Wednesday, June 3, 2026

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण का महत्व


डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी कारण भारत में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भूमि को माता माना जाता है। आकाश को भी उच्च स्थान प्राप्त है। वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल को पूजा जाता है। पंचवटी की पूजा होती है। घरों में तुलसी को पूजने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नदियों को माता मानकर पूजा जाता है। कुंआ पूजन होता है। अग्नि और वायु के प्रति भी लोगों के मन में श्रद्धा है। वेदों के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पंचतत्व के योग से हुआ है, जिनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि सम्मिलित है।
इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि

पृथ्वी ही वह ग्रह है, जहां पर जीवन है। वेदों में पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहा गया है।
ऋग्वेद के अनुसार-
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्
अर्थात् आकाश मेरे पिता हैं, बंधु वातावरण मेरी नाभि है, और यह महान पृथ्वी मेरी माता है।

अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के रूप में पूजने की बात कही गई है। अथर्ववेद के अनुसार-
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः

इतना ही नहीं वेदों में सभी जीवों की रक्षा का भी कामना की गई है। ऋग्वेद के अनुसार–
पिता माता च भुवनानि रक्षतः

जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
वेदों में जल को अमृत कहा गया है।
अमृत वा आपः

जल ही है, जो मनुष्य के तन और मन के मैल को धोता है। तन और मन को पवित्र करता है।
इदमाप: प्र वहत यत् किं च दुरितं मयि
यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेष उतानृतम्
अर्थात हे जल देवता, मुझसे जो भी पाप हुआ हो, उसे मुझसे दूर बहा दो अथवा मुझसे जो भी द्रोह हुआ हो, मेरे किसी कृत्य से किसी को कष्ट हुआ हो अथवा मैंने किसी को अपशब्द कहे हों, अथवा असत्य वचन बोले हों, तो वह सब भी दूर बहा दो।

वेदों में जल को सखदायी बताया गया है। साथ ही जल के शोधन की बात भी कही गई है।
आपोSअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्व: पुनन्तु
विश्व हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्य: शुचिरा पूतSएमि
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा शग्मां परिदधे भद्रं वर्णम पुष्यन
अर्थात मनुष्य को चाहिए कि जो सब सुखों को देने वाला, प्राणों को धारण करने वाला एवं माता के समान, पालन-पोषण करने वाला जो जल है, उससे शुचिता को प्राप्त कर, जल का शोधन करने के पश्चात ही, उसका उपयोग करना चाहिए, जिससे देह को सुंदर वर्ण, रोग मुक्त देह प्राप्त कर, अनवरत उपक्रम सहित, धार्मिक अनुष्ठान करते हुए अपने पुरुषार्थ से आनंद की प्राप्ति हो सके।

वेदों में स्वच्छ एवं शुद्ध जल को स्वस्थ जीवन के लिए अति आवश्यक माना गया है। अथर्ववेद के अनुसार-
शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु

जीवन के लिए वायु अति आवश्यक है। वेदों में वायु के महत्व का उल्लेख किया गया है। ऋग्वेद के अनुसार-
वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्

वेदों में वायु का शुद्धता पर बल देते हुए कहा गया है कि जीवन के लिए शुद्ध एवं प्रदूषण रहित वायु अति आवश्यक है।
वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे

वेदों में वृक्षों की महत्ता पर भी प्रकाश डाला गया है। वृक्षों में देवताओं का वास माना जाता है।
मूलतो ब्रम्हरूपाय मधयतो विष्णुरूपिणें
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाए ते नम:
अर्थात वृक्ष के मूल में ब्रम्हा, मध्य में भग्वान विष्णु और शिरोभाग में शिव का वास होता है।

वेदों में वनस्पतियों से पूर्ण वनदेवी की पूजा की गई है. ऋग्वेद में कहा गया है-
आजनगन्धिं सुरभि बहवन्नामड्डषीवलाम्
प्राहं मृगाणां मातररमण्याभिशंसिषम्
अर्थात अब मैं वनदेवी की पूजा करता हूं, जो मधुर सुगंध परिपूर्ण है और सभी वनस्पतियों की माता है और भोजन का भंडार है।

निसंदेह, हमारी भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को बहुत महत्व दिया गया है, किन्तु आज प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। परिणाम स्वरूप पर्यावरण असंतुलन उत्पन्न हो गया है, जिससे प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं। पर्यावरण असंतुलन से बचने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उतना ही दोहन करे, जितनी उसे आवश्यकता है. ईशावस्योपनिषत् के अनुसार-
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्वि नम्

वेदों में पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया गया है। यजुर्वेद के अनुसार-
पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम्
अर्थात मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुंचाऊं

ऋग्वेद में समग्र पृथ्वी की स्वच्छता पर बल देते हुए कहा गया है-
पृथ्वीः पूः च उर्वी भव:
अर्थात समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे।
यदि हमारी पृथ्वी स्वच्छ रहेगी, तो हमारा जीवन भी सुखदायी होगा। जीवन के सम्यक विकास के लिए पर्यावरण का स्वच्छ रहना नितांत आवश्यक है।

Monday, June 1, 2026

टीवी पर लाइव





उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का चुनाव केवल दलों की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि कई क्षेत्रों में राजनीतिक विरासत बनाम नई पीढ़ी का भी मुकाबला देखने को मिल सकता है। पूर्वांचल से लेकर अवध तक ऐसे कई प्रभावशाली परिवार हैं जिनकी अगली पीढ़ी अब पंचायत, जिला पंचायत, संगठन और विधानसभा राजनीति में सक्रिय हो रही है।
क्या प्रमुख दल उन्हें टिकट और संगठनात्मक समर्थन देते हैं।
पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है। देखना दिलचस्प होगा...

