Sunday, April 5, 2026
राष्ट्रधर्म विशेषांक लोक जागरण - साधना
पुस्तक परिचय -
विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की साधारण सभा बैठक में राष्ट्रधर्म विशेषांक लोक जागरण - साधना अंक का परिचय श्री अवनीश भटनागर जी द्वारा कराया गया. नई दिल्ली
Wednesday, March 18, 2026
साहित्य हमें समृद्ध करता है : डॉ. सौरभ मालवीय
लखनऊ। साहित्यिक गरिमा और सांस्कृतिक उत्साह के बीच लेखक मनीष शुक्ला की पुस्तक “अफसाना लिख रहा हूँ” का भव्य विमोचन समारोह आज लखनऊ पुस्तक मेला, रविंद्रालय में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सौरभ मालवीय ने की, मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मंत्री अनुपमा जायसवाल जी उपस्थित रहीं। विशिष्ट अतिथि के रूप में ललित कला के उपाध्यक्ष गिरीश चन्द्र मिश्रा एवं नाटक अकादमी की उपाध्यक्ष विभा सिंह ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि साहित्य हमें समृद्ध करता है। साहित्य ही जीवन है और जीवन ही साहित्य है। उन्होंने कहा कि “भारत” शब्द का अर्थ ही प्रकाश, उजाला और ज्ञान है, जिसका बोध साहित्य के माध्यम से ही संभव होता है।
मुख्य अतिथि अनुपमा जायसवाल ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह कृति अत्यंत अभिनंदनीय है और पाठकों को एक नई दृष्टि प्रदान करेगी।
इस अवसर पर उपस्थित विशिष्ट अतिथियों ने भी लेखक मनीष शुक्ला के प्रयासों की प्रशंसा की और पुस्तक को समाज के लिए उपयोगी बताया।
कार्यक्रम में साहित्य प्रेमियों, बुद्धिजीवियों एवं बड़ी संख्या में पाठकों की उपस्थिति रही, जिससे वातावरण साहित्यिक उत्साह से ओत-प्रोत रहा।
Monday, March 2, 2026
स्नेहिल सानिध्य
आदरणीय बड़े भाई एवं शुभेच्छु डॉ. सौरभ मालवीय जी (क्षेत्रीय मंत्री, विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय) का कल मेरे ग्राम देवरिया गंगा आगमन से हृदय अत्यंत प्रसन्न और अभिभूत हुआ। आपका स्नेहिल सानिध्य सदैव मेरे लिए प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत रहा है।
मेरी नवीन प्रकाशित पुस्तक "पंच परिवर्तन : राष्ट्रोत्थान की संघ दृष्टि" के लेखन में आपके अमूल्य मार्गदर्शन, सुझाव एवं बौद्धिक सहयोग के लिए मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। आपके विचारों ने न केवल इस कृति को दिशा दी, बल्कि इसके चिंतन को और अधिक परिपक्व तथा राष्ट्रसमर्पित स्वरूप प्रदान किया।
यह पुस्तक भेंट करते हुए मुझे अत्यंत गर्व और आत्मसंतोष की अनुभूति हुई। आपके सान्निध्य से भावी लेखन के लिए भी एक नई ऊर्जा और स्पष्ट पथ प्राप्त हुआ है।
शिवेश प्रताप
Thursday, September 18, 2025
Thursday, June 5, 2025
Tuesday, May 27, 2025
'स्याही के उजाले'
इस पुस्तक के लेखक श्री आशुतोष शुक्ल जी है.
