Saturday, September 12, 2026

दिव्यांगों के लिए योजनाएं : सशक्तीकरण होगा


देश में ढाई करोड़ से अधिक दिव्यांगजन हैं। सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ उनके सशक्तिकरण और आर्थिक समावेश के लिए निरंतर कार्यरत है। केंद्र सरकार ने दिव्यांग जनों के कल्याण के लिए कई उपयोगी योजनाएं प्रारंभ की हैं। 

केंद्र सरकार ने पुराने दिव्यांग जन अधिनियम-1995 को निरस्त करते हुए दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम-2016 पारित किया है, जो 19 अप्रैल, 2017 से लागू हो चुका है। नये अधिनियम में दिव्यांगों को बहुत सारे अधिकार दिए गए है। नया अधिनियम राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों पर यह जिम्मेदारी देता है कि वे ऐसी व्यवस्था करें कि दिव्यांग दूसरे नागरिकों के समान ही अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। यह अधिनियम राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश को यह जिम्मेदारी देता है कि वे ऐसी योजनाएं/कार्यक्रम बनाए तथा ऐसी अवसंरचना विकसित करें कि दिव्यांगों का सशक्तिकरण और समावेश सुनिश्चित हो सके। केन्द्र सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों को नए तरीके से निर्मित करने की प्रक्रिया में संलग्न है और राज्य सरकारों व केन्द्र शासित प्रदेशों से यह आशा की जाती है कि वे भी अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों में तदनुसार परिवर्तन करें। इसी परिप्रेक्ष्य में पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली में हुआ।

इस अधिनियम में दिव्यांगता को गतिशील और व्यापक अर्थ में पारिभाषित किया गया है। दिव्यांगता के प्रकारों की संख्या सात से बढ़ाकर 21 कर दी गई है। इनमें नेत्रहीनता,दृष्टिहीनता, कुष्ठ उपचारित जन, श्रवण दुर्बलता (बहरापन और सुनने में परेशानी), गतिहीनता, बौनापन, बौद्धिक दुर्बलता, मानसिक रूग्णता,स्वलीनता, मस्तिष्क पक्षाघात, मांसपेशीय दुर्विकास,दीर्घकालिक मानसिक स्थितियां, विशेष अध्ययन दुर्बलता, विविध स्लोरोसिस, बोलने और भाषा की दुर्बलता, थैलेसीमिया, होमो फीलिया, लाल रक्त कोशिका रोग, बहरेपन और नेत्रहीनता से जुड़ी विविध दिव्यांगता, एसिड हमले का पीड़ित और पारकिंसन रोग सम्मिलित हैं।

सरकार दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। दिव्यांगों के लिए सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत और उच्च शिक्षा में पांच प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। पिछले तीन वर्षों में उन्हें छह हजार से ज्यादा कैंप लगाकर, नौ लाख से अधिक आवश्यक उपकरण भी प्रदान किए गए हैं। केंद्र सरकार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के 30 मिलियन से अधिक बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांग लाभार्थियों को प्रत्यक्ष हस्तांतरण के लिए प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत अभावों से जूझ रहे परिवारों तक नकद हस्तांतरण की सुविधा खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा समेत समग्र सामाजिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है।

वर्ष 2016 में एनएसएपी योजना को सर्वाधिक महत्वपूर्ण योजना के अंतर्गत लाने का जबसे रणनीतिक निर्णय लिया गया, तब से केन्द्र सरकार योजना की शत-प्रतिशत जरूरतें पूरी करने के लिए वित्तीय प्रतिबद्धता को लगातार बढ़ा रही है। वित्त वर्ष 2018-19 के लिए एनएसएपी योजना को 9975 करोड़ रुपये आवंटित किए गए,जो वर्ष 2014-15 के दौरान 7241 करोड़ रुपये के आवंटित बजट से 38 प्रतिशत अधिक है। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान एनएसएपी के तहत राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों को 8696 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई, जो वर्ष 2014-15 के दौरान जारी राशि से 23 प्रतिशत अधिक है।

योजना में पारदर्शिता बढ़ाने और कमियां हटाने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। एनएसएपी के अंतर्गत लाभार्थियों के आंकडें एनएसएपी-पीपीएस पर डिजिटल फार्म में रखे गए हैं। योजना के अंतर्गत 173 लाख लाभार्थियों के आधार नंबर उनकी सहमति से जोड़े गए हैं। इस दिशा में तेजी लाते हुए डिजिटल लेन-देन की सुविधा बढ़ाने के लिए लाभार्थियों की सहमति से आधार आधारित भुगतान व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य है, ताकि किसी भी तरह की संभावित कमियों को पूरी तरह से दूर किया जा सके। आधार आधारित व्यवस्था से बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांग लोगों को बैंक/डाकघर के माध्यम से उनके गांव तक भुगतान पहुंचाया जाएगा।

वित्तीय वर्ष 2017-2018 के प्रारंभ में केवल छह राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों गुजरात, लक्षद्वीप, बिहार, दादर एवं नगर हवेली, दमन एवं द्वीप, झारखंड और महाराष्ट्र में ही डिजिटल लेन-देन के माध्यम से एनएसएपी सहायता पहुंचायी गई और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए एक 1.73 करोड़ लेन-देन दर्ज किए गए। 31 मार्च, 2018 को समाप्त वित्तीय वर्ष में विशेष प्रयास के अंतर्गत आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दमन एवं द्वीप, दादर एवं नगर हवेली, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, लक्षद्वीप, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र. मेघालय, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और उत्तरप्रदेश जैसे 20 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए 10.73 करोड़ लेन-देन हुए। अत: 2016-17 में डीबीटी के जरिए डिजिटल लेन-देन की तुलना में 2017-18 में 520 प्रतिशत लेन-देन की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। वर्ष 2017-18 में 6791.70 करोड़ रुपये मूल्य के डिजिटल लेन-देन किए गए जो इस साल जारी धनराशि का लगभग 78 प्रतिशत है।

