Sunday, July 5, 2026

विश्व का तेजोवलय

    


प्रश्न यह है कि मैं हिंदू क्यों हूं. वास्तव में मैं हिंदू क्यों हूं, क्योंकि मैंने हिंदू के रूप में जन्म लिया है. मैं एक हिंदू हूं, जिसे हिंदू होने में सुख का अनुभव होता है. स्वामी विवेकानंद के शब्दों में ’ मैं हिंदू हूं, जिसे अपने हिन्दुत्व पर गर्व है.’

एक बात मुझे स्पष्ट कर देनी चाहिए कि साधारण तौर पर धर्म का जो अर्थ लिया जाता है, वह हिंदू धर्म के लिए लागू नहीं होता है. यह धर्म है जीवन की एक पद्धति, जो संपूर्ण जीवन को दृष्टिगत रखता है.

हिंदू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है. हिंदू धर्म न तो किसी पुस्तक से जुड़ा है और न किसी एक धर्म प्रवर्तक से, जो कालगति के साथ असंगत हो सकते हैं. हिंदू धर्म का स्वरूप हिंदू समाज द्वारा निर्मित होता है. और यही कारण है कि यह धर्म युग-युगांतर में सर्वधित और पुष्पित होता आ रहा है. यद्यपि हिंदू धर्म सर्वाधिक प्राचीन है, फिर भी इसमें समय-समय पर देवताओं और धर्मशास्त्रों का उदय होता रहा है. वैदिक देवताओं का स्थान पौराणिक देवों ने प्राचीन काल में ही ले लिया था. वेदों का उपवृंहण पुराणों ने किया है. इस प्रकार हिंदू धर्म ऐसा जीवन  धर्म है, जो धार्मिक अनुभवों की वृद्धि और उसके आचरण की चेतना के साथ निरंतर विकास करता रहता है.

हिंदू धर्म की इस लोकप्रिय प्रकृति का ही एक परिणाम है कि यह सभी प्रकार की रुचियों और आध्यात्मिकता के सभी स्तरों की तुष्टि में सक्षम है. कोई भी व्यक्ति चाहे, वह एक ईश्वर में विश्वास करता हो, सहस्रों देवताओं को मानता हो या ईश्वर में उसकी आस्था ही न हो, उसे हिंदू धर्म में आध्यात्मिक समर्थन और अनुपोषण प्राप्त होता रहता है.

हिंदू धर्म कोई मतवादी धर्म नहीं है, जिसमें कुछ बातों पर, भले ही वे अविश्वसनीय हों, आस्था रखना अनिवार्य हो अन्यथा धर्म छोड़ना पड़े. हिंदू धर्म में कोई धर्म विद्रोही नहीं होते. नये मंत्रदृष्टा या गुरु हो सकते हैं.

मुझे प्रभावित करने वाले इस धर्म की दूसरी विशेषता है इसकी वैज्ञानिक प्रकृति. अन्यान्य धर्मों की तुलना में हिंदू धर्म आधुनिक विज्ञान की चुनौती पर अधिक सक्षमता से खरा उतरा है. इसका सीधा कारण यह है कि यदि कोई बात तथ्यों के विपरीत पाई जाती है, तो उसे बिना विवाद किए ही त्याग दिया जाता है. इस प्रकार हिंदू धर्म निरंतर ताजा और अद्यावधि बना रहता है. पश्चिम में 500 वर्ष पूर्व एक बार धर्म-सुधार हुआ था, किंतु हमारे यहां तो नित्य सुधार होता है.  
हिंदू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ होता है और न अंत ही.  यह एक आनंद चक्र है. हिंदू धर्म मानव को आश्वस्त करता है कि मृत्यु के बाद भी जीवन रहता है. और व्यक्ति जब तक पूर्णता प्राप्त नहीं कर लेता, उसे विकास का अवसर मिलना असंभव है.

हिंदू धर्म को सनातन धर्म कहा गया है. शब्दश: यह वास्तविक है, क्योंकि यह प्राकृतिक धर्म है. यह प्रकृति के अनुकूल है और सूर्य, चंद्र, जल, पृथ्वी, पर्वत, नक्षत्र, अंतरिक्ष और वस्तुत: उन सबके पीछे विद्यमान उनकी आत्मा और शक्ति पर उसका दर्शन और व्यवहार आश्रित है. इसी कारण हिंदू धर्म प्रकृति और मानव अस्तित्व के साथ समसामयिक बना रहता आया है.  यह विकास करता हुआ और समय के साथ सामंजस्य स्थापित करता हुआ, बिना धूमिल हुए आगे बढ़ता रह सकेगा. 

इस सबसे भी महत्व की बात यह है कि हिंदू धर्म सौंदर्यनुभूति और भावनात्मक दोनों ही दृष्टि से अत्यंत संतोषप्रद है. इसका कर्मकांड बहुरंगी है, जो हृदय को त्वरित शुद्ध बनाता है और उसे उच्चतर स्तर पर पहुंचा देता है. इसका धार्मिक प्राचीन साहित्य उतना ही समुद्ध है, जितना कि वह ज्ञानप्रद और आनंददायी है. वास्तव में, हिंदू धर्म भगवतप्राप्ति की मानव-आकांक्षा हेतु एक परमानंददायक दीर्घ संगीत है.  ऐसा यह धर्म विश्व के लिए गौरवमय तेजोवलय है. यही कारण है कि हिंदुस्तान की वर्तमान दुखद स्थिति में भी हिंदू धर्म विश्व के सर्वाधिक बुद्धिमान लोगों में से अनेक को आकर्षित करता है.

धार्मिक चीनवासियों का यह विश्वास अकारण ही नहीं है कि उनमें से जो अच्छी तरह जीवन बिताएंगे, वे मरने के बाद निर्वाण प्राप्त होने तक भारत में बार-बार जन्म लेते रहेंगे.
हिंदू होकर जन्म लेना संतोषप्रद भी है और एक चुनौती भी.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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