महाराष्ट्र के पुणे में 1982 में आयोजित गीत रामायण के शातकोत्तर रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गीत रामायण पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- आज चैत्र सुदी का पवित्र और ऐतिहासिक प्रसंग है. नये संवत्सर का प्रारंभ हो रहा है. हमारी आंखों के सामने अतीत का एक चित्र उपस्थित होता है. परकीयों का पराभव करके राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय गौरव की स्थापना करने वाले महापुरुष हमें प्रेरणा देने के लिए वर्ष प्रतिपदा के मुहूर्त पर हमारी स्मृति के आकाश में ज्वलंत नक्षत्र के रूप में चमकते हैं. इस अवसर पर पुणे की नगरी में गीत रामायण का रजत महोत्सव एक महत्वपूर्ण घटना है. यह हमारे सांस्कृतिक जीवन में एक मील का पत्थर है. रामकथा हजारों वर्षॊं से लोकमानस को आंदोलित और आप्लावित करती रही है. नवरसों का यह प्रवाह कभी न समाप्त होने वाला प्रवाह है, अनंत है, अगाध है.
किसी काल में कोई कवि किसी रंग को गाढ़ा या प्रगाढ़ कर देता था. किसी युग में कोई लेखक किसी रस को अधिक उभार कर रख देता था. कभी महाकाव्य के रूप में, कभी प्रबंधकाव्य के रूप में, कभी खंडकाव्य के रूप में. रामकथा इस देश की सभी दिशाओं में, सभी भाषाओं में, मानवजीवन की सभी आशाओं में, निराशाओं में, जयों में-पराजयों में हमारा संबल बनकर, हमारा पाथेय बनकर, संकट के समय संजीवनी बनकर, आनंद के समय इस आनंद को भौतिक धरातल से उठाकर आध्यात्मिकता की चोटी तक पहुंचाने का काम करती रही है. विदेशों के बाहर भी रामकथा प्रचलित है, प्रवाहित है, अलंकृत है. हमारे सभी पड़ोसी देश भी किसी न किसी रूप में रामकथा से परिचित हैं, उसका अभिनय करते हैं.
जहां परिस्थितियों के परिवर्तन के कारण इस्लाम का पदार्पण हुआ, वहां भी प्राचीन संस्कृति के एक अनमोल अंग के रूप में रामायण जानी जाती है. बर्मा की राजधानी रंगून में मुझे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने रामकथा के उस भाग को प्रस्तुत किया था, जहां सोने का मृग सीता का मन मोह कर चला गया और राम को पत्नी से हाथ धोना पड़ा. बर्मी भारतीय नहीं हैं, किंतु बर्मा के लोकमानस में रामायण की छाप है. इंडोनेशिया में एक महीने तक रामायण का अभिनय होता है. रामायण वहां की सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग है. लाओस में रामायण प्रचलित है. थाइलैंड में, कंबोडिया में में श्रीलंका के बारे में तो इतने निश्चय के साथ नहीं कह सकता, क्योंकि हम जो श्रीलंका समझते हैं, वह आज की श्रीलंका नहीं है. अभी उसकी खोज होनी बाकी है. हो सकता है वह सागर के तल में लुप्त हो गई हो या हो सकता है, हमारे भूतल कर कहीं अदृश्य हो गई हो. अनुसंधान हो रहा है. पुरातत्वेत्ता खोज कर रहे हैं. ये प्रयत्न चलते रहना चाहिए.
