Thursday, September 3, 2026

स्मार्ट सिटी योजना : आधुनिक राष्ट्र निर्माण का अभिनव पहल


किसी भी देश, समाज और राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधारभूत तत्व सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक विकास ही उसका आधार स्तम्भ होता है, जिससे वहां के लोग आपसी भाईचारे से विकास की नैया आगे बढ़ाते हैं। समाज का प्रत्येक वह व्यक्ति जो राष्ट्र का नेतृत्व करना चाहता है, उसके पास राष्ट्र निर्माण के लिए एक दृष्टि होनी चाहिए। साथ ही उसे क्रियात्मक रूप देने के लिए एक कारगर योजना भी होनी चाहिए। भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि कहने को तो देश के पास राष्ट्र-नायकों की कभी कोई कमी नही रही, परंतु आजादी के समय से लेकर मई, 2014 तक एक से बढ़कर एक बुद्धिवादियों के हाथ में देश का नेतृत्व रहा, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए उनके द्वारा जो भी पहल की गई, वह मौलिक सोच पर आधारित नही थी। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जहां देश को समय से पहले इंग्लैंड (विकसित राष्ट्र) बनाना चाहते थे, वही भारत के अंतिम कांग्रेसी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच कभी उनकी खुद की नही रही और वह पूरे कार्य काल तक नाममात्र के कठपुतली प्रधानमंत्री बनकर रह गए। राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखना और उसे किसी भी फार्मूले के तहत विकसित राष्ट्र के रूप मे पहल करना गलत नही है, गलती उस दृष्टि की है जिसमें राष्ट्र को देखने की मौलिक सोच और राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव है। वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता-सीन होने से पहले तक कमोबेश देश की यही स्थिति रही है। जिनके हाथ मे राष्ट्र के  निर्माण का दायित्व था, उनकी सोच कभी समाजवादी चश्मे की चकाचौध की शिकार थी, तो कभी उनके दृष्टि पर गाहे-बगाहे लाल सलाम का कब्जा रहा।  इसका प्रतिफल यह रहा कि राष्ट्र निर्माण की जो भी आर्थिक नीति बनी और सामाजिक पहल की गई वह निहायत अव्यवहारिक और राष्ट्र को दिवालिया बनाने वाली रही। उन नीतियों का कुफ़ल ही राष्ट्र को 1990 मे आर्थिक संकट के रूप में भुगतना पड़ा। अर्थशास्त्र का हर ज्ञाता इस बात को जानता है कि राष्ट्र निर्माण की नीतियां लोकप्रियता की चाशनी से सराबोर नहीं हो सकती हैं। वह दवा की तरह से कड़वी होती हैं, जो वर्तमान में कष्टकारी और भविष्य के लिए हितकारी परिणाम वाली होती हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय सोच और इसी समझ के नाते उनके हाथ में देश का नेतृत्व देने का निर्णय लिया। मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक किसी भी मोर्चे पर निराश नहीं किया और जनाकांक्षाओं का प्रतीक बनकर जनता के बीच स्वयं को प्रस्तुत किया है। उनके पास दूरदृष्टि और स्पष्ट दृष्टि है। उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही भारत के आधुनिक निर्माण के लिए कई मूर्त कार्य योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की।  इसी क्रम में उन्होंने भारत के शहरों का कार्य योजना के तहत कायाकल्प करने का निर्णय लिया। उनकी इस अभिनव पहल को स्मार्ट सिटी के रूप में पहचान मिली और इसके तहत ही भारतीय शहरों के आधुनिकरण की रूपरेखा बनाई गई। भाजपा सरकार का उद्देश्य देश में ऐसी 100 स्मार्ट सिटी के निर्माण का लक्ष्य है, जो पूरी तरह से आधुनिक संसाधनों से युक्त होंगीं।  एक निश्चित पैमाने के तहत राज्यों से पन्द्रह दिन के अंदर स्मार्ट सिटी के लायक शहरों की सूची भेजने का निर्देश दिया गया। साथ ही ऐसा मानक पैमाना बनाया गया, जिसके तहत यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का निर्माण अवश्य किया जा सके। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 जून, 2015 को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को देश के सामने प्रस्तुत किया। स्मार्ट सिटी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय की ओर से बताया गया कि हर राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का अवश्य विकास किया जाएगा। साथ ही यह भी बताया गया कि स्मार्ट सिटी का निर्माण दो चरणों में होगा। पहले चरण के तहत नई स्मार्ट सिटी का निर्माण किया जाएगा और दूसरे चरण में पुरानी स्मार्ट सिटीज़ का नवीनीकरण किया जाएगा। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत केंद्र सरकार ने प्रयोग के तौर पर दो बड़े शहरों के बीच स्मार्ट सिटी के निर्माण का निर्णय किया है। इन स्मार्ट सिटीज़ की खास बात यह है कि इनका निर्माण एक लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में किया जा रहा है। योजना के तहत जिन शहरों में स्मार्ट सिटीज़ का निर्माण कार्य होना है, वहां नगर निगम की ओर से बिजली, पानी और यातायात की व्यवस्था का होना सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही इन शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित प्रयोग लायक मूल-भूत संसाधनों का होना जरूरी है।

स्मार्ट सिटी के विकास के साथ केंद्र सरकार द्वारा जो ध्यान देने योग्य प्रावधान किया गया है, वह यह है की एक स्मार्ट सिटी को अपने नजदीकी शहर के विकास में मदद करनी होगी। इस प्रावधान में केंद्र सरकार की विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी सोच की झलक मिलती है। उनका मानना है कि आधुनिक सुविधाओं और विकास को सीमित दायरे तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका लाभ जितना संभव हो सके आस-पास के क्षेत्र के लोगों को भी मिलना चाहिए। केंद्र सरकार की इस बात की भी तारीफ होनी चाहिए कि इस योजना का निर्माण राजनीतिक आग्रहों और दुराग्रहों से मुक्त होकर किया गया है। अगर ऐसा नहीं होता, तो विरोधी विचारधारा, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले राज्य उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक शहरों को इस प्रोजेक्ट में स्थान नहीं मिलता, क्योंकि मोदी जी का भारत के विकास का जो नजरिया है, वह व्यापक है। उनका मानना है कि देश का विकास एक व्यापक लक्ष्य है। इसके लिए कार्य योजना बनाते समय समग्रता से समाज के प्रत्येक वर्ग को ध्यान में रखकर करना है। राष्ट्र के परम वैभव तक पहुंचने तक सभी राजनीतिक दलों को आपसी मतभेद दरकिनार कर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए। इस लिहाज से भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के गर्भ में भविष्य के भारत की छवि छिपी हुई है। देश में कई महानगर हैं। वहां सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। सारे संसाधन उन्नत अवस्था में हैं, लेकिन सही मायने में देश का विकास तभी होगा, जब उन्नत संसाधनों की पहुंच तक राष्ट्र के आम नागरिक को न जाना पड़े, बल्कि वह ही आसानी से उसकी पहुंच में हो।

