Wednesday, August 19, 2026

परम्परागत खेती विकास योजना : जैविक खेती से लहलहाएंगी फसलें

देश में प्राचीन काल से ही जैविक खेती की जाती रही है। भारत परम्परागत रूप से विश्व का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है। अब भी देश के बहुत बड़े भू–भाग में परम्परागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। जैविक खादों पर आधारित पारम्परिक खेती को जैविक खेती कहा जाता है। बदलते समय के साथ कृषि भूमि कम होने लगी और बढ़ती जनसंख्या का भार सीमित कृष क्षेत्र पर आ गया। ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक उत्पादन लेने की होड़ लग गई। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा। इससे उत्पादन तो बढ़ गया, परंतु दिनों-दिन भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। निसंदेह रासायनिक उर्वरकों के कारण उत्पादन बढ़ा, किन्तु इस तरह अधिक समय तक खेती नहीं की जा सकती। इसे देखते हुए पारम्परिक जैविक खेती और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज विश्व भर में जैविक खाद्य के लिए मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। जैविक खेती की तकनीक को बढ़ावा मिलने से देश इन खाद्य पदार्थों के विशाल निर्यात की संभावनाओं को साकार कर सकता है। इस सबको ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू की है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का एक सविस्तारित घटक है। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत जैविक खेती को क्लस्टर पद्धति और प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा वर्ष 2015-16 से एक नई परम्परागत कृषि विकास योजना का शुभारम्भ किया गया है। इस योजना का उद्देश्य जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण और विपणन को प्रोत्साहन करना है। इस योजना के अंतर्गत सम्मिलित घटक सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली या प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली को सुदृढ़ता प्रदान करने के तारतम्य में हैं। इसी दिशा में भारत सरकार कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा क्षेत्रीय परिषद के रूप में राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र गाजियाबाद से पंजीयन करवाकर, प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली लागू करने संबंधी कार्यवाही के लिए जिला आतमा (एटीएम) समितियों को अधिकृत किया गया है। योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये एवं तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। इन रुपयों का इस्तेमाल किसानों को जैविक खेती के बारे में बताने के लिए होने वाली बैठक, एक्सपोजर विजिट, प्रशिक्षण सत्र, ऑनलाइन पंजीकरण, मृदा परीक्षण, जैविक खेती व नर्सरी की जानकारी, लिक्विड बायोफर्टीलाइजर, लिक्विड बायो पेस्टीसाइड उपलब्ध कराने, नीम तेल, बर्मी कंपोस्ट और कृषि यंत्र आदि उपलब्ध कराने पर किया जाएगा। वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन एवं उपयोग, बायोफर्टीलाइजर और बायोपेस्टीसाइड के बारे में प्रशिक्षण, पंच गव्य के उपयोग और उत्पादन पर प्रशिक्षण आदि इसके साथ ही जैविक खेती से पैदा होने वाले उत्पाद की पैकिंग एवं परिवहन के लिए भी अनुदान दिया जाएगा।

इस योजना का उद्देश्य प्रमाणित जैविक खेती के माध्यम से वाणिज्यिक जैविक उत्पादन को बढ़ावा देना है। उपज को कीटनाशक मुक्त करके उपभोक्ता को पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। जैविक खेती से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और व्यापारियों को भी बाजार उपलब्ध होगा। इसके साथ ही यह योजना उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधन जुटाने के लिए भी किसानों को प्रेरित करेगी। किसान प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करके भरपूर और उन्नत फसल उगा सकेंगे। 

