Sunday, May 31, 2026
भारतीय संस्कृति की पहचान है धोती-कुर्ता
धोती-कुर्ता भारतीय संस्कृति की पहचान है।
यह केवल एक वेशभूषा नहीं, बल्कि भारत की परंपरा, सादगी, शालीनता और सांस्कृतिक चेतना का बोध कराता है। धोती-कुर्ता धारण करने वाला व्यक्ति भारतीय जीवन-मूल्यों, लोकाचार और अपनी जड़ों से जुड़े होने का संदेश देता है। यह वेश हमें अपनी गौरवशाली सभ्यता, ऋषि-परंपरा और आत्मगौरव की अनुभूति कराता है। धोती-कुर्ता भारतीयता का प्रतीक है, जो भारत बोध और सांस्कृतिक स्वाभिमान को सशक्त बनाता है।
"धोती-कुर्ता का मान बढ़ाएँ, भारत की पहचान जगाएँ।"
"भारतीय वेश अपनाएँ, संस्कृति से नाता निभाएँ।"
"धोती-कुर्ता धारण करें, भारत बोध का संचार करें।"
संस्कारयुक्त, भारत-केंद्रित शिक्षा विद्या भारती का उद्देश्य : डॉ. सौरभ मालवीय
सीतापुर। आनंदी देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, सीतापुर में विद्या भारती द्वारा आयोजित पंद्रह दिवसीय नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का समापन सत्र गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष तथा विद्या भारती के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में भारतीय शिक्षा समिति के अध्यक्ष माननीय हरेन्द्र श्रीवास्तव उपस्थित रहे। अतिथियों का परिचय विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री राम निवास सिंह ने कराया।
समापन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व एवं आचरण का निर्माण करना है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण वर्ग में वंदना, भोजन मंत्र, व्यवहार एवं विचार-विमर्श के माध्यम से आचार्यों के मन, चित्त और वाणी में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया है।
स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। यदि शिक्षा समाज की आवश्यकताओं और राष्ट्रीय मूल्यों के अनुरूप होगी, तो राष्ट्र समृद्ध, समर्थ और शक्तिशाली बनेगा। उन्होंने आचार्यों का आह्वान किया कि वे नई पीढ़ी के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए “श्रेष्ठ, समर्थ एवं संपन्न भारत” के निर्माण का संकल्प लें।
डॉ. मालवीय ने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आनंद, ज्ञान, मुक्ति और परोपकार की जीवनदृष्टि का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति संबंधों, कर्तव्यों और मर्यादाओं पर आधारित है। उन्होंने भगवान राम, लक्ष्मण एवं माता सीता के उदाहरणों के माध्यम से भारतीय जीवन मूल्यों की व्याख्या करते हुए कहा कि मर्यादा और धर्मयुक्त संबंध ही भारत की सांस्कृतिक पहचान हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पूंजीवाद, समाजवाद और सांस्कृतिक अतिवाद जैसी विचारधाराएँ भारतीय जीवन मूल्यों को चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं। ऐसे समय में विद्या भारती के आचार्यों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा, ऋषियों के चिंतन तथा “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना को समाज तक पहुँचाएं।
डॉ. मालवीय ने बताया कि विद्या भारती आगामी वर्ष गुरु पूर्णिमा से अपना 75वाँ अमृत महोत्सव वर्ष प्रारम्भ करने जा रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में विद्या भारती की उपस्थिति लगभग 24 हजार केंद्रों तक है, किन्तु जब यह संख्या 24 लाख अथवा 24 करोड़ तक पहुँचेगी, तभी भारत में वास्तविक भारत-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था का व्यापक स्वरूप स्थापित हो सकेगा।
इस अवसर पर अवध प्रांत के प्रदेश निरीक्षक श्री रामजी सिंह, पूर्णकालिक अधिकारी बंधु, संभाग निरीक्षक तथा अनेक शिक्षाविद् एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष श्री सुभाष चन्द्र अग्निहोत्री ने सभी अतिथियों, प्रशिक्षक आचार्यों एवं कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
समापन सत्र में प्रशिक्षण प्राप्त नवचयनित आचार्यों ने राष्ट्रनिर्माण एवं शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित भाव से योगदान देने का संकल्प लिया।
Thursday, May 28, 2026
छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होंगी
इस नीति के अनुसार अलग‑अलग राज्य की भाषाएँ सीखने से आपसी समझ बढ़ेगी, जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। साथ ही विद्यार्थियों के मज़बूत भाषा‑आधार से प्रशासन, मीडिया, कानून, पर्यटन, शोध और प्रतियोगी परीक्षाओं में लाभ मिलेगा।
मातृभाषा आधारित बहुभाषिक शिक्षा से ग्रामीण, आदिवासी और बहुभाषिक पृष्ठभूमि के बच्चे सीखने में सुविधा महसूस करेंगे।
इस भाषा नीति का समर्थन किया जाना चाहिये.
