Sunday, September 13, 2026

संकल्प से सिद्धि : नये भारत का निर्माण होगा


देश में भ्रष्टाचार, गरीबी और निरक्षरता जैसी समस्याएं एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इससे निपटने के लिए जनता और सरकार दोनों को ही मिलकर काम करना होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकल्प से सिद्धि नामक कार्यक्रम प्रारंभ किया है। वर्ष 2017 से 2022 तक चलने वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था, नागरिक, समाज, प्रशासन, सुरक्षा और अन्य कई क्षेत्रों में सुधार लाकर देश में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।

संकल्प से सिद्धि कार्यक्रम के अंतर्गत नये भारत आंदोलन से भारतीय नागरिकों को भेदभाव, जातिवाद, सांप्रदायिकता जैसे कई सामाजिक मुद्दों से अवगत कराने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। यह आंदोलन भारतीय नागरिकों में सकारात्मक परिवर्तन के लिए सुधार करने की तत्काल आवश्यकता को जागृत करने के लिए प्रारंभ किया गया है। इसके द्वारा लोगों के बीच जागरूकता पैदा करके गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, गंदगी और अन्य कई सामाजिक मुद्दों से देश को मुक्त कराना का प्रयास किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर शुरू की गई एक नई पहल है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने नागरिकों को आंदोलन में शामिल होने और 2022 तक स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों वाला भारत बनाने का एक सामूहिक प्रयास करने का आग्रह किया है।
इस अवसर पर कई मंत्रियों और अधिकारियों ने नये भारत को बनाने की प्रतिज्ञा की है। यह पहल दूसरों को प्रतिज्ञा दिलाती है और नये भारत का एक हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करती है, जो मजबूत, समृद्ध और समावेशी है।
आज देश को ऐसे ही आंदोलनों की अति आवश्यकता है, जो सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध लोगों को जागरूक करके नये भारत का निर्माण करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
नये भारत का आंदोलन युवाओं को उनके अनमोल जीवन में कठिनाइयों से लड़ने के लिए भी प्रेरणा देगा।




(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान : सामाजिक सौहार्द्र बढ़ेगा


जनता के कल्याण के लिए सरकार अनेक योजनाएं चला रही है, किन्तु लोगों को इनके बारे में जानकारी न होने के कारण वे इनका लाभ नहीं उठा पाते। इसीलिए जनता को जागरूक करने के लिए सरकार ने एक ऐसा अभियान प्रारंभ किया है, जिसके माध्यम से लोगों को जन कल्याणकारी योजनाओं को जानकारी दी जाएगी, ताकि वे इनसे लाभान्वित हो सकें। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ावा देना, गरीब परिवारों तक पहुंच कायम करना और केंद्र सरकार की विभिन्न जन-कल्याणकारी योजनाओं तथा कार्यक्रमों से वंचित रह गए सभी लोगों को इनके दायरे में लाकर लाभान्वित करना है। ग्राम स्वराज अभियान के दौरान 21058 गांवों के लिए विशेष पहल शुरू की जा रही है। इस अभियान के अंतर्गत गरीब समर्थक पहलों में उज्ज्वला योजना, मिशन इन्द्रधनुष, प्रधानमंत्री सौभाग्य योजना, उजाला, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का शत प्रतिशत आच्छादन किया जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 21 अप्रैल, 2018 को पुनर्गठित केंद्र प्रायोजित योजना राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (आरजीएसए) को स्वीकृति दे दी है। यह योजना 7255।50 करोड़ रुपये की कुल लागत के साथ 1 अप्रैल, 2018 से 31 मार्च, 2022 के दौरान लागू की जाएगी। योजना में केंद्र की हिस्सेदारी 4500 करोड़ रुपये की होगी और राज्य की हिस्सेदारी 2755।50 करोड़ रुपये की होगी। वर्ष 2018-19 में राज्य की हिस्सेदारी 585।51करोड़ रुपये होगी, जबकि 2019-20 में 877।84 करोड़ रुपये, 2020-21 में 712।63 और 2021-22 में 579।52 करोड़ रुपये होगी। इसी प्रकार वर्ष 2018-19 में केंद्रीय हिस्सा 969।27 करोड़ रुपये होगा, जबकि 2019-20 में 1407।76 करोड़ रुपये,  2020-21 में 1160।94 करोड़ रुपये और 2021-22 में 962।03 करोड़ रुपये खर्च होंगे। 

