Thursday, August 27, 2026

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन : ग्रामीणों के लिए हितकारी


देश में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो बहुत दयनीय है। उपचार के अभाव में रोगियों की मृत्यु होने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं। देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखें, तो उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं। ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने 12 अप्रैल 2005 को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का शुभारंभ किया। यह केन्द्र सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है।आरंभ में यह मिशन केवल सात वर्ष अर्थात 2005 से 2012 तक के लिए रखा गया था, परंतु बाद में इसे आगे बढ़ा दिया गया। 

इसका प्रमुख उद्देश्य सामुदायिक स्वामित्व की विकेंद्रित स्वास्थ्य प्रदान करने वाली प्रणाली विकसित करना है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में सुगमता से वहनीय और जवाबदेही वाली गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। यह योजना विभिन्न स्तरों पर चल रही लोक स्वास्थ्य सुपुर्दगी प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ-साथ विद्यमान सभी कार्यक्रमों जैसे प्रजनन बाल स्वास्थ्य परियोजना, एकीकृत रोग निगरानी, मलेरिया, कालाज़ार, तपेदिक तथा कुष्ठ आदि के लिए एक ही स्थान पर सभी सुविधाएं प्रदान कराना है।संचारी और असंचारी रोगों की रोकथाम व नियंत्रण के कार्य करना, जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ लिंग व जन सांख्यिकीय संतुलन सुनिश्चित करना, अन्य वैकल्पिक औषधी पद्धतियों आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी आदि को प्रोत्साहित करना भी इसमें सम्मिलित है। 
इसके अंतर्गत जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ बाल मृत्यु और मातृ दर को घटाना है। इसके लिए केवल स्वास्थ्य सेवाओं की ही नहीं, साथ में अन्य मूलभूत आवश्यकताओं जैसे पीने का पानी, सफाई व शौचालय, टीकाकरण और पर्याप्त पोषण का भी प्रबंध करना भी है। 
इस योजना को पूरे देश में विशेषकर उन 18 राज्यों में लागू किया गया, जिनमें स्वास्थ्य अवसंरचना अत्यंत दयनीय तथा स्वास्थ्य संकेतक निम्न हैं। इन राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, मध्य प्रदेश, नागालैंड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं। इसके द्वारा वर्तमान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य केन्दों को सुदृढ़ बनाने और गैर सरकारी संगठनों का अधिकतम उपयोग करने की योजना है। इस मिशन के अंतर्गत किए जाने वाले कार्यों में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में बढोत्तरी, स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचा का सुधार, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत बनाना, देशी याब्नी परंपरागत आरोग्य प्रणालियों को बढावा देना, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य अंग बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का नियमीकरण, इसके लिए मापदंड और अधिनियम बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ साझेदारी बनाना, लोगों को इलाज प्राप्त करने के लिए जो खर्च करना पड़ता है, उसके लिए उचित बीमा-योजनाओं का प्रबंध करना, जिला कार्यक्रमों का विकेंद्रीकरण करना ताकि ये जिला स्तर पर चला जा सकें, स्वास्थ्य के प्रबंधन में पंचायती राज संस्थाओं/ समुदाय की भागीदारी को बढाना, समयबद्ध लक्ष्य और कार्य की प्रगति पर जनता के सामने रिपोर्ट पेश करना आदि सम्मिलित है।
इस योजना के क्रियान्वयन में लगीं प्रशिक्षित आशा की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग प्रति एक हजार ग्रामीण जनसंख्या पर एक आशा कार्यरत है। 