परम्परागत कृषि विकास योजना पहली व्यापक योजना है, जिसका कार्यान्वयन प्रति 20 हैक्टेयर के क्लस्टर आधार पर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। किसान हित समूहों को जैविक खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। क्लस्टर के अंतर्गत किसानों को अधिकतम एक हैक्टेयर तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। जैविक खेती का काम शुरू करने के लिए 50 या उससे अधिक ऐसे किसान एक क्लस्टर बनाएंगे, जिनके पास 50 एकड़ भूमि होगी। इस तरह तीन वर्षों के दौरान जैविक खेती के तहत 10 हजार क्लस्टर बनाए जाएंगे, जो पांच लाख एकड़ के क्षेत्र को कवर करेंगे। प्रमाणीकरण पर व्यय के लिए किसानों पर कोई भार या दायित्व नहीं होगा। फसलों की बुआई के लिए, बीज खरीदने और उपज को बाजार में पहुंचाने के लिए हर किसान को तीन वर्षों में प्रति एकड़ 20 हजार रुपये दिए जाएंगे। परम्परागत संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा और जैविक उत्पादों को बाजार के साथ जोड़ा जाएगा। यह किसानों को शामिल करके घरेलू उत्पादन और जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण को बढ़ाएगा। 

उल्लेखनीय है कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती हो रही है, जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। नवंबर, 2017 तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 किसान समूहों का गठन कर लिया गया है, 2500 किसान हित समूह लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है। 

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार विश्व के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है। बेहद गहरी समझ के साथ वे इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं। आज, वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर ऐसा न करने का निर्णय किया है। इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशकों में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं, जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसंख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गई है, जिसमें हम रासायनिक उर्वरक, कीट-रोग नाशी एवं अन्य रसायनों का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान्न उत्पन्न करने की समस्या पनप गई है।

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के अनुसार परम्परागत खेती विकास योजना के अधीन 29 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र की वार्षिक कार्य योजना 7186 क्लस्टर विकसित करने के लिए कुल 511.76 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है, जिसमें से वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यो को 226 करोड़ रूपये निर्मुक्त किए गए। वर्ष 2016-17 के दौरान उपयोग में लाए जाने के लिए 2814 कलस्टरों के निर्माण के लिए 10 हजार कलस्टरों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केन्द्रीय प्रोयोजित योजना के रूप में परम्परागत कृषि विकास योजना के लिए वर्ष 2016-17 के लिए 297 रूपये की राशि आवंटित की गई।

उत्तर प्रदेश में परम्परागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारंभ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। केन्द्र सरकार की परम्परागत खेती विकास योजना के अंतर्गत पथम चरण में बुंदेलखंड के सभी जिलों समेत उत्तर प्रदेश के 15 जिलों को इसमें शामिल किया गया है। पहले चरण में यह योजना तीन वित्तीय वर्ष के लिए बनाई गई है। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए गैर सरकारी संगठन का चयन किया गया है। क्लस्टर को जैविक खेती की पूरी जानकारी के साथ-साथ बेहतर क्रियान्वयन की तकनीक और तमाम संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पूरे प्रदेश में 28,750 एकड़ भूमि का चयन किया गया और 575 क्लस्टर बनाए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए  जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये व तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की मदद प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। 
किसानों के जैविक उत्पादों के विपणन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पांच लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केन्द्र खुलवा रही है। इस योजना के तहत वर्ष 2015-16 में केन्द्र ने उत्तर प्रदेश को 2052.20 करोड़ की राशि दी, लेकिन इसमें से खर्च केवल 1075.692 करोड़ रुपये हुए। वर्ष 2016-17 में केन्द्र अब तक इस मद में उत्तर प्रदेश को 1270.64 करोड़ रुपये दे चुका है।

कृषि मंत्री के अनुसार वर्ष 2016 में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत उत्तराखंड में गंगा की धारा से लेकर पश्चिम बंगाल तक 1657 ग्राम पंचायतों में नमामि गंगे परियोजना के तहत परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1657 क्लस्टर में जैविक खेती विकसित की जाएगी। इस परियोजना के अंतर्गत कृषि मंत्रालय क्लस्टर निर्माण के साथ एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और माइक्रो सिचाई तकनीक पर प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराएगा। 

यदि हम इन रासायनिक आदानो के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करें, तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक पदार्थों का बड़ा भाग मिट्टी, भू-जल, हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है। ये रसायन छिडकाव के समय वायु के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर, पानी के अन्य स्रोतो को भी प्रदूषित कर देते हैं। रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, और मानवों पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं। धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।