विभिन्न तरह के अभावों को कम करने की कोशिशों को और अधिक कारगर करने के उद्देश्य से मुद्दे के अभिसरण पर अधिक से अधिक जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना के अंतर्गत मासिक सहायता 300 से बढ़ाकर 500 रुपये प्रति महीना करने के अलावा अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में भी दिव्यांग लोगों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। एमजीएनआरइजीए के तहत कार्यस्थलों पर पेयजल उपलब्ध कराने, पालना घर की व्यवस्था इत्यादि में दिव्यांग लोगों को काम दिलाने को प्राथमिकता दी गई है। दिव्यांग श्रमिकों को अन्य श्रमिकों के बराबर ही मजदूरी दी जाती है। दिव्यांग श्रमिकों को उनके अनुसार उचित काम के चुनाव जैसी कई और छूट दी गई है। वित्त वर्ष 2017-18 में एमजीएनआरइजीए के अंतर्गत लगभग 4.7 लाख दिव्यांग श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराया गया।

डीडीयू-ग्रामीण कौशल योजना के निर्देशों के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए लोगों के कौशल बढ़ाने के लक्ष्य का कम से कम तीन प्रतिशत कौशल विकास लक्ष्य दिव्यांगों के लिए सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। इस योजना के अंतर्गत दिव्यांग योजनाओं के लिए पृथक प्रशिक्षण केन्द्र हो सकते हैं और नियमित परियोजना से अलग इनकी लागत भी अलग हो सकती है। डीडीयू-ग्रामीण कौशल योजना के अंतर्गत देशभर में अभी कुल 243 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिसमें दिव्यांग उम्मीदवारों को भी प्रशिक्षित करने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त डीडीयू-जीकेवाई के अंतर्गत पांच विशेष परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनमें 1500 दिव्यांग उम्मीदवारों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाना है। वित्त वर्ष 2016-17 में 662 उम्मीदवारों की तुलना में डीडीयू-जीकेवाई परियोजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2017-18 (फरवरी 2018 तक) में 912 दिव्यांग उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया।

सरकार दिव्यांगों के लिए आवासीय सुविधा भी उपलब्ध करा रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना (जी) में भी राज्यों के लिए यह प्रावधान है कि वह कम से कम तीन प्रतिशत दिव्यांग लाभार्थी सुनिश्चित करें। इस योजना के अंतर्गत दिव्यांगों के लिए 5682 घर स्वीकृत किए गए, जिनमें से 1655 घरों का निर्माण हो चुका है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थॉवरचंद गहलोत के अनुसार सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने दिव्यांग जनों के लिए सहायता उपकरण वितरित करने, सभी प्रकार के विकास के लिए अभिनव कार्यक्रमों और योजनाओं का शुभारंभ करने तथा समाज में उनके सामाजिक आर्थिक पुनर्वास करने में विश्व रिकॉर्ड बनाया है। यह मंत्रालय समाज में दिव्यांग जनों के सम्मानीय जीवन के लिए बेहतर शिक्षा, व्यवसायिक शिक्षा और पुनर्वास के लिए किए गए प्रयासों के कारण महत्वपूर्ण और प्रमुख बन गया है।

निंसंदेह सरकार की इन योजनाओं से दिव्यांग जनों के जीवन में सुधार आएगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दिव्यांग जनों को उन सब योजनाओं का लाभ मिले, जो उनके कल्याण के लिए चलाई जा रही हैं।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

वन धन योजना : जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव आएगा


देश में अधिकतर जनजातीय जिले वन क्षेत्रों में हैं। जनजातीय समुदाय पारंपरिक प्रक्रियाओं से गैर-लकड़ी वनोत्पाद एकत्रित करने और उनके मूल्यवर्धन में पारंगत होते हैं। इसलिए केंद्र सरकार जनजातीय समुदाय के वनोत्पाद एकत्रित करने वालों और कारीगरों के आजीविका आधारित विकास को बढ़ावा देना चाहती है। केंद्र सरकार ने वन धन योजना प्रारंभ की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अम्बेडकर जयंती पर 14 अप्रैल, 2018 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में इस पायलेट परियोजना का शुभारंभ किया था। उन्होंने इस योजना के अंतर्गत पहले मॉडल वान धन विकास केंद्र का भी उद्घाटन किया। यह जनजातीय मामलों और जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ (टीआरआईएफईडी) मंत्रालय की योजना है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि वन धन, जन धन और गोवर्धन भविष्य में ग्रामीण और जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के आधार होंगे। उनके दृष्टिकोण के अनुरूप अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए समन्वित कार्रवाई की जा रही है। 
प्रधानमंत्री के जन धन, वन धन तथा गोवर्धन योजनाओं को एकजुट करने के उनके आग्रह पर केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने देश के जनजातीय जिलों में वन धन विकास केंदों का विस्तार करने का प्रस्ताव किया है। इस व्यवस्था के तौर-तरीके तय करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय में सचिव लीना नायर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई। इस योजना के अनुसार ट्राइफेड गौण वनोत्पाद (एमएफपी)-आधारित बहु-उद्देशीय वन धन विकास केंद्र स्थापित करने में सहायता करेगा। यह दस स्वयंसेवी समूहों (एसएचजी) का केंद्र होगा, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों में 30 एमएफपी एकत्रित करने वाले शामिल होंगे। इस पहल का उद्देश्य प्राथमिक स्तर पर एमएफपी में मूल्य वृद्धि कर जमीनी स्तर पर जनजातीय समुदाय को व्यवस्थित करना है। इस पहल के जरिये गैर लकड़ी वनोत्पाद की मूल्य श्रृंखला में जनजातीय लोगों की भागीदारी वर्तमान 20 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत होने की संभावना है। देश के वन क्षेत्रों के जनजातीय जिलों में दो वर्ष में लगभग तीन हजार ऐसे वन धन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया है। 50 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी वाले 39 जिलों में प्राथमिकता के आधार पर यह पहल शुरू करने का प्रस्ताव किया गया है। इसके बाद धीरे-धीरे देश के अन्य जनजातीय जिलों में इनका विस्तार किया जाएगा।

