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Tuesday, October 21, 2025

पंडित दीनदयाल उपाध्याय – व्यक्ति नहीं विचार दर्शन है

 


डॉ. सौरभ मालवीय
“भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।” ये शब्द पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हैं, जिन्हें जनसंघ के राष्ट्र जीवन दर्शन का निर्माता माना जाता है। वे मानते थे कि राजनीतिक जीवन दर्शन का पहला सूत्र संस्कृति निष्ठा है।
वास्तव में भारतीय ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास रखते हैं। यह हमारा मूल मंत्र है। इसके अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त है। इसी कारण भारत विश्व गुरु माना जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक राष्ट्रवादी चिंतक के रूप में जाने जाते हैं। एकात्म मानववाद के रूप में उन्होंने अपने विचारों की व्याख्या की तथा एक राष्ट्रवादी दर्शन के रूप में इसे स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने एकात्म मानववाद दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। वे न केवल वैचारिक चुनौतियों के प्रति सजग थे, परन्तु उन चुनौतियों का सामना राष्ट्रवाद के माध्यम से करने को दृष्ट संकल्प भी प्रतीत होते हैं। भारत जैसे विशाल एवं सर्वसाधन सम्पन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज से आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगतगुरु के पद पर प्रतिस्थापित हुआ, ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात् समर्थ और सशक्त भारत बनाने में उनके विचार प्रेरणास्पद हैं।
प्रसिद्ध विचारक और प्रख्यात पत्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन में से अनेक वर्षों तक ऒर्गेनाइजर, राष्ट्रधर्म, पांचजन्य में तत्कालीन राजनीतिक-आर्थिक घटनाक्रम पर गम्भीर विवेचनात्मक टिप्पणियां लिखते रहे। यद्यपि विषय तत्कालीन होता या, तो भी उस पर दीनदयाल जी की टिप्पणी सामयिक के साथ-साथ बहुधा दीर्घकालीन या स्थायी महत्व की भी होती थी।
भारत को एक नई शुरुआत करनी पड़ेगी, इस बात को मानते हुए लेख में वे स्पष्टता के साथ लिखते कि फिर से वापस नहीं लौटा जा सकता। अतः दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही होगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दासता के काल में आगामी विकृतियों को हम दूर करने का प्रयास न करें। वे लिखते हैं- अतः हमको सावधानी रखनी होगी कि हम अपने जर्जर शरीर को रोगमुक्त करके जब तक स्वस्थ होकर खड़े हों, तब तक बीच में ही कोई हमारे ऊपर हावी न हो जाएं। साथ ही संसार के अनेक देशों के साथ हमारे संबंध रहे हैं। हमें अनेक पुराने अप्राकृतिक संबंध तोड़ने पड़ेंगे, नवीन निर्माण करने होंगे।
अपने एकात्म मानववाद दर्शन के अंतर्गत उन्होंने राष्ट्र की चित्ति की अवधारणा को व्याख्यायित करने का निरंतर प्रयास किया। दीनदयाल जी चित्ति को राष्ट्र के अस्तित्व का मुख्य आधार मानते थे। उनका मानना था कि भारत को बलशाली और वैभवशाली तभी बनाया जा सकता है, जब भारत की चित्ति को समझा जा सके। चित्ति को बिना समझे राष्ट्र को समझना दुष्कर है तथा बिना राष्ट्र को समझे इसे बलशाली और वैभवशाली बनना असम्भव है। इस प्रश्न को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं-
हमारे राष्ट्र जीवन की चित्ति क्या है? हमारी आत्मा का क्या स्वरूप है? इस स्वरूप की व्याख्या करना कठिन है उसका तो साक्षात्कार ही संभव है, किंतु जिन महापुरूषों ने राष्ट्रात्मा का पूर्ण साक्षात्कार किया, जिनके जीवन में चित्ति का प्रकाश उज्ज्वलतम रहा है। उनके जीवन की ओर देखने से, उनके जीवन की क्रियाओं और घटनाओं का विश्लेषण करने से, हम अपनी चित्ति के स्वरूप की कुछ झलक पा सकते हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक चली आने वाली राष्ट्र पुरुषों की परंपरा के भीतर छिपे हुए सूत्र को यदि हम ढूंढें, तो संभवतया चित्ति के व्यक्त परिणाम की मीमांसा से उसके अव्यक्त कारण की भी हमको अनुभूति हो सके। जिन महान् विभूतियों के नाम स्मरण मात्र से हम अपने जीवन में दुर्बलता के क्षणों में शक्ति का अनुभव करते हैं, कायरता की कृति का स्थान वीर व्रत ले लेता है, उनके जीवन में कौन सी बात है, जो हममें इतना सामर्थ्य भर देती है? कौन सी चीज है जिसके लिए हम मर मिटने के लिए तैयार हो जाते हैं? हमारा मस्तक श्रद्धा से किसके सामने नत होता है और क्यों? वह कौन सा लक्ष्य है, जिसके चारों ओर हमारा राष्ट्र जीवन घूमता आया है? अपने राष्ट्र के किस तत्व को बचाने के लिए हमने बड़े-बड़े युद्ध किए? किसके लिए लाखों का बलिदान हुआ? उत्तर हो सकता है भारत की भूमि के लिए। किंतु भारत से तात्पर्य क्या जड़ भूमि से है? क्या हमने हिमालय के पत्थर और गंगा के जल की रक्षा की है? हमारे अवतारों ने किस हेतु जन्म लिया था? उनको हम भगवान् का अवतार क्यों कहते हैं? इस लेख में इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढते हुए वे अनेक वैचारिक प्रश्नों का साक्षात्कार पाठकों को कराते हैं।
हमारा धर्म हमारे राष्ट्र की आत्मा है। बिना धर्म के राष्ट्र जीवन का कोई अर्थ नहीं रहता। भारतीय राष्ट्र न तो हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हुए भू-खंड से बन सकता है और न तीस करोड़ मनुष्यों के झुंड से। एक ऐसा सूत्र चाहिए, जो तीस करोड़ को एक-दूसरे से बांध सके, जो तीस कोटि को इस भूमि में बांध सके। वह सूत्र हमारा धर्म ही है। बिना धर्म के भारतीय जीवन का चैतन्य ही नष्ट हो जाएगा, उसकी प्रेरक शक्ति ही जाती रहेगी। अपनी धार्मिक विशेषता के कारण ही संसार के भिन्न-भिन्न जन समूहों में हम भी राष्ट्र के नाते खड़े हो सकते हैं। धर्म के पैमाने से ही हमने सबको नापा है। धर्म की कसौटी पर ही कसकर हमने खरे-खोटे की जांच की है। हमने किसी को महापुरुष मानकर पूजा है तो इसलिए कि उनके जीवन में पग-पग हमको धार्मिकता दृष्टिगोचर होती है। राम हमारे आराध्य देव बनकर रहे हैं और रावण सदा से घृणा का पात्र बना है। क्यों? राम धर्म के रक्षक थे और रावण धर्म का विनाश करना चाहता था। युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों भाई-भाई थे, दोनों राज्य चाहते थे, एक के प्रति हमारे मन में श्रद्धा है, तो दूसरे के प्रति घृणा।
दीनदयालजी राष्ट्र के समक्ष उपस्थित विभिन्न वैचारिक चुनौतियों के अंतर्गत द्विसंस्कृतिवाद तथा बहुसंस्कृतिवाद भी मानते हैं अपने लेख में वे भारत को एक संस्कृति वाला राष्ट्र मानते हैं। अपने लेख ‘राष्ट्रजीवन की समस्याएं’ राष्ट्रधर्म में लिखते हैं-
भारत में एक ही संस्कृति रह सकती है। एक से अधिक संस्कृतियों का नारा देश के टुकड़े-टुकड़े करके हमारे जीवन का विनाश कर देगा। अतः आज लीग का द्विसंस्कृतिवाद, कांग्रेस का प्रच्छन्न द्विसंस्कृतिवाद तथा साम्यवादियों का बहुसंस्कृतिवाद नहीं चल सकता। आज तक एक-संस्कृतिवाद को संप्रदायवाद कहकर ठुकराया गया, किंतु अब कांग्रेस के विद्वान भी अपनी गलती समझकर इस एक-संस्कृतिवाद को अपना रहे हैं। इसी भावना और विचार से भारत की एकता तथा अखंडता बनी रह सकती है तथा तभी हम अपनी संपूर्ण समस्याओं को सुलझा सकते हैं।
उनके अनुसार भारत में चार प्रधान वर्ग दिखाई पड़ते हैं, जिसकी व्याख्या उन्होंने निम्नवत् की है-
अर्थवादी पहला वर्ग, अर्थवादी संपत्ति को ही सर्वस्व समझता है तथा उसके स्वामित्व एवं वितरण में ही सब प्रकार की दुरवस्था की जड़ मानकर उसमें सुधार करना ही अपना एकमेव कर्तव्य समझता है। उसका एकमेव लक्ष्य ‘अर्थ’ है। साम्यवादी एवं समाजवादी इस वर्ग के लोग हैं। इनके अनुसार भारत की राजनीति का निर्धारण अर्थनीति के आधार पर होना चाहिए तथा संस्कृति एवं मत को वे गौण समझकर अधिक महत्व देने को तैयार नहीं हैं।
राजनीतिवादी दूसरा वर्ग है। यह जीवन का संपूर्ण महत्व राजनीतिक प्रमुख प्राप्त करने में ही समझता है तथा राजनीतिक दृष्टि से ही संस्कृति, मजहब तथा अर्थनीति की व्याख्या करता है। अर्थवादी यदि एकदम उद्योगों का राष्ट्रीयकरण अथवा बिना मुआविजा दिए जमींदारी उन्मूलन चाहता है, तो राजनीतिवादी अपने राजनीतिक कारणों से ऐसा करने में असमर्थ है। उसके लिए इस प्रकार संस्कृति एवं मजहब का भी मूल्य अपनी राजनीति के लिए ही है, अन्यथा नहीं। इस वर्ग के अधिकांश लोग कांग्रेस में हैं, जो आज भारत की राजनीतिक बागडोर संभाले हुए हैं।
मतवादी तीसरा वर्ग, मजहब परस्त या मतवादी है। इसे धर्मनिष्ठ कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि धर्म मजहब या मत से बड़ा तथा विशाल है। यह वर्ग अपने-अपने मजहब के सिद्धांतों के अनुसार ही देश की राजनीति अथवा अर्थनीति को चलाना चाहता है। इस प्रकार का वर्ग मुल्ला-मौलवियों अथवा रूढ़िवादी कट्टरपंथियों के रूप में अब भी थोड़ा बहुत विद्यमान है, यद्यपि आजकल उसका बहुत प्रभाव नहीं रह गया है।
संस्कृतिवादी चौथा वर्ग है। इसका विश्वास है कि भारत की आत्मा का स्वरूप प्रमुखतया संस्कृति ही है। अतः अपनी संस्कृति की रक्षा एवं विकास ही हमारा कर्तव्य होना चाहिए। यदि हमारा सांस्कृतिक ह्रास हो गया तथा हमने पश्चिम के अर्थ प्रधान अथवा भोग प्रधान जीवन को अपना लिया, तो हम निश्चित ही समाप्त हो जाएंगे। यह वर्ग भारत में बहुत बड़ा है। इसके लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तथा कुछ अंशों में कांग्रेस में भी हैं। कांग्रेस के ऐसे लोग राजनीति को केवल संस्कृति का पोषक मात्र ही मानते हैं, संस्कृति का निर्णायक नहीं। हिंदीवादी सब लोग इसी वर्ग के हैं।
जहां संस्कृतिवाद के दृष्टिकोण को सार्थक मानते हैं, वहीं इसके विभिन्न स्वरूपों एवं समस्याओं के प्रति भी सचेत हैं। संस्कृति का स्वरूप कैसा हो इसमें कौन सा तत्व हो आदि विषयों पर हो रहे विवाद को भी वे एक समस्या ही मानते हैं, वे कहते हैं-
आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है। वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्व मानना तथा दूसरे यदि इसे मान लें, तो उस संस्कृति का रूप कौन सा हो? विचार के लिए यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किंतु वास्तव में है एक ही। क्योंकि एक बार संस्कृति का जीवन को प्रमुख एवं आवश्यक तत्व मान लेने पर उसके स्वरूप के संबंध में झगड़ा नहीं रहता, न उसके संबंध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है। यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है, जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढकने का प्रयत्न किया जाता है।
अंततः वे एक संस्कृतिवाद को ही उत्तम मार्ग मानते हैं तथा राष्ट्र के लिए आवश्यक तत्व बताते हैं वे लिखते हैं-
केवल एक-संस्कृतिवादी लोग ही ऐसे हैं, जिनके समक्ष और कोई ध्येय नहीं है तथा जैसा कि हमने देखा, संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातंत्र तथा राजनीतिक पूंजीवादी का निर्माण करना चाहते हैं। अतः उनमें सब प्रकार की संभावना होते हुए भी इस बात की संभावना कम नहीं है कि उनके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाए। अतः आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाए। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा भारत-विभाजन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे।
15 अगस्त, 1947 को हमने एक मोर्चा जीत लिया। हमारे देश से अंग्रेजी राज्य विदा हो गया। उस राज्य के कारण हमारी प्रतिभा के विकास में जो बाधाएं उपस्थित की जा रही थीं, उनका कारण हट गया, हम अपना विकास करने के लिए स्वतंत्र हो गए। अपनी आत्मानुभूति का मार्ग खुल गया। किंतु अभी भी मानव की प्रगति में हमको सहायता करनी है। मानव द्वारा छेड़े गए युद्ध में जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग हमने अब तक किया है, जिनके चलाने में हम निपुण हैं तथा जिन पर पिछली सहस्राब्दियों में जंग लग गई थी, उन्हें पुनः तीक्ष्ण करना है तथा अपने युद्ध कौशल का परिचय देकर मानव को विजय बनाना है। आज यदि हमारे मन में उन पद्धतियों के विषय में ही मोह पैदा हो जाए, जिनके पुरस्कर्ताओं से हम अब तक लड़ते रहे हैं, तो यही कहना होगा कि हम न तो स्वतंत्रता का सच्चा स्वरूप समझ पाए हैं और न अपने जीवन के ध्येय को ही पहचान पाए हैं। हमारी आत्मा ने अंग्रेजी राज्य के प्रति विद्रोह केवल इसलिए नहीं किया कि दिल्ली में बैठकर राज्य करने वाला एक अंग्रेज था, अपितु इसलिए भी कि हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारे जीवन की गति में विदेशी पद्धतियां, रीति-रिवाज विदेशी दृष्टिकोण और आदर्श अडंगा लगा रहे थे, हमारे संपूर्ण वातावरण को दूषित कर रहे थे, हमारे लिए सांस लेना भी दूभर हो गया था। आज यदि दिल्ली का शासनकर्ता अंग्रेज के स्थान पर हममें से ही एक, हमारे ही रक्त और मांस का एक अंश हो गया है, तो हमको इसका हर्ष है, संतोष है किंतु हम चाहते हैं कि उनकी भावनाएं और कामनाएं भी हमारी भावनाएं और कामनाएं हों। जिस देश की मिट्टी से उसका शरीर बना है, उसके प्रत्येक रंजकण का इतिहास उसके शरीर के कण-कण से प्रति ध्वनित होना चाहिए तीस कोटि के हृदयों को समष्टिगत भावनाओं से उसका हृदय उद्वेलित होना चाहिए तथा उनके जीवन के विकास के अनुकूल, उनकी प्रकृति और स्वभाव अनुसार तथा उनकी भावनाओं और कामनाओं के अनुरूप पद्धतियों की सृष्टि उसके द्वारा होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो हमको कहना होगा कि अभी भी स्वतंत्रता की लड़ाई बाकी है। अभी हम अपनी आत्मानुभूति में आनेवाली बाधाओं को दूर नहीं कर पाए हैं।
आर्थिक स्वाधीनता के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता है। आत्मानुभूति के प्रयत्नों में जिन सामाजिक व्यवस्थाओं एवं पद्धतियों की राष्ट्र अपनी सहायता के लिए सृष्टि करता है अथवा जिन रीति-रिवाजों में उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति होती है, वे ही यदि कालावपात से उसके मार्ग में बाधक होकर उसके ऊपर भार रूप हो जाएं तो उनसे मुक्ति पाना भी प्रत्येक राष्ट्र के लिए आवश्यक है। यात्रा की एक मंजिल में जो साधन उपयोगी सिद्ध हुए हैं वे दूसरी मंजिल में भी उपयोगी सिद्ध होंगे यह आवश्यक नहीं। साधन तो प्रत्येक मंजिल के अनुरूप ही चाहिए तथा इस प्रकार प्रयाण करते हुए प्राचीन साधनों का मोह परतंत्रता का ही कारण हो सकता है, क्योंकि स्वतंत्रता केवल उन तंत्रों का समष्टिगत नाम है जो स्वानुभूति में सहायक होते हैं।
राष्ट्र की सांस्कृतिक स्वतंत्रता तो अत्यंत महत्व की है, क्योंकि संस्कृति ही राष्ट्र के संपूर्ण शरीर में प्राणों के समान संचार करती है। प्रकृति के तत्वों पर विलय पाने के प्रयत्न में तथा मानवानुभूति की कल्पना में मानव जिस जीवन दृष्टि की रचना करता है वह उसकी संस्कृति है। संस्कृति कभी गतिहीन नहीं होती अपितु वह निरंतर गतिशील फिर भी उसका अपना एक अस्तित्व है। नदी के प्रवाह की भांति निरंतर गतिशील होते हुए भी वह अपनी निजी विशेषताएं रखती हैं, जो उस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को उत्पन्न करने वाले समाज के संस्कारों में तथा उस सांस्कृतिक भावना से जन्य राष्ट्र के साहित्य, कलाए दर्शन, स्मृति शास्त्र, समाज रचना इतिहास एवं सभ्यता के विभिन्न अंग अंगों में व्यक्त होती हैं। परतंत्रता के काल में इन सब पर प्रभाव पड़ जाता है तथा स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। आज स्वतंत्र होने पर आवश्यक है कि हमारे प्रवाह की संपूर्ण बाधाएं दूर हों तथा हम अपनी प्रतिभा अनुरूप राष्ट्र के संपूर्ण क्षेत्रों में विकास कर सकें। राष्ट्र भक्ति की भावना को निर्माण करने और उसको साकार स्वरूप देने का श्रेय भी राष्ट्र की संस्कृति को ही है तथा वही राष्ट्र की संकुचित सीमाओं को तोड़कर मानव की एकात्मता का अनुभव कराती है। अतः संस्कृति की स्वतंत्रता परमावश्यक है। बिना उसके राष्ट्र की स्वतंत्रता निरर्थक ही नहीं, टिकाऊ भी नहीं रह सकेगी।
(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष है।)

