Sunday, August 23, 2026

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जीते जी सम्मानों से बहुत परहेज करते थे अटल जी

  


जीते जी सम्मानों से बहुत परहेज करते थे अटल जी

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना : युवा कुशल होंगे


जीवनयापन के लिए रोजगार होना आवश्यक है. रोजगार प्राप्त करने के लिए कुशल होना अति आवश्यक है. किसी भी कार्य के लिए उसकी जानकारी होनी चाहिए. युवाओं के समक्ष बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. इसके साथ अकुशलता भी एक चुनौती है. जो युवा कुशल हैं, उन्हें कहीं न कहीं कार्य मिल ही जाता है,  किन्तु जो अकुशल हैं, उन्हें काम पाने के लिए बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है.  ऐसे ही युवाओं को कुशल करने के लिए केन्द्र सरकार दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना चला रही है। इसका उद्देश्य गरीब ग्रामीण युवाओं को नौकरियों में नियमित रूप से न्यूनतम पारिश्रमिक के समान या उससे अधिक मासिक पारिश्रमिक प्रदान करना है। यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए की क्रियान्वित की जा रही है। आजीविका गरीबी कम करने के लिए एक मिशन है, जो राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का एक भाग है। इस योजना से 550 लाख से अधिक ऐसे गरीब ग्रामीण युवाओं को लाभ होगा, जो कुशल होना चाहते हैं। इस योजना के द्वारा गरीबी को कम करने का भी प्रयास किया जा रहा है। इसकी संरचना प्रधानमंत्री के अभियान 'मेक इन इंडिया' के लिए एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में की गई है।

परिवारों को नियमित रूप से काम मिलेगा, उनका रोजगार स्थायी होगा, तो इससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। इससे गरीबी कम करने में मदद मिलेगी। गरीबों को आर्थिक अवसरों की बहुत आवश्यकता है। इसलिए उनके कार्य क्षमताओं को विकसित करने के संबंध में भी अपार अवसर हैं। देश के जनसांख्यिकीय अधिशेष को एक लाभांश में विकसित करने के लिए सामाजिक एकजुटता के साथ ही मजबूत संस्थानों के एक नेटवर्क का होना अति आवश्यक है। भारतीय और वैश्विक नियोक्ता के लिए ग्रामीण गरीबों को वांछनीय बनाने के लिए कौशल्य के वितरण के लिए गुणवत्ता और मानक सर्वोपरि हैं। इस योजना के अंतर्गत कई कार्य किए जाते हैं, जिनमें  कौशल्य एवं नियोजन, अवसर पर समुदाय के भीतर जागरूकता पैदा करना, गरीब ग्रामीण युवाओं की पहचान करना, परिक्षण व कार्य में रुचि रखने वाले ग्रामीण युवाओं को इकट्ठा करना, युवाओं और उनके माता-पिता की काउंसिलिंग तथा योग्यता के आधार पर उनका चयन करना, रोजगार के अवसर को बढ़ाने के लिए ज्ञान, उद्योगों से जुड़े कौशल और मनोदृष्टि प्रदान करना, ऐसी नौकरियां प्रदान करना, जिनका सत्यापन स्वतंत्र जांच करने के तरीकों से किया जा सके और जो न्यूनतम पारिश्रमिक से अधिक भुगतान करती हों आदि सम्मिलित है। यह नियुक्ति के बाद कार्यरत व्यक्ति को स्थिरता के लिए सहायक भे है। 

यह योजना युवाओं को प्रशिक्षण देगी, जिससे उनके करियर में प्रगति होगी। युवाओं का विकास होगा और गरीब और हाशिये पर खड़े लोग लाभ लेने के लिए सक्षम बनेंगे। बेरोजगारी के कारण होने वाले पलायन में कमी आएगी।  यह राज्यों को कौशल्य परियोजनाओं का पूर्ण स्वामित्व लेने के लिए सक्षम बनाती है। यह निर्णय किया गया है कि अब और किसी बहु राज्यीय परियोजनाओं पर विचार नहीं किया जाएगा। एकल राज्य परियोजना से वार्षिक कार्य योजनाओं के लिए राज्य सरकार मुख्य निर्धारक है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्रालय के सहयोग से उत्तर पूर्व के राज्यों की विशेष आवश्यकताओं और जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास के लिए विशिष्ट परियोजनाएं हैं। परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों की क्षमता बढ़ाना भी इसमें सम्मिलित है।

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना के कई विशेष घटक हैं। इसके अंतर्गत सामाजिक रूप से वंचित समूह के अनिवार्य कवरेज द्वारा उम्मीदवारों का पूर्ण सामाजिक समावेश सुनिश्चित किया जाता है। धन का 50 प्रतिशत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, 15 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के लिए और तीन प्रतिशत विकलांग व्यक्तियों के लिए निर्धारित किया जाएगा। उम्मीदवारों में एक तिहाई संख्या महिलाओं की होनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय युवा उम्मीदवारों को ’हिमायत’ नाम की एक विशेष उप योजना के माध्यम से सक्षम किया गया है, जो ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा राज्य के लिए एडीएसपी के तहत चल रही है एवं इसमें शहरी के साथ ही ग्रामीण युवाओं और गरीबी रेखा से नीचे तथा साथ ही गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को भी सम्मिलित किया गया है। इसके अतिरिक्त आदिवासी क्षेत्रों और महत्वपूर्ण वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) प्रभावित जिलों के लिए ’रोशनी’ नामक एक विशेष योजना अलग दिशा निर्देशों के साथ शुरू की गई है। यह योजना चयनित महत्वपूर्ण वामपंथी उग्रवाद जिलों में खास परिस्थितियों के लिए है। विशेष रूप से यह अलग-अलग समय अवधि के लिए प्रशिक्षण प्रदान करती है।