रामायण हमारे लिए एक महान भारत का चित्र उपस्थित करती है. राम अयोध्या में जन्मे. अयोध्या उत्तर में है. राम जनकपुर में विवाह के लिए गए थे. जनकपुरी मिथिला में है. मिथिला बिहार में है. भरत जी जब अपनी ननिहाल गए थे, तो कैकेय देश गए थे. कैकेय देश अब अफगानिस्तान के रूप में विद्यमान है. इस प्रकार के संकेत मिलते हैं और इसलिए जब भरत और शत्रुघ्न कैकेय देश गए, तो आज का हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जो पंजाब हमारा भाग नहीं है, उसकी सीमा को पार करके गए. ये तब हमारे भूखंड के भाग थे. सारा उत्तरी भाग इस रूप में हमारे सामने आ जाता है, लेकिन दक्षिण भी छूटा नहीं है. राम को वनवास मिला. तब वन केवल दक्षिण में नहीं, उत्तर में भी थे. हिमालय के जंगलों में वे जा सकते थे, कश्मीर की यात्रा कर सकते थे. वहां गर्मी भी कम पड़ती है, प्रकृति का रूप भी बड़ा मनोहारी होता है. केदारनाथ नहीं गए, बद्रीनाथ नहीं गए, यद्यपि उनका वर्णन किया गया है. राम का वर्णन किया गया है, जिसमें कहा गया है कि वे हिमालय के समान जड़ और समुद्र के समान गंभीर थे, फिर भी वन-गमन के लिए उन्होंने दक्षिण चुना. चित्रकूट, पंचवटी, किष्किंधा, फिर पंचासर और रामेश्वर-सारा भारत मानो अपनी भुजाओं में भर लिया. सारी मेदिनी मानो अपने पुरुषार्थ से जीत ली.
दक्षिण में उस समय अनेक राज्य थे. केंद्रीय सत्ता दुर्बल हो गई थी. राष्ट्रीय शक्ति प्रचंड नहीं थी. समाज में संभ्रम था. ब्रह्मतेज और क्षात्रतेज एक दूसरे के पूरक हैं, जिनका जन्म और जाति से कोई संबंध नहीं है, जो कर्म पर और तप पर आधारित थे, वे अलग-अलग थे. यहां तक कि विश्वामित्र और वशिष्ठ में भी मतभेद था. लेकिन जब शाश्वत जीवन मूल्यों पर संकट आया, जब अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हुआ, जिस विशिष्ट प्रणाली के लिए हम संसार में अस्तित्व में आए थे, जब वह खतरे में पड़ गई, तो फिर विश्वामित्र-वशिष्ठ एक हुए. महराजा दशरथ से उनके पुत्रों को गुरु वशिष्ठ मांग लाए. लड़ने के लिए बेटों को मांग लाए. दशरथ पिता थे, अंत: करण वात्सल्य से परिपूर्ण था. कहने लगे, "मैं अपनी फौज दे सकता हूं, बेटे मत ले जाओ." मगर जब देश पर संकट होगा, तब बेटों की पुकार होगी और पिताओं को, माताओं को अपने बेटे दान करने पड़ेंगे. और वे राम-लक्ष्मण को लेकर चले गए.
ऋषि तपोवन में थे, संस्कार भूमि चलाते थे, मानव तैयार करते थे, राजसत्ता से पृथक धर्म के आधार पर समाज की धारणा को बदलने के लिए यज्ञ करते थे. मगर राक्षस नहीं चाहते थे कि यज्ञ सफल हो. वे नहीं चाहते थे- निर्माण चले, वे नहीं चाहते थे कि संस्कारों की शृंख्ला आगे बढ़े. इसलिए यज्ञों का ध्वंस किया जाता था, तपोवन नष्ट किए जाते थे. राम-लक्ष्मण ने यज्ञों की रक्षा की, लेकिन अगर केवल यज्ञों की रक्षा के लिए विश्वामित्र उन्हें लाए होते, तो फिर अयोध्या वापस ले जाते, जनकपुरी ले जाने की जरूरत नहीं थी. वहां तो विवाह हो रहा था. विश्वामित्र को इसकी चिंता क्यों हुई कि अयोध्या और मिथिला का संबंध होना चाहिए, साथ होना चाहिए. लेकिन इसमें भी ऋषि की एक दूरदृष्टि थी. पृथ्वी कन्या के रूप में जानकी जनक की गोद में आई. राम की अर्द्धांगिनी बनी और फिर राज्याभिषेक का प्रसंग- उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है.
