Sunday, July 5, 2026

विजयादशमी

    


आज विजय का पर्व है. भारतीय राष्ट्र की अगणित महान विजयों का राष्ट्रीय पर्व. हमारा राष्ट्र-जीवन केवल उन्नीस सौ पचास वर्ष पुराना नहीं है. सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक जीवन-संग्राम में सतत रत रहकर हमने अपने गौरवपूर्ण राष्ट्र-जीवन के उज्ज्वल इतिहास में विजय के अनेक कालखंड निर्माण किए हैं. निराशा की अमावस सी गहन निशा के अंधकार में हम तनिक अपना मस्तक आत्मगौरव के साथ ऊंचा उठाकर देखें, विश्व के गगन-मंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं. संसुति के गौरवपूर्ण इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर असंख्य युगों के वज्र कठोर हृदय पर, हमारी विजय के स्तंभ अंकित हैं. अनादि भूतकाल हमारी दिव्य विभा से आलोकित है. भावी की अनंत घड़ियां हमारी विजय-मालिका की लड़ियां बनने की प्रतीक्षा में मौन रुकी पड़ी हैं. आज का दिन हमारी संपूर्ण विजयों का दिन है. इस राष्ट्रीय पर्व को हमने सदैव ही अपनी विजिगीषु क्षात्रवृत्ति का प्रदर्शन करके मनाया है. आज के शुभ मुहूर्त पर ही हमने देश, धर्म और संस्कृति को नष्ट करने वाली आसुरी शक्तियों को ललकारा है और उनका मान-मर्दन कर विजयलक्ष्मी को वरण किया है. इन विजयों ने विजया नाम को सार्थक किया है, पवित्र परंपरा को पुष्ट किया है. 

आज का दिन हमारी विजयों का ही दिन नहीं, अराष्ट्रीय तथा आसुरी शक्तियों की पराजय का भी दिन है. विजय के उज्ज्वल इतिहास के पीछे क्षणिक पराजय की धूमिल छाया भी छिपी हुई है. कौन जानता था कि शुम्भ और निशुम्भ की निरंकुश सत्ता तथा अत्याचारी प्रवृत्ति से पीड़ित राष्ट्र को बचाने के लिए दुर्गा के रूप में समाज की संघटित शक्ति प्रकट होगी ? किसको विश्वास हो सकता था कि रावण जैसे शक्ति संपन्न तथा वैभवशाली सम्राट के स्वर्णसिंहासन को टुकड़े-टुकड़े करने में वनवासी राम सफलता पा लेंगे ? किसने कल्पना की थी कि सह्याद्रि की गिरिमाला में मुट्ठी-भर मावलों के बल पर स्वधर्म-संरक्षण तथा स्वराज्य-संस्थापन की महान साधना में रत श्री शिवाजी ’दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ की सारी शान को मिट्टी में मिलाने में समर्थ होंगे ?  किसने सोचा था, आत्मविस्मृत, गौरव-शून्य, निराश, आकांक्षाविहीन, व्यक्तिगत स्वार्थ के पंक में फंसा हुआ पददलित राष्ट्र परतंत्रता की बेड़ियां काटकर स्वतंत्रता के स्वच्छ वातावरण में विचरण करेगा ? पर जब समाज की सारी शक्तियों का केंद्रीकरण होता है, तो विजय चरण चूमने के लिए तत्काल तत्पर हो जाती है.

राष्ट्र पुरुष राम के रूप में जब समाज का क्षात्रतेज ब्रह्मतेज का योग पाकर राष्ट्र की अपहृत लज्जा को लौटा लाने के लिए लंका की ओर अग्रसर हुआ, तो आततायी रावण का अंत विधि का विधान बन गया. छोटे-छोटे कपियों और भालुओं की सहायता से राम ने विश्वविजयी के गौरव-सिंहासन और गर्व-मुकुट को पैरों की धूल में परिवर्तित कर दिया. रावण के पास शक्ति थी, किंतु शील नहीं था. बल था, न्याय नहीं था. रावण के प्रत्येक अनुयायी के हृदय में जलने वाली सर्वस्वार्पण की वृत्ति नहीं थी, स्वयंस्फूर्ति से उत्पन्न होने वाला अनुशासन नहीं था, ध्येय की वेदी पर जीवन-पुष्प को अर्पित करने में समाधान मानने वाली पवित्र आकांक्षा नहीं थी और उससे बढ़कर यह विश्वास नहीं था कि अपना मार्ग सत्य और न्याय का मार्ग है. फलत: राम की विजय हुई और रावण पराजित हुआ. राष्ट्र शक्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दसों शीशों के रूप में सब्याज चुकाना पड़ा. दशानन का वध हुआ, इसलिए दशहरा हुआ. असुरों की लंका भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कुंदकली की भांति सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ. विजय का आनंद सुजनों में सुवर्ण वितरित कर प्रदर्शित किया गया. 