उप केंद्रों की क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यकता के अनुसार नये उपकेंद्र उपकेंद्र के भवन का निर्माण करना, आवश्यकतानुसार एक और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम की नियुक्ति की जाएगा, जो उसी क्षेत्र की होगी। हर उप-केंद्र को 10 हजार रुपये की गैर मद निर्धारित अनुदान राशि दी जाएगी, जो सरपंच और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम के नाम से बैंक में जमा होगी। महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल ग्राम स्वास्थ्य समिति से चर्चा करके कर सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सभी आवश्यक दवाइयां उपलब्ध होंगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के क्रियान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य कि जाएंगे, जैसे आवश्यकतानुसार भवन का निर्माण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे खुले रहेंगे और नर्सिंग की सुविधा उपलब्ध होगी। कुछ चुनिंदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 24 घंटे का अस्पताल बनाया जाएगा, जिसमें आपातकालीन सेवाएं प्राप्त हो सकें। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो और नर्स की नियुक्ति की जाएगी, यानी कुल तीन नर्स आवश्यकता के अनुसार एक और चिकित्सक  आयुष चिकित्सक आयुर्वेदिक, यूनानी, होमियोपैथी की नियुक्ति की जाएगी।हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 10 हजार का अनुदान मिलेगा, जिसे स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के रख-रखाव के लिए 50 हजार रुपये दिए जाएंगे।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को चलाने के लिए इनमें रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को प्रोत्साहित करने के लिए एक लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। शर्त यह है कि यह राशि राज्य को तभी दी जाए, जब राज्य यह वचन दे कि रोगी कल्याण समित जो पैसा इकट्ठा करती है उसे वह उसी के पास रहेगा, राज्य के खाते में नहीं जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तरह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता का विकास किया जाएगा, जिनमें 24 घंटे चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होंगी। उनमें आयुर्वेदिक, यूनानी एवं होमियोपैथी के चिकित्सक की नियुक्ति की जाएगी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के भवनों का निर्माण या पुननिर्माण किया जाएगा। इनमें भी रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। आवश्यकतानुसार नये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए जा सकेंगे। सारे राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे मलेरिया, टीबी आदि और परिवार कल्याण कार्यक्रमों का राज्य और ज़िला स्तर पर समन्वयन किया जाएगा। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए जो ज़िला स्तर पर टीम बनेगी, उसमें निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया जाएगा। `आशा´ कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए एक निगरानी समूह का गठन किया जाएगा। जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत सामाजिक निगरानी और जवाबदेही के लिए प्रबंध किया जाएगा। इसके लिए गांव, जिला और राज्य के स्तर पर समितियां होंगी। जिला स्तर पर जन संवाद, राज्य स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित कर सरकार, राज्य और जिला अपने स्तर पर जन स्वास्थ्य की रिपोर्ट पेश करेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में तीन तरीकों से जवाबदेही प्रक्रिया के ढांचे का प्रस्ताव किया गया है। इसमें आंतरिक निगरानी, सामयिक अध्ययन एवं सर्वेक्षण तथा समुदाय आधारित निगरानी शामिल है। समुदाय आधारित निगरानी को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सामुदायिक पहलकदमी के एक कदम के रूप में समझा जा सकता है। अत: निगरानी एवं नियोजन समितियों का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रखंड, ज़िला एवं राज्य स्तर पर प्रावधान किया गया है। समुदाय आधारित निगरानी प्रक्रिया वस्तुत: स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना एवं प्रबंधन करने वालों, समुदाय एवं समुदाय आधारित संगठनों यथा स्वयंसेवी संस्थाएं और पंचायती राज संस्थाओं की आपसी साझेदारी एवं समझदारी से ही विकसित एवं सफल हो पाएंगी। 

उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सहयोग बढ़ाने के लिए भारत और मोरक्को ने दिसम्बर 2017 में एक समझौता किया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी.नड्डा के अनुसार दोनों देशों के बीच मजबूत और समृद्ध पारंपरिक संबंध हैं। भारत जेनेरिक दवाओं का दो सौ से अधिक देशों को निर्यात कर रहा है और हमारे यहां एक मजबूत जन स्वास्थ्य प्रणाली काम करती है। इस प्रणाली की निगरानी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से की जाती है। दोनों देशों के बीच सहयोग के मुख्य क्षेत्रों में बाल हृदय रोग और कैंसर सहित गैर-संचारी रोग, औषधि नियमन एवं गुणवत्ता नियंत्रण, संचारी रोग, मातृत्व, बाल एवं पूर्व-प्रसव स्वास्थ्य, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के आदान-प्रदान के लिए अस्पतालों के बीच सहयोग, स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों के प्रबंधन और प्रशासन में प्रशिक्षण आदि सम्मिलित है। एक समझौता जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च और और मराकेश मोहम्मद विश्व विद्यालय अस्पताल के बीच हुआ। दोनों देशों के संस्थानों ने टेली-मेडिसन के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति वयक्त की।