कर्म

 







समाचार पत्रों में






 

टीवी पर लाइव




"उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कानून के राज और न्याय के सिद्धांत पर चलने वाली सरकार है। अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करना और पीड़ित को न्याय दिलाना सरकार की प्राथमिकता है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अपराध और अपराधियों के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जाएगी तथा निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि रहेगी।"
"योगी सरकार की पहचान—न्याय का सम्मान, अपराधियों पर कानून का प्रहार।"

Sunday, May 31, 2026

भारतीय संस्कृति की पहचान है धोती-कुर्ता


धोती-कुर्ता भारतीय संस्कृति की पहचान है। 
यह केवल एक वेशभूषा नहीं, बल्कि भारत की परंपरा, सादगी, शालीनता और सांस्कृतिक चेतना का बोध कराता है। धोती-कुर्ता धारण करने वाला व्यक्ति भारतीय जीवन-मूल्यों, लोकाचार और अपनी जड़ों से जुड़े होने का संदेश देता है। यह वेश हमें अपनी गौरवशाली सभ्यता, ऋषि-परंपरा और आत्मगौरव की अनुभूति कराता है। धोती-कुर्ता भारतीयता का प्रतीक है, जो भारत बोध और सांस्कृतिक स्वाभिमान को सशक्त बनाता है।
"धोती-कुर्ता का मान बढ़ाएँ, भारत की पहचान जगाएँ।"
"भारतीय वेश अपनाएँ, संस्कृति से नाता निभाएँ।"
"धोती-कुर्ता धारण करें, भारत बोध का संचार करें।"

संस्कारयुक्त, भारत-केंद्रित शिक्षा विद्या भारती का उद्देश्य : डॉ. सौरभ मालवीय






















सीतापुर। आनंदी देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, सीतापुर में विद्या भारती द्वारा आयोजित पंद्रह दिवसीय नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का समापन सत्र गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष तथा विद्या भारती के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में भारतीय शिक्षा समिति के अध्यक्ष माननीय हरेन्द्र श्रीवास्तव उपस्थित रहे। अतिथियों का परिचय विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री राम निवास सिंह ने कराया।
समापन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व एवं आचरण का निर्माण करना है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण वर्ग में वंदना, भोजन मंत्र, व्यवहार एवं विचार-विमर्श के माध्यम से आचार्यों के मन, चित्त और वाणी में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया है।
स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। यदि शिक्षा समाज की आवश्यकताओं और राष्ट्रीय मूल्यों के अनुरूप होगी, तो राष्ट्र समृद्ध, समर्थ और शक्तिशाली बनेगा। उन्होंने आचार्यों का आह्वान किया कि वे नई पीढ़ी के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए “श्रेष्ठ, समर्थ एवं संपन्न भारत” के निर्माण का संकल्प लें।
डॉ. मालवीय ने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आनंद, ज्ञान, मुक्ति और परोपकार की जीवनदृष्टि का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति संबंधों, कर्तव्यों और मर्यादाओं पर आधारित है। उन्होंने भगवान राम, लक्ष्मण एवं माता सीता के उदाहरणों के माध्यम से भारतीय जीवन मूल्यों की व्याख्या करते हुए कहा कि मर्यादा और धर्मयुक्त संबंध ही भारत की सांस्कृतिक पहचान हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पूंजीवाद, समाजवाद और सांस्कृतिक अतिवाद जैसी विचारधाराएँ भारतीय जीवन मूल्यों को चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे समय में विद्या भारती के आचार्यों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा, ऋषियों के चिंतन तथा “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना को समाज तक पहुँचाएं।
डॉ. मालवीय ने बताया कि विद्या भारती आगामी वर्ष गुरु पूर्णिमा से अपना 75वाँ अमृत महोत्सव वर्ष प्रारम्भ करने जा रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में विद्या भारती की उपस्थिति लगभग 24 हजार केंद्रों तक है, किन्तु जब यह संख्या 24 लाख अथवा 24 करोड़ तक पहुँचेगी, तभी भारत में वास्तविक भारत-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था का व्यापक स्वरूप स्थापित हो सकेगा।
इस अवसर पर अवध प्रांत के प्रदेश निरीक्षक श्री रामजी सिंह, पूर्णकालिक अधिकारी बंधु, संभाग निरीक्षक तथा अनेक शिक्षाविद् एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष श्री सुभाष चन्द्र अग्निहोत्री ने सभी अतिथियों, प्रशिक्षक आचार्यों एवं कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
समापन सत्र में प्रशिक्षण प्राप्त नवचयनित आचार्यों ने राष्ट्रनिर्माण एवं शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित भाव से योगदान देने का संकल्प लिया। 

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है