Tuesday, September 30, 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र


डॉ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र, किसी भूभाग पर रहने वालो का भू भाग, भूसंस्कृति, उसभूमि का प्राकृतिक वैभव, उस भूमि पर रहने वालो के बीच श्रद्धा और प्रेम, उनकी समान परस्परा, समान सुख­दुख, किन्ही अर्थों में भाषिक एकरूपता, दैशिक स्तरपर समान शत्रु मित्र आदि अनेक भावों का समेकित रूप होता है। यह भाव बाहर से सम्प्रेषित नहीं किया जाता अपितु जन्मजात होता है।
भारत में यह बोध अनादिकाल से है। अभी वैज्ञानिक युग में भी यह तय नहीं हो पा रहा है कि वेदो की रचना कब हुई और वेदो में राष्ट्रवाद अपने उत्कर्ष पर है। इसी संकल्पना के कारण वैदिक ऋषियों ने घोषणा की है कि
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् हम लोगों के मन्त्र (कार्यसूत्र का सिद्धन्त ) एक जैसे हो। उस मन्त्र के अनुरूप हमलोगो की समिति (संगठन), हमारे चित्त, हमारी मानसिक दशा और कार्यप्रणाली भी समान हो। हमलोग समेकित रूप से लक्ष्य प्राप्ति हेतु परमात्मा से एक समान प्रार्थना करें।
इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आगे कहा कि­
समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
हमारे लक्ष्य, हमारे हृदय के भाव और हमारे चिन्तन भी समान हो और हमलोग आपस में संगठित रहे।
संगच्छध्वं संवध्वं सं वो मनांसि जनताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।
अर्थात हमलोग साथ साथ चले, एक साथ बोले, हमारे मनोभाव समान रहें। हमलोग समानरूप से अपने लक्ष्य सिद्धि हेतु देवाताओं की साधना करें।
ऋषियों ने यह उद्घोष श्रुतियों में शताधिक बार किया है। हर बार वे हमे संगठित और सुव्यवस्थित रहकर अपने लक्ष्य के लिये समर्पित होने का आदेश दे रहे है। ऐसा राष्ट्रगीत धरती के किसी समाज में कभी नहीं पैदा हुआ है। पूरा का पूरा वैदिक वाङ्मय ही भारत का राष्ट्रगान है।
ओउम् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ओउम् शान्तिः शान्ति: शान्ति।।
हम दोनों की परमात्मा साथ साथ रक्षा करें, हमदोनो साथ साथ लक्ष्य भोग करें, साथ साथ पराक्रम करें, हम दोनों के द्वारा पढी गयी विद्या तेजस्वी हो और हम कभी आपस में द्वेष न करें। हमारे त्रितापों (दैविक, दैहिक, भौतिक) का शमन हो।
यहाँ ऋषि हम दोनो का अर्थ केवल दो से ही नहीं कह रहे है अपितु गुरू शिष्य से है। यह एक परम्परा की वार्ता है। जो सगम्र गुरूओं व्दारा समग्र शिष्यों को अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप से दी गयी शिक्षा है जिससे भारत की राष्ट्रियता सिञ्चित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होती रही है।
भारत का यह अक्षुण्ण राष्ट्र भारत के चप्पे चप्पे में सदैव दृष्टिगोचर होता रहता है। देश मे दुर्भाग्य से देश में पराधीनता का काल आ गया। 1235 वर्षो तक के प्रदीर्घ पराधीन काल में, हिमालय, गंगा, काशी, प्रयाग, कुंभमेला, अनेकतीर्थ, अनन्तऋषि, महात्मा, महापुरूष, समुद्र, सरिता पेड, पौधे आदि भारत के राष्ट्रिय गीत तो अहर्निश गाते ही रहते है, पर उनकी मानवीय अभिव्यक्ति सुप्त पड़ गयी थी। इस कोढ में खाज जैसी स्थिती मैकाले की शिक्षा पद्धति ने पूरी कर दी। हमें बताया गया कि वेद गडरियो के गीत हैं, भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा। यहाँ मे मूल निवासी तो कोल भील द्रविड आदि रहे है, आर्य मध्यएशिया से आकर उनपर आक्रमण करके देशपर कब्जा कर लिया, भारत गर्म देश है, सपेरों और नटों का बाहुल्य रहा है, यह एक देश ही नहीं रहा है बल्कि उपमहाद्विप है, मुस्लिम आक्रान्ताओं ने भारत को कपडा, भोजन, और अन्य तहजीब सिखाया, अब ईसाई आक्रान्ता भारतीयों के पाप का बोझ उतारने के लिये भगवान के आदेश पर भारत आये हैं। यह भारत का सौभाग्य है कि प्रभु ईसा मसीह भारत पर प्रसन्न हो गये है अब भारत इन ईसाइयों की कृपासे सुशिक्षित और सभ्य हो जायेगा, शैतानी परम्पराओं और झूठे देवताओं से मुक्त होकर असली देवताओं की कृपा पा जायेगा। इस प्रकार के सुझावो को जब सत्ता सहयोग मिल जाता है तो करैला नीम चढ जाता है। और इस स्थिति ने हमें इतना आत्मविस्मृत कर दिया कि हम मूढता की सीमा तक विक्षिप्त हो गये। वैदिक ऋषियों की गरिमावान पंरम्परा को अपना कहने में लज्जानुभव होने लगा। यत्किञ्चित इसका प्रभाव अभी भी अवशेष है। हम जान ही लिय थे कि हम जादू टोने वालों के वंशज हैं। अपनी किसी भी बात की साक्षी के लिये विदेशी प्रमाण खोजने लगे। यदि गौराड्ग शासको ने मान्यता दी तो हमार सीना फूल गया वरना एक अघोषित आत्मग्लानि से हम छूट भी नहीं पाते थे। और तो और हम धर्म की परिभाषा भी ह्विटने, स्पेंसर, थोरो, नीत्से, फिक्टे आदि की डायरियों से खोजना चालू कर दिये। वेदो के भाष्य के सन्दर्भ में मेक्समूलकर, ए.बी. कीथ अदि भगवान वेदव्यास पर भी भारी पडने लगे। आत्मदीनता की इस पराकाष्ठा में महानायक स्वामी विवेकानंन्द ने अमृत तत्व भरा और बडे शान से घोषित किया कि हमे हिंन्दू होने पर गर्व है। इसी घोषणा के बाद हमारी तन्द्रा टूटने लगी। बडे सौभाग्य की बात है कि इस वर्ष उसी महानायक की डेढ सौवी वर्ष गांठ है।
संघ के प्रथमपुरूष जन्मजात क्रान्तदर्शी थे। भारत पराधीनदासता से छूटे यह प्रथम प्रयास था पर उस स्वतन्त्रता के बाद का भारत कैसा हो इसका ब्लू प्रिण्ट समग्र भारत में केवल और केवल डा. केशव बलिराम हेडगेवार नें ही तैयार किया था। वे स्वामी विवेकानंन्द के राष्ट्रियत्व जागरण से अपने अभियान की ऊर्जा ले रहे थे। या यूँ कहे कि स्वामी जी के संकल्पना के 100 तरुण डा. हेडगेवार जी ने तैयार किया और भारत की आत्मा को बचा लिया वरना भारतीय संस्कृति भी बेबीलोन, मिस्र, एजटेक, इन्का, यूफ्रेटस और यूनान आदि की सभ्यताओं जैसे बडे-बडे पुस्तकालयों में भी नही मिलती। प्रो. अर्नाल्ड टायनवी जैसा विद्वान भी भारतीय संस्कृति नहीं खोज पाता।
डा. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि भारतीय मानस की आत्म विस्मृति केवल राष्ट्रवाद के मन्त्र से ही टूटेगी। इसके लिये स्वामी जी का सौद्धान्तिक राजपथ तो उन्होने चुन ही लिया था पर साक्षात् दर्शन हेतु योगी अरविन्द घोष का राष्ट्रिय आह्वान उन्हे सशरीर गुरुतुल्य लगा। श्री अरविन्द घोष के संगठन “अनुशीलन समिति” से जुडकर वे सिद्धान्त और क्रिया दोनो का अभूतपूर्व प्रयोग किये। सन 1915 से 1925 तक के कालखण्ड में वे केवल और केवल राष्ट्रवाद का ही चिन्तन, मनन और प्रयोग करते रहे। योगी अरविन्द अलीपुर जेल से बाहर आने पर कहे थे कि- “ भारत जब भी जागा है तो केवल अपने लिये नहीं अपितु सनातन धर्म के लिये जागा है। जब भी यह कहा जाता है कि भारत महान है तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म महान है। सनातन धर्म का प्रसार ही भारत का प्रसार है। भारत धर्म है और धर्म ही भारत है।
राष्ट्रियता केवल राजनीति नहीं है अपितु यह एक विश्र्वास है, एक आस्था है, एक धर्म है। मैं इतना ही नहीं कह रहा हूँ अपितु यह भी कि सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रियता है। इस हिंदू राष्ट्रकी उत्पत्ति ही सनातान धर्म के साथ हुई है। सनातन धर्म के साथ ही यह राष्ट्र आंदोलित होता है और उसी के साथ बढता है। सनातन धर्म कभी नष्ट होगा तो उसके साथ ही हिन्दू राष्ट्र भी नष्ट हो जायेगा। सनातन धर्म अर्थात् हिन्दू राष्ट्र……….।”
संघ संस्थापक डा. हेडगेवार इन विचारो से इतना प्रभावित हुए कि उन्होने स्वामी विवेकानन्द के समान सगर्व घोषित किया कि
“हो ओउम्। हे भारत हिन्दू राष्ट्र आहे ”
और उपर्युक्त मन्त्र राष्ट्रिय स्वंयसेवक संघ का पथ प्रदर्शक मन्त्र बन गया। इसके उच्चारण मात्र से एक ही साथ स्वामी विवेकानन्द और योगी अरविन्द दोनो ऋषियों की आत्माएं तृप्त होती है, अनादि काल से चला आरहा सत्य सनातन धर्म परिपुष्ट होता है, अनादिकाल से चला आर हा सत्य, विज्ञान, धर्म, संस्कार सब मजबूत होते है, भारतीय जनमें आत्मविश्वास पैदा होता है, भारत माता गर्वोन्नत होती है और प्रसन्न भाव से अपने पुत्रों को लाख­लाख आशीषें देती है। यह भारत माता की स्तुति का बीज मन्त्र है। इससे सम्पुटित कर काई भी पूजन अर्चन लोक परलोक दोनो में अभ्युदय ओर निःश्रेयस का कारण होता है।
यह कोई योगायोग की बात नही है। नियति के चक्र में सब कुछ नियत है। सड्घ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी श्री अखण्डनन्दजी के दीक्षित शिष्य थे। निश्चित ही स्वामी विवेकान्द अपने सिद्धान्तों को साकाररूप देखने हेतु श्री गुरूजी को शिष्य बनन के लिये प्रेरित किये हांेगे।
संघ की राष्ट्रभक्ति का ज्वलन्त उदाहरण पग पग पर दष्टिगोचर होत है।
शाखा की नित्य प्रार्थना की प्रत्येक पंक्ति इसकी दुन्दुभी बजा रही है। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे से लेकर परं वैभवंनेतु मेतत्स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वा शिषा ते मृशम् तक और अन्ततः भारत माता की जय में भी केवल राष्ट्रवाद ही तो भासित हो रहा है। कोई पंक्ति ऐसी नही है जिंसमे राष्ट्रवाद का साक्षात्कार न हो। इससे बडा राष्ट्रगीत क्या हो सकता है।
एकात्मता स्त्रोत्र, एकात्मता मन्त्र, प्रातःस्मरण, संघ की शाखओं के गीत, बौद्धिक, और शाखा की पूरी संचरना विशुद्ध राष्ट्रवादी प्रयोग है जिससे स्वामी विवेकानन्द की आकांक्षाओ के राष्ट्रिय पुरूषों की अखण्ड मालिका पैदा होती रहे। संघ ने समग्र सांस्कृतिक भारत की वन्दना के गीत गाये है जो किसी भी दृष्टिकोण से भगवान परशुराम, जगद्गुरू शड्कराचार्य और आचार्य चाणक्य के राष्ट्रिय अभियान को ही पुष्ट करते हैं। संघ के कारण सबने जाना कि भारत का परिमाप “हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्” तक है। छुआछूत, भाषा, क्षेत्र, जाति और ऊँच नीच के भाव तो संघ को समाप्त करने की जरूरत ही नहीं पडी। भारत गान की पवित्र गंगा मे स्नान करते ही उपर्युक्त समास्त विकार अनायास भाग गये। बए एक ही मन्त्र गूंज उठा कि
रत्नाकराद्यौत पदां हिमालयं किरीटिनीम्
ब्रम्हराजर्षि रत्नाद्रयां वन्दे भारत मातरम्।।
यही तो राष्ट्रर्षि वंकिम बाबू का राष्ट्रवाद है। श्री गुरूजी ने तो इससे भी आगे बढ़कर शुक्ल यजुर्वेद मे मन्त्र मे एक नव प्राण भर दिया कि
“राष्ट्राय स्वाहा। राष्ट्रायमिदं न मम।।
यही भारत का सनातन राष्ट्रवाद है जो हिन्दुत्व की जड़ है।
भाषागत समानता राष्ट्रवाद के लिये आति महत्वपूर्ण तत्व नही है। इसी से संघ देश की सारी आंचलिक भाषाओं के पिष्टपोषण की बात कहते हुए संस्कृत को केन्द्र में रखता है क्योकि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है।
अमेरिका मे अंग्रजी भाषी लोग ब्रिटिश सत्ता से अलग होकर (1774 अड) में फ्रेच और स्पेनिशों के साथ मिलकर स्वतन्त्र अमेरिकन राष्ट्र गठित कर लिये।
भाषा ही राष्ट्र हेतु मुख्य तत्व होता तो स्वीटजरलॅण्ड चार देशों मे टूट गया होता। वहां चार भाषाएं जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन और रोमन चलती है पर एक ही राष्ट्र है। बेल्जियम के फ्रेंची अपने को बेल्जियमी कहते है फ्रेंच नहीं। भाषाई दृष्टि से स्पेनिश और पोर्तगीज एकदम निकट हैं पर दो राष्ट्र है।
समानपूजा पद्धति भी राष्ट्र का आधार होती तो विश्व मे 63 मुस्लिम देश एक राष्ट्र बन जाते। संसार मे शाताधिक इसाई देश एक राष्ट्र बन जाते। पर और तो और अरब के यहूदी और मुस्लिम ही एक राष्ट्र न बन सके। ईरान­ईराक, लीबिया, मिश्र, सूडान, यमन आदि तेा इसके जीवन्त उदाहरण है।
रक्तगट भी राष्ट्रका आवश्यक तत्व न होने से स्कैन्डिनेविया और आइबेरिया भी अनेक राष्ट्रों मे विभक्त हैं।
राष्ट्र हेतु सर्वाधिक आवश्यक तत्व राष्ट्रजन के हृदय की एकता है। संघ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात पर खर्च कर रहा है कि
“भारतवासी एक हृदय हैं”
संघ का भारत राष्ट्र वृहत्तर है। इसमे वे सब देश समाहित है जो किन्ही राजनीतिक करणों से अलग हो गये। परन्तु उनकी राष्ट्रिय पहचान तो भारत ही है।
पाकिस्तान के “जिये सिन्ध” के नेता श्री जी.एम.सईद कहते है कि -पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ है भारत के भूगोल और इतिहास को नकारना। पाकिस्तान को अब एक संघ राज्य बनकर विशाल भारत में सम्मिलित हो जाना चाहिए। मुहाजिरों को कृष्ण तथा कबीर का अनुयायी होना चाहिए। पंजाबी मुसलामान तो नानक, वारिस शाह तथा बुल्ले शाह के वारिस हैं। मै स्वयम 50 वर्षोसे पाकिस्तानी हुँ, 500 वर्षो से मुसलमान हूं लेकिन 5000 वर्षो से सिन्धी हूँ। मुहम्मद बिन कासिम तो लुटेरा था। सिन्ध स्वातंत्र्य के बाद वहां का बन्दरगाह राजा दाहर सेन के नाम पर हो गया।
इण्डियन एक्सप्रेस 02.02.1992
यह राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की ही सोच थी कि पण्डित श्री दीनदयाल उपाध्याय ने भारत­पाक और बंगला देश मे महासंघ बनाने की बात कही थी । बाद में प्रख्यात समाजवादी डा. राममनोहर लोहिया भी उपाध्याय जी के साथ जुड गये।
संघ के वरिष्ठतम प्रचारक श्री दत्तोपन्त ठेगडी ने तो गहन शोध मे उपरान्त यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र की और नेशन की अवधारणा अलग अलग बाते है। “राष्ट्र नेशन एक नहीं है। योगी अरविन्दने भी संयुक्त राष्ट्र संघ मे नामकरण का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि जबकत राष्ट्र की परिभाषा तय न हो तबतक यह नाम रखना ठिक नही होगा। सच में राष्ट्र के समग्र अर्थो में सांगोपांगरूपेण कोई देश इस धरा पर है तोवह केवल भारत है। भारत में ही राष्ट्र की परिभाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक रूपेण तृप्त होती है। अन्य किसी देश में नही। राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ मौन तपस्वी के रूप में अहर्निश भारतवासियो में राष्ट्र तत्व भरने का कार्य कर रहा है। संघ के ही कारण राष्ट्र शब्द की गरिमा और महिमा जानने का योग बना है वरना इतना महत्वपूर्ण शब्द केवल वैदिक वाडम्य का कैदी बनकर रह जया होता।
“संघे शक्ति सर्वदा”
“भारत मातरम् विजयते तराम्”