राम पुत्र थे, भाई थे, सखा थे, पति थे, युवराज थे- अलग अलग कर्तव्यों में बंधे थे. पुत्र के नाते उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया. अगर वह चाहते, तो राजगद्दी पर बैठने के लिए कुछ बहाना निकाल सकते थे. दशरथ जी ने उनसे आग्रह भी किया था कि तुम मत जाओ. कौशल्या भी नहीं चाहती थी कि वह वन जाएं. राम कानून का भी सहारा ले सकते थे. राजा दशरथ ने उन्हें राज्याभिषेक करने का निर्णय सबकी सहमति से किया था. राम कह सकते थे कि आप अपना निर्णय बदल रहे हैं, इसलिए सारा मामला लोकसभा को रेफर बैक करना चाहिए. ऐसा उन्होंने नहीं किया. वन गमन के लिए तैयार हो गए. पुत्र के आचरण का एक आदर्श रखा. भाई थे- सौतेले भाई. कैकेयी ने सारा प्रबंध किया था- अपने पुत्र की राज्य प्राप्ति के लिए. मां की ममता समझ में आ सकती है. अनर्थ करा सकती है. मैं कैकेयी को दोष नहीं दूंगा. मगर कैकेयी चतुर भी थी. उसने केवल पुत्र के लिए राज्य नहीं मांगा. मगर भरत का वह राज्य मजबूत न होता, इसलिए राम के लिए 14 वर्षों का वनवास भी मांगा. अगर राम अयोध्या में रहेंगे, राज्य से वंचित रहेंगे, उनका अधिकार छीन लिया जाएगा- प्रजा देखेगी- विद्रोह की अग्नि सुलग सकती है, इसलिए उन्हें अयोध्या से दूर भेजो- राजधानी से परे फेंको. लोगों की स्मृति कमजोर होती है, भूल जाएंगे लोग 14 साल में. तब तक भरत का राज्य मजबूत हो जाएगा और मैं राजमाता के रूप में अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो जाऊंगी. लेकिन भरत ने सारा खेल बिगाड़ दिया. भरत जैसा भाई, उसने गद्दी नहीं ली. जो कुछ मां को कहा, शायद हृदय पर पत्थर रखकर कहा होगा. वह संभाषण पढ़ने लायक है. गीत रामयाण में भी एक गीत है- सुधीर फड़के के कंठ से सुनिए- ’माता नहीं, तू वैरिणी.’ माडगुलकर जी ने उस चित्र को सजीव कर दिया है. अब कैकेयी की कहां चलती थी? जिस भरत के लिए सब कुछ किया जा रहा था, वह भरत भी रामभक्त था. ऐसा भाइयों के प्रति स्नेह. सुमित्रा राजनीति में काफी निष्पात मालूम होती है. राजा राम हो या राजा भरत हो, एक बेटा राम के साथ है, दूसरा बेटा भरत के साथ है. आवश्यक नहीं है- यह सोच समझ कर किया होगा. मगर राजनीति में रहते-रहते मेरी दृष्टि से ऐसा दोष हो सकता है और जोड़ी अमर हो गई- राम-लक्ष्मण की, भरत और शत्रुघ्न की.
