Sunday, July 5, 2026

हिंदी की दयनीय स्थिति

    


हिंदी भारत की राज-काज, शिक्षा-दीक्षा तथा न्यायदान की भाषा बनने की लड़ाई उसी दिन हार गई, जिस दिन संविधान के निर्माताओं ने 1950 में एक विदेशी भाषा को आगामी 15 वर्षों के लिए स्वतंत्र भारत की राजभाषा बनाए रखने का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय ले लिया. यदि हिंदी को नई दिल्ली में आना था, तो वह कलम की एक ही नोक से आ सकती थी, उसे किस्तों में लाने के फैसले का विफल होना निश्चित था और वह विफलता उजागर हो गई.

अंग्रेजी को क्रमश:  हटाने और हिंदी को उत्तरोत्तर बढ़ाने के फेर में अंग्रेजी सम्राज्ञी बन बैठी है हिंदी को चिरदासी का पद प्राप्त हो गया दिखता है. राजभाषा कानून के अंतर्गत, यद्यपि हिंदी प्रमुख भाषा है और अंग्रेजी इसकी सहायक भाषा, किंतु केंद्रीय कार्यालयों में सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला है. यहां तक कि हिंदी क्षेत्रों में स्थित केंद्रीय कार्यालयों में भी, जिनका संबंध वहां की हिंदी भाषी जनता से है, अंग्रेजी में काम होता है और हिंदी का प्रयोग करने वाले कर्मचारी न केवल निरुत्साहित किए जाते हैं वरन उन्हें किसी बहाने दंडित भी किया जाता है.

केंद्रीय कर्मचारियों को हिंदी में प्रशिक्षण देने का काम बड़े जोर-शोर से जारी है. कागज पर ऐसे प्रशिक्षित कर्मचारियों के आंकड़ें भी प्रभावशाली दिखाई देते हैं. किंतु वस्तुस्थिति यह है कि न केवल प्रशिक्षित कर्मचारी अपितु हिंदी भाषा-भाषी कर्मचारी भी हिंदी भूलते जा रहे हैं. उन्हें हिंदी में काम करने का अवसर ही उपलब्ध नहीं होता. भाषा अभ्यास से आती है. अभ्यास के अभाव में शिक्षण और प्रशिक्षण पर भी पानी फिर जाता है.

हिंदी की कितनी दयनीय स्थिति है, यह उस दिन भली भांति पता लग गया, जब भारत-पाक समझौते की हिंदी प्रति न तो संसद सदस्यों को और न हिंदी पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई. भारत-पाकिस्तान में कितना ही बुनियादी अंतर क्यों न हो, किंतु जहां तक अंग्रेजी की गुलामी का सवाल है, दोनों देश उसका गौरव अनुभव करने में संकोच नहीं करते. जिस उर्दू का परचम फहराकर पाकिस्तान बना था और जिस उर्दू को बढ़ावा देने का नारा बुलंद करके भारत का सत्ताधीश उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव को अपने पक्ष में प्रभावित करना चाहते हैं, उसके प्रतिनिधि हाल की वार्ता में न तो उर्दू में बातचीत कर सके और न समझौता ही कर सके.

स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री ने जनरल अयूब को उर्दू या हिंदुस्तानी में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया था, किंतु अब केवल शास्त्री जी की याद ही बाकी रह गई है. 

हिंदी वालों को चाहिए कि हिंदी प्रदेशों में हिंदी को पूरी तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठित करें, केंद्र पर दबाव डालें, जो छात्र अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा नहीं पाते हैं, उन्हें भी केंद्रीय सेवाओं में प्रविष्ट होने का समान अवसर और अधिकार मिलना चाहिए. हिंदी प्रदेशों को हिंदी की समान शब्दावली का प्रयोग करने का भी समन्वित प्रयोग करना चाहिए.

’रामचरितमानस’ की चारसौवीं वर्षगांठ के महान अवसर पर सभी हिंदी भाषा-भाषी राज्य, संस्थाएं तथा व्यक्ति समूचे देश में एक ऐसी लहर फैला सकते थे,  जो न केवल केंद्र को प्रभावित करती, अपितु हर भारतीय के मानस को छू लेती. किंतु यह समारोह हिंदी मठाधीशों की मुट्ठी तक सीमित रह गया. 

प्रतिवर्ष एक कर्मकांड की तरह हिंदी दिवस का आयोजन और उस पर हिंदी के पक्ष में पांडित्यपूर्ण प्रवचन के स्थान पर, हिंदी साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों तथा समर्थकों को व्यवहार की भाषा बनाने के लिए एक प्रचंड राष्ट्रीय अभियान चलाने का संकल्प लेना होगा. मुगलों और अंग्रेजों के राज्य में जब हिंदी सिंहासन से कोसों दूर थी, तब भी वह पनपी, फूली-फली और न केवल समाज के लिए संजीवनी के रूप में सामने आई, अपितु राष्ट्रीय एकता का बल माध्यम भी सिद्ध हुई. भारत के चारों कोनों में स्थित चारों धामों की यात्रा करने वाले, फिर वे केरल के हों या कश्मीर के, जिस भाषा में अपने को व्यक्त करते थे और भी करते हैं, वह हिंदी ही है, अन्य कोई भाषा नहीं है.

जब विदेशी राज्य में हिंदी पनपी, तो अपने कहलाने वाले राज्यों में वह उपेक्षित और तिरस्कृत रहे, यह केवल हिंदी वालों के लिए भी गंभीर चुनौती है. हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा और सभी भारतीय भाषाओं को शासन तथा जनता की भाषा बनाकर दिखाना होगा.
 -डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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