उल्लेखनी है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का एक घटक है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पा रही है। इस योजना को अभी उन क्षेत्रों तक ले जाना है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम : भरपेट भोजन देने का प्रयास


देश में बेरोजगारी और गरीबी के कारण एक बड़ी जनसंख्या दो भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय खाद्या नीति अनुसंधान संस्थान के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में वर्ष 2017 में भारत 100वें स्थान पर पहुंच गया है। देशों के इस सूचकांक में भारत 97वें स्थान पर था, किन्तु एक वर्ष में यह तीन अंक और गिर गया है। भूखे देशों के मामले में भारत उत्तर कोरिया, बांग्लादेश से भी पीछे है। अंतर्राष्ट्रीय खाद्या नीति अनुसंधान संस्थान के अनुसार भारत के बच्चों में भुखमरी की समस्या सबसे अधिक कुपोषण के कारण और यहां सामाजिक क्षेत्र के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता दिखाने की आवश्यकता है। भुखमरी के मामले में भारत एशिया में तीसरे स्थान पर है। केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं। सूचकांक में भारत का स्कोर 31.4 है, जो भुखमरी की ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। सूचकांक में भारत के पड़ोसी देशों में से अधिकतर की रैंकिंग उससे बेहतर है. इनमें चीन सबसे आगे है जो 29वें स्थान पर हैग्लोबल हंगर इंडेक्स  उसके बाद नेपाल 72वें, म्यांमार 77वें, श्रीलंका 84वें, बांग्लादेश 88वें, पाकिस्तान 106 और अफगानिस्तान 107वें स्थान पर हैं। उत्तर कोरिया 93वें और ईराक 78वें स्थान पर हैं। इस बार ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग के चार मानदंड अल्पपोषण, बच्चों की मृत्यु दर, वृद्धि में रुकावट थे. भारत में पांच वर्ष से कम आयु के हर पांचवें बच्चे का भार उसकी लंबाई के हिसाब से बहुत कम है। कुपोषण और भुखमरी के कारण मौत होने के भयावह मामले भी प्रकाश में आते रहते हैं, जो अत्यंत चिंता का विषय हैं।

भुखमरी की समस्या को देखते हुए केन्द्र सरकार ने 10 सितम्बर, 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 लागू किया। जिसका उद्देश्य लोगों को सस्ती दर पर पर्याप्त मात्रा में उत्तम खाद्यान्न उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मिले और वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश एक ऐतिहासिक पहल है, जिसके माध्यम से जनता को पोषण खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। इससे लोगों को प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न उचित दरों पर पाने का अधिकार मिलेगा। खाद्य सुरक्षा विधेयक का विशेष बल गरीब से गरीब व्यक्ति, महिलाओं और बच्चों की आवश्यकताएं पूरी करने पर होगा। अगर लोगों को अनाज नहीं मिल पाया, तो उन्हें खाद्य सुरक्षा भत्ता दिया जाएगा। इसमें शिकायत निवारण तंत्र की भी व्यवस्था है। अगर कोई जन सेवक या अधिकृत व्यक्ति इसका अनुपालन नहीं करेगा, तो उसके विरुद्ध शिकायत की सुनवाई हो सकेगी। 

देश की 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को हर महीने बहुत ऊंची अनुदान वाली दरों पर यानी तीन रूपये, दो रूपये, एक रुपये प्रति किलो चावल, गेहूं और मोटा अनाज पाने का अधिकार होगा। इससे 1.2 अरब जनसंख्या के दो तिहाई भाग को लक्षित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के अंतर्गत अनुदान वाला खाद्यान्न पाने का अधिकार मिलेगा। समाज के अति गरीब वर्ग के हर परिवार को हर महीने अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत तीन रुपये, दो रुपये, एक रूपये की दरों पर अनुदान वाले खाद्यान्न की आपूर्ति जारी रहेगी। राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों को मौजूदा दर पर खाद्यान्न की आपूर्ति होती रहेगी और इसे तभी कम किया जाएगा, जब पिछले तीन वर्षों तक उनकी औसत उठान इससे कम हो।