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना के अंतर्गत एक त्रिस्तरीय कार्यान्वयन प्रतिरूप है। नीति निर्माण, तकनीकी सहायता और सरलीकरण एजेंसी के रूप में दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना राष्ट्रीय यूनिट ग्रामीण विकास मंत्रालय में काम करती है। यह योजना के राज्य मिशन कार्यान्वयन को समर्थन प्रदान करती है और परियोजना की कार्यान्वयन एजेंसियां कौशल्य और नियोजन परियोजनाओं के माध्यम से कार्यक्रम को लागू करती हैं।

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना बाजार की मांग के समाधान के लिए नियोजन से जुड़ी  कौशल्य परियोजनाओं के लिए 25,696 रुपये से लेकर एक लाख रुपये प्रति व्यक्ति तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जो परियोजना की अवधि और परियोजना के आवासीय या गैर आवासीय होने पर निर्भर करता है। योजना तीन महीने से लेकर 12 महीने तक के प्रशिक्षण अवधि की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
इस योजना के अंतर्गत अनुदान के घटक दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना 250 से अधिक व्यापार क्षेत्रों जैसे खुदरा, आतिथ्य, स्वास्थ्य, निर्माण, मोटर वाहन, चमड़ा, विद्युत, पाइपलाइन, रत्न और आभूषण आदि को अनुदान प्रदान करता है। इसका एकमात्र अधिदेश है कि कौशल प्रशिक्षण मांग आधारित होना चाहिए और कम से कम 75 प्रतिशत प्रशिक्षुओं की नियुक्ति होनी चाहिए।

परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए निर्धारित परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों को प्राथमिकता दी जाती है।  इनमें वे परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियां या संगठन सम्मिलित हैं, जो आंतरिक मानव संसाधन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कौशल प्रशिक्षण कर रहे हों। इसके अतिरिक्त उद्योग से सह वित्त पोषण के साथ इंटर्नशिप के लिए समर्थन, परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी, जो दो साल की अवधि में 10 हजार प्रशिक्षुओं की एक न्यूनतम संख्या के लिए कौशल प्रशिक्षण और नियोजन का आश्वासन दे सकता हो, उच्च प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जैसे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद से न्यूनतम 3।5 ग्रेडिंग प्राप्त संस्थान, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद से वित्त पोषित सामुदायिक कॉलेज जो डीडीयू-जीकेवाई परियोजनाओं में रुचि रखने वाले भी इसमें सम्मिलित हैं। यह योजना पूरे देश के लिए है। यह योजना वर्तमान में देश के 33 राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों के 610 जिलों में 202 से अधिक परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों के साथ साझेदारी में 50 से अधिक क्षेत्रों एवं 250 से अधिक व्यापार क्षेत्रों में लागू की जा रही है। 

बेरोजगार विशेषकर अकुशल युवाओं के लिए बहुत उपयोगी योजना है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 15 वर्ष से लेकर 35 वर्ष की आयु के बीच के 5.50 करोड़ संभावित कामगार हैं। विश्व भर में वर्ष 2020 तक 5.70 करोड़ कामगारों की कमी होने का अनुमान है। ऐसे में कुशल युवकों के लिए रोजगार के द्वार खुल जाएंगे. इस योजना का प्रचार-प्रसार भी होना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक युवा इसका लाभ उठा सकें।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

दीनदयाल अंत्योदय योजना : रोजगार से दूर होगी गरीबी


देश की एक बड़ी जनसंख्या गरीबी में जीवन व्यतीत कर रही है। ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें दो समय का भरपेट भोजन भी नहीं मिल पा रहा है। भूख से मौत होने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं। गरीबी का एक प्रमुख कारण लगातार बढ़ती जनसंख्या और बेरोजगारी है। वर्तमान में 29.8 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है। गरीब की श्रेणी में वह लोग आते हैं जिनकी दैनिक आय शहरों में 28.65 रुपये और गांवों में 22.24 रुपये से कम है। शहरों में रहने वाले जनजातीय लोग, दलितों और मजदूर वर्ग, जैसे खेतिहर मजदूर और सामान्य मजदूर अब भी बहुत गरीब हैं। इनमें 60 प्रतिशत लोग बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के राज्यों में रहते हैं। इन राज्यों के सबसे गरीब राज्य होने का कारण यह है कि 85 प्रतिशत जनजातीय यहां निवास करती है। इनमें से अधिकतर क्षेत्र बाढ़ या फिर सूखे से प्रभावित हैं। ऐसी स्थिति में कृषि बुरी तरह प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर रोजगार पर पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ है। संगठन के महानिदेशक गाइ राइडर के अनुसार इस समय हम लोग वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नवआगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन के अनुसार उभरते देशों में हर दो श्रमिकों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर पांच में से चार श्रमिकों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है। 

सरकार ने गरीबी दूर करने के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना आरंभ की है। इसका उद्देश्य कौशल विकास और अन्य उपायों के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि करना है। मेक इन इंडिया, कार्यक्रम के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सामाजिक तथा आर्थिक बेहतरी के लिए कौशल विकास आवश्यक है। दीनदयाल अंत्योदय योजना को आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय के तहत शुरू किया गया था। भारत सरकार ने इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
यह योजना राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का एकीकरण है।
राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन को दीन दयाल अंत्योदय योजना नाम दिया गया है। इस योजना में शहरी क्षेत्रों के लिए दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना के अंतर्गत सभी 4041 शहरों और कस्बों को कवर कर पूरे शहरी आबादी को लगभग कवर किया जाएगा। वर्तमान में सभी शहरी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में केवल 790 कस्बों और शहरों को कवर किया गया है।

