महाराष्ट्र के मुंबई के विलेपार्ले में 1996 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वंदे मातरम के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- सचमुच मैं महोत्सव समिति को बधाई देकर उनका अभिनंदन करना चाहता हूं. समिति ने वंदे मातरम को, लेखक श्री बंकिमचंद्र को- जिन्हें ऋषि के रूप में याद किया जाता है- वस्तुत: वह हमारी विश्व परंपरा में थे, उनकी स्मृति को एक बार फिर से जन-जन तक पहुंचाने के लिए यह अनुष्ठान बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न किया. वंदे मातरम एक शताब्दि से अधिक समय से इस देश को अनुप्राणित करता रहा है. लेकिन इतने दिनों बाद, उसे फिर से प्रस्तुत करने का जो प्रयत्न हुआ है, वह अपने में एक महनीय प्रयत्न है और मैं महोत्सव समिति को एक बार फिर बधाई देना चाहता हूं. मैं नहीं जानता, देश के किसी भाग में इस तरह का शताब्दि समारोह मनाया गया, कम से कम मुझे उसका निमंत्रण नहीं आया. इसलिए पहले जब इस कार्यक्रम का निमंत्रण मिला, तो सहज स्वाभाविक रूप से मेरी इच्छा हुई कि ऐसे कार्यक्रम में मुझे जाना चाहिए. लेकिन उस समय मेरे विदेश जाने की बात थी, न्यूयॊर्क में जनरल असेंबली का अधिवेशन चल रहा था, उसकी एक समिति के साथ मैं जुड़ा हुआ हूं. मैंने डॊ. लेले साहब को लिखा था कि अगर मैं विदेश नहीं गया तो आऊंगा. मगर संयोग देखिए कि मैं विदेश भी गया और यहां भी आ गया. यह समिति के सदस्यों के आत्मीयता के कारण हुआ है.
अभी जो मैंने विस्तृत विवरण सुना-किस किस तरह से विद्यालयों में, किस तरह से छात्रों के बीच, किस तरह से विविध प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करके राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम का शताब्दि का समारोह मनाया गया है, यह सचमुच में एक प्रेरणादायी प्रसंग है. मैं उन कार्यक्रमों के विस्तार में नहीं जाता, मैं तो उनके बारे में पढ़ रहा हूं, सुन रहा हूं- आपने तो उनको देखा होगा. मैं देखने से वंचित हो गया. मैंने डॊक्टर साहब को पूछा कि मेरे भाषण के अतिरिक्त और भी कोई कार्यक्रम है या नहीं ? कार्यक्रम होना चाहिए था. या शायद मुझे समय पर आना चाहिए, मैं देर से आया हूं- या कार्यक्रम पहले हो गया हो.
वंदेमातरम के साथ हमारी राष्ट्रीय स्मृतियां जुड़ी हुई हैं. उसके साथ पराधीनता की पीड़ा जुड़ी हुई है, पराधीनता के पाश को काट कर फेंकने का वज्र संकल्प जुड़ा हुआ है. एक राष्ट्र के संघर्ष की कहानी जुड़ी हुई है. बलिदानों के प्रसंग जुड़े हुए हैं. काले पानी की काल कोठरियों में बेड़ियों की झंकार के बीच सुनाई देने वाली उसकी गूंज जुड़ी हुई है. हमें ऐसा राष्ट्र गीत उपलब्ध हुआ है, जो सचमुच में हमारे हृदय के तारों को झंकृत कर देता है. जो गीत फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए गाया जाता है, जो गीत बलिदान के रक्त से लिखा गया था, जो गीत संपूर्ण संघर्ष की कहानी कहता है. और इस धरती के प्रति- भारत मां के प्रति, जो श्रद्धा निवेदन में अपूर्व है, उस गीत की शताब्दि मनाकर आपने सचमुच में उस गीत का सम्मान नहीं किया- हमने अपनों को सम्मानित किया है. हमने अपनों को एक आदर्श दिया है.