इस योजना का विस्तार देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में किया जाएगा और इसमें गैर-भाग IX में जहां पंचायतें नहीं हैं, वहां इसमें ग्रामीण स्थानीय सरकार के संस्थान शामिल होंगे। योजना में केंद्र और राज्य दोनों के घटक होंगे। केंद्रीय घटक में ‘तकनीकी सहायता के लिए राष्ट्रीय योजना’, ई पंचायत परमिशन मोड परियोजना और पंचायतों के प्रोत्साहन सहित राष्ट्रीय स्तर की गतिविधियां होंगी तथा राज्य घटक में पंचायती राज्य संस्थानों का क्षमता सृजन होगा।

राज्य धन पोषण व्यवस्था सभी राज्यों के लिए 60 : 40 होगी। पूर्वोत्तर तथा पवर्तीय राज्यों में केंद्र राज्य वित्त पोषण का अनुपात 90:10 होगा। सभी केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्रीय हिस्सेदारी 100 प्रतिशत होगी। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए योजना के क्रियान्वयन और निगरानी गतिविधयों को सामान्य रूप से आपस में जोड़ा जाएगा और मुख्य बल मिशन अंत्योदय के अंतर्गत चिन्हित पंचायतों और नीति आयोग द्वारा चिंन्हित 115 आकांक्षी जिलों पर होगा। यह योजना अन्य मंत्रायलयों के क्षमता सृजन प्रयासों को मिलाएगी और उन मंत्रालयों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिन पर इस योजना का अधिक प्रभाव होगा।

राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान की स्वीकृति योजना 2।55 लाख से अधिक पंचायती राज संस्थानों को सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की शासकीय क्षमता विकसित करने में मदद देगी। यह कार्य उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर फोकस के साथ समावेशी स्थानीय शासन के माध्यम से होगा। सतत विकास लक्ष्य के ये प्रमुख सिद्धांत हैं कि किसी को पीछे नहीं छोड़ते हुए तेजी से पहले पहुंचना और इसमें प्रशिक्षण मॉड्यूल तथा सामग्रियों सहित सभी क्षमता निर्माण कार्रवाइयों में लैंगिक सामानता के साथ सार्वभौमिक कॉवरेज की डिजाइन अंतरनिहित होगी। राष्ट्रीय महत्व के विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी, जो वंचित समूहों को प्रभावित करते हैं। इनमें यानी गरीबी,  प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, आहार, टीकाकरण, स्वच्छता, शिक्षा, जल संरक्षण, डिजिटल लेन-देन आदि सम्मिलित है।

यह योजना मिशन अंत्योदय तथा नीति आयोग द्वारा चिन्हित 115 आकांक्षी जिलों द्वारा व्यावहारिक संमिलन को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है। पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होता है और यह संस्थान जमीन से जुड़े होते हैं इसलिए पंचायतों को मजबूत बनाने से सामाजिक अया और समुदाय के आर्थिक विकास के साथ समानता और समावेशन को प्रोत्साहन मिलेगा।

पंचायती राज्य संस्थानों द्वारा ई-गवर्नेंस के बढ़ते प्रयोग से सुधरी हुई सेवा डिलीवरी और पारदर्शित हासिल करने में सहायता मिलेगी। इस योजना से ग्राम सभाओं को मजबूती मिलेगी और ग्राम सभाएं नागरिकों विशेष कर कमजोर समूहों के समाजिक समावेश के साथ कारगर संस्थान के रूप में काम करेंगी। यह योजना राष्ट्रीय राज्य और जिला स्तर पर पर्याप्त मानव संसाधन और संरचना के साथ पंचायती राज्य संस्थानों की क्षमता सृजन के लिए संस्थापक ढांचे की स्थापना करेगी। पंचायतों को राष्ट्रीय महत्वपूर्ण आधार पर प्रोत्साहन देकर मजबूत बनाया जाएगा। इससे पंचायतों में स्पर्धा की भावना बढ़ेगी। 