राम वन में चले गए. चाहते तो लड़कर राज्य ले सकते थे. लेकिन उन्होंने भी इधर अयोध्या में रहना ठीक नहीं समझा. "न भीतो मरणादस्मि, केवल दूषितों यश:" मुझे मृत्यु की चिंता नहीं है, आवश्यकता पड़े, तो मृत्यु का हंसते-हंसते आलिंगन करूंगा. अगर डर है, तो एक ही बात का कि मेरा नाम बदनाम न हो जाए. राजा के लिए इससे बढ़कर और बंधन कौन सा हो सकता है ? वे लोकोपवाद से बचते हुए- लोग बुरा न कहें- आलोचना न हो, निंदा का शिकार न हो जाऊं. इसलिए राजपाट छोड़कर वन चले गए. वन में मुसीबतों में फंसे. इस पर भी एक बड़ा सुंदर गीत है- कौन मुसीबत में नहीं फंसता ? मानव के किस पुत्र पर विपत्ति नहीं आती है ? गीत आप सुनेंगे. माडगुलकर जी ने उस गीत में ऐसा रस भरा है, कि आप अगर डूबें, तो पार हो जाएं और पार हो जाएं, तो डूब जाएं. मगर भगवान राम जंगलों में पशु- पक्षियों से, पेड़ों से "सीता कहां है, सीता कहां है ?" पूछते रहे. हमारे जैसा मनुष्य, मगर एक मर्यादा - और मन में एक वज्र संकल्प है और इसलिए वे जहां पहुंचे, वहां लोगों को इकट्ठा किया. संदेश भेजकर भरत से सेना नहीं मंगाई. भरत तो उनकी पादुकाएं रखकर राज चला रहे थे. उनको एक संदेश भेज देते- पत्नी चली गई है, फौज लेकर चले आना. तब राम क्या मुंह दिखाते ? आयोध्या वालों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता ? पत्नी चली गई देखते-देखते, रक्षा नहीं कर सके. इसलिए अपने भुजबल से- अपने बाहुबल से- अपने पुरुषार्थ से- अपने प्रयत्नों से- लोकसंग्रह से- जनजातियों के संगठन से, फिर से प्राप्त करेंगे- खोयी हुई ’श्री’ को. यह निश्चय मन में जगाया.
जब बाली का वध हुआ, तो बाली ने कहा, " हे राम, आप मेरे पास क्यों नहीं आए ? मैं रावण को ठीक कर देता. तुम्हारी पत्नी को मैं वापस लाकर देता. सुग्रीव के पास क्यों गए ? रावण से सभी आतंकित हैं, रावण मुझसे आतंकित है. मैं रावण को ठीक करने की शक्ति रखता था. मगर बाली भूल गया. राम जानते थे, अगर याचक बनकर बाली के दरबार में जाते तो, राम की स्थिति क्या होती ? प्रतिष्ठा कहां जाती ? जिनके हितसंबंधों के लिए मैत्री नहीं हो सकती वह सुग्रीव राज्यवंचित था, पीड़ित था. सुग्रीव को मित्र चाहिए थे और राम को ऐसे मित्र की तलाश थी. और बाली सीता को छुड़ाकर ले आता, तो भगवान राम की क्या तारीफ होती ? ला सकता था बाली. बाली क्या, अगर चाहते तो हनुमान जी भी सीता को छुड़ाकर ला सकते थे. खुद लंका गए थे सीतामाई का संदेश लेने को और लंका को जला दिया. और अगर हनुमान पहाड़ उठाकर कंधे पर ले जा सकते हैं, तो जानकी जी को भी कंधे पर उठा कर लंका से ला सकते थे. लंका पर चढ़ाई की आवश्यकता ही न पड़ती. मगर राम ने कहा था, "सीता का संदेश लाना." वापस लाने का सवाल नहीं है. उद्देश्य केवल पत्नी को प्राप्त करना नहीं था. बाली और रावण के स्थान पर ऐसी सत्ता को प्रोत्साहित करना था, जो हमारे जीवन मूल्यों से न टकराती हो. जो शत्रुत्व का पालन न करती हो, जो हमारे साथ मिलकर चलती हो. जिसके साथ हमारी संगति बैठती हो. जो मित्रशक्ति होती और जो भारत की समग्रता में अपनी पूर्णता समझती हो और इसीलिए बाली का वध किया. वह प्रसंग भी पढ़ने लायक है- रामायण का.
