-डॉ. सौरभ मालवीय
ग्रीष्मकाल के अवकाश में बच्चे अपनी नानी के घर जाते हैं। बाल्यकाल के ये सुंदर संस्मरण जीवनपर्यंत स्मृति में रहते हैं। हमारे देश भारत में बच्चों का अपनी नानी के घर जाना केवल एक यात्रा नहीं है, अपितु एक भावनात्मक परंपरा है, जो उन्हें परिवार से जोड़े रखती है।
शिक्षण संस्थाओं में ग्रीष्म कालीन अवकाश ग्रीष्म ऋतु के मध्य में आता है। इस समयावधि में भीषण गर्मी पड़ती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश मई के अंतिम सप्ताह से लेकर संपूर्ण जून तक रहता है। इस समयावधि में उच्च तापमान के कारण सभी विद्यालय एवं महाविद्यालय बंद रहते हैं। बच्चे वर्षभर ग्रीष्म कालीन अवकाश की प्रतीक्षा करते हैं, क्योंकि इसमें उन्हें सबसे अधिक दिनों का अवकाश प्राप्त होता है। बच्चों के लिए ग्रीष्म कालीन अवकाश किसी पर्व से कम नहीं होता। इस समयावधि में उन्हें कोई चिंता नहीं होती अर्थात उन्हें न तो प्रात:काल में शीघ्र उठकर विद्यालय जाने की चिंता होती है और न ही गृहकार्य करने की कोई चिंता होती है। प्राय: ग्रीष्म कालीन अवकाश में बच्चे अपने माता- पिता के साथ अपनी नानी के घर जाते हैं। वहां वे अपने ननिहाल के लोगों से मिलते हैं। सब उन्हें बहुत लाड़-प्यार करते हैं। नानी के घर की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि उन पर कोई रोक-टोक नहीं होती। यहां माता-पिता का कड़ा अनुशासन नहीं होता। माता-पिता के रोकने-टोकने पर नानी उन्हें ही डांट देती हैं कि बच्चे हैं। यदि अब नहीं खेलेंगे, तो कब खेलेंगे। वर्षभर उन्हें पढ़ाई ही करनी है, अब तो उन्हें खेलने दो। नानी के घर बच्चे अपने मामा और मौसी के बच्चों के साथ मिलकर खेलते हैं। वृक्षों पर चढ़ना और फल तोड़ना भी बहुत ही रोमांचकारी होता है। ये अवकाश का मुख्य आकर्षण होता है। कभी वृक्ष से गिरकर चोटिल होना और परिजनों की डांट खाना भी इसमें सम्मिलित हो जाता है।
रात्रि में नानी बच्चों को बहुत सी रोचक कथाएं सुनाती हैं। ये कथाएं केवल परियों या राजा- महाराजाओं की नहीं होतीं, अपितु परिवार के इतिहास और पूर्वजों की भी होती हैं, जो बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक सिद्ध होती हैं। इनके कारण बच्चे अपने पूर्वजों के विषय में जान पाते हैं। इन कथाओं के माध्यम से वे बच्चों में संस्कार पोषित करती हैं, जो उनके चरित्र का निर्माण करते हैं। यही संस्कार जीवन में उनका मार्गदर्शन करते हैं। अपने पैतृक गांव अथवा नगरों में जाने से वे वहां की संस्कृति से जुड़ते हैं। अपने सगे-संबंधियों से मिलते हैं। इससे उन्हें अपने संबंधों का पता चलता है। उनमें अपने संबंधियों के प्रति स्नेह का भाव उत्पन्न होता है। वे अपने संबंधियों के प्रति अपने दायित्व को भी समझते हैं। समय पड़ने पर वे अपने दायित्वों को निभाने से पीछे भी नहीं रहते। वास्तव में बच्चों को बाल्यकाल से ही उन्हें परिवार और परिवार के प्रति उनके दायित्वों के विषय में बताना चाहिए।
बच्चे नानी के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन करते हैं। वे अपनी माता के मुख से नानी के हाथ से बने भोजन की बातें सुनते रहते हैं और जब उन्हें अपनी नानी के हाथ का बना भोजन खाने को मिलता है, तो उनके आनंद का ठिकाना नहीं रहता। उन्हें नानी के हाथ का बना अचार, मुरब्बा एवं पापड़ आदि अत्यंत प्रिय होते हैं। वापसी में नानी बच्चों के लिए अपने हाथ से बने स्वादिष्ट व्यंजन देती हैं।
ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चे अपने माता पिता एवं ननिहाल के सदस्यों के साथ पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं। अधिकतर लोग ऐसे स्थानों पर जाते हैं, जहां तापमान कम रहता है। ये पहाड़ी क्षेत्र होते हैं। इससे वे वहां की संस्कृति एवं रीति- रिवाजों के बारे में जान पाते हैं। इसके अतिरिक्त वे धार्मिक स्थलों एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों पर भी घूमने जाते हैं। घूमने का अर्थ केवल सैर सपाटा और मनोरंजन करना नहीं है, अपितु पर्यटन से बहुत सी शिक्षाएं मिलती हैं। धार्मिक स्थलों पर जाने से मन को शांति प्राप्त होती है तथा बच्चे अपने गौरवशाली संस्कृति से जुड़ पाते हैं। उन्हें अपने ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है। उनमें आस्था का संचार होता है। उनका आत्मबल एवं आत्म विश्वास बढ़ता है। ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से उन्हें अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होता है। ये व्यवहारिक ज्ञान है, जो उन्हें आने- जाने से प्राप्त होता है। यह उनके लिए आवश्यक भी है। वे जिन चीजों के बारे में पुस्तकों में पढ़ते उनके बारे में उन्हें सहज जानकारी प्राप्त होती है। इसका उनके मन- मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
शिक्षकों द्वारा ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए भी विद्यार्थियों को गृहकार्य दिया जाता है। इस दौरान विद्यालय अवश्य बंद रहते हैं, किन्तु ट्यूशन सेंटर खुले रहते हैं। बच्चे ट्यूशन के लिए जाते हैं और अपना गृहकार्य भी करते हैं। इसके अतिरिक ग्रीष्म कालीन अवकाश के दौरान बहुत से संस्थान अनेक प्रकार के कम समयावधि वाले कोर्स प्रारंभ करते हैं, उदाहरण के लिए चित्रकला, संगीत, गायन, नृत्य, मिट्टी के खिलौने बनाने, सजावटी सामान बनाना आदि। इस समयावधि में बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने एवं नई- नई चीजें सीखने का अवसर प्राप्त होता है। बहुत से बच्चे खेलों की ओर रुझान करते हैं। समय अभाव के कारण वे खेल नहीं पाते थे, किन्तु अवकाश में उन्हें अपनी पसंद के खेल खेलने का अवसर मिल जाता है। क्षेत्र के बच्चे अपनी-अपनी टीमें बना लेते हैं और आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं. इससे उनमें खेल भावना का विकास होता है। किसी भी खिलाड़ी के खेल का प्रारंभ इसी प्रकार होता है। पहले वे अपने मित्रों के साथ खेलता है. फिर इसी प्रकार वह खेल स्पर्धाओं में खेलने लगता है। इस प्रकार एक दिन वह देश के लिए पदक जीतने वाला खिलाड़ी बन जाता है। वास्तव में यह समय बच्चों के नैसर्गिक गुणों को निखारने का कार्य करता है।
यह दुखद एवं चिंतनीय है कि आज के डिजिटल युग में बच्चे मोबाइल में लगे रहते हैं। इससे उनके नेत्रों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। तकनीक का आवश्यकता से अधिक उपयोग करना हानिकारक होता है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को प्रकृति के निकट लेकर जाएं अर्थात ग्रीष्मकालीन अवकाश में ननिहाल अवश्य लेकर जाएं।






