यह योजना केंद्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण विभाग के तौर पर जनजातीय कार्य मंत्रालय और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण एजेंसी के रूप में ट्राइफेड के माध्यम से लागू की जाएगी। योजना के कार्यान्वयन में राज्य स्तर पर एमएफपी के लिए राज्य नोडल एजेंसी और जमीनी स्तर पर जिलाधीश महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह भी प्रस्ताव किया गया कि वन धन एसएचजी के प्रतिनिधियों से गठित प्रबंधन समिति स्थानीय स्तर पर केंद्रों का प्रबंधन करेगी।

एमएफपी या अधिक उपयुक्त के रूप में उल्लेखित गैर-लकड़ी वनोत्पाद (एनटीएफपी) देश के लगभग पांच करोड़ जनजातीय लोगों की आय और आजीविका का प्राथमिक स्रोत है। इसलिए स्थानीय कौशल और संसाधनों पर आधारित जनजातीय लोगों के विकास का यह आदर्श मॉडल एनटीएफपी केंद्रित होगा।

केंद्र सरकार ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम-1996 और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 के प्रावधानों के माध्यम से इस क्षेत्र में कुछ सुधार किए हैं। इनके अंतर्गत उनके क्षेत्रों में पाए जाने वाले एमएफपी पर जनजातीय ग्राम सभा को स्वामित्व के अधिकार प्रदान किए गए हैं।

वर्ष 2014 में एमएफपी के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत चयनित एमएफपी एकत्रित करने वालों को न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान किया जाता है। हालांकि यह कदम सही दिशा में है, लेकिन एमएफपी से जुड़े अधिकतर कारोबार गैर संगठित है, जिसके कारण वनोत्पाद एकत्रित करने वालों को कम मूल्य मिल पाता है और उतपादों के सीमित मूल्यवर्धन से अधिक उतपाद व्यर्थ हो जाते है। इसलिए एमएफपी की आपूर्ति श्रृंखला के आगे और पीछे की कड़ी को सुदृढ़ करने और विशेष रूप से जनजातीय समुदाय को व्यवस्थित करने के लिए अधिक संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है।

इकाई स्तर पर वनोत्पाद एसएचजी द्वारा एकत्रित किए जाएंगे और लगभग 30 सदस्यों का वन धन विकास ‘समूह’ होगा। एसएचजी क्षेत्र में उपलब्ध काटने और छानने, सजाने, सूखाने और पैक करने जैसे उपकरणों का उपयोग कर प्राथमिक स्तर पर एमएफपी का मूल्यवर्धन करेंगे। 
एक आदर्श वन धन विकास समूह में कई सुविधाएं होंगी, जिनमें आवश्यक भवन अथवा बुनियादी ढांचा सुविधा लाभार्थियों में से किसी एक के आवास या आवास के हिस्से या सरकारी या ग्राम पंचायत भवन में स्थापित किए जाने का प्रावधान शामिल है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में उपलब्ध एमएफपी के आधार पर काटने, छानने, सजाने, सूखाने जैसे छोटे औजार एवं टूल किट सम्मिलित है। प्रशिक्षण के लिए कच्चे माल के प्रावधान के साथ 30 प्रशिक्षुओं के बैच के लिए पूरी तरह से सुसज्जित प्रशिक्षण सुविधाएं और ट्रेनी किट भी दी जाएगी, जिसमें बैग, पैड, पेन, विवरणिका, प्रशिक्षण पुस्तिका, पुस्तिका आदि शामिल हैं। साथ ही वित्तीय संस्थानों, बैंकों, एनएसटीएफडीसी के साथ समझौतों के जरिये एसएचजी के लिए कार्यशील पूंजी का प्रावधान भी किया जाएगा।
एक ही गांव में ऐसे दस एसएचजी के क्लस्टर से वन धन विकास केंद्र बनेगा। एक केंद्र में समूह के सफल संचालन के आधार पर अगले चरण में समूह के सदस्यों के उपयोग के लिए भवन, गोदाम जैसी सामान्य बुनियादी ढांचा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
इस पहल के अंतर्गत कवर किए जा सकने वाले प्रमुख गौण वनोत्पादों की सूची में इमली, महुआ के फूल, महुआ के बीज, पहाड़ी झाड़ू, चिरौंजी, शहद, साल के बीज, साल की पत्तियां, बांस, आम, अमचूर, आंवला, चूरन, कैंडी, तेज़ पट्टा, इलायची, काली मिर्च, हल्दी, सौंठ, दालचीनी आदि शामिल हैं। इनके अलावा मूल्यवर्धन के लिए संभावित अन्य एमएफपी शामिल किए जा सकते हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि वर्ष 1999 में बस्तर में इस योजना को लागू किया गया था, किन्तु गैर आदिवासी कारोबारियों के विरोध के बाद सरकार ने इस नीति को वापस ले लिया था। अब यह योजना दोबारा प्रारंभ की गई है। यदि यह योजना सही तरीके से लागू हो जाती है, तो इससे जनजातीय समुदाय के लोगों को बहुत लाभ होगा। इसस उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना : मुख्यधारा में लाने का प्रयास