ये विचार अपने मन से निकाल दीजिए कि हनुमान जी बंदर थे. मूर्तियां ऐसी बनी हैं, चित्र ऐसे बने हैं, लेकिन सचमुच में वे हमारे जैसे मनुष्य थे. उनकी पूंछ नहीं थी, वे कमर में रस्सा बांधते थे और रस्से का थोड़ा हिस्सा लटका रहता था, जो आगे जाकर पूंछ के रूप में चित्रित होने लगा. भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा, "सुनो ! कितना हनुमान शुद्ध संस्कृत बोल रहे हैं, व्याकरण की एक भी गलती नहीं है. अब वानर कितने भी चतुर हों, अगर वे सचमुच वानर हैं, तो ऐसा नहीं कर सकते. वह एक विशेष जाति थी, जनजाति थी. भगवान राम का संदेश लेकर जब हनुमान जी गए, तो वाल्मीकि रामायण में प्रसंग है कि उन्होंने सीता से संस्कृत में बात नहीं की- क्योंकि संस्कृत रावण भी जानता था, कुछ राक्षस भी संस्कृत जानते थे- तो मैथिली भाषा में बात की होगी. तब वह मैथिली कैसे जानते थे ? वे ’बुद्धिमतां वरिष्ठम’- बुद्धिमान थे.
इसलिए जब बाली का वध हुआ, तो बाली ने बहुत सुनाई राम को. "मुझे छुपकर मारा, पेड़ों की ओट लेकर मारा." और फिर कहा, इसका मैंने ऊपर पहले उल्लेख किया है कि, "मुझे मारने की क्या जरूरत थी ? मैं सीता को वापस लाकर दे सकता था." प्रभु राम ने उत्तर दिया. "जो जानवर है, उसको मारने में क्या आपत्ति है ? शिकारी पेड़ से छुपकर ही मारते हैं युद्ध में सब कुछ ठीक है." मगर बाली समझ गया था कि उसका अंत आ गया है. और बाद में बाली को चिंता हुई कि किसी तरह अंगद का अधिकार बन जाए और वह बच गया. बाली के बाद सुग्रीव. प्रभु राम ने अपना कोई सूबेदार नहीं बिठाया. अयोध्या से बुला सकते थे, "आओ भरत तुम्हें बाली का राज्य दे रहे हैं." राज्य जीतना- उद्देश्य नहीं था. विस्तारवाद की आकांक्षा नहीं थी. अधिकार क्षेत्र की वृद्धि का कोई इरादा नहीं था. मगर सत्ता ऐसी होनी चाहिए, जो हमारे जीवन मूल्यों के साथ बंधी हो, जो हमारी जीवन पद्धति के विकास में योग दे. और सुग्रीव ऐसा करने के लिए तैयार थे. इसी तरह विभीषण का राज्याभिषेक हुआ. लंका का राज्य विभीषण को सौंप दिया. अपने कब्जे में लंका को नहीं रखा.
ये सारी बातें रामकथा को एक ऐसा रूप प्रदान करती है, जो अनूठा है- अनुपम है. इसलिए राम अवतार भी है. राम हमारे जीवन में बस गए. सोते, बैठते, उठते, जागते हम राम का नाम लेते हं. "राम राम पाहुणे". नमस्कार का स्थान ले लिया राम ने. किसी देश में ऐसा राम, जीवन में राम, मरण में राम, अंतिम समय में राम और आज भी ’आयाराम और गया राम.’ अब तो लियाराम और दियाराम भी है. राम नाम लोकमानस पर छा गया है. हमारे भाव जगत को उद्वेलित करने वाले राम, मगर एक आदर्श रखने वाले- ज्ञान देते राम. सीताजी पवित्र हैं उनके मन में कभी संदेह नहीं था. रावण की क्या हिम्मत थी, क्या साहस था- उस अग्निशिखा पर आंखें डाल सकता. लेकिन राजा थे, लोकनायक थे. पराये घर में रही हुई नारी के बारे में ’सौ मुंह हजार बातें.’ इसलिए सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. अग्नि परीक्षा सती को ही देनी पड़ती है- वेश्या को नहीं देनी पड़ती. सीताजी के मन में भी कोई संदेह नहीं था. मैं सब कुछ छोड़ सकता हूं- "स्नेहं, दयांच, सौख्यंच, यदि वा जानकी मपि. आराधनाय लोकानाम मुश्चतो नास्ति." आराधनाय लोकानाम’-प्रजा की आराधना के लिए- लोकरंजन के लिए. राजा का अर्थ ’जो रंजन करे.’ और राम ने सीता को छोड़ा. हमारी पढ़े-लिखी बहनें कहती हैं, "सीता के साथ अन्याय हुआ." सचमुच में अन्याय हुआ, मगर अन्याय किया पति राम ने, किन्तु न्याय किया राजा राम ने. पत्नी के साथ अन्याय हुआ, परंतु प्रजा के साथ न्याय हुआ. आज तो यह ’आदर्श’ की बात दिखाई देती है. कौन इस तक पहुंच सकता है ? किंतु एक मर्यादा, आचरण का एक मानदंड, एक लक्ष्मण रेखा- व्यवहार की एक कसौटी. लोग प्रयत्न करें, आगे बढ़ें, वहां तक पहुंचे. वह आदर्श जो ध्रुव तारे की तरह चमक रहा है. वह केवल आदर्श नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में आ चुका है, ऐसा आदर्श.
फिर लव-कुश का जन्म और फिर रामायण के गीत और फिर ’गीत-रामायण’. माडगुलकर जी ने अयोध्या से प्रारंभ नहीं किया. राम जन्म से प्रारंभ नहीं किया. लव-कुश खड़े हो गए- ’रामायण गाते’- रामायण गा रहे हैं. 56 गीत. मैंने आज दोपहर में सुधीर जी से पूछा कि, "भाई ये 56 क्यों ? वर्ष में सप्ताह तो 52 होते हैं, फिर ये चार अतिरिक्त गीत कहां से आए?" तो कहने लगे, जिस वर्ष में उन्होंने गीत लिखे थे, उसमें एक अधिक मास था. तो इसलिए 56 गीत लिखने पड़े." जैसे आज वर्ष प्रतिपदा है और राम नवमी तक ये समारोह चलेगा. एक दिन का लोप है, मगर आठ गुने सात=छप्पन. उस समय एक महीना बढ़ गया, इस समय एक महीना- एक दिन घट गया. अब महर्षि वाल्मीकि की तरह माडगुलकर जी को तमसा के तीर रहने का मौका नहीं मिला. मिलेगा तो पूरा समय देने पर सब कामधाम छोड़ देना पड़ेगा. जीवन, व्यापार में लगा है- उदर भरण में लगा है- संसार में लगा है. मगर रामकथा का बीज भावों के जगत में- संस्कारों के रूप में- हृदय में पड़ा हुआ है. वह पुष्पित हो रहा है, पल्लवित हो रहा है. दिन भर की दौड़ में धूप में उसे खाद मिल रहा है, उसे पानी मिल रहा है. कभी गुनगुना रहा है, कभी सपने देख रहा है, कभी सुर में सुर बांध रहा है, शब्द से शब्द जोड़ रहा है. और किसी ने ठीक ही कहा कि ’गीत रामायण’ ’केलेंलं नाहीं-झालेंल. गीत रामायण गढ़ा नहीं- गीत रामायण यूं ही बन गई है. ’वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’. ’राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए-सहज संभाव्य है.’