स्मार्ट सिटी के विकास के बाद राष्ट्र के विकेंद्रकृत व्यवस्था को धरातल पर लाने में भी पूरा सहयोग मिलेगा और विकास आसानी से गांवों की ओर उन्मुक्त होगा, नासमझ लोग मोदी जी पर शहरवादी और पुंजीपतिवादी होने का आरोप लगाते हैं, जबकि वह इस प्रोजेक्ट के माध्यम से पूंजी और पुंजीपतियों की दिशा गावों की ओर करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री की योजना स्मार्ट सिटी के बाद स्मार्ट गांव बनाने की भी है, ताकि छोटे शहर के छात्रों, कलाकारों और उद्यमियों को एक प्लेटफॉर्म दिलाने के बाद गांव के युवाओं को भी बेहतर अवसर के लिए उचित मंच उपलब्ध कराया जा सके। वास्तविक विकसित राष्ट्र की पहचान उसके सर्वाधिक विकसित शहरों से नहीं होती, बल्कि उसके पास कितने सर्वाधिक विकसित शहर हैं,  इससे होती है। तात्पर्य स्पष्ट है कि विकसित राष्ट्र के मुकाम तक पहुंचने के लिए राष्ट्र का विकेंद्रीकृत शहरीकरण एक बड़ी समस्या है। पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस अभिनव प्रयोग ने समृद्ध, सुदृढ़ और सशक्त भारत की नींव रखी है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट जैसी योजनाओं की मदद से ही भारत सही मायने में 21वीं सदी में विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना : बेघरों को घर मिलेंगे


घर किसी भी व्यक्ति का आश्रय स्थल होता है, जहां वह शांति से रहता है. किन्तु ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनका अपना मकान नहीं है. इनमें ऐसे लोग भी सम्मिलित हैं, जो किराये के मकानों में रहते हैं. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन व्यतीत कर देते हैं. जनगणना-2011 के अनुसार देश में लगभग 17.72 लाख लोग बेघर हैं. वर्ष 2001 में हुई जनगणना में यह संख्या लगभग 19.43 लाख थी. इसके अनुसार एक दशक में इस संख्या में कमी आई है. किन्तु इसी समयावधि में शहरी क्षेत्रों में बेघरों की संख्या बढ़ गई, जो चिंता का विषय है. शहरों में बेघरों की संख्या में 1.6 लाख की बढ़ोतरी हुई है. देश के 14 प्रतिशत बेघर लोग देश के शीर्ष पांच महानगरों में रहते हैं. इनकी कुल संख्या 245,490 है. इनमें से ग्रेटर मुंबई में सबसे अधिक बेघर हैं. यहां लगभग 95,755 लोगों के घर नहीं है. दूसरे स्थान पर कोलकाता है, जहां 69,798 लोग बेघर हैं. दिल्ली में 46,724 लोगों के सर पर छत नहीं है. इसी प्रकार चेन्नई में 16,882 और बेंगलुरु में 16,531 लोग बेघर हैं. राज्य की बात करें, तो उत्तर प्रदेश में बेघरों की संख्या सबसे अधिक हैं. यहां पर बेघर लोगों की संख्या 3.19 लाख है. दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां 2.13 लाख लोग बेघर हैं. इसके बाद राजस्थान में 1.78 लाख, मध्य प्रदेश में 1.45 लाख और गुजरात में 1.45 लाख लोगों के पास अपना घर नहीं है. इन बेघर लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे ही लोगों के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना प्रारंभ की है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2016 को उत्तर प्रदेश के आगरा से प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का शुभारंभ किया था। इस योजना का लक्ष्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2022 तक सभी को आवास उपलब्ध कराना है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना केन्द्र शासित दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की गई है।

इस योजना के अंतर्गत अगले तीन वर्ष में कुल एक करोड़ पक्के मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सरकार ने अगले तीन वर्ष के लिए 1,30,075 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जो योजना को वर्ष 2016-17 से लेकर 2018-19 तक लागू करने में काम आएगा। पहले सरकार ने कुल लक्ष्य तीन करोड़ मकानों का रखा था, जिसे बाद में बढ़ाकर चार करोड़ कर दिया गया। इसे वर्ष 2022 तक पूरा किया जाना है। वर्ष 2018-19 तक व्यय होने वाली कुल लागत में केन्द्रीय अंश 81,975 करोड़ रुपये का होगा। इसमें से 60 हजार करोड़ रुपये की पूर्ति बजटीय सहायता द्वारा तथा शेष 20 हजार करोड़ रुपये की पूर्ति कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक से ऋण लेकर की जाएगी। मकान के निर्माण में आने वाली लागत को 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य सरकार के बीच बांटा जाएगा.  उत्तर– पूर्वी और पहाड़ी क्षेत्रों में इसे 90:10 के अनुपात में विभाजित किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत लाभार्थियों का चयन वर्ष 2011 के सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना में दर्शाये गए विभिन्न बिंदुओं को ध्यान में रखकर किया जाएगा। इसमें राज्य सरकारों की भी सहायता ली जाएगी। योजना के अंतर्गत लाभार्थियों के दायरे में गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) सूची के स्थान पर एसईसीसी-2011 के आंकड़ों के अनुसार सभी बेघर परिवार, अनुबंध–1 में दर्शायी गई बहिर्वेशन प्रक्रिया के अधीन शून्य, एक या दो कमरों की कच्ची दीवार या कच्ची छत युक्त मकानों में रहने वाले परिवार सम्मिलित होंगे। लाभार्थियों का चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाएगा। ग्राम सभा उन तथ्यों का सत्यापन करेगी, जिनके आधार पर किसी भी परिवार को योजना के लिए लाभार्थी स्वीकार किया जाएगा।