निसंदेह जैविक खेती से न केवल भूमि की उर्वरता बनी रहेगी, अपितु खाद्यान्न भी विषैले होने से बच जाएंगे.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : हर खेत को मिलेगा पानी


जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। हर प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। खेती-किसानी के लिए भी जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। देश के अधिकतर किसानों को अपनी फसल की संचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। देश के अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र को ही होती है। इसके कारण इन क्षेत्रों में सूखे की समस्या है। इनमें देश का उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण के पठार सम्मिलित हैं। लगातार गिरते भू-जल स्तर ने भी सिंचाई जल संकट उत्पन्न कर दिया है। देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई सुविधा नहीं है। 

खराब मानसून से किसानी को राहत पहुचाने के लिए प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य देश के हर खेत तक किसी न किसी माध्यम से सिंचाई सुविधा सुनिश्चित करना है, ताकि जल का अधिक से अधिक सदुपयोग कर अधिक फसल ली जा सके। इसमें पांच वर्षों 2015-16 से 2019-20 के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया है। इस निवेश से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना कार्यक्रम में पूरी आपूर्ति श्रंखला अर्थात जल स्त्रोत, वितरण नेटवर्क तथा फार्म स्तर के अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित करके एकीकृत विकास की कल्पना की गई हैं। वर्ष 2015-16 के दौरान लघु सिंचाई के तहत 8.0 लाख हेक्टेयर क्षेत्र लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। दिसंबर 2019 तक 99 मुख्य और माध्यम सिंचाई को मिशन मोड़ में पूरा किए जाने का भी निर्णय लिया गया हैं। इसके अतिरिक्त 76.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचाई के अंतर्गत लाया जा सकेगा। इससे सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाई जा सकेगी। ’हर खेत को पानी’ के अंतर्गत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए, खेतों में ही जल को इस्तेमाल करने की दक्षता को बढ़ाना देना है, ताकि पानी के अपव्यय को कम किया जा सके। साथ ही सही सिंचाई और पानी को बचाने की तकनीक को अपनाना जा सके। इसके अतिरिक्त इसके माध्यम से सिंचाई में निवेश को आकर्षित करने का भी प्रयास किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 में रुपये 125.17 करोड़ की लागत से 23 बड़े और माध्यम सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किए जाने का निर्णय लिया गया था। लगभग 20 हजार करोड़ की धनराशि से नाबार्ड में एक लम्बी अवधि सिंचाई कोष का सर्जन किया जाएगा।  

इस योजना के उद्देश्यों की उपलब्धि के लिए विशेषकर तीन मंत्रालयों जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा कृषि मंत्रालय के सहभागिता द्वारा विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाते हैं। समेकित पनधारा प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय मुख्य रूप से मृदा एवं जल संरक्षण के लिए छोटे तालाब, जल संचयन संरचना के साथ-साथ छोटे बांधों तथा सम्मोच्च मेढ़ निर्माण आदि कार्यों का क्रियान्वयन राज्य सरकार के माध्यम से करेगा। इसके लिए वर्ष 2015-16 में 1500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय संरक्षित जल को खेत तक पहुंचाने के लिए नाली इत्यादि विकास के साथ-साथ त्वरित सिंचाई लाभ संबंधी कार्यक्रम समयबद्ध तरीके से पूर्ण करेगा। इसके अंतर्गत निम्न स्तर पर जल निकाय सृजन, नदियों में लिफ्ट सिंचाई योजना, जल वितरण नेटवर्क तथा उपलब्ध जलस्रोतों के मरम्मत, पुन: भंडारण तथा सृजन का कार्य मुख्य रूप से किया जाएगा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओं का निर्माण प्रस्तावित है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओ का निर्माण प्रस्तावित है। इन कार्यों के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 2000 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है। 