सरकार समाज के कमजोर वर्गों, जनजातियों और वन में रहकर जीवन यापन करने वाले खनन गतिविधियों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सजग है। देश के खनन क्षेत्रों के लोगों को मूलमूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने 17 सितम्बर, 2015 प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के शुभारंभ की घोषणा की। यह एक नया कार्यक्रम है, जिसमें खनन से संबंधित परिचालनों से प्रभावित लोगों तथा क्षेत्रों का कल्याण किया जाएगा। इसमें डिस्ट्रिक मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) द्वारा उपलब्ध कराई गई निधि का उपयोग किया जाएगा। 

प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का उद्देश्य खनन से प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्न विकास तथा कल्याणकारी परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों को लागू करना है। ये राज्य और केंद्र सरकार की वर्तमान में चल रही योजनाओं एवं परियोजनाओं की सम्पूरक भी होगी। खनन जिलों में लोगों के स्वास्थ्य और सामाजिक- अर्थव्यवस्था, पर्यावरण पर खनन के दौरान और बाद में पड़े प्रतिकूल प्रभाव को कम करना अथवा दूर करना शामिल हैं। खनन क्षेत्रों में प्रभावित लोगों के लिए दीर्घावधि टिकाऊ जीवन यापन सुनिश्चित करना भी इसमें सम्मिलित है। जीवन की गुणवत्ता में ठोस सुधार सुनिश्चित करते हुए जीवन के सभी पहलुओं को शामिल करने पर ध्यान रखा गया है। पीने के पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, कौशल विकास, महिला और बाल विकास, वरिष्ठ तथा विकलांगजनों का कल्याण, कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र इस निधि का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करेंगे। हितकर जीवन यापन वातावरण बनाने के लिए निधि की शेष राशि सड़क, ब्रिज, रेलवे, जलमार्ग परियोजनाओं, सिंचाई और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बनाने पर खर्च की जाएगी। 

केंद्र सरकार ने एमएमडीआर अधिनियम-1957 की धारा 20-ए के अंतर्गत प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना को लागू करने के लिए दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए राज्य सरकारों को निदेश जारी किए हैं और राज्यों को यह निर्देश दिया गया है कि डिस्ट्रिक मिनरल फाउंडेशन के लिए बनाए गए नियमों में इन्हें शामिल कर लें। डीएमएफ को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे कार्य प्रणाली में पूरी पारदर्शिता बरतें और उनके द्वारा चलाई विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं के बारे में समय-समय पर रिपोर्ट दें। 

खनन और इस्पात मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना को एक क्रांतिकारी और अनोखी योजना बताते हुए कहा है कि इससे खनन क्षेत्र में रहने वाले प्रभावित लोगों का जीवन रूपांतरित होगा। उनका कहना है कि देश में खनन क्षेत्र का नियोजित विकास समय की मांग है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्तमान सरकार नियोजित तरीके से काम कर रही है और पिछले एक वर्ष में खऩन क्षेत्र में बड़े परिवर्तन किए गए हैं। भारत में खनन क्षेत्र की सांख्यिकी पर गौर करें, तो हम यह महसूस करेंगे कि इस क्षेत्र में अपार संभावना हैं। रोजगार सृजन तथा सकल घरेलू उत्पाद में योगदान की दृष्टि से खनन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। खदानों तथा वन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय तथा गरीब लोगों की समस्याओं का स्थाई समाधान ढूंढने में प्रधानमंत्री की खनिज क्षेत्र कल्याण योजना तथा जिला खनिज फाउंडेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 

उनके अनुसार खनन क्षेत्र पुनर्जीवित किया गया है और मई 2014 के बाद से उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप यह क्षेत्र विकास की राह पर चल पड़ा है। इससे खनिज आधारित उद्योगों को सहायता मिलेगी और मैन्यूफैक्चरिंग तथा मेक इन इंडिया को प्रोत्सान मिलेगा। सितम्बर, 2014 में लौह अयस्क उत्पादन 8 मिलियन था, जो 2015 में बढ़कर 12.5 मिलियन टन हो गया। यह सामान्य सुधार नहीं है। हमारे खनन क्षेत्र की एक बड़ी कमी यह है कि हम छोटे स्तर पर खुदाई करते हैं। हमारी तरह का भूगर्भीय प्रोफाइल वाले आस्ट्रेलिया ने क्षेत्रीय खुदाई में 100 प्रतिशत सफलता प्राप्त की है और भारत में यह काम 10 प्रतिशत हुआ है। इस कमी को दूर करने के लिए हमने राष्ट्रीय खनिज खुदाई ट्रस्ट स्थापित किया है। जीएसआई तथा एमईसीएल के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को भी अधिसूचित करके खुदाई करने के लिए अधिकृत किया गया है। किसी भी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए सभी हितधारकों को एक साथ काम करना आवश्यक है। यह खन्न क्षेत्र के लिए भी सच है। सतत और समावेशी विकास के समान लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार, नियोजनकर्ताओं, नीतिनिर्धारकों, खनन उद्योग, टेक्नॉलाजी सप्लाईकर्ता, सेवा प्रदाता तथा समुदायों को एक साथ काम करना होगा। 

सरकार की इस योजना से खनन क्षेत्र के निवासियों को जहां मूलभूत सुविधाएं, प्राप्त होंगी, वहीं वे मुख्यधारा में भी आएंगे।


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Friday, September 11, 2026

अतीत का स्मरण


 चित्र संग्रह से चित्र!!
अतीत का स्मरण!!