समप्रति : राज्य सम्पादक दैनिक जागरण - लखनऊ
Monday, May 19, 2025
युग भारती लखनऊ इकाई का वार्षिक आयोजन
पुस्तक विमोचन के अवसर पर पुस्तक द्वय के सम्पादक डॉ पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि आचार्य जी के मुक्तको और गीतों में निहित ऊर्जा ने मुझे इनके संकलन, सम्पादन और प्रकाशन के लिये प्रेरित किया ताकि ये भाव समाज में प्रसरित हो सके। इस संकलन में आचार्य जी की रचना की एक पंक्ति 'निराशा भी किसी उम्मीद में ही जी रही है' आचार्य जी के कवित्व की एक बानगी है।
आचार्य ओमशंकर जी ने सभी को लेखन में रत रहने के लिये प्रेरित किया।
प्रश्नोत्तर काल में एक प्रश्न के उत्तर में यतीन्द्र शर्मा जी ने बताया कि विद्या भारती अपने पुराने मूल्यों और दर्शन को मजबूती से थामे है और युगानुकूल परिवर्तनों को आत्मसात कर आगे बढ़ रही है। डॉ सौरभ मालवीय जी ने युगभारती सदस्यों से अपील की कि वे विद्या भारती से प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर दायित्व निर्वहन हेतु आगे आएं।
संस्था के महामंत्री डॉ मोहन कृष्ण मिश्र जी ने बताया कि देश के विभिन्न शहरों से 100 से अधिक शिक्षाविद, इंजीनियर्स, चिकित्सकों और प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ पंकज श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में न्यायमूर्ति सुरेश चंद्र, भरत सिंह, डॉ प्रदीप बाजपेई, डॉ प्रवीण सारस्वत, अभय गुप्त, रविंद्र प्रकाश, डॉ मलय चतुर्वेदी, शुभेन्द्र परिहार, रामेंद्र त्रिपाठी, शरद कश्यप, नितिन परिहार, रामेंद्र सिंह, नवीन भार्गव, डॉ पवन मिश्र, दीपक शर्मा, प्रवीण द्विवेदी, विवेक चतुर्वेदी, पीयूष वर्मा, पुरुषोत्तम बाजपेई, राजेश गर्ग, प्रवीण अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।
Thursday, September 17, 2020
राष्ट्रवाद और मीडिया
मेरे द्वारा संपादित पुस्तक "राष्ट्रवाद और मीडिया" का अध्ययन करते हुए भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदीजी!
पुस्तक के सहायक संपादक श्री लोकेन्द्र सिंह जी है।
Thursday, January 4, 2018
अन्धकार काल भारत में ब्रिटिश साम्राज्य
शशि थरूर अपनी विशिष्ट हाजिर-जबाबी, तीखे व्यंग्य एवं लेखन के साथ लोकप्रिय राजनेता है। इनके द्वारा लिखित पुस्तक "अन्धकार काल भारत में ब्रिटिश साम्राज्य" लोकार्पण वाणी प्रकाशन द्वारा आयोजित था। पुस्तक को राष्ट्रीय दृष्टि से लिखा गया है, मूल "An era of darkness" पुस्तक जो काफी चर्चित रही उसी का यह हिंदी अनुवाद है। शुभकामनाएं।
शेष टिप्पणी पढ़ने के बाद।
Friday, November 10, 2017
अन्त्योदय
कुल पेज -160
मूल्य- 90 रूपये
Monday, June 12, 2017
गर्दिश
लेखक श्री विकास सिंह की पहली कृति का लोकार्पण।
भारतीयता की प्रतिष्ठा,पाश्चात्य सभ्यता की आलोचना,दहेज़ प्रथा,छुआछूत ,सामाजिक असमानता,धार्मिक भेदभाव पर लेखक ने प्रहार किया है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र "राजवंश" एक किसान है। किसान को केंद्र में रखकर इस कृति की रचना की गई है। खास बात यह है कि लेखक 21वर्ष की आयु में यह उपलब्धि अर्जित किया है। विकास जी को अनंत शुभकामनाएं।
Friday, May 26, 2017
कुदरती आवाज की कहानी
उनकी आवाज से चेहरे बनते हैं। ढेरों चेहरे,जो अपनी पहचान को किसी रंग-रूप या नैन-नक्श से नहीं ,बल्कि सुर और रागिनी के आइने में देखने से आकार पाते है। एक ऐसी सलोनी निर्मिति, जिसमें सुर का चेहरा दरअसल भावनाओं का चेहरा बन जाता है। कुछ-कुछ उस तरह जैसे बचपन में परियों की कहानियों में मिलने वाली एक रानी-परी का उदारता और प्रेम से भीगा हुआ व्यक्तित्व हमको सपनों में भी खुशियों और खिलौनों से भर देता है।
