Wednesday, July 1, 2026

दरिद्रता मिटाकर रहेंगे

    


जब ’पांचजन्य’ के संपादक ने मुझे सूचित किया कि पत्र का ’दरिद्रनारायण अंक’ प्रकाशित हो रहा है, तो मेरे मन में प्रश्न उठा कि दरिद्रनारायण अंक क्यों, लक्ष्मीनारायण अंक क्यों नहीं ? दरिद्रनारायण की सेवा तथा साधना हम बहुत दिन कर चुके. अब समय लक्ष्मीनारायण का आवाहन करने का है. किंतु फिर ख्याल आया कि लक्ष्मीनारायण की आराधना भी हम सदियों से करते आए हैं. जगह-जगह लक्ष्मीनारायण के मंदिर भी स्थापित किए गए हैं. फिर भी देश दरिद्र है. अधिकांश भारतीय निर्धन हैं. आवश्यक वस्तुओं का अभाव है. यहां तक कि हम अन्न की दृष्टि से भी आत्मनिर्भर नहीं हैं. 

दरिद्रता में जिन्होंने नारायण के दर्शन किए और उस नारायण की उपासना का उपदेश दिया, उनका अंत:करण करुणा से भरा हुआ था. रामकृष्ण परमहंस के संबंध में तो यहां तक कहा जाता था कि ’दूब को पैरों तले रौंदे जाते देखकर वह पीड़ा से सिहर उठते थे.’ दूसरों के दुख से दवित होना मानव का गुण है. यह इस बात का भी प्रमाण है कि सब में एक ही आत्मतत्त्व विद्यमान है. किंतु ऐसा भी होता है कि निरंतर पीड़ा देखते-देखते मानव का मन उसके प्रति संवेदनहीन हो जाता है. हृदय को संवेदनशील रखने के लिए पीड़ित के प्रति केवल दया का नहीं, करुणा का भाव जगाना आवश्यक है. दरिद्रनारायण के संपूर्ण दर्शन के मूल में करुणा का अजस्र स्रोत्र प्रवहमान है.

यह धारणा सही नहीं है कि भारतीय संस्कृति दरिद्रता का पुरस्कार और समृद्धि का तिरस्कार करती है. अस्तेय और अपरिग्रह का दरिद्रता से दूर का भी संबंध नहीं था. त्याग वही कर सकता है, जिसके पास भोग की क्षमता और उसके साधन हैं. बिखारी का अपरिग्रह उपहास का विषय बनेगा. विवशता की नाम संतोष नहीं हो सकता. 

वस्तुत: यह एक रहस्य का विषय है कि पुरुषार्थ-चतुष्टय के आधार पर जीवन का प्रासाद खड़ा करने वाले देश में दरिद्रता को ईश्वरीय देन समझने की भ्रामक भावना कैसे फैल गई ? क्या इसका कर्मफल के सिद्धांत से कोई संबंध है ? होना तो नहीं चाहिए. किंतु जिन्होंने कर्म पर बल न देकर, केवल फल की लालसा की. वे भाग्यवाद का शिकार अवश्य हो गये. अपनी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, आलस्यप्रियता पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने ’हुई है वही जो राम रचि राखा’ की रट लगाना आरंभ कर दिया. 

यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि गरीबी, बेकारी, भुखमरी ईश्वर का विधान नहीं, मानवीय व्यवस्था की विफलता का परिणाम है. ऐसे समाज की रचना संभव ही नहीं आवश्यक भी है, जिसमें अभाव न हो, शोषण न हो, भय न हो, भूख न हो. ’सर्वे सुखिन: सन्तु’ की हमारी कामना कोरी कल्पना की उड़ान नहीं, आदर्श समाज व्यवस्था का चित्र है. यहां यह भी स्मरणीय है कि हमने केवल बहुसंख्यक के सुख की बात नहीं कही. हमने स्वयं में सबको समाहित करने वाले सुख का मुख देखा है. स्पष्ट: हमारा लक्ष्य सर्वोदय है, मात्र एक वर्ग अथवा बहुसंख्यक वर्ग का उदय अथवा उत्कर्ष नहीं. 

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि जो वैभव संपन्न हैं, उनके उत्कर्ष की क्या आवश्यकता है. इसका उत्तर यह है कि जो धन से संपन्न हैं, वह मानवीय गुणों से भी संपन्न हों, यह आवश्यक नहीं है. पूंजी के अभाव की भांति पूंजी का प्रभाव भी दुर्गुणों का जनक होता है. धन से भोग-विलास की सामग्री जुटाई जा सकती है, मन की शांति नहीं प्राप्त की जा सकती.

दरिद्रता के निर्मूलन के लिए सबसे पहली चीज़ यह है कि हम भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की प्रतिष्ठापना करें. विज्ञान और टेक्नोलॊजी के इस युग में गरीबी पर पूर्ण विजय पाई जा सकती है. विश्व में ऐसे देश हैं, जिनमें हर व्यक्ति के भोजन, वस्त्र, निवास, चिकित्सा तथा शिक्षा के लिए समाज उत्तरदायी है. ऐसे भी देश हैं, जहां उत्पादन में कमी किए बिना मजदूरों के काम के घंटे घटाए जा रहे हैं, जिससे वे खाली समय में साहित्य, कला, मनोरंजन आदि का लाभ उठा सकें और इन क्षेत्रों में भी योगदान दे सकें. जो अन्य देशों में संभव है, वह हमारे देश में असंभव नहीं होना चाहिए.

यह ठीक है कि भौतिक समृद्धि के बाद भी नैतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष की आवश्यकता बनी रहेगी. किंतु इसके लिए भौतिकता की उपेक्षा करना उचित नहीं होगा. हमारे इतिहास में स्वर्ण-युग उसी काल को कहा गया, जब यहां ऐश्वर्य का साम्राज्य था. भारत को वैभव के शिखर पर ले जाने की हमारी कामना इसी राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप है.

नर को नारायण का रूप देने वाले भारत में दरिद्र और लक्ष्मीवान, दोनों में एक ही परम तत्त्व का दर्शन किया गया है. अध्यात्म-जगत की एकता को भौतिक जगत में लाने की महती आवश्यकता है. दरिद्रता का सर्वथा उन्मूलन कर हमें प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार उससे कार्य लेना है और उसकी आवश्यकता के अनुसार उसे देना है. संयुक्त परिवार की प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा का ऐसा ही प्रबंध था, जिसने मार्क्स को भी मात कर दिया था. समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी- नवनिर्माण के प्राचीन आधार स्तंभ हैं.इन्हीं स्तंभों पर हमें भावी भारत का भवन खड़ा करना है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

0 टिप्पणियाँ:

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है