच को आग्रहपूर्वक स्थापित करती है कि भारत एक संस्कृति वाला एक राष्ट्र है जिसमें जाति, पंथ, भाषा आदि बहुविधा विविधता दिखायी पड़ती है।

कभी-कभी राष्ट्र और राज्य दोंनों का पर्यायवाची रूप में प्रयोग किया जाता है। यह सही नहीं है। राज्य एक राजनैतिक संकल्पना है और राष्ट्र सांस्कृतिक संकल्पना है। राज्य नहीं है तो भी राष्ट्र का अस्तित्‍व हो सकता है। लंबे समय तक यहूदी दुनिया के अलग-अलग देशों में बिखरे हुए थे और उनका अपना राज्य नहीं था । तो क्या यह माना जाये कि यहूदी राष्ट्रीयता नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं। यहूदी राष्ट्रीयता की यह भावना ही आगे चलकर उनके राज्य इज़रायल के रूप में मूर्त हुई। यदि किसी जन या मानव समुदाय से उसका राज्य छिन जाये, वह किसी विदेशी सत्ता के अधीन हो जाये तो इससे उस समुदाय की राष्ट्रीयता नष्ट नहीं हो जाती। वह भावना के रूप में समुदाय के लोगों को बराबर सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती रहती है।

इतिहास में ऐसे दृष्टांत भी मिलते हैं जब विभिन्न राष्ट्रीयताओं वाले मानव समुदायों को एक राज्य सत्ता के अंतर्गत बांधने का प्रयत्न किया गया। इससे एक राज्य तो अस्तित्तव में आ गया, पर समान राष्ट्रीयता के अभाव में आगे चलकर विखंडित हो गया। सोवियत संघ इसका उदाहरण है। सोवियत संघ के अंतर्गत अनेक राष्ट्रीयता वाले मानव समुदाय या इकाइयां सम्मिलित की गई थी किन्तु समान राष्ट्रीयता या समान संस्कृति के अभाव में वे एक नहीं रह पाये।भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रहित को पार्टी हित से ऊपर रखती है। राष्ट्रहित को क्षति पहुंचाने वाली प्रवृत्तियों के विरूध्द भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता आंदोलन किया है। ऐसी प्रवृत्तियां जो राष्ट्र की एकता को कमज़ोर करती है, विभाजनकारी है, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, राष्ट्र के स्वाभिमान को कमज़ोर करती हैं और राष्ट्र की अस्मिता तथा उसके प्रतीकों, मानदंडों और चिन्हों के प्रति उपेक्षा का भाव रखती हैं, भाजपा उन्‍हें निर्मूल करने के लिए बराबर आंदोलन करती रही है। आंदोलन के विषय बदलते रहे हैं लेकिन उनके पीछे प्रेरणा या दृष्टि बराबर राष्ट्रहित पोषण की रही है। फिर चाहे आंदोलन का विषय कश्मीर की अखंडता हो, बेरूवाड़ी का हस्तांतरण हो, वंदे मातरम् गान या सरस्वती वंदना के विरोध की मानसिकता हो, अयोध्‍या में राम मंदिर का निर्माण हो, समान नागरिक संहिता हो, आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो, वोट की राजनीति हो, जातिवाद की विभाजनकारी प्रवृत्ति हो या ऐसे ही अन्य अनेक विषय हों। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की प्रेरणा से ही जनसंघ या भाजपा इन विषयों पर आंदोलन में प्रवृत्त हुए। ऐसे तत्तव और प्रवृत्तियां जो हमारी एकता को चुनौती देती हैं, भारतीय जनता पार्टी के आंदोलन के प्रिय विषय रहे हैं। बहुराष्ट्रवाद की सोच, क्षेत्रवाद, जातिवाद, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, माओवाद, नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरवाद, राष्ट्रीय सम्प्रभुता को चुनौती, देश पर चीन का आक्रमण, पाकिस्तानी आक्रमण, बांग्लादेशी घुसपैठ आदि समय-समय पर सार्वजनिक क्षितिज पर उभरने वाले विषयों पर भाजपा के लाखों-लाख कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया और राष्ट्रहित के रक्षण और संवर्धन के लिए अनुकरणीय त्याग किया। राष्ट्र के लिए क्या हितकर और वांछनीय है और क्या अहितकर और अवांछनीय है यह विवेक भाजपा नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं में सदैव जागृत करता रहता है।