Sunday, May 8, 2016
लोकार्पण
हिंदी साहित्य क्षितिज की ओर निगाह डाला जाये तो जो सिर्फ नाम से ही 'वर' नहीं है बल्कि जीते जी साहित्य के बट वृक्ष बन गए ऐसे साहित्य जगत के प्रतिनिधि आचार्य आदरणीय डॉ.नामवर सिंह के द्वारा कल श्रीमती अलका सिंह की काब्य संग्रह "बिखरने से बचाया जाए " का लोकार्पण तमाम साहित्य प्रेमियों के मध्य कांस्टीट्ूशन कल्ब -नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ।
इस घर को, बिखरने से बचाया जाए
"सिर्फ मेरा नहीं, तुम्हारा भी, हम सब का है,
इस घर को, बिखरने से बचाया जाए।"
अंग्रेजी की प्राध्यापिका होने के बावजूद डॉ. अनामिका हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान कर रही है,कहानीकार,उपन्यासकार और समकालीन हिंदी कविता की सर्वाधिक चर्चित कवयित्रियों में अनामिका जाना-पहचाना नाम है,आप को सुनना हम साहित्य प्रेमियों को सुकून देता।
श्रीमती अलका सिंह की काब्य संग्रह "बिखरने से बचाया जाए " का लोकार्पण तमाम साहित्य प्रेमियों के मध्य कांस्टीट्ूशन कल्ब -नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ।
Saturday, May 7, 2016
काश कोई ऐसी मुलाकात होती
काश कोई ऐसी मुलाकात होती
बस जिसकी शर्त जुदाई न होती
"बिखरने से बचाया जाए" का लोकार्पण डॉ. नामवर सिंह, डॉ. अनामिका, डॉ.अमर नाथ अमर, श्री अनंत विजय और लेखिका श्रीमती अलका सिंह
कांस्टीट्यूशन क्लब, नई दिल्ली
Friday, May 29, 2015
राष्ट्रवादी पत्रकारिता का स्वर "पाञ्चजन्य" के संपादक श्री हितेश शंकर
राष्ट्रवादी पत्रकारिता पाञ्चजन्य पत्रिका का एक संछिप्त परिचय श्री रविशंकर की पुस्तक राष्ट्रवादी पत्रकारिता से प्रस्तुत है।
पांचजन्य
राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के प्रकाशन के नियमित होने के साथ ही एक साप्ताहिक पत्र की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। वि.सं. 2004 यानी 14 जनवरी, 1948 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री राजीवलोचन अग्निहोत्री के संपादन में राष्ट्रधर्म प्रकाशन से पांचजन्य का प्रकाशन शुरू हुआ। पहला अंक 16 पृष्ठों का था। उसमें मुसलमान हिन्दू कान्फ्रेंस की रपट छापी गई थी। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं इसकी रिपोर्टिंग की थी। पांचजन्य के दो अंक ही नियमित छप पाये। तीसरा अंक छपने ही वाला था कि 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गई। अतः पांचजन्य का नियमित अंक रद्द करके केवल एक पृष्ठ का एक विशेष अंक छापा गया, जिसमें गांधीजी का एक चित्र था। उसके उसपर शीर्षक था ‘विश्ववंद्य गांधी जी की हत्या’। इसके दो-तीन दिन बाद ही प्रकाशन पर सरकारी ताला लग गया। संपादक, प्रकाशक और मुद्रक सभी जेल में डाल दिए गए। साढ़े चार महीने बाद न्यायालय के आदेश के बाद पांचजन्य का पुनः प्रकाशन संभव हो पाया। परन्तु छह महीने बाद दिसम्बर, 1948 में फिर सरकारी प्रतिबंध लग गया। सात माह बाद जुलाई, 1949 में पांचजन्य पर से प्रतिबंध हटा और प्रकाशन शुरू हुआ। पांचजन्य का निर्भीक स्वर सरकारों के लिए हमेशा सरदर्द बना रहा। पांचजन्य पर तीसरा प्रतिबंध आपातकाल में लगा। सच्चाई तो यह है कि अपने निर्भीक स्वर के कारण पांचजन्य मेशा सरकार