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपनी-अपनी भूमिकाओं के लिए स्वीकृत गतिविधियों को लागू और पूरा करने के लिए कदम उठाएंगी। राज्य सरकार अपनी प्राथमिकताओं और आवश्यकता के अनुसार केंद्रीय सहायता के लिए अपना वार्षिक कार्ययोजना तैयार करेगी। यह योजना मांग प्रेरित रूप में लागू की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री ने वर्ष 2016-17 के अपने बजट भाषण में सतत विकास लक्ष्यों पर कार्य करने के लिए पंचायती राज संस्थानों की शासन क्षमता विकिसत करने के लिए पुनर्गठित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (आरजीएसए) योजना की घोषणा की थी। मंत्रालय की वर्तमान योजना को राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान के रूप में नया रूप देने के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी। समिति ने विभिन्न हितधारकों के साथ अनेक बैठकें की और परामर्श किया। समिति ने अनेक सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट दी, जिसे सरकार द्वारा स्वीकार किया गया और यह योजना बनाने का आधार बना। वर्ष 2017-18 के अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने 50 हजार ग्राम पंचायतों को गरीबी मुक्त बनाने के लिए एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर लाने के लिए मिशन अंत्योदय की घोषणा की थी। इसी के अनुसार मिशन अंत्योदय का इस योजना के साथ एकीकरण किया गया है।

यदि ये अभियान सफ़ल हो जाता है, तो इससे लोगों को बहुत लाभ होगा। लोग सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इससे उनकी स्थिति में सुधार आएगा। हर योजना का यही उद्देश्य होता है कि लोग उससे लाभान्वित हों।




(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Saturday, September 12, 2026

दिव्यांगों के लिए योजनाएं : सशक्तीकरण होगा


देश में ढाई करोड़ से अधिक दिव्यांगजन हैं। सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ उनके सशक्तिकरण और आर्थिक समावेश के लिए निरंतर कार्यरत है। केंद्र सरकार ने दिव्यांग जनों के कल्याण के लिए कई उपयोगी योजनाएं प्रारंभ की हैं। 

केंद्र सरकार ने पुराने दिव्यांग जन अधिनियम-1995 को निरस्त करते हुए दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम-2016 पारित किया है, जो 19 अप्रैल, 2017 से लागू हो चुका है। नये अधिनियम में दिव्यांगों को बहुत सारे अधिकार दिए गए है। नया अधिनियम राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों पर यह जिम्मेदारी देता है कि वे ऐसी व्यवस्था करें कि दिव्यांग दूसरे नागरिकों के समान ही अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। यह अधिनियम राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश को यह जिम्मेदारी देता है कि वे ऐसी योजनाएं/कार्यक्रम बनाए तथा ऐसी अवसंरचना विकसित करें कि दिव्यांगों का सशक्तिकरण और समावेश सुनिश्चित हो सके। केन्द्र सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों को नए तरीके से निर्मित करने की प्रक्रिया में संलग्न है और राज्य सरकारों व केन्द्र शासित प्रदेशों से यह आशा की जाती है कि वे भी अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों में तदनुसार परिवर्तन करें। इसी परिप्रेक्ष्य में पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली में हुआ।

इस अधिनियम में दिव्यांगता को गतिशील और व्यापक अर्थ में पारिभाषित किया गया है। दिव्यांगता के प्रकारों की संख्या सात से बढ़ाकर 21 कर दी गई है। इनमें नेत्रहीनता,दृष्टिहीनता, कुष्ठ उपचारित जन, श्रवण दुर्बलता (बहरापन और सुनने में परेशानी), गतिहीनता, बौनापन, बौद्धिक दुर्बलता, मानसिक रूग्णता,स्वलीनता, मस्तिष्क पक्षाघात, मांसपेशीय दुर्विकास,दीर्घकालिक मानसिक स्थितियां, विशेष अध्ययन दुर्बलता, विविध स्लोरोसिस, बोलने और भाषा की दुर्बलता, थैलेसीमिया, होमो फीलिया, लाल रक्त कोशिका रोग, बहरेपन और नेत्रहीनता से जुड़ी विविध दिव्यांगता, एसिड हमले का पीड़ित और पारकिंसन रोग सम्मिलित हैं।