दीन दयाल अंत्योदय योजना तथा राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन का लक्ष्य शहरी गरीब परिवारों की गरीबी और जोखिम को कम करने के लिए उन्हें लाभकारी स्वरोजगार और कुशल मजदूरी रोजगार के अवसर का उपयोग करने में सक्षम करना है. इसके परिणामस्वरूप मजबूत जमीनी स्तर के निर्माण से उनकी आजीविका में स्थायी आधार पर सराहनीय सुधार हो सके। इस योजना का लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से शहरी बेघर लोगों के लिए आवश्यक सेवाओं से युक्त आश्रय प्रदान करना भी होगा। योजना शहरी सड़क विक्रेताओं की आजीविका संबंधी समस्याओं को देखते हुए उनकी उभरते बाजार के अवसरों तक पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त स्थान, संस्थागत ऋण, और सामाजिक सुरक्षा और कौशल के साथ इसे सुविधाजनक बनाने से भी संबंधित है।

इस योजना में दो घटक हैं, एक ग्रामीण भारत के लिए तथा दूसरा शहरी भारत के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना के रूप में नामित शहरी घटक को आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय द्वारा लागू किया जाएगा। दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना के रूप में नामित ग्रामीण घटक को ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा लागू किया जाएगा।

इस मिशन के तहत शहरी गरीबों को प्रशिक्षित कर कुशल बनाने के लिए 15 हजार रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के लिए प्रति व्यक्ति 18 हजार रुपये है। इसके अलावा शहर आजीविका केंद्रों के माध्यम से शहरी नागरिकों द्वारा शहरी गरीबों को बाजारोन्मुख कौशल में प्रशिक्षित करने की बड़ी मांग को पूरा किया जाएगा। इसे सदस्यों के प्रशिक्षण के लिए स्वयं सहायता समूह के गठन के माध्यम से किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक समूह को 10 हजर रुपये का प्रारंभिक समर्थन दिया जाता है। पंजीकृत क्षेत्रों के स्तर महासंघों को 50 हजार रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। सूक्ष्म उद्यमों और समूह उद्यमों की स्थापना के माध्यम से स्व-रोजगार को बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें व्यक्तिगत परियोजनाओं के लिए दो लाख रुपयों का ब्याज अनुदान औऱ समूह उद्यमों पर 10 लाख रुपयों का ब्याज अनुदान प्रदान किया जाएगा। शहरी बेघर लोगों के लिए आश्रयों के निर्माण की लागत योजना के तहत पूरी तरह से वित्त पोषित है। मूलभूत ढांचे की स्थापना के माध्यम से विक्रेताओं के लिए विक्रेता बाजार का विकास और कौशल को बढ़ावा और कूड़ा उठाने वालों और विकलांगजनों आदि के लिए विशेष परियोजनाएं हैं।

शहरी गरीबों का स्वामित्व और लाभकारी भागीदारी और सभी प्रक्रियाओं में उनकी सहभागिता
संस्था निर्माण और क्षमता को मजबूत बनाने सहित कार्यक्रम के डिजाइन और कार्यान्वयन में पारदर्शिता लाई जाएगी। सरकारी पदाधिकारियों और समुदाय की जवाबदेही रहेगी। उद्योग और अन्य हितधारकों के साथ भागीदारी पर बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त सामुदायिक आत्मनिर्भरता, आत्म-निर्भरता, स्वयं सहायता और आपसी सहायता बढ़ावा दिया जाएगा।

राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन का मूल विश्वास यह है कि गरीब लोग उद्यमी होते हैं और वे गरीबी से निकलने चाहते हैं। इसक लिए आवशय्क है कि उनकी क्षमताओं का उपयोग करके उनके लिए सार्थक और सुस्थिर जीविका के साधन पैदा किए जाएं। मिशन का यह विश्वास है कि किसी भी आजीविका कार्यक्रम को केवल समयबद्ध तरीके से ही आगे बढाया जा सकता है, बशर्ते कि इसे गरीबों और उनके संस्थानों द्वारा संचालित किया जाए। ऐसे सुदृढ़ संस्थागत ढांचे गरीबों के लिए उनके निजी मानव, सामाजिक, वित्तीय और अन्य संपतियों को निर्मित करने में सहायक होते हैं। इस प्रकार ये उन्हें सरकारी और निजी क्षेत्रों से अधिकारों, पात्रों, अवसरों और सेवाओं को प्राप्त करने में समर्थ बनाते हैं और साथ ही उनकी एकता सुगठित करते हैं, अभिव्यक्ति और लेन-देन की शक्ति को भी बढाते हैं।
संविधान (74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के अनुसार शहरी गरीबी उपशमन, शहरी स्थानीय निकायों का विधिक कार्य है। इसलिए शहरी स्थानीय निकायों को शहरों/कस्बों में रह रहे शहरी गरीबों से संबंधित उनके कौशल और जीविका सहित उनसे संबंधित समस्त मुद्दों और कार्यक्रमों के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाने की आवश्यकता है।

