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Tuesday, May 25, 2010

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ


नरेन्द्र मोहन
हिन्दुत्व एक ऐसी भू-सांस्कृतिक अवधारणा है, जिसमें सभी के लिए आदर है, स्थान है और सह-अस्तित्व का भाव भी। इस सह-अस्तित्व प्रधान सांस्कृतिक चेतना ने उसे अत्यंत उदार, सहिष्णु और लचीला भी बनाया। बात तब बिगड़ी जब विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृतियों ने इस अति सहिष्णु संस्कृति की उदारता का लाभ उठा कर इसकी जड़ें ही काटनी प्रारंभ कर दीं। हिन्दुत्व की इस अति-सहिष्णुता को उसकी कायरता माना गया तथा उसके जो भी मूल तत्व थे उन्हें नष्ट-भ्रष्ट करने की हर संभव चेष्टा की गई। अभी भी इस हेतु तरह-तरह के षडयंत्र रचे जा रहे हैं।आक्रमणकारियों के समक्ष पलायन करने की नीति का सह-अस्तित्व, सहिष्णुता के दर्शन और सिध्दांत से कुछ भी लेना देना नहीं है। सह-अस्तित्व व सहिष्णुता और 'आत्मवत्' दर्शन के जो भी शत्रु हैं उनसे मोर्चा लेने, युध्द करने तथा उन्हें पराजित करने का कर्त्तव्य-कर्म तो हिन्दुत्व का आधारस्तंभ अनादि काल से रहा है और रहेगा। जब-जब आक्रमणकारी शत्रुओं से युध्द करने में हिन्दुत्व से चूक हुई तब-तब न केवल अपमान सहना पड़ा है, बल्कि पराधीनता में भी रहना पड़ा है।आज हिन्दुत्व को राजनीति से जोड़ा जा रहा है। उसे एक राजनीतिक अथवा साम्प्रदायिक अवधारणा कह कर लांछित और अपमानित किया जा रहा है। दुख की बात यह है कि यह लांछन अभारतीय तो लगा ही रहे हैं, पर हम भारतवासी भी स्वयं लगा रहे हैं। स्वाधीनता के पहले हिन्दुत्व के प्रति अपमानजनक भाव रखने वालों की संख्या कम थी और केवल दुराग्रही व आक्रमणकारी संस्कृतियों के प्रति तुष्टिकरण का भाव रखने वाले ही 'हिन्दू' शब्द को साम्प्रदायिक बताते थे पर स्वाधीनता के बाद तो 'हिन्दुत्व' को गाली देना और उसका अपमान करना एक बौध्दिक फैशन बन गया और विडंबना यह है कि अपमान, लांछन व तिरस्कार के इस विष को बिना किसी प्रतिकार के 'प्रगतिवाद' के नाम पर सहन किया जा रहा है।लगभग दो हजार वर्षों की दासता ने यही सिखाया है कि विदेशी संस्कृतियां हमारा सहयोग नहीं करना चाहतीं, वे हमें तोड़ कर तथा धवस्त करके हम पर शासन करना चाहती है। विदेशी संस्कृतियां चाहती हैं कि भारत अपनी अस्मिता भुला दे, उसे छोड़ दें, अत: हमें विदेशी प्रचार के उनके प्रलोभनों के प्रति सावधान रहना होगा।भारत की मूर्छा धीरे-धीरे टूट रही है और यह एक शुभ लक्षण है। 'हिन्दुत्व' के प्रति जो भ्रम उत्पन्न किए गए हैं उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने नकार दिया है।
भारत के कुछ राजनीतिक दल अज्ञानवश आज भी हिन्दुत्व के प्रति शंकालु हैं। उन्हें हिन्दुत्व की ऊर्जा, उसका तप और उसका सर्वकल्याणकारी भाव ही नहीं दिखाई देता। ऐसे राजनीतिज्ञों से न तो डरने की आवश्यकता होती है और न ही चिन्तित होने की। हाल के वर्षों में वोट बैंक की राजनीति के दुष्प्रभाव में आकर हिन्दुत्व पर जितने अपमानजनक प्रहार किए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। इन प्रहारों से भारत का आत्मविश्वास तो टूट ही रहा है, साथ ही नई पीढ़ी के भ्रमित होने की संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। नई पीढ़ी को भ्रमित करने में पश्चिम से आये सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का भी बहुत बड़ा हाथ है। यद्यपि पहले की तरह आज का विश्व राजनीति उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से पीड़ित नहीं है, पर आने वाली शताब्दी में आर्थिक, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की समस्याओं से मानवता को जूझना ही होगा। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीन धाराएं इस समय विश्व में प्रबलता से चल रही हैं-पहली धारा ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित, पोषित और समर्थित, दूसरी, इस्लामी रूढ़िवादिता से संचालित, पोषित और समर्थित। इस्लाम के अनेक पक्षधार अत्यधिक आक्रामक व दुराग्रही हो चुके हैं। वे इतने अधिक असहिष्णुता-प्रधान हैं कि समस्त विश्व का इस्लामीकरण करने के लिए प्रतिबध्द हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीसरी धारा 'साम्यवादी विचारधारा' अर्थात् वामपंथी विचारधारा है। यह चुनौती प्रत्यक्ष कम प्रच्छन्न अधिक है।राष्ट्रीय अज्ञान व विभ्रम की यह स्थिति आज हर स्तर पर है और सर्वाधिक उस वर्ग में है जो राजनीति से जुड़ा हुआ है। राजनीति से जुड़ा यह वर्ग भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्तवों से न केवल अनभिज्ञ है वरन वह भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को पश्चिमी विचारकों की ही दृष्टि से देखना चाहता है।
निस्संदेह भारतीय संस्कृति के संदर्भ में सर्वाधिक विभ्रम अंग्रेज इतिहासकारों ने फैलाया है। ऐसा इसलिए किया गया जिससे भारतीय जनमानस हमेशा-हमेशा के लिए अंग्रेजियत की दासता स्वीकार कर ले तथा भारत पर अंग्रेजी सत्ता का प्रभुत्व बना रह सके। भारतीय एकता और अखंडता को सबसे बड़ा खतरा उस अंग्रेजियत से है जिसका एकमात्र लक्ष्य भारतीय संस्कृति को लांछित करना और भारत को मानसिक स्तर पर विभाजित रखना रहा। यद्यपि रानाडे, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, डा0 केशवराम बलिराम हेडगेवार और महात्मा गांधी सरीखे नेताओं ने अंग्रेजों की कुटिलता की कड़ी से कड़ी भर्त्सना की पर कुल मिलाकर भारतीय राजनीति का मन संशयग्रस्त ही रहा और रह-रह कर यह विचार ज्वार-भाटे की तरह उठता और गिरता रहा कि भारत की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है भी या नहीं। भारत की अपनी एक संस्कृति है, इसका सबसे प्रबल विरोध उस समय प्रारंभ हुआ जब मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी। उन्नीसवीं व बीसवीं शताब्दी के भारतीय राजनीतिज्ञों से सबसे बड़ी भूल यह हुई कि उन्होंने 'हिन्दू' के संदर्भ में उस परिभाषा को ग्रहण कर लिया जो अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी। 'हिन्दू' शब्द एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा की उपज है, यह यथार्थ पता नहीं कैसे भारत में निरन्तर उपेक्षित होता चला गया और यह मान्यता प्रगाढ़ता से भारतीय मन पर छा गई कि 'हिन्दू' एक वैसा ही मजहब है जैसे कि इस्लाम या ईसाइयत।आश्चर्य की बात यह है कि जो भूल इस्लामी आक्रमणकारियों ने भ्रमवश की थी और जिस भूल को अपनी निहित स्वार्थों के कारण अंग्रेजों ने सैध्दांतिक व वैचारिक जामा पहना दिया उसे हम भारतीयों ने भी धीरे-धीरे बिना प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया और परिणामत: सांस्कृतिक स्तर पर नए विभ्रम को जन्म दिया।अंग्रेजी दासता के दौरान भारतीय संस्कृति की इतनी अधिक दुर्दशा कर दी गई कि उसकी सांस्कृतिक व आध्‍यात्मिक शब्दावली तक को भ्रष्ट किया गया और इस शब्दावली के राजनीतिक अर्थ निकाले गए। उदाहरणस्वरूप 'धर्म' शब्द का जैसा मनमाना अर्थ अंग्रेजों ने किया उसके पीछे उनके स्वयं के निहित स्वार्थ थे। उन दिनों यह भी स्थापित करने का प्रयास किया गया कि भारत कभी एक राष्ट्र था ही नहीं, वह तो अंग्रेजों ने आकर इसे राजनीतिक एकता प्रदान कर दी।
प्राचीन भारत की साहित्यिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों को पश्चिम का उच्छिष्ट सिध्द करने के प्रयत्न किए गए और समूचे भारतीय जीवन को आत्मगौरव शून्य एवं आत्मविस्मृत बनाने की दुरभिसंधि रची गयी। एक राष्ट्र के नाते हमारे पहचान के जितने तत्व हो सकते थे अंग्रेज उन्हें पूर्णत: नष्ट या विकृत करने का प्रयत्न करते रहे।मजेदार मामला यह है कि जब भारत का संविधान रचा गया तब न तो भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्वों की ओर ही गंभीरता से निहारा गया और न भारतीय मूल्यों, आदर्शों व श्रेष्ठ परंपराओं तथा भारतीय मन की अभिलाषाओं को ही समझने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान को बनाया गया तो भारत की जनता के लिए, लेकिन भारत की जनता के मन में क्या है, कहां बसती है, उसकी आस्थाएं किस पर हैं, उसका विश्वास क्या रहा है, किन मूल्यों की रक्षा के लिए लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक उसने विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष किया, यह सब जानने की चेष्टा ही नहीं की गई।ब्रिटिश साम्राज्यवाद को स्थायित्व प्रदान करने के निमित्त मैकाले ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के सहयोग से संस्कृति पर प्रहार करने में जो सफलता प्राप्त कर ली उस आघात से भारत आज भी नहीं उबर पा रहा है। जीवन की विश्वात्म धारणा को प्रतिपादित करने वाला भारत, जिसका कभी विश्वास रहा, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' पर वह दुष्प्रचार का शिकार होकर स्वयं ही अपने मूल्य छोड़ बैठा और सांस्कृतिक रूप से बिखर गया। यह सांस्कृतिक बिखराव आज भी राजनीति में हर स्तर पर हमें दिखाई दे रहा है।ऐसा नहीं है कि भारत की संविधान सभा में भारतीय संस्कृति एकात्म भाव तथा राष्ट्रीयता के पक्षधार नहीं थे, पर वे कुल मिला कर मौन ही रहे। जब 7 और 8 दिसम्बर, 1948 को संस्कृति से जुड़े अनुच्छेद पर संविधान सभा में चर्चा हो रही थी तब केवल लोकनाथ मिश्र ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मान्यता देने का सुझाव दिया था पर उसका उग्र विरोध मुस्लिम सदस्यों द्वारा हुआ और अंतत: 'भारत एक सांस्कृतिक इकाई है तथा उसे अपनी सांस्कृतिक धारोहर की रक्षा करनी है', यह भाव इस विरोधा के कारण भारतीय संविधान का अंग न बन सका।प्राकृतिक अनेकता में मानसिक एकता के जो सूत्र विद्यमान रहते हैं उनसे ही राष्ट्र का और उसकी संस्कृति का निर्माण होता है। इस मानसिक एकता से ही अंतत: राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी होता है और इस राष्ट्रीय चरित्र में विभिन्न मूलवंशों के लोग सहभागी और सहयोगी होते हैं। इस सामूहिक अस्मिता के अभाव में राष्ट्र की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। इस सामूहिक अस्मिता का जन्म भारत में कहां से हुआ? यह अस्मिता किन प्रतीकों व आदर्शों से जुड़ी है? कौन हैं इस सामूहिक अस्मिता के प्रेरणास्रोत आज इस प्रश्नों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए और भी महत्वपूर्ण तथा तात्कालिक हो चुकी है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद उन्तीस में यह प्रतिपादित करके कि हर व्यक्ति को अपनी एक पृथक वैयक्तिक संस्कृति है-एक प्रकार से बिखराव व बिखंडन के बीज बो दिए गए हैं। सिध्दांतत: किसी भी व्यक्ति का कोई भी अधिकार राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकता। हर नागरिक को अंतत: राष्ट्रीय हितों को ही सर्वोच्चता प्रदान करनी होगी।अपने राष्ट्र की संस्कृति के रहस्य को भारत के राजनीतिज्ञ इसलिए नहीं समझ सके, क्योंकि वैयक्तिक स्तर पर वे न तो अज्ञात में छलांग लगाने के लिए तैयार थे और न अपने उन राजनीतिक स्वार्थों व पूर्वाग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार थे जो उन्होंने यूरोपीय प्रभाव के कारण प्राप्त किए थे।
स्वतंत्रता के उपरांत भी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव आया हो, यह नहीं कहा जा सकता। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उस समय यदि पं। नेहरू चाहते तो भारतीय संस्कृति को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकते थे और भारत की जो गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा है उसकी रक्षा भी कर सकते थे, पर वे स्वयं के राजनीतिक स्वार्थों और यूरोपीय प्रभाव से इतने अधिक जुड़े रहे कि अगर यह कहा जाए कि इसके दुष्प्रभाव से भटक गए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।यह बात एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि भारत एक राष्ट्र है और इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है। अगर भारत के राजनीतिज्ञ इस सत्य का साक्षात्कार करने से इंकार करेंगे तो राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता संकट में पड़ सकती है। संकट में इसलिए पड़ सकती है क्योंकि फिर वे समस्त तत्वहीन और श्रीहीन हो जाएंगे जिन पर इस राष्ट्र का एकत्व आश्रित होता है। राजनीति का पहला कर्त्तव्य यह है कि वह राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित हो। यदि राजनीति राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित नहीं है और उसे राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता की चिंता नहीं है तब फिर ऐसी राजनीति कलह को ही जन्म देगी। भारत की सांस्कृतिक एकता का अर्थ यह नहीं है कि भारत में अनेक संस्कृतियां हैं बल्कि इसका अर्थ यह है कि इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है और यह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेकता को प्रश्रय देती है।अंग्रेजों ने इस झूठ को सौ बार दोहराया कि मजहब के आधार पर देश को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक बनाया जा सकता है, लेकिन अंग्रेजों ने अपने देश में ऐसा नहीं किया। इंग्लैण्ड में तो ईसाइयों के अनेक पंथ है, लेकिन विभिन्न पंथों को मानने वाले अंग्रजों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच विभाजित नहीं किया गया। सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता का संबंध उपासना पध्दति की विभिन्नता से नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीयता उपासना पध्दति से कहीं अधिक विशाल, उदात्त और श्रेष्ठ है। हिन्दुत्व पंथ नहीं है, मजहब नहीं है, वह पंथ या मजहब हो ही नहीं सकता।
मजहब या पंथ के उसमें कोई गुण ही नहीं हैं। जिसमें अनंत जीवन दर्शन, अनंत पंथ, अनंत जीवन-शैलियां, अनंत उपासना-पध्दतियां समाहित हो, उसे कोई किसी एक परिभाषा से कैसे बांधोगा? हिन्दुत्व का सारा प्रयास सामंजस्य एवं एकरसता प्राप्त करना है, सभी सुखी हों, सभी का कल्याण हो, सभी की समृध्दि हो, सभी में मित्रता हो, सभी एक दूसरे के सहयोगी बनें, कोई किसी से द्वेष न करे। ये सारे प्रयास हमें वर्तमान में ही करने होंगे।हिन्दुत्व वर्तमान मेंसत्य का साक्षात्कार ही हिन्दुत्व का प्राणतत्व है और यह साक्षात्कार हमें वर्तमान में करना होता है। अतीत के गुण गाकर हम सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकते। अतीत में क्या था, यह तो इतिहास की बात हो गई, पर क्या होना चाहते हैं, किनकी नकल करना चाहते हैं यह हुई कल्पना की बात। कोई भी समाज इतिहास के कल्पना लोक में जीकर विश्व को नेतृत्व नहीं दे सकता और भविष्य की कोरी कल्पनाओं के आधार पर भी किसी भी समाज ने उन्नति नहीं की है। हिन्दुत्व का आधार है 'चरैवेति'। हिन्दुत्व में ठहराव नहीं है। यह ठीक है कि किन्हीं कारणों से हिन्दुत्व नीचे गहरी खाई में जा गिरा है और यह संभवत: इसलिए हुआ होगा क्योंकि यह प्रकृति का नियम है, लेकिन अब यह कालचक्र उत्कर्ष की ओर बढ़ रहा है। उचित यह होगा कि भारतीय समाज यह समीक्षा करें कि उसके उत्कर्ष में क्या सहायक है और क्या अवरोधक?हिन्दुत्व किन्हीं कारणों से जो भटकावग्रस्त हुआ है, उससे समाज में कलह बढ़ी है, विघटन बढ़ा है, विद्वेष बढ़ा है और दुष्कर्म बढ़ा है तथा उत्कर्ष के स्थान पर पतन हुआ है। हिन्दुत्व का सनातन प्रवाह, जो हमारी राष्ट्रीय चेतना की मुख्यधारा है, उसे शक्तिवान बनाने के स्थान पर यदि कोई उसे प्रदूषित कर रहा है अथवा किसी कारणवश वह प्रवाह प्रदूषणग्रस्त होता चला जा रहा है, तो हमें प्रदूषण की इस सत्यता को स्वीकार करना ही होगा। कपोतवृति अपनाकर हम यथार्थ की उपेक्षा तो कर सकते हैं पर यथार्थ के सत्य को नष्ट नहीं कर सकते।ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज ने जिसे आज 'हिन्दू समाज' कहकर संबोधिात किया जाता है उसने समय-समय पर स्वयं की दुर्बलताओं को दूर करने के लिए संघर्ष नहीं किया। समाज सुधारकों का भी जन्म हुआ, पर जो भी आज तक हुआ है, वह बहुत ही आधार अधूरा है। न तो हमने अंधाविश्वास पर पूर्णत: विजय पाकर बुध्दि व विवेक की सत्ता पुन: स्थापित की है और न पाखंड का ही पूर्ण परित्याग कर अपनी कथनी-करनी के भेद को ही मिटाया है। जाति-प्रथा व वर्ण व्यवस्था में आज सर्वाधिक सहारा मनुस्मृति का लिया जाता है और यह जाने समझे बिना कि मनुस्मृति के नाम जो ग्रंथ बाजारों में बिकता है, वास्तव में क्या है। यह निर्विवादित रूप से सिध्द हो चुका है कि आज जिस ग्रंथ को 'मनुस्मृति' के रूप में जाना जाता है, वह किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा, इस ग्रंथ को एक कालखंड में भी नहीं लिखा गया और समय-समय पर स्वयं के स्वार्थों की रक्षा के लिए इसमें ऐसे विचारों को भी जोड़ दिया गया जो परस्पर विरोधी है। क्या यह स्वयं में एक क्रूर व्यंग्य नहीं है कि जिस 'मनुस्मृति' का आधार लेकर आज जन्म आधारित जाति व वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है, उसी व्यवस्था का विधान है कि कर्म के बदलते ही वर्ण भी बदल जाता है।हिन्दुत्व की इस दुर्बलता को कैसे सुधारा जाए, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अब यदि भारत का पूरा का पूरा मन नहीं बदलता तो उसके जीवन-दर्शन में जो भारी गिरावट आ गई है उसे ठीक नहीं किया जा सकता। पर राष्ट्र एवं समाज का मन बदलने के लिए जैसे प्रयास होने चाहिए, उस ओर ध्‍यान देने की चेष्टा नहीं की जा रही है। भारतीय जीवन दर्शन के मन में जो दुर्बलताएं आ गयी हैं उन्हें दूर करने का काम समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर करना होगा। केवल कानून बना देने से भारतीय समाज स्वयं को पतन के गर्त से बाहर नहीं निकाल सकेगा।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक थे)