कृषि मंत्रालय, कृषि एवं सहकारिता विभाग, वर्षाजल संरक्षण, जल बहाव नियंत्रण कार्य, जल उपलब्धता के अनुसार फसल उत्पादन, कृषि वानिकी, चारागाह विकास के साथ-साथ कृषि जीविकोपार्जन के विभिन्न कार्यक्रमों को भी चलाया जाएगा। जल प्रयोग क्षमता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई योजना ड्रिप, स्प्रिंकलर, रेनगन आदि का उपयोग विभिन्न फसलों की सिंचाई के लिए किया जाएगा। इस सभी कार्यक्रमों को चलाने के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 1800 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। इस योजना के अंतर्गत कृषि-जलवायु की दशाओं और पानी की उपलब्धता के आधार पर जिला और राज्य स्तरीय योजनाएं बनाई जाएंगी। इसके अंतर्गत हर खेत तक सिंचाई जल पहुंचाने के लिए योजनाएं बनाने एवं उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया में राज्यों को अधिक स्वायत्ता तथा धन के इस्तेमाल की सुविधा दी गई है। इस योजना में केंद्र 75 प्रतिशत अनुदान देगा और 25 प्रतिशत खर्च राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र और पर्वतीय राज्यों में केंद्र का अनुदान 90 प्रतिशत तक होगा। 

राष्ट्रीय स्तर पर पीएमकेएसवाई योजना की निगरानी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सभी संबंधित मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ एक अंतर मंत्रालयी राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा की जाएगी। कार्यक्रम के कार्यान्वयन संसाधनों के आवंटन, अंतर मंत्रालयी समन्वय, निगरानी और प्रदर्शन के आकलन के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय कार्यकारी समिति गठित की जाएगी। राज्य के स्तर पर योजना का कार्यान्वयन संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय स्वीकृति देने वाली समिति द्वारा किया जाएगा। इस समिति के पास परियोजना को स्वीकति देने और योजना की प्रगति की निगरानी करने का पूरा अधिकार होगा। कार्यक्रम को और बेहतर ढंग से लागू करने के लिए जिला स्तर पर जिला स्तरीय समिति भी होगी। इस योजना के अंतर्गत उन कार्यकर्मों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाता है, जिनसे किसानों को लाभ होता है। किसान अपनी सुविधानुसार बेहतर सिंचाई जल योजना अपना सकते हैं। वे ड्रिप, स्प्रिकलर सिंचाई योजनाओं आदि उपयोग कर सकते हैं। किसानों को इन तकनीकों की जानकारी अपने जिले के कृषि/बागवानी अधिकारी से प्राप्त हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त किसान टोल फ्री किसान कॉल सेंटर 1800-180-1551 से भी जानकारी ले सकते हैं। कृषि समन्वय एवं किसान कल्याण विभाग को वर्ष 2016-17 में सूक्ष्म सिंचाई के लिए 2340 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया हैं, जो वर्ष 2015-16 के 1550 करोड़ रुपये के बजट से 51 प्रतिशत अधिक हैं।

इस योजना के अंतर्गत “हर खेत को पानी” यानि प्रत्येक किसान के खेत मे सिंचाई की सुविधा और फसल की ‘जल उपयोग दक्षता’ को बढाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार जल संरक्षण और क्षेत्रीय स्तर पर सिंचाई के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने तथा इसके प्रबंधन के लिए प्रतिबद्ध है। सुनिश्चित सिंचाई के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार, खेत में पानी के संरक्षण के लिए इसकी उपयोग दक्षता में सुधार, परिशुद्ध सिंचाई तथा पानी के बचत के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, जलवाही स्तर के पुनर्भरण बढ़ाने, अर्धशहरी कृषि के लिए नगरपालिका के अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग की व्यवहार्यता की खोज तथा टिकाऊ और स्थाई जल संरक्षण के उपायों को लागू करने पर बल दिया जा रहा है, जिससे सिंचाई परियोजनाओं मे निजी निवेश भी अधिक से अधिक आकर्षित हो रहे है।

उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व की आबादी की 17 प्रतिशत जनसंख्या तथा 11.3 प्रतिशत पशुधन निवास करते हैं, जबकि देश में विश्व का मात्र 4 प्रतिशत जल संसाधन उपलब्ध है। ऐसे में देश के समक्ष इतनी बड़ी मानव आबादी तथा पशुधन को पानी की आपूर्ति करने की अभूतपूर्व चुनौती है। ऐसे में समुचित जल प्रबंधन करके ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। सरकार द्वारा समय-समय पर जल संरक्षण से संबंधित कार्यकर्मों का भी आयोजन कराया जाता है, ताकि लोगों में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के प्रति जागरुकता पैदा की जा सके। निसंदेह, बेहतर जल प्रबंधन से ही जल संकट से उबरा जा सकता है और संरक्षण भी किया जा सकता है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना : स्वस्थ धरा से होगा खेत हराभरा


उपजाऊ कृषि भूमि से ही अच्छी फसल मिलती है, लेकिन उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण कृषि भूमि निरंतर बंजर होती जा रही है। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो गई है। मिट्टी की उत्पादन क्षमता कम होने लगी है। इसका सीधा प्रभाव कृषि उत्पाद पर पड़ रहा है। उत्तराखंड के देहरादून स्थित मृदा जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के अनुसार एश में पिछले कुछ वर्षों में उर्वरकों, कीटनाशकों और कीटनाशक दवाइयों के अत्यधिक प्रयोग के कारण प्रत्येक वर्ष 5334 लाख टन मिट्टी नष्ट हो रही है। दूसरे शब्दों में औसतन 16.4 टन प्रति हेक्टेयर उपजाऊ मिट्टी प्रत्येक वर्ष समाप्त हो रही है। कृषि जगत के लिए यह बहुत चिंता का विषय है, क्योंकि जब मिट्टी ही नहीं होगी, तो खेती कैसे होगी।

ऐसी स्थिति में नियमित अंतरालों पर मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में आकलन करने की आवश्यकता है, ताकि मिट्टी में पहले से ही मौजूद पोषक तत्वों का लाभ उठाते हुए किसान अपेक्षित पोषक तत्वों का प्रयोग सुनिश्चित कर सकें। केंद्र सरकार राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना नामक योजना चला रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ में इस योजना का शुभारंभ किया था। उन्होंने ’स्वस्थ धरा, खेत हरा’ का नारा दिया है, जिसका अर्थ स्वस्थ भूमि और हरित खेत है। उन्होंने पूरे देश में कृषि क्षेत्र में मिट्टी के स्वास्थ्य पर ध्यान देने का आह्वान किया, ताकि उतपादका बढ़ाई जा सके और समृद्धि लाई जा सके। स्वथ्य भूमि के लिए उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता है। उन्होंने वंदे मातरम गान की चर्चा करते हुए कहा कि भूमि को सुजलाम-सुफलाम बनाने के लिए मिट्टी का पोषण आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना इस दिशा में लाई गई है। उन्होंने मिट्टी के नियमित परीक्षण का आह्वान करते हुए कहा कि छोटे शहरों में भी उद्यमी मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित कर सकते हैं। 

उल्लेखनीय है कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिशन के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। इस कार्ड में खेतों के लिए अपेक्षित पोषण/ उर्वरकों के बारे में फसलवार सिफारिशें की जाएंगी, ताकि किसान उपयुक्त आदानों का उपयोग करते हुए उत्पादकता में सुधार कर सकें। फसल के लिए सबसे आवश्यक तत्व मिट्टी है। यदि मिट्टी की गुणवत्ता ही सही नहीं होगी, तो फ़सल भी उन्नत और भरपूर नहीं हो सकती। इसलिए सरकार ने किसानों के लिए यह कार्ड जारी किया है। इस योजना के अंतर्गत तीन वर्ष के अंदर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का उद्देश्य रखा गया है। इसके लिए अलग से 568.54 करोड़ रूपये का बजट भी रखा गया है।  