Thursday, April 17, 2025

स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका


डॉ. सौरभ मालवीय
संघ संस्‍थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्‍मजात देशभक्‍त और प्रथम श्रेणी के क्रांतिकारी थे। वे युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्‍लवी संगठनों में डॉ. पाण्‍डुरंग खानखोजे, श्री अरविन्‍द, वारीन्‍द्र घोष, त्रैलौक्‍यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे। रासबिहारी बोस और शचीन्‍द्र सान्‍याल द्वारा प्रथम विश्‍वयुद्ध के समय 1915 में सम्‍पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्‍यभारत के प्रमुख थे। उस समय स्‍वतंत्रता आंदोलन का मंच कांग्रेस थी। उसमें भी उन्‍होंने प्रमुख भूमिका निभाई। 1921 और 1930 के सत्‍याग्रहों में भाग लेकर कारावास का दण्‍ड पाया।
1925 की विजयादशमी पर संघ स्‍थापना करते समय डॉ. हेडगेवार जी का उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता ही था। संघ के स्‍वयंसेवकों को जो प्रतिज्ञा दिलाई जाती थी उसमें राष्‍ट्र की स्‍वतंत्रता प्राप्ति के लिए तन-मन-धन पूर्वक आजन्‍म और प्रामाणिकता से प्रयत्‍नरत रहने का संकल्‍प होता था। संघ स्‍थापना के तुरन्‍त बाद से ही स्‍वयंसेवक स्‍वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने लगे थे।
क्रान्तिकारी स्‍वयंसेवक
संघ का वातावरण देशभक्तिपूर्ण था। 1926-27 में जब संघ नागपुर और आसपास तक ही पहुंचा था उसी काल में प्रसिद्ध क्रान्तिकारी राजगुरू नागपुर की भोंसले वेदशाला में पढते समय स्‍वयंसेवक बने। इसी समय भगतसिंह ने भी नागपुर में डॉक्‍टर जी से भेंट की थी। दिसम्‍बर 1928 में ये क्रान्तिकारी पुलिस उपकप्‍तान सांडर्स का वध करके लाला लाजपत राय की हत्‍या का बदला लेकर लाहौर से सुरक्षित आ गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरू को उमरेड में भैया जी दाणी (जो बाद में संघ के अ.भा. सरकार्यवाह रहे) के फार्म हाउस पर छिपने की व्‍यवस्‍था की थी।
1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे देश में उसका बहिष्‍कार हुआ। नागपुर में हडताल और प्रदर्शन करने में संघ के स्‍वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में थे।
महापुरूषों का समर्थन
1928 में विजयादशमी उत्‍सव पर भारत की असेम्‍बली के प्रथम अध्‍यक्ष और सरदार पटेल के बडे भाई श्री विट्ठल भाई पटेल उपस्थित थे। अगले वर्ष 1929 में महामना मदनमोहन मालवीय जी ने उत्‍सव में उपस्थित हो संघ को अपना आशीर्वाद दिया। स्‍वतंत्रता संग्राम की अनेक प्रमुख विभूतियां संघ के साथ स्‍नेह संबंध रखती थीं।
शाखाओं पर स्‍वतंत्रता दिवस
31 दिसम्‍बर, 1929 को लाहौर में कांग्रेस ने प्रथम बार पूर्ण स्‍वाधीनता को लक्ष्‍य घोषित किया और 16 जनवरी, 1930 को देश भर में स्‍वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्‍चय किया गया।
डॉ. हेडगेवार ने दस वर्ष पूर्व 1920 के नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्‍वतंत्रता संबंधी प्रस्‍ताव रखा था, पर तब वह पारित नहीं हो सका था। 1930 में कांग्रेस द्वारा यह लक्ष्‍य स्‍वीकार करने पर आनन्दित हुए हेडगेवार जी ने संघ की सभी शाखाओं को परिपत्र भेजकर रविवार 26 जनवरी, 1930 को सायं 6 बजे राष्‍ट्रध्‍वज वन्‍दन करने और स्‍वतंत्रता की कल्‍पना और आवश्‍यकता विषय पर व्‍याख्‍यान की सूचना करवाई। इस आदेश के अनुसार संघ की सब शाखाओं पर स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया।
सत्‍याग्रह
6 अप्रैल, 1930 को दांडी में समुद्रतट पर गांधी जी ने नमक कानून तोडा और लगभग 8 वर्ष बाद कांग्रेस ने दूसरा जनान्‍दोलन प्रारम्‍भ किया। संघ का कार्य अभी मध्‍यभारत प्रान्‍त में ही प्रभावी हो पाया था। यहां नमक कानून के स्‍थान पर जंगल कानून तोडकर सत्‍याग्रह करने का निश्‍चय हुआ। डॉ. हेडगेवार संघ के सरसंघचालक का दायित्‍व डॉ. परांजपे को सौंप स्‍वयं अनेक स्‍वयंसेवकों के साथ सत्‍याग्रह करने गए।
जुलाई 1930 में सत्‍याग्रह हेतु यवतमाल जाते समय पुसद नामक स्‍थान पर आयोजित जनसभा में डॉ. हेडगेवार के सम्‍बोधन में स्‍वतंत्रता संग्राम में संघ का दृष्टिकोण स्‍पष्‍ट होता है। उन्‍होंने कहा- ‘स्‍वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के बूट की पालिश करने से लेकर, उनके बूट को पैर से निकाल कर उससे उनके ही सिर को लहुलुहान करने तक के सब मार्ग मेरे स्‍वतंत्रता प्राप्ति के साधन हो सकते हैं। मैं तो इतना ही जानता हूं कि देश को स्‍वतंत्र कराना है।‘’
डॉ. हेडगेवार के साथ गए सत्‍याग्रही जत्‍थे मे आप्‍पा जी जोशी (बाद में सरकार्यवाह) दादाराव परमार्थ (बाद में मद्रास में प्रथम प्रान्‍त प्रचारक) आदि 12 स्‍वयंसेवक थे। उनको 9 मास का सश्रम कारावास दिया गया। उसके बाद अ.भा. शारीरिक शिक्षण प्रमुख (सर सेनापति) श्री मार्तण्‍ड राव जोग, नागपुर के जिलासंघचालक श्री अप्‍पाजी हळदे आदि अनेक कार्यकर्ताओं और शाखाओं के स्‍वयंसेवकों के जत्‍थों ने भी सत्‍याग्रहियों की सुरक्षा के लिए 100 स्‍वयंसेवकों की टोली बनाई जिसके सदस्‍य सत्‍याग्रह के समय उपस्थित रहते थे।
8 अगस्‍त को गढवाल दिवस पर धारा 144 तोडकर जुलूस निकालने पर पुलिस की मार से अनेक स्‍वयंसेवक घायल हुए।
विजयादशमी 1931 को डाक्‍टर जी जेल में थे, उनकी उनुपस्थिति में गांव-गांव में संघ की शाखाओं पर एक संदेश पढा गया, जिसमें कहा गया था- ‘’देश की परतंत्रता नष्‍ट होकर जब तक सारा समाज बलशाली और आत्‍मनिर्भर नहीं होता तब तक रे मना ! तुझे निजी सुख की अभिलाषा का अधिकार नहीं।‘’
जनवरी 1932 में विप्‍लवी दल द्वारा सरकारी खजाना लूटने के लिए हुए बालाघाट काण्‍ड में वीर बाघा जतीन (क्रान्तिकारी जतीन्‍द्र नाथ) अपने साथियों सहित शहीद हुए और श्री बाला जी हुद्दार आदि कई क्रान्तिकारी बन्‍दी बनाए गए। श्री हुद्दार उस समय संघ के अ.भा. सरकार्यवाह थे।
संघ पर प्रतिबन्‍ध
संघ के विषय में गुप्‍तचर विभाग की रपट के आधार पर मध्‍य भारत सरकार (जिसके क्षेत्र में नागपुर भी था) ने 15 दिसम्‍बर 1932 को सरकारी कर्मचारियों को संघ में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया।
डॉ. हेडगेवार जी के देहान्‍त के बाद 5 अगस्‍त 1940 को सरकार ने भारत सुरक्षा कानून की धारा 56 व 58 के अन्‍तर्गत संघ की सैनिक वेशभूषा और प्रशिक्षण पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया।
1942 का भारत छोडो आंदोलन
संघ के स्‍वयंसेवकों ने स्‍वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारत छोडो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। विदर्भ के अष्‍टी चिमूर क्षेत्र में समानान्‍तर सरकार स्‍थापित कर दी। अमानुषिक अत्‍याचारों का सामना किया। उस क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक स्‍वयंसेवकों ने अपना जीवन बलिदान किया। नागपुर के निकट रामटेक के तत्‍कालीन नगर कार्यवाह श्री रमाकान्‍त केशव देशपांडे उपाख्‍य बाळासाहब देशपाण्‍डे को आन्‍दोलन में भाग लेने पर मृत्‍युदण्‍ड सुनाया गया। आम माफी के समय मुक्‍त होकर उन्‍होंने वनवासी कल्‍याण आश्रम की स्‍थापना की।
देश के कोने-कोने में स्‍वयंसेवक जूझ रहे थे। मेरठ जिले में मवाना तहसील पर झण्‍डा फहराते स्‍वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, अनेक घायल हुए।
आंदोलनकारियों की सहायता और शरण देने का कार्य भी बहुत महत्‍व का था। केवल अंग्रेज सरकार के गुप्‍तचर ही नहीं, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के आदेशानुसार देशभक्‍तों को पकडवा रहे थे। ऐसे में जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली दिल्‍ली के संघचालक लाला हंसराज गुप्‍त के यहां आश्रय पाते थे। प्रसिद्ध समाजवादी श्री अच्‍युत पटवर्धन और साने गुरूजजी ने पूना के संघचालक श्री भाऊसाहब देशमुख के घर पर केन्‍द्र बनाया था। ‘पतरी सरकार’ गठित करनेवाले प्रसिद्ध क्रान्तिकर्मी नाना पाटील को औंध (जिला सतारा) में संघचालक पं. सातवलेकर जी ने आश्रय दिया।
स्‍वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघ की योजना
ब्रिटिश सरकार के गुप्‍तचर विभाग ने 1943 के अन्‍त में संघ के विषय में जो रपट प्रस्‍तुत की वह राष्‍ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है, जिसमें सिद्ध किया है कि संघ योजनापूर्वक स्‍वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ रहा है।

