उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की अमर गाथा नारी अस्मिता, सम्मान और स्वावलंबन की प्रेरणा प्रदान करती है। वे 15 मार्च 2026 को राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में आयोजित ‘जौहर श्रद्धांजलि समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में समिलित हुये। इस अवसर पर उन्होंने चित्तौड़गढ़ के वीरों से संबंधित पुस्तिका का विमोचन किया। इसके पूर्व मुख्यमंत्री ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कालिका माता मंदिर में दर्शन-पूजन किया तथा चित्तौड़गढ़ दुर्ग जौहर स्थल पर यज्ञ की पूर्णाहुति कार्यक्रम में सम्मिलित हुये।
जौहर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कार्यक्रम हमें भारतीय नारी के शौर्य, स्वाभिमान तथा अस्मिता को सम्मान करने का अवसर प्रदान कर रहा है। हम लोग नारी गौरव को नई ऊंचाई प्रदान करने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं। इतिहास में कई बार हमारी माताओं और बहनों को जौहर व्रत धारण करना पड़ा। अब ऐसी स्थिति मत आने देना कि हमारी माताओं-बहनों को जौहर व्रत धारण करना पड़े। आज का यह दिन हम सभी के लिए यह उद्घोष करता है कि सनातन की मर्यादा सदैव अमर है और अमर रहेगी। सनातन धर्म कभी पददलित नहीं हो सकता। यद्यपि चुनौतियां आ सकती हैं। हमने अनेक चुनौतियों का सामना किया है और आगे भी करेंगे, लेकिन कोई हमारी अमरता पर उंगली नहीं उठा सकता। चित्तौड़गढ़ का दुर्ग हमें याद दिलाता है कि मातृ शक्ति का साहस अजेय है तथा स्वाभिमान की जो ज्वाला सन् 1303 में प्रज्ज्वलित हुई कि वह शाश्वत बनी रहेगी। इसके लिए हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा।
उन्होंने कहा कि हम लोग जो कुछ उत्तर प्रदेश में कर रहे हैं, वह राजस्थान के तेज से संभव हुआ है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्श न में उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रहे परिवर्तन के पीछे राजस्थान की इस वीर भूमि का भी योगदान है, क्योंकि मेरे पूज्य दादागुरु इसी भूमि से गए थे। जब हम राजस्थान के चित्तौड़गढ़ व मेवाड़ के शौर्य तथा पराक्रम की बात होती है, तब हम वीरांगनाओं के जौहर को स्मरण करते हैं। मीराबाई की भक्ति से संपूर्ण भारत अभिभूत होता है। हम सब इससे नई प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस वीर भूमि ने भारत को नई पहचान प्रदान की है। चित्तौड़गढ़ का किला केवल पत्थरों से बना हुआ दुर्ग मात्र नहीं, बल्कि यह भारत की अस्मिता का प्रतीक है, जो इतिहास निर्माण का साक्षी होने के साथ त्याग और बलिदान का भी प्रतीक है। कौन ऐसा भारतीय होगा, जिसके मन में इस वीर भूमि के राणाओं के शौर्य व पराक्रम तथा देश के लिए किये गये बलिदान के प्रति श्रद्धा का भाव न उत्पन्न होता हो। जब भी भारत संकट में होता है, देश का अभिभावक अपने पुत्र को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, तो प्रत्येक भारतीय के मन में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज का स्मरण अनायास हो जाता है। इन राष्ट्र नायकों ने अपना बलिदान स्वयं व स्वयं के परिवार के लिए नहीं दिया, बल्कि इनका संघर्ष देश व धर्म के लिए था।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा, महारानी पद्मिनी, महाराणा कुम्भा तथा बप्पा रावल की गौरवशाली परम्परा को नमन करता है। राष्ट्र के लिए योगदान देने वाले लोगों का स्मरण लम्बे समय तक किया जाता है। हम आज इतिहास बनाने वाली धरती का साक्षात्कार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आज का यह समारोह हम सभी को प्रेरणा प्रदान कर रहा है कि आने वाले समय में किसी बेटी व बहन को इस प्रकार के दौर से न गुजरना पड़े। जौहर की गाथा सुनाते समय केंद्रीय मंत्री श्री गजेन्द्र शेखावत जी कह रहे थे कि सन् 1303, सन् 1535 तथा सन् 1568 में तीन बड़े जौहर यहां संपन्न हुए थे। भारत का इतिहास इन वीरांगनाओं के जौहर से परिपूर्ण है। महाराणा सांगा के शरीर पर लगे अस्सी घाव भारत की अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उनके शौर्य व पराक्रम के प्रतीक हैं। भले ही वह अनेक संकटों सामना करते रहे हों, लेकिन उन्होंने विधर्मियों को देश में घुसने नहीं दिया। जब महाराणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपना पहला युद्ध लड़ा, उस समय उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष थी।