बैठक







 संस्कारधानी जबलपुर में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक!
संस्कारधानी जबलपुर में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हो रही है। बैठक में देशभर से आए पदाधिकारी एवं शिक्षाविद् भारतीय दृष्टि, संस्कारयुक्त शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण तथा राष्ट्र निर्माण से जुड़े विभिन्न विषयों पर मंथन करेंगे।
यह बैठक विद्या भारती के शिक्षा दर्शन को समयानुकूल बनाते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के संतुलित समन्वय के साथ नई पीढ़ी के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
संस्कारयुक्त शिक्षा से राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ी का निर्माण—यही विद्या भारती का संकल्प है।

Wednesday, September 9, 2026

टीवी पर लाइव




युवा भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं।
भारत की राजनीति अब केवल सत्ता और चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि युवा आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा, नवाचार और विकास के सवालों के इर्द-गिर्द भी आकार ले रही है। युवा देश की सबसे बड़ी जनशक्ति हैं और उनकी अपेक्षाएँ राजनीतिक दलों की नीतियों और प्राथमिकताओं को प्रभावित कर रही हैं।
आज का युवा रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता, तकनीकी प्रगति और सुरक्षित एवं विकसित भारत चाहता है। इसलिए जो राजनीतिक दल युवाओं की आकांक्षाओं को समझकर उन्हें अवसर और नेतृत्व प्रदान करेगा, वही भविष्य की राजनीति में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगा।
युवा केवल भारत का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीति के निर्णायक भागीदार हैं।

पूर्वोत्तर के लिए योजनाएं : समुचित विकास होगा


केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों के विकास पर विशेष ध्यान दे रही है। एक्ट ईस्ट की नीति को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार लगातार पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाने में लगी है। इससे जहां क्षेत्र का विकास हो रहा है, वहीं लोगों को नये अवसर भी प्राप्त हो रहे हैं।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि वे पूर्वोत्तर क्षेत्रों को दक्षिण-पश्चिम एशिया का गेटवे मानते हैं। 

एक अभूतपूर्व निर्णय के अंतर्गत राष्ट्रपति ने नवंबर में भारतीय वन (संशोधन) विधेयक को लागू किया, जिसके तहत ‘वृक्ष’ की परिभाषा के दायरे से गैर वन क्षेत्रों में बांस को अलग कर दिया गया है। इस निर्णय से आर्थिक इस्तेमाल के लिए बांस को काटने संबंधी अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इस निर्णय को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में सम्पन्न होने वाली मंत्रिमंडल की बैठक में स्वीकृति दी गई। इसे एक ऐतिहासिक निर्णय कहा गया, क्योंकि पहले भारतीय वन अधिनियम-1927 के अंतर्गत बांस को वैधानिक रूप से ‘वृक्ष’ के रूप में परिभाषित किया गया था। इसके कारण गैर किसानों द्वारा गैर वन भूमि पर बांस की खेती में बाधा आती थी।

अक्टूबर 2017 में सरकार ने नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल प्रबंधन के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगस्त 2017 में पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ के हालात और राहत कार्यों का जायजा लेने के लिए गुवाहाटी गए थे। उनके दौरे की पृष्ठभूमि में इस समिति का गठन किया गया था। समिति पन बिजली, कृषि, जैव विविधता संरक्षण, बाढ़ से होने वाले मिट्टी के क्षरण में कमी लाने, अंतर्देशीय जल यातायात, वन, मछली पालन और ईको-पर्यटन के रूप में जल प्रंबधन के लाभों को बढ़ाने का काम करेगी। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय इसका समन्वय करेगा। इसके साथ ही पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने चार पूर्वोत्तर राज्यों असम, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम में बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण के कार्यों के लिए 200 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए है। इस वर्ष क्षेत्र में अभूतपूर्व बाढ़ आई थी और बहुत अधिक वर्षा दर्ज की गई थी। यह पिछली अवधि के दौरान होने वाली वर्षा से 100 प्रतिशत अधिक थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगस्त में जब बाढ़ का जायजा लेने के लिए पूर्वोत्तर गए थे, तब उन्होंने 2000 करोड़ रुपये का बाढ़ राहत पैकेज घोषित किया था।