सरकार दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। दिव्यांगों के लिए सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत और उच्च शिक्षा में पांच प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। पिछले तीन वर्षों में उन्हें छह हजार से ज्यादा कैंप लगाकर, नौ लाख से अधिक आवश्यक उपकरण भी प्रदान किए गए हैं। केंद्र सरकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के 30 मिलियन से अधिक बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांग लाभार्थियों को प्रत्यक्ष हस्तांतरण के लिए प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत अभावों से जूझ रहे परिवारों तक नकद हस्तांतरण की सुविधा खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा समेत समग्र सामाजिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है।

वर्ष 2016 में एनएसएपी योजना को सर्वाधिक महत्वपूर्ण योजना के अंतर्गत लाने का जबसे रणनीतिक निर्णय लिया गया, तब से केन्द्र सरकार योजना की शत-प्रतिशत जरूरतें पूरी करने के लिए वित्तीय प्रतिबद्धता को लगातार बढ़ा रही है। वित्त वर्ष 2018-19 के लिए एनएसएपी योजना को 9975 करोड़ रुपये आवंटित किए गए,जो वर्ष 2014-15 के दौरान 7241 करोड़ रुपये के आवंटित बजट से 38 प्रतिशत अधिक है। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान एनएसएपी के तहत राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों को 8696 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई, जो वर्ष 2014-15 के दौरान जारी राशि से 23 प्रतिशत अधिक है।

योजना में पारदर्शिता बढ़ाने और कमियां हटाने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। एनएसएपी के अंतर्गत लाभार्थियों के आंकडें एनएसएपी-पीपीएस पर डिजिटल फार्म में रखे गए हैं। योजना के अंतर्गत 173 लाख लाभार्थियों के आधार नंबर उनकी सहमति से जोड़े गए हैं। इस दिशा में तेजी लाते हुए डिजिटल लेन-देन की सुविधा बढ़ाने के लिए लाभार्थियों की सहमति से आधार आधारित भुगतान व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य है, ताकि किसी भी तरह की संभावित कमियों को पूरी तरह से दूर किया जा सके। आधार आधारित व्यवस्था से बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांग लोगों को बैंक/डाकघर के माध्यम से उनके गांव तक भुगतान पहुंचाया जाएगा।

वित्तीय वर्ष 2017-2018 के प्रारंभ में केवल छह राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों गुजरात, लक्षद्वीप, बिहार, दादर एवं नगर हवेली, दमन एवं द्वीप, झारखंड और महाराष्ट्र में ही डिजिटल लेन-देन के माध्यम से एनएसएपी सहायता पहुंचायी गई और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए एक 1.73 करोड़ लेन-देन दर्ज किए गए। 31 मार्च, 2018 को समाप्त वित्तीय वर्ष में विशेष प्रयास के अंतर्गत आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दमन एवं द्वीप, दादर एवं नगर हवेली, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, लक्षद्वीप, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र. मेघालय, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और उत्तरप्रदेश जैसे 20 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए 10.73 करोड़ लेन-देन हुए। अत: 2016-17 में डीबीटी के जरिए डिजिटल लेन-देन की तुलना में 2017-18 में 520 प्रतिशत लेन-देन की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। वर्ष 2017-18 में 6791.70 करोड़ रुपये मूल्य के डिजिटल लेन-देन किए गए जो इस साल जारी धनराशि का लगभग 78 प्रतिशत है।

विभिन्न तरह के अभावों को कम करने की कोशिशों को और अधिक कारगर करने के उद्देश्य से मुद्दे के अभिसरण पर अधिक से अधिक जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना के अंतर्गत मासिक सहायता 300 से बढ़ाकर 500 रुपये प्रति महीना करने के अलावा अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में भी दिव्यांग लोगों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। एमजीएनआरइजीए के तहत कार्यस्थलों पर पेयजल उपलब्ध कराने, पालना घर की व्यवस्था इत्यादि में दिव्यांग लोगों को काम दिलाने को प्राथमिकता दी गई है। दिव्यांग श्रमिकों को अन्य श्रमिकों के बराबर ही मजदूरी दी जाती है। दिव्यांग श्रमिकों को उनके अनुसार उचित काम के चुनाव जैसी कई और छूट दी गई है। वित्त वर्ष 2017-18 में एमजीएनआरइजीए के अंतर्गत लगभग 4.7 लाख दिव्यांग श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराया गया।