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

राष्ट्र सर्वोपरि

डॉ. सौरभ मालवीय
भारत यह एक ऐसा अद्भुत शब्द है जिसका उच्चारण ही मन को झंकृत कर देता है। जिस शब्द की कल्पना से ही संगीत निकलने लगे वह भारत है। ‘भारत’ में ‘भा’ का अर्थ होता है उजाला, सत्य, प्रकाश, आभा, ज्ञान, मोक्ष, परिपूर्ण, पोषण, जीवन आनन्द आदि आदि...। कहां तक कहें यहां तो सहस्र नाम की परम्परा ही है। विष्णु सहस्र नाम, शिव सहस्र नाम श्रीराम सहस्र नाम, गोपाल सहस्र नाम...। तो भारत के अनन्त नाम हैं अनन्त अर्थ हैं और यह संस्कृत का शब्द है संस्कृत इतनी तरल भाषा ;सपुनपपिकि संदहनंहद्ध है कि इसके अर्थ की अनन्तता सहज ही हो जाती है। भारत में ‘रत’ का अर्थ है लीन तल्लीन, लवलीन विलीन आदि। भारत का अर्थ हुआ ज्ञान में तल्लीन, भरणपोषण करने वाला, परम प्रकाशक अतएव इस धरा पर जहां भी ज्ञान की सत्य की साधना हो वह भारत भूमि है। प्रख्यात दार्शनिक ओशो की रचना ‘भारत एक सनातन यात्रा’ की प्रस्तावना में विख्यात साहित्यकर्तृ श्रीमती अमृता प्रीतम कहती हैं- ‘‘भारत एक भाव दशा है और इस जगत में जहां भी ज्ञान के अनन्त ऊंचाइयों को छूने का परम्परागत प्रयास चलता है वह भारत है।’’ इन विशिष्टताओं के बिना भारत अधूरा है। भारतीय संस्कृति के महानायक श्रीराम इस पावन भारत को माता कहते हैं वे इसे स्वर्ग से भी महनीय बताते हैं।
‘‘अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी।।’’
(श्री बालमीकि रामायण, लंका काण्ड)

हे लक्ष्मण यद्यपि यह लंका सुवर्ण की है फिर भी मुझे रूचिकर नहीं लग रही है क्योंकि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान् है।
ऋग्वेद के ऋषि तन्मय भाव से भारत की वन्दना में अपनी ऋचाओं को चढ़ाकर अपने को निष्क्रय कर रहे हैं कि-
यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः।
यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।।  (ऋग्वेद)

महिमावान हिमालय जिसका गुण गा रहा है। नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही हैं उस परम राष्ट्र देव को हम हविष्य दें।
श्रीमद् भागवत् में भगवान् वेदव्यास जी कहते है कि-
अहो अमीषां किमकारिशोभनं
प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः।
यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे
मुकुन्द सेवौपयिकं स्पृहा हि नः।।
(श्रीमद् भागवत् 3.19.21)
देवतागण आपस में बात करते हुए कह रहे हैं कि-
अहो वे लोग ऐसा कौन सा पुण्य किये हैं कि उनका जन्म भगवत्सेवार्थ पवित्र भारतवर्ष के आंगन में हुआ है। इन लोगों पर श्री हरि स्वयं प्रसन्न हैं। इस सौभाग्य पर तो हम भी तरसते हैं।
पुराण तो भारत की वन्दना से आपूरित हैं-
गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तुते भारत भूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।
(श्री विष्णु पुराण 2.3.24)

देवतागण भी अहर्निश यही गाते रहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जो भारतवर्ष में जन्मे है क्योंकि यह भूमि मोक्ष भूमि है।
भारत शब्द का जो अर्थ होता है वही अर्थ ‘काशी’ शब्द का भी होता है।
काश्यां काशते काशी
काशी सर्वप्रकाशिका।
और काशी में मरना मोक्षकारी माना जाता है।
काश्यां मरणान्मुक्तिः
(काशी में मरना मोक्षकर है)

परमपूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि-
मुक्ति जन्म महि जानि ज्ञान खानि अघ हानिकर।
जहं बस सम्भु भवानि सो कासी सेइय कस न।।
(श्रीरामचरित मानस उत्तर काण्ड)

‘‘यह पवित्र भूमि मोक्ष भू है ज्ञान की खान है, पापनाशी है, यहां भगवान शिव और मां पार्वती सदा विराजते रहते हैं। इस काशी का सेवन क्यों नहीं किया जाय।’’
राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने इसी भारत के भावभूमि की वन्दना में लिखा है कि-
मानचित्र में जो मिलता है नहीं देश भारत है।
भूपर नहीं मनों में ही बस कहीं शेष भारत है।।
भारत एक स्वप्नभू को ऊपर ले जाने वाला।
भारत एक विचार स्वर्ग को भू पर लाने वाला।।
भारत एक भाव जिसको पाकर मनुष्य जगता है,
भारत एक जलज जिस पर जल का न दाग लगता है।।
भारत है संज्ञा विराग के उज्जवल आत्म उदय की,
भारत है आभा मनुष्य की सबसे बड़ी विजय की।
भारत है भावना दाह जगजीवन का हरने की,
भारत है कल्पना मनुज को राग मुक्त करने की।।
जहां कहीं एकता अखण्डित जहां प्रेम का स्वर है,
देश-देश में खड़ा वहां भारत जीवित भास्वर है।
भारत वहां जहां जीवन साधना नहीं है भ्रम में,
धाराओं का समाधान है मिला हुआ संगम में।।
जहां त्याग माधुर्यपूर्ण हो जहां भोग निष्काम।
समरस हो कामना वहीं भारत को करो प्रणाम।।
वृथा मत लो भारत का नाम।।

भारत के भाव भूमि का वन्दन करते हुए भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं-
यह राष्ट्र केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, यह जीता जागता राष्ट्र पुरुष है। हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है। कश्मीर इसका किरीट है। पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं। दिल्ली इसका हृदय है, नर्मदा करधनी है। पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं। इसका सागर चरण धुलाता है, मलयानिल विजन डुलाता है। सावन के काले-काले मेघ इसकी कुन्तल केश राशि हैं। चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं। यह देवताओं की भूमि है। यह संन्यासियों की भूमि है। यह ऋषि की भूमि है, यह कृषि की भूमि है। यह सम्राटों की भूमि है, यह सेनानियों की भूमि है। यह सन्तों की भूमि है, यह तीर्थकरों की भूमि है। यह अर्पण की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है, यह वन्दन की भूमि है, यह अभिनन्दन की भूमि है। इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है। इसका कण-कण हमें प्यारा है इसका जन-जन हमारा दुलारा है। हम जियेंगे तो इसके लिये और यदि मृत्यु ने बुलाया तो मरेंगे भी इसके लिये। अगर मृत्यु के बाद हमारी हड्डियां गंगाजी में फंेक दी गयी और कोई कान लगाकर सुने तो एक ही आवाज सुनायी देगी वन्दे मातरम्। वन्दे मातरम्।।
(श्री अटल बिहारी वाजपेयी)

युग पुरुष स्वामी विवेकानन्द इस पवित्र भारत माता के प्रति कुछ ऐसा विचार रखते थे-
यदि इस पृथ्वीतल पर कोई एक ऐसा देश है, जो मंगलमयी पुण्यभूमि कहलाने का अधिकारी है, ऐसा देश जहां संसार के समस्त जीवों को अपना कर्मफल भोगने के लिये आना ही है, ऐसा देश जहां ईश्वरोन्मुख प्रत्येक आत्मा को अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करने के लिये पहुंचना अनिवार्य है, ऐसा देश जहां मानवता ने ऋजुजा उदारता, शुचिता एवं शान्ति का चरम शिखर स्पर्श किया हो तथा इन सबसे आगे बढक़र भी जो देश अन्तदृष्टि एवं आध्यात्मिकता का घर हो तो वह देश भारत है।
-स्वामी विवेकानन्द, बौद्धिक पुस्तिका 1979 का आमुख
इसी भारत के गुणानुवाद में कवि समाधिस्थ सा होकर गा उठता है कि-
ऊंचा ललाट जिसका हिमगिरि चमक रहा है,
स्वर्णिम किरीट जिस पर आदित्य रख रहा है।
साक्षात् शिव की प्रतिमा जो सब प्रकार उज्जवल,
बहता है जिसके सिर पर गंगा का नीर निर्मल।
वह पुण्य भूमि मेरी यह जन्मभूमि मेरी
यह मातृ भूमि मेरी यह पितृ मेरी।।
अमर साहित्यकार श्री जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरु शिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुाम सारा।। (‘चंद्रगुप्त’ नाटक)
भारत की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति होने के बावजूद आज भी जीवंत है और मानवता के विकास में सहायक-इससे संभवतः कोई इनकार न कर सकेगा। प्राचीनतम संस्कृति होने के कारण इसका इतिहास मानवता के हर पग से जुडा़ हुआ है। विश्व के इतिहास का कोई भी प्रमुख पृष्ठ ऐसा नहीं है जो भारतीय संस्कृति से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित न रहा हो। मेसोपोटामिया, मिस्र, रोम, यूनान तथा और, ‘इन्का’ और ‘एजटेक’ सरीखी लुप्त संस्कृतियां भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित रही हैं तथा इनके प्रणाम भी हैं। यह एक पृथक बात है कि विश्व के सभी इतिहासकारों से उसे मान्यता न मिली हो; पर जो भी इतिहासकार भारतीय संस्कृति के प्रभाव को खोजने मैक्सिको या दक्षिणी अमेरीका के सुदूर क्षेत्रों में गए हैं, वे वहां की लुप्त संस्कृतियों पर भारतीयता की छाप को जान सकने में समर्थ रहे हैं।

भारत, जो ऋग्वेद काल से एक राष्ट्र है, जिसके अभिनंदन में वैदिक ऋचाएं रची गईं और जिसकी समृद्धि के लिए भारतीय ऋषियों ने बार-बार प्रार्थनाएं कीं, उन सबको जाने-अनजाने हमारे संविधान निर्माताओं ने भुला दिया-यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसका स्मरण आज भी दुःखदायी है।
‘इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय’
-अथर्व.,7-35-1
‘इस राष्ट्र की श्रीवृद्धि हो।
‘बृहद् राष्ट्रं संवेश्यं दधातु’
-अथर्व-3-8-1
हमें एक महान् राष्ट्र प्राप्त हो।

जीवन की विश्वात्म धारणा को प्रतिदिन करनेवाला भारत, जिसका कभी विश्वास रहा ‘वसुधैव कुटंुबकम्’; पर वह दुष्प्रचार का शिकार होकर स्वयं ही अपने मूल्य छोड़ बैठा और सांस्कृतिक रूप से बिखर गया। यह सांस्कृतिक बिखराव आज भी राजनीति में स्तर पर दिखाई दे रहा है। लेकिन फिर भी न तो इस राष्ट्र के कर्णधारों को इसकी चिंता है और न भूल का एहसास है जो कि जाने-अनजाने संविधान निर्माताओं से हो गई। भारत एक सांस्कृतिक इकाई है- भले ही यह बात इस राष्ट्र के अनेक महान् नेतााओं ने बार-बार विभिन्न संदर्भाें में तथा विभिन्न स्तरों पर कही हो; पर उनकी इस अवधारणा की छाया तक भारतीय संविधान में नहीं है। यह सब इसलिए हुआ, क्यांेकि संविधान सतत् उपलब्ध थी, उसका कहीं भी प्रयोग न करके सारी सामग्री योरोप और अमेरिका में खोजी गई। पश्चिम का राजनैतिक व सांस्कृतिक चिंतन तथा दर्शन भारत से मौलिक रूप से भिन्न है, यह सब जानते हुए भी संविधान निर्माण में अनुच्छेदों के लेखन के समय विदेशी मूल्यों, आदर्शांे, परिपाटियों एवं व्यवस्थाओं का ही प्रयोग किया गया।

‘‘प्रत्येक समाज की अपनी एक मूल प्रकृति होती है और भारत की मूल प्रकृति सहिष्णुता प्रधान व समन्वयात्मक है, इसीलिए उसका उद्देश्य है- ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। सभी सुखी हों, सभी का कल्याण हो-इसी भाव को लेकर भारत में जीवन-मूल्यों को विकसित किया गया। ये जीवन-मूल्य जितने उदार व उच्च होंगे, उनसे जुडी़ संस्कृति भी उतनी ही उदार व उच्च होगी। अतः हमें अपने श्रेय प्रधान जीवन-मूल्यों को उन भोगवादी मूल्यों तथा रूढ़िवादिता के प्रहार से बचाना होगा, जो इधर समाज में बढे़ हैं।’’