अखिल भारतीय स्तर की शहरी जनसंख्या के 50 प्रतिशत और ग्रामीण जनसंख्या के 75 प्रतिशत को इस योजना के अंतर्गत लाभान्वित करने का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। इस मामले में पात्र परिवारों की पहचान का दायित्व राज्यों/केंद्र शासित प्रदशों पर छोड़ दिया गया है, जो इसके लिए अगर चाहें तो सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना के आंकड़ों के आधार पर मापदंड बना सकते हैं।

इसमें महिलाओं और बच्चों के पोषण संबंधी समर्थन पर विशेष रूप से बल दिया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताएं निर्धारित पोषण संबंधी मापदंडों के अनुरूप पोषक भोजन पाने की अधिकारी होंगी। उन्हें कम से कम 6 हजार रुपये मातृत्व लाभ भी मिलेगा। 6 महीने से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग तक के बच्चे घर पर राशन पाने अथवा पोषण संबंधी मापदंडों के आधार पर गर्म पका भोजन पाने के अधिकारी होंगे।

केंद्र सरकार राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को निधियां प्रदान करेंगी, जिसे वे अनाज की आपूर्ति कम होने पर उपयोग कर सकेंगे। अगर अनाज की आपूर्ति बिल्कुल नहीं की जाती, तो ये व्यक्ति भोजन पाने के अधिकारी होंगे और संबंधित राज्य/ संघ शासित सरकार को उन्हें ऐसा खाद्य सुरक्षा भत्ता देना होगा जैसा कि केंद्र सरकार लाभार्थियों के लिए निर्धारित करे। अतिरिक्त वित्तीय बोझ के संबंध में राज्यों की चिंता को दूर करने के लिए केंद्र सरकार खाद्यान्नों की राज्य से बाहर ढुलाई और रख-रखाव तथा उचित दर दुकानदारों के लाभ के बारे में राज्यों को सहायता उपलब्ध कराएगी। इसके लिए मानक विकसित किए जाएंगे। इससे खाद्यान्नों की समय पर ढुलाई और प्रभावी रख-रखाव सुनिश्चित हो जाएगा। इसमें खाद्यान्नों की घर-घर तक आपूर्ति, कंप्यूटरीकरण सहित सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग, लाभार्थियों की विशिष्ट पहचान के लिए 'आधार' का लाभ खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए टीपीडीएस आदि के अधीन उपभोक्ता वस्तुओं की विविधता को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार लाने के प्रावधान शामिल हैं।
 
18 साल या अधिक आयु की महिला राशन कार्ड जारी करने के लिए घर की मुखिया होगी। अगर ऐसा नहीं है, तो सबसे बड़ा पुरुष सदस्य घर का मुखिया होगा। राज्य और जिला स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित होगा, जिसमें नियत अधिकारी तैनात किए जाएंगे। राज्यों को नये निवारण तंत्र की स्थापना पर होने वाले वय्य को बचाने के लिए अगर वे चाहें, तो जिला शिकायत निवारण अधिकारी राज्य खाद्य आयोग के लिए वर्तमान तंत्र को प्रयोग करने की अनुमति होगी। निवारण तंत्र में कॉल सेंटर, हेल्पलाइन आदि भी शामिल किए जा सकते हैं।
 
पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के लिए सामाजिक लेखा परीक्षा और सतर्कता समितियां स्थापित करने के प्रावधान भी किए गए हैं। जिला शिकायत निवारण अधिकारी द्वारा सिफारिश की गई राहत का अनुपालन करने में असफल रहने के दोषी पाए जाने पर जनसेवक या नियत अधिकारी पर जुर्माना लगाने का भी इस विधेयक में प्रावधान है। सतर्कता समितियों का अस्तित्व राशन प्रणाली के प्रारंभ से ही है। केंद्रीय सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निगरानी और राशन कार्ड धारकों, उपभोक्ता कार्यकर्ताओं और संसद सदस्यों को पुनर्गठन के लिए सदस्यों के रूप में जोड़कर इन समितियों को सक्रिय बनाने के उद्देश्य से समय-समय पर राज्य सरकारों से अनुरोध करती आ रही है। नवम्बर, 1997 में जारी आदर्श नागरिक अधिकार-पत्र में राज्य सरकारों द्वारा पंचायत/वार्ड, तालुक, जिला और राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के स्तरों पर सतर्कता समितियों के गठन पर बल दिया गया था। टीपीडीएस के कार्यान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं को शामिल करने के संबंध में जून, 1999 में जारी किए गए दिशा-निर्देशों में यह उल्लेख किया गया था कि ग्राम पंचायतों/ग्राम सभाओं को उचित दर दुकानों की समितियां गठित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सतर्कता समितियों के प्रमुख कार्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुचारू कार्यकरण और उससे संबंधित समस्याओं के निपटान को सुनिश्चित करना है। सरकार ने राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को उचित दर दुकानों/पंचायत, ब्लॊक, जिला और राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के स्तर पर सतर्कता समितियां गठित करने के निर्देश जारी किए हैं, जिसमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत योजनाओं/उचित दर दुकानों के कार्यकरण की आवधिक समीक्षा करने के लिए सरकार, सामाजिक संगठनों, उपभोक्ता संगठनों और स्थानीय निकायों के सदस्यों को शामिल किया है। ग्राम/उचित दर दुकान, ब्लॊक, जिला और राज्य स्तर पर सतर्कता समितियों के अध्यक्ष के रूप में क्रमश: सरपंच, प्रधान, प्रमुख और खाद्य मंत्री/खाद्य सचिवों को शामिल करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को निर्देश जारी किए गए हैं। 
31 अगस्त, 2001 को अधिसूचित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2001 में राज्य सरकार द्वारा राज्य, जिला, ब्लॊक और उचित दर दुकान के स्तर पर सतर्कता समितियों की कम से कम तिमाही आधार पर बैठकें आयोजित करने का प्रावधान है। बैठकों की तिथि और अवधि राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की जानी है। सतर्कता समितियों के प्रावधानों को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से समितियों की स्थापना को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अंतर्गत लाया गया है। इन प्रावधानों की व्याख्या दिनांक 20 मार्च,2015 को अधिसूचित नये लक्षित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था(नियंत्रण) आदेश, 2015 में और अधिक स्पष्ट की गई है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2015 को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3 के अंतर्गत और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अनुरूप सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2001 का अधिक्रमण करते हुए 20 मार्च, 2015 को अधिसूचित किया गया है। 

उल्लेखनीय है कि लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली वर्ष 1997 से शुरू की गई थी। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बनाने और सुप्रवाही बनाने और इसकी पहुंच दूर-दराज, पहाड़ी, सुदुरवर्ती और दुर्गम क्षेत्रों तक वृद्धि करने की दृष्टि से, जहां गरीबों की बड़ी आबादी रहती है, जून, 1992 में शुरू की गई थी। इसमें 1775 ब्लॉकों को कवर किया गया था, जहां सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम, एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना, मरूस्थल विकास कार्यक्रम और विशेष लक्ष्य हेतु राज्य सरकारों के परामर्श से पहचान किए गए कुछ पहाड़ी क्षेत्र जैसे क्षेत्र विशिष्ट कार्यक्रम कार्यान्वित किए गए थे। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरण के लिए खाद्यान्न केंद्रीय निर्गम मूल्य से 50 पैसे कम मूल्य पर जारी किए गए थे। निर्गम की मात्रा 20 किलोग्राम प्रति कार्ड तक थी। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जिन्सों की प्रभावी पहुंच, राज्य सरकारों द्वारा पहचान किए गए क्षेत्रों में उचित दर दुकानों द्वार तक उनकी सुपुर्दगी, छोड़ दिए गए परिवारों को अतिरिक्त राशन कार्ड, अतिरिक्त उचित दर दुकान भंडारण क्षमता आदि जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी आवश्यकताओं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानों के जरिए वितरण हेतु चाय, नमक, दाल, साबुन आदि जैसे अतिरिक्त वस्तुओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण शामिल थे।