Tuesday, February 17, 2009

श्रीगुरुजी और राष्ट्र-अवधारणा


संस्कृति: राष्ट्र संकल्पना का हृदय
राष्ट्र यानी लोग या समाज होता है। उसकी विशेषता उस समाज की संस्कृति होती है।
संस्कृति यानी उस समाज के जीवनमूल्य, संस्कृति यानी उस समाज के अच्छे और बुरे नापने के मापदण्ड। संक्षेप में संस्कृति यानी राष्ट्र और राष्ट्रीयता का प्राण। श्री गुरुजी कहते है:-

``हिन्दू राष्ट्र की हमारी कल्पना राजनीतिक एवं आर्थिक अिधकारों का एक गट्ठर मात्र नहीं है। वह तत्त्वत: सांस्कृतिक है। हमारे प्राचीन एवं उदात्त सांस्कृतिक जीवनमूल्यों से उसके प्राणों की रचना हुई है। और हमारी संस्कृति की भावना का उत्कट नवतारुण्य (तमरनअमदंजपवदद्ध ही हमारे राष्ट्रीय जीवन की सही दृष्टि हमें प्रदान कर सकता है तथा आज हमारे राष्ट्र के सम्मुख खड़ी हुई अगणित समस्याओं के समाधान में हमारे सभी प्रयत्नों को सफल दिशानिर्देश भी कर सकता है। ``किन्तु इन दिनों संस्कृति के नवतारुण्य को प्राय: `पुनरुज्जीवनवाद´ और प्रतिक्रियावाद होने की उपािध दी जाती है। प्राचीन पूर्वाग्रहों, मूढ़ विश्वासों, अथवा समाजविरोधी रीतियों का पुनरुज्जीवन प्रतिक्रियात्मक कहा जा सकता है, कारण इसका परिणाम समाज का पाशाणीकरण (विेेपसपेंजपवदद्ध में हो सकता है। किन्तु शाश्वत एवं उत्कर्षकारी जीवनमूल्यों का नवतारुण्य कभी प्रतिक्रियात्मक नहीं हो सकता। इसे केवल प्राचीन होने के कारण प्रतिक्रियात्मक´ नाम देना, बौद्धिक दिवालियापन प्रकट करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अपनी संस्कृति के नवतारुण्य से हमारा आशय उन शाश्वत जीवनादशोZं को पुन: जीवन में उतारने से है, जिन्होंने इन सहस्रों वषो± तक हमारे राष्ट्रजीवन को पोषित किया और अमरता प्रदान की।´´

अपनी संस्कृति की विशेषताओं का विवेचन करते हुए श्री गुरुजी कहते हैं -``प्रथम एवं सर्वािधक मूलभूत पहलू है उस परम सत्य की अनुभूति की आकांक्षा, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, चाहे उसे कुछ भी नाम दिया गया हो। अथवा सरल शब्दों में कहा जाय तो ``ईश्वर का साक्षात्कार करना। किन्तु ईश्वर है कहाँ? हम उसे कैसे जान सकते हैं? उसका स्वरूप कैसा है? उसके रूप, गुण क्या हैं? कि हम उसका ध्यान कर सकें और उसको पावें? उसका यह वर्णन कि वह निर्गुण और निराकार है इत्यादि, हमारी समस्याओं को सुलझाता नहीं। पूजा के विविध पंथ भी विकसित हुए हैं। लोग मंदिरों में जाते हैं और सर्वशक्तिमान् का प्रतीक मानकर मूर्तियों पर ध्यान केिन्द्रत करने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु जो कि कर्मशक्ति से पूर्ण है उनको यह सब सन्तुष्ट नहीं करता।

``अतएव हमारे पूर्वजों ने कहा है ``हमारा समाज ही हमारा ईश्वर है। ``जनता जनार्दन´´ है। भगवान् रामकृष्ण परमहंस ने कहा है -`मनुष्य की सेवा करो´। जनता में जनार्दन देखने की यह अतिश्रेष्ठ दृष्टि ही हमारे राष्ट्रकल्पना का हृदय है। उसने हमारे चिन्तन को परिव्याप्त कर लिया है तथा हमारे सांस्कृतिक दाय की विविध अनुपम कल्पनाओं को जन्म दिया है।´´


ईश्वर की सेवा यानी समाज की सेवा। ईश्वर की पूजा यानी जनता जनार्दन की पूजा। इस भाव को यदि हमने हृदयंगम किया तो फिर मनुष्य अपने अिधकारों की बात नहीं करेगा। अपने कर्तव्यों का ध्यान रखेगा। श्री गुरुजी कहते हैं ``आज हम सभी जगह अिधकारों के लिए मचा हुआ कोलाहल सुनते हैं। हमारे सभी राजनैतिक दल समान अिधकारों की बात बोलते हुए लोगों में अहंभाव जागृत कर रहे हैं। कहीं भी कर्तव्य और नि:स्वार्थ भाव की सेवा पर कोई बल नहीं दिया जाता। स्व-केिन्द्रत अिधकार-ज्ञान के वायुमण्डल में सहयोग की भावना, जो समाज की आत्मा होती है, जीवित नहीं रह सकती। इसी कारण आज हम अपने राष्ट्रजीवन में विविध घटकों के बीच संघर्ष देख रहे हैं। केवल हमारी सांस्कृतिक दृष्टि के आत्मसात् करने से ही हमारे राष्ट्रजीवन में सहयोग की सच्ची भावना एवं कर्तव्य की चेतना पुनर्जीवित हो सकती है।´´

अपनी संस्कृति की और एक विशेषता, श्री गुरुजी बताते हैं। ``हिमाचल के समान उन्नत
हमारी संस्कृति का एक और शिखर है जिसपर पहुँचने की महत्वाकांक्षा अभी तक संसार में अन्य किसी ने नहीं की है। `एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति´´ वाक्यद्वारा जिस भाव की अभिव्यक्ति की गई है- अथाZत् सत्य एक है, ऋषि उसे विविध प्रकार से बताते हैं - इस प्रकार भाव को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी में कोई ‘ाब्दरचना नहीं है। `सहिष्णुता´ शब्द, जो इस भाव को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में आता है, बहुत नीचा है। वह तो सहन करने मात्र का भाव व्यक्त करने के लिए एक अन्य शब्द है। इसमें एक अहं का भाव है, जो केवल दूसरों के दृष्टिकोण को मात्र सहन करता है, उसके लिए कोई प्रेम या सम्मान नहीं रखता। परन्तु, हमारी शिक्षा अन्य विश्वासों एवं दृष्टिकोणों को इस रूप में सम्मान करने तथा स्वीकार करने की भी रही है कि वे सब एकही सत्य तक पहुँचने के लिए अनेक मार्ग हैं।´´

श्री गुरुजी आगे बताते हैं ``जब हम अपने उदात्त सांस्कृतिक मूल्यों की बात करते हें तो
आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता में पले हुए लोग सोचते हैं कि यह कोई रहस्यात्मक चीज है, कुछ पारलौकिक वस्तु है। किन्तु यह केवल हमारे मानसिक दास्य की वर्तमान गहराई को ही प्रकट करता है, जिसने हमें उन सिद्धान्तों को समझने के सामथ्र्य से भी वंचित कर दिया है, जो कभी हमारे राष्ट्रजीवन का गौरव थे।´´

नाच, गाना, नाटक, चलचित्र को ही सांस्कृतिक कार्य मानना श्री गुरुजी को मान्य होना
सम्भव ही नहीं था। वे कहते हैं ``आज हम एक दूसरी पराकाष्ठा देखते हैं। नाच, गाना,
चलचित्र तथा नाटकों को ही हम संस्कृति मानने लगे हैं। हम इस प्रकार के `संास्कृतिक कार्यक्रम´ अपने देश में सभी जगह चलते हुए देखते हैं। निस्संशयरूपेण हल्के मनोरंजन का एक दूसरा नाम संस्कृति हो गया है। यह इतनी हास्यासपद और अपमानकारी सीमातक पहुँच गया है कि नैतिक दुश्चरित्रता के कीचड़ में फँसे हुए चलचित्र के कुख्यात नट-नटी हमारे सांस्कृतिक प्रतिनििधमण्डलों में सिम्मलित किये जाते हैं। जिस देश में राम और सीता जैसे आदशZ चरित्र हुए, जिसने भूतकाल में श्रेष्ठतम दार्शनिक एवं ऋषियों और वर्तमान काल में विश्व में सहज सम्मान तथा प्रेमादर प्राप्त करनेवाले रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जैसे व्यक्तियों को अपने सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते भेजा है, वहाँ से ऐसे व्यक्तियों का हमारे देश के सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते जाना हमारे पतन का एक भयावह दृश्य उपस्थित करता है।´´

हमारी इस उन्नत संस्कृति की आवश्यकता केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में भी उसकी उपयोगिता है, इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए श्री गुरुजी बोलते है, ``हमारी सांस्कृतिक दृष्टि को ही, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम और सामंजस्य के लिए सच्चा आधार प्रदान करती है, और जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को पूर्त करती है, आज के इस युद्ध से ध्वस्त हुए विश्व के सामने प्रभावी ढंग से रखने की आवश्यकता है। यदि इस महान् जागतिक लक्ष्य में हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें प्रथम अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। हमें विदेशी वादों (पेउे) की मानसिक Üाृंखलाओं और आधुनिक जीवन के विदेशी व्यवहारों तथा अस्थिर ``फैशनों´´ से अपनी मुक्ति कर लेनी होगा। परानुकरण से बढ़कर राष्ट्र की अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती है। हम स्मरण रखें कि अन्धानुकरण प्रगति नहीं है।´´ (विचार नवनीत-पृष्ठ. 23 से 32)
संकलनकर्ता - मा.गो.वैद्य

हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ


बलबीर पुंज
हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ नागपुर बैठक के बाद राजनीतिक हलके में चुनावी रणनीति के तहत भाजपा के अयोध्या और हिंदुत्व एजेंडे की ओर वापस लौटने की चर्चा चल रही है। यह बहस निरर्थक है, क्योंकि भाजपा ने कभी अयोध्या और हिंदुत्व का मुद्दा छोड़ा ही नहीं था। भाजपा की विचारधारा में हिंदुत्व ही मूल है। भारत के पंथनिरपेक्ष और बहुलवादी चरित्र का मूलाधार भी यही सनातन चिंतन है। हिंदुत्व के बिना भारत मजहब आधारित जिहादी पाकिस्तान का प्रतिरूप होगा। विभाजन के साथ पाकिस्तान ने अपने हिंदू अतीत को नकारा और वहां बचे हिंदुओं को मतांतरण अथवा पलायन के लिए विवश किया। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की राजधानी के रूप में कुख्यात हो चुका है।

वैदिक ऋचाओं के माध्यम से विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाला सिंधु नदी का पावन तट आज आतंकवाद की उपजाऊ भूमि के रूप में उभरा है। हिंदुत्वविहीन पाकिस्तान का एजेंडा जिहादी तय कर रहे हैं। क्यों? हमें जिस बहुलतावादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत पर गर्व है उसका यह स्वरूप संविधान के कारण नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति के कारण संविधान पंथनिरपेक्ष और सम्मानित है। जिस सभ्यता-संस्कृति में संविधान को क्रियाशील रहना है उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति से साम्य नहीं रखने वाला संविधान कभी भी दीर्घजीवी नहीं रह सकता। इसीलिए पाकिस्तान में पंथनिरपेक्षता और प्रजातंत्र जड़ नहीं पकड़ सके। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय मुस्लिम लीग को छोड़कर प्राय: सभी राजनीतिक दल विभाजन के खिलाफ थे, किंतु कम्युनिस्टों ने जिन्ना को वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए जो मजहब आधारित राष्ट्र की मांग के लिए जरूरी थे। क्यों? इसलिए कि कम्युनिस्ट भारत की मूल प्रकृति व संस्कृति से कटे-छंटे थे। 1962 के चीन के आक्रमण के समय कम्युनिस्ट चीन के साथ थे। जब चीन परमाणु शक्ति से संपन्न हुआ तो कम्युनिस्टों ने तालियां बजाईं, किंतु पोखरण में दूसरे परमाणु परीक्षण से उन्हें बड़ी तकलीफ हुई।

वामपंथियों और भारत के बीच जो असंगति है उसका कारण यही है कि मा‌र्क्स के मानसपुत्रों में हिंदुत्व का अभाव है। दुर्भाग्य से मीडिया के एक बड़े वर्ग में विकृत सेकुलरवाद के प्रति आसक्ति और हिंदू विरोधी मानसिकता हावी है। तकरीबन पिछली दो पीढ़ी नेहरूवादी स्वाधीन भारत में पल कर बड़ी हुई हैं। नेहरूवादी पाश्चात्य उन्मुक्तता इस्लामी कट्टरवाद के लिए सहिष्णुता और हिंदू पहचान के प्रति वैमनस्य का ही नाम था। उनके बाद इंदिरा गांधी के दौर में वामपंथियों का गुट मीडिया और शीर्षस्थ बौद्धिक संस्थानों पर हावी हुआ। वामपंथियों के लिए राष्ट्रवाद कोई मायने नहीं रखता था, इसलिए इस राष्ट्र का गौरव उन्हें आकर्षित नहीं कर सका। जिस मानसिकता ने देश का विभाजन कराया, आजादी के बाद जिसने सांप्रदायिक वैमनस्य के बीज बोए उसके लिए देश की पुरातन मान्यताएं व उसकी गरिमा गौण है। रोम, मिस्त्र, यूनान आदि सभ्यताएं काल के गाल में समा गईं, किंतु हिंदू सभ्यता नित नूतन है। इसीलिए, क्योंकि भारत का सतत अस्तित्व हिंदू दर्शन पर आधारित है। भारत की पहचान किसी एक पंथ या पूजा पद्धति से नहीं जोड़ी जा सकती।

हिंदू दर्शन में अनंत काल से विचार-विमर्श और श्रेष्ठ चिंतन के आदान-प्रदान की दीर्घ परंपरा रही है। यूरोप में रोमन साम्राज्य की छत्रछाया में ईसाइयत ने मूर्तिपूजकों के साथ लड़ाई लड़ खुद को स्थापित किया। लिथुआनिया में 14वीं सदी तक मूर्तिपूजन विद्यमान था, किंतु ईसाइयत उसे निगल गई। वह एक बर्बर सामूहिक नरसंहार का दौर था जब श्वेत ईसाइयत लेकर अमेरिका पहुंचे और वहां के निवासियों को ईसाई बनाया। मध्यकाल इस्लामी बर्बरता और हिंसा के बल पर मतांतरण का साक्षी है। इस तरह की असहिष्णुता के लिए हिंदू दर्शन में कभी कोई स्थान नहीं रहा है। हिंदुत्व को फासीवादी और सांप्रदायिक संज्ञा देना वास्तव में भारत के सनातन चरित्र को कमजोर करने का षड्यंत्र है। इस कुप्रचार का लक्ष्य प्रजातांत्रिक और सहिष्णु मूल्यों को कमजोर कर मध्यकालीन कट्टरता को वापस लाना है।

आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश इस्लामी जिहाद से त्रस्त हैं। राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए भाजपा यदि इस्लामी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने की मांग करती है, मौत के सौदागरों को मिल रहे स्थानीय समर्थन पर प्रश्न खड़ा करती है तो इसे किस तरह सांप्रदायिकता से जोड़ा जाता है? महात्मा गांधी ने रामराज्य के आधार पर ही एक पंथनिरपेक्ष जनकल्याणकारी राष्ट्र की कल्पना की थी। क्या गांधीजी और भाजपा के राम अलग-अलग हैं? राम तो हिंदुत्व के प्राण हैं। हिंदुत्व केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। पोखरण द्वितीय भी हिंदुत्व एजेंडा का अंग था। भाजपा नीत राजग सरकार के काल में प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, दूरसंचार क्रांति, सर्व शिक्षा अभियान आदि भी उसी एजेंडे से प्रसूत थे। उसी एजेंडे से दीप्त गुजरात आज विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा है। हिंदुत्व भारतीयों को खुशहाल, समृद्ध, शांतिप्रद भारत के लिए प्रेरित करता है, जहां सब के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध हों, जहां सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और शुचिता का महत्व हो। वर्तमान संप्रग सरकार में आधा दर्जन ऐसे मंत्री हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। एक पर हत्या का आरोप है, किंतु वह महत्वपूर्ण पद पर कायम हैं।

श्रीराम ने पिता के आदेश का पालन करने के लिए राजपाट का मोह छोड़ वनवास स्वीकार किया। उसी हिंदुत्व के कारण लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कांड में अपना नाम शामिल होने पर सार्वजनिक जीवन से तब तक के लिए अवकाश ले लिया था जब तक जांच में वह निर्दोष साबित न हो जाएं। क्या हिंदुत्व इस सनातन राष्ट्र की कालजयी सभ्यता का बोधक नहीं है? सेकुलरिस्ट अगर इसी देश में कश्मीरियत को स्वीकार सकते हैं तो समग्र रूप से पूरे हिंदुस्तान की सभ्यता के लिए हिंदुत्व के प्रयोग पर आपत्ति क्यों है? इस देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो उन पर समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जा सकती है? एक समुदाय अपने लिए अलग कानून और अदालत की मांग क्यों करता है और उस मांग को सेकुलरिस्टों का समर्थन क्यों मिलता है? हिंदुत्व का अर्थ सर्वधर्म समादर है। यह मजहब के आधार पर किसी समुदाय के लिए विशेष अधिकारों की व्यवस्था नहीं देता।