उन्होंने कहा कि महाराणा रतन सिंह को वीरगति प्राप्त होने के पश्चात गोरा और बादल जैसे उनके वीर सेनापतियों ने भी लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके पश्चात महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में हजारों वीरांगनाओं ने नारी अस्मिता की रक्षा के लिए परिस्थितिवश जौहर व्रत ग्रहण किया। माता सीता ने धरती माता के सामने व्रत लेते हुए कहा कि उनका सतित्व अखंड है, माता मुझे अपनी गोद में समाहित करें। जो संकल्प माता सीता ने लिया था, वही संकल्प यहां महारानी पद्मिनी ने प्रकट किया था। यह संकल्प नारी गरिमा तथा भारत की धरती को विधर्मियों से मुक्त करने का था। यह संकल्प हम सभी को आज भी प्रेरणा प्रदान कर रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में हमेशा इस शौर्य का स्मरण किया गया है। भारत की पीढ़ियां इसे सम्मान प्रदान करती हैं। प्रभु श्रीराम असल मायने में राम तब बन सके, जब उन्होंने ‘निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह’ का संकल्प लिया। लाखों युवाओं ने श्रीराम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जब अपने पूर्वजों के प्रति हमारे मन में श्रद्धा भाव होता है, तो अच्छे परिणाम आने में देर नहीं लगती।
उन्होंने कहा कि अब अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हो चुका है। अब अयोध्या में गुलामी का कोई चिह्न नहीं बचा है। अयोध्या अब राममय हो चुकी है। जब देश एकजुट होकर एक स्वर में एक दिशा में चलता है, तो श्रीराम मंदिर जैसा उपहार सनातन धर्मावलम्बियों को प्राप्त होता है। कंस के अत्याचार से त्रस्त मथुरा को अभय प्रदान करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण को ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ का संकल्प लेना पड़ा था। उन्होंने कहा था कि वह सज्जन शक्ति का संरक्षण तथा दुर्जनों का संहार करने के लिए अवतरित हुए हैं। आज भगवान श्रीकृष्ण हम सबके पूज्य हैं।
उन्होंने कहा कि खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने कहा था कि ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’। उनके चार-चार पुत्र बलिदान को प्राप्त हुए थे। जब उनसे कहा गया कि आपके चार पुत्र बलिदान हो चुके हैं, तो उन्होंने कहा कि ‘चार मुये तो क्या हुआ, जीवित कई हजार’, वह पूरे समाज को अपना पुत्र मानते थे।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का स्मरण करता है। उनके बारे में कहा जाता है कि ‘सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’ जब उन्होंने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध शंखनाद किया था, उस समय उनकी आयु मात्र 26 वर्ष थी। 27 वर्ष की आयु में वह बलिदान हो गई थीं। यह भारत की नारी थी, और भारत की नारी ने उसी रूप में भारत का आह्वान किया था।
उन्होंने कहा कि कौन ऐसा भारतीय होगा, जो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्मरण न करता हो। उन्होंने आह्वान किया था कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ यह नारा केवल बंगाल के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की आजादी, अस्मिता और युवा चेतना के लिए था। आज अगर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस होते तो भारत का विभाजन नहीं होता। पाकिस्तान का भी अस्तित्व नहीं होता। भारत से बाहर जापान, म्यांमार व सिंगापुर तथा भारत के पोर्ट ब्लेयर में आजादी के लिए किये गये उनके योगदान का स्मारक आज भी हम सभी को प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में देश की आजादी के लिए काकोरी टेªन एक्शन हुआ था। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रान्तिकारी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये। इन क्रान्तिकारियों ने जो खजाना लूटा था, उसकी कीमत मात्र 4,600 रुपये थी, जबकि इन क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार करने में अंग्रेजों ने दस लाख रुपये लगा दिये। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल तथा ठाकुर रोशन सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को जेल में बन्द किया गया