की आंखों की किरकिरी बना रहा। इसलिए उस पर सरकार और लोगों द्वारा दायर मुकदमों की सूची बहुत लंबी है। पांचजन्य के संपादकों और प्रकाशकों का एक पैर हमेशा न्यायालय में ही रहा है। पांचजन्य की यात्रा साधनों के अभाव और सरकारी दमन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना के संघर्ष की लंबी कहानी है। पांचजन्य की हमेशा यह कोशिश रही कि स्वाधीन भारत की विकास-यात्रा स्वाधीनता आंदोलन की मूल प्रेरणा से जुड़ी रहे। इसके लिए पांचजन्य ने राष्ट्रजीवन के लगभग सभी क्षेत्र और पहलूओं पर समय-समय पर विभिन्न स्तंभ चलाए। अन्तरराष्ट्रीय घटना चक्र, राष्ट्रीय घटना क्रम, अर्थ जगत, शिक्षा जगत, नारी जगत, युवा जगत, राष्ट्र चिन्तन, सामयिकी, इतिहास के झरोके से, फिल्म समीक्षा, साहित्य समीक्षा, संस्कृति सत्य, अच्छे कार्य, स्त्री, ऐसी भाषा कैसी भाषा आदि स्तंभ इसके उदाहरण हैं। पांचजन्य के विकास में डाॅसम्पूर्णानंद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, डाॅ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, महादेवी वर्मा, किशोरी दास वाजपेयी, कृष्णचंद प्रकाश मेढ़े जैसे मूर्धन्य विचारकों, राजनेताओं और साहित्यकारों का योगदान रहा है। ‘पांचजन्य’ ने जहां अपने सामान्य अंक के सीमित कलेवर में अनेक स्तंभों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक दृष्टि के आलोक में पाठकों को देश-विदेश के घटनाचक्र से अवगत कराने की कोशिश की, तो विचार प्रधान लेखों के द्वारा मूलगामी राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी उन्हें सोचने की सामग्री प्रदान की। असम और पूर्वोत्तर भारत आज जिस संकट से गुजर रहा है, कश्मीर समस्या आज क्यों हमारे जी का जंजाल बनी हुई है? इसके बारे में ‘पांचजन्य’ की चेतावनियों को सुना गया होता तो पृथकतावाद, सामाजिक विघटन एवं राजनैतिक दलों के जिस संकट से हम गुजर रहे हैं, वह हमारे सामने न आता। स्वाधीन भारत की यात्रा के प्रत्येक महत्वपूर्ण मोड़ पर ‘पांचजन्य’ राष्ट्रीयता के प्रहरी की भूमिका निभाता रहा है। ‘पांचजन्य’ ने वर्ष में पांच अवसरों पर विशेषांक निकालने का निश्चय किया। स्वाधीनता दिवस ‘15 अगस्त’, गणतंत्र दिवस ‘26 जनवरी’, विजया दशमी, दीपावली, वर्ष प्रतिपदा। इनके अतिरिक्त भी आवश्यकतानुसार, विषयानुसार, विशेषांकों का आयोजन किया जाता रहा। ये विशेषांक कभी पूर्णाकार, कभी पत्रिकाकार तो कभी पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त भी पांचजन्य ने समय-समय पर आकार औरसज्जा परिवर्तन की दृष्टि से कई परिवर्तन किए। पांचजन्य के प्रत्येक विशेषांक में इतिहास, संस्कृति और राजनीति पर विचारप्रधान लेखों का संकलन होता है। विषय केन्द्रित विशेषांकों की परम्परा स्वयं में बहुत समृद्ध और अनूठी है। प्रारंभ से ही ‘पांचजन्य’ ने व्यवस्था त्रयी के अन्तर्गत ‘राजनीति’, ‘अर्थ’ और ‘समाज’ विषयों पर तीन विशेषांकों का पुस्तकाकार रूप में आयोजन किया। तिलक सिंह परमार के सम्पादन काल में ‘समाज अंक’, ‘राष्ट्रीय एकता अंक’, ‘केरल अंक’, ‘तिब्बत अंक’ और ‘जनसंघ अंक’ निकले। यादवराव देशमुख ने ‘हिमालय बचाओ अंक’, ‘युद्ध अंक’, ‘कश्मीर अंक’, ‘भारत-नेपाल मैत्री अंक’ का आयोजन किया। वचनेश त्रिपाठी ने स्वाधीनता के लिए हुए क्रांति संघर्ष पर दो ‘क्रांति संस्मरण अंक’ आयोजित किए। केवल रतन मलकानी के प्रधान सम्पादकत्व में देवेन्द्र स्वरुप ने ‘भारतीयकरण विशेषांक’, ‘गांधी जन्म शताब्दी विशेषांक’, ‘बंगाल विशेषांक’, ‘बंगलादेश मुक्ति विशेषांक’, ‘दरिद्रनारायण विशेषांक’ आदि का आयोजन किया। भानुप्रताप शुक्ल ने ‘क्रांति कथा अंक’, ‘वीर वनवासी अंक’, ‘उद्योग अंक’ आदि निकाले। प्रबाल मैत्र के सम्पादन काल में ‘अपना वतन अंक’, ‘समाधान अंक’, ‘वैशाखी अंक’ आदि का प्रकाशन हुआ। ‘पांचजन्य’ का देश के साप्ताहिकों में एक विशिष्ट स्थान है। इसकी अनेक रपटें समय-समय पर देश के बुद्धिजीवियों और शासन को आंदोलित करती रही है।