इस योजना का उद्देश्य कौशल विकास और ॠण की सुविधाओं के लिए शहरी गरीबों को व्यापक रूप से सम्मिलित करना है। यह बाजार-आधारित कार्यों और स्वरोजगार के लिए शहरी गरीबों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने तथा सुगमता से ॠण प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करेगा। सड़क विक्रेता शहरी जनसंख्या का महत्वपूर्ण अंग हैं, जो पिरामिड के धरातल पर हैं। सड़क विक्रय स्व-रोजगार का एक स्रोत प्रदान करता है और इस प्रकार यह बिना प्रमुख सरकारी हस्तक्षेप के शहरी गरीबी उपशमन के एक उपाय के रूप में कार्य करता है। शहरी आपूर्ति श्रृंखला में उनका प्रमुख स्थान होता है और ये शहरी क्षेत्रों के भीतर आर्थिक विकास की प्रक्रिया के अभिन्न अंग होते हैं। इसका उद्देश्य उन्हें अपने कार्य के लिए उपयुक्त स्थल प्रदान करना, संस्थागत ॠण सुलभ कराना, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना और बाजार के उभरते अवसरों का लाभ उठाने के लिए उनका कौशल बढ़ाना होगा। चरण बद्ध तरीके से शहरी बेघर लोगों को अनिवार्य सुविधाओं से युक्त आश्रय प्रदान करना होगा।

यह योजना मंत्रालयों/विभागों से संबद्ध योजनाओं/कार्यक्रमों और कौशल, आजीविकाओं, उद्यमिता विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सहायता आदि के कार्य निष्पादित करने वाले राज्य सरकारों के कार्यक्रमों के साथ समाभिरूपता पर अत्यधिक बल देगा। ग्रामीण और शहरी गरीब लोगों की आजीविका के बीच एक सेतु के रूप में ग्रामीण-शहरी प्रवासियों के कौशल प्रशिक्षण को बढावा देने के लिए सभी संबंधित विभागों से एक संयुक्त कार्यनीति बनाए जाने का समर्थन करने का अनुरोध किया जाएगा।
इसका उद्देश्य शहरी बेघर लोगों को कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और आश्रय के प्रचालन में सहायता प्रदान करने में निजी क्षेत्र की भागीदारी प्राप्त करना है। यह शहरी बेघर लोगों को कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और आश्रय प्रदान करने तथा साथ ही ऐसे शहरी गरीब उद्यमियों को जो कि स्व-रोजगार प्राप्त करना तथा अपने निजी लघु व्यावसायिक अथवा विनिर्माण यूनिट स्थापित करना चाहते है, प्रौद्योगिकीय, विपणन और एकजुट सहयोग देने में सहायता प्रदान करने में निजी और सिविल समाज के क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी के लिए प्रयास करेगा। मंत्रालय ने वास्तविक समय में और नियमित रूप से योजना की प्रगति की निगरानी के उद्देश्य से ऑनलाइन वेब आधारित प्रबंधन सूचना प्रणाली विकसित की थी। 
एमआईएस को 20 जनवरी 2015 को शुरू किया गया था। एमआईएस प्रशिक्षण प्रदाताओं, प्रमाणन एजेंसियों, बैंकों और संसाधन संगठनों जैसे हितधारकों को भी सीधे आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाता है, जिसे निगरानी और अन्य उद्देश्यों और योजना की प्रगति को ट्रैक करने के लिए शहरी स्थानीय निकायों, राज्यों और आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय द्वारा भी संचालित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन योजना के क्रियान्वयन की प्रभावी निगरानी के लिए निदेशालय राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के साथ नियमित रूप से समीक्षा बैठकों और वीडियो सम्मेलनों का आयोजन करेगा।

यदि इस योजना को सही तरीके से लागू किया गया, तो इसके बेहतर परिणाम सामने आएंगे। युवक कुशल होंगे, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और देश से गरीबी दूर होगी।


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Saturday, August 22, 2026

विद्या भारती का लक्ष्य संस्कारयुक्त एवं राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी का निर्माण: डॉ. सौरभ मालवीय













बस्ती। सरस्वती विद्या मन्दिर, रामबाग में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि विद्या भारती का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को परीक्षा और रोजगार के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें संस्कारवान, चरित्रवान, आत्मनिर्भर और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनाना है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक के युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और कोडिंग जैसी तकनीकी दक्षताओं के साथ भारतीय संस्कृति, जीवन-मूल्यों और राष्ट्रबोध का समन्वय आवश्यक है।

डॉ. मालवीय ने विद्या भारती की भावी योजनाओं और गोरक्ष प्रान्त की उपलब्धियों की जानकारी देते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ उनमें सामाजिक उत्तरदायित्व और भारतीय जीवन-दृष्टि का विकास करना है।

उन्होंने बताया कि संत रविदास जी के 650वें जयंती वर्ष के अवसर पर सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वर्षभर गोष्ठियों, निबंध, चित्रकला एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

इसी प्रकार वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर विद्यालयों और समाज में राष्ट्रीय चेतना के जागरण के लिए सामूहिक गान, चित्रकला, निबंध तथा अन्य रचनात्मक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 में विद्या भारती के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर अमृत महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। वर्षभर चलने वाले कार्यक्रमों के माध्यम से विद्या भारती की 75 वर्षों की यात्रा, शैक्षणिक उपलब्धियों और राष्ट्र निर्माण में उसके योगदान को समाज के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

डॉ. मालवीय ने कहा कि विद्यालयों में पंच परिवर्तन को विशेष रूप से केंद्र में रखा जा रहा है। सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्य बोध और स्वबोध के माध्यम से विद्यार्थियों तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन का वातावरण तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है।

पत्रकार वार्ता के उपरांत विषय संयोजकों एवं प्रान्त प्रमुखों की बैठक आयोजित हुई, जिसमें आगामी कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन, संगठनात्मक समन्वय तथा प्रचार-प्रसार की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस अवसर पर प्रान्त निरीक्षक श्री राम सिंह, संभाग निरीक्षक श्री अजय कुमार दूबे, प्रधानाचार्य श्री गोविन्द सिंह सहित विद्या भारती के अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। 