हिंदुत्व के समर्थक क्या कभी ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं जिसमें शंकराचार्य फतवा जारी कर रहे हों और संत न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान हों? भाजपा के हिंदुत्व का जिस सेकुलरवाद के नाम पर विरोध किया जा रहा है उसका भारत में क्या अर्थ है? बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी शिक्षण संस्था चलाने के अधिकार से वंचित रखना और अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम व ईसाइयों को न केवल यह अधिकार देना, बल्कि उनकी संस्थाओं को राज्याश्रय और वित्तीय मदद उपलब्ध कराना, जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बहुल चरित्र को कायम रखने के लिए धारा 370 की व्यवस्था के अंतर्गत शेष भारतीयों की वहां रिहायश पर पाबंदी लगाना, हिंदू तीर्थस्थलों का अधिग्रहण और उन तीर्थस्थलों से हुई आमदनी से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये हज सब्सिडी के रूब में बांट देना क्या सेकुलरवाद की विकृति को उजागर नहीं करते? इस विकृत सेकुलरवाद का विरोध आज सांप्रदायिकता है। क्यों?
साभार-जागरण
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

Monday, February 9, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : भारतीयता की अभिव्यक्ति


पं. दीनदयाल उपाध्‍याय
भारत में एक ही संस्कृति रह सकती है; एक से अधिक संस्कृतियों का नारा देश के टुकड़े-टुकड़े कर हमारे जीवन का विनाश कर देगा।

संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातन्त्र तथा राजनैतिक पूंजीवाद का निर्माण करना चाहते हैं। अत: उनमें सब प्रकार की सद्भावना होते हुए भी इस बात की सम्भावना कम नहीं है कि उसके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाय। अत: आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाय। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा राष्ट्र-विघटन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे। अत: मुस्लिम लीग का द्वि-संस्कृतिवाद, कांग्रेस का प्रच्छन्न द्वि-संस्कृतिवाद तथा साम्यवादियों का बहु-संस्कृतिवाद नहीं चल सकता। आज तक एक-संस्कृतिवाद को सम्प्रदायवाद कहकर ठुकराया गया किन्तु अब कांग्रेस के विद्वान भी अपनी गलती समझकर एक-संस्कृतिवाद को अपना रहे हैं। इसी भावना और विचार से भारत की एकता तथा अखण्डता बनी रह सकती है, तभी हम अपनी सम्पूर्ण समस्याओं को सुलझा सकते हैं।


मनुष्य अनेक जन्मजात प्रवृत्तियों के समान, देशभक्ति की भावना भी स्वभाव से ही प्राप्त करता है। केवल परिस्थितियों एवं वातावरण के दवाब से किसी व्यक्ति में ये प्रवृत्ति सुप्त होकर विलीनप्राय हो जाती है। इस प्रकार विकसित देश-प्रेम के व्यक्ति, अपनी कार्य-कलापों की प्रेरणा अस्पष्ट एवं क्षीण भावना से नहीं वरन् अपने स्वप्नों के अनुसार अपने देश का निर्माण करने की प्रबल ध्‍येयवादिता से पाते हैं। भारत में भी प्रत्येक देशभक्त के सम्मुख इस प्रकार का ध्‍येय-पथ है तथा वह समझता है कि अपने पथ पर चलकर ही वह देश को समुन्नत बना सकेगा। यह धयेय-पथ यदि एक ही होता तथा सब देश-भक्तों के लिये आदर्श भारत का स्वरूप भी एक ही होता तब तो किसी भी प्रकार के विवाद या संघर्ष का प्रश्न नहीं था, किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि आज भिन्न-भिन्न मार्गों से लोग देश को आगे ले जाना चाहते हैं तथा प्रत्येक का विश्वास है कि उसी का मार्ग सही मार्ग है। अत: हमको इन मार्गों का विश्लेषण करना होगा और तब ही हम प्रत्येक की वास्तविकता को भी समझ सकेंगे।
चार प्रमुख मार्ग
इन मार्गों को देखते हुए हमें चार प्रधान वर्ग दिखाई देते हैं, अर्थवादी, राजनीतिवादी, मतवादी तथा संस्कृतिवादी।
अर्थवादी
प्रथम वर्ग अर्थवादी, सम्पत्ति को ही सर्वस्व समझता है तथा उसके स्वामित्व एवं वितरण दोषों को सब प्रकार की दुर्व्यवस्था को जड़ मान कर उसमें सुधार करना ही अपना एकमेव कर्तव्य समझता है। उसका एकमेव लक्ष्य 'अर्थ' है। साम्यवादी एवं समाजवादी इसी वर्ग के लोग हैं। इनके अनुसार भारत की राजनीति का निधार्रण अर्थ-नीति के आधार पर होना चाहिये तथा संस्कृति एवं मत (Religion) को वे गौण समझकर अधिक महत्व देने को तैयार नहीं हैं।

राजनीतिवादी
राजनीतिवादी दूसरा वर्ग है। यह जीवन का सम्पूर्ण महत्व राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त करने में ही समझता है तथा राजनीतिक दृष्टि से ही संस्कृति, मज़हब तथा अर्थनीति की व्याख्या करता है। अर्थवादी यदि एकदम उद्योगों का राष्ट्रीयकरण अथवा बिना मुआविजा दिये जमींदारी-उन्मूलन चाहता है तो राजनीतिवादी अपने राजनीतिक कारणों से ऐसा करने में असमर्थ है। इस प्रकार उसके लिए संस्कृति एवं मज़हब का भी मूल्य अपनी राजनीति के लिए ही है, अन्यथा नहीं। इस वर्ग के अधिकांश लोग कांग्रेस में हैं जो आज भारत की राजनीतिक बागडोर संभाले हुए है।

मतवादी
तीसरा वर्ग मज़हब-परस्त या मतवादी है। इसे धर्मनिष्ठ कहना ठीक न होगा; क्योंकि धर्म; मज़हब या मत से बड़ा तथा विशाल है। यह वर्ग अपने-अपनी मज़हब के सिध्दान्तों के अनुसार ही देश की राजनीति अथवा अर्थनीति को चलाना चाहता है। इस प्रकार का वर्ग मुल्ला-मौलवियों तथा रूढ़िवादी कट्टरपंथियों के रूप में अब भी विद्यमान है, यद्यपि आजकल उसका बहुत प्रभाव नहीं रह गया है।

संस्कृतिवादी
चौथा वर्ग संस्कृतिवादी है। इसका विश्वास है कि भारत की आत्मा का स्वरूप प्रमुखतया संस्कृति ही है। अत: अपनी संस्कृति की रक्षा एवं विकास ही हमारा कर्तव्य होना चाहिये। यदि हमारा सांस्कृतिक ह्रास हो गया तथा हमने पश्चिम के अर्थ-प्रधान अथवा भोग-प्रधान जीवन को अपना लिया तो हम निश्चित ही समाप्त हो जायेंगे। यह वर्ग भारत में बहुत बड़ा है। इसके लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तथा कुछ अंशों में कांग्रेस में भी हैं। कांग्रेस के ऐसे लोग राजनीति को केवल संस्कृति का पोषक मात्र ही मानते हैं, संस्कृति का निर्णायक नहीं। हिन्दीवादी सब लोग इसी वर्ग के हैं।

मार्गों की प्राचीनता
उपर्युक्त चार वर्गों की विवेचना में यद्यपि हमने आधुनिक शब्दों का प्रयोग किया है किन्तु प्राचीन काल में भी ये चार प्रवृत्तियां उपस्थित थीं तथा इनमें एक एक प्रवृत्ति को ही अपनाकर हमने अपने जीवन के आदर्श का मानदण्ड बनाया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही चार प्रवृत्तियां हैं। धर्म संस्कृति का, अर्थ नैतिक वैभव का, काम राजनैतिक आकांक्षाओं का तथा मोक्ष पारलौकिक उन्नति का द्योतक था। इनमें से हमने धार्म को ही अपनी जीवन का आधार बनाया है, क्योंकि उसके द्वारा ही हमने शेष सबको सधाते हुए देखा है। इसीलिये जब महाभारत काल में धार्म की अवहेलना होनी प्रारम्भ हुई, तब महर्षि व्यास ने कहा :-
''उधर्वबाहुर्विरोम्पयेष न च कश्चिच्छृणेति मे।
धर्मादर्थश्य कामख्य स धर्म: किं न सेव्येत॥''

अर्थ और काम की ही नहीं, मोक्ष की भी प्राप्ति धार्म से होती है; इसलिये धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि ''यतोऽभ्युदय नि:श्रेयस् सिध्दि: स धर्म:।'' जिससे ऐहिक और पारलौकिक उन्नति प्राप्त हो वही धर्म है। यह धर्म निश्चित ही अंग्रेजी का रिलीजन नहीं है। रिलीजन के लिये तो हमने मत शब्द का प्रयोग किया है, जो प्रत्येक के लिये भिन्न होता था तथा मोक्ष-निर्वाण अथवा परमानन्द-प्राप्ति का साधान होता था, जबकि धर्म के द्वारा सम्पूर्ण समाज की धारणा तथा उसके अंगों का पालन होता था। इसलिये धर्म की भी व्याख्या की गई है :-
''धारणाध्दर्मभित्याहु धर्मो धारयते प्रजा:।''

धर्मप्रधान भारतीय जीवन
भारतीय जीवन को धर्म-प्रधान बनाने का प्रमुख कारण यह था कि इसी में जीवन का विकास सबसे अधिक निश्चित है। आर्थिक दृष्टिकोण वाले लोग यद्यपि आर्थिक समानता के पक्षपाती हैं, किन्तु वे व्यक्ति की राजनीतिक एवं आत्मिक सत्ता को पूर्णत: समाप्त कर देते हैं। राजनीतिवादी प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार देकर उसके राजनैतिक व्यक्तित्व की रक्षा तो अवश्य करते हैं किन्तु आर्थिक एवं आत्मिक दृष्टि से वे भी अधिक विचार नहीं करते। अर्थवादी यदि जीवन को भोग-प्रधान बनाते हैं तो राजनीतिवादी उसको अधिकार-प्रधान बना देते हैं। मतवादी बहुत कुछ अव्यावहारिक, गतिहीन एवं संकुचित हो जाते हैं। किसी-किसी व्यक्ति विशेष अथवा पुस्तक विशेष के विचारों के वे इतने गुलाम हो जाते हैं कि समय के साथ वे अपने आपको नहीं रख पाते तथा इस प्रकार पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं। इन सबके विपरीत संस्कृति-प्रधान जीवन की यह विशेषता है कि इसमें जीवन के केवल मौलिक तत्तवों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंधा में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है। इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है। संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है। इस संस्कृति को ही हमने धर्म कहा है। अत: जब कहा जाता है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, किन्तु यह संस्कृति ही होता है।

भारत की विश्व को देन
हमने देखा है कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा। भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं। उसमें तो शायद हमको उनसे ही उल्टे कुछ सीखना पड़े। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं।

संघर्ष का आधार
भारतीय जीवन का प्रमुख तत्व उसकी संस्कृति अथवा धर्म होने के कारण उसके इतिहास में भी जो संघर्ष हुये हैं, वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ही हुए हैं। तथा इसी के द्वारा हमने विश्व में ख्याति भी प्राप्त की है। हमने बड़े-बड़े साम्राज्यों के निर्माण को महत्व न देकर अपने सांस्कृतिक जीवन को पराभूत नहीं होने दिया। यदि हम अपने मध्ययुग का इतिहास देखें तो हमारा वास्तविक युध्द अपनी संस्कृति के रक्षार्थ ही हुआ है। उसका राजनीतिक स्वरूप यदि कभी प्रकट भी हुआ तो उस संस्कृति की रक्षा के निमित्त ही।

राणा प्रताप तथा राजपूतों का युध्द केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही था। छत्रपति शिवाजी ने अपनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना गौ-ब्राह्मण प्रतिपालन के लिए ही की। सिक्ख-गुरुओं ने समस्त युध्द-कर्म धर्म की रक्षा के लिए ही किए। इन सबका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि राजनीति का कोई महत्व नहीं था और राजनीतिक गुलामी हमने सहर्ष स्वीकार कर ली; किन्तु तात्पर्य यह है कि राजनीति को हमने जीवन में केवल सुख का कारण-मात्र माना है, जब कि संस्कृति जीवन ही है।

संस्कृतियों का संघर्ष
आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्त्व मानना तथा दूसरा इसे मान लेने पर उस संस्कृति का रूप कौन सा हो? विचार के लिए यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किन्तु वास्तव में है एक ही। क्योंकि एक बार संस्कृति को जीवन का प्रमुख एवं आवश्यक तत्त्व मान लेने पर उसके स्वरूप के सम्बन्धा में झगड़ा नहीं रहता, न उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है। यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढंकने का प्रयत्न किया जाता है।

इस दृष्टि से देखें तो आज भारत में एक-संस्कृतिवाद, द्वि-संस्कृतिवाद तथा बहु-संस्कृतिवाद के नाम से तीन वर्ग दिखाई देते हैं। एक-संस्कृतिवाद के पुरस्कर्ता भारत में विकसित एक ही भारतीय संस्कृति का अस्तित्तव मानते हैं तथा अन्य संस्कृतियों के लिए, जो विदेशों से भारत में आयी हैं, आवश्यक समझते हैं कि वह भारतीय संस्कृति में विलीन हो जाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी एक-संस्कृतिवाद के पोषक तथा कांग्रेस में श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन जैसे व्यक्ति इसी वाद के पोषक रहे हैं।

द्वि-संस्कृतिवादी
द्वि-संस्कृतिवादी दो प्रकार के हैं। एक तो स्पष्ट तथा दूसरे प्रच्छन्न। एक वर्ग भारत में स्पष्टतया दो संस्कृतियों का अस्तित्तव मानता है तथा उनको बनाये रखने की मांग करता है। मुस्लिम लीगी इसी मत के हैं। वे हिन्दू और मुस्लिम दो संस्कृतियों को मानते हैं तथा उनका आग्रह है कि मुसलमान अपनी संस्कृति की रक्षा अवश्य करेगा। दो संस्कृतियों के आधार पर ही उन्होंने दो राष्ट्रों का सिद्वान्त सामने रखा, जिसके परिणाम को हम पिछले वर्षों में भली-भांति अनुभव कर चुके हैं। प्रच्छन्न द्वि-संस्कृतिवादी वे लोग हैं जो स्पष्टतया तो दो संस्कृतियों का अस्तित्व नहीं मानते, मूल से एक संस्कृति एवं एक राष्ट्र का ही राग अलापते हैं, किन्तु व्यवहार में दो संस्कृतियों को मानकर उनका समन्वय करने का असफल प्रयत्न करते हैं। वे यह तो मान लेते हैं कि हिंदू और मुसलमान दो संस्कृतियां हैं, किन्तु उनको मिलाकर एक नवीन हिन्दुस्तानी संस्कृति बनाना चाहते हैं। अत: हिन्दी-उर्दू का प्रश्न वे हिन्दुतानी बनाकर हल करना चाहते हैं तथा अकबर को राष्ट्र-पुरुष मानकर अपने राष्ट्र के महापुरुषों के प्रश्न को हल करना चाहते हैं। 'नमस्ते' और 'सलामालेकुल' का काम ये 'आदाब-अर्ज' से चला लेना चाहते हैं। यह वर्ग कांग्रेस में बहुमत में है। दो संस्कृतियों के मिलाने के अब तक असफल प्रयत्न हुए हैं किन्तु परिणाम विघातक ही रहा है। मुख्य कारण यह है कि जिसको मुस्लिम संस्कृति के नाम से पुकारा जाता है वह किसी मजहब की संस्कृति न होकर अनेक अभारतीय संस्कृतियों का समुच्चय मात्र है। फलत: उसमें विदेशीपन है, जिसका मेल भारतीयत्व से बैठना कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। इसलिए यदि भारत में एक संस्कृति एवं एक राष्ट्र को मानना है तो वह भारतीय संस्कृति एवं भारतीय हिन्दू राष्ट्र, जिसके अन्तर्गत मुसलमान भी आ जाते हैं, के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता।

बहु-संस्कृतिवादी
बहु-संस्कृतिवादी वे लोग हैं जो प्रान्त को निजी संस्कृति मानते हैं तथा उस प्रान्त को उस आधार पर आत्म-निर्णय का अधिकार देकर बहुत कुछ अंशों में स्वतंत्र ही मान लेते हैं। साम्यवादी एवं भाषानुसार प्रान्तवादी लोग इस वर्ग के हैं। वे भारत में सभी प्रान्तों में भारतीय संस्कृति की अखण्ड धारा का दर्शन नहीं कर पाते।

संस्कृति से भिन्न जीवन का आधार
उपरोक्त तीनों प्रकार के वर्गों का प्रमुख कारण यह है कि उनके सम्मुख संस्कृति-प्रधान जीवन न होकर मज़हब, राजनीति अथवा अर्थनीति-प्रधान जीवन ही है। मुस्लिम लीग ने अपनी अमूर्त तत्तव का आधार मुस्लिम मज़हब समझकर ही भिन्न मुस्लिम संस्कृति एवं राष्ट्र का नारा लगाया तथा उसके आधार पर ही अपनी सब नीति निधार्रित कीं। कांग्रेस का जीवन एवं लक्ष्य राजनीति-प्रधान होने के कारण उसने अंग्रेजों को मुकाबला करने के लिए तथा शासन चलाने के लिए सब वर्गों को मिलाकर खड़ा करने का विचार किया, जिसके कारण अप्रत्यक्ष रूप से यह भी द्वि-संस्कृतिवाद का शिकार बन गई। बहु-संस्कृतिवादी जीवन को अर्थ-प्रधान मानते हैं, अत: वे आर्थिक एकता की चिन्ता करते हुए सांस्कृतिक एकता की ओर से उदासीन रह सकते हैं।

एक राष्ट्र और एक संस्कृति
केवल एक-संस्कृतिवादी लोग ही ऐसे हैं जिनके समक्ष और कोई ध्‍येय नहीं है तथा जैसा कि हमने देखा, संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातन्त्र तथा राजनैतिक पूंजीवाद का निर्माण करना चाहते हैं। अत: उनमें सब प्रकार की सद्भावना होते हुए भी इस बात की सम्भावना कम नहीं है कि उसके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाय। अत: आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाय। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा राष्ट्र-विघटन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे।
(भारतीय जनसंघ के अध्‍यक्ष रह चुके दीनदयाल जी मौलिक चिंतक थे)