सरकार ने गरीबों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जून, 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की थी। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन राज्यों के लिए यह अपेक्षित था कि वे खाद्यान्नों की सुपुर्दगी देने और उचित दर दुकान स्तर पर इनका पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से वितरण करने के लिए गरीबों की पहचान करने की पुख्ता व्यवस्था बनाए और क्रियान्वित करें। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत अंत्योदय अन्न योजना को लागू करना गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के निर्धनतम वर्ग के बीच भुखमरी को कम करने की दिशा में उठाया गया एक कदम है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने इस तथ्य की ओर संकेत किया था कि देश में कुल जनसंख्या के लगभग 5 प्रतिशत भाग दो समय का भोजन भी नहीं मिल पाता। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को जनसंख्या के इस वर्ग के प्रति और अधिक केंद्रित और लक्षित करने के लिए एक करोड़ निर्धनतम परिवारों के लिए दिसम्बर, 2000 में अंत्योदय अन्न योजना' शुरू की गई थी। अंत्योदय अन्न योजना में राज्य में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन कवर किए गए गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों में से एक करोड़ निर्धनतम परिवारों की पहचान करने और उन्हें दो रुंपये प्रति किलोग्राम गेहूं और तीन रुंपये प्रति किलोग्राम चावल की अत्यधिक राज सहायता प्राप्त दरों पर खाद्यान्न प्रदान करने की परिकल्पना की गई थी। निर्गम की मात्रा जो प्रारंभ में 25 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह थी, उसे 1 अप्रैल, 2002 से बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया।

गरीबी रेखा से नीचे के 50 लाख अतिरिक्त परिवारों को शामिल करके वर्ष 2003-04 में अंत्योदय अन्न योजना का विस्तार किया गया। इसमें वे परिवार शामिल किए गए थे, जिनकी मुखिया विधवा अथवा असाध्यरोगी या अपंग व्यक्ति अथवा 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु के व्यक्ति थे और जिनकी जीविका का सुनिश्चित साधन नहीं था या जिन्हें सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं थी। इस वृद्धि के साथ अंत्योदय अन्न योजना में 1.5 करोड़ परिवार अर्थात गरीबी रेखा से नीचे के 23 प्रतिशत लोग शामिल किए गए।
केन्द्रीय बजट 2004-05 में की गई घोषणा के अनुसार इस योजना का और विस्तार किया गया, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ भुखमरी के खतरे वाले सभी परिवारों को शामिल करके गरीबी रेखा से नीचे 50 लाख के और परिवार इस योजना में शामिल किए गए। इस बारे में 3 अगस्त, 2004 को आदेश जारी किए गए। इन परिवारों की पहचान करने के लिए जारी दिशा-निर्देशों में निम्नलिखित मानदंड निर्धारित किए गए, उनमें ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में भूमिहीन कृषि श्रमिक, सीमांत किसान,ग्रामीण दस्तकार, शिल्पी कुम्हार, मोची, बुनकर, लोहार,बढ़ई, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले जैसे ग्रामीण दस्तकार और कुली, रिक्शाचालक, हथठेला चालक, फल और फूल विक्रेता, सपेरे, कबाड़ी, मोची जैसे अनौपचारिक क्षेत्र में दिहाड़ी आधार पर जीविका अर्जित करने वाले व्यक्ति, निराश्रित और इसी प्रकार की अन्य श्रेणियों के परिवार शामिल है। इनमें वे परिवार भी शामिल हैं, जिनकी मुखिया विधवा अथवा असाध्य रोग ग्रस्त व्यक्ति या अपंग व्यक्ति अथवा 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु के व्यक्ति अथवा अकेली महिला या पुरुष हैं और जिनकी जीविका का कोई सुनिश्चित साधन नहीं है अथवा जिन्हें पारिवारिक अथवा सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं है। इनमें विधवाएं अथवा असाध्य रोग ग्रस्त अथवा विकलांग व्यक्ति या 60 वर्ष अथवा उससे अधिक की आयु के व्यक्ति या अकेली महिला अथवा अकेला पुरुष जिन्हें कोई पारिवारिक अथवा सामाजिक समर्थन प्राप्त नहीं है या जिनकी जीविका का कोई सुनिश्चित साधन नहीं है, उन्हें भी शामिल किया गया है। सभी आदिम आदिवासी परिवारों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है। इस वृद्धि के साथ अंत्योदय अन्न योजना परिवारों की संख्या बढ़कर दो करोड़ परिवार अर्थात् गरीबी रेखा से नीचे की 30.66 प्रतिशत आबादी हो गई। केन्द्रीय बजट 2005-06 में की गई घोषणा के अनुसार अंत्योदय अन्न योजना का और विस्तार किया गया, ताकि गरीबी रेखा से नीचे के और 50 लाख और परिवारों को कवर किया जा सके। इस प्रकार इसका क्षेत्र बढ़कर 2.5 करोड़ परिवार अर्थात् गरीबी रेखा से नीचे की 38 प्रतिशत जनसंख्या हो गई।