Friday, August 21, 2026

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम : बेरोजगारों को काम मिला

जीविकोपार्जन के लिए किसी भी व्यक्ति को कार्य की आवश्यकता होती है. देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जो दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। बेरोजगारी कई समस्याओं की जड़ है. बेरोजगार युवा मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं, वे नशे की लत के आदी बन जाते हैं, अकसर युवा भटक जाते हैं. वे आपराधिक दलदल में फंस जाते हैं. इसके कारण उनका जीवन तो नष्ट होता ही है, साथ ही परिवार के मान-सम्मान पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. बेरोजगार युवकों द्वारा आत्महत्या करने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं. जनवरी 2018 में पंजाब के अमृतसर के निवासी रोहित ठाकुर ने फांसी लगाकर जान दे दी. बेरोजगार होने के कारण वह अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से नहीं कर पा रहा था. इसके कारण वह तनाव में रहता था. इसी महीने राजस्थान के अजमेर के किशन सिंह ने भी बेरोजगारी से तंग आकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसी जनवरी के महीने में उत्तराखंड के बायखला सेलाकुई के निवासी प्रेम सिंह ने भी फांसी लगाकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली. वह भी रोजगार न मिलने के कारण बहुत दुखी रहता था. बेरोजगारी के कारण उसके घर में कलेश रहता था. 

बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एक महत्वकांक्षी योजना आरंभ की थी. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम एक रोजगार गारंटी योजना है. कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इसे लागू किया था. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 25 अगस्त 2005 को पारित हुआ. इसका पहला चरण 2 फरवरी 2006 से आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले से शुरू हुआ. उस समय देश के 200 जिलों को इसमें सम्मिलित किया गया. इसके दूसरे चरण 2007- 08 से देश के 130 और जिलों को इसमें सम्मिलित किया गया. फिर इसके तीसरे चरण में 1 अप्रैल 2008 से देश के सभी जिलों में इस योजना को लागू कर दिया गया. शुरू में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाता था, लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका पुनः नामकरण किया गया और इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाने लगा. 

यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, जो प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं. इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों. नियत कार्य बल का लगभग एक तिहाई महिलाओं से निर्मित है. 

यह अधिनियम, राज्य सरकारों को ’महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम योजनाओं’ को लागू करने के निर्देश देता है. इसके अंतर्गत केन्द्र सरकार मजदूरी की लागत, माल की लागत का तीन चौथाई और प्रशासनिक लागत का कुछ प्रतिशत वहन करती है. राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता, माल की लागत का एक चौथाई और राज्य परिषद की प्रशासनिक लागत को वहन करती है. चूंकि राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता देती हैं, उन्हें श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने के लिए भारी प्रोत्साहन दिया जाता है. हालांकि बेरोजगारी भत्ते की राशि को निश्चित करना राज्य सरकार पर निर्भर है, जो इस शर्त के अधीन है कि यह पहले 30 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी के एक चौथाई भाग से कम ना हो और उसके बाद न्यूनतम मजदूरी का आधे से कम ना हो. प्रति परिवार 100 दिनों का रोजगार या बेरोजगारी भत्ता सक्षम और इच्छुक श्रमिकों को हर वित्तीय वर्ष में प्रदान किया जाना चाहिए. दूसरे शब्दों में यदि योग्य आवेदक को मांग पर 15 दिनों के भीतर कार्य न मिल पाए तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा भत्ते की दर पहले 30 दिनों के लिए बेरोजगारी भत्ते की दर दूरी पर का 25 प्रतिशत होगा और उसके बाद 50 प्रतिशत हो जाएगी. स्थाई संपत्ति योजना का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है कि स्थाई संपत्ति का सृजन करना और ग्रामीण परिवारों की आजीविका का साधन आधार को मजबूत बनाना इस के कामों में ठेकेदारों द्वारा कार्य निष्पादन की अनुमति नहीं है. आवेदक के निवास से पांच किलोमीटर के भीतर काम उपलब्ध कराए जाएंगे. पांच किलोमीटर की परिधि से अधिक होने पर संबंधित व्यक्ति को परिवहन तथा आजीविका मद में 10 प्रतिशत अतिरिक्त मजदूरी प्रदान की जाएगी. मजदूरी भुगतान प्रति सप्ताह या अन्य मामलों में काम के पूरा होने के 15 दिनों के भीतर इस मजदूरी का आंशिक भाग नगद रूप से प्रतिदिन दिया जाएगा. यदि कोई व्यक्ति सूचित किए गए समय से 15 दिनों के भीतर कार्यस्थल पर रिपोर्ट नहीं करता, तो वह बेरोजगारी भत्ते का अधिकारी नहीं होगा, परंतु कार्य के लिए पुनः आवेदन दे सकेगा.

इसके अंतर्गत श्रमिकों को स्वच्छ पेयजल, बच्चों के लिए शेड, विश्राम के लिए समय, प्राथमिक उपचार बॉक्स के साथ कार्य के दौरान घटित किसी आकस्मिक घटना का सामना करने के लिए अनुसंधान उपलब्ध कराई जाएगी, कोई कामगार कार्यस्थल कार्य के दौरान घायल होता है, तो वह निशुल्क चिकित्सा सुविधा पाने का हकदार होगा. घायल श्रमिक के अस्पताल में भर्ती करवाने पर राज्य सरकार द्वारा निशुल्क चिकित्सा सुविधा दवा तथा घायल व्यक्ति की प्रतिदिन की मजदूरी राशि का 50 प्रतिशत पाने का अभी का अधिकारी होगा. कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण पंजीकृत मजदूर की स्थाई विकलांगता या मृत्यु हो जाने की स्थिति में मृत्यु या पूर्ण विकलांगता की स्थिति में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित राशि या 25 हजार रुपये पीड़ित व्यक्ति के परिवार को दी जाएगी.