जे. रैम्जे मैक्डोनाल्ड नामक एक अंग्रेज ने, जो कभी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, लिखा था, ‘‘जो भी हो, हिन्दू अपनी परम्परा और धर्म के अनुसार भारत को न केवल एक प्रभुसŸाा के अधीन एक राजनीतिक इकाई मानता है, बल्कि अपनी आध्यात्मिक संस्कृति को साकार मन्दिर और उससे भी बढक़र देवी मां का रूप मानता है। भारत और हिन्दुत्व एक दूसरे से ऐसे जुडे़ है, जैसे शरीर से आत्मा। राष्ट्रीयता की व्याख्या करना, उसकी परख करना और उसेे सिद्ध करना एक कठिन काम है, किन्तु जहां तक भारत और आर्यपुत्र का सम्बन्ध है, निश्चय ही उसने उसे अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित किया है ‘‘
जार्ज ओटो ट्रेविलयनः द लाइफ एण्ड लेटर्स आफ लार्ड मैकाले, पृ.421

भारत उपासना-पंथों की भूमि, मानव-जाति का पालन, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दादी एवं परंपरा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सर्जनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है। यह ऐसी भूमि है जिसके दर्शन के लिए सब लालायित ही रहते है और एक बार इसकी झलक मिल जाय तो दुनिया के अन्य सारे दृश्यों के बदले में भी वे उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे।

मार्क ट्वेन मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है तो वह है भारत।
रोमां रोला (फ्रांस के विद्वान)

हिन्दुत्व धार्मिक एकरूपता पर जोर नहीं देता, वरन् आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाता है। यह जीवन-पद्धति है, न कि कोई विचारधारा।

स्वामी विवेकानन्द का ‘‘राष्ट्रदेव की पूजा’’ का आह्वान
‘‘आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्म भूमि भारतमाता ही हमारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं, और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने ‘‘योग्य होंगे, अन्यथा नहीं’’
(भारत का भविष्य पृ.19)।

हिन्दुओं को प्रेरणा देते हुए स्वामी जी कहते हैं, ‘‘उŸिाष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’’ (कठोप.1.3.4) यानी उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति से पहले रूको नहीं। यानी पूर्ण हिन्दूराज स्थापित करो। हिन्दू के अस्तित्व की सुरक्षा का यही एकमेव मार्ग रह गया है।

योगी श्री अरविन्द ने 1918 में युवकों का कहाः
‘‘मैं केवल इतना ही कह सकता हूं कि ऐसी सभी बातों को मेरा पूर्ण समर्थन मिलेगा जो एक शक्तिशाली समाज के ढाचे में व्यक्ति के जीवन को मुक्त करने और सशक्त बनाने में सहायक हों तथा उस स्वाधीनता और ऊर्जा को फिर से वापस दिलायें जो भारत के पास उसकी महानता और विस्तार के वीरत्वपूर्ण काल में थी। हमारे अनेक वर्तमान सामाजिक ढांचे जब गढे़ गये थे, हमारी अनेक रीति-नीति व परम्पराएं जब उत्पन्न हुए थे, वह समय सिकुड़न और अवनति का था। आत्मरक्षा और टिके रहने के लिए संकीर्ण सीमाओं में उनकी उपादेयता थी, पर वर्तमान घड़ी में, जब हमसे एक बार फिर एक स्वतंत्र और साहसपूर्ण आत्म रुपांतरण और विस्तार में प्रविष्ट होने की अपेक्षा की जा रही है, वे हमारी प्रगति में रुकावट बन रही है। मैं एक आक्रामक और विस्तारशील हिन्दुत्व में विश्वास करता हूं, संकीर्णता के साथ रक्षात्मक और आत्मसंकोचशील हिन्दुत्व में नहीं।’’
‘‘सर्व साधारण लोगों को सम्मिलित व राष्ट्र के नवजागरण में करना, भविष्य की महानता पर आधारित करना, भारतीय राजनीति को भारतीय धार्मिक भाव-प्रवणता और आध्यात्मिक में भिगोना-ये भारत में एक महान और शक्तिशाली राजनैतिक जागृति की अपरिहार्य शर्तें है।’’
(1918, भारत का पुनर्जन्म पृ.140.)

‘‘हम प्रकृति के जंगल में से चीरकर अपनी राह निकालने वाले अग्रदूत हैं। कायर चोर कामचोर बनने तथा भार उठाने से मना करने और सब कुछ हमारे लिए शीघ्र और सरल बनाये जाने हेतु शोर मचाने से काम नहीं चलेगा। सबसे ऊपर मैं तुमसे सहनशीलता, दृढ़ता, वीरता-सच्ची आध्यात्मिक वीरता की मांग करता हूं। मुझे शक्तिशाली मनुष्य चाहिए। भावुक बच्चे मुझे नहीं चाहिए। (1919 वहीं. पृ. 154)। ‘‘एक अकेले वीर का संकल्प हजारों कायरों के हृदय में साहस फूंक सकता है।’’
(1920 वहीं. पृ. 157)।

हमने अपने सामने जो काम रखा है वह यांत्रिक नहीं है, किन्तु नैतिक और आध्यात्मिक है। हमारे लक्ष्य किसी एक प्रकार की सरकार को बदल डालना नहीं है, प्रत्युत एक राष्ट्र का निर्माण करना है। उस काम का राजनीति भी एक भाग है, परन्तु एक भाग मात्र है। हम अपनी सारी शक्ति राजनीति पर ही नहीं लगाएंगे, ना ही केवल सामाजिक प्रश्नों पर या ब्रह्मविद्या का दर्शन या साहित्य या विज्ञान के विषयों पर, परन्तु इन सबको हम उस एक ही वस्तु के अर्न्तगत समझते हैं जिसे हम सबसे आवश्यक मानते है। वह वस्तु है धर्म, राष्ट्रीय धर्म, जो हमारा विश्वास है, सार्वभौम भी है।’’

श्री अरविन्द का राष्ट्र को आह्वान
महाभारत की एक आख्या के अनुसार-
अभगच्छत राजेन्द्र देविकां लोक विश्रुताम्।
प्रसूर्तियत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ।।

अर्थात् ‘‘सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि यदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई।

संसार भर में गोरे, पीले, लाल और श्याम (काले) ये चार रंगों के लोग विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं। एक भारत ही ऐसा देश है, जहां इन चार रंगों का भरपूर मिश्रण एक साथ देखने को मिलता है। वस्तुतः श्वेत-काकेशस, पीले-मंगोलियन, काले-नीग्रो तथा लाल रेड इंडियन इन चार प्रकार के रंगविभाजनों के बाद पांचवी मूल एवं मुख्य नस्ल है, जो भारतीय कहलाती है। इस जाति में उपर्युक्त चारों का सम्मिश्रण है। ऐसा कहीं सिद्ध नहीं हेाता कि भारतीय मानव जाति उपर्युक्त चारों जातियों की वर्ण संकरता से उत्पन्न हुई। उलटे नेतृत्व विज्ञानी यह कहते हैं कि भारतीय सम्मिश्रिण वर्ण ही यहां से विस्तरित होकर दीर्घकाल में जलवायु आदि के भेद से चार मुख्य रूप लेता चला गया।

न केवल रंग यहां चारों के सम्मिश्रित पाए जाते हैं, वरन् भारतीयों का शारीरिक गठन भी एक विलक्षणता लिए है। ऊंची दबी, गोल-लम्बी मस्तकाकृति उठी या चपटी नाक, लम्बी-ठिगनी, पतली-मोटी शरीराकृति, एक्जो व एण्डोमॉर्फिक (एकहरी या दुहरी गठन वाली) आकृतियां भारत में पाई जाती हैं। यहां से अन्यत्र बस जाने पर इनके जो गुण सूत्र उस जलवायु में प्रभावी रहे, वे काकेशस, मंगोलियन, नीग्रॉइड व रेडइंडियंस के रूप में विकसित होते चले गए। अतः मूल आर्य जाति की उत्पत्ति स्थली भारत ही है, बाहर कहीं नहीं, यह स्पष्ट तथ्य एक हाथ लगता है। पाश्चात्य विद्वानों ने एक प्रचार किया कि आर्य भारत से कहीं बाहर विदेश से आकर यहां बसे थे। संभवतः इसके साथ दूसरी निम्न जातियों को जनजाति-आदिवासी वर्ग का बताकर, वे उन्हें उच्च वर्ग के विरूद्ध उभारना चाहते थे। द्रविड़ तथा कोल, ये जो दो जातियां भारत में बाहर से आईं बतायी जाती हैं, वस्तुतः आर्य जाति से ही उत्पन्न हुई थीं, इनकी एक शाखा जो बाहर गयी थी पुनः भारत वापस आकर यहां बस गयी।

भारतीय जातियों पर शोध करने वाले नेतृत्व विज्ञानी श्रनैसफील्ड लिखते हैं कि ‘‘भारत में बाहर से आए आर्य विजेता और मूल आदिम मानव (बरबोरिजिन) जैसे कोई विभाजन नहीं है। ये विभाग सर्वथा आधुनिक है। यहां तो समस्त भारतीयेां में एक विलक्षण स्तर की एकता है। ब्राह्मणों से लेकर सड़क साफ करने वाले भंगियों तक की आकृति और रक्त समान हैं।’’
मनुसंहिता (10/43-44) का एक उदाहरण है
शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च।।

पौण्ड्राकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः शकाः।
पादराः पहल्वाश्चीनाः काम्बोजाः दरदाः खशाः।।

अर्थात् ‘‘ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न हानेे के कारण उस क्रिया का लोप होने से पौण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़ काम्बोज, भवन, शक पादर, पहल्व, चीनी किरात, दरद व खश ये क्षत्रिय जातियां धीरे-धीरे शूद्रत्व को प्राप्त हो गयीं।’’ स्मरण रहे यहां ब्राह्मणत्व से तात्पर्य है श्रेष्ठ चिन्तन, ज्ञान का उपार्जन व श्रेष्ठ कर्म तथा शूद्रत्व से अर्थ है निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म। क्षत्रिय वे जो पुरूषार्थी थे व बाहुबल से क्षेत्रों की विजय करके राज्य स्थापना हेतु बाहर जाते रहे।

मूल आर्य जाति ने उत्तराखण्ड से नीचे की भूमि में वनों को काटकर, जलाकर उन्हें


भारत में भारतीयता विषय पर सब पहलुओं से विचार किया गया है। इस शरीर के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, अतएव-
यावज्जीवं सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।।

भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी तभी हम पुनः भारत को विश्व में प्रतिष्ठापित कर पायेंगे। इसी भावना और विचार में भारत की एकता तथा अखण्डता बनी रह सकती है। तभी भारत परम वैभव को प्राप्त कर सकता है।
विश्व के अनेक विद्याविदों, दार्शनिकांे, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत के समर्थ को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी, किसी ने यहां आत्मिक पीपासा बुझाई है तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है। तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित भारतीय समाज अपने में समेटे खड़ा है इसी से पूरा  भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है।
विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की संवेदनाओं चिंतन प्रारंभ किया भारतीय चिंतन का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है- इस बात को न्यायालयों ने उनके निर्णयों में स्वीकार किया है। सांस्कृतिक चिंतन  एक आध्यात्मिक अवधारणा है और यही है भारतीय का वैशिष्ट्य। राष्ट्र का आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं जो हमे वेदांे, पुराणों, रामायण, महाभारत, गौतमबुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

संप्रति
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्ट्री य पत्रकारिता एवं संचार विश्वेविद्यालयए नोएडा
मोबाइल 8750820740



Wednesday, March 5, 2025

भारतीय संस्कृति में नारी कल, आज और कल


डॉ. सौरभ मालवीय
‘नारी’ इस शब्द में इतनी ऊर्जा है कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है, इसके पर्यायी शब्द स्त्री, भामिनी, कान्ता आदि है, इसका पूर्ण स्वरूप मातृत्व में विलसित होता है। नारी, मानव की ही नहीं अपितु मानवता की भी जन्मदात्री है, क्योंकि मानवता के आधार रूप में प्रतिष्ठित सम्पूर्ण गुणों की वही जननी है। जो इस ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाला विधाता है, उसकी प्रतिनिधि है नारी। अर्थात समग्र सृष्टि ही नारी है इसके इतर कुछ भी नही है। इस सृष्टि में मनुष्य ने जब बोध पाया और उस अप्रतिम ऊर्जा के प्रति अपना आभार प्रकट करने का प्रयास किया तो वरवश मानव के मुख से निकला कि –
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विधा द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
अर्थात हे प्रभु तुम माँ हो ............।
अक्सर यह होता है कि जब इस सांसारिक आवरण मैं फंस जाते या मानव की किसी चेष्टा से आहत हो जाते हैं तो बरबस हमें एक ही व्यक्ति की याद आती है और वह है माँ । अत्यंत दुःख की घड़ी में भी हमारे मुख से जो ध्वनी उच्चरित होती है वह सिर्फ माँ ही होती है। क्योंकि माँ की ध्वनि आत्मा से ही गुंजायमान होती है ।  और शब्द हमारे कंठ से निकलते हैं लेकिन माँ ही एक ऐसा शब्द है जो हमारी रूह से निकलता है। मातृत्वरूप में ही उस परम शक्ति को मानव ने पहली बार देखा और बाद में उसे पिता भी माना। बन्धु, मित्र आदि भी माना। इसी की अभिव्यक्ति कालिदास करते है कि-
वागार्थविव संप्रक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पीतरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ ॥ (कुमार सम्भवम)
जगत के माता-पिता (पीतर) भवानी शंकर, वाणी और अर्थ के सदृश एकीभूत है उन्हें वंदन।
इसी क्रम में गोस्वामी तुलसीदास भी यही कहते  हैं –
जगत मातु पितु संभु-भवानी। (बालकाण्ड मानस)
अतएव नारी से उत्पन्न सब नारी ही होते है, शारीरिक आकार-प्रकार में भेद हो सकता है परन्तु, वस्तुतः और तत्वतः सब नारी ही होते है। सन्त ज्ञानेश्वर ने तो स्वयं को“माऊली’’ (मातृत्व,स्त्रीवत) कहा है।
कबीर ने तो स्वयं समेत सभी शिष्यों को भी स्त्री रूप में ही संबोधित किया है वे कहते है –
दुलहिनी गावहु मंगलाचार
रामचन्द्र मोरे पाहुन आये धनि धनि भाग हमार
दुलहिनी गावहु मंगलाचार । - (रमैनी )
घूँघट के पट खोल रे तुझे पीव मिलेंगे
अनहद में मत डोल रे तुझे पीव मिलेंगे । -(सबद )
सूली ऊपर सेज पिया कि केहि बिधि मिलना होय । - (रमैनी )
जीव को सन्त कबीर स्त्री मानते है और शिव (ब्रह्म) को पुरुष यह स्त्री–पुरुष का मिलना ही कल्याण है मोक्ष और सुगति है ।
भारतीय संस्कृति में तो स्त्री ही सृष्टि की समग्र अधिष्ठात्री है, पूरी सृष्टि ही स्त्री है क्योंकि इस सृष्टि में बुद्दि ,निद्रा, सुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, चेतना और लक्ष्मी आदि अनेक रूपों में स्त्री ही व्याप्त है। इसी पूर्णता से स्त्रियाँ भाव-प्रधान होती हैं, सच कहिये तो उनके शरीर में केवल हृदय ही होता है,बुद्दि में भी ह्रदय ही प्रभावी रहता है, तभी तो गर्भधारण से पालन पोषण तक असीम कष्ट में भी आनंद की अनुभूति करती रहती।कोई भी हिसाबी चतुर यह कार्य एक पल भी नही कर सकता। भावप्रधान नारी चित्त ही पति, पुत्र और परिजनों द्वारा वृद्दावस्था में भी अनेकविध कष्ट दिए जाने के बावजूद उनके प्रति शुभशंसा रखती है उनका बुरा नहीं करती,जबकि पुरुष तो ऐसा कभी कर ही नही सकता क्योंकि नर विवेक प्रधान है, हिसाबी है, विवेक हिसाब करता है घाटा लाभ जोड़ता है, और हृदय हिसाब नही करता। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है-
यह आज समझ मैं पायी हूँ कि
दुर्बलता में नारी हूँ।
अवयन की सुन्दर कोमलता
लेकर में सबसे हारी हूँ ।।
भावप्रधान नारी का यह चित्त जिसे प्रसाद जी कहते है-
नारी जीवन का चित्र यही
क्या विकल रंग भर देती है।
स्फुट रेखा की सीमा में
आकार कला को देती है।।
परिवार व्यवस्था हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है,इसके दो स्तम्भ है- स्त्री और पुरुष।परिवार को सुचारू रूप देने में दोनों की भूमिका अत्यंत महतवपूर्ण है,समय के साथ मानवीय विचारों में बदलाव आया है| कई पुरानी परम्पराओं, रूढ़िवादिता एवं अज्ञान का समापन हुआ। महिलाएँ अब घर से बाहर आने लगी है कदम से कदम मिलाकर सभी क्षेत्रों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दे रही है,अपनी इच्छा शक्ति के कारण सभी क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही है अंतरिक्ष हो या प्रशासनिक सेवा,शिक्षा,राजनीति,खेल,मिडिया सहित विविध विधावों में अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर कुशलता से प्रत्येक जिम्मेदारी के पद को सँभालने लगी है, आज आवश्यकता है यह समझने की  कि नारी विकास की केन्द्र है और भविष्य भी उसी का है, स्त्री के सुव्यवस्थित एवं सुप्रतिष्ठित जीवन के अभाव में सुव्यवस्थित समाज की रचना नहीं हो सकती। अतः मानव और मानवता दोनों को बनाये रखने के लिए नारी के गौरव को समझना होगा।