Saturday, February 7, 2009

हिन्दुत्व: हमारी राष्ट्रीय संस्कृति


अटल बिहारी वाजपेयी
समुद्र का दृश्य और उसकी लहरों का संगीत किसी भी व्यक्ति के मन में शाश्वत और अनन्त शक्ति के प्रति सहज ही जिज्ञासा पैदा कर सकता है। लेकिन मेरा मन भारत की ओर लौटता है। हमारी मातृभूमि के तट से इतिहास की कितनी ही लहरें टकरा गई। इसके विशाल क्षितिज पर नए वर्ष के कितने ही सूर्यों का उदय हुआ। हम अपने सांसारिक कार्यों में ही इतने खोये रहते हैं कि हम कभी-कभी यह भी भूल जाते हैं कि हमारी सभ्यता कितनी प्राचीन और महान है, उसमें कितना स्थायित्व है और उसमें अपने आपको नयेपन में ढालने की कितनी अपार क्षमता है। एक ऐसी सभ्यता जो अजेय है, सर्व समावेशक है, इतिहास की लहरों द्वारा लाये गये सभी सकारात्मक प्रभावों को अपने में समाहित करती रही है।

मुझे स्वामी विवेकानन्द के वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपने निबंध '' भारत का भविष्य'' में कहे थे; '' यह वही भारत है जो सदियों से सैकड़ों विदेशी आक्रमणों के आघातों को, अनेक आचार-व्यवहारों और रीति-रिवाजों के उथल-पुथल को झेलता आया है। यह वही भारत है जो अपनी अनन्त शक्ति, अनश्वर जीवन के साथ विश्व में किसी भी चट्टान से अधिक मजबूती के साथ खड़ा है। इसके जीवन का वही स्वरूप है जो आत्मा का होता है, जिसका न तो आदि है और न अंत, जो शाश्वत है और हम ऐसे ही देश की संतानें हैं।''







मुझे स्वामी विवेकानन्द के वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपने निबंध '' भारत का भविष्य'' में कहे थे; '' यह वही भारत है जो सदियों से सैकड़ों विदेशी आक्रमणों के आघातों को, अनेक आचार-व्यवहारों और रीति-रिवाजों के उथल-पुथल को झेलता आया है। यह वही भारत है जो अपनी अनन्त शक्ति, अनश्वर जीवन के साथ विश्व में किसी भी चट्टान से अधिक मजबूती के साथ खड़ा है। इसके जीवन का वही स्वरूप है जो आत्मा का होता है, जिसका न तो आदि है और न अंत, जो शाश्वत है और हम ऐसे ही देश की संतानें हैं।''

हमारी प्राचीन सभ्यता की तरह हमारी विविधता भी भारत की महानता - और इस राष्ट्र के प्रति भारतीयों में गर्व की भावना का स्रोत है। विदेशी लोग हमेशा आश्चर्य प्रकट करते हैं कि हमारे देश में धर्म, जाति, भाषा और जीवन-शैली में इतनी अधिक विविधता होते हुए भी, हम एक राष्ट्र कैसे बने हुए हैं ? जो बात वे समझ नहीं सकते और जिसे हमें भी कभी नहीं भूलना चाहिए, वह है - विविधता के साथ रहना और एक-दूसरे के साथ एकता और सामंजस्य का ताना-बाना बुनना। अनंतकाल से सम्पूर्ण भारत की एक जीवन-पद्वति रही है। यह बात गोवा के सम्बंध में भी उतनी ही सत्य है जितनी गुजरात के बारे में, जम्मू और कश्मीर के बारे में जितनी सत्य है उतनी ही केरल के बारे में और मणिपुर के सम्बंधा में जितनी सत्य है उतनी ही मधय प्रदेश के बारे में।

समय-समय पर विविधता में एकता को लेकर गंभीर बहस और यहां तक कि विवाद भी छिड़ जाते हैं। मैं यहां दो विशिष्ट विचारों पर टिप्पणी करना चाहता हूं जिन पर गुजरात चुनावों के बाद जोर-जोर से चर्चा हो रही है। एक तरफ, पंथ-निरपेक्षता को इस सोच के आधार पर हिन्दुत्व के विरूद्व खड़ा किया जा रहा है कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। यह गलत और अनुचित है। पंथ-निरपेक्षता राज्य-व्यवस्था की वह अवधारणा है जिसमें सभी धार्मों का सम्मान किया जाता है तथा नागरिकों के साथ उनकी धार्मिक आस्थाओं के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। भारत शुरू से ही पंथ-निरपेक्ष रहा है। हमने पंथ-निरेपंक्षता पर प्रतिबद्व रहना तब भी स्वीकार किया जग देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का द्वि-राष्ट्र सिध्दांत के साम्प्रदायिक आधार पर निर्माण हुआ। ऐसा कभी संभव नहीं हुआ होता यदि अधिकांश भारतीय पंथ-निरपेक्ष नहीं होते।

गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी बहुत अच्छे ढंग से व्याख्या की है '' भारत हमेशा से सामाजिक एकता बनाए रखने का प्रयास करता रहा है जिसमें विभिन्न मतावलम्बियों को अपना अलग अस्तित्तव बनाए रखने की पूरी आजादी भी होते हुए एकजुट रखा जा सके। यह बंधान जितना लचीला है उतना ही परिस्थितियों के अनुरूप इसमें मजबूती भी है। इस प्रक्रिया से एक एकात्मक सामाजिक संघ की उत्पत्ति हुई जिसका सामूहिक नाम ' 'हिन्दुइज्म' है।''

हिदू दर्शन द्वारा पंथों की विविधाता की स्वीकार्यता भारतीय सेक्युलरिज्म का मूल-सत्व रहा है। महर्षि अरविंद ने इसे इन शब्दों में व्यक्त किया है: ''भारतीय धर्म की अवधारणा में हमेशा यह महसूस किया गया है कि चूंकि मनुष्यों के विचारों, स्वभाव और बौद्विक ज्ञान में असीमित विविधताएं होती हैं, अत: हर व्यक्ति को अपने विचार अभिव्यक्त करने और ईश्वर की अपने ढंग से पूजा-अर्चना करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।

दूसरी तरफ, हिन्दुत्व, जो मानव जीवन का विराट दर्शन प्रस्तुत करता है, को कुछ लोगों द्वारा एक संकीर्ण, कट्टर तथा चरमपंथी रूप में पेश किया जा रहा है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य व्याख्या है जो इसके सही अर्थ के बिल्कुल विपरीत है। हिन्दुत्व सम्पूर्ण सृष्टि को समग्र रूप से समझने की दृष्टि है जो इस लोक तथा परलोक, दोनों के लिए रास्ता दिखाता है। यह व्यक्ति और समाज तथा मनुष्य की भौतिक तथा आधयात्मिक जरूरतों के बीच अटूट सम्बंधों पर बल देता है। हिन्दुत्व उदार है, उदात्त है, मुक्तिगामी है। यह किसी भी आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच कोई दुर्भावना, घृणा अथवा हिंसा को बर्दाश्त नहीं करता है।

पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति और सभ्यता का यह राष्ट्र है। इसलिए जब संविधान परिषद बैठी थी और सेकुलरवाद या सेकुलरवाद की भावना के प्रश्न पर चर्चा हो रही थी, उस समय भी सेकुलर का अर्थ क्या है, इसके बारे में अलग-अलग राय थी। लेकिन संविधान के निर्माताओं ने सेकुलर शब्द संविधान में नहीं रखा। संविधान की प्रस्तावना में सेकुलर शब्द उस समय आया, जब देश में इमर्जेंसी लगी थी और कई लोग जेलों में बंद थे। विचार व्यक्त करने की आजादी नहीं थी। उस समय संविधान में संशोधन किया गया। उससे पहले धारणा यह थी कि प्रस्तावना में संशोधन नहीं होना चाहिए। होगा भी नहीं, मगर प्रस्तावना में संशोधान कर दिया गया और भारत को डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के साथ-साथ सेकुलर एंड सोशलिस्ट रिपब्लिक भी घोषित कर दिया गया।

हमारा सेकुलरिज्म पश्चिम के सेकुलरिज्म से भिन्न होगा। उन्होंने कहा था कि यह बहुधर्मों का देश है और सेकुलरिज्म का अर्थ है कि किसी भी धर्म के मानने वाले के साथ भेदभाव न हो और सब धर्मों को समान दृष्टि से देखा जाये। हम इस व्याख्या को हृदय से स्वीकार करते हैं। यह हिन्दू चिंतन का निचोड़ हैं। यह हमारी अस्मिता है क्योंकि भारत में अनेक मत हैं अनेक मतांतर हैं। केवल एक पुस्तक नहीं है, एक पैगम्बर नहीं है। यहां ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर की सत्ता को नकारने वाले भी है। यहां किसी को सूली पर नहीं चढ़ाया गया और न किसी को पत्थर मारकर दुनिया से उठाया गया। यह सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है '' एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति' अब तो दर्शन उससे भी आगे चला गया है। यह अनेकांतवादी देश है।
इस देश में कभी मजहबी राज्य की मांग नहीं उठी। इस देश मे कभी मजहब के आधार पर, मत भिन्नता के आधाार पर उत्पीड़न की बात नहीं उठी, न उठेगी, न उठनी चाहिए।

मुझे याद है कि देश के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भाषण करने के लिये गये थे। दीक्षांत समारोह था। उनके भाषण का एक अंश है-
''मैं कह चुका हूं कि मुझे अपनी विरासत एवं अपने पूर्वजों पर बड़ा गर्व है, जिन्होंने भारत को ज्ञान एवं सांस्कृतिक उत्कर्ष पर पहुंचाया। इस अतीत के बारे में आप कैसा महसूस करते है? क्या आप इसमें अपने आपको हिस्सेदार महसूस करते हैं और इसका वारिस महसूस करते हैं और किसी बात पर गर्व महसूस करते हैं जो उतनी ही आपसे संबधित है, जितनी मुझसे या इससे अलग महसूस करते हैं? क्या यह अजनबी सरसराहट जो यह महसूस करने से आती है कि हम इस विशाल खजाने के वारिस हैं, न्यासी हैं- या बिना समझदारी से ही? आप एक मुसलमान है और मैं एक हिन्दू। हम अलग-अलग धार्मिक विश्वास रख सकते हैं और कोई भी धार्मिक विश्वास न रखें, उससे हमारी विरासत समाप्त नहीं होती जो आपकी भी उतनी ही है, जितनी मेरी। अतीत हमें एक सूत्र में बांधाता है, जबकि वर्तमान और भविष्य हमें विभाजित करता हैं।''

अपने अंतिम दस्तावेज में नेहरू जी ने जो कुछ लिखा है और आज पाठय-पुस्तकों का विषय बन गया है, सबको फिर से पढ़ने की जरूरत है। नेहरू जी पर कोई पुरातनपंथी होने का आरोप नहीं लगा सकता, लेकिन नेहरू जी ने उस विश्वास की बात की है कि हम अपने दिमाग खुले रखते हैं, हम खिडकियां खुली रखते हैं। मगर यह भी कहा है कि हम अपने पांव पर मजबूती से खड़े रहते हैं। कामन इनहेरिटेंस इसकी स्वीकृति है? क्या जो अतीत है, उसमे अभिमान है?

बहुत से विदेशी यहां आये, लोगों को शरण मिली। हमने निर्दोष आने वालों को, उजड़ कर आने वालों को वापस नहीं भेजा। भारत माता की गोद में सबको जगह मिली। जो अपना देश छोड़ कर उत्पीड़न के शिकार होकर यहां आये, उन्हें जगह मिली। भारत में पहली मस्जिद हिन्दू राजा की अनुमति से केरल में बनी, भारत में पहला चर्च भी केरल में बना, वही भी अनुमति से। यह हमारे रक्त में हैं। यह जीवन की घुट्टी में है। मजहब के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। सबको छूट होनी चाहिए। सबके साथ बराबर व्यवहार होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। बराबर व्यवहार नहीं हो रहा है। इसलिये कठिनाई पैदा हो रही है। इसलिये लोगों के मन में शंकाए पैदा हो रही है।

इस देश में हिन्दू बहुत संख्या में हैं, मगर उनमें एक माइनिरिटी काम्पलेक्स जैसा विकसित हो रहा है। माइनिरिटी में अगर काम्पलेक्स हो तो मैं समझ सकता हूं कि जो संख्या में कम हैं वे संरक्षण की बात करें। संरक्षण मिलना चाहिए। यह राजधर्म है और इसलिये जहां हम राष्ट्र की सुरक्षा पर बल देते हैं, वहां इस बात पर भी बल देते हैं, कि देश के भीतर हर नागरिक की जान माल इज्जत की और धर्म की हिफाजत होनी चाहिए। (मेरी संसदीय यात्रा पृष्ठ क्र. 52,53,54, 55)

हमें हिन्दुत्व की उस सही पहचान को परिपुष्ट करके और बढ़ावा देने की जरूरत है जो भविष्योन्मुखी है, न कि पीछे का मुकाबला करने के लिये सक्षम बनाता है, न कि पुरानी लीक पर ही अटकी रहने वाली, जो सुधारवादी है न कि उस रूढ़िवाद, अन्याय की हिमायत करने वाली जिसके विरूद्व विगत में सभी समाज सुधारकों ने संघर्ष किया था। यदि इस प्रबुद्व हिंदुत्व को समझा जाये और इसका अनुकरण किया जाये, जैसा कि स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान देशभक्तों ने प्रतिपादित किया है, तो हिन्दुत्व के बारे में वर्तमान में चल रहा विवाद पूर्णतया अनावश्यक दिखाई देगा।
ऐसे हिन्दुत्व तथा भारतीयता में कोई अंतर नहीं है क्योंकि दोनों ही एक चिंतन को अभिव्यक्त करते है। दोनों ही इस बात पर जोर देते है कि भारत सभी का है और सभी भारत के है। इसका तात्पर्य यह है कि सभी भारतीयों के समान अधिकार हैं और उनकी जिम्मेदारियां भी समान हैं। यह हमारी सामूहिक राष्ट्रीय संस्कृति जो भारत की सभी विभिन्न धार्मिक तथा गैर-धार्मिक परम्पराओं से समाविष्ट है, की पहचान को दर्शाता है। सदियों से दोनों ही समान रूप से हमारी राष्ट्रीय पहचान को परिलक्षित करते आये हैं। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने ही यह माना है कि हिन्दुत्व न तो कोई धार्मिक अवधारणा है न ही राजनीतिक बल्कि यह हमें जीवन का उदात्त एवं उन्नत मार्ग दिखाता है। यही भारतीयता है जिसका हमें गुणगान करना है तथा इसे और मजबूत बनाना है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : वैचारिक मूलमंत्र



लालकृष्ण आडवाणी
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा का सहज स्वरूप हिन्दुत्व बन गया है। हिन्दुत्व केवल अयोध्‍या में मंदिर नहीं है, यह तो हजारों-हजारों वर्षों से हमारे अनुभवों की सामूहिक बुध्दिमत्ता का प्रतीक है। इसलिए अक्टूबर 1961 में मदुरई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक को सम्बोधित करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था-''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''हिन्दुत्व हमारे लिए मात्र नारा नहीं है। यह भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक मूलमंत्र है जिसमें उसकी पहचान और दृष्टि अत्यन्त विशिष्ट रूप से प्रकट होती है।

हिन्दुत्व पंथ या मजहब नहीं है और न ही हिन्दुत्व कोई मजहबी राज्य स्थापित करने का नुस्खा है। इसमें राष्ट्रत्व और सत्त्व समाहित है। यह राष्ट्र को एकजुट करने वाली सुदृढ़ शक्ति है। हिन्दुत्व केवल अयोध्‍या में मंदिर नहीं है, यह तो हजारों-हजारों वर्षों से हमारे अनुभवों की सामूहिक बुध्दिमत्ता का प्रतीक है। इसलिए अक्टूबर 1961 में मदुरई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक को सम्बोधित करते हुए पंडित नेहरू ने कहा था-



''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''

''भारत पिछले अनेक युगों से तीर्थ स्थलों के देश में बर्फीली हिमालय पर्वतमाला में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक आपको प्राचीन स्थलों के दर्शन होंगे। इन महान तीर्थों में ऐसी क्या बात हैं जो लोगों को दक्षिण से उत्तर और उत्तर से दक्षिण की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती है। यह एक देश और संस्कृति की भावना है और इस भावना ने हम सबको जोड़ रखा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि भारत भूमि उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैली हुई है। भारत को एक महान देश समझने की अवधारणा युगों-युगों से चली आ रही है जिसे लोग पावन भूमि मानते है और इसी अवधारणा ने इसे एकसूत्र में बाँध रखा है। हालांकि यहां विभिन्न राजनैतिक स्वरूप के अलग-अलग राज्य रहे है और हम विभिन्न भाषाएं बोलते है फिर भी यह मृदुल बंधन हमें अनेक रूपों में इकट्ठा बांधे रखता है।''

पं. नेहरू ने हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं किया। परन्तु भारत की एकता-संस्कृति के मुदृल बंधन का जो आधार स्पष्ट रुप से उन्होंने रखा वह वही है जिसे भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्व की संज्ञा दी है।

भारतीय राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय एक जन है परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी संस्कृति में ही निहित है-इस बात को न्यायालयों ने अनेक निर्णयों में स्वीकार किया है।

प्रदीप जैन बनाम भारत संघ (1984) मामले में निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी.एन. भगवती और अमरेन्द्र नाथ सेन तथा जस्टिस रंगनाथ मिश्र ने कहा था-
यह इतिहास का रोचक तथ्य है कि भारत का राष्ट्र के रूप में अस्तित्तव बनाए रखने का कारण एक समान भाषा या इस क्षेत्र में एक ही राजनैतिक शासन का जारी रहना नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी चली आ रही एक समान संस्कृति हैं। यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बंधन से अधिक मूलभूत और टिकाऊ है, जो किसी देश के लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसने इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बाँध रखा है।