वर्ष 1997 से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए निर्गम की मात्रा को 10 किलोग्राम से धीरे-धीरे बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया है। पहली अप्रैल, 2000 से निर्गम की मात्रा को 10 किलोग्राम से बढ़ाकर 20 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया था। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए खाद्यान्नों के आवंटन को जुलाई, 2001 से 20 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह से और बढ़ाकर 25 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया। पहले इस योजना की शुरुआत के समय अंत्योदय परिवारों को 25 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह दिया जाता था। परिवार स्तर पर खाद्य सुरक्षा में वृद्धि करने की दृष्टि से गरीबी रेखा से ऊपर, गरीबी रेखा से नीचे और अंत्योदय अन्न योजना के अधीन निर्गम की मात्रा को पहली अप्रैल, 2000 से संशोधित कर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली अभाव की स्थिति में खाद्यान्नों के प्रबंधन करने और उचित मूल्यों पर वितरण करने के लिए तैयार की गई थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश में खाद्य अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए सरकार की नीति का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली अनुपूरक स्वरूप की है और इसका उद्देश्य किसी परिवार अथवा समाज के किसी वर्ग को इसके अंतर्गत वितरित किसी वस्तु की समस्त आवश्यकता उपलब्ध कराना नहीं है।

खाद्यान्न वितरण में अकसर धांधली के समाचार मिलते रहते हैं। इस बारे में शासन-प्रशासन को दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। यह एक कल्याणकारी योजना है,  इसका लाभ सभी पात्रों को मिले, यह सरकार को सुनिश्चत करना होगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

रक्षासूत्र का आत्मीय बंधन












रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सरस्वती विद्या मंदिर, अलीगंज की बहनों का लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित मेरे विभाग में आकर स्नेहपूर्वक रक्षासूत्र बाँधना मेरे लिए परम सौभाग्य और आत्मीय आनंद का अवसर रहा।

यह रक्षासूत्र केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि संस्कार, स्नेह और भारतीय संस्कृति की उस पवित्र परंपरा का प्रतीक है, जो रिश्तों को आत्मीयता और विश्वास से जोड़ती है।

सभी बहनों के स्नेह एवं आशीष के लिए हृदय से आभार।

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

Wednesday, August 26, 2026

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ


प्रिय श्रृंन्द्र मालवीय को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं मंगलमय शुभकामनाएँ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं निरंतर सफलता प्रदान करें। आपका जीवन सदैव खुशियों, ऊर्जा और उपलब्धियों से परिपूर्ण रहे।
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई!

Tuesday, August 25, 2026

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न्यूज नेशन

Monday, August 24, 2026

बैठक

  








लखनऊ। विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित गुणवत्ता विकास हेतु चयनित विद्यालयों की प्रबंध समितियों की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी का सान्निध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, संस्कारयुक्त वातावरण तथा प्रभावी शैक्षिक प्रबंधन के लिए उनके मार्गदर्शन से कार्यकर्ताओं एवं प्रबंध समितियों और प्रधानाचार्य बन्धुओं को नई दिशा और प्रेरणा मिली।

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आरक्षण सामाजिक और आर्थिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है। वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार तथा अवसरों में प्रतिनिधित्व देकर मुख्यधारा से जोड़ना और समान अवसर उपलब्ध कराना है। 
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है