उल्लेखनीय है कि पूर्वोत्तर के विकास को और बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च 2018 में वर्तमान परियोजनाओं को मार्च 2020 तक करने समेत उत्तर पूर्व परिषद की योजनाओं को दी स्वीकृति दी। महत्वपूर्ण अंतर्राज्यीय सड़कों के विकास सहित पूर्वोत्तर की विकास परियोजनाओं के लिए 4500 करोड़ रुपये प्रदान किए। इस धनराशि को मार्च 2020 तक खर्च किया जाएगा। इसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र में सड़कों के विकास के लिए 1000 करोड़ रुपये की योजना भी शामिल है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था को लर्निंग आउटकम केंद्रित बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सरकार ने एक अप्रैल से पूरे देश में स्कूली शिक्षा के लिए एक समेकित व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके अंतर्गत सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और टीचर एजुकेशन को एक साथ जोड़कर एक योजना बनाई गई है।
मार्च 2020 तक इस समेकित योजना पर 75 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जो पिछली बार इन योजनाओं को मिले बजट से 20 प्रतिशत अधिक है। इसके माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न 'सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा' को पूरा किया जा सकेगा, तो साथ ही इससे नर्सरी से लेकर बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा हर बच्चे तक पहुंचाने में भी सहायता मिलेगी। अगले तीन वर्ष के लिए मंत्रिमंडल ने शिक्षा ऋण के लिए भी 6600 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। साथ ही ऋण की औसतन सीमा चार लाख रुपये थी, उसको बढ़ाकर साढ़े सात लाख रुपये किया गया है। उत्तर पूर्व परिषद द्वारा चलाई जा रही परियोजनाएं जारी रहेंगी। क्षेत्र के लिए विशेष विकास योजना में 100 प्रतिशत केंद्र का पैसा लगाया जाएगा। 
इसके अतिरिक्त मंत्रिमंडल ने सरसों तेल को छोड़कर शेष खाद्य तेलों के थोक में निर्यात को अपनी स्वीकृति दी है, तो देश में रोजगार के प्रोत्साहन के लिए प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना का दायरा भी बढ़ाया गया है। इसके साथ खाद पर पोषक त्तव आधारित अनुदान को भी वर्ष 2020 तक जारी रखने का निर्णय लिया गया है, जिस पर अगले तीन वर्ष में लगभग 62 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च 2020 तक 3000 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन के साथ पूर्वोत्तर विकास योजना (एनईआईडीएस)-2017 को स्वीकृति दे दी है। सरकार मार्च 2020 से पहले मूल्यांकन के बाद शेष अवधि के लिए आवश्यक आवंटन उपलब्ध कराएगी। एनईआईडीएस अधिक आवंटन के साथ पहले की दो योजनाओं के अंतर्गत कवर किए गये प्रोत्साहनों का समुच्चय है। सरकार पूर्वोत्तर राज्यों में रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए इस योजना के माध्यम से मुख्य रूप से एमएसएमई क्षेत्र को प्रोत्साहन दे रही है। सरकार रोजगार सृजन के लिए इस योजना के माध्यम से विशिष्ट प्रोत्साहन दे रही है। सभी पात्र औद्योगिक ईकाइयां जो केंद्र सरकार की अन्य योजनाओं के एक या उससे अधिक घटकों का लाभ ले रही हैं उनके लिए भी इस योजना के अन्य घटकों के लाभ के लिए विचार किया जाएगा।

15 दिसंबर, 2017 को पूर्वोत्तर विशेष बुनियादी ढांचा विकास योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दी। योजना को 2017-18 से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार शत प्रतिशत सहायता प्रदान करेगी। इस योजना का उद्देश्य मार्च 2020 तक विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के सृजन संबंधित अंतरों को भरना है। योजना के वित्त पोषण की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी। इस विकास योजना की स्वीकृति से संबंधित बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। यह योजना व्यापक रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य के सामाजिक क्षेत्रों के अंतर्गत बुनियादी ढांचे के सृजन का कार्य करेगी। साथ ही जलापूर्ति, विद्युत, संपर्क और पर्यटन को बढ़ावा देने से संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास का कार्य भी इस योजना के अंतर्गत आएगा। यह योजना स्वास्थ्य और शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ साथ पर्यटन को भी बढ़ावा देने का कार्य करेगी जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे और युवाओं को रोजगार प्राप्त होगा। आने वाले समय में यह योजना क्षेत्र के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2017 को असम के ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक लोहित नदी पर बने देश के सबसे लंबे पुल का उदघाटन किया। उन्होंने इस पुल का नाम विश्व प्रसिद्ध लोकगायक भूपेन हजारिका सेतु रखने की घोषणा की थी। इस अवसर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह पुल न केवल असम और अरुणाचल को जोड़ने की कड़ी के रूप में काम करेगा, अपितु यह पूरे पूर्वोत्तर की अर्थक्रांति का आधार बनेगा। असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाले 9.15 किलोमीटर लंबे पुल के बन जाने से दोनों प्रदेशों के बीच की यात्रा का समय छह घंटे से कम होकर मात्र एक घंटा रह गया है। इस पुल के चालू होने से असम और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी भाग के लिए संपर्क सुनिश्चित हो गया है। इससे प्रतिदिन  लगभग 10 लाख रुपये के पेट्रोल और डीजल की बचत होने लगी है। अभी तक यहां ब्रह्मपुत्र नदी को पार करने के लिए केवल दिन के समय नौका का ही उपयोग किया जाता था और बाढ़ के दौरान यह भी संभव नहीं होता था। उन्होंने 27 मई, 2017 को चेरापूंजी में डॉपलर वेदर रडार को राष्ट्र के नाम समर्पित किया। इस रडार प्रणाली से विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बेहतर मौसम अनुमान जारी करना संभव होगा। इससे खराब मौसम से होने वाले नुकसान को न्यूनतम करने में सहायता मिलेगी, क्योंकि सौंदर्य और रोमांच की इस धरती को भारी बारिश और भूस्खलन के कारण तमाम प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 दिसंबर, 2017 को मिजोरम में 60 मेगावॉट की ट्युरिअल जल विद्युत परियोजना राष्ट्र को समर्पित किया। 1302 करोड़ रुपये की लागत की यह परियोजना मिजोरम में स्थापित सबसे बड़ी परियोजना है। इससे राज्य का संपूर्ण विकास और केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी और प्रमुख कार्यक्रम "सभी को सातों दिन चौबीसों घंटे किफायती स्वच्छ ऊर्जा" के लक्ष्य को पूर्ण किया जा सकेगा। परियोजना से अतिरिक्त 60 मेगावाट बिजली प्राप्त होने के साथ ही मिजोरम राज्य अब सिक्किम और त्रिपुरा के बाद पूर्वोत्तर भारत का तीसरा बिजली सरप्लस वाला राज्य बन जाएगा। 

केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के विकास और पूर्वोत्तर के लोगों के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने पूर्वोत्तर परिषद (एनईसी) को दोबारा कारगर बनाने के लिए उसका एक नया स्वरूप तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि उसे पूरे पूर्वोत्तर की उन्नति के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया जा सके। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा था कि इस संबंध में एक प्रस्ताव भेज दिया गया है, जिस पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। एनईसी की स्थापना 1970 के दशक की शुरुआत में की गई थी और इसका उद्देश्य क्षेत्रीय विकास पर विशेष ध्यान देना था। 
3 दिसंबर, 2017 को डॉ. जितेन्द्र सिंह ने ‘पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र विकास’ के लिए 90 करोड़ रुपये की घोषणा की थी। इस योजना का प्रारंभ पायलेट आधार पर दो वर्ष की अवधि के लिए पहले चरण में तामंगलांग जिले से हुआ। नई दिल्ली में द्वि-साप्ताहिक ‘पूर्वोत्तर हस्तशिल्प-सह-हथकरघा प्रदर्शनी-सह-बिक्री उत्सव’ का उदघाटन करते हुए डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा था कि पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने व्यय विभाग के साथ विस्तृत चर्चा की है। चर्चा में यह बात सामने आई थी कि जनकल्याण संबंधी समस्त लक्ष्यों के लिए पूर्वोत्तर राज्यों की पर्वतीय क्षेत्र विकास की मौजूदा योजनाओं में इस संबंध में प्रावधान किया जाना चाहिए।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने 5 जून, 2017 को मणिपुर के इम्फाल में पूर्वोत्तर के लिए ‘पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम’ की घोषणा की थी। यह घोषणा पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम लिमिटेड द्वारा आयोजित निवेशकों और उद्यमियों की बैठक के दौरान की गई थी। इसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय और मणिपुर सरकार ने भागीदारी की थी। इस योजना से मणिपुर, त्रिपुरा और असम के पर्वतीय क्षेत्रों को लाभ होगा।
16 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में डॉ. जितेन्द्र सिंह ने ‘12वां पूर्वोत्तर व्यापार शिखर सम्मेलन’ का उदघाटन किया था। इस सम्मेलन का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यापार अवसरों की संभावनाओं की पहचान करना था। इसके तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ संरचना और सम्पर्कता, कौशल विकास, वित्तीय समावेश, पर्यटन, सत्कार एवं खाद्य प्रसंस्करण संबंधी सेवा क्षेत्र विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना है।

पूर्वोत्तर को भारत की पहली ‘एयर डिस्पेंसरी’ मिलना तय है। इसके अंतर्गत हेलीकॉप्टर के माध्यम से चिकित्सा सेवा प्रदान की जाएगी। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने इस पहल के लिए 25 करोड़ रुपये की आरंभिक धनराशि जारी कर दी है। डॉ. जितेन्द्र सिंह के अनुसार पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय दूरदराज के क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर आधारित चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने संबंधी संभावनाएं देख रहा है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां कोई चिकित्सक या चिकित्सा सेवा उपलब्ध नहीं है। मंत्रालय ने प्रस्ताव भेज दिया है और इसे स्वीकृत भी कर लिया गया है। 
16 अगस्त, 2017 को घोषणा की गई कि दिल्ली में एक पूर्वोत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक एवं सूचना केन्द्र की स्थापना की जाएगी। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने पूर्वोत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक एवं सूचना केन्द्र की स्थापना के उद्देश्य से पूर्वोत्तर परिषद (एनईसी) को लगभग छह करोड़ रुपये की लागत से नई दिल्ली के द्वारका सैक्टर 13 में 1.32 एकड़ भूमि आवंटित की गई है। यह केन्द्र दिल्ली में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए एक सांस्कृतिक एवं सम्मेलन/सूचना हब के रूप में कार्य करेगा। 24 जुलाई, 2017 को नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में बराक छात्रावास का शिलान्यास किया गया। डॉ. जितेन्द्र सिंह ने इस अवसर पर कहा कि जेएनयू में आठ हजार से अधिक छात्र हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र से बाहर किसी भी अन्य राज्य की तुलना में उत्तर-पूर्व के छात्रों की संख्या यहां सबसे अधिक है। पिछले वर्ष बंगलूरु विश्वविद्यालय में भी विशिष्ट रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र की छात्राओं के लिए एक छात्रावास का शिलान्यास किया गया था।