Wednesday, September 25, 2024

अंत्योदय से समृद्ध होगा भारत

डॉ. सौरभ मालवीय 
देश की समृद्धि के लिए अंत्योदय अत्यंत आवश्यक है। अंत्योदय का अर्थ है- समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय। दूसरे शब्दों में- समाज के सबसे निचले स्तर के लोगों का विकास करना ही अंत्योदय है। अंत्योदय के बिना देश उन्नति नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक देश के अति निर्धन वर्ग का उत्थान नहीं होता, तब तक वह मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में देश भी समृद्ध नहीं हो पाएगा। इसलिए अंत्योदय आवश्यक है।
 
जनसंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय का नारा दिया था। अंत्योदय उनका सपना था। वे कहते थे कि आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीढ़ी पर पहुंचे हुए व्यक्ति नहीं, बल्कि सबसे नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होगा। अंत्योदय के माध्यम से केवल भारत ही नहीं, अपितु समग्र विश्व का विकास हो सकता है। इसके सुनियोजित योजना एवं उत्तरदायित्व आवश्यक है। विश्व के बहुत से विकसित राष्ट्र हालांकि किसी भी योजना के बिना ही वर्तमान आर्थिक विकास की दर प्राप्त करने में सफल रहे हैं, जिससे कुछ लोगों को यह अनुभव हो रहा है कि योजनाएं न केवल अनावश्यक हैं, अपितु निहायत अवांछनीय भी हैं। इसके बावजूद आम सहमति इस बात पर भी है कि यदि अविकसित राष्ट्र थोड़े समय में वही हासिल करना चाहते हैं, जो विकसित देशों ने लगभग एक शताब्दी में प्राप्त किया है तो विकास को अपनी प्राकृतिक गति पर नहीं छोड़ा जा सकता। विकास की प्रक्रिया शुरू करने के लिए भी एक प्रयास करना पड़ेगा और यह प्रयास नियोजित ढंग से होना चाहिए।   
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर, 2014 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 98वीं जयंती के अवसर पर अंत्योदय दिवस की घोषणा की थी, तभी से यह दिवस मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का प्रकाश पहुंचाना है, ताकि वे भी प्रगति करके समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित हो सकें। आर्थिक उन्नति के साथ-साथ यह दिवस समाज में व्याप्त असमानताओं के उन्मूलन के लिए कार्य करने की प्रोत्साहित करता है। इसके अतिरिक्त यह दिवस विभिन्न सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देता है, जिससे निर्धनों एवं वंचित वर्गों के लोगों को उनके कल्याण के लिए संचालित की जा रही योजनाओं की जानकारी प्राप्त हो सके तथा वे इसका लाभ उठा सकें। सरकार इन वर्गों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रही है। दीनदयाल अंत्योदय योजना के कई घटक हैं, जिन्हें अलग-अलग समय पर प्रारंभ किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर, 2014 को दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना भी प्रारंभ की। इसका उद्देश्य निर्धन ग्रामीण युवाओं को नौकरियों में नियमित रूप से न्यूनतम पारिश्रमिक के समान या उससे अधिक मासिक पारिश्रमिक प्रदान करना है। यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए की क्रियान्वित की जा रही है। इससे पूर्व 24 सितंबर, 2013 को राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन प्रारंभ किया गया था। इसके अंतर्गत शहरी निर्धनों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने एवं उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करने पर ध्यान दिया जाता है। इससे पूर्व 25 सितंबर, 2004 को दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना प्रारंभ की गई थी। इस योजना के अंतर्गत निर्धन रोगियों को एंबुलेंस की सुविधा प्रदान की जाती है।
    
उल्लेखनीय है कि सरकार अंत्योदय अन्न योजना संचालित कर रही है। यह योजना 25 दिसंबर 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रारंभ की गई थी। इसे केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय द्वारा लागू किया गया था। इसका उद्देश्य सार्वजनिक वितरण परमाली द्वारा देश के सबसे निर्धन लोगों को रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध करवाना है। इस योजना के अंतर्गत निर्धन परिवारों को 35 किलो राशन प्रदान किया जाता है। इसमें 20 किलो गेहूं और 15 किलो चावल सम्मिलित होता है। इसके अंतर्गत गेहूं तीन रुपये प्रति किलोग्राम और चावल दो रुपये प्रति किलोग्राम की दर से दिया जाता है। इसे सबसे पहले राजस्थान में लागू किया गया था। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि कच्ची नौकरियों में निर्धन परिवारों के युवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। इसमें वे परिवार सम्मिलित हैं, जिनकी वार्षिक आय एक लाख 80 हजार रुपये से कम है। कोरोना काल से यह राशन नि:शुल्क कर दिया गया है।
 
भारतीय जनता पार्टी की केंद्र एवं राज्य सरकारें अंत्योदय के सिद्धांत को लेकर शासन कर रही हैं। भाजपा के अनुसार एकात्म मानववाद और अंत्योदय का दर्शन पार्टी के मार्गदर्शक सिद्धांतों में से एक है। इस सिद्धांत को हम सबका साथ सबका विकास के साथ मिला हुआ देख सकते हैं जो गरीब, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार द्वारा तय की गई नीतियों में भी नजर आता है।
 
दीनदयाल जी और उनकी आर्थिक नीतियों ने हमेशा गरीबों की भलाई पर जोर देने की बात की है। उनके आर्थिक विचार में पंक्ति के अंतिम पड़ाव पर खड़ा व्यक्ति शामिल रहा है। उन्होंने कहा था कि‘आर्थिक नीति निर्धारण और प्रगति की सफलता का पैमाना यह नहीं है कि समाज के सबसे शीर्ष पर मौजूद व्यक्ति को उससे कितना फायदा मिल रहा है बल्कि यह है कि समाज पर जो लोग सबसे नीचे हैं उन्हें उन नीतियों का कितना फायदा मिला है। अंत्योदय का मतलब समाज के सबसे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्ति का कल्याण है। उन्होंने यह भी कहा था कि यह हमारी सोच और हमारे सिद्धांत हैं कि ये गरीब और अशिक्षित लोग हमारे ईश्वर हैं, यही हमारा सामाजिक और मानवीय धर्म है।
 
उनके इसी अंत्योदय के विचार से प्रेरित होकर केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मौजूद एनडीए सरकार और तमाम प्रदेशों में शासन करने वाली भाजपा सरकारें अंत्योदय के रास्ते पर बढ़ने की ओर अग्रसर हैं तथा गरीब, ग्रामीण एवं किसानों के लिए और समाज के सबसे शोषित वर्ग से आने वाले युवाओं और महिलाओं के कल्याण की ओर प्रतिबद्ध हैं। गरीब को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हुए औसत जीवन स्तर में बढ़ोतरी हुई है। मुद्रा, जनधन, उज्जवला, स्वच्छता मिशन, शौचालयों का निर्माण, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, आवास योजना, सस्ती दवाएं और इलाज, इन सभी योजनाओं पर कार्य को आगे बढ़ा दिया गया है।
 
तकनीक के प्रयोग से कृषि में सुधार किया जा रहा है एवं किसानों की आय दुगनी करने के इरादे से सिंचाई तकनीकों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। केंद्रीय बजट की सहायता से गांवों में भी कई निवेश किए जा रहे हैं। दीनदयाल जी के विचारों से प्रेरित बीजेपी सरकार देश के संसाधनों का उपयोग केवल देश की उन्नति के लिए करने के लिए प्रतिबद्ध है जिसके लिए यह सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने, काले धन को रोकने और जनता की कमाई की लूट रोकने के लिए कड़े कदम उठा रही है। एक भारत-श्रेष्ठ भारत का रास्ता गरीबी दूर करके ही मिलेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में अंत्योदय व सेवा के संकल्प को पूर्ण कर विकसित भारत के निर्माण के लिए भाजपा प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि मां भारती की सेवा में जीवनपर्यंत समर्पित रहे अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का व्यक्तित्व और कृतित्व देशवासियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
 
वास्तव में दीनदयाल अंत्योदय योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्वरोजगार के अवसरों में वृद्धि करती है। इसके अंतर्गत कृषि और गैर-कृषि दोनों प्रकार की आजीविकाओं में सहायता मिलती है। इससे महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सहायता मिलती है। महिला स्वयं सहायता समूहों को उनकी आजीविका बढ़ाने में सहायता मिलती है। इसके अंतर्गत महिलाओं को बैंकिंग संवाददाता सखियों के रूप में प्रशिक्षण दिया जाता है।
(लेखक – लखनऊ विश्वविधालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