और पता जमा करते हैं. जांच के बाद पंचायत, घरों को पंजीकृत करता है और एक जॉब कार्ड प्रदान करता है. जॉब कार्ड में, पंजीकृत वयस्क सदस्य का ब्यौरा और उसकी फोटो शामिल होती है. एक पंजीकृत व्यक्ति निरंतर कार्य के कम से कम चौदह दिनों के लिए पंचायत या कार्यक्रम अधिकारी को लिखित रूप से आवेदन प्रस्तुत कर सकता है. आवेदन दैनिक बेरोजगारी भत्ता आवेदक को भुगतान किया जाएगा. इस अधिनियम के तहत पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव की अनुमति नहीं है. इसलिए पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन भुगतान किया जाना चाहिए. सभी वयस्क रोजगार के लिए आवेदन कर सकते हैं.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है. इसके तहत कई कार्य कराए जाते हैं, जिनमें जल संरक्षण और जल संग्रहण, सुखा बचाओ, वनरोपण, वृक्षारोपण, सिंचाई नहरों के साथ शुक्ष्म एवं लघु सिंचाई कार्य, अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय की भूमिका भूमि सुधार के लाभ लोगों की भूमिका इंदिरा आवास योजना के लाभ होगी परिवार के सदस्यों की भूमि के लिए सिंचाई की व्यवस्था परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार, भूमि विकास बाढ़ नियंत्रण तथा सुरक्षा एवं प्रभावित क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था, बारहमासी सड़क की सुविधा, सड़क निर्माण में जहां कहीं भी आवश्यक हो, वहां पर पुलिया का निर्माण करना, राज्य सरकार से परामर्श के बाद केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य कार्य सम्मिलित हैं.

पलायन को रोकने में भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम अत्यंय प्रभावी प्रमाणित हुआ है. ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रामकृपाल यादव के अनुसार मंत्रालय ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा के तहत 50 दिन के लिए अतिरिक्त अकुशल रोजगार उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाए हैं. वर्ष 2016-17 के दौरान मनरेगा के अंतर्गत सात सूखा प्रभावित राज्यों को 150 दिन के काम की अनुमति दी गई. वर्तमान वर्ष में इस प्रावधान के तहत केरल और पुद्दुचेरी को काम दिया गया है. मंत्रालय ग्रामीण और शहरी अंतर को पाटने तथा ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में होने वाले पलायन को रोकने के उद्देश्य से श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के अंतर्गत ग्रामीण केंद्रों का भी निर्माण कर रहा है. स्वतंत्र आकलनकर्ताओं के माध्यम से मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के परिणामस्वरूप विशेष मौसम में होने वाले पलायन में कमी आई है. अन्य अध्ययनों में भी दर्शाया गया कि घर के निकट काम देने और कार्यस्थल पर उचित माहौल उपलब्ध कराने से पलायन कम करने में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का प्रत्यक्ष और सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. उन्होंने कहा कि मंत्रालय द्वारा ऐसे अध्ययनों का सार ‘मनरेगा समीक्षा’ नामक प्रकाशन में दिया गया है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय की सिफारिश पर राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान ने पलायन की समस्या पर दो अध्ययन करवाए हैं. इनके नाम हैं- कठिन समय में होने वाले पलायन पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम का प्रभाव : भारत के चयनित राज्यों का एक अध्ययन और जनजातीय लोगों के पलायन पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम का प्रभाव : पश्चिम बंगाल के जंगलमहल जिले में एक मामले का अध्ययन.

सरकार युवाओं को आत्मनिरभर बनाने पर विशेष बल दे रही है. राज्यसभा सांसद  महेश पोद्दार के अनुसार कि देश के युवा बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देकर आश्रित बनाने के स्थान पर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना ज्यादा श्रेयस्कर है. सरकार इसी दिशा में काम कर रही है. युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने की जरूरत पर है. देश के युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना चाहिए, उन्हें बेरोजगारी भत्ता देकर आश्रित नहीं बनाना चाहिए. देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि के माध्यम से रोजगार पाता है. केंद्र सरकार ने किसानों की आय दुगुनी करने का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है. स्पष्ट है कि सरकार ने जब किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है, तो कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. रोजगार के अवसरों में यह बढ़ोतरी केवल परंपरागत कृषि कार्य में ही नहीं बल्कि मूल्य संवर्द्धन, प्रसंस्करण और विपणन के क्षेत्र में भी होगी. सरकार ने हर हाथ को हुनर, हर पेट को अनाज, हर घर में बिजली, हर घर तक पानी, हर घर तक सड़क और हर परिवार तक बैंक खाता के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा का लक्ष्य भी निर्धारित किया है. ये तमाम योजनाएं प्रचुर मात्रा में रोजगार सृजन करेंगी, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. 

वास्तव में बेरोजगारों को कार्य उपलब्ध कराने की यह एक प्रभावी योजना है. परंतु बढ़ती जनसंख्या के कारण लोगों को योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल पाता, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती है. परंतु यह सत्य है कि इस योजना के कारण आज करोड़ों लोगों को रोजगार मिला है.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम : किसान लाभान्वित होंगे