टीवी पर लाइव
भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से “विश्व शांति”, “संवाद” और “कूटनीतिक समाधान” पर आधारित रही है। भारत लगातार यह पक्ष रखता रहा है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, बल्कि बातचीत, संयम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही स्थायी शांति का मार्ग हैं।
प्रधानमंत्री Narendra Modi जी भी अनेक वैश्विक मंचों पर “यह युद्ध का युग नहीं है” का संदेश दे चुके हैं, जो आज की परिस्थिति में और अधिक प्रासंगिक दिखाई देता.
जीवन में अमृत है पानी : जल है तो कल है
डॉ. सौरभ मालवीय
मनुष्य का शरीर पंचभूत से निर्मित है। पंचभूत में पांच तत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सम्मिलित है।
सभी प्राणियों के लिए जल अति आवश्यक है। प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। नि:संदेह जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। जल के पश्चात मनुष्य को जीवित रहने के भोजन चाहिए। भोजन के लिए अन्न, फल एवं सब्जियां उगाने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है। कृषकों को अपनी फसल की सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र की ही होती है। जलवायु परिवर्तन एवं जल के अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस गिरते भू-जल स्तर के कारण सिंचाई जल संकट उत्पन्न हो गया है। इसके अतिरिक्त जिन क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नहीं है अथवा जल की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है, वहां के निवासी भी पेयजल के लिए संकट में रह रहे हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जल संकट बना हुआ है।
वास्तव में इस जल संकट के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक वस्तुओं का उतना ही उपयोग करते थे, जितनी उनकी आवश्यकता होती है। भारतीय संस्कृति के अनुसार ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। इसलिए प्रत्येक वस्तु में भगवान का वास माना जाता है। हमारी प्राचीन गौरवमयी संस्कृति में जल को जीवन माना गया है-
जलमेव जीवनम्।
ऋग्वेद में भी जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजम्।।
अर्थात जल में अमृत है, जल में औषधि है।
महाभारत में भी जल के महत्त्व का वर्णन करते हुए इसे सर्वोत्तम दान कहा गया है-
अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च।
तस्मात् सर्वेषु दानेषु तयोदानं विशिष्यते।।
अर्थात संसार के समस्त प्राणियों की उत्पत्ति जल से हुई है तथा इसी से वे जीवित रहते हैं। अत: सभी प्रकार के दानों में जल-दान सर्वोत्तम माना गया है। महाभारत में यह भी कहा गया है-
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं समृतम्।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः।।
अर्थात जल से ही संसार के समस्त प्राणियों को जीवन प्राप्त होता है। जल का दान करने से प्राणियों को तृप्ति प्राप्त होती है। जल में दिव्य गुण हैं, जो परलोक में भी लाभ प्रदान करते हैं।
विष्णु पुराण में जल-चक्र का वर्णन किया गया है कि किस प्रकार वह वाष्प बनता है तथा वर्षा के रूप में भूमि को तृप्त करता है। इसी जल से कृषि होती है अर्थात अन्न उत्पन्न होता है-
विवस्वानर्ष्टाभर्मासैरादायापां रसात्मिकाः।
वर्षत्युम्बु ततश्चान्नमन्नादर्प्याखिल जगत्।
अर्थात सूर्य आठ मास तक अपनी किरणों से रस स्वरूप जल को ग्रहण करता है। तत्पश्चात चार मास में उसे वर्षा के माध्यम से बरसा देता है। इससे अन्न उत्पन्न होता है, जिससे संपूर्ण जगत का पोषण होता है।
वर्षा का जल अत्यंत उपयोगी है। अर्थवेद में भी इस विषय में कहा गया है-
शिवा नः सन्तु वार्षिकीः।
अर्थात वर्षा का जल कल्याणकारी है।
प्राचीन ग्रन्थों में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। ऋग्वेद के अनुसार-
अप्स्वडन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये देवा भक्त वाजिनः।
अर्थात अमृत के समान एवं गुणकारी जल का उचित उपयोग करने वाले बनो। जल की प्रशंसा के लिए सदैव तत्पर रहो।
प्राचीन काल में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया जाता था। तालाब बनाए जाते थे एवं कुएं खोदे जाते थे। वर्षा का जल तालाबों आदि में एकत्रित हो जाता था। इन तालाबों से मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु भी लाभान्वित होते थे।
किन्तु कालांतर में प्राकृतिक एवं मनुष्य निर्मित जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। ऋग्वेद में जल संरक्षण के विषय में यह भी कहा गया है-
आपो अस्मान्मातरः शुन्ध्यन्तु द्यृतेन ना द्यृत्प्वः पुनन्तु।
अर्थात जल हमारी माता के समान है। जल घृत के समान हमें शक्तिशाली एवं उत्तम बनाता है। इस प्रकार का जल जहां कहीं भी हो, उसका संरक्षण करना चाहिए।
जल संकट के लिए प्रदूषण भी उत्तरदायी है, क्योंकि प्रदूषण के कारण जल अनुपयोगी हो जाता है। वह पीने योग्य नहीं रहता। अत: हमें जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए। यजुर्वेद में भी जल संरक्षण पर बल दिया गया है-
मा आपो हिंसी।
अर्थात जल को नष्ट मत करो।
देश में नदियों की का अभाव नहीं है, परन्तु प्रदूषण के कारण उनका जल पीने योग्य नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कारखानों से निकलने वाले घातक रसायनों एवं सीवर की गंदगी के कारण नदियों का पानी विषैला हो गया है।