भारतीय जनता पार्टी जिस समान संस्कृति को राष्ट्रीयता का अधिष्‍ठान मानती है उसे हिन्दुत्व, भारतीयता और इंडियननैस किसी भी नाम से जाना जा सकता है। राष्ट्रीयता का यह बोध ही हिन्दुत्व है, यही भारतीयता है और यही हमारी जीवन पध्दति है।राष्ट्रीय दृष्टिकोण को मजबूत करने के लिए राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक है। जो कुछ है वह राष्ट्र का है, मेरा नहीं। 'राष्ट्राय स्वाहा, राष्ट्राय इद्म न मम्।'
सांस्कृतिक समानता राष्ट्रीय एकता का आधारभूत तत्‍व होता है। एकता के अन्य पोषक तत्व हैं : भौगोलिक सान्निध्‍य, समान अतीत, भाषायी समानता, आध्‍यात्मिक एकता। ये सभी तत्‍व मिलकर किसी मानव समुदाय का एक राष्ट्र बनाते हैं। आतंरिक रूप से धर्म, भाषा, जाति जैसे विभाजक तत्वों के सक्रिय रहते हुए भी मानव समुदायों को उक्त तत्‍व एकरूपता प्रदान करते हैं। राजनैतिक समुदायों को एकता प्रदान करने वाली भावना उसकी राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद ही राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय सम्मान, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सम्प्रभुता का स्रोत हैं।राष्ट्रीयता की भावना को मज़बूत करने में समान इतिहास एक पोषक तत्‍व होता है। समान परम्पराएं मानव समुदाय को एक राष्ट्र का रूप देती हैं। समान विचारों एवं अनुभूतियों से युक्त होकर एक निश्चित भूभाग में रहने वाला मानव समुदाय राष्ट्र के रूप में ढलता है। राष्ट्र एक ऐसा मानव समुदाय है जिसकी एक स्वतंत्र राजनैतिक इकाई होना वांछित होने पर भी अनिवार्य नहीं है। राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। इसे राष्ट्र की चिति या अस्मिता कहते हैं। भारतीय संस्कृति की पहचान उसके आध्‍यात्मिक रूझान के कारण है। आध्‍यात्मिकता हमारी चिति का वैशिष्टय हैं। राष्ट्रीयता वह भावनात्मक बंधान है जो किसी मानव समुदाय को एक जन में रूपातंरित करता हैं।

संक्षेप में, भारतीय जनता पार्टी एक देश, एक जन और एक संस्कृति की अवधारणा में अविचल विश्वास रखने वाला राजनीतिक दल है। जब कभी राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचती है तो भाजपा स्वाभाविक रूप में उद्वेलित होती है और राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचाने वाले तत्‍वों का प्रबल विरोध करती है। भारतीय जनता पार्टी यह मानती है कि हमारी एक राष्ट्रीय जीवन पध्दति है जो न केवल अक्षुण्ण रहनी चाहिए बल्कि उसका सतत् पोषण और संवर्धन होते रहना चाहिए। हमारे सभी कार्यकलापों का उद्देश्य राष्ट्र का संरक्षण, कल्याण और अभ्युदय है। हमारी सीमाएं सुरक्षित रहनी चाहिए, क्षेत्रीय एकता बनी रहनी चाहिए और हमें अपनी ऐतिहासिक परम्पराओं और विरासत का स्वाभिमान रहना चाहिए। ये सब बातें राष्ट्रीय हित की अवधारणा का अंग है।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है