फसल उगाने से लेकर उसे बेचने तक किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। फसल काटने के बाद किसानों को चिंता होती है कि उन्हें उनकी फसल के सही दाम मिलेंगे भी या नहीं। ऐसे समाचार सुनने को मिलते रहते हैं कि किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए व्यापारी नहीं मिले। फसल न बिकने पर क्रोधित किसानों ने स्वयं अपनी फसल नष्ट कर दी या फिर उसे सड़क पर फेंक दिया, जो पशुओं का भोजन बन गई। अच्छी फसल के लिए लगातार पांचवीं बार ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ जीतने वाले मध्यप्रदेश के किसानों को भी फसलों के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे हैं। सब्जी, फलों, अनाज एवं दलहनों की अच्छी उपज होने के बाद भी उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिला। लागत से बहुत कम दाम मिलने के कारण किसानों ने विरोध प्रकट करते हुए प्याज, टमाटर, दूध एवं पपीते की फसल को सड़कों पर फेंक दिया। किसानों को दुख है कि अरहर, उड़द एवं मसूर के साथ-साथ गेहूं को बाजार में बेचने पर लागत से कम मूल्य मिला। उन्होंने विरोधस्वरूप राज्यव्यापी आंदोलन चलाया। मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 जून वर्ष 2017  को पुलिस की गोलीबारी में छह किसानों की मौत हो गई। इसके अतिरिक्त कर्ज एवं फसल खराब होने से परेशान 160 से अधिक किसानों की कथित आत्महत्या की खबरें भी छाई रहीं। जनवरी 2018 में आलू के सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में किसानों ने उत्पाद का उचित दाम न मिलने पर सड़कों पर आलू फेंक दिया। कुछ समय पहले पंजाब के किसानों ने भी सड़कों पर आलू फेंक दिया था। उनका कहना था कि मंडी तक आलू ले जाने में जितनी लागत आ रही है, उन्हें उपज के उससे भी कम दाम मिल रहे हैं। ऐसे में बोरियां बचाने के लिए उन्होंने आलू फेंक दिया।
 
किसानों को इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम की परियोजना शुरू की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की जयंती 14 अप्रैल, 2016 को राष्ट्रीय कृषि बाजार के लिए ई-ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ‘ई-नाम’ की प्रायोगिक परियोजना का शुभारंभ किया। प्रारंभिक काल से ही आठ राज्यों की 21 मंडियां ‘ई-नाम’ से जुड़ गई हैं। पांच माह के भीतर 200 मंडियों को और मार्च, 2018 तक 585 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि इस पहल से पारदर्शिता आएगी, जिससे किसान काफी हद तक लाभान्वित होंगे। यह कृषि समुदाय के लिए एक बड़ा बदलाव है। कृषि क्षेत्र को समग्र रूप में देखना होगा और इसके बाद ही किसानों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है। 

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम एक पैन-इंडिया इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल है, जो कृषि से संबंधित उपजो के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने के लिए मौजूदा कृषि उपज बाजार समिति मंडी का एक प्रसार है। ई-नाम पोर्टल सभी एपीएमसी से संबंधित सूचना और सेवाओं के लिए एक ही स्थान पर सेवा प्रदान करता है। इसमें अन्य सेवाओं के बीच उपज के आगमन और कीमतों, व्यापार प्रस्तावों को खरीदने और बेचने, व्यापार प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया के लिए प्रावधान शामिल हैं। जब कृषि उपज लेन देन मंडी के माध्यम से होना आरंभ होता है, तो ऑनलाइन बाजार से लेन-देन संबंधित व्यय और जानकारी असममिति कम होती है। कृषि बाजार को राज्यों द्वारा उनके कृषि-व्यवसाय विनिमय द्वारा संचालित किया जाता है। इसके अंतर्गत राज्य को विभिन्न बाजार क्षेत्रों में बांटा जाता है, जिसमें से प्रत्येक का संचालन अलग-अलग कृषि उपज बाजार समिति द्वारा किया जाता है। यह समिति शुल्क के साथ अपने व्यवसाय विनिमय को लागू करती है। बाजारों के इस विखंडन के कारण राज्य के भीतर, एक बाजार से दूसरे बाजार में कृषि उपजो के आवागमन तथा कृषि-उत्पाद के अलग-अलग तरह से निपटान में बाधा पहुंचाता है और मंडी शुल्कों के अलग-अलग स्तर किसानों के अनुरूप लाभ के बिना उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ती जाती है।

ई-नाम राज्य एवं राष्ट्रीय दोनों ही स्तर पर ऑनलाइन व्यापार मंच का निर्माण करके इन चुनौतियों को ध्यान दिलाता है। संपूर्ण एकीकृत बाजारों की प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने के लिए एकरूपता को प्रोत्साहित करता है। खरीददारों और विक्रेताओं के बीच की विषम जानकारी को हटाता है तथा वास्तविक मांग एवं आपूर्ति पर आधारित वास्तविक समय मूल्य की खोज को बढ़ावा देता है। नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और अपनी उपज की गुणवत्ता वाले अनुरूप मूल्यों एवं ऑनलाइन भुगतान तथा बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद की उपलब्धता के माध्यम से किसान को राष्ट्रव्यापी बाजार की पहुंच प्राप्त करवाता है। साथ ही उपभोक्ता को अधिक उचित मूल्य पर उत्पाद उपलब्ध करवाता है।