इस प्रकार हिन्दुत्व वह आदर्श है जो भूत और भविष्य को वर्तमान से जोड़ता है। सारे रूप में यही भारत की पहचान है। सेक्यूलरवाद के नाम पर राजनीतिज्ञ चाहते है कि यह देश अपनी पहचान भूल जाए। हिन्दुत्व मात्र सिध्दान्त नहीं है, इससे बढ़कर यह भारत के प्रति हमारी प्रतिबध्दता की वास्तविकता है। जब तक भारतीय सभ्यता है हिन्दुत्व का स्थान है। यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। यह हमारा मिशन है। इससे भारतीय राजनीति में नैतिक और आचार संबंधी आधार को बल मिलेगा। जिसे जातिवाद और साम्प्रदायिक वोट बैंक की राजनीति को चलाने वाले धीरे-धीरे समाप्त करते जा रहे है।
पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की सफलता यह रही है कि मतदाताओं में इस विचारधारा को संगत मुद्दा बना सकी हैं। हम देशभर में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम छद्म सेक्यूलरवाद पर बहस कराने में सफल हुए है। अब अधिक से अधिक लोग महसूस करने लगे है कि सेक्युलरवाद के नाम पर हमारे विरोधी चाहते है कि राष्ट्र अपनी अस्मिता जिसे हिन्दुत्व कहते है उसे नकार दें। इस राष्ट्रीय अस्मिता को भी भारतीयता का नाम दिया जा सकता हैं परन्तु इसका अंतनिर्हित सार एक ही है।

भारतीय सेक्युलरवाद के बारे में एक विशुध्द अध्‍ययन में यूजीन ने लिखा था-भारतीय संस्कृति एक मिली जुली संस्कृति होने के बावजूद उसमें हिन्दुत्व ही अत्यधिक शक्तिशाली और व्यापक रहा है। वे लोग जो बार-बार भारतीय संस्कृति के इस मिले-जुले स्वरुप के बारे में बहुत बल देते है इस बुनियादी तत्तव के महत्व को कम कर देते है। हिन्दुत्व ने ही वास्तव में भारतीय संस्कृति को आवश्यक विशिष्टता प्रदान की है।

हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने लिखा था-
अंग्रेजों ने हमें यह सिखाया है कि पहले हम एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में अभी हमें शताब्दियां लगेगी। यह बात निराधार है। उनके भारत आने के पहले से ही हम एक राष्ट्र थे। एक ही विचार हमें प्रेरित करते थे। हमारी जीवन शैली एक समान थी। चूंकि हम एक राष्ट्र थे इसलिए वे एक साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हुए।

भारत का राष्ट्रत्व न तो ब्रिटिश शासन की देन है न ही उस स्थिति में स्वतंत्रता आन्दोलन की। न ही वह भारत के संविधान से उपजा है। वास्तव में तो स्वयं स्वतंत्रता आन्दोलन स्वराज के लिए संघर्ष की अग्नि प्रदीप्त करने हेतु जागृत हुई राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति थी। भारत के संविधान में वस्तुत: उस प्राचीन राष्ट्र को मान्य किया है जो इस भूमि में हजारों वर्षों से विद्यमान रहा है। जब संविधान में गोरक्षा को निवेश सिध्दांतों में शामिल किया गया तो यह उस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्वीकारोक्ति थी जो उस राष्ट्र के जीवन का प्राण है।

सामान्यत: हिन्दुस्तान में पिछले 50 सालों में हम साम्प्रदायिक तनाव को दूर नहीं कर पाए। 1947 में तो भयंकर रक्तपात हुआ था और 1947 में रक्तपात होने के बावजूद हमने भारत का जो संविधान बनाया, वह भारत के लिए गर्व की बात है, बहुत गर्व की बात है। ऐसे समय में, जब देश का विभाजन हुआ, जिस विभाजन के लिए महात्मा गांधी ने कहा था कि यह तो पाप है; महात्माजी ने कहा था कि यह तो मेरी मां की हत्या है, एक प्रकार से मातृहत्या है, मेंडीसाइट है। बावजूद इस बात के कि हिन्दुस्तान का बंटवारा धार्म के आधार पर हुआ किन्तु हिन्दुओं का बहुमत कहां है। मुसलमानों का बहुमत कहां है और बावजूद इसके कि हमारे पड़ोसी देश में जिसने कहा कि अगर अखंड हिन्दुस्तान रहेगा तो देश के मुसलमान हिन्दुओं के गुलाम बन कर रहेंगे। This was the thesis और उन्होंने कहा कि इसलिए हमको अलग राष्ट्र चाहिए, अलग राज्य चाहिए, अलग राज्य उन्होंने बना लिया और उस राज्य को इन्होंने इस्लामिक राज्य भी घोषित किया। इन बातों के बावजूद 1950 में जो संविधान स्वीकार किया, वह संविधान उस समय के हमारे नेतृत्व के लिए गर्व की बात है, सम्पूर्ण भारत के लिए गर्व की बात है। उस समय उस संविधान को स्वीकार करना, जिसको हम सैकुलर कहते हैं, जबकि उस समय सैकुलर शब्द का प्रयोग संविधान निर्माताओं ने अपने संविधान में किया भी नहीं था लेकिन सैकुलरिज्म की जो कल्पनाएं हैं वे हमने अपने संविधान के प्रावधानों में लिख दी और तब से लेकर आज तक कोई कुछ कहे हमने मज़हबी राज्य को कभी स्वीकार नहीं किया, न करेंगे और हमारे ऊपर सबसे ज्यादा आरोप लगता है इसलिए हमने कहा कि हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा, हमारे इतिहास का हिस्सा है India's polity, Indias political thinkers haveAlways rejectedA theocratic state. मज़हबी राज्य को हमने कभी स्वीकार नहीं किया, न 1950 में किया, न अब कर रहे हैं, न आगे करेंगे। इस तथ्य को समझ कर लोग चले और जो इससे सहमत नहीं वे मेरी भी आलोचना करते हैं। मैंने जो शब्द प्रयोग किया उसका मेरे ऊपर उपयोग किया गया, चाहे वह बाद में उन्होंने कहा कि हमसे गलती हो गई, हमको नहीं करना चाहिए। उसका कारण यह है कि अगर आप हिन्दू शब्द कहते ही चिढ़ जाएंगे और कहेंगे कि आप गलत बात कर रहे हो तो फिर आप सही नहीं कह रहे हैं जो व्याख्या हिन्दुत्व की सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है-
"The words Hinduism or HindutvaAre not confined only to the strict Hindu religious practices unrelated to the cultureAnd ethos of the people of India depicting the way of life of the Indian people,AndAre not confined merely to describe persons practising the Hindu religionAsA faith." इसका कोई अर्थ, यदि कोई दे तो उसे देने दीजिए, लेकिन हमारे लिए थियोक्रेटिक स्टेट स्वीकार नहीं है और न हिन्दुत्व एक ऐसा शब्द है जिसको सुनकर ही तथाकथित बुध्दिजीवी कहेंगे कि यह तो संकीर्ण है, यह तो बिगेट्री है, यह तो ऐसा है, यह तो वैसा है। नि:सन्देह उनके भय के मूल में अल्पसंख्यकवाद पर आधारित छद्म पंथनिरपेक्षता की राजनीति के कारण उत्पन्न जनक्षोभ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इस राष्ट्रवाद की आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं है जो हमें वेदों, रामायण, महाभारत, गौतमबुध्द, भगवान महावीर, आदि शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई, स्वामी दयानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, जय प्रकाश नारायण और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

इस प्रकार हिन्दुत्व एक एकात्मवादी सिध्दांत है। यह भारत की आत्मा की रक्षा और उसे पुन: ऊर्जावान बनाने का सामूहिक उद्यम है। यह एक ऐसा सकारात्मक प्रयास है जो किसी भी एक वर्ग को दूसरे की कीमत पर लाभ उठाने की शर्मनाक कोशिशों को रोकता है। हिन्दुत्व है अनुशासन और आत्मानुशासन।

केवल भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणाओं में निहित अनंत शक्ति को मान्य करके ही अलगाववादी ताकतें खत्म कर राष्ट्र को एकजुट किया जा सकता है। यह बात गौण है कि आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को कैसे बताते हैं- हिन्दुत्व के रूप में या भारतीयता के रूप में। मूल तत्त्व तो एक ही है। केवल भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणाओं में निहित अनंत शक्ति को मान्य करके ही अलगाववादी ताकतें खत्म कर राष्ट्र को एकजुट किया जा सकता है। यह बात गौण है कि आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को कैसे बताते हैं- हिन्दुत्व के रूप में या भारतीयता के रूप में। मूल तत्त्व तो एक ही है।
(सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुस्तक से साभार)

Thursday, February 5, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : भारत के भविष्य का आधार


डॊ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी
भारतीयता का अर्थ है भारत की समग्र परम्परा, भारत-वर्ष का सामाजिक, सांस्कृतिक इतिहास, भारत-वर्ष की पुरातन, अधुनातन पृष्ठभूमि, भारत-वर्ष की संवेदना, भारत वर्ष की कला, भारत-वर्ष का साहित्य। इन सबमें एक ही भाव है जो भारत-वर्ष के प्राचीन दर्शन व भारत के अध्‍यात्म को जीवन से जोड़ता है। मेरी दृष्टि में भारतीयता पूरे इतिहास का निचोड़ है, हमारे दर्शन का निचोड़ है, हमारे जीवन के आदर्शों का प्रतीक है। भारतीयता एक ऐसी चीज है जिसे पहचाना तो जा सकता है, महसूस भी किया जा सकता है किन्तु उसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता।

मैंने अपनी पुस्तक 'भारत और हमारा समय' में लिखा है कि भारतवर्ष एक सनातन चिंतन, सनातन विचार, सनातन दृष्टि, सनातन आचार और सनातन यात्रा-पथ भी है। मैं मानता हूं कि भारत मात्र एक भूखंड ही नहीं, केवल भौगोलिक इकाई ही नहीं, केवल एक राजनीतिक सत्ता ही नहीं बल्कि मनुष्य की मनुष्यता का अभिषेक है। भारतीयता का अर्थ है पुरातन से अद्यतन का समतामूलक अनुभव किन्तु वर्तमान परिदृश्य में लगता है कि भारतीयता की यह परिकल्पना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। इसकी अनुभूति मुझे तब और भी गहरी हुई, जब मैं सात वर्ष तक ब्रिटेन का उच्चायुक्त रहने के बाद भारत लौटा। जब लौटा तो मैंने एक बार परिहास में कहा था कि 'बाहर तो मैंने अप्रवासी भारतीय (नॉन रेजिडेन्ट इंडियन्स) कई देखे हैं, उनसे मिलन हुआ है और उसकी भारतीयता से मैं बहुत गहरे तक प्रभावित भी हुआ हूं, किन्तु यहां आकर एक बड़ी दु:खद और दयनीय त्रासदी मुझे दिखाई देती है कि भारत वर्ष में ही कई प्रवासी अभारतीय हैं। सच बात यह है कि आजादी से पहले भी इतनी विकृतियां नहीं थीं जितनी कि आज हैं। हमारी भाषा का, हमारे साहित्य का, हमारी राष्ट्रीयता का जो आत्म सम्मान था, जो प्रतीति थी, जो अस्मिता की अनुभूति थी उसे हम भूलते चले जा रहे हैं। यह एक बड़ी कष्टमय स्थिति है। आने वाली पीढ़ी किस सांस्कृतिक पौष्टिक आहार पर बन रही है? समझ नहीं आता। उसका सांस्कृतिक पौष्टिक बहुत कम भारतीय है। इसका कारण हमारी नीति में कमियां हैं। हमने अपनी शिक्षा नीति में बहुत सारी बातें जोड़ी हैं। हमने बच्चों पर काफी बोझा भी बढ़ा दिया है किन्तु उन सबमें भारतीयता की कमी है। संस्कृत भाषा को ही लें, मेरी संस्कृत में बहुत निष्ठा है और मान्यता है कि संस्कृत भाषा के बिना भारत की सम्पूर्ण अनुभूति जरा मुश्किल से होती है।

आज से लगभग डेढ़ दशक पहले जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने अपनी भाषा नीति प्रकाशित की तो मुझे बहुत कष्ट हुआ था कि इस नीति के चलते तो यहां से संस्कृत लुप्त हो जाएगी क्योंकि उस नीति में संस्कृत वैकल्पिक विषय भी नहीं रखा गया, जिसमें कि अंक दिए जा सकें। जब अंक नहीं दिये जाएंगे तो कोई व्यक्ति इसे पढ़ेगा भी नहीं और विषय के रूप में लेगा भी नहीं। तब मैंने राजीव गांधी से कहा था कि यह नीति देश के लिए सबसे बड़ी दुर्घटना है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया और कहा था कि आपकी बात मेरी समझ में आती है किन्तु अब मैं क्या कर सकता हूं। तब मैंने उनसे कहा था कि अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो मैं अदालत में जाऊंगा। मैं इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले गया क्योंकि उस समय संस्कृत के कई अध्‍यापकों को बर्खास्त किया जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगनादेश भी दिया था और अब हमारे पक्ष में निर्णय भी हो गया है किन्तु यह प्रकरण मेरे जीवन की बहुत कष्टपूर्ण घटना रही हैं।

भारतीयता जिसके नाम पर वोट मांगे जाएं, जिसके नाम पर राज्य करे, जिसके नाम पर बड़ी-बड़ी बातें कही जाएं, वह अगर हमारे पूरे कार्य व्यवहार में कहीं न हो, उस लक्ष्य को हम भूल जाएं तो फिर क्या होगा? सच पूछें तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जिसे भारतीयता का पता ही नहीं है आर इसके लिए वह पीढ़ी दोषी नहीं है, दोषी हम हैं, क्योंकि हम उन्हें ऐसे ही संस्कार, ऐसी ही शिक्षा दे रहे हैं, जो नकल को प्रधाानता देती है। हम आधुनिकता के नाम पर दूसरे देशों और उनकी सभ्यता की नकल करने लगे हैं और अपनी जड़ों से, अपनी जमीन से, अपनी संस्कृति से अलग होने लगे हैं, जो समाज, जो देश अपनी जड़ों, अपनी जमीन और संस्कृति से अलग हो जाएगा, वह धीरे-धीरे क्षरित होने लगेगा। यही भय मेरे मन मस्तिष्क पर आतंक बनकर छाया रहता है। मुझे लगता है कि यह स्थिति लेने के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। इस तरह हम अपने आप को दुनिया का द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना रहे हैं। पहले तो यह अंग्रेजों की गुलामी के कारण हुआ किन्तु आज यह गुलामी हम अपने आप पर थोप रहे हैं। इस कारण हम भ्रमित हो गए हैं। हम भारतीयता को हिन्दुत्व को सम्प्रदायों में बांटकर धर्मनिरपेक्षता की बात करने लगे हैं। मेरे विचार में साम्प्रदायिकता बहुत अच्छी चीज है और बहुत बुरी चीज भी है। हमारे यहां सम्प्रदाय का अर्थ यह है कि अलग-अलग प्रकार हैं, अलग-अलग पंथ है, जिनको भारत स्वीकार करता है। अलग-अलग पंथों को स्वीकार करना या न करना ठीक है किन्तु राज्य किसी भी पंथ का नहीं है। इसी संदर्भ में यह कहना होगा कि हमने पंथनिरपेक्ष कहने की बजाय 'धर्मनिरपेक्ष' कहना शुरू कर दिया है और जो राज्य, जो समाज, धर्म से निरपेक्ष हो जाता है उसका तो कोई भविष्य ही नहीं है। धर्म का अर्थ है कर्तव्य, धर्म का अर्थ है सौहार्द्र। अब यदि हम अपने कर्तव्य से निरपेक्ष हो गए तो समाज का क्या होगा।



यदि किसी एक शब्द को देश निकाला दिया जाए तो मैं इस 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को देश निकाला देना चाहूंगा। मुझे तो इस शब्द के लिए लड़ना पड़ा है। मैंने श्रीमती गांधी से कहा भी था कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष का अनुवाद 'सेकुलर' किया गया है, जो स्वीकार करने योग्य नहीं है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। अब हमारे संविधान का जो अधिकृत अनुवाद है उसमें 'सेकुलर' के लिए पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।

यदि किसी एक शब्द को देश निकाला दिया जाए तो मैं इस 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को देश निकाला देना चाहूंगा। मुझे तो इस शब्द के लिए लड़ना पड़ा है। मैंने श्रीमती गांधी से कहा भी था कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष का अनुवाद 'सेकुलर' किया गया है, जो स्वीकार करने योग्य नहीं है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। अब हमारे संविधान का जो अधिकृत अनुवाद है उसमें 'सेकुलर' के लिए पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।

हिन्दू होना सम्प्रदायवादी होना कतई नहीं है। मुसलमान होना संप्रदायवादी होना नहीं है। किसी भी मत-पंथ का होना संप्रदायवादी होना नहीं है किन्तु अगर हम उसमें कट्टर होकर अन्यों के प्रति विद्वेषी हो जाएं तो वह गलत है। भारत वर्ष की सभ्यता कट्टरपन नहीं सिखाती। हिन्दू धार्म की परम्परा का आधार सहिष्णुता है। कट्टर होना सम्प्रदायवाद हो सकता है किन्तु अगर हम अपनी अस्मिता को मानते हैं और अलग-अलग उन पंथों को जानते हैं, जो हमारे देश को बनाते है तो वह इन्द्रधनुषी छटा है। हमारा देश एक इन्द्रधनुष है, उस इन्द्रधनुष की संभावना इसीलिए हुई कि भारत वर्ष में सदैव सहिष्णुता का साम्राज्य रहा। भौगोलिक अखंडता हमारा नागरिक कर्तव्य है और वह हमारी संस्कृति और राजनीति से अलग नहीं है किन्तु उससे भी कहीं परे, उससे भी कहीं अधिक एक अपेक्षित है राष्ट्रीयता से ओतप्रोत एक दृष्टि! राष्ट्रीयता से ओतप्रोत दृष्टि का अर्थ है भारत के लाखों-करोड़ों लोगों में अंतर्निहित, अंतर्भूत सम्बंध, उनके प्रति प्रतिबद्वता, उनके प्रति सेवा की भावना-सम्पर्क, सहयोग और संस्कार ये चारों हमारी संस्कृति के मूल मंत्र हैं। इस मूल मंत्र को मानते हुए अगर हम राष्ट्रीय जीवन का निर्माण करें और राष्ट्र के प्रति भक्ति, राष्ट्र के प्रति निष्ठा, श्रद्वा को लेकर चलें, तो हमारे राष्ट्रीय जीवन में एक नया अध्‍याय निश्चित रूप से शुरू हो सकता है। मुझे आशा है कि यह होगा। लेकिन यह तभी होगा जब हम इसके लिये प्रयत्न करें।