दुर्गा का अवतार, राम की विजय और पांडवों का अज्ञातवास समाप्त कर पुन: शस्त्र धारण आज भी हमारे निश्चेष्ट जीवन में चैतन्य का संचार कर रहे हैं. आज का दिन राष्ट्र-जीवन की महत्वाकांक्षाओं को जगाने और उन्हें पूर्ण करने के लिए प्राणपण से जुट जाने का दिन है. आज हमें शस्त्र पूजन कर सीमोल्लंघन करना है. कृषक अपना हल सम्हाले, मजदूर अपने चक्के को गति दे, व्यवसायी अपनी तुला पर राष्ट्र का हित-अनहित तौले, लेखक अपनी लेखनी की लौ को प्रज्वलित करे और सब अपने-अपने शस्त्रों का पूजन करते हुए विजयश्री से मंडित करने में अपना योग दें. जो समय पर काम आ जाए, वही शस्त्र है. यदि हम सीमोल्लंघन के इच्छुक हैं, तो रूढ़िपालन से ही शांत न बैठें. हमें उन सब मनोभावों को तिलांजलि देनी चाहिए, जिन्होंने हमारे मानसिक जगत को सीमित बना रखा है. 

हमारी अगणित विजयों का इतिहास साक्षी है. विजय प्राप्ति के लिए विजयी कार्यशक्ति चाहिए. महिषासुर के आतंक से जब मेदिनी थर्रा उठी, धर्म का श्वास रुद्ध होने लगा, अन्यायों ने सर्वत्र सरोष सिर उठा लिया, अत्याचारों की झड़ी लग गई, तो अराष्ट्रीय शक्ति के आतंक और उपद्रव को सदा-सर्वदा के लिए समाप्त करने की दृष्टि से राष्ट्र की सर्व शक्तियों का केंद्रीकरण किया गया. ब्रह्मा की सृजन, विष्णु की सिंचन और शंकर की प्रलयंकर शक्ति ने सम्मिलित होकर देवों के शरीरों से प्रकटित पुण्य प्रकोप द्वारा आदिशक्ति का निर्माण किया. समस्त देवताओं ने अपने प्रखर आयुध, संपूर्ण गुण और अपनी सारी शक्ति दुर्गा के अधीन की.  समाज की संपूर्ण शक्ति से समन्वित होकर राष्ट्र शक्ति ने अराष्ट्रीय शक्ति को ललकारा. आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी पर्यंत वह विकट संग्राम चला. अंत में दुर्गा की जीत हुई और महिषासुर का मान-मर्दन कर दिया गया. हम राष्ट्र की विजय के उपलक्ष्य में नवरात्र का उत्सव मनाते हैं. दुर्गा समाज की संघटित शक्ति का प्रतीक है. व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थ साधना को एक ओर रखकर हमें राष्ट्र की आकांक्षा प्रदीप्त करनी होगी, दलगत स्वार्थों की सीमा छोड़कर विशाल राष्ट्र की हितचिंता में अपना जीवन लगाना होगा. हमारी विजिगीषु वृत्ति हमारे अंदर अनंत गतिमय कर्मचेतना उत्पन्न करे. राष्ट्र के वैभव के लिए हम रावण की आसुरी, तामसी वृत्ति का नाश कर राम की वृत्ति की विजय के लिए प्रबलशील हों. जन-जन के मन में नव चैतन्य निर्माण कर राष्ट्र की विजय तथा वैभव का पथ प्रशस्त करें. दीपावली हमारे स्वागत के लिए तैयार खड़ी है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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