और फांसी की सजा दी गई। जिस दिन इन क्रान्तिकारियों को फांसी की सजा होनी थी, उससे दो दिन पूर्व ही उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। इन क्रान्तिकारियों से अंतिम इच्छा पूछी गई, उन्होंने बताया कि उनकी अंतिम इच्छा यही है कि हर बार इस भारतवर्ष में उनका जन्म हो और उनकी मृत्यु का कारण देशोपकारक कर्म हो।
उन्होंने कहा कि शिकागो की धर्म सभा में सन् 1893 में स्वामी विवेकानन्द ने इतिहास रचा था। धर्म सभा में उन्होंने यह नहीं कहा कि वह किस जाति से हैं। उन्होंने पंथ और संप्रदाय की बात भी नहीं की। उन्होंने कहा था कि ‘गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं।’ उनका यह उद्घोष आज भी भारत को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करता है। जब हम नेपाल जाते हैं, तो हिन्दू का यह भाव तोड़ता नहीं, बल्कि जोड़ता है। यह देश इसलिए कमजोर हुआ, क्योंकि जातिवाद ने समाज की नींव को कमजोर कर दिया। जातिवाद की राजनीति भारत की नींव को कमजोर कर रही है। बांटने की यह राजनीति हम सभी को गुलामी की ओर ढकेल रही है, जिससे बचने के लिए आज हम सभी को एकता के भाव के साथ आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने कहा कि जौहर स्मृति संस्थान और यहां के स्थानीय जनप्रतिनिधि ने अपने पूर्वजों की स्मृतियों को नमन करने के लिए सर्वसमाज के इस कार्यक्रम का आयोजन किया है। महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियां ‘मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का, पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।’ इस संबंध में अत्यंत प्रासंगिक हैं। जिनको कुछ नहीं करना होता है, वह जातिवाद के आधार पर सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने का कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत का प्राचीन वैभव हमेशा हम सभी को आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। वैदिक कालीन भारत आदर्श भारत था। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित था। यहां का अन्नदाता किसान, उत्पादक, कारीगर उद्यमी तथा व्यापारी राष्ट्र को जोड़ने का सेतु था। ग्राम स्वराज्य हमारी पहचान थी। माल, उत्पादन, आमदनी गाँव की ही थी तथा गांव एक आत्मनिर्भर इकाई था। जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी आत्मनिर्भर और विकसित भारत की बात करते हैं, इसकी आधारभूत इकाई हमारी ग्राम पंचायतें व कस्बे हैं। गांव और शहर जब आत्मनिर्भर होंगे, तब आत्मनिर्भर भारत बनेगा।
उन्होंने कहा कि कि जो लोग जातिवाद के आधार पर समाज को बांट रहे हैं तथा अफवाह के आधार पर देश में विश्वास का संकट खड़ा कर रहे हैं, वही लोग राम, कृष्ण एवं राम सेतु के आस्तित्व को नकारते थे तथा श्रीराम मंदिर के विरुद्ध एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। यह लोग भारत की संवैधानिक संस्थाओं को भी कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वयं के आस्तित्व पर संकट होने के कारण यह लोग देश के आस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहे है। आज का दिन हम सभी के लिए संकल्प का दिवस होना चाहिए। हमारे मन में वह संकल्प होना चाहिए, जो सैकड़ों वर्षों से इस वीर भूमि ने हम सभी को दिया है।
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में जौहर भूमि को नमन कर माँ कालिका के दर्शन किए, तो वह अभिभूत थे तथा उनकी भाषा अवरुद्ध थी। उस समय श्याम नारायण पांडेय की पंक्तियां ‘यह एकलिंग का आसन है, इस पर न किसी का शासन है, नित सिहक रहा कमलासन है, यह सिंहासन सिंहासन है’ याद आ रही थीं।



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