संसद में और अन्य समाचार पत्रों में ‘पांचजन्य’ को अक्सर उद्धृत किया जाता है। समाज ने पांचजन्य पर जो भरोसा व्यक्त किया, पांचजन्य ने भी उसका पूरी तत्परता से निर्वहन किया। केवल भाषा और साज-सज्जा के कारण ही पांचजन्य में अनेक विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए जाते। पांचजन्य के लिए हमेशा उसके पाठक और उसका ध्येय सर्वाेपरि रहा है। इसीलिए तो तमाम प्रकार के आर्थिक संकटों के बाद भी पांचजन्य ने कभी भी अश्लील चित्रों वाले विज्ञापन नहीं छापे। बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों के विज्ञापनों को भी पांचजन्य मंे कोई जगह नहीं मिलती। इन सबके बावजूद पांचजन्य न केवल अपनी यात्रा अनवरत जारी रखे हुए है, बल्कि उसके अनेक मील के पत्थर भी स्थापित किए। भारत-पाकिस्तान की बीच सहयोग को बढ़ाने के लिए उसने वहां के प्रमुख पत्र जंग के साथ मिलकर एक प्रतियोगिता चलायी। जंग के पत्रकार यहां आए और उसका काफी अच्छा प्रभाव पड़ा। पांचजन्य का यशस्वी संपादन अनेक महान विभूतियों ने किया। उनके नाम इस प्रकार हैं-
1. श्री राजीव लोचन अग्निहोत्री प्रथमांक पौष शु. 3, वि. संवत् 2004 से आश्विन कृष्ण 6, वि. संवत् 2006 तक
2. श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रथमांक से 26 अक्टूबर, 1950 तक
3. श्री ज्ञानेन्द्र सक्सेना 2 नवम्बर, 1950 से 29 जून, 1952 तक
4. श्री गिरीश चन्द्र मिश्र 27 जुलाई, 1953 से 16 जुलाई, 1950 तक
5. श्री तिलक सिंह परमार 23 जुलाई, 1956 से 20 नवम्बर, 1959 तक
6. श्री यादवराव देशमुख 09 नवम्बर, 1950 से 09 अक्टूबर, 1967
7. श्री वचनेश त्रिपाठी साहित्येन्दू 16 अक्टूबर, 1967 से 25 दिसम्बर, 1967 02 जनवरी, 1977 से 10 जुलाई, 1977 तक
8. श्री केवल रतन मलकानी 16 जुलाई, 1968 से 18 जुलाई, 1971 तक
9. श्री देवेन्द्र स्वरूप 25 जुलाई, 1971 से 15 अक्टूबर, 1972 तक
10. श्री दीनानाथ मिश्र 15 अक्टूबर, 1972 से 27 अक्टूबर, 1974 तक
11. श्री भानुप्रताप शुक्ल 27 अक्टूबर, 1974 से 22 जून, 1975 तक
17 जुलाई, 1977 से 15 अप्रैल, 1984 तक
12. श्री प्रबाल मैत्र 22 अप्रैल, 1984 से 29 दिसम्बर, 1985 तक
13. श्री रामशंकर अग्निहोत्री 05 जनवरी, 1986 से 27 अगस्त, 1989 तक
14. श्री तरुण विजय 03 सितम्बर, 1989 से जून, 2008 तक
15. श्री बलदेव भाई शर्मा अगस्त, 2008 से
16.श्री हितेश शंकर वर्तमान@
Saturday, April 4, 2015
काव्य संग्रह का विमोचन
भोपाल। युवा लेखक एवं पत्रकार लोकेन्द्र सिंह के प्रथम काव्य संग्रह '' मै भारत हूँ '' के विमोचन कार्यक्रम में मंचासीन माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो बृज किशोर कुठियाला जी,वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव एवं दैनिक स्वदेश के प्रवन्ध संपादक श्री अक्षत शर्मा जी के साथ।
मेरे प्रेरणास्रोत: स्वामी विवेकानंद
डॉ. सौरभ मालवीय
अपनी बात
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- पुस्तक- भारतीय राजनीति के महानायक नरेन्द्र मोदी