डीडीयू-ग्रामीण कौशल योजना के निर्देशों के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए लोगों के कौशल बढ़ाने के लक्ष्य का कम से कम तीन प्रतिशत कौशल विकास लक्ष्य दिव्यांगों के लिए सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। इस योजना के अंतर्गत दिव्यांग योजनाओं के लिए पृथक प्रशिक्षण केन्द्र हो सकते हैं और नियमित परियोजना से अलग इनकी लागत भी अलग हो सकती है। डीडीयू-ग्रामीण कौशल योजना के अंतर्गत देशभर में अभी कुल 243 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिसमें दिव्यांग उम्मीदवारों को भी प्रशिक्षित करने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त डीडीयू-जीकेवाई के अंतर्गत पांच विशेष परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनमें 1500 दिव्यांग उम्मीदवारों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाना है। वित्त वर्ष 2016-17 में 662 उम्मीदवारों की तुलना में डीडीयू-जीकेवाई परियोजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2017-18 (फरवरी 2018 तक) में 912 दिव्यांग उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया।

सरकार दिव्यांगों के लिए आवासीय सुविधा भी उपलब्ध करा रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना (जी) में भी राज्यों के लिए यह प्रावधान है कि वह कम से कम तीन प्रतिशत दिव्यांग लाभार्थी सुनिश्चित करें। इस योजना के अंतर्गत दिव्यांगों के लिए 5682 घर स्वीकृत किए गए, जिनमें से 1655 घरों का निर्माण हो चुका है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थॉवरचंद गहलोत के अनुसार सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने दिव्यांग जनों के लिए सहायता उपकरण वितरित करने, सभी प्रकार के विकास के लिए अभिनव कार्यक्रमों और योजनाओं का शुभारंभ करने तथा समाज में उनके सामाजिक आर्थिक पुनर्वास करने में विश्व रिकॉर्ड बनाया है। यह मंत्रालय समाज में दिव्यांग जनों के सम्मानीय जीवन के लिए बेहतर शिक्षा, व्यवसायिक शिक्षा और पुनर्वास के लिए किए गए प्रयासों के कारण महत्वपूर्ण और प्रमुख बन गया है।

निंसंदेह सरकार की इन योजनाओं से दिव्यांग जनों के जीवन में सुधार आएगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दिव्यांग जनों को उन सब योजनाओं का लाभ मिले, जो उनके कल्याण के लिए चलाई जा रही हैं।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

वन धन योजना : जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव आएगा


देश में अधिकतर जनजातीय जिले वन क्षेत्रों में हैं। जनजातीय समुदाय पारंपरिक प्रक्रियाओं से गैर-लकड़ी वनोत्पाद एकत्रित करने और उनके मूल्यवर्धन में पारंगत होते हैं। इसलिए केंद्र सरकार जनजातीय समुदाय के वनोत्पाद एकत्रित करने वालों और कारीगरों के आजीविका आधारित विकास को बढ़ावा देना चाहती है। केंद्र सरकार ने वन धन योजना प्रारंभ की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अम्बेडकर जयंती पर 14 अप्रैल, 2018 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में इस पायलेट परियोजना का शुभारंभ किया था। उन्होंने इस योजना के अंतर्गत पहले मॉडल वान धन विकास केंद्र का भी उद्घाटन किया। यह जनजातीय मामलों और जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (टीआरआईएफईडी) मंत्रालय की योजना है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि वन धन, जन धन और गोवर्धन भविष्य में ग्रामीण और जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के आधार होंगे। उनके दृष्टिकोण के अनुरूप अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए समन्वित कार्रवाई की जा रही है। 
प्रधानमंत्री के जन धन, वन धन तथा गोवर्धन योजनाओं को एकजुट करने के उनके आग्रह पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने देश के जनजातीय जिलों में वन धन विकास केंदों का विस्तार करने का प्रस्ताव किया है। इस व्यवस्था के तौर-तरीके तय करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय में सचिव लीना नायर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इस योजना के अनुसार ट्राइफेड गौण वनोत्पाद (एमएफपी)-आधारित बहु-उद्देशीय वन धन विकास केंद्र स्थापित करने में सहायता करेगा। यह दस स्वयंसेवी समूहों (एसएचजी) का केंद्र होगा, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों में 30 एमएफपी एकत्रित करने वाले शामिल होंगे। इस पहल का उद्देश्य प्राथमिक स्तर पर एमएफपी में मूल्य वृद्धि कर जमीनी स्तर पर जनजातीय समुदाय को व्यवस्थित करना है। इस पहल के जरिये गैर लकड़ी वनोत्पाद की मूल्य श्रृंखला में जनजातीय लोगों की भागीदारी वर्तमान 20 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत होने की संभावना है। देश के वन क्षेत्रों के जनजातीय जिलों में दो वर्ष में लगभग तीन हजार ऐसे वन धन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया है। 50 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी वाले 39 जिलों में प्राथमिकता के आधार पर यह पहल शुरू करने का प्रस्ताव किया गया है। इसके बाद धीरे-धीरे देश के अन्य जनजातीय जिलों में इनका विस्तार किया जाएगा।