सरकार बंजर हो रही भूमि के प्रति अत्यधिक गंभीर है। इस योजना के अंतर्गत मिट्टी के नमूने का पूरी तरह से निरिक्षण किया जाएगा। पूरा निरिक्षण करने के बाद मृदा स्वास्थ्य कार्ड में रिपोर्ट तैयार की जाएगी। सबसे पहले अलग-अलग खेतों की मिट्टी के नमूनों को एकत्रित किया जाएगा। इसके बाद इसे लैब में परिक्षण के लिए भेजा जाएगा और लैब के अंदर विशेषज्ञ इसकी अच्छी तरत से जांच करेंगे। इसके बाद विशेषज्ञ कांच के परिणाम का विश्लेषण करेंगे। फिर वे विभिन्न मिट्टी के नमूनों के गुणों और कमियों की सूची बनाएंगे। यदि मिट्टी में कुछ कमी है, तो उसके सुधार के लिए सुझाव देंगे और उसकी एक सूची बनाएंगे। इसके बाद सरकार किसानों के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड में पूरी जानकारी छापेगी। यह जानकारी इस तरीके से दी जाएगी, जिससे किसान इसे आसानी से अच्छी तरह से समझ सकें। फिर किसानों को एक मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिया जाएगा, जिसमें किसानों के भूमि की मिट्टी की विशेषताओं के बारे में जानकारी होगी कि मिट्टी की कार्यात्मक विशेषताएं क्या हैं, मिट्टी में पानी और विभिन्न पोषक तत्वों की उपलब्धता कैसी है। यदि मिट्टी में अतिरिक्त गुण पाए जाते हैं, तो कार्ड में उसकी अलग सूची दी जाएगी। कुछ सुधार के उपाय बताए जाएंगे, जिससे किसान अपनी मिट्टी की कमियों को सुधारने के लिए आवश्यक उपाय कर सकें। उन्हें एक सूची दी जाएगी कि उनकी भूमि में किस प्रकार की फसल अच्छे से उग सकती है, जिससे उन्हें अधिकतम लाभ हो। इसके अतिरिक्त उन्हें यह भी बताया जाएगा कि उनके खेत की मिट्टी में क्या सुधार करने की आवश्यकता है। वास्तव में मृदा स्वास्थ्य कार्ड, एक प्रकार का रिपोर्ट कार्ड है, जो मिट्टी के गुण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेगा। यह मिट्टी के प्रकार के बारे में, पोषक तत्व सामग्री, आवश्यक खाद, फसल के लिए उपयुक्त तापमान और वर्षा की स्थिति आदि के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराएगा। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खाद के उपयोग से मिट्टी के आधार और संतुलन को बढ़ावा देना है, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पाद प्राप्त हो सके। यह रिपोर्ट किसानों को उनके खेत या भूमि के लिए तीन वर्ष में एक बार दी जाएगी। 

यह योजना किसानों के लिए बहुत ही लाभदायक है। देश के कई राज्यों में किसानों को उनकी मिट्टी के बारे में रिपोर्ट पहले से ही दी जा रही थी। कुछ किसान शिक्षित थे, जो अपनी मिट्टी के गुण-दोषों को अच्छे समझ सकते थे। लेकिन देश में ऐसे बहुत से अशिक्षित किसान है, जो यह नहीं जानते कि उनके खेत की मिट्टी किस प्रकार की है। उन्हें अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए किस तरह की फसलों को विकसित करना चाहिए। इसलिए पूरे देश में इस योजना को लागू करना अत्यधिक आवश्यक था। इस योजना के कारण अब किसान मिट्टी की प्रकृति की जानकारी के साथ यह भी समझ पाएंगे कि उन्हें कौन-सी फसल उगानी चाहिए, उर्वरक और कीटनाशक की संतुलित मात्रा क्या होनी चाहिए। अधिकतर किसान अपने अनुभव के आधार पर ही मिट्टी के गुण-दोष, फसलों का बढ़ना आदि जानते हैं। मगर अधिकतर किसान यह नहीं जानते कि मिट्टी की स्थिति को कैसे सुधारा जा सकता है। इसके कारण उन्हें समस्या का सामना करना पड़ता है. 