आज कई तरह के खतरे हमारे ऊपर मंडरा रहे हैं। ये खतरे बौध्दिक भी हैं और सांस्कृतिक भी। सांस्कृतिक खतरा कोई भौगोलिक खतरे से कम नहीं होता। भाषा का लुप्त हो जाना कोई कम खतरा नहीं है। अपने पंथों अथवा संप्रदायों की जानकारी न होना भी एक खतरा है। अपनी मान्यताओं के लिये निष्ठा न होना और भी बड़ा खतरा है। ये सब खतरे भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जिस देश को नष्ट करना हो, उसकी संस्कृति नष्ट कर दीजिये, उसकी भाषा नष्ट कर दीजिये, अपने आप वह समाज और जाति नष्ट हो जायेगी। हममें इतनी सामर्थ्य तो है कि हम इन खतरों का सामना कर सकें किन्तु इसके लिये इच्छाशक्ति होनी चाहिए, संकल्प होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने भी यही कहा था कि हमारे यहां सामर्थ्य की कमी नहीं है। संभावनाओं की हमारे यहां कमी नहीं है। कमी है संकल्प की, कमी है समर्पण की। ये सब भावनाएं जगाने के लिये हमें अभियान चलाना होगा। इसके लिये लोगों को तैयार करना होगा। हममें से बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो इस बात को जानते हैं और तरीके से इसे आगे बढ़ा भी रहे हैं। एक-एक दीप से हजारों-लाखों दीप जल जाते हैं और ऐसे दीप जलेंगे इसे कोई रोक नहीं सकता।

भारतवर्ष का भविष्य अभी बनना है और वह भविष्य सांस्कृतिक दृष्टि पर आधारित होगा, भारतीयता पर आधारित होगा। वह सच्चे अर्थों में भारत होगा। संस्कृत में भारत का अर्थ है वह जो ''प्रवाह'' में रत है-प्रवाह के प्रति प्रतिबद्व है, वही भारत है। तो उस दृष्टि से भी हमको भारतवर्ष में अध्‍यात्म और विज्ञान को एक-दूसरे के साथ बांधना होगा, उसे समन्वित करना होगा। हम विज्ञान से अलग नहीं रह सकते। जीवन में जो शक्तियां हैं, उन्हें संकलित करना बहुत आवश्यक है किन्तु संभव नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं है कि हममें प्रतिभा नहीं हैं अथवा सामर्थ्य नहीं है। व्यक्तिगत रूप से भारत वर्ष के लोग बहुत प्रतिभाशाली हैं और बहुत कुछ हासिल करते हैं किन्तु संयुक्त रूप से समुदाय और समूह की दृष्टि से अभी तक भारत के प्रति भक्ति और निष्ठा की भावना न होने के कारण हम कुछ हासिल नहीं कर पा रहे हैं, वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं जहां पहुंचना चाहिए। इन्हें पाने के लिये हमें भारत को पाने का लक्ष्य अपने सामने रखना होगा। इस लक्ष्य को पाने के लिये रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं चाहे वामपंथ हो अथवा दक्षिणपंथ, चाहे मध्‍यपंथ हो, इन सबको अपना केन्द्र भारत ही बनाना होगा। मेरे विचार से तो सबसे पहले इनका भारतीयकरण होना जरूरी है। उनका भारतीयकरण न होने के कारण हमारी अस्मिताएं क्षीण हो रही हैं, हमारा संकल्प क्षीण हो रहा है, हमारी शक्तियां क्षीण हो रही हैं, हमारा आत्मविश्वास कम होता जा रहा है और जहां आत्मविश्वास खत्म हो जाता है, वहां भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। पंथ चाहे कोई भी हो, उनमें मतभेद हो सकते हैं, किन्तु राष्ट्र की दृष्टि से कहीं मतभेद नहीं होना चाहिए।
(लेखक प्रसिध्द चिंतक एवं प्रख्यात संविधानविद् थे)

Wednesday, February 4, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ही देश अक्षुण्ण रहेगा


विष्णुकान्त शास्त्री
मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मैं यह नहीं मानता कि 15 अगस्त, 1947 को भारत एक नया राष्ट्र बन गया। सच तो यह है कि ऐसा मानने वाले बहुत विरले हैं।

प्राचीन भारतवर्ष के इतिहास में मनु, रघु, श्रीराम, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य आदि कुछ ही ऐसे चक्रवर्ती राजा थे जिन्होंने पूरे भारतवर्ष पर शासन किया था। अन्यथा भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग स्वाधीन राज्य थे। हमारा इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न राज्यों में विभक्त होते हुए भी सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा भारतवर्ष एक देश माना जाता था। देश के किसी भी कोने में बैठ कर पुण्य कार्य करने वाला व्यक्ति जल को शुध्द करने के लिए देश के विभिन्न भागों में बहने वाली सात पवित्र नदियों का आह्वान करता था, जो परंपरा आज तक चली आ रही है।कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भी कभी ऐसा नहीं कहा कि 15 अगस्त 1947 को भारत एक नया राष्ट्र बन गया। स्वाधीनता के लिए जिन वीरों ने संघर्ष किया था उनकी आंखों में स्वदेश का एक चित्र था। लोकमान्य तिलक ने जब सिंह गर्जना की थी कि 'स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' तो वे केवल राजनीतिक स्वाधीनता की ही बात नहीं कर रहे थे। अपने 'स्व' का स्पष्टीकरण करने के लिए ही उन्होंने गीता रहस्य की रचना की थी। महात्मा गांधी ने भारतीय स्वराज्य की संज्ञा दी थी 'रामराज्य'।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वाधीनता के बाद 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा था ''हमें अपनी उस विरासत और अपने उन पूर्वजों पर गर्व है जिन्होंने भारत को बौध्दिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठता प्रदान की। आप इस अतीत के बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको भी यह महसूस होता है कि आप भी इसके साझीदार और उत्तराधिकारी हैं? क्या आप भी उस पर गौरवान्वित होते हैं, जो आपका भी उतना ही है जितना मेरा अथवा आप उसे अपना ही समझते हैं?'' उनको स्पष्ट अपेक्षा थी कि उन सब विद्यार्थियों को भी प्राचीन भारत की उपलब्धियों के लिए गौरव का अनुभव करना चाहिए। इस निरूपण से यह साफ हो जाता है कि स्वाधीन भारत प्राचीन भारत का ही विकसित आधुनिक रूप है।

मैं समझता हूं कि अपने राष्ट्रवाद को परिभाषित करने के पहले हमें अपने पारम्परिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। हमें उस स्वरूप को हृदयंगम करना चाहिए जो परिस्थितियों के दबाव में रूपत: बाहर से तो बदलता रहता है किन्तु भीतर से अपरिवर्तित रहा है। हम परम्परा के आधारभूत चिंतन मनन और जीवन में उसके प्रतिफलन को समझने की चेष्टा करें।

राजधर्म और राजनीति
महाभारत में कहा गया है कि धारण करने की शक्ति के कारण धर्म, धर्म होता है। धर्म वही है जो प्रजा धारण करे। अत: निश्चित सिध्दांत यही है कि जो धारण शक्ति से संयुक्त है वही धर्म है। यहीं कुछ चर्चा संस्कृति की भी कर ली जाये। संस्कृति अर्थात् 'सम्यक कृति'। इससे यह ध्‍वनि निकलती है कि जो कृति को सम्यक रूप से सुधार दे वह संस्कृति है। कुछ लोग कहते हैं कि संस्कृति शब्द कल्चर का अनुवाद है। यह ठीक नहीं है। हम जो कुछ करते हैं, जिस प्रकार का वैयक्तिक, पारिवारिक या सामाजिक जीवन जीते हैं, उसको निरन्तर सुधारते रहने की प्रक्रिया ही संस्कृति है।

अपनी संस्कृति की एक आधारभूत विशेषता की ओर आप लोगों का ध्‍यान आकृष्ट करना चाहता हूं। सभी जानते हैं कि अपने अपने उपास्य की उत्कृष्टता सिध्द करने के हठाग्रह के कारण धार्मिक विद्वेष उत्पन्न होता है। भारतीय संस्कृति ने इस विकृति के निराकरण के लिए एक अद्भुत स्थापना की है। ऋग्वेद में कहा गया है कि 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात परमसत्ता एक ही है जिसे विद्वान विविधा नामों से पुकारते हैं। अत: इनके लिए विवाद करना व्यर्थ है।

इस मान्यता के कारण भारत में बड़ी हद तक साम्प्रदायिक समरसता बनी रही। सम्राट हर्षवर्धन, शिव, सूर्य और बुध्द तीनों की उपासना करते थे। एक ही परिवार के भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न इष्ट देवों की पूजा करते हुए प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते हैं। आचार्य विनोबा भावे ने इसे भारतीय संस्कृति का भेदक लक्षण घोषित करते हुए इसको 'भी वाद' की संज्ञा दी हैं। इसका अर्थ हुआ कि यदि हम सब श्रध्दापूर्वक चल रहे हैं तो भगवान तक मेरा रास्ता भी पहुंचेगा और तुम्हारा तथा उसका रास्ता भी पहुंचेगा। यह 'भी वाद' यदि सभी धर्मावलंबियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए तो धार्मिक संघर्ष का मूलोच्छेद हो जाए। परन्तु अभी इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि विनोबा भावे के अनुसार यहूदी, ईसाई और इस्लाम 'ही वाद' धर्म हैं। यह भी यहां जोड़ दूं कि बाबा विनोबा भावे के अनुसार मार्क्‍सवादी भी 'ही वादी' ही हैं। वे भी सबों पर अपना सिध्दांत थोपने के हठाग्रही हैं।

समग्र मानव जीवन के मंगल का विधान करने वाली हमारी सांस्कृतिक चेतना ने जिस भारतीय समाज और राष्ट्र का निर्माण किया उनमें राजनीति की भूमिका को महत्वपूर्ण तो माना गया है किन्तु उसे सर्वोपरि नहीं माना गया है। धर्मधिष्ठित राजनीति का ही हमारे देश में सम्मान था। भारतीय चेतना ने आदर्श शासक के रूप में श्रीराम को ही स्वीकार किया है, जिनकी प्रशस्ति में कहा गया है, 'रामो विग्रहवान धर्म:' राम तो मूर्तिमान धर्म ही है।

राजनीति कभी सत्यमयी, कभी मिथ्यामयी, कभी कठोर, कभी प्रियभाषिणी, कभी हिंसामयी, कभी दयालु, कभी लोभी, कभी उदार, कभी अत्यंत खर्चीली, कभी अत्याधिक अर्जनशील होती है। राजनीति वस्तुत: कल्याणकारी तभी होती है जब वह सच्चे राजधर्म पर आधारित होती है, जिसका एक प्रधान लक्षण यह है कि राजा पार्थिव व्रत का निर्वाह करे अर्थात् उसी प्रकार बिना किसी भेदभाव के सारी प्रजा का समानभाव से पालन करे जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को समान भाव से धारण करती है। इससे यह स्पष्ट है कि भारतीय धर्म व राज्य को मजहबी राज्य या थियोक्रेटिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें जाति, भाषा, उपासना पध्दति आदि के आधार पर जनता में भेदभाव नहीं किया जाता था।

संस्कृतिपरक भारतीय राष्ट्रवाद
यह तथ्य भी उल्लेख्य है कि प्राचीन भारतवर्ष के इतिहास में मनु, रघु, श्रीराम, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य आदि कुछ ही ऐसे चक्रवर्ती राजा थे जिन्होंने पूरे भारतवर्ष पर शासन किया था। अन्यथा भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग स्वाधीन राज्य थे। हमारा इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न राज्यों में विभक्त होते हुए भी सांस्कृतिक दृष्टि से पूरा भारतवर्ष एक देश माना जाता था। देश के किसी भी कोने में बैठ कर पुण्य कार्य करने वाला व्यक्ति जल को शुध्द करने के लिए देश के विभिन्न भागों में बहने वाली सात पवित्र नदियों का आह्वान करता था, जो परंपरा आज तक चली आ रही है।

यह ठीक है कि राजनीति को कम महत्व देने का दंड भी हम लोगों को भोगना पड़ा है। जब विदेशी शक्तियां राज्यों पर आक्रमण करती थीं तो देश भर के सभी राज्य मिल कर उनका प्रतिरोध नहीं करते थे। फलत: एक-एक करके वे राज्य विपन्न होते रहे और हमें पराधीनता का अभिशाप भोगना पड़ा। अब हम इस ओर भी सावधान रह कर अपने को राजनीतिक दृष्टि से भी अजेय बनायें, यही अभीष्ट है। जो हो, अपने विचारक्रम को ऐतिहासिक दृष्टि से आगे बढ़ाने पर यह लक्षित किया जा सकता है कि जब तुर्क आये, पठान आये, मुगल आये और केन्द्रीय राज्य क्षमता छिन गयी, तब भी हमारी संस्कृति ने ही सारे देश को एक मानने की दृष्टि को अक्षुण्ण रखा।

यह दिवालोक की भांति स्पष्ट है कि धार्मिक कट्टरता को लांघ कर साधाना और साहित्य के क्षेत्र में पठान-मुगल काल में ही भारतीय संस्कृति की उदारता को मुसलमान भाई अपना रहे थे। दाराशिकोह द्वारा उपनिषदों का फारसी अनुवाद करवाना भी इसी धारा की कड़ी है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि औरंगजेब की मजहबी कट्टरता ने इस धारा को अवरूध्द करना चाहा पर फिर भी मंदगति से ही सही वह धारा प्रवाहित होती रही। संत प्राणनाथजी ने समन्वय की दृष्टि से औरंगजेब को पत्र भी लिखा और अपने सम्प्रदाय में श्रीकृष्ण के निराकार रूप की उपासना का प्रवर्तन किया। संगीत, चित्रकला एवं नृत्य के क्षेत्र में भी आदान प्रदान चलता रहा। यह उदार समन्वयी धारा निश्चय ही भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

1857 में अंग्रेजों के विरूध्द छेड़े गये प्रथम स्वाधीनता संग्राम के पूर्व जनसंघर्ष की चेतना जगाने के लिए रोटी के साथ-साथ कमल को प्रतीक के रूप में चुनना, हमारी सांस्कृतिक चेतना के कारण ही संभव हो सका था। इस संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजी राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए लड़े थे। दुर्भाग्य से इस स्वातंत्र्य समर के विफल होने के बाद जनता में व्यापक हताशा फैल गयी। राष्ट्र को इस हताशा से उबारने के लिए पुन: एक बार हमारी सांस्कृतिक चेतना ही सक्रिय हुई। राजा राम मोहन राय, श्री रामकृष्ण परमहंस देव, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्री अरविन्द, स्वामी रामतीर्थ आदि महापुरूषों ने भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल पक्षों को उभार कर और विकृतियों को नकार कर पुन: देश में नवजीवन का संचार किया। इस सांस्कृतिक जागरण का एक सुफल यह भी हुआ कि पाश्चात्य ज्ञान-विभान और जीवन मूल्यों के अंधानुकरण के अतिरेकों से मुक्त होकर भारतीय प्रबुध्द चित्र ने भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान आदि के स्वस्थ समन्वय पर बल दिया। इस सांस्कृतिक जागरण की फलश्रुति ही थे भारतीय स्वाधीनता के सहिंस और अहिंसा आन्दोलन। आरंभ में इन आन्दोलनों को सभी भारतीयों का समर्थन प्राप्त था। किन्तु कालान्तर में अंग्रेजों की कूटनीति के कारण कट्टरपंथी मुसलमान इनसे कटते गये। दुर्भाग्य की बात है कि ''सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'' लिखने वाले अल्लामा इकबाल ने पाकिस्तान का बीजारोपण किया और एक समय के हिन्दू मुस्लिम एकता के समर्थक, नरमपंथी नेता कायदे आजम जिन्ना अंग्रेजों की कूटनीति को सफल करते हुए पाकिस्तान के जनक बने। मजहब के आधार पर जिस पाकिस्तान की सृष्टि हुई थी वह 1971 में टूट गया। स्वाधीन बांग्लादेश इस बात का प्रमाण है कि मजहब के नाम पर बने पाकिस्तान की नींव कितनी खोखली थी। बचे-खुचे पाकिस्तान में भी पंजाबी, सिंधी, बलूची, पख्तून, मुहाजिर के भेद उग्र होते जा रहे हैं। मुहाजिरों के नेता अल्ताफ हुसैन ने तो साफ-साफ कह दिया है कि पाकिस्तान का निर्माण ऐतिहासिक भूल थी। इसलिए उसने ''सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'' फिर से गाना शुरू कर दिया है।

इससे यही शिक्षा लेनी चाहिए कि उपासना पध्दति एवं सामाजिक रीति-नीति की भिन्नताओं के बावजूद साझी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को हम लोग और दृढ़ करें।

भारत में बड़ी हद तक साम्प्रदायिक समरसता बनी रही। सम्राट हर्षवर्धन, शिव, सूर्य और बुध्द तीनों की उपासना करते थे। एक ही परिवार के भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न इष्ट देवों की पूजा करते हुए प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते हैं। आचार्य विनोबा भावे ने इसे भारतीय संस्कृति का भेदक लक्षण घोषित करते हुए इसको 'भी वाद' की संज्ञा दी हैं। इसका अर्थ हुआ कि यदि हम सब श्रध्दापूर्वक चल रहे हैं तो भगवान तक मेरा रास्ता भी पहुंचेगा और तुम्हारा तथा उसका रास्ता भी पहुंचेगा। यह 'भी वाद' यदि सभी धर्मावलंबियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए तो धार्मिक संघर्ष का मूलोच्छेद हो जाए। परन्तु अभी इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि विनोबा भावे के अनुसार यहूदी, ईसाई और इस्लाम 'ही वाद' धर्म हैं। यह भी यहां जोड़ दूं कि बाबा विनोबा भावे के अनुसार मार्क्‍सवादी भी 'ही वादी' ही हैं। वे भी सबों पर अपना सिध्दांत थोपने के हठाग्रही हैं।मध्‍ययुग में राजनीति की उपेक्षा करने का भरपूर दण्ड हम लोग भोग चुके हैं अत: अब राजनीतिक आवश्यकताओं के प्रति भी पूर्णत: सजग रहना होगा। खासकर इस बात का ध्‍यान रखना होगा कि देश में बलिष्ठ राज्यों के साथ-साथ केन्द्र भी भरपूर बलिष्ठ हो जिससे हमारी सीमाओं पर कारगिल के सदृश अनुप्रवेश करने का दुस्साहस करने वालों को उचित सबक सिखाया ज