’गीत रामायण’ भारतीय साहित्य की धरोहर है, अनमोल निधि है. आकाशवाणी ने उसे घर-घर तक पहुंचाया है और कानों के रास्ते वह हृदय में उतर आई है. केवल मराठी में नहीं, भारत की अन्य भाषाओं में भी उसका रूपान्तर हुआ है. ’रामकथा’ जैसा उदात्त विषय, माडगुलकर जैसा रससिद्ध कवि और सुधीर फडके जैसा कुशल गायक. ये त्रिवेणी जहां मिल गई, वहां फिर तन और मन पवित्र हो जाएंगे, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है. रजत जयंती समारोह है- पच्चीस वर्ष हो गए. माडगुलकर जी हमारे बीच में नहीं हैं. नागपुर में मुझे उनके दर्शन का सौभाग्य मिला था. भारतीय जनसंघ का अधिवेशन था- कवि सम्मेलन का आयोजन था. अध्यक्ष स्थान पर वे विराजमान थे. बाद में उनके लेख पढ़े. और उनके गीत आज हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, मन पर संस्कार डालते हैं. संगीत में भीगे हुए-पगे हुए. इसलिए सुलभ-सहज हैं, जब तस्वीर का एक पहलू पेश करते हैं, तो पूरी तस्वीर सामने आ जाती है. राम का चरित- यह हमारे मानस में पूरी तरह से प्रतिबंबित है, आलोकित है. मैं बधाई देना चाहता हूं रजत जयंती समारोह के संयोजकों को जिनके प्रयास से यह पर्व मनाया गया. यह पियूष वर्षा का पर्व है. मैं तो कल सुबह चला जाऊंगा, मगर पुणे के निवासियों को रोज रात में इसका आनंद प्राप्त करने का मौका मिलेगा. इसे सभी भारतीय भाषाओं में सुनेंगे- जिन भाषाओं में गीत रामायण का अनुवाद हुआ है, रूपान्तर हुआ है- उनके भी कलाकार आएंगे. रूपान्तर का आपसे परिचय होगा. आज अध्यक्ष के स्थान पर श्री भीमसेन जोशी विद्यमान हैं, प्रमुख अतिथि शरद यादव और उदघाटक के रूप में मुझे यहां लाया गया है. मैं अपने को धन्य समझता हूं.
मैं एक बार फिर से बधाई देता हूं समारोह के संयोजकों को. और आग्रह करता हूं कि यह समारोह केवल एक नगरी तक सीमित न रहे, एक प्रदेश तक इसे न रखें. इस तरह का आयोजन पूरे भारत में होना चाहिए तथा यह भी आशा करता हूं कि इससे कई नये गीतकार निकलेंगे, जो अमर गीत की विधा में नहीं तो किसी और शैली में रामचरित मानस के कुछ उपेक्षित पहलुओं को उजागर करेंगे. बार बार मुझे भरत का स्मरण आता है. राज्य त्यागने वाले भरत का स्मरण. राज्य के लिए लड़ने वाले भरत का स्मरण नहीं. मगर भरत का मंदिर नहीं है. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हमारे यहां राज्य के लिए लड़ाई होती है, इसका कारण है कि हमने भरत की पूजा नहीं की- राम की पूजा की. ’उर्मिला’- सीताजी तो चली गईं राम के साथ, मगर उर्मिला का दर्द कौन जानेगा ? उसकी व्यथा को कौन मापेगा ? रह गई घर के द्वार पर खड़ी हुई, चौखट पे, आंखों में आंसू लिए हुए. चौदह वर्ष का वनवास. पति को तो वनवास नहीं मिला था. पिता ने लक्ष्मण को आज्ञा नहीं दी थी, मगर लक्ष्मण भाई की प्रीति में चले गए. मगर- उर्मिला की व्यथा का, भरत का प्रभुत्व और भी ऐसे प्रसंग, जिनमें मैं जाना नहीं चाहता. जो उपेक्षित हैं- कैकेयी ने उन्हें उजागर किया है, उभारा है. उन्हें और भी गहरे रंगों में- प्रगाढ़ रसों में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है. मुझे विश्वास है कि ऐसे समारोह कवियों को भी प्रेरणा देंगे. जन-जन के लिए मांगलिक प्रसंग बनेंगे. और मैं विश्वास के साथ कहता हूं कि यह समारोह सफल होगा. आपने मुझे बुलाया. इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूं. और आज विधिवत इस कार्यक्रम का उदघाटन करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)




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