यह योजना केंद्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण विभाग के तौर पर जनजातीय कार्य मंत्रालय और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण एजेंसी के रूप में ट्राइफेड के माध्यम से लागू की जाएगी। योजना के कार्यान्वयन में राज्य स्तर पर एमएफपी के लिए राज्य नोडल एजेंसी और जमीनी स्तर पर जिलाधीश महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह भी प्रस्ताव किया गया कि वन धन एसएचजी के प्रतिनिधियों से गठित प्रबंधन समिति स्थानीय स्तर पर केंद्रों का प्रबंधन करेगी।

एमएफपी या अधिक उपयुक्त के रूप में उल्लेखित गैर-लकड़ी वनोत्पाद (एनटीएफपी) देश के लगभग पांच करोड़ जनजातीय लोगों की आय और आजीविका का प्राथमिक स्रोत है। इसलिए स्थानीय कौशल और संसाधनों पर आधारित जनजातीय लोगों के विकास का यह आदर्श मॉडल एनटीएफपी केंद्रित होगा।

केंद्र सरकार ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम-1996 और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 के प्रावधानों के माध्यम से इस क्षेत्र में कुछ सुधार किए हैं। इनके अंतर्गत उनके क्षेत्रों में पाए जाने वाले एमएफपी पर जनजातीय ग्राम सभा को स्वामित्व के अधिकार प्रदान किए गए हैं।

वर्ष 2014 में एमएफपी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत चयनित एमएफपी एकत्रित करने वालों को न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान किया जाता है। हालांकि यह कदम सही दिशा में है, लेकिन एमएफपी से जुड़े अधिकतर कारोबार गैर संगठित है, जिसके कारण वनोत्पाद एकत्रित करने वालों को कम मूल्य मिल पाता है और उतपादों के सीमित मूल्यवर्धन से अधिक उतपाद व्यर्थ हो जाते है। इसलिए एमएफपी की आपूर्ति श्रृंखला के आगे और पीछे की कड़ी को सुदृढ़ करने और विशेष रूप से जनजातीय समुदाय को व्यवस्थित करने के लिए अधिक संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है।