किसानों की मदद के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड एप लांच किया गया है। इस ऐप से क्षेत्र स्तर के कार्यकर्ताओं को लाभ होगा। नमूना संग्रह के समय खेत से नमूना पंजीकरण विवरण इकट्ठा करने में यह मोबाइल ऐप स्वचालित रूप से जीआईएस समन्वय को एकत्रित करता है और उस स्थान को इंगित करता है, जहां से क्षेत्र के कार्यकर्ताओं द्वारा मिटटी का नमूना लिया जाता है। यह ऐप राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए विकसित अन्य जियोटैंगिग ऐप की तरह काम करता है। ऐप में किसानों के नाम, आधार कार्ड नंबर, मोबाइल नंबर, लिंग, पता, फसल विवरण आदि दर्ज होता है। इसके अतिरिक्त स्वायल हेल्थ कार्ड पोर्टल को अब समेकित उर्वरक प्रबंधन सिस्टम से जोड़ दिया गया है और मृदा स्वास्थ्य कार्ड सिफारिश के अनुसार उर्वरकों के वितरण का कार्य पॉयलेट आधार पर कई जिलों में शुरू कर दिया गया है। 
उल्लेखनीय है कि शुरू में मृदा स्वास्थ्य कार्ड 14 स्थानीय भाषाओं में तैयार किए जा रहे थे, लेकिन अब कुमाऊनी, गढ़वाली, खासी, गारो जैसी स्थानीय बोलियों में भी कार्ड तैयार किए जा रहे हैं, ताकि इन बोलियों को बोलने वाले किसानों को उनकी अपनी बोली में कार्ड मिल सकें।

नियमित रूप से मिट्टी की जांच होने से किसानों को लम्बे समय तक मिट्टी को स्वस्थ रखने का रिकॉर्ड पाने में सहायता मिलेगी। इसके अनुसार वे इसका अध्ययन कर अलग मिट्टी के प्रबंधन के तरीकों के परिणामों का मुल्यांकन कर सकेंगे। यह कार्ड किसानों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इससे किसान अपने खेत की मिट्टी को सुधार सकेंगे। उर्वरकों और केटनाशकों की संतुलित मात्रा का प्रयोग करते हुए अधिक पैदावार ले सकेंगे। समय पर खेत की मिट्टी का उपचार होने के कारण कृषि भूमि बंजर होने से भी बच जाएगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Sunday, August 16, 2026

संवाद

  


स्मृतियों का संसार












चित्र केवल किसी क्षण को सुरक्षित नहीं करते, वे हमारी स्मृतियों के संसार को समृद्ध करते हैं। बीते हुए आयोजनों, आत्मीय मुलाकातों और सुखद पलों को जब तस्वीरों में देखते हैं, तो लगता है जैसे समय फिर से हमारे सामने आकर ठहर गया हो।

हर चित्र अपने भीतर एक कहानी, एक भाव और एक स्मृति समेटे होता है। यही चित्र हमें नए आयोजनों और कार्यक्रमों के लिए उत्साहित करते हैं और जीवन के सुंदर क्षणों को फिर से जीने का अवसर देते हैं।

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विकास के पथ पर समृद्ध होता उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश आज विकास, सुशासन और जनकल्याण की नई तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है। बदलता हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर, बेहतर कनेक्टिविटी, एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट का विस्तार, औद्योगिक निवेश को बढ़ावा, रोजगार के नए अवसर तथा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर हो रहा काम प्रदेश की विकास यात्रा को गति दे रहा है।
गांव से लेकर शहर तक सुविधाओं का विस्तार और डिजिटल तकनीक का बढ़ता उपयोग आम नागरिक के जीवन को अधिक सुगम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। प्रदेश की समृद्धि का वास्तविक अर्थ तभी है, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
उत्तर प्रदेश—परंपरा, प्रतिभा और प्रगति का संगम।
विकास की इस यात्रा के साथ आगे बढ़ता, समृद्ध होता उत्तर प्रदेश।