- पुस्तक- राष्ट्रवाद और मीडिया
- पुस्तक- राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी
- पुस्तक- विकास के पथ पर भारत
- पुस्तक- श्रेष्ठ भारत आत्मबोध से राष्ट्रबोध
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भारतीय पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद, फिर इससे गुरेज क्यों? - *सौरभ मालवीय ने कहा अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्...
लोक दृष्टि
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लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ.सौरभ मालवीय जी से पिछले दिनों लखनऊ में भेंट हुई। इस मौके पर उन्होंने अपनी ...
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विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय कार्य समिति की बैठक निराला नगर, लखनऊ स्थित क्षेत्रीय कार्यालय में प्रारम्भ हुई। बैठक में क्षेत...
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डॉ. सौरभ मालवीय आज सम्पूर्ण विश्व विज्ञान की प्रगति और संचार माध्यमों के कारण ऐसे दौर में पहुंच चुका है कि मीडिया अपरिहार्य बन गई है...
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-डॉ. सौरभ मालवीय `माई कंट्री माइ लाइफ´ बस नाम ही काफी है लेखक के उदात्त चित्त को समझने के लिए। राष्ट्रीय संवेदना से इतना एकाकार कि ले...
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“हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, जीवन-मूल्यों, सह-अस्तित्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’...
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गाँधी व्यक्ति नहीं विचार हैं। महात्मा गांधी जी की जयंती के पावन अवसर पर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ में राष्ट्री...
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लखनऊ। विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित प्रदेश निरीक्षक एवं प्रदेश परीक्षा प्रमुख बैठक के समापन सत्र में क्षेत्रीय मंत्री डॉ. स...
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“भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका मूल दायित्व स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था ...
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वन्दे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आज ‘नमामि भारतम्’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर देशभर में एक साथ ‘वन्...
संप्रति
2/564, अवधपुरी खण्ड 2
खरगापुर, निकट प्राथमिक विद्यालय, गोमतीनगर विस्तार
पिन- 226010
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शहर, कुत्ते और हमारी ज़िम्मेदारी - “पॉटी उठाना शर्म नहीं, संस्कार है, शहर की सड़कों पर पॉटी नहीं, जिम्मेदारी चाहिए” भारत में पालतू कुत्तों की संख्या 2023 में लगभग 3.2 करोड़ आंकी गई, और यह ...1 year ago
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नमो-नमो.....आंखों ने जो देखा ! - अपन गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय को आदर्श राजनेता मानकर राजनीति में सक्रिय हैं। सादगी, शुचिता, विनम्रता, अध्ययनशीलता...ये सब गुण ऐसे हैं, जो ज्यादा आ...13 years ago

















