इस योजना के अंतर्गत सभी लाभार्थियों को मकान बनाने के लिए 1.20 लाख और पहाड़ी क्षेत्रों जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 1.30 लाख की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। लाभार्थी को स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के माध्यम से मकान में शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता का प्रावधान है। मकान के क्षेत्रफल को 20 से 25 वर्ग मीटर कर दिया जाएगा, जिसमें की स्वच्छ खाना पकाने के लिए अलग से स्थान भी सम्मिलित होगा। इससे महिलाओं को अपना रसोईघर भी मिल जाएगा। परियोजना से जुड़े सभी लोगों के लिए गहन क्षमता सर्जक प्रक्रिया रखी जाएगी। ज़िला एवं ब्लॉक स्तर पर आवासों के निर्माण हेतु तकनीकी सुविधाएं प्रदान करने के लिए मदद मुहैया कराई जाएगी। 

लाभान्वितों की वार्षिक सूची की पहचान ग्राम सभा द्वारा सहभागिता पूर्वक की जाएगी। मूल सूची की प्राथमिकता में परिवर्तन के लिए ग्राम सभा को लिखित में न्यायसंगत ठहराना होगा। 
वित्तीय सहायता की राशि सीधा लाभार्थी के बैंक या डाकघर के बचत खाते में हस्तांतरित कर दी जाएगी। किन्तु यह याद रहे की लाभार्थी के खाते में लाभार्थी की सहमति से उसके आधार संख्या की संबद्धता कर दी गई हो। ऋण राशि को 70 हजार रुपये से बढ़ाकर अब दो लाख रुपये कर दिया गया है, नई ऋण योजना के अंतर्गत अब प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के लाभार्थी दो लाख रुपये तक का ऋण ले सकते हैं और उनको इस गृह ऋण पर ब्याज में 3 प्रतिशत की छूट भी दी जाएगी, बशर्ते ये ऋण नया मकान बनाने अथवा मकान के विस्तार के लिए लिया गया हो।

इस योजना के अंतर्गत बनाए जाने वाले मकानों में शौचालय, पेयजल, बिजली, स्वच्छ एवं कुशल ईंधन, तरल अपशिष्ट के शोधन आदि मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने के लिए अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लिया जाएगा। सरकार ने एक तकनीकी सहायता एजेंसी का भी गठन किया है, जो लाभार्थी को वित्तीय सहायता के अतिरिक्त मकान के निर्माण में तकनीकी सहायता भी प्रदान करेगी। प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों द्वारा स्थानीय सामग्रियों का उपयोग करते हुए सुंदर मकान बनाना जाएगा। मकानों की संरचना ऐसी होगी, जो क्षेत्रीय आधार पर उपयुक्त हों, मकानों की रचना में ऐसी विशेषताएं रखी जाएंगी जो उन्हें प्राकृतिक आपदाओं से बचा सकें। 

सरकार पहले से ही शहरी क्षेत्रों के लिए आवास योजना चला रही है. इसके अंतर्गत अब तक लगभग कई लाख मकानों के निर्माण को स्वीकृति मिल चुकी है। इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2022 तक दो करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य रख गया है।

इस योजना से उन लोगों को लाभ होगा, जिनका अपना मकान नहीं है। महंगाई के कारण लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. दो समय का भोजन जुटाने में ही उन्हें बहुत सी समस्याओं को सामना करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में अपने घर का सपना देखना भी उनके लिए असंभव हो गया है. ऐसे ही लोगों के सपनों को पूरा करने के लिए सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना लेकर आई है.  

मकान एक आर्थिक सम्पत्ति है एवं स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डालने के साथ ही सामाजिक उन्नति में योगदान देता है। किसी परिवार के लिए रहने का स्थाई मकान होने के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष फायदे अमूल्य एवं ढेरों हैं। निर्माण क्षेत्र भारत में दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार प्रदाता है। इस क्षेत्र का 250 से भी अधिक अधीनस्थ उद्योगों से संबंध है। ग्रामीण आवास योजना के विकास से ग्रामीण समाज में रोजगारों का सृजन होता है और इससे गांवों के अर्थतंत्र का विकास होता है। रहने के लिए वातावरण बेहतर होने के अप्रत्यक्ष लाभ श्रम उत्पादकता एवं स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव के रूप में होते हैं। पोषण, स्वच्छता, माता एवं बच्चे के स्वास्थ्य समेत मानव विकास के मापदंडों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जीवन स्तर बेहतर होता है। इस योजना से जहां बेघरों को अपने घर मिलेंगे, वहीं रोजगार को बढ़ावा देने में भी यह सहायक सिद्ध होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Wednesday, September 2, 2026

ग्राम उदय से भारत उदय अभियान : गांवों के विकास पर जोर


भारत ग्रामों का देश है। यहां की अधिकांश जनसंख्या गांवों में ही निवास करती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या एक अरब 21 करोड़ है। इसमें 83 करोड़ 31 लाख ग्रामीण और 37 करोड़ 71 लाख शहरी जनसंख्या है। पिछले एक दशक में ग्रामीण जनसंख्या में नौ करोड़ चार लाख 70 हजार और शहरी में नौ करोड़ 10 लाख की बढ़ोत्तरी हुई है। देश की जनसंख्या का 68.84 प्रतिशत भाग ग्रामीण और 31.16 प्रतिशत शहरी है। सर्वाधिक 89.96 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या हिमाचल प्रदेश में और सबसे अधिक 97.50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या दिल्ली में है। इतना ही नहीं, हमारी अर्थव्यवस्था भी कृषि पर आधारित है। घटती कृषि भूमि और बेरोजगारी के कारण लोग गांवों से पलायन करके शहरों में आकर बस रहे हैं। इसके कारण शहरों पर जनसंख्या का दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति न गांवों के लिए अच्छी है और न ही शहरों के लिए अच्छी है। ऐसे में आवश्यक है कि गांवों का विकास किया जाए और ग्रामीणों को सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि जनसंख्या का पलायन रुक सके। 
 