नई दिल्ली में 4 नवम्बर, 2017 को विख्यात वर्ल्ड फूड इंडिया-2017 के दौरान ‘पूर्वोत्तर भारत: जैविक उत्पादन हब; अवसर जिनका अब तक दोहन नहीं किया गया’ शीर्षक सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। पूर्वोत्तर क्षेत्र में बांस की लगभग 50 प्रजातियां, केले की लगभग 14 किस्में और नींबू वर्गीय फलों की 17 किस्में पाई जाती हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में अनानास एवं संतरे जैसे फलों का भी प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है। असम, त्रिपुरा एवं मिजोरम राज्यों में तीन मेगा फूड पार्क हैं। सिक्किम राज्य को पहला जैविक राज्य घोषित किया गया है।

3 अगस्त, 2017 को नई दिल्ली में डोनर के लिए जापान-भारत समन्वय फोरम (जेआईसीएफ) की पहली बैठक आयोजित की गई। डोनर के सचिव नवीन वर्मा ने भारतीय पक्ष का प्रतिनिधित्व किया, जबकि जापानी शिष्टमंडल का नेतृत्व भारत में जापान के राजदूत केन्जी हीरामत्सू ने किया। भारतीय पक्ष द्वारा चिन्हित सहयोग के प्राथमिकता क्षेत्रों में राज्यों के बीच सड़कों तथा बड़ी जिला सड़कों सहित सम्पर्क एवं सड़क नेटवर्क विकास, आपदा प्रबंधन, खाद्य प्रसंस्करण एवं पर्यटन शामिल थे।

19 जुलाई, 2017 को पूर्वोत्तर क्षेत्र के छात्रों एवं उभरते उद्यमियों को एक मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ‘व्यवसाय विचार चुनौती का प्रवर्तन’ विषय पर आयोजित एक समारोह का सह-आयोजन डोनर मंत्रालय एवं पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम लिमिटेड (एनईडीएफआई) द्वारा तेजपुर विश्वविद्यालय में किया गया। यह विश्वविद्यालय के सम्पर्क 2017 का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उद्योगों एवं शिक्षाविदों के बीच आपसी संपर्क को बढ़ावा देना है। समारोह के दौरान व्यवसाय योजना पर आधारित प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन किया गया। प्राप्त की गई कुल 60 योजनाओं में से 15 योजनाओं का चयन किया गया और की गई प्रस्तुतियों के आधार पर तीन व्यवसाय योजनाएं पुरस्कृत की गईं।

3 मई, 2017 को नई दिल्ली में वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से मेघालय के शिलांग स्थित मुख्यालय में पूर्वोत्तर परिषद का एक ई-ऑफिस लांच किया गया। औपचारिक लांचिंग नई दिल्ली के डोनर मंत्री के कार्यालय में एनईसी, शिलांग से एक फाईल प्रस्तुत किए जाने के द्वारा की गई जिसे एनईसी की अगली पूर्ण बैठक के आयोजन के लिए समुचित रूप से अनुमोदित किया गया।
ग्यारहवें उत्तर पूर्व व्यापार सम्मेलन का आयोजन 9 मार्च, 2017 को नई दिल्ली में किया गया। इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्देश्य पूर्वोत्तर में निवेश को बढ़ाना, क्षेत्र की विशेषताओं को रेखांकित करना तथा व्यापार के अवसरों को बढ़ाना था। इस अवसर पर रेल मंत्री ने एक वीडियो संदेश के जरिये कहा कि आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर शीघ्र ही एक ई-वाणिज्य पोर्टल शुरू किया जाएगा, जो पूर्वोत्तर के हथकरघा से बने वस्त्रों  तथा हस्तशिल्प वस्तुओं को पूरी दुनिया में विक्रय करेगा। दार्जलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद ने रेल लिंक को दार्जलिंग तक बढ़ाने का भरोसा दिया है। भविष्य में इसे सिक्किम तक बढ़ाया जाएगा।

दो दिवसीय नॉर्थ ईस्ट कॉलिंग उत्सव का उदघाटन 9 दिसंबर, 2017 को नई दिल्ली में हुआ। इस अवसर पर नॉर्थ ईस्ट वेंचर फंड को लांच किया गया। यह कोष डोनर मंत्रालय और उत्तर पूर्व वित्त विकास कॉर्पोरेशन का संयुक्त उद्यम है। इस कोष की स्थापना का उद्देश्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में उद्यमिता और स्टार्टअप को प्रोत्साहन देना है। इस पर 100 करोड़ रूपये की प्रारंभिक लागत आई है। इससे पूर्व 6 मार्च, 2017 को चंडीगढ़ में तीन दिसवीय डेटीनेशन नॉर्थ ईस्ट-2017 का आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में सटीक प्रौद्योगिकी का विकास करना था। इसका आयोजन डोनर मंत्रालय द्वारा किया गया था।

राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह ने जीएसटी के विभिन्न आयामों पर पूर्वोत्तर के सांसदों से विस्तृत चर्चा की। पूर्वोत्तर मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति की एक बैठक 8 जून, 2017 को नई दिल्ली में आयोजित की गई। इस बैठक में क्षेत्र के सांसदों ने हथकरघा व हस्तशिल्प उत्पादों, झाडू की छड़ियों तथा बांस के उत्पादों पर कर प्रावधानों के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किए। राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह तथा असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनवाल ने 11 जनवरी को गुवाहाटी में आयोजित डीजी धन मेला का उदघाटन किया। इस अवसर पर सर्बानंद सोनवाल ने कैशलेस अर्थव्यवस्था की पहल के अंतर्गत टोका पैसा ई वॉलेट का उदघाटन किया। इस मेले का आयोजन असम सरकार ने आयकर विभाग और नीति आयोग के सहयोग से किया था।

इनके अतिरिक्त में केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। इन योजनाओं के अच्छे परिणाम दिखाई देने लगे हैं।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है