Sunday, February 11, 2018

भावी भारत, युवा और पंडित दीनदयाल उपध्याय


डॉ. सौरभ मालवीय
1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो देश के सामने उसके स्वरूप की महत्वपूर्ण चुनौती थी कि अंग्रेजों के जाने बाद देश का स्वरूप क्या होगा। कॉंग्रेसी नेता सहित उस समय के अधिकांश समकालीन विद्वानों का यही मानना था कि अंग्र्रेजों के जाने के बाद देश अपना स्वरूप स्वतः तय कर लेगा, अर्थात तत्कालीन नेताओं जेहन में देश के स्वरूप से अधिक चिंता अंग्र्रेजों के जाने को लेकर था, राष्ट्र के स्वरूप को लेकर गॉंधी जी के बाद अगर किसी ने सर्वाधिक चिंता या विचार प्रकट किये, उनमें श्यामाप्रसाद मखर्जी के अलावा पं. दीनदयाल उपध्याय का नाम उन चुनिन्दे चिंतकों में शामिल था, जो आजादी मिलने के साथ ही देश का स्वरूप भारतीय परिवेश, परिस्थिति और सांस्कृतिक, आर्थिक मान्यता के अनुरूप करना चाहते थे। वे इस कार्य में पश्चिम के दर्शन और विचार को प्रमुख मानने के वजाए सहयोगी भूमिका तक ही सीमित करना चाहते थे, जबकि तत्कालीन प्रमुख नेता और प्रथम प्रधानमंत्री पं.नेहरू पश्चिमी खाके में ही राष्ट्र का ताना-बाना बुनना चहते थे।
अगर हम गॉंधीजी और दीनदयाल जी के विचारों के निर्मेष भाव से विवेचना करें तो दोनों नेता राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के अभ्युदय और उत्थान में ही उसका वास्तविक विकास मानते थे। हालांकि दोनों के दृष्टिकोंण में या इसके लिए अपनाये जाने वाले साधनों और दर्शन तत्त्वों में मूलभूत विभेद भी था। दीनदयाल जी इस राष्ट्र नव-जागरण में युवाओं की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि किसी राष्ट्र का स्वरूप उसके युवा ही तय करते हैं। किसी राष्ट्र को जानना हो तो सर्वप्रथम राष्ट्र के युवा को जानना चाहिए। पथभ्रष्ट और विचलित युवाओं का साम्राज्य खड़ा करके कभी कोई राष्ट्र अपना चिरकालिक सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकता। दीनदयाल जी की दृष्टि में युवा राष्ट्र की थाती है, एवं युवा-युवा के बीच भेद नहीं करता वह समग्र युवाओं को राष्ट्र की थाती मानता है। राष्ट्र जीवंत और प्राणवान सांस्कृतिक अवधारणा है। पण्डित जी राष्ट्र को जल, जंगल, जमीन का सिर्फ समन्वय नहीं मानते थे।
राष्ट्र और युवा के सम्बन्ध में दीनदयाल जी की मान्यता थी कि राष्ट्र का वास्तविक विकास सिर्फ उसके द्वारा ओद्योगिक जाना, और बड़े पैमाने पर किया गया पूॅंजी निवेश मात्र नहीं है। उनका स्पष्ट मानना था कि किसी राष्ट्र का सम्पूर्ण और समग्र विकास तब तक नहीं जब तक कि राष्ट्र का युवा सुशिक्षित और सुसंस्कृत नहीं होगा। सुसंस्कृत से पण्डित जी का आशय सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक नहीं था, बल्कि वह ऐसी युवा शक्ति निर्माण की बात करते थे जो राष्ट्र की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करता हो, उनके अनुसार यह तब तक सम्भव नहीं था, जब तक युवा, देश की संस्कृति और उसकी बहुलतावादी सोच मंे राष्ट्र की समग्रता का दर्शन न करता हो। अगर इसे हम भारत जैसे बहुलवादी राष्ट्र के संदर्भ में देखें तो ज्ञात होगा कि उसकी सांस्कृतिक बहुलता में भी एक समग्र संस्कृति का बोध होता है। जो उसे अनेकता में भी एकता के सूत्र में पिरोये रखने की ताकत रखता है। यही वह धागा है, जिसने सहस्त्रों विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भी राष्ट्र को कभी विखंडित नहीं होने दिया, और एक सूत्र में पिरोए रखा।
पश्चिमी दार्शनिक मनुष्य के सिर्फ शारीरिक और मानसिक विकास की बात करते हैं। वहीं अधिकांश भारतीय दार्शनिक व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक विकास के साथ ही धार्मिक विकास पर भी जोर देते हैं। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन की बाद करते हैं, तो उनका भी आशय यही होता है कि पूर्ण मानव बनना तभी सम्भव है, जब मनुष्य का शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसका अध्यात्मिक विकास भी हो। इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है युवा व्यक्तित्व का विकास होगा तो समाज विकसित होगा, समाज विकसित होगा तो राष्ट्र तो राष्ट्र की उन्नति होगी, और राष्ट्र की उन्नति होगी तो विश्व का कल्याण होगा। राष्ट्र के सम्बन्ध में दीनदयाल जी का विचार था कि जब एक मानव समुदाय के समक्ष, एक वृत्त-विचार आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृ भाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है, अर्थात पण्डित जी के अनुसार देश के युवा राष्ट्र के सच्चे सपूत तभी कहलायेंगे जब वे भारत मॉं को मातृ जमीन का टुकड़ा न समझें, बल्कि उसे सांस्कृतिक मॉं के रूप में स्वीकार करें। उनका विचार था कि राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है जिसे चिती रूप में जाना जाता है।
प्रसिद्ध विद्वान मैक्डूगल के अनुसार किसी भी समूह की एक मूल प्रवृत्ति होती है, वैसे ही चिती किसी समाज की मूल प्रवृत्ति है जो जन्मजात है, और उसके होने का कारण ऐतिहासिक नहीं है। इसी क्रम में वर्तमान परिप्रेक्ष्य के भौतिकवादी स्वरूप को देखते हुए एवं युवाओंे के मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में चिंता प्रकट करते हुए एक बार अपने उद्बोधन में पण्डित दीनदयाल जी कहा था कि किसी भी राष्ट्र का युवा का इस कदर भौतिकवादी होना और राष्ट्र राज्य के प्रति उदासीन होना अत्यन्त घातक है। दीनदयाल जी का युवाओं के लिए चिंतन था कि भारत जैसा विशाल एवं सर्वसम्पन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृति पृष्ठभूमि के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज के आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगत गुरू के पद पर प्रतिष्ठापित हुआ। ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात समर्थ सशक्त भारत बनाने में युवाओं के योगदान को महत्त्वपूर्ण माना है।
पं. दीनदयाल उपध्याय के मन में जो मानवता के प्रति विचार थेए उसे गति 1920 में प्रकाशित पण्डित बद्रीशाह कुलधारिया की पुस्तक ‘दैशिक शास्त्रश् से मिली। दैशिक शास्त्र की भावभूमि तो दीनदयाल जी के मन में पहले से ही थी और एक नया विचार उनके मन में उदित हुआ कि सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व युवा ही करते हैं द्य अतः युवाओं के विचारों का अध्ययन करके मानवता के लिए एक शास्वत जीवन प्रणाली दी जाएए जो कि युवाओं के लिए प्रेरक तो ही साथ ही साथ युवाओं के माध्यम से भारत एक वैश्विक शक्ति बन सके।

मानवता के कल्याण का विचार है एकात्म मानवदर्शन

डॉ. सौरभ मालवीय
मनुष्य विचारों का पुंज होता है और सर्व प्रथम मनुष्य के चित्त में विचार ही  उभरता है। वही विचार घनीभूत होकर संस्कार बनते है और मनुष्य के कर्म रूप में परिणीति हो कर व्यष्टि और समष्टि सबके हित का कारक बनते है।  यदि विचारों की परिपक्वता अपूर्ण रह गई तो परिणाम विपरीत होने लगतेहै।  भारतीय महर्षियों ने विचारों की अनन्त उचाई छूने का प्रयास किया और इस विचार यात्रा में पाया गया कि सबसे उत्तम धर्म वही होगा जिसमें मनुष्यों के खिलने की समग्र संभावनाओं के द्वार खुले हो जिसे जो होना है वह हो और दूसरे के होने में बाधक न हो वल्कि साधक हो।  इस प्रकार के सः अस्तित्व की विचार सारणी इस धरा-धाम पर सबकी संभावनाओं के द्वार खोलती है। और इस प्रक्रिया में टकराहट की कल्पना भी नही सः अस्तित्व सहज धर्म बन जाता है और सूत्रवद्धता सबके मूल में स्थापित हो जाती है।
ऋषियों की यह चिंतन शैली भारत के जन मन में घुल हुआ है,भारत की मानसिकता इसी प्रकार के समग्र सोच पर विकसित है।  परोपकार ,अहिंसा ,करुणा ,क्षमा,दया ,आर्जव ,मृदुता,प्रतिभा इत्यादि अनेको प्रकार के फल इसी चिंतन वृक्ष पर सदियों से सदाबहार रूप में लदे रहते है। लम्बे गुलामी के कारण हमारी चिंतन धारा में भी गतिरोध पैदा हुआ और उस जीवन वृक्ष से नवीन सपने ढहता गया।  इस दौरान एक अपूर्ण विचार भी हम पर थोपने का प्रयास हुआ. सामान्यतः ऐसा होता ही है बिजेता चाहे जितना भी पतित विचार या जीवन शैली का हो अपनी उन चिंजो को विजितों पर लादता ही है उसी में कुछ चाटुकार वृति के लोग विजेताओं के इस नए धर्म का गला फाडू स्वागत करने लगते है पश्चिम के चिंतको में एक अत्यंत ही प्रमुख नाम रेन्डेकार्ट ने यहाँ तक घोषणा कर दिया कि ईश्वर मर गया है विश्व में ईश्वर नाम को कोई चीज ही नहीं है।  फेडरिकमित्से,कारलायल आदि विचारकों ने खण्डसह सोच को प्राथमिकता दी उनके कारण यह चिंतन ही पैदा नहीं हो पाया कि प्रकृति में कही एक सूत्रता भी है इस विचार ने अपनी पूरी ऊर्जा यह बताने में लगा दिया की व्यक्ति और समाज दो है। साधन और साध्य दो है।  सृष्टि और परमेष्ठी दो है।  देश और राष्ट्र दो है।  राष्ट्र और विश्व दो है इत्यादि।  इन द्वंदों के बीच वो यह भी कहते गए कि इनके लक्ष्य पूर्ति में विरोधाभाष भी है।  इस तरह के अपूर्ण चिंतन शैली का भयंकर परिणाम यह हुआ की हीगेल नाम के विचारक ने यह विचार दिया की आगे बढे हुए लोग अनैतिक हो जाते है जो पीछे वालों की नैक्तिक्ता पर पलते है इसी प्रकार की अपूर्ण शैली पर कार्ल मार्क्स ने बुजुर्वा और सर्वहारा शब्द गढ़े। उन्मादी मानसिकता के इस सोच ने विश्व में राष्ट्र ,परिवार ,ग़ाँव ,देश इत्यादि संस्थाओ और भावनात्मक सम्वन्धों को मिटा कर एक नई रेखा खीचंनी शुरू की लगभग ६० वर्षो के भीतर अधिक से अधिक धरती को अपनी छतरी के नीचें ढका लेकिन क्या परिणाम हुआ ये सारे के सारे देश टूट गए वहा का समाज जीवन नष्ट भ्रस्ट हो गया वे लोग अब पेरोस्ट्राइका और ग्लासमोस्ट की छाँव खोज रहे है।

एक दूसरी विचार शैली ने पूंजीवाद का एक ऐसा नँगा रूप खड़ा कर दिया की वहा हर व्यक्ति एक दूसरे को ग्राहक समझने लगा हर आदमी अपने मॉल  बढ़िया बता कर हर दूसरे को बेचा रहा है भले ही उसकी कोई सार्थकता न हो।  इस भयंकर परिस्थिति में यह सोचने का विषय है कि मनुष्य केवल व्यापारिक सम्बन्धो के कारण जी रह है या मनुष्य का बल पूंजी है ? क्या मनुष्य केवल रोटी है ?  जब इसकी जड़ो की ओर हम जाते है तो दिखाई देता है कि यह ओरिजिन ऑफ़ स्पेसिज तथा स्पेंसर वे तीन जीवन दिखाई देते है जिसमे कहा गया है कि सर्वाइकल ऑफ फिटेस्ट ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर और स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस ही मूल है यह बितण्डावाद इतना गहरा हो गया है की पूरा विश्व ही त्राहिमाम कर रहा है।  युग पुरुष महामनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सन १९६२ में श्री बद्रीशाह कुलधारिया की एक पुस्तक दैशिकशास्त्र पढ़ा पंडित जी ने दैशिकशास्त्र के जीवन मूल्यों के गुण सूत्र तो लाखो साल पुरानी परम्परा से चली आरहे श्री बद्रीशाह के अमृत वर्षा ने जीवन मूल्यों को फलने फूलने का अवसर दिया उसी शुभअवसर का अमृत फल एकात्म मानव दर्शन है।  जिसमे मनुष्य के परम स्वातंत्रय की घोषण है इस महामंत्र को पंडित जी ने सन १९६४ में मुंबई के भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में प्रस्तुत किया था।  इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है व्यक्ति का विकास हो तो समाज विकसित होगा समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी राष्ट्र के उन्नति से विश्व का कल्याण होगा।  इस सूत्र को पंडित दीनदयाल जी ने श्रीमदभागवत से ग्रहण किया था जिसकी मूल धारणा स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस नहीं वल्कि अस्तित्व के लिए सहयोग है।  उपनिषदों से किये हुए अमृत ने पंडित जी ने कहा कि जीवन उपभोग नहीं वल्कि तेन भुञ्जितः है सम्पूर्ण विश्व सुखी होगा।  सर्वाइकल ऑफ़ फिटेस्ट यह जीवन मंत्र नहीं हो सकता अपितु सबका सहयोग और सबका विकास जीवन दृष्टि है। ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर यह पूरी तरह से मानव जाती को डूबा देगा।  जब की एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता दीनदयाल जी कहते है प्रकृति के सहयोग से अपना अस्तित्व बचाये रख सकते है प्रकृति गाय है गाय हमारी माता है हम उस माँ का दूध पिएंगे तो हम भी सुखी और स्वास्थ्य रहेंगे और प्रकृति माँ भी सुखी रहेंगी लेकिन यदि गाय का खून पिएंगे तो गाय भी मर जाएगी और हम भी मर जायेंगे।  यह उच्चतम मूल्य पूरी दृष्टि से हमें एकात्म हो जाने की प्रेरणा देती है यही एकात्म मानव दर्शन है जो इस धरती को एक नई दिशा देगा और सबका कल्याण होगा।

Sunday, July 30, 2017

वंदे मातरम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होगा

डॊ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र गीत वंदे मातरम एक बार भी चर्चा में है. इस बार मद्रास उच्च न्यायालय की वजह से इसके गायन का मुद्दा गरमाया है. मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी कार्यालयों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. उल्लेखनीय है कि एक ओर मुस्लिम समुदाय से ही वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम लड़की ने ही वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद कर सराहनीय कार्य किया है.वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद करने वाली फ़िरदौस ख़ान शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि जिस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया गया है, उसमें वंदे मातरम को गाने या न गाने से संबंधित किसी तरह की अपील नहीं की गई थी. यह गीत शिक्षा संस्थाओं में अनिवार्य रूप से गाया जाए या नहीं, इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में आगामी 25 अगस्त को सुनवाई होनी है.

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था, जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है, जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. उल्लेखनीय है कि 1870 के दौरान ब्रिटिश शासन ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. बंकिमचंद्र चटर्जी को इससे बहुत दुख पहुंचा. उस समय वह एक सरकारी अधिकारी थे. उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में वंदे मातरम की रचना की. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया. 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. वास्तव में बंकिमचंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को सम्मिलित कर लिया. उसके बाद कहानी की मांग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया, अर्थात बाद में जोड़े गए भाग में ही दशप्रहरणधारिणी, कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं. बाद में इस गीत को लेकर विवाद पैदा हो गया.

वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था. इसके बावजूद इसे राष्ट्रगान के रूप में नहीं चुना गया. वंदे मातरम के स्थान पर वर्ष 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जॊर्ज पंचम के सम्मान में रबींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे और गाये गए गीत जन गण मन को वरीयता दी गई. इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर आपत्ति थी. उनका कहना था कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का उल्लेख है, इसलिए इसे गाना उनके धर्म के विरुद्ध है. इसके अतिरिक्त यह गीत जिस आनंद मठ से लिया गया है, वह मुसलमानों के विरुद्ध लिखा गया है. इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है.  1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे. कुछ मुसलमानों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव भी शामिल थे. समिति का मानना था कि इस गीत के प्रथम दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा की गई है, जबकि बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है. समिति ने 28 अक्टूबर, 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस गीत के प्रारंभिक दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा. इस समिति का मार्गदर्शन रबींद्रनाथ ठाकुर ने किया था. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारंभिक दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ. 14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदे मातरम के साथ हुआ. फिर 15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था. डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को  वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.  वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर यह  गीत गाया जाता है. आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों का प्रसारण वंदे मातरम से ही होता है. वर्ष 1882 में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितंबर, 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए वर्ष 2005 में इसके सौ वर्ष पूरे होने पर साल भर समारोह का आयोजन किया गया. 7 सितंबर, 2006 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था.  इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया. परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है. यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये. इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य, परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है. जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं. इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है. इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है. इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है. गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की अराधना है, लेकिन इसे कोई महत्व नहीं दिया गया है. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर विशेष बल देते हैं. कुछ वर्ष पूर्व विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने वंदे मातरम को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. उल्लेखनीय बात यह भी है कि ईसाई समुदाय के लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते, इसके बावजूद उन्होंने कभी वंदे मातरम के गायन का विरोध नहीं किया.  