केन्द्र सरकार गांव और ग्रामीणों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। इन योजनाओं के प्रति ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इसके अंतर्गत 14 अप्रैल से लेकर 24 अप्रैल, 2016 तक ग्राम उदय से भारत उदय अभियान का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर मध्य प्रदेश के महू में इस अभियान का शुभारंभ किया। समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर ने समाज में अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने समानता और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने कहा कि विकास की पहलों को ग्रामीण विकास पर केंद्रित होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने कि विकास की पहलों को ग्रामीण विकास पर केंद्रित होना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा की गई कुछ महत्वपूर्ण विकास पहलों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 1000 दिनों की समय सीमा के भीतर उन 18000 गांवों का विद्युतीकरण किया जा रहा है, जो बिजली की सुविधा से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि ‘गर्व’ एप के जरिये लोग इस लक्ष्य की प्राप्ति में हो रही प्रगति का अवलोकन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि गांवों में डिजिटल कनेक्टिविटी आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रामीणों की क्रय क्षमता को निश्चित तौर पर बढ़ाना है, क्योंकि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि पंचायती राज से जुड़े संस्थानों को और ज्यादा मजबूत एवं ज्यादा जीवंत बनाया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार राज्यों और पंचायतों के सहयोग से आयोजित ग्राम उदय से भारत उदय अभियान पंचायती राज दिवस अर्थात 24 अप्रैल तक चला। इस अभियान का लक्ष्य देश के समस्त गांवों में पंचायती राज वय व्यवस्था को सुदृढ़ करके सामाजिक सद्भाव बढ़ाने, ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने, किसानों की प्रगति और गरीब लोगों की जीविका के लिए राष्ट्रव्यापी प्रयास करना है। इस अभियान के अंतर्गत 14 से 16 अप्रैल के मध्य सभी ग्राम पंचायतों में पंचायती राज मंत्रालय और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से एक ‘सामाजिक समरसता कार्यक्रम’ का आयोजन किया गया। इसमें ग्रामीणों ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर की शिक्षाओं के आलोक में सामाजिक सद्भाव को मजबूत बनाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर संबंधित अधिकारियों ने ग्रामीणों को सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की विभिन्न योजनाओं से संबंधित सूचना उपलब्ध कराई। इसके पश्चात 17 से 20 अप्रैल तक ग्राम पंचायतों में ग्राम किसान सभाओं का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का लक्ष्य कृषि को बढ़ावा देना है। इन सभाओं में कृषि से संबंधित सरकार की योजनाओं के विषय में जानकारी उपलब्ध कराई गई। किसानों की समस्याओं के बारे में भी चर्चा की गई। देश भर में 21, 22, 23 और 24 अप्रैल को ग्राम सभा की बैठकों का आयोजन किया गया। इस दिन गांवों में प्रभातफेरियां निकाली गईं, स्वच्छता पर कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें बताया गया कि स्वच्छता क्यों आवश्यक है। इसके अतिरिक्त खेलकूद की स्पर्धाएं भी हुईं। समारोह के अंत में रंगारंग सासंकृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

उल्लेखनीय है कि इस ग्राम उदय से भारत उदय अभियान के दौरान स्थानीय आर्थिक विकास के लिए ग्राम पंचायत विकास योजनाएं, पंचायती राज  संस्थाओं को मिलने वाली राशि के समुचित उपयोग के लिए उपलब्ध निधियों, स्वच्छ पेयजल एवं स्वच्छता, ग्राम एवं ग्रामीण विकास में महिलाओं की भूमिका, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों, दिव्यांग व अन्य हाशिये पर रहने वाले वर्गों के कल्याण आदि विषयों पर चर्चा की गई। इसके साथ ही अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों को सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न योजनाओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई गई। पंचायती राज दिवस पर 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने झारखंड के जमशेदपुर में इसके समापन समारोह को संबोधित करते हुए ग्रामीण विकास के सरकार के संकल्प को दोहराया।

केन्द्र सरकार की किसानों के जीवन स्तर को सुधारने और ग्राम स्तर पर आधारभूत ढांचे के उन्नयन संबंधी कार्यक्रमों को सफलता भी मिल रही है। सरकारी योजनाओं का लाभ गांव के सभी पात्रों तक पहुंचना चाहिए। ग्रामीणों की समृद्धि से गांवों में विकास का उजियाला आएगा और इससे देश भी प्रकाशमान होगा।
 



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

सेतु भारतम योजना : आवाजाही और सुगम होगी


रेलवे क्रॉसिंग पर पुल न होने के कारण अकसर दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इससे जान-माल की काफी हानि होती है। इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार प्रयासरत है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर पुलों के निर्माण और सुरक्षित व सहज यात्रा के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 4 मार्च, 2016 को नई दिल्ली में सेतु भारतम योजना का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क होना अति आवश्यक है। लोगों की आकांक्षाओं और लंबे समय से महसूस की जा रही जरूरत को पूरा करने के लिए देश के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए गुणात्मक परिवर्तन लाना जरूरी है। विकास में व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। 

सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग व जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार सेतु भारतम परियोजना का लक्ष्य वर्ष 2019 तक सभी राष्ट्रीय राजमार्गों को रेलवे स्तरीय क्रॉसिंग से मुक्त बनाना है। क्रॉसिंग पर बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं और जान-माल की हानि को रोकने के लिए ऐसा किया जाना है। इस योजना में 20,800 करोड़ रुपये की लागत से 208 रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी)/रेलवे अंडर ब्रिज (आरयूबी) का निर्माण किया जाएगा। इनमें आंध्र प्रदेश में 33, असम में 12, बिहार में 20, छत्तीसगढ़ में 5, गुजरात में 8, हरियाणा में 10, हिमाचल प्रदेश में 5, झारखंड में 11, कर्नाटक में 17, केरल में 4, मध्य प्रदेश में 6, महाराष्ट्र में 12, ओडिशा में 4, पंजाब में 10, राजस्थान में 9, तमिलनाडु में 9, उत्तराखंड में 2, उत्तर प्रदेश में 9 और पश्चिम बंगाल में 22 ब्रिज बनाए जाएंगे।

इसके अतिरिक्त लगभग 1500 पुराने और खस्ता हाल पुलों को करीब 30 हजार करोड़ रुपये की लागत से चरणबद्ध तरीके से प्रतिस्थापन/चौड़ीकरण/मजबूत बनाकर सुधारा जाएगा। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश में नोएडा स्थिति इंडियन अकेडमी फॉर हाइवे इंजीनियर में एक भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली भी स्थापित की है। इसका उद्देश्य मोबाइल इंस्पेक्शन यूनिटों की मदद से देश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर बने सभी पुलों का कंडीशन सर्वे करना है। इस उद्देश्य के लिए 11 सलाहकार कंपनियों को नियुक्त किया गया है। हजारों पुलों का ब्योरा तैयार किया गया है। यह अपनी तरह का सबसे बड़ा डाटा बेस होगा। इससे राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवाजाही और सुगम होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Tuesday, September 1, 2026