इकाई स्तर पर वनोत्पाद एसएचजी द्वारा एकत्रित किए जाएंगे और लगभग 30 सदस्यों का वन धन विकास ‘समूह’ होगा। एसएचजी क्षेत्र में उपलब्ध काटने और छानने, सजाने, सूखाने और पैक करने जैसे उपकरणों का उपयोग कर प्राथमिक स्तर पर एमएफपी का मूल्यवर्धन करेंगे। 
एक आदर्श वन धन विकास समूह में कई सुविधाएं होंगी, जिनमें आवश्यक भवन अथवा बुनियादी ढांचा सुविधा लाभार्थियों में से किसी एक के आवास या आवास के हिस्से या सरकारी या ग्राम पंचायत भवन में स्थापित किए जाने का प्रावधान शामिल है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में उपलब्ध एमएफपी के आधार पर काटने, छानने, सजाने, सूखाने जैसे छोटे औजार एवं टूल किट सम्मिलित है। प्रशिक्षण के लिए कच्चे माल के प्रावधान के साथ 30 प्रशिक्षुओं के बैच के लिए पूरी तरह से सुसज्जित प्रशिक्षण सुविधाएं और ट्रेनी किट भी दी जाएगी, जिसमें बैग, पैड, पेन, विवरणिका, प्रशिक्षण पुस्तिका, पुस्तिका आदि शामिल हैं। साथ ही वित्तीय संस्थानों, बैंकों, एनएसटीएफडीसी के साथ समझौतों के जरिये एसएचजी के लिए कार्यशील पूंजी का प्रावधान भी किया जाएगा।
एक ही गांव में ऐसे दस एसएचजी के क्लस्टर से वन धन विकास केंद्र बनेगा। एक केंद्र में समूह के सफल संचालन के आधार पर अगले चरण में समूह के सदस्यों के उपयोग के लिए भवन, गोदाम जैसी सामान्य बुनियादी ढांचा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
इस पहल के अंतर्गत कवर किए जा सकने वाले प्रमुख गौण वनोत्पादों की सूची में इमली, महुआ के फूल, महुआ के बीज, पहाड़ी झाड़ू, चिरौंजी, शहद, साल के बीज, साल की पत्तियां, बांस, आम, अमचूर, आंवला, चूरन, कैंडी, तेज़ पट्टा, इलायची, काली मिर्च, हल्दी, सौंठ, दालचीनी आदि शामिल हैं। इनके अलावा मूल्यवर्धन के लिए संभावित अन्य एमएफपी शामिल किए जा सकते हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि वर्ष 1999 में बस्तर में इस योजना को लागू किया गया था, किन्तु गैर आदिवासी कारोबारियों के विरोध के बाद सरकार ने इस नीति को वापस ले लिया था। अब यह योजना दोबारा प्रारंभ की गई है। यदि यह योजना सही तरीके से लागू हो जाती है, तो इससे जनजातीय समुदाय के लोगों को बहुत लाभ होगा। इसस उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना : मुख्यधारा में लाने का प्रयास


सरकार समाज के कमजोर वर्गों, जनजातियों और वन में रहकर जीवन यापन करने वाले खनन गतिविधियों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सजग है। देश के खनन क्षेत्रों के लोगों को मूलमूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने 17 सितम्बर, 2015 प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के शुभारंभ की घोषणा की। यह एक नया कार्यक्रम है, जिसमें खनन से संबंधित परिचालनों से प्रभावित लोगों तथा क्षेत्रों का कल्याण किया जाएगा। इसमें डिस्ट्रिक मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) द्वारा उपलब्ध कराई गई निधि का उपयोग किया जाएगा। 

प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का उद्देश्य खनन से प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्न विकास तथा कल्याणकारी परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू करना है। ये राज्य और केंद्र सरकार की वर्तमान में चल रही योजनाओं एवं परियोजनाओं की सम्पूरक भी होगी। खनन जिलों में लोगों के स्वास्थ्य और सामाजिक- अर्थव्यवस्था, पर्यावरण पर खनन के दौरान और बाद में पड़े प्रतिकूल प्रभाव को कम करना अथवा दूर करना शामिल हैं। खनन क्षेत्रों में प्रभावित लोगों के लिए दीर्घावधि टिकाऊ जीवन यापन सुनिश्चित करना भी इसमें सम्मिलित है। जीवन की गुणवत्ता में ठोस सुधार सुनिश्चित करते हुए जीवन के सभी पहलुओं को शामिल करने पर ध्यान रखा गया है। पीने के पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, कौशल विकास, महिला और बाल विकास, वरिष्ठ तथा विकलांगजनों का कल्याण, कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र इस निधि का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करेंगे। हितकर जीवन यापन वातावरण बनाने के लिए निधि की शेष राशि सड़क, ब्रिज, रेलवे, जलमार्ग परियोजनाओं, सिंचाई और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बनाने पर खर्च की जाएगी। 