एकात्म भारतीय संस्कृति
संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसकी संस्कृति ने दूसरे देशों की संस्कृतियों से आदान-प्रदान न किया हो। आधुनिक युग में यह प्रक्रिया और भी तेज हो गयी है। फिर भी दुनिया का कोई दूसरा देश ऐसा नहीं है जो अपनी संस्कृति को सामासिक संस्कृति कहता हो। अत: हमें अकुंठ चित्त से अपने देश की संस्कृति को सीधे भारतीय संस्कृति ही कहना चाहिए।

(एकात्म मानववाद अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा आयोजित सेमिनार में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री द्वारा दिए गए भाषण से संकलित है।)

Tuesday, February 3, 2009

राष्ट्र को जोड़ने का मंत्र है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


राजनाथ सिंह
इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता कि भारत एक राष्ट्र के रूप में सदियों पहले विकसित हुआ था। प्राचीन काल में भारत की एक राष्ट्र के रूप में मान्यता थी। 'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।मध्‍यकाल में भी भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान बनी रही। परन्तु अंग्रेजों ने यहां आने के बाद भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान को धुंधला करने का प्रयास किया। उनके इतिहासकारों ने कहा ''भारत एक राष्ट्र कभी नहीं था। अंग्रेजों के आने के पश्चात् वह एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है। अंग्रेजों द्वारा दी गयी शिक्षा के प्रभाव में आकर कुछ भारतीयों ने भी यह कहना शुरू किया कि ''भारत देश एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है।''

यहां पर उनसे 'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।

इस राष्ट्रीय भावना का हजारों वर्ष पहले भारत की धरती पर अंकुरण हुआ। भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'। यही कारण था जब भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला तो उन्होंने अयोध्‍या के आसपास के जंगलों में वास करने की अपेक्षा उत्तर से सूदूर दक्षिण तक की यात्रा करके भारत की एकता का संदेश दिया। इसी तरह भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ। उन्होंने अपना राज्य गुजरात में द्वारका में स्थापित किया और महाभारत के युध्द में कुरूक्षेत्र की समरभूमि पर गीता का उपदेश दिया। ऐसे भगवान कृष्ण की रथ यात्रा पूर्व में जगन्नाथ पुरी में होती है और दक्षिण में तिरूमाला की पहाड़ियों पर भगवान व्यंकटेश के रूप में पूजा जाता है।

भगवान राम और कृष्ण इस देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करते हैं और वे हमारी 'राष्ट्रीय' चेतना के दो प्रतीक हैं। इसी तरह भगवान शिव की आराधना दक्षिण में रामेश्वरम् से लेकर उत्तर में काशी तक होती है। पूरे भारत में बनी राष्ट्रीय चेतना की पहचान कर केरल में जन्में जगद्गुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना कर भारतीय राष्ट्रीय चेतना को आकार देने का प्रयास किया। कहने का आशय यह है कि मात्र भगवान श्री श्रीकृष्ण का स्मरण करने से हम अपने आप में पूरे भारत के साथ जुड़ जाते हैं। इसी तरह मर्यादा पुरुषोत्ताम श्री राम का जीवन चरित्र प्रमुखता से उनका 14 वर्षों का वनवास क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक एकता का परिचायक है।

कश्मीर घाटी में श्रीनगर के पास एक मंदिर है जिसे 'शंकराचार्य' के नाम से वहां के लोग जानते हैं। यदि भारत एक सांस्कृतिक इकाई नहीं थी तो शंकराचार्य को केरल से आगे निकल कर कश्मीर घाटी तक जाने की क्या आवश्यकता थी? कारण स्पष्ट है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक उन्हें एक ही चेतना दिखाई पड़ी जिसे हम भारतीयता, राष्ट्रीयता या हिन्दुत्व कोई भी नाम दे सकते हैं।

भारत की धमनियों में एक अदृश्य चेतना बहती है और वह चेतना इतनी प्रेरक है कि जहां बड़े से बड़ा व्यक्ति भी लाख प्रयत्नों और बड़ी विनतियों के बाद कुछ हजारों या अधिक से अधिक कुछ लाख व्यक्तियों को एकत्रित कर पाता है। वहीं दूसरी ओर बिना किसी प्रयास के कुम्भ मेले में करोड़ों लोग भारत के कोन-कोने से पहुंचते थे। कहीं कोई निमंत्रण-पत्र नहीं छपा, कहीं किसी ने हाथ नहीं जोड़े। फिर भी करोड़ों व्यक्तियों का एकत्रीकरण हो गया। यही है भारत के राष्ट्र होने की पहचान और उनकी चेतना। आशय यह है कि भारत ही अकेला राष्ट्र है जो अपनी अमूल्य सनातन सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण ही एकसूत्र में बंधा हुआ है।

इस चेतना को कोई कैसे भुला सकता है, और अपनी जड़ों को काट कर भला कोई समाज कैसे जीवित रह सकता है? भारत की संस्कृति जिन मूल्यों और आदर्शों की वकालत करती है वे दुनिया के ऊंचे मानदण्ड है। पश्चिमी उदाहरण, पश्चिमी सोच और पश्चिमी ढांचे से भारत की भलाई नहीं हो सकती। किसी भी देश के विकास के पीछे जरूरी है वहां की धारती से निकले विचारों पर खड़ा हुआ एक मजबूत ढांचे का अस्तित्तव।

हम भारतीय विचारों और अवधारणाओं के अनुरूप राजनीति करने का प्रयास करते हैं। स्वतंत्र भारत में भाजपा को छोड़कर भारतीय मूल्यों और आदर्शों के उच्च मानदण्डों की राजनीति करने वाला और कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा भारत की मिट्टी से उपजा, भारतीय लोगों द्वारा स्थापित और भारतीय मान्यताओं को मानने वाला दल है।

जबकि प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस का जन्म ही एक विदेशी ए.ओ. ह्यूम के हाथों हुआ था और उसका नेतृत्व फिर विदेशी मूल के हाथों में हैं। रही बात वामपंथी दलों की तो उनके विचार और प्रेरणास्रोत सब आयातित हैं। रूस में बारिश होने पर भारत में छतरी तानने वाले वामपंथी ही यह कहने का दुस्साहस कर सकते हैं कि 'धर्म एक अफीम है।'

दुनिया के बाकी देशों की स्थिति पर विचार करने के बजाय यदि भारत का ही विचार किया जाये तो हम पायेंगे कि 'धर्म गुरु' कहलाने वाले भारत की नस-नस में ही धर्म है। धर्म 'रिलीजन' जैसा संकुचित नहीं है जैसा वामपंथी या अन्य पश्चिमी विचारक समझते हैं। अब भारतीय धर्म और संस्कृति को गाली देने वाले रूस और चीन में तो सुने जा सकते हैं मगर भारत में उनकी दाल नहीं गलने वाली। वामपंथ का सिकुड़ता जनाधार इसी बात का परिचायक है। कांग्रेस के साथ भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि पश्चिमी विचारों को ही वह अपना समझती है और उसी रंग ढंग से ढली है, जबकि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से कहती चली आई है कि हम इस देश के राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों के वाहक हैं। हमारे प्रत्येक नेता और कार्यकर्ता की यही अन्त:प्रेरणा है।

राष्ट्र एक भावात्मक 'स्वरूप' है। रूप नहीं। रूप बाहर-बाहर होता है। स्वरूप आन्तरिक चेतना है। बाहर-बाहर यह देश भूमि, जनता और राज्य व्यवस्था का योग है। लेकिन आन्तरिक रूप में यह एक दिव्य चेतना है। चेतना का यह साक्षात्कार युगों-युगों से सामूहिक चिन्तन का फल है। इसे ही हम भारत में अपनी संस्कृति कहते हैं। यहां जीव, आत्मा, चिति और विराट का साक्षात हुआ है। धर्म यहां बंधनकारी नहीं है। सारे पंथ अनुशासन देते हैं। भारत का धर्म आत्म अनुशासन देता है। यह बांधता नहीं मुक्त करता है। ऋग्वेद से उपनिषद, महाभारत और रामायण तक यही धारा चली। गौतम बुध्द और आदि शंकराचार्य ने अपनी-अपनी बोली सत्य तत्तव ही बताया। पं. दीनदयाल उपाध्‍यायजी ने राजनीति में पहली बार कोई सर्वांगपूर्ण दर्शन को राजनीति का अधिष्ठान बनाया जिसे आगे चलकर उन्होंने एकात्मवाद के रूप में सभी के समक्ष रखा। 'एकात्म मानववाद' पूरी तौर पर भारतीय संस्कृति पर आधारित है। अब हमें यहां संस्कृति को समझना होगा।

संस्कृति का अर्थ होता है सम्यक कृति। सम्पूर्ण जीवन कर्म का सत्य, शिव और सौंदर्य ही हमारी संस्कृति है। प्राचीन परम्परा का 'संस्कार' शब्द ही सामूहिक कर्म के रूप में भारतीय संस्कृति है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रीय जीवन मूल्यों का समुच्चय है। सम्पूर्ण सत्य, सम्पूर्ण शिव और सम्पूर्ण सुन्दर इसमें खिलता हैं। यह वोट की राजनीति का खेल नहीं है। इसमें गांधीवादी समाजवाद शामिल है। इसमें भारत के आदर्श रामराज्य की अवधारणा है। यह मजहबी राज्य की कल्पना से पृथक स्वाभाविक लोकतांत्रिक अवधारणा है। यह किसी के विरूध्द नहीं है। सबके साथ है। सब इसमें समाहित हैं।

कभी-कभी देश और राज्य को राष्ट्र के स्थान पर व्यवहार करते देखा गया है परन्तु यह उचित व्यवहार नहीं है। देश दिशा से आकृत है। वह भौगोलिक सीमाओं से निर्दिष्ट है। राष्ट्र एक भावनात्मक शक्ति है। वो प्रेरणा का स्रोत है और युग-युग से मानव के मर्मस्थल में टिका हुआ है। वह सुप्त होकर भी जागृत हैं। इसका एक ही कारण है कि एक राष्ट्र के हृदय में संस्कृति की अमर आत्मा का निवास है। देश की सीमा घटती-बढ़ती है परन्तु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कभी क्षरण नहीं होता। वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर है और विराट से विराटतर है और जन-जन के जीवन में श्रध्दा और निष्ठा के रूप में सदा सर्वदा वर्तमान है। काल और देश को सीमाएं तो प्रभावित नहीं कर सकती है।

राष्ट्र की पहचान तभी होती है जब इतिहास में कोई सुखदायी या दुखदायी घटना होती है। हल्दीघाटी की लड़ाई हो या प्लासी का युध्द। राष्ट्र को क्या पीड़ा थी और पीड़ा को किसने झेला, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। हल्दीघाटी में आज भी जाने से हम क्या अनुभव करते हैं वह तो वही राष्ट्रभक्त कह सकता है जो इस ऐतिहासिक आघात की सहन पीड़ा को स्वयं पी गया है। घास की रोटियां खानी पड़ी, बच्चे बिलखते रहें, परन्तु उन रोटियों का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा है, उसे मिटाने की शक्ति प्रचण्ड महाकाल में नहीं है। ठीक उसके विपरीत मानसिंह का भी महल है जिसके अपवित्र और अभिशप्त दीवारों की सिसकियों से सारा वातावरण विवादमय बना हुआ है। आप स्वयं समझ सकते हैं कि कौन कार्य राष्ट्रीय है और कौन अराष्ट्रीय है।

भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्शों में से एक है ''एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति'' यानि सत्य तो एक ही परन्तु विद्वान उसे भिन्न-भिन्न तरह से कहते हैं। इसलिए भारतीय विचारों में कभी दुराग्रह नहीं रहा है कि हम ही सही हैं। इस देश में सदियों से माना जाता है कि ''यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे'' अर्थात् जो पिण्ड में है वहीं ब्रह्माण्ड में है, जो आत्मा में है वही परमात्मा में है और जो तेरे में है वहीं मेरे में है। ऐसी है भारत की उदात्त संस्कृति। यही भारतीय संस्कृति आगे बढ़ कर कहती है ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' यानि पूरा विश्व एक परिवार सरीखा है। इसलिए भारत ने कभी भी देशों को जीतने के प्रयास नहीं किये क्योंकि हमारा संदेश विश्व बन्धुत्व का रहा है।

ऐसे उदात्त और ऊंचे आदर्शों से ओत-प्रोत भारतीय संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसे 'संकुचित दृष्टिकोण' कहने का कार्य विरोधी राजनीतिज्ञ करते रहे हैं। इसके पीछे उनके निहित स्वार्थों के साथ उनका संकुचित दृष्टिकोण और तोड़ने वाली राजनीतिक विचारधारा है। यही कारण है जब हम राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विचारधाारा की बात करते हैं तो उन्हें लगता है कि हम जोड़ने के बजाय तोड़ने की बात करते हैं। उन्हें सम्भवत: इसका ज्ञान नहीं है कि संस्कृति का स्वरूप ही 'सम्यक' हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने सच ही लिखा है कि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'। इसलिए भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की बात करने पर वामपंथी को विभाजन दिखाई पड़े तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

राजनीति का स्वरूप जल की भांति होता है जो व्यक्ति या संगठन के अनुरूप ही आकार लेती है। जब भगवान राम ने राजनीति का सहारा लिया तो वह 'भक्ति' हो गयी जब श्रीकृष्ण ने उसे अपनाया तो वह 'युक्ति' हो गयी और जब सुभाष बोस ने उसे अपनाया तो वह 'शक्ति' बन गयी। भारतीय जनता पार्टी पंडित दीन दयाल उपाधयाय के 'एकात्म मानववाद' और भारत की राष्ट्र एवं संस्कृति से ओत-प्रोत विचारों पर आधारित राजनीति का सहारा लेकर उसे 'मुक्ति' का स्वरूप देना चाहती है। जबकि कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीति का स्वरूप 'विपत्ति' और 'सम्पत्ति' से जुड़ा हुआ है।

भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष है और भारत सरकार के कृषि मंत्री रहे हैं)

Monday, February 2, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय'
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम समुन्नत संस्कृतियों में से एक है। इसकी सुदीर्घ परंपरा में अनेक मनीषी विद्वानों, मंत्र द्रष्टा ऋषियों तथा तत्ववेत्ता मुनियों के जीवनानुभवों के शाश्वत निष्कर्षों की संचित निधि जुड़ी है। इसकी वरेण्यता आप्त ऋषियों ने 'सा संस्कृति विश्ववारा' कहकर रेखांकित की है। इसी संस्कृति के आचरित चरित्र ने सर्व मानवों को प्रशिक्षित कर संस्कारित किया है। प्रमाण में यह श्लोक उध्दृत कर सकते हैं-

एतद्येश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना,
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।

संस्कृति सभ्यता नहीं है। सभ्यता जहां आचरण का बाह्य पक्ष है, वहां संस्कृति जीवन का आंतरिक सौन्दर्य है। जीवन जीने की दृष्टि है। शाश्वत मूल्यों की मंजूषा है। औदात्य की प्रतिष्ठा है। पवित्रता की लेखनी से लिखा जागतिक कर्मों का पावन संविधान है। उच्चासन पर विराजमान सारस्वत मूर्ति संतों का संभाषण है। अभ्युदय का विज्ञान तथा नि:श्रेयस का ज्ञान है। नैर्ष्कम्य का उपनिषद तथा जीवन मुक्ति का आरण्यक है। माधुर्य की भागवत ही नहीं, कर्म की गीता भी है। जीवन का सत ही नहीं, सृष्टि का ऋण भी है। सुख का श्वास ही नहीं, सिध्दि का विन्यास भी है। नवजागरण का शंखनाद ही नहीं, प्रगति एवं समृध्दि का पांचजन्य भी है। अत: गुणात्मक है। सर्व श्रध्देय है। इसके विपरीत सभ्यता सभाओं में बैठने की शिष्टता का मानदंड भर है। सृष्टि व्यवहार का औचित्य है। संस्कृति जहां आध्यात्मिक मूल्य है, वहां सभ्यता विज्ञानात्मक संचेतना है। संस्कृति जहां शाश्वत सत्यों को सहेजे है, वहां सभ्यता यांत्रिक परिणामात्मक उपयोगी सत्यों को सहेजे है। दोनों के वैभिन्य के बीच अंतर्बाह्यता की तथा आध्यात्मिक एवं भौतिकता की अति सूक्ष्म झीनी-सी पारदर्शी पट्टिका है, जिसे सरलता से पृथक करना कठिन है।

जब हम राष्ट्र के आगे सांस्कृतिक शब्द का प्रयोग करते हैं, तब तत्काल हमारा ध्यान, राष्ट्र जनों के उन जीवन-मूल्यों की ओर जाता है जो शाश्वत ही नहीं, राष्ट्र जीवन को अहम् से वयम् की ओर तथा सयम् से ओम तत्सत् की ओर ले जाने वाले हैं। राष्ट्र जीवन को पूर्ण एवं सार्थक बनाने वाले हैं। राष्ट्रजनों की अंतश्चेतना को विकसित एवं सृदृढ़ बनानेवाले हैं। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था जनित निष्ठा ही राष्ट्रजनों को राष्ट्रीय बनाती है। इस तरह राष्ट्रीयता का मूल स्वरूप राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। निश्चित भू भाग तथा निश्चित निष्ठावान जन तो भौतिक उपकरण हैं। संस्कृति ही आध्यात्मिक, गुणात्मक तथा शाश्वत जीवन-मूल्य है, जिनका अनुसरण करती प्रजा उसे राष्ट्र का रूप प्रदान करती है। मातृभूमि के प्रति भक्ति तथा जन के प्रति आत्मीयता का भाव सांस्कृतिक मूल्य हैं। यही तीनों मिलकर राष्ट्र को राष्ट्र बनाती हैं। राष्ट्र किन्हीं संप्रदायों तथा जन-समूहों का समुच्चय न होकर, एक जीवमान इकाई है। ऐसे राष्ट्र पुरूष का सजीव व्यक्तित्व है, जिसमें भूमि, जन एवं संस्कृति की जीवंत एकता का सतत निवास वर्तमान रहता है। दशम मंडल में ऋग्वेद के ऋषि से शिष्य पूछता है कि राष्ट्र पुरूष के जो विविध रूप दिए गए हैं वे कितने प्रकार से व्यकल्पित किए जा सकते हैं? मंत्र है-

यत् पुरूषं व्यवर्धु: कति धा व्यकल्पन्
मुखं किमस्य कौ बाहु का ऊरू पादा उच्यते? 10-8-11
तब ऋग्वेद का ऋषि उत्तार देता है-
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:
उरू तदस्य यद्वैश्य पद्मयां शूद्रो अजायत्। (10-9-92)