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना : राह हुई आसान


किसी की क्षेत्र के विकास के लिए सड़क का होना बहुत आवश्यक है। जहां सड़कें होंगी, वहां यातायात के साधन भी होंगे। इससे उस क्षेत्र के लोगों का आवागमन सुगम होगा। देश में आज भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां सड़कें नहीं हैं। ऐसे भी क्षेत्रों की कमी नहीं है, जहां सड़कों की स्थित अच्छी नहीं है। इन क्षेत्र के निवासियों को यातायात में असुविधा का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार ग्रामीण सड़क संपर्क आर्थिक और सामाजिक सेवाओं तक पहुंच का संवर्धन करते हुए और फलस्वरूप भारत में कृषि आय और उत्पादक रोजगार अवसरों का अधिक मात्रा में सृजन करते हुए ग्रामीण विकास का न केवल एक मुख्य घटक है, अपितु स्थायी रूप से गरीबी निवारण कार्यक्रम का भी एक मुख्य भाग है। पिछले वर्षों में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य और केन्द्र स्तरों पर किए गए प्रयासों के बावजूद देश में अभी भी लगभग 40 प्रतिशत बसावटें बारहमासी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। यह सर्वविदित है कि जहां पर सड़क संपर्क उपलब्ध भी कराया गया है, वहां निर्मित सड़कों की स्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें बारहमासी सड़कों के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सके। 

इस स्थिति को सुधारने के लिए केन्द्र सरकार ने 25 दिसम्बर, 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की थी। यह शत-प्रतिशत केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजना है। इस कार्यक्रम के लिए हाई स्पीड डीजल पर 50 प्रतिशत उपकर निर्धारित है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों से न जुड़ी बसावटों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना है, जिसमें आवश्यक पुलियां और क्रास-ड्रेनेज भी सम्मिलित हैं। इस योजना के अंतर्गत उन जिलों में मौजूदा सड़कों को सुधारने की अनुमति दी जाएगी, जहां निर्दिष्ट जनसंख्या वाली सभी बसावटों को बारहमासी सड़क संपर्कता प्रदान की गई है। यह सुधार-कार्य कार्यक्रम का केन्द्र बिन्दु नहीं है और इस स्थिति में यह उन राज्यों के राज्य आवंटन के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है, जहां वे बसावटें मौजूद हैं,  जो अभी भी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। सुधार कार्य में कोर नेटवर्क में सामान्य और सभी सड़कों को बारहमासी सड़कों में बदलने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके कई मार्गदर्शक सिद्धांत और परिभाषाएं हैं, जैसे प्रधानमंत्री सड़क योजना की भावना और उद्देश्य सड़क से न जुड़ी बसावटों को बेहतर बारहमासी सड़कें प्रदान करना है। यह सुनिश्चित किया जाए कि नये सड़क संपर्क के प्रावधान को कार्यक्रम के उद्देश्य को ध्यान में रखकर वरीयता दी जाएगी, यानी वे बसावटें जो अभी सड़कों से जुड़ी हुई नहीं हैं। 
 
बसावटों की जनसंख्या के आकार से संबंधित है। जनगणना 2001 में दर्ज की गई जनसंख्या बसावट के जनसंख्या आकार को निर्धारित करने का आधार होनी चाहिए तथा इसी के आधार पर जिला ग्रामीण सड़क योजनाएं और कोर नेटवर्क बनाए/संशोधित किए जाने चाहिए। सड़कों से न जुड़ी बसावट, वह बसावट है जिसमें निर्दिष्ट आकार की जनसंख्या है, जो बारहमासी सड़क अथवा सड़क से जुड़ी बसावट से कम से कम 500 मीटर या इससे अधिक की दूरी पर स्थित है। पहाड़ों के मामले में 1।5 किलीमीटर पैदल दूरी पर हैं। सड़कों से न जुड़ी बसावटों को बारहमासी सड़क अथवा अन्य मौजूदा बारहमासी सड़क से पहले से ही जुड़ी समीपवर्ती बसावटों से जोड़ा जाना होता है, जिससे सड़कों से न जुड़ी बसावट में प्राप्त न होने वाली शिक्षा, स्वास्थ्य, विपणन आदि सुविधाएं  निवासियों को मिल सकें। इस कार्यक्रम के लिए इकाई राजस्व गांव अथवा पंचायत न होकर एक बसावट है। क्षेत्र में रहने वाली जनसंख्या के समूह, जो लंबे समय तक स्थान नहीं बदलते हैं, बसावट करते हैं। देद्गाम, धानिस, तोलास, माजरस, हैम्लिट आदि बसावटों की व्याख्या के लिए सामान्य रूप से प्रयोग में आने वाले शब्द हैं। एक राजस्व गांव/ग्राम पंचायत में एक या इससे अधिक बसावटें हो सकती हैं। जनसंख्या आकार को निर्धारित करने के प्रयोजनार्थ 500 मीटर की दूरी के भीतर (पहाड़ों के मामले में 1।5 कि।मी। पैदल दूरी) सभी बसावटों की जनसंख्या को एक साथ शामिल किया जा सकता है। समूहगत नीति अनेक बसावटों खासकर पहाड़ी/पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क के प्रावधान को सक्षम बनाएगी।

