उर्दू और फ़ारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर 13 दिसंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उर्दू के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में हूं. मुझे बोलने के लिए सिर्फ़ दस मिनट दिए गए हैं. ’उम्रे-दराज मांग कर लाए थे.’ कुल दस मिनट हैं. हम राजनेता बोलते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते. फिर मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में बोलना. मैं उर्दूदां नहीं हूं. लेकिन मिर्ज़ा साहब को मैंने पढ़ा है. वे विश्व के महाकवियों में से एक हैं. उर्दू और फ़ारसी में उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह विश्व साहित्य की एक धरोहर है. मैं उनके बारे में क्या कहूं ? जब मैं तकरीर की तैयारी कर रहा था और किताबें इधर-उधर फैली थीं, तो उनके एक शेर पर मेरी नजर पड़ी.
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ?
मैं नहीं जानता कि यह शेर किस संदर्भ में कहा गया. लेकिन यह उन्हीं का शेर है. ग़ालिब कौन ? इसके जवाब में लंबी-चौड़ी तकरीरें की जा सकती हैं. किताबें लिखी गई हैं, शोध हुए हैं. और यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा.
मिर्ज़ा ग़ालिब एक बड़े योद्धा वंश के वंशधर थे. फ़ारसी के अप्रतिम विद्वान. मुगल साम्राज्य के इतिहास मंल अपने समय के प्रतिष्ठित स्वाभिमानी नागरिक. फ़ारसी और उर्दू के महान कवि या फिर मध्यकाल और आधुनिक काल की युग-संधि पर खड़े हुए एक संवेदनशील व्यक्ति. दो सौ साल पुरानी बात है. मुगल साम्राज्य खत्म हो रहा था, मगर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. अंग्रेज हमारे मुल्क में पांव जमाने में लगे थे, मगर पूरी तरह पांव जमे नहीं थे. एक संक्रमण का काल था. अब उस संक्रमण के काल में मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा- उन्होंने अपनी पीड़ा के बारे में लिखा. लेकिन सार्वजनिक पीड़ा भी उनकी वाणी में अभिव्यक्त हुई. खुद अपने बारे में उन्होंने लिखा था-
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वह बहुत अच्छा है, मगर बदनाम बहुत है
किस बांकपन से अपने को बदनाम करने वालों को निरुत्तर करते हुए उन्होंने अच्छे शायर के रूप में सर्वविदित होने का दावा किया है. इसी क्रम को बढ़ाया जाए, तो उन्हीं के शब्दों में कहा जा सकता है कि उनकी खास विशेषता अंदाजे-बयां या वर्णन का उनका अदभुत तेवर है-
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और
इस शेर में उन्होंने अपने को बहुत अच्छा सुखनवर कहते हुए, सुखनवर कवि और काव्यमर्मज्ञ दोनों का समावेश किया है. अपनी खासियत अंदाजे-बयां को बताया है, जो और शायरों से बहुत भिन्न है. मरने के बाद उनके किस गुण को याद करके उनके मित्र सिर धुनेंगे. इस सवाल का जवाब भी ग़ालिब खुद दे गए हैं-
क्या बयां करके रोएंगे मेरे यार
मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी
साफ है कि ग़ालिब को दूसरों को विकल बनाने की अपनी जो क्षमता थी, उस पर भरोसा था. उस समय काव्य के विषय सीमित थे. ग़ालिब बड़ी पृष्ठभूमि में लिखना चाहते थे. व्यापक और विस्तृत उनका परिवेश था. लेकिन सबमें बात कहने की उनकी जो वक्रता है, वो उनको सब शायरों से अलग कर देती है. उनकी कविता से यह बात साफ झलकती है कि मध्य युग से जुड़े होते हुए भी वे आधुनिकता की ओर मुड़ना चाहते थे-
बकद्रे-शौक नहीं दर से तंग ना एक गजल
कुछ और चाहिए बुसत मेरे बयां के भी हैं
कुछ और चाहिए. यह स्पष्ट है कि ग़ालिब जिन भावों को अपने काव्यों में लाना चाहते थे, वे तत्कालीन काव्य के दायरे में नहीं समा पा रहे थे. अतत: वे काव्य के क्षेत्र के और विस्तार के पक्ष में थे.
ग़ालिब मुख्यत: इंसानी रिश्तों के कवि थे. अपने जीवन की सार्थकता और विफलता, दोनों के लिए ही वे इश्क को जिम्मेदार मानते थे. उनका सुप्रसिद्ध शेर है-
इश्क से तबीयत से जिस्त मजा पाया
दर्द की दवा पाई और दर्द बेदवा पाया
उन्हें जीवन का आनंद प्रेम से ही मिला था, जो एक ही साथ उनके सभी दर्दों की दवा भी था और ऐसा दर्द भी था, जिसकी कोई दवा नहीं थी. कोई पूछ सकता है कि अगर यह दर्द बेदवा है, तो फिर इसे पालने की जरूरत क्या है ? ग़ालिब का मासूम उत्तर है-
इश्क पर जोर नहीं है, ये वो आतिश है ग़ालिब
कि लगाए न लगे, बुझाए न बुझे
मगर उन्होंने आगे यह भी कहा-
इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना वो (हम) भी आदमी थे काम के
मैंने थोड़ा-सा बदल दिया है. हम की जगह वो. लेकिन मैं इतना कहना चाहूंगा कि उस युग के बहुत से काम के आदमी न जाने किधर बिला गए. पर प्रेम प्रकाश में प्रदीप्त ग़ालिब आज भी असंख्य लोगों के हृदय के हार बने हुए हैं. उन लोगों को लगता है कि ग़ालिब ने उन लोगों के दिल की बात कितने अच्छे ढंग से कितनी खूबसूरती से पेश की है. दुख में, सुख में, प्रेम के उल्लास में, प्रेमी की हताशा में, निराशा में ग़ालिब की पंक्तियों को दोहराकर लोग सुकून पाते हैं. ग़ालिब अपनी संभावना को समझ गए थे और उन्होंने इस बात को कहा भी था.
कवि की सबसे बड़ी सार्थकता यह है कि आम आदमी उसके साथ अपने को जोड़ सके और यह समझ सके कि उसके दिल का दर्द कहीं आवाज पा रहा है. किसी और के हृदय को झनझना रहा है. ग़ालिब की प्रेमानुभूति, इश्कमिजाजी और इश्क हकीकी के दोनों छोरों से जुड़ी हुई है, लेकिन मानवता को समर्पित है. उस युग के कवियों का एक तीसरा पहलू बड़ी मुश्किल से मिलता है.
इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत मेरी शोहरत ही सही
कता कीजे न ताल्लुक हमसे
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही
यह सियासत पर बहुत फिट बैठता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)




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