विनियमित बाजार में पारदर्शी विक्रय सुविधा और मूल्य की खोज के लिए राष्ट्रीय ई-बाजार मंच प्रारंभ से ही है। अपनी राज्य कृषि विपणन बोर्ड/ कृषि उपज बाजार समिति द्वारा ई-व्यापार के विज्ञापन के लिए इच्छुक राज्य अपनी कृषि उपज बाजार समिति अधिनियम में तदनुसार उपयुक्त प्रावधानों को पूरा करते हैं। बाजार यार्ड में भौतिक उपस्थिति या दुकान / परिसर के कब्जे के किसी पूर्व शर्त के बिना राज्य के अधिकारियों द्वारा व्यापारियों / खरीदारों और कमीशन एजेंटों लिबरल लाइसेंस उपलब्ध कराया जाएगा। व्यापारी का एक लाइसेंस राज्य भर के सभी बाजारों में मान्य रहेगा। इसके अंतर्गत कृषि उपज की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप और खरीददारों द्वारा सूचित बोली सक्षम करने के लिए प्रत्येक बाजार में परख करने की क्रिया के लिए (गुणवत्ता परीक्षण) मूलभूत सुविधाओ का प्रावधान किया गया है। सामान्य व्यापार के लिए गुणवतियो को अब तक 69 उपजों के लिए विकसित किया गया है। बाजार शुल्क एकत्र करने के एक स्तर, अर्थात् किसान के पहले थोक खरीद पर। किसानों की सुविधा के लिए मंडी में ही इस सुविधा का उपयोग करने के लिए चयनित मंडी में/ या नजदीक मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं का प्रावधान भी है। नागार्जुन फर्टलाइजर्स और केमिकल्स लिमिटेड रणनीतिक साथी (एस.पी) है, जो विकास, परिचालन और मंच का रखरखान करने के लिए जिम्मेदार है। रणनीतिक साथी की मुख्य भूमिका बहुत ही व्यापक है और इसमें सॉफ्टवेयर बनाना, ई-नाम के साथ एकीकृत होने के इच्छुक राज्यों में मंडियों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इसे अनुकूल बनाना और मंच पर चलाना सम्मिलित है।

व्यापारियों एवं कमीशन एजेंट के लिए बेहतर निगरानी और पूरी तरह से पारदर्शी व्यवस्था है, जो निविदा/नीलामी प्रक्रिया में जाने या अनजाने में हेरफेर की किसी भी संभावना को समाप्त करती है। सभी लेन-देन लेखांकन के माध्यम से बाजार शुल्क संचयन में सुधार जो बाजार में जगह ले रहे हैं। जनशक्ति आवश्यकताओं में कमी क्योंकि निविदा/ नीलामी प्रक्रिया प्रणाली के माध्यम से जगह ले लेता है। आमदनी एवं मूल्यों का विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाया जाता है। प्रत्येक कृषि उपज बाजार समिति की गतिविधियों की जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। यह किसानों को ई-नाम उत्पाद को बेचने और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य प्राप्त करने के लिए अधिक विकल्प प्रदान करने का वादा करता है। व्यापारियों के लिए ई-नाम माध्यमिक व्यापार के लिए एक बड़े राष्ट्रीय बाजार का पहुंच प्रदान करेगा। थोक खरीदार, संसाधक और निर्यातक के लिए यह स्थानीय मंडी व्यापार में सीधी भागीदारी को सक्षम करेगा, जिससे वित्तीय मध्यस्थता के खर्च में कमी होगी।

बाजार का एकीकरण और ऑनलाइन व्यापार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक है कि राज्यों के संबंध में योजना के तहत सहायता की मांग करने से पहले एक एकल लाइसेंस हो। यह लाइसेंस राज्य भर में मान्य हो और बाजार शुल्क को एक स्तर में एकत्र किया जाए। इसके अतिरिक्त उत्कृष्ट मूल्य खोज के साधन के रूप में इलेक्ट्रॉनिक नीलामी का प्रावधान होना चाहिए। केवल इन तीन पूर्व-पेक्षाओं को पूर्ण करने वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस योजना के अंतर्गत सहयोग के पात्र होंगे। राज्यों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सुधार कृषि उपज बाजार समिति अधिनियमों और कानूनों दोनों में उचित और स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार अक्षरश: पूरा किया गया है। राज्य विपणन बोर्ड/ कृषि उपज बाजार समिति के अलावा ई-नीलामी मंच को सक्षम करना आवश्यक है। राज्यों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पड़ेगी कि जो मंडियां ई-नाम के साथ एकीकृत हैं, वे उत्तम ऑनलाइन संयोजकता, हार्डवेयर और जांचे गए उपकरणों के लिए प्रावधान बनाती है

ई-मंच से जुड़ने के लिए इच्छुक राज्यों/ केंद्रशासित प्रदेशों में चयनित 585 विनियमित थोक बाजारों में ई-नाम को प्रसारित किया रहा है। छोटे किसानों का कृषि व्यवसाय सहायता संघ ई-नाम का संचालन रणनीतिक साथी से प्राप्त तकनीकी सहायता के साथ कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में हो रहा है। ई-नाम पर व्यापार के लिए वस्तुओं को जांचने की सुविधा के लिए, आम व्यापार योग्य मानकों को 90 उपजो के लिए विकसित किया गया है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार यह परियोजना एक ऑनलाइन पोर्टल द्वारा संचालित हो रही है, जिसे राज्य की मंडियों से जोड़ा जा रहा है। इसका सॉफ्टवेयर सभी इच्छुक राज्यों को नि:शुल्क दिया गया है और कामकाज में मदद के लिए हर भागीदार मंडी में एक वर्ष के लिए एक जानकार व्यक्ति को नियुक्त किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत भारत सरकार, राज्यों की प्रस्तावित कृषि मंडी को 30 लाख रुपये का अनुदान दे रही है। इस पोर्टल से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए किसानों को 24 घंटे किसान हेल्पलाइन सेवाएं उपलब्ध होंगी। कृषि मंत्रालय ने अपने लिए एक कृषि विकास वृक्ष की अवधारणा अपनाई है और इसी कृषि वृक्ष के अंदर कृषि मंत्रालय ने किसानों के समग्र विकास के लिए विभिन्न परियोजनाएं शुरू की हैं। भारत में पहली बार “एक राष्ट्र – एक बाजार” विकसित हो रहा है और यह कृषि बाजार अंतरराष्ट्रीय स्तर का होगा, इसके लिए सबको मिलकर काम करना होगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है