कोर नेटवर्क सड़कों का ऐसा अल्प नेटवर्क है, जो कम से कम एक बारहमासी सड़क संपर्कता के  माध्यम से चुनिंदा क्षेत्रों में सभी पात्र बसावटों को अनिवार्य सामाजिक आर्थिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है। कोर नेटवर्क में थ्रू रूट्स और लिंक रूट्स सम्मिलित हैं। थ्रू रूट वे हैं, जिनसे कई संपर्क सड़कों या कई गांवों से यातायात आकर चलता है और यह उच्च श्रेणी की सड़कों अर्थात् जिला सड़कों या राज्य अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग के माध्यम से सीधे विपणन  केन्द्रों से जुड़े होते हैं। लिंक रूट वे सड़कें हैं, जो किसी एक बसावट या बसावटों के एक समूह को थ्रू रूटों या जिला सड़कों से जोड़ती हैं और ये विपणन केन्द्रों तक जाती हैं। लिंक रूट सामान्यतः किसी बसावट की सीमा खत्म होने पर समाप्त हो जाते हैं। हालांकि थ्रू रूट दो या अधिक लिंक रूटों को मिलाकर तथा मुख्य सड़क या विपणन केन्द्र से उत्पन्न होते हैं। यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत शुरू किया गया प्रत्येक सड़क कार्य कोर नेटवर्क का भाग है। सड़क संपर्क के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन सड़कों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो संयोगवद्गा अन्य बसावटों के काम आती हैं। इस योजना के अंतर्गत उन सड़कों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो अधिक आबादी के काम आती है। यद्यपि मैदानी क्षेत्रों में सड़क से 500 मीटर की दूरी वाली बसावटों को सड़क से जुड़ा हुआ माना गया है, पर्वतीय क्षेत्रों यह दूरी 1।5 किलोमीटर होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना केवल ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करेगी। द्राहरी सड़कें इस कार्यक्रम के क्षेत्र से बाहर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह योजना केवल उन्हीं ग्रामीण सड़कों को कवर करती है, जो पहले से ही ’अन्य जिला सड़कों’ तथा ’ग्राम सड़कों’ के रूप में वर्गीकृत थीं। अन्य जिला सड़कें ऐसी सड़कें हैं, जो उत्पादन वाले ग्रामीण क्षेत्रों में काम में आती हैं और बाजार केन्द्रों, तालुका मुख्यालयों, ब्लाक मुख्यालयों या अन्य मुख्य सड़कों तक जाने का मार्ग देती हैं। ग्राम सड़कें ऐसी सड़कें हैं, जो गांवों / बसावटों या बसावट के समूहों को एक-दूसरे से तथा उच्च श्रेणी की समीपवर्ती सड़क से जोड़ती हैं। इस योजना के अंतगर्त मुख्य जिला सड़कों, राज्य राजमार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग को शामिल नहीं किया जा सकता है, चाहे वे ग्रामीण क्षेत्रों में ही आती हों। यह नई सड़क संपर्कता या उन्नयन कार्यों पर लागू है। इस योजना में केवल एकल सड़क संपर्कता की ही व्यवस्था है। यदि कोई बसावट पहले ही बारहमासी सड़कों के माध्यम से किसी अन्य सड़क से जुड़ी बसावट से जुड़ी हुई है, तो उस बसावट में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत कोई अन्य कार्य शुरू नहीं किया जा सकता है।

सड़कों से न जुड़ी बसावटों के लिए सड़क संपर्क का प्रावधान नये सड़क संपर्क के रूप में माना जाएगा। नये सड़क संपर्क में मिट्टी कार्य स्तर से वांछित विनिर्देद्गान तक सड़कों का निर्माण समाविष्ट है तथा इसलिए उसमें निरपवाद रूप से कुछ मिट्टी कार्य शामिल होगा। पहाड़ी क्षेत्रों के मामले में काट-छांट शामिल होगा। मौजूदा बजरी या पक्की सड़कें नये सड़क संपर्क कार्य के रूप में स्वीकार करने के योग्य नहीं होगी, चाहे वहां पर कैरेज-वे और सड़क को चौड़ा करने का कुछ मिट्टी कार्य हुआ है। ऐसे सड़क, जिस पर केवल मिट्टी कार्य किया गया है, उसे नये सड़क संपर्क के रूप में माना जाएगा। सुधार में अनुमति मिलने पर सड़क को चौड़ा किया जाएगा। क्रास ड्रैनेज कार्य का प्रावधान ही इस योजना के अंतर्गत उन्नयन कार्य के रूप में माना जाएगा।  ग्रेवल की सड़क वह सड़क होती है जिस का निर्माण सुसंघटित बजरी तथा रोड़ी सामग्री का उपयोग करके किया जाता है, जो पक्की होती है और गीली होने पर फिसलनदार नहीं होती है। वाटर बांऊड मैकेडम सड़क की वह परत है, जो मशीब द्वारा बारीक या टुकड़े वाली सामग्री से रिक्त स्थान को पूरी तरह भर कर तैयार की जाती है।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का मुख्य लक्ष्य सम्पर्क विहीन बसावटों को बारहमासी सम्पर्क सड़क प्रदान करना है। बारहमासी सड़क वह है जो सभी मौसम में प्रयोग के योग्य होती है। इसका तात्पर्य यह है कि सड़क के अंतगर्त उपयुक्त आर-पार नालियों जैसे पुलियों, छोटे पुलों एवं सेतुकों का निर्माण किया गया हो और जिसमें उचित संख्या एवं अवधि में यातायात की बाधा को  स्वीकृति दी गई हो। पैदल पथ पर हर मौसम में काम में आने योग्य होना चाहिए, परन्तु इसमें यह आवश्यक नहीं है कि इस पर खड़ंजा लगाया जाए या चौरस बनाया जाए या तारकोल बिछाकर पक्का किया जाए। ऐसी सड़कें भी हो सकती हैं, जिन्हें सामान्य मौसम की सड़कें मानी जाती हों। दूसरे शब्दों में, आरपार नालियों के कार्यों के अभाव में वे मात्र मौसम में उपयोगी होती हैं। ऐसी सड़कों का बारहमासी सड़कों में बदलाव सुधार माना जाएगा। मात्र आरपार नालियों के कार्यों के प्रावधान को भी सुधार माना जाएगा। परन्तु यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के समस्त सड़क कार्यों में अपेक्षित आरपार नालियों के कार्यों का प्रावधान एक अत्यावश्यक तत्व समझा गया है।

इस योजना में तारकोल बिछी या सीमेंट से बनी सड़कों की मरम्मत करने की अनुमति नहीं दी गई है, भले ही सतह की स्थिति खराब हो गई हो। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनाई गई ग्रामीण सड़कें तकनीकी विशिष्टताओं के अनुरूप हों। इसमें ग्रामीण सड़क नियम-पुस्तिका में बताए अनुसार इंडियन रोड्स कांग्रेस द्वारा निर्धारित विशिष्टताओं को अपनाया जाएगा।

सरकार की इस योजना से अनेक क्षेत्रों में पक्की सड़कें बन गईं। दूर-दराज के क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ दिया गया, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में आसानी हो गई। इस क्षेत्र में अभी बहुत काम होना शेष है।




(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना : धुएं से मुक्ति


भोजन पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है। ग्रामीण परिवारों में आज भी महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकाती हैं। ईंधन के रूप में लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है। इन चूल्हों से धुआं होता है। धुएं के कारण जहां वायु प्रदूषण फैलता है, वहीं महिलाएं कई प्रकार के रोगों की चपेट में आ जाती हैं। धुएं के कारण उन्हें फेफड़ों और नेत्र संबंधी रोग हो जाते हैं। ईंधन के रूप में लकड़ियों का प्रयोग करने से ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार पेड़ कम हो रहे हैं।