Saturday, August 15, 2026

80वाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह धूमधाम से सम्पन्न















बलिया। नागाजी सरस्वती विद्या मन्दिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, माल्देपुर में देश का 80वाँ स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास, राष्ट्रभक्ति एवं गरिमामय वातावरण में धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रध्वज फहराने एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ। विद्यालय परिसर भारत माता की जय और वन्दे मातरम् के जयघोष से गूंज उठा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष तथा विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्यसभा सांसद एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर जी के सुपुत्र श्री नीरज शेखर जी ने की। अतिथि परिचय विद्यालय के आचार्य श्री अरुण कुमार पाण्डेय जी ने कराया।
मुख्य अतिथि डॉ. सौरभ मालवीय ने अपने उद्बोधन में स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक, राष्ट्रीय एवं सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता केवल अधिकारों का नाम नहीं, बल्कि कर्तव्यों के निर्वहन का भी संकल्प है। देश की स्वतंत्रता असंख्य वीरों के त्याग, तपस्या और बलिदान का परिणाम है। आज की युवा पीढ़ी उस स्वतंत्रता की वास्तविक उत्तराधिकारी है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान करते हुए कहा कि युवा ही भारत के वर्तमान और भविष्य के निर्माता हैं। अपने ज्ञान, अनुशासन, परिश्रम, चरित्र एवं राष्ट्रनिष्ठा के बल पर वे भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में विद्यार्थियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज का विद्यार्थी कल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, प्रशासक, सैनिक, पत्रकार एवं विभिन्न क्षेत्रों का कुशल नेतृत्वकर्ता बनकर राष्ट्रसेवा करेगा। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को अपने जीवन का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रखकर समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को भी समझना चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री नीरज शेखर जी ने विद्यार्थियों को राष्ट्रसेवा का संकल्प दिलाते हुए कहा कि “देश के लिए जीना है, देश के लिए काम करना है और अपना पूरा जीवन राष्ट्रहित में समर्पित करना है।” उन्होंने कहा कि आज के नौजवान छात्र ही देश के भविष्य हैं। आपमें से कोई डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक बनेगा तो कोई देश का सिपाही बनकर मातृभूमि की रक्षा करेगा। उन्होंने सभी विद्यार्थियों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ देते हुए राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन जीने का आह्वान किया।
इस अवसर पर बलिया संभाग के संभाग निदेशक श्री कन्हैया चौबे जी एवं विद्यालय प्रबंध समिति के प्रबंधक श्री संजय कुमार कश्यप जी, कोषाध्यक्ष श्री ओमप्रकाश राय जी एवं सदस्य श्री शमशेर बहादुर सिंह जी सहित विद्यालय परिवार के आचार्यगण, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में भैया-बहन उपस्थित रहे।
स्वतंत्रता दिवस समारोह में विद्यालय के भैया-बहनों ने मनमोहक एवं देशभक्तिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विद्यार्थियों द्वारा रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद एवं मंगल पाण्डेय जैसे महान क्रांतिकारियों के जीवन, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया। इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमुदाय में राष्ट्रप्रेम एवं देशभक्ति की भावना को और अधिक प्रबल किया।
कार्यक्रम का सफल एवं प्रभावी संचालन विद्यालय के वरिष्ठ आचार्य श्री मनोज कुमार स्थाना जी एवं आचार्य श्री चन्द्रप्रकाश जी ने किया। अंत में विद्यालय के प्रबंधक श्री संजय कुमार कश्यप जी ने मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, विशिष्ट अतिथियों, प्रबंध समिति के सदस्यों, आचार्यगण, भैया-बहनों एवं समस्त उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
सम्पूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, संस्कार एवं देश के प्रति समर्पण की भावना से ओत-प्रोत रहा। विद्यालय परिसर में गूंजते “भारत माता की जय” और “वन्दे मातरम्” के उद्घोष के साथ समारोह का समापन हुआ।
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है