भारतीय संस्कॄति में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। किन्तु दुख की बात यह है कि सबके पाप धोने वाली यह पवित्र नदी दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। नदियों में शव बहाने से भी यह प्रदूषित हो रही है। इस नदी को साफ करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास होते रहते है। समय-समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं भी चलाई गईं ऐसे कार्यक्रमों में समाज जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को लोकमंगल के कार्य मे सहयोगी होने की आवश्यकता है।
भारतीय संस्कृति में जल को देवता माना गया है। अत: विभिन्न मांगलिक अवसरों पर जल की पूजा की जाती है अर्थात कुआं पूजन किया जाता है। महिलाएं गीत गाती हुई कुआं पूजने जाती हैं। महानगरों में अब कुएं नहीं हैं। अत: महानगरों से यह परम्परा भी समाप्त हो रही है। गांवों में अभी कुआं पूजन की परम्परा जीवित है। भारतीय संस्कृति में नदियों को देवी स्वरूप माना गया है। नदियों के तट पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
प्रयागराज में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, क्योंकि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का अद्भुत संगम होता है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारत में महाकुम्भ धार्मिक स्तर पर अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण आयोजन है। खगोल गणनाओं के अनुसार कुम्भ मेला मकर संक्रान्ति के दिन प्रारम्भ होता है। उस समय सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिवस को अति शुभ एवं मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते हैं। इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु अमृत से भरा कुम्भ लेकर जा रहे थे कि असुरों ने आक्रमण कर दिया। अमृत प्राप्ति के लिए देव एवं दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के समान होते हैं। इसलिए कुम्भ भी बारह होते हैं। इनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं तथा शेष आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं। देव एवं दानवों के इस संघर्ष के दौरान अमृत की चार बूंदें गिर गईं। ये बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन में गिरीं, जहां पर तीर्थस्थान बना दिए गए। तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जहां मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जहां अमृत की बूंदें गिरीं, उन स्थानों पर तीन-तीन वर्ष के अंतराल पर बारी-बारी से कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। इन तीर्थों में प्रयाग को तीर्थराज के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है। इसके अतिरिक कालिंदी, कावेरी, रामगंगा, कोसी, गगास, कृष्णा, गोदावरी, गंडक, घाघरा, चम्बल, चेनाब, झेलम, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, पद्मा, फल्गू, बागमती, ब्रह्मपुत्र, भागीरथी, महानदी, महानंदा, रावी, व्यास, सतलुज, सरयू, सिन्धु नदी, सुवर्णरेखा, हुगली, गोमती, माही आदि नदियों में भी श्रद्धालु स्नान करते हैं। छठ के अवसर पर नदियों के तटों पर श्रधालुओं का जमावड़ा लगा रहता है।
नदी, तालाब एवं कुएं आदि अथाह जल के स्रोत हैं। ये अमूल्य हैं। हमें इनका संरक्षण करना चाहिए। यदि वर्षा के जल को तालाबों आदि में एकत्रित किया जाए, तो जल संकट से उबरा जा सकता है। इसके साथ ही हमें जल को व्यर्थ न बहाकर इसका सदुपयोग करना चाहिए।
Tuesday, May 26, 2026
नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग
विद्या भारती द्वारा संचालित ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर प्रयागराज में आयोजित पंद्रह दिवसीय नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग में शिक्षण, संस्कार एवं भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित विविध सत्रों का आयोजन किया जा रहा है।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता डॉ. सौरभ मालवीय (क्षेत्रीय मंत्री, विद्या भारती) ने “भारतीय ज्ञान परम्परा” विषय पर प्रेरक एवं विचारोत्तेजक मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने वाली समग्र दृष्टि है, जो मानवता, कर्तव्यबोध, राष्ट्रचेतना एवं विश्वकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने आचार्यों से आह्वान किया कि वे शिक्षा को केवल जानकारी तक सीमित न रखकर संस्कार, संवेदना और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाएं। भारतीय संस्कृति, वेद-उपनिषद, गुरु-शिष्य परम्परा तथा राष्ट्रनिष्ठ शिक्षा व्यवस्था को वर्तमान समय की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने नवचयनित आचार्यों को विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व निर्माण हेतु समर्पित भाव से कार्य करने की प्रेरणा दी।
इस सघन प्रशिक्षण वर्ग में नवचयनित आचार्य बंधु-भगिनी उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं तथा विविध शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं व्यवहारिक गतिविधियों के माध्यम से अपने व्यक्तित्व एवं शिक्षण कौशल का विकास कर रहे हैं।
मेरे प्रेरणास्रोत: स्वामी विवेकानंद
डॉ. सौरभ मालवीय
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