अर्थात् राष्ट्र पुरूष का मुख ब्राह्मण, बाहु राजन्य, उरू वैश्य तथा पादशूद्र है। चारों वर्णों के संघात से ही राष्ट्र प्रमुख का निर्माण होता है। इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध ही होगा। कर्म निष्ठा ही चारों के लिए मुक्ति प्रदाता बनती है। इस मंत्र के आशय को इस प्रकार भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि समाज जीवन में चार प्रकार की मनुष्य प्रवृत्तिायां कार्यरत हैं, बुध्दि, सूक्ति, अर्थ तथा श्रम शक्ति। बुध्दि ज्ञान का पथ प्रशस्त करती है। शक्ति सीमाओं की रक्षा करती है आंतरिक अराजकता का शमन करती है। अर्थ औद्यौगिक एवं व्यापारिक विकास का हेतु है तथा श्रम विकास की योजनाओं की सम्पूर्ति का एकमेव साधन है।

स्वीकृत सांस्कृतिक जीवन दृष्टि ही एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से पृथक करती है। प्रत्येक राष्ट्र उसकी स्वीकृत जीवन दृष्टि से ही पहिचाना जाता है। पृथकता की यह स्वीकृति तथा इसका सैध्दांतिक पक्ष ही राष्ट्रवाद को जन्म देता है। कोई भी विचार तभी वाद का रूप लेता है जब उसके आचरण कर्ता उस विचार को जीवन का एक अंग बना लेते हैं। राष्ट्र को सामने रखकर जब कोई सिध्दांत या चिंतन निरूपित होता है, तब वह विचार राष्ट्रवाद के नाम से अभिहित किया जाता है। राष्ट्रवादी हर कार्य को राष्ट्र की तात्कालिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित एवं व्यवहारित करता है। फिर चाहे वह प्रश्न राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा का हो या जन के मौलिक अधिकारों की संरक्षा का या संस्कृति की गरिमापूर्ण मर्यादा को सुरक्षित रखने का। राष्ट्रवादी पहले अपने राष्ट्र का हित देखता है। उसके पश्चात् ही नीति निर्धारित करता है तथा आवश्यक संरक्षात्मक कदम उठाता है।

यहां यह प्रश्न उपस्थित हो आना स्वाभाविक है। जब राष्ट्र की परिभाषा में संस्कृति शब्द समाहित है तब राष्ट्रवाद के आगे अतिरिक्त सांस्कृतिक शब्द लगाने की क्यों आवश्यकता पड़ी। सच में यह एक गंभीर प्रश्न है तथा गहराई से विवेचन की अपेक्षा रखता है। संस्कृत शब्द में 'ठक्' प्रत्यय लगकर 'कितिच' सूत्रानुसार सांस्कृतिक शब्द बनता है। इसे हम संस्कृति का भाववाचीकरण कह सकते हैं। सांस्कृतिक शब्द अपनी परिधि की व्यापकता में संस्कृति के सभी उपादानों एवं उपकरणों को समेटे होता है। हम जानते हैं संस्कृति शब्द 'कृ' धातु से 'सम' उपसर्ग पूर्वक 'सुट्' आगम करके 'क्तिन' प्रत्यय के योग से निष्पन्न है। 'सम' उपसर्ग जहां भी जुड़ता है वह वहां संस्कारित अथवा सुन्दरीकृत का अर्थ देता है। 'सम' के सभी अर्थ पश्चात्वर्ती शब्द को विशेषित करते हैं। विद्वान उसके दो ही अर्थ मुख्य रूप से ग्रहण करते हैं। एक तो संस्कारित सम्यक कृति और दूसरा संभूय कृति के रूप में। संघश: कृति सम्भूय कृति कहलाती है। इस तरह संस्कृति संस्कार युक्त सम्भूय कृति है। संस्कार, सामाजिक विद्रूपताओं के साथ मनीषियों के बौध्दिक संघर्ष का सुपरिणाम है। मनुष्य उन पर विजय के पश्चात जिन तात्विक एवं सात्विक निष्कर्षों पर पहुंचता है, वे निष्कर्ष ही शनै:-शनै: संस्कृति बनते चलते हैं। मानवीय जीवन मूल्य बन जाते हैं। कह सकते हैं मानव के जीवनानुभवों का नवनीत ही संस्कृति है। समाज से संघर्ष का क्रम निरंतर बना ही रहता है। इस कारण संस्कृति में नैरंतर्य बना रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित रहेगा कि संस्कृति की स्वीकृत जीवन-दृष्टि में कहीं कोई बदलाव नहीं आता। ऐसे निष्कर्ष संस्कृति के आचरण पक्ष के उपादानों एवं उपकरणों में अभिवृध्दि ही करते हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सांसकृतिक परंपरा के शाश्वत मूल्यों से जब तक जुड़ा चलता है, तब तक वह जीवंत एवं समुन्नत बना रहता है। स्खलन उसकी गरिमा तथा प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाता है। मर्यादाओं को नष्ट ही नहीं करता, उपेक्षा तथा तिरस्कार का भाव जगा, परिणामगत दुर्बलताओं को स्वीकारने में भी संकोच नहीं करता। हम जानते हैं सांस्कृतिक स्खलन के कारण ही विश्व के अनेक राष्ट्र मिट गये। इकबाल ने कहा भी है-

यूनान मिश्र रोमां सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाकी नामोनिशा हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।

यह जो 'कुछ बात है' यह हमारी सांस्कृतिक निष्ठा ही है। अपनी सनातन संस्कृति के साथ अटूट जुड़ाव ही है। इसी से अनेकों झंझावातों के बीच भारत-तरणी विपत्तिा समुद्र को पार करने में सक्षम एवं समर्थ सिध्द हुई है। इसकी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय जीवन का अपनी मूल्यवान आध्यात्मिक संस्कृति को जड़ से दृढ़ता से पकड़े रहना ही है। इसी सत्य को बार-बार उजागर करने के हेतु से मनीषियों को राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जोड़ने की आवश्यकता अनुभव हुई है। एक और भी कारण हो सकता है। जब राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जुड़ जाता है तब वह सोच का एकमेव सांस्कृतिक अधिष्ठान भी निर्धारित कर देता है। तब मनीषि, जीवन के समस्त व्यवहारों में संस्कृति को सामने रखकर ही नीति निर्धारित नही ंकरते, आचरण तक भी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही तय करते हैं। तब लक्ष्य का ही नहीं, साधनों की पवित्रता का भाव भी सामने रहता है। इसी कारण तो महाभारत में धर्मराज का यह कथन 'अश्वत्थामा हतौ नरो वा कुंजरौ' कभी अभिशंसित नहीं हुआ। यह किसी अपवाद को सहन नहीं करता। तीसरा कारण यह भी हो सकता है राष्ट्र के उपादान तत्व भू और जन के साथ संस्कृति अपनी पृथक सत्ताा के साथ अलग विचार की अपेक्षा रखती है। जब सांस्कृतिक शब्द राष्ट्रवाद के आगे जुड़ जाता है तब किसी अवमूल्यन, किसी गिरावट अथवा किसी अपवाद के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहता। तब राष्ट्र हित चिंतन की एकमात्र कसौटी सांस्कृतिक बोध ही रह जाती है। राष्ट्रवाद की अवधारणा का एक मात्र निकष सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अवस्थित विचार ही रह जाता है। इस तरह यह जोड़ निरर्थक नहीं सार्थक ही कहा जाएगा। इसका परिणामात्मक लाभ भी राष्ट्र को मिला है। इसी बल पर आज भारत विपत्तियों की भारी चट्टानों के बोझ को शीश से उतार फेंकने में, पराधीनता की बेड़ियों को काटने में, धर्मांधता की आंधी को रोकने में तथा मतांतरण के षडयंत्रों को उध्वस्त करने में पूरी तरह सफल हो, विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आने का व्यग्र खड़ा है।

इसी संदर्भ में एक और प्रश्न अंतर्राष्ट्रीयतावादियों ने उठा, राष्ट्रवाद के आगे प्रश्नवाचक लगाने का दुस्साहस किया है। अंतर्राष्ट्रीयतावादी तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी राष्ट्रवाद का नाम सुनते ही नाक भौंह सिकोड़ते हुए कानों में अंगुलियां नहीं, शीशा डाल लेते हैं। मानों राष्ट्रवाद का शब्द प्रयोग, कोई एक बड़ा अपराध हो। ऐसा सोचने वाले स्वयं वर्गवादी हैं। 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' यह कहने वाले स्वयं द्वैतवादी हैं। जो श्रमिक नहीं हैं उन्हें वे शोषक की संज्ञा देते हुए शत्रुवत मान, उनके विनाश तक की भयंकर कामना लिए होते हैं। समाज तक से उनका बहिष्कार तथा तिरस्कार का भाव लिए होते हैं। जबकि राष्ट्रवादी सोच वाला मानव मात्र के हित को अपने राष्ट्र हित से पृथक नहीं मानता। वे भूल जाते हैं, राष्ट्रवादी भारत के मंत्र द्रष्टा ऋषियों ने ही गाया है 'माता भूमि पुत्रोहम् पृथिव्या:। इन्होंने ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' जैसे विश्वात्मक वैश्विक मंत्र दिए हैं। इन मंत्रों की पृष्ठभूमि में वही भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा कार्यरत है जिसका अधिष्ठान अध्यात्म है। सारी सृष्टि एक ही चेतन सत्ताा का विस्तार है। कहीं कोई भेद नहीं है। कोई द्वैत नहीं है। यह अभेदात्मक अद्वैत दृष्टि ही उपर्युक्त वैश्विक सोच की नींव में है। दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने वाले रूस और चीन आज भी अलग-अलग राष्ट्र हैं। ये बहुत समय तक सीमा संघर्ष में उलझे भी रहे हैं। इनने अपनी प्रादेशिकता का त्याग कब किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को ही लें। यह राष्ट्रों का संघ है। राष्ट्रों की सापेक्षता स्वीकार कर चला है। अपने को अंतर्राष्ट्रीय कहने वाले भूल जाते हैं कि इस शब्द प्रयोग में ही राष्ट्रों की उपस्थिति अनिवार्य है। सारा विश्व राष्ट्रों में बंटा है। हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति है। हर राष्ट्र की अपनी भाषा है। जिन राष्ट्रों ने परकीय भाषा एवं संस्कृति अपना रखी है, वे पूर्व में उस राष्ट्र के प्रमुख में पराधीन रह चुके हैं वे राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होकर भी सांस्कृतिक एवं भाषाई दृष्टि से आज भी पराधीन ही हैं। जिन राष्ट्रों की अपनी भाषा संस्कृति नहीं होती निश्चय ही वे राष्ट्र कहलाने के योग्य पात्र नहीं है।

कई राष्ट्रों की संस्कृति को संप्रदायों ने संकुचित कर कट्टरतावादी रूप दे दिया है। कट्टरता ने गर्हित हिंसा तक के सामने अपना घृणित एवं गर्हित चेहरा उजागर कर दिया है। इससे उनका घृणा भरा आत्मघाती रूप सामने आया है। इससे मानवता का उदारचरित प्रभावित हुआ है। आज सांप्रदायिक कट्टरता ने आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर, जन जीवन को भयाक्रांत कर दिया है। सांप्रदायिकता तब और भयावह हो जाती है जब वह अपने चिंतन को ही अंतिम मान कर चलती है। तब वह दूसरों के प्रति कहर ढाने लगती है। विष विमन करती हुई दूसरे राष्ट्रों को खंडित तक करने को तुल जाती है। आज इस सांप्रदायिक कट्टरता की आग से विश्व का कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं बचा है। सांप्रदायिक कट्टरता धर्म के उदार चरित्र को भूल आज रक्त से सड़कें रंगने में लगी है। यह संस्कृति नहीं, विकृति है अपकृति है। भारत के ऋषियों ने इस कट्टरता का विरोध करते हुए यही कहा है-

अयं निज: परोवेति गणना लघु चेहसाम्
उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।

उपर्युक्त श्लोक के संदर्भित परिप्रेक्ष्य में तो राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द प्रयोग और भी आवश्यक हो जाता है। यह शब्द प्रयोग राष्ट्रवाद के विरूध्द उद्धोषित लघु चेतस घोषणाओं को जड़ से निर्मूल कर, चिंतन को उदार सहिष्णु मान-संपदा से परिपुष्ट कर देता है। प्रकाश का नंदादीप बन मानवता का पथ प्रशस्त करता है। तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवता का पर्याय, औदात्य का कल्पतरू तथा सर्व हित की चिंतामणि बन जाता है।

भारतीय साहित्य के अवलोकन से हमें इस सत्य के दर्शन होते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही सदा सर्वदा साहित्य का आदर्श रहा है। क्या संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य, पाली साहित्य, अपभ्रंश साहित्य और क्या लोकभाषा साहित्य, सभी ने संस्कृति और राष्ट्रीयता को ही अपना कथ्य बनाया है। प्रगतिवाद जनवाद के नाम से जो अभारतीय चिंतन भारतीय साहित्य में साम्य का नारा लेकर अनुप्रविष्ट हुआ, ऐसे समाज ने कुछ काल के भ्रम के बाद ही नकार दिया। समाज को वह नग्न यथार्थ कहे, या भोगा हुआ यथार्थ कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से किया जाता यह सीधा आक्रमण भारतीय समाज को भी गले नहीं उतरा। उस साहित्य के लेखकों को पाठकों की खोज के उपाय अपनी बैठकों में सोचने पड़ रहे हैं। इसी तरह से भारतीय समाज ने अस्तित्ववादी, क्षणवादी आधे-अधूरे पाश्चात्य दर्शन को भी कभी स्वीकार नहीं किया है। भले ही इन्होंने प्रयोगवाद, नई कविता आदि के नाम लेकर कितने ही बड़े नाटक क्यों न हों। इनके समकालीन प्रयास समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।

इसका कारण भी है। साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है। संस्कृति साहित्य में लिपटी रहती है। कभी कथानक के रूप में, तो कभी शिल्प के रूप में। वही साहित्य श्रेष्ठता अर्जित करता है जो संस्कृति को अधिकाधिक आत्मसात् किये होते हैं। संस्कृति विहीन साहित्य की कल्पना शशक श्रृंगवत है। संस्कृति भी वही जीवित रहती है जिसका विपुल परिमाण में साहित्य उपलब्ध होता है। जिस संस्कृति का साहित्य नहीं होता, वह संस्कृति कालांतर में अकाल काल कवलित हो जाती है।

मानवता को उजागर करनेवाला साहित्य ही है। साहित्य मनुष्य और समाज की मनोभावनाओं को शब्द के स्तर पर प्रभासित करता हुआ, मानवीय आदर्श की प्रतिष्ठापना करता है। साहित्य के शब्द-शब्द में भावोद्रेक की अप्रतिम शक्ति होती है। यह व्यक्ति को उसकी वास्तविक स्थिति से परिचित करा, उन उदात्ता विश्वासों से जोड़ता है जो उसे महामानव बनाते हैं। सामाजिक धरातल पर मानव का यह उदात्ता की ओर आरोहण है। व्यक्ति के धरातल पर जीवन प्रवृत्तियों का उन्नयत भी साहित्य ही करता है। साहित्य मानवीय संवेदना जगा, मानव संबंधों में सघनता उपजाता है। यह मनुष्य के भीतर चल रहे आंतरिक संघर्ष को तीव्र कर स्वस्थ एवं सही पथ पर अग्रसर करता है। साहित्य की परिधि में जहां सामाजिक संबंधों का नैकटय आता है वहीं सांस्कृतिक परंपरा की पहचान को नवीनतम रूपों से ग्रहण करने की प्रेरणा भी आती है।

साहित्य सृजन इस तरह एक सांस्कृतिक कर्म है। यह संस्कृति को अक्षुण्ण रखता है। संस्कृति साहित्य को अनुप्राणित करती है। साहित्य की जीवनीशक्ति के मूल में उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा ही होती है। साहित्य, संस्कृति का संवाहक होकर भी सदैव संस्कृत्योन्मुख रहता है। संस्कृति विमुख साहित्य की स्थिति उस रोगी की तरह होती है जिसे मृत्यु-मुख में जाने से कोई उपचार नहीं रोक पाता। जब भी साहित्य संस्कृति विमुख हुआ है, वह या तो दिग्भ्रम की स्थिति जीने लगता है अथवा मृत्यु का ग्रास बना है।

संस्कृति की प्रभविष्णुता अति सूक्ष्म किंतु अति तीव्र होती है। ऐसे समय में वह साहित्य को ही नहीं समय को भी नियंत्रित करती है। संस्कृति की यह प्रभविष्णुता कभी प्रत्यक्ष दिखती है तो कभी नहीं। प्रत्यक्षता की स्थिति में इसे सांस्कृतिक शक्तियां बलशाली हुई समय-रथ की वल्गा थामें दिखाई देती है। आज समय साहित्य के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा है। ऐसी स्थिति में तो साहित्य को समय से आगे निकलने का सामर्थ्य अर्जित करना ही चाहिए। इस हेतु उसे अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अंगद चरण जमा खड़ा होना है। तभी वह प्रतिगामी शक्तियों के चेहरों पर चढ़े मुखौटों को हटाने की शक्ति स्वयं में जगा सकेगा। इन दिनों प्रतिभागी शक्तियों ने विश्व-अराजकता के कर्णणारों के साथ दुरभि संधि कर रखी है। ऐसे प्रयासों को कुंठित कर विश्वमंच पर साहित्य को सत्यं शिवं सुंदरम् से अभिमंडित अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक छवि उपस्थित करनी है। इस सांस्कृतिक समर में भारत को साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी ध्येय े रूप में अंगीकार कर आलोक की नवीनतम दीपशिखा के साथ विश्वमंच पर खड़ा होना है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपनाव आज राजनीति के लिए जितना आवश्यक है उससे कम साहित्य के लिए नहीं है। साहित्य का इतिहास अथ से आज तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही इतिहास है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ध्येय वाक्य के रूप में जब तक अंगीकार नहीं करेंगे, भारत वैभव के उन्नतम शिखरों का स्पर्श कदापि नहीं कर सकेगा। कालजयी साहित्य नहीं लिखा जा सकेगा। वर्तमान के संकटापन्न इस काल में यदि प्रतिगामी शक्जियों को दुर्बल समझ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दुर्लक्ष्य किया तो निश्चय ही यह स्थिति भारत को महंगी पड़ सकती है। इसलिए राजनीति और साहित्य दोनों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को दृष्टि-पथ में रख, औपनिषदिक मंत्र 'चरैवेति चरैवेति' का घोष गुंजाते हुए त्वर गति से आगे बढ़, भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है।
(लेखक सुप्रसिध्द साहित्यकार हैं।)
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है