केंद्र सरकार ने एमएमडीआर अधिनियम-1957 की धारा 20-ए के अंतर्गत प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना को लागू करने के लिए दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए राज्य सरकारों को निदेश जारी किए हैं और राज्यों को यह निर्देश दिया गया है कि डिस्ट्रिक मिनरल फाउंडेशन के लिए बनाए गए नियमों में इन्हें शामिल कर लें। डीएमएफ को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे कार्य प्रणाली में पूरी पारदर्शिता बरतें और उनके द्वारा चलाई विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं के बारे में समय-समय पर रिपोर्ट दें। 

खनन और इस्पात मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना को एक क्रांतिकारी और अनोखी योजना बताते हुए कहा है कि इससे खनन क्षेत्र में रहने वाले प्रभावित लोगों का जीवन रूपांतरित होगा। उनका कहना है कि देश में खनन क्षेत्र का नियोजित विकास समय की मांग है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्तमान सरकार नियोजित तरीके से काम कर रही है और पिछले एक वर्ष में खऩन क्षेत्र में बड़े परिवर्तन किए गए हैं। भारत में खनन क्षेत्र की सांख्यिकी पर गौर करें, तो हम यह महसूस करेंगे कि इस क्षेत्र में अपार संभावना हैं। रोजगार सृजन तथा सकल घरेलू उत्पाद में योगदान की दृष्टि से खनन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। खदानों तथा वन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय तथा गरीब लोगों की समस्याओं का स्थाई समाधान ढूंढने में प्रधानमंत्री की खनिज क्षेत्र कल्याण योजना तथा जिला खनिज फाउंडेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 

उनके अनुसार खनन क्षेत्र पुनर्जीवित किया गया है और मई 2014 के बाद से उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप यह क्षेत्र विकास की राह पर चल पड़ा है। इससे खनिज आधारित उद्योगों को सहायता मिलेगी और मैन्यूफैक्चरिंग तथा मेक इन इंडिया को प्रोत्सान मिलेगा। सितम्बर, 2014 में लौह अयस्क उत्पादन 8 मिलियन था, जो 2015 में बढ़कर 12.5 मिलियन टन हो गया। यह सामान्य सुधार नहीं है। हमारे खनन क्षेत्र की एक बड़ी कमी यह है कि हम छोटे स्तर पर खुदाई करते हैं। हमारी तरह का भूगर्भीय प्रोफाइल वाले आस्ट्रेलिया ने क्षेत्रीय खुदाई में 100 प्रतिशत सफलता प्राप्त की है और भारत में यह काम 10 प्रतिशत हुआ है। इस कमी को दूर करने के लिए हमने राष्ट्रीय खनिज खुदाई ट्रस्ट स्थापित किया है। जीएसआई तथा एमईसीएल के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को भी अधिसूचित करके खुदाई करने के लिए अधिकृत किया गया है। किसी भी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए सभी हितधारकों को एक साथ काम करना आवश्यक है। यह खन्न क्षेत्र के लिए भी सच है। सतत और समावेशी विकास के समान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार, नियोजनकर्ताओं, नीतिनिर्धारकों, खनन उद्योग, टेक्नॉलाजी सप्लाईकर्ता, सेवा प्रदाता तथा समुदायों को एक साथ काम करना होगा। 

सरकार की इस योजना से खनन क्षेत्र के निवासियों को जहां मूलभूत सुविधाएं, प्राप्त होंगी, वहीं वे मुख्यधारा में भी आएंगे।


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Friday, September 11, 2026

अतीत का स्मरण


 चित्र संग्रह से चित्र!!
अतीत का स्मरण!!

बैठक







 संस्कारधानी जबलपुर में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक!
संस्कारधानी जबलपुर में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हो रही है। बैठक में देशभर से आए पदाधिकारी एवं शिक्षाविद् भारतीय दृष्टि, संस्कारयुक्त शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण तथा राष्ट्र निर्माण से जुड़े विभिन्न विषयों पर मंथन करेंगे।
यह बैठक विद्या भारती के शिक्षा दर्शन को समयानुकूल बनाते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के संतुलित समन्वय के साथ नई पीढ़ी के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
संस्कारयुक्त शिक्षा से राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी का निर्माण—यही विद्या भारती का संकल्प है।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है