ग्रामीण महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना शुरू की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 मई, 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का शुभारंभ किया। इससे पहले 29 फरवरी, 2016 को केंद्रीय बजट में 8000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ तीन वर्षों की अवधि के दौरान बीपीएल परिवारों को पांच करोड़ एलपीजी कनेक्शन जारी करने की घोषणा की गई थी। इस योजना के अंतर्गत गरीब महिलाओं को निशुल्क गैस कनेक्शन उप्लब्ध कराए जाएंगे। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जो परिवार गरीब श्रेणी में रखे गए थे या बीपीएल श्रेणी में रखे गए थे, उन्हें इस योजना का लाभ दिया जाएगा। 

इस योजना के क्रियान्वयन के लिए प्राथमिकता वाले राज्यों के रूप में राष्ट्रीय औसत से कम एलपीजी कवरेज वाले 14 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी राज्यों और सभी पूर्वोत्तर राज्यों की पहचान की गई थी। अधिकतम कनेक्शनों वाले शीर्ष पांच राज्यों में उत्तर प्रदेश (46 लाख), पश्चिम बंगाल (19 लाख), बिहार (19 लाख), मध्य प्रदेश (17 लाख) और राजस्थान (14 लाख) सम्मिलित हैं। दिसंबर, 2016 तक जारी किए गए कुल कनेक्शनों में लगभग 75 प्रतिशत भाग इन्हीं पांचों राज्यों का था। लाभार्थियों में बड़ी संख्या एससी/एसटी परिवारों की ही है। 35 प्रतिशत कनेक्शन इन्हीं परिवारों को जारी किए जा रहे हैं। अब यह योजना 35 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में क्रियान्वित की जा रही है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की ओर से सभी बीपीएल परिवारों को 1600 रूपये की वित्तीय सहायता देने का प्रावधान रखा गया है। इस योजना का लाभ लेने के लिए सबसे पहले 2011 की जनगणना की सूची में अपना नाम देखना होगा। यदि वहां पर उनका नाम आया है, तो वे गैस कनेक्शन के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इच्छुक बीपीएल परिवार की महिला सदस्य निर्धारित आवेदन पत्र भरकर अपने नजदीकी एलपीजी वितरण केंद्र में जमा करा सकती है। याद रहे कि जिन बीपीएल परिवारों के पास योजना के आरंभ के समय तक एलपीजी कनेक्शन नहीं है, केवल वही योजना के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस योजना का लाभ लेने के लिए सभी दस्तावेज को आवेदन पत्र के साथ संलग्न करना होगा और उसके बाद उन्हें अपने नजदीकी एलपीजी गैस वितरक के पास जाकर जमा कराना होगा। इस दस्तावेजों में दो पासपोर्ट साइज फोटो, बीपीएल राशन कार्ड, एक फोटो पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट की प्रति, राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित स्व-घोषणा पत्र, जीवन बीमा पॊलिसी, बैंक स्टेटमेंट, बीपीएल सूची में नाम का प्रिंट आउट आदि शामिल हैं। आवेदन पत्र को संबंधित वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है। आवेदन पत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मिल जाएगा। इच्छुक अपनी भाषा के अनुसार आवेदन को डाउनलोड कर सकते हैं और आवेदन पत्र को भरकर और सभी दस्तावेजों को एक साथ जोड़ कर अपने नजदीकी किसी भी एलपीजी वितरक के पास जमा करके इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। 

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों के लिए इस योजना को शुरू करने के प्रथम वर्ष में 2।20 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं। एसईसीसी 2011 के डेटा से यह जानकारी उभर कर सामने आई है। यह वित्त वर्ष के लिए तय 1।5 करोड़ कनेक्शनों के लक्ष्य से अधिक है। वित्त वर्ष 2016-17 में तेल विपणन कंपनियों ने देश भर में 3।25 करोड़ नये कनेक्शन दिए हैं। यह किसी भी वर्ष में अब तक जारी किए गए सर्वाधिक कनेक्शन हैं। अप्रैल, 2017 तक सक्रिय एलपीजी उपभोक्ताओं की कुल संख्या 20 करोड़ के पार चली गई है। यह वर्ष 2014 में आंके गए 14 करोड़ सक्रिय एलपीजी उपभोक्ताओं की तुलना में काफी अधिक है। देश में एलपीजी की मांग में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले तीन वर्षों में 4600 से अधिक नये वितरक बने हैं, जो मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित हैं।

50 प्रतिशत नये उपभोक्ता रिफिल के लिए वापस आ चुके हैं। इस योजना को भागीदारी मोड में क्रियान्वित किया गया है, जिनमें लाभार्थी, निर्वाचित प्रतिनिधि, प्रतिष्ठित हस्तियां, स्थानीय प्रशासन इत्यदि शामिल हैं। इस योजना को लोकप्रिय बनाने और लाभार्थियों को सुरक्षा मानकों के बारे में जागरूक करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में प्रचार-प्रसार की विशेष संचार रणनीति पर अमल किया गया। इसमें संचार के समस्त माध्यमों का उपयोग किया गया और इस योजना के क्रियान्वयन की निगरानी की भी व्यवस्था की गई है। इस योजना ने एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है और बड़ी संख्या में लाभार्थी अपने यहां एलपीजी सिलेंडर की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए आवेदन कर रहे हैं।

सुरक्षा एवं एलपीजी के सुरक्षित उपयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। योजना के समस्त लाभार्थियों के घरों में मैकेनिक के माध्यम से एलपीजी सिलेंडर लगवाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं, ताकि लाभार्थियों को एलपीजी के सुरक्षित एवं समुचित उपयोग के बारे में सही ढंग से बताया जा सके। इसी तरह योजना के लाभार्थियों के लिए देश भर में नियमित रूप से सुरक्षा शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे उन्हें एलपीजी के सुरक्षित उपयोग के बारे में अवगत कराया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वर्ष के भीतर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की संख्या दो करोड़ को पार करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था, ''बहुत खुशी और गर्व की बात है कि एक वर्ष के भीतर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की संख्या दो करोड़ को पार कर गई है।'' 

वास्तव में इस योजना से गरीब महिलाओं के जीवन में गुणात्मक बदलाव आने लगा है। उन्हें धुएं से मुक्ति मिली है और भोजन पकाने में उन्हें अब असुविधा का सामना भी नहीं करना पड़ता।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Monday, August 31, 2026