Sunday, May 21, 2017

आखिर राष्ट्रवाद से भय क्यों





 पत्रकारिता के राष्ट्रवादी स्वरूप के इतने महत्वपूर्ण योगदान के बाद भी, दुर्भाग्यवश स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता जगत में राष्ट्रवाद की उपेक्षा होने लगी | आज स्थिति यह है कि पत्रकारिता के आधुनिक स्वरूप में राष्ट्रवाद को संकुचित विचार माना जाता है। इसलिए राष्ट्रवादी विचारों और मुद्दों पर की जाने वाली पत्रकारिता को मुख्यधरा की पत्रकारिता में शामिल नही किया जाता, परन्तु यदि हम राष्ट्रवाद की परिभाषा और व्यख्या पर नजर डालें तो यह स्थापित सत्य दीखता है कि पत्रकारिता का राष्ट्रवाद से सीधा सम्बन्ध है सामाजिक मान्यता है कि मीडिया संस्कृति का वाहक भी है, दर्पण भी है और निर्माता भी अतएव पत्रकारिता का मौलिक कार्य समाज की विकास के प्रक्रियाओं को मजबूत करना है जिसके लिए उसे निर्भीक ,सत्यवादी और सुचितापूर्ण अनुशासन की भूमिका मे अपने को रखना है।
भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता पर मीडिया स्कैन द्वारा आयोजित सेमिनार में।

Monday, April 24, 2017

राष्ट्र की अस्मिता का गीत


सौरभ मालवीय
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था, जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है, जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. उल्लेखनीय है कि 1870 के दौरान ब्रिटिश शासन ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. बंकिमचंद्र चटर्जी को इससे बहुत दुख पहुंचा. उस समय वह एक सरकारी अधिकारी थे. उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में वंदे मातरम की रचना की. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया. 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. वास्तव में बंकिमचंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को सम्मिलित कर लिया. उसके बाद कहानी की मांग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया, अर्थात बाद में जोड़े गए भाग में ही दशप्रहरणधारिणी, कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं. बाद में इस गीत को लेकर विवाद पैदा हो गया.



वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था. इसके बावजूद इसे राष्ट्रगान के रूप में नहीं चुना गया. वंदे मातरम के स्थान पर वर्ष 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जॊर्ज पंचम के सम्मान में रबींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे और गाये गए गीत जन गण मन को वरीयता दी गई. इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर आपत्ति थी. उनका कहना था कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का उल्लेख है, इसलिए इसे गाना उनके धर्म के विरुद्ध है. इसके अतिरिक्त यह गीत जिस आनंद मठ से लिया गया है, वह मुसलमानों के विरुद्ध लिखा गया है. इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है.  1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे. कुछ मुसलमानों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव भी शामिल थे. समिति का मानना था कि इस गीत के प्रथम दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा की गई है, जबकि बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है. समिति ने 28 अक्टूबर, 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस गीत के प्रारंभिक दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा. इस समिति का मार्गदर्शन रबींद्रनाथ ठाकुर ने किया था. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारंभिक दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ. 14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदे मातरम के साथ हुआ. फिर 15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था. डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को  वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.  वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर यह  गीत गाया जाता है. आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों का प्रसारण वंदे मातरम से ही होता है. वर्ष 1882 में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितंबर, 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए वर्ष 2005 में इसके सौ वर्ष पूरे होने पर साल भर समारोह का आयोजन किया गया. 7 सितंबर, 2006 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था.  इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया. परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है. यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये. इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य, परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है. जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं. इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है. इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है. इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है. गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की अराधना है, लेकिन इसे कोई महत्व नहीं दिया गया है. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर विशेष बल देते हैं. कुछ वर्ष पूर्व विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने वंदे मातरम को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. उल्लेखनीय बात यह भी है कि ईसाई समुदाय के लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते, इसके बावजूद उन्होंने कभी वंदे मातरम के गायन का विरोध नहीं किया.  वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे मातरम का हिन्दी में अनुवाद किया था. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. शाइरा, लेखिका और पत्रकार फ़िरदौस ख़ान ने पंजाबी में वंदे मातरम का अनुवाद किया है. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

Thursday, December 24, 2015

अटलजी, जिन्होंने कभी हार नहीं मानी

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर विशेष

डॉ. सौरभ मालवीय
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं...
यह कविता है देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की, जिन्हें सम्मान एवं स्नेह से लोग अटलजी कहकर संबोधित करते हैं. कवि हृदय राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी ओजस्वी रचनाकार हैं. अटलजी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर के शिंके का बाड़ा मुहल्ले में हुआ था. उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी अध्यापन का कार्य करते थे और माता कृष्णा देवी घरेलू महिला थीं. अटलजी अपने माता-पिता की सातवीं संतान थे. उनसे बड़े तीन भाई और तीन बहनें थीं. अटलजी के बड़े भाइयों को अवध बिहारी वाजपेयी, सदा बिहारी वाजपेयी तथा प्रेम बिहारी वाजपेयी के नाम से जाना जाता है. अटलजी बचपन से ही अंतर्मुखी और प्रतिभा संपन्न थे. उनकी प्रारंभिक शिक्षा बड़नगर के गोरखी विद्यालय में हुई. यहां से उन्होंने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की. जब वह पांचवीं कक्षा में थे, तब उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था. लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ग्वालियर जाना पड़ा. उन्हें विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल में दाख़िल कराया गया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की. इस विद्यालय में रहते हुए उन्होंने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया तथा प्रथम पुरस्कार भी जीता. उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण की. कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था. आरंभ में वह छात्र संगठन से जुड़े. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता नारायण राव तरटे ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में कार्य किया. कॉलेज जीवन में उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. वह 1943 में कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष भी बने. ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद वह कानपुर चले गए. यहां उन्होंने डीएवी महाविद्यालय में प्रवेश लिया. उन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की. इसके बाद वह पीएचडी करने के लिए लखनऊ चले गए. पढ़ाई के साथ-साथ वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य भी करने लगे. परंतु वह पीएचडी करने में सफलता प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि पत्रकारिता से जुड़ने के कारण उन्हें अध्ययन के लिए समय नहीं मिल रहा था. उस समय राष्ट्रधर्म नामक समाचार-पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपादन में लखनऊ से मुद्रित हो रहा था. तब अटलजी इसके सह सम्पादक के रूप में कार्य करने लगे. पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस समाचार-पत्र का संपादकीय स्वयं लिखते थे और शेष कार्य अटलजी एवं उनके सहायक करते थे. राष्ट्रधर्म समाचार-पत्र का प्रसार बहुत बढ़ गया. ऐसे में इसके लिए स्वयं की प्रेस का प्रबंध किया गया, जिसका नाम भारत प्रेस रखा गया था.

कुछ समय के पश्चात भारत प्रेस से मुद्रित होने वाला दूसरा समाचार पत्र पांचजन्य भी प्रकाशित होने लगा. इस समाचार-पत्र का संपादन पूर्ण रूप से अटलजी ही करते थे. 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हो गया था. कुछ समय के पश्चात 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई. इसके बाद भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया. इसके साथ ही भारत प्रेस को बंद कर दिया गया, क्योंकि भारत प्रेस भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव क्षेत्र में थी. भारत प्रेस के बंद होने के पश्चात अटलजी इलाहाबाद चले गए. यहां उन्होंने क्राइसिस टाइम्स नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक के लिए कार्य करना आरंभ कर दिया.  परंतु जैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगा प्रतिबंध हटा, वह पुन: लखनऊ आ गए और उनके संपादन में स्वदेश नामक दैनिक समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगा.  परंतु हानि के कारण स्वदेश को बंद कर दिया गया.  इसलिए वह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र वीर अर्जुन में कार्य करने लगे. यह दैनिक एवं साप्ताहिक दोनों आधार पर प्रकाशित हो रहा था. वीर अर्जुन का संपादन करते हुए उन्होंने कविताएं लिखना भी जारी रखा.

अटलजी को जनसंघ के सबसे पुराने व्यक्तियों में एक माना जाता है. जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लग गया था, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय जनसंघ का गठन किया था. यह राजनीतिक विचारधारा वाला दल था. वास्तव में इसका जन्म संघ परिवार की राजनीतिक संस्था के रूप में हुआ. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके अध्यक्ष थे. अटलजी भी उस समय से ही इस दल से जुड़ गए. वह अध्यक्ष के निजी सचिव के रूप में दल का कार्य देख रहे थे. भारतीय जनसंघ ने सर्वप्रथम 1952 के लोकसभा चुनाव में भाग लिया. तब उसका चुनाव चिह्न दीपक था. इस चुनाव में भारतीय जनसंघ को कोई विशेष सफ़लता प्राप्त नहीं हुई, परंतु इसका कार्य जारी रहा. उस समय भी कश्मीर का मामला अत्यंत संवेदनशील था. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अटलजी के साथ जम्मू-कश्मीर के लोगों को जागरूक करने का कार्य किया. परंतु सरकार ने इसे सांप्रदायिक गतिविधि मानते हुए डॉ. मुखर्जी को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया, जहां 23 जून, 1953 को जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई.  अब भारतीय जनसंघ का काम अटलजी प्रमुख रूप से देखने लगे. 1957 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ को चार स्थानों पर विजय प्राप्त हुई. अटलजी प्रथम बार बलरामपुर सीट से विजयी होकर लोकसभा में पहुंचे. वह इस चुनाव में 10 हज़ार मतों से विजयी हुए थे. उन्होंने तीन स्थानों से नामांकन पत्र भरा था. बलरामपुर के अलावा उन्होंने लखनऊ और मथुरा से भी नामांकन पत्र भरे थे. परंतु वह शेष दो स्थानों पर हार गए. मथुरा में वह अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाए और लखनऊ में साढ़े बारह हज़ार मतों से पराजय स्वीकार करनी पड़ी. उस समय किसी भी पार्टी के लिए यह आवश्यक था कि वह कम से कम तीन प्रतिशत मत प्राप्त करे, अन्यथा उस पार्टी की मान्यता समाप्त की जा सकती थी. भारतीय जनसंघ को छह प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे. इस चुनाव में हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद जैसे दलों की मान्यता समाप्त हो गई, क्योंकि उन्हें तीन प्रतिशत मत नहीं मिले थे. उन्होंने संसद में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी. 1962 के लोकसभा चुनाव में वह पुन: बलरामपुर क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी बने, परंतु उनकी इस बार पराजय हुई. यह सुखद रहा कि 1962 के चुनाव में जनसंघ ने प्रगति की और उसके 14 प्रतिनिधि संसद पहुंचे. इस संख्या के आधार पर राज्यसभा के लिए जनसंघ को दो सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त हुआ. ऐसे में अटलजी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्यसभा में भेजे गए. फिर 1967 के लोकसभा चुनाव में अटलजी पुन: बलरामपुर की सीट से प्रत्याशी बने और उन्होंने विजय प्राप्त की. उन्होंने 1972 का लोकसभा चुनाव अपने गृहनगर अर्थात ग्वालियर से लड़ा था. उन्होंने बलरामपुर संसदीय चुनाव का परित्याग कर दिया था. उस समय श्रीमती इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, जिन्होंने जून, 1975 में आपातकाल लगाकर विपक्ष के कई नेताओं को जेल में डाल दिया था. इनमें अटलजी भी शामिल थे. उन्होंने जेल में रहते हुए समयानुकूल काव्य की रचना की और आपातकाल के यथार्थ को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया. जेल में रहते हुए ही उनका स्वास्थ्य ख़राब हो गया और उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया. लगभग 18 माह के बाद आपातकाल समाप्त हुआ. फिर 1977 में लोकसभा चुनाव हुए, परंतु आपातकाल के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं. विपक्ष द्वारा मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और अटलजी विदेश मंत्री बनाए गए. उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं और भारत का पक्ष रखा.  4 अक्टूबर, 1977 को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में हिंदी मंध संबोधन दिया. इससे पूर्व किसी भी भारतीय नागरिक ने राष्ट्रभाषा का प्रयोग इस मंच पर नहीं किया था. जनता पार्टी सरकार का पतन होने के पश्चात् 1980 में नए चुनाव हुए और इंदिरा गांधी पुन: सत्ता में आ गईं. इसके बाद 1996 तक अटलजी विपक्ष में रहे. 1980 में भारतीय जनसंघ के नए स्वरूप में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ और इसका चुनाव चिह्न कमल का फूल रखा गया. उस समय अटलजी ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् 1984 में आठवीं लोकसभा के चुनाव हुए, परंतु अटलजी ग्वालियर की अपनी सीट से पराजित हो गए. मगर 1986 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया.

13 मार्च, 1991 को लोकसभा भंग हो गई और 1991 में फिर लोकसभा चुनाव हुए. फिर 1996 में पुन: लोकसभा के चुनाव हुए.  इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी. संसदीय दल के नेता के रूप में अटलजी प्रधानमंत्री बने. उन्होंने 16 मई, 1996 को प्रधानमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की. 31 मई, 1996 को उन्हें अंतिम रूप से बहुमत सिद्ध करना था, परंतु विपक्ष संगठित नहीं था. 28 मई को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. इस कारण अटलजी मात्र 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे. इसके बाद 19 मार्च 1998 को उन्होंने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. 1999 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और 13 अक्टूबर, 1999 को अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली. इस प्रकार वह तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 22 मई 2004 तक अपना कार्यकाल पूरा किया.

पत्रकार के रूप में अपना जीवन आरंभ करने वाले अटलजी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. राष्ट्र के प्रति उनकी समर्पित सेवाओं के लिए वर्ष 1992 में राष्ट्रपति ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया. वर्ष 1993 में कानपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि प्रदान की. उन्हें 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार दिया गया. वर्ष 1994 में श्रेष्ठ सासंद चुना गया तथा पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसी वर्ष 27 मार्च, 2015 भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

अटलजी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें कैदी कविराय की कुंडलियां, न्यू डाइमेंशन ऒफ़ एशियन फ़ॊरेन पॊलिसी, मृत्यु या हत्या, जनसंघ और मुसलमान, मेरी इक्यावन कविताएं, मेरी संसदीय यात्रा (चार खंड), संकल्प-काल एवं गठबंधन की राजनीति सम्मिलित हैं.

अटलजी को इस बात का बहुत हर्ष है कि उनका जन्म 25 दिसंबर को हुआ. वह कहते हैं- 25 दिसंबर! पता नहीं कि उस दिन मेरा जन्म क्यों हुआ?  बाद में, बड़ा होने पर मुझे यह बताया गया कि 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्मदिन है, इसलिए बड़े दिन के रूप में मनाया जाता है. मुझे यह भी बताया गया कि जब मैं पैदा हुआ, तब पड़ोस के गिरजाघर में ईसा मसीह के जन्मदिन का त्योहार मनाया जा रहा था. कैरोल गाए जा रहे थे. उल्लास का वातावरण था. बच्चों में मिठाई बांटी जा रही थी. बाद में मुझे यह भी पता चला कि बड़ा धर्म पंडित मदन मोहन मालवीय का भी जन्मदिन है. मुझे जीवन भर इस बात का अभिमान रहा कि मेरा जन्म ऐसे महापुरुषों के जन्म के दिन ही हुआ.

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है