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ : सक्षम होंगी बेटियां


जिस देश में नारी को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है, उस देश में कन्याओं के प्रति घृणा की मानसिकता का पैदा होना तुच्छ कहा जाएगा। अधिकतर माता-पिता अपनी संतान के रूप में पुत्र की कामना करते हैं। पुत्र की अभिलाषा में वे अवैध रूप से भ्रूण की जांच कराते हैं। सरकार की पाबंदी के बाद भी चोरी-छिपे लिंग जांच का कार्य चल रहा है। भ्रूण के कन्या होने पर लोग गर्भपात करा देते हैं। इसी कारण देश में लड़कियों का अनुपात निरंतर कम हो रहा है। वर्ष 2001 में की गई गणना के अनुसार प्रति 1000 लड़को में 927 लड़कियां थीं। इसके एक दशक बाद यह आंकड़ा गिरकर वर्ष 2011 में 918 हो गया। 

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए केंद्र सरकार बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ योजना चला रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में यह योजना प्रारंभ की थी। इस योजना का उद्देश्य कन्या भ्रूणहत्या को रोकना और बेटियों को सुरक्षा प्रदान करना है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के लिए 100 करोड़ की प्रारंभिक राशि की घोषणा की थी। सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कार्य करने पर बल दे रही है। इसके लिए 50 करोड़ रुपये का फंड दिया जाएगा,  जिससे मुख्यतः महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधा दी जाएगी। एक बटन के माध्यम से संदेश आवाज के साथ ही चित्र के माध्यम से सुरक्षा के लिए सहायता मांगने की सुविधा दी जाएगी। यदि कोई दुर्घटना हो गई है, तो इस स्थिति में उचित कार्यवाही के लिए संकट प्रबंधन केंद्र की सुविधा दी जाएगी। इस योजना के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कई विज्ञापन, स्लोगन एवं पोस्टर बनाए गए हैं। 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अंतर्गत कई कार्यक्रम हैं। सुकन्या समृद्धि योजना इसकी सबसे महत्वपूर्ण योजना है। इसके अंतर्गत 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं के लिए एक बैंक खाता खोला जाता है। कन्या की आयु कम होने के कारण इस खाते की देखरेख उसके माता-पिता द्वारा की जाएगी। इस खाते पर 9।1 वार्षिक चक्रवर्ती ब्याज दिया जाएगा।  यह दर बढ़ाई भी जा सकती है। सुकन्या समृद्धि खाता खोलने के लिए कई प्रमाण-पत्रों की आवश्यकता होती है, जिनमें बेटी का जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता या अन्य संरक्षक का पते का प्रमाण पत्र और परिचय पत्र आदि सम्मिलित हैं।

सुकन्या समृद्धि खाते को खोलने के लिए इसमें 1000 रुपये की न्यूनतम राशि ली जाएगी, जो खाते में ही जमा होगी। प्रति वर्ष इसमें न्यूनतम 100 रुपये जमा करना अनिवार्य हैं, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाएगा।  इसकी अधिकतम 150000 प्रति वर्ष की राशि तय की गई हैं। इस खाते के शुरू होने की तारीख से 14 वर्ष तक इसमें राशि जमा की जा सकती हैं। अतः 15 से 21 वर्ष तक इस खाते मे अन्य राशि जमा नहीं की जा सकती। लड़की की आयु 18 वर्ष हो जाने पर इस खाते से 50 प्रतिशत की राशि उसकी पढ़ाई एवं विवाह के लिए निकाली जा सकती हैं। सुकन्या समृद्धि खाते की आयु उसे खोलने वाली तारीख से 21 वर्ष तय की गई है, जिसे 14 वर्ष तक इस खाते में रुपये जमा करने की सुविधा दी गई है। 21 वर्ष की अवधि के बाद इस खाते से धनराशि प्राप्त होगी।

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने 29, जनवरी,  2018 को संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत करते हुए बताया था कि पिछले 10 से 15 वर्षों में महिलाओं की क्षमता का दृष्टिकोण और परिणामों के संबंध में 17 में से 14 संकेतकों पर भारत का प्रदर्शन बेहतर रहा है। इनमें से 7 संकतकों में सुधार कुछ ऐसा रहा है कि भारत की स्थिति विकास के स्तरों को मापने के बाद अनेक देशों में सामान दिखाई देती है। अच्छी बात यह है कि महिलाओं से जुड़े परिणाम समानभिरूपता का पैटर्न दर्शाते हैं, जो समान अवसर के देशों के मुकाबले भारत में काफी हद तक समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ इतने बेहतर होते जाते हैं कि जन पहलुओं पर यह पिछड़ भी रहे हैं, वहां समय के साथ इनके और आगे बढ़ने की उम्मीद बढ़ती जाती है। दूसरे संकेतकों मुख्यतः रोजगार और परिवर्तनीय गर्भनिरोध के प्रयोग और पुत्र की चाह के संबंध में, भारत को अभी कुछ दूरी और तय करनी है क्योंकि विकास इन समस्याओं का समाधान नहीं बन पाया है। भारत के भीतर ही काफी विविधता दिखाई देती है। जहां पूर्वोत्तर के राज्यों में ने अन्य राज्यों के मुकाबले लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है और वह इसलिए नहीं हुआ कि वे समृद्ध है;  भीतरी राज्य इस मामले में पिछड़ गए हैं। हालांकि हैरानी की बात यह है कि दक्षिणी राज्य अपने विकास स्तरों की तुलना में इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। महिला पुरूष भेदभाव की चुनौती लंबे समय से, शायद सदियों से चली आ रही है। इसीलिए सभी पक्ष समग्र रूप से इसके समाधान के लिए जिम्मेदार है। भारत को पुत्र के लिए, यहां तक कि अधिक पुत्रों के लिए समाज की इस प्रबल चाह पर विचार करना चाहिए, जो विकास से अप्रभावित दिखाई देती है। महिलाओं और पुरुषों में प्रतिकूल लिंग अनुपात के कारण ‘गुमशुदा’ महिलाओं की समस्याओं की पहचान हो पाई है। लेकिन अधिक पुत्रों की चाह जनन क्षमता रोकने के नियमों में भी प्रतिबिंबित हो सकती है, जो अंतिम संतान के लिए लिंग पर आधारित हो और जो संभवतः ‘अवांछित’ कन्याओं के वर्गों को जन्म देती है- ऐसी कन्याओं की संख्या 21 मिलियन के लगभग आंकी गई है। समाज का यह उद्देश्य होना चाहिए कि यह घृणित श्रेणियां निकट भविष्य में इतिहास बन जाए। सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना और अनिवार्य मातृत्व अवकाश नियमावली सही दिशा में उठाया गया कदम है।

निसंदेह, केन्द्र सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना से बेटियां सक्षम होंगी। वे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगी और उनके विवाह के लिए धन की भी कोई समस्या नहीं होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है