मैंने कहा आपसे कि बंकिमचंद्र की गणना ऋषियों में होगी. कल्पना करिए उस सौ-सवा सौ वर्ष पहले के काल का- किस तरह से विदेशियों ने देश को पददलित किया था, किस तरह से देश को बांटने की साजिश की थी, किस तरह से अत्याचार और आतंक के साम्राज्य को स्थापित किया था. लेकिन उसी के साथ त्याग और बलिदान की एक परंपरा, एक के बाद एक फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लायक भारतमाता के सुपुत्र, दमन और आतंक के खिलाफ छाती तानकर खड़े रहने की तैयारी में इस गीत ने देश में नये प्राण फूंके थे. वंदेमातरम एक मंत्र बन गया था. विदेशी उसे सुनकर चिढ़ते थे, वंदेमातरम का गीत गाकर, वंदेमातरम का नारा लगाकर, देश भक्तों के हृदय पुलकित हो जाते थे. जो फांसी के तख्तों पर नहीं चढ़ सकते थे. वे भी वंदेमातरम का गीत गाकर आनंदित अनुभव करते थे, अपने को गौरवांवित अनुभव करते थे. शायद ही संसार के किसी देश में त्याग और बलिदान से पवित्र ऐसा गीत, राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया हो.
यह दुर्भाग्य की बात है कि यह गीत भी विवाद का विषय बन गया था. अभी भी थोड़ा विवाद हो रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण विवाद सामने आया, मुंबई के लोकसभा सदस्य श्री रामभाऊ नाईक के प्रयत्नों से. उनका अभिनंदन होना चाहिए. वह चुनकर गए, तो उन्होंने अपना प्रयत्न प्रारंभ किया कि संसद के सत्र का जब प्रारंभ होता है और जब सत्र समाप्त होता है, तो वह राष्ट्रगीत के साथ होना चाहिए. महाराष्ट्र के विधान मंडल में पहले से ऐसा हो रहा है. लोकसभा के अध्यक्ष श्री शिवराज पाटील को यह विचार पसंद आया. मैं उनको भी श्रेय देना चाहता हूं. लेकिन सदस्यों में मतभेद है. क्या आवश्यकता है ? यहां से प्रश्न शुरू हुआ. अभी तक राष्ट्रगीत नहीं गाया जाता था. अब उसकी क्या जरूरत है ? जब देखा कि यह विरोध का तर्क चलता नहीं है, अच्छा काम है जब शुरू हो, तबसे उसका उदात्त स्वीकार करना चाहिए, फिर कहा गया कि एक हमारी राष्ट्रीय धुन है, वंदेमातरम राष्ट्रीय गीत है- जनगणमन क्यों नहीं ? वंदेमातरम क्यों ? संविधान सभा की कार्यवाही देखी गई. संविधान सभा के अध्यक्ष डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने जो विरोध किया था, उसका उल्लेख किया गया. दोनों में से कौन पहला है, कौन बाद में है, इस तरह का सवाल नहीं है. यह राष्ट्रीय धुन है, यह राष्ट्र गीत है. वह भी विवाद हुआ था कि आरंभ किससे करें- अंत किससे करें- और एक दल के सदस्यों ने तो कहा कि यह गीत गाया जाए, इससे हम सहमत नहीं हैं. यह वही दल है, जिसने पहले विरोध किया था, पराधीनता के काल में- मनोवृत्ति बदली नहीं है. कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में वंदेमातरम गाया, तो उसका विरोध हुआ, मुस्लिम लीग के सदस्य नहीं, कांग्रेस का काम करने वाले मुस्लिम सदस्य विरोध करके चले गए. फिर गीत गाना रोक दिया गया- गीत गाना कम कर दिया गया. तुष्टिकरण की यह कहानी बहुत पुरानी है. इस तरह की बात को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. अगर कोई कहता है कि भारत को मां के रूप में वंदना करना मूर्तिपूजा है और हम मूर्तियों में विश्वास नहीं रखते, तो वह अपने विश्वास को अपने पास रख सकता है. उसके विश्वास को कोई ठेस नहीं पहुंचती. आखिर यह भारत मां है. हम मां के रूप में इसकी वंदना करते हैं. हम उसकी संतान हैं. हमने उसकी गोद में जन्म लिया है. हम इसके आंचल की छाया में बढ़ रहे हैं. और यह संस्कार कोई आज का संस्कार नहीं है. यह परकीय राज्य के विरोध में पैदा हुई भावना नहीं है.
वाल्मीकि ने जब रामायण लिखी और उसमें लंका विजय वर्णन के बाद उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया. प्रभु रामचंद्र ने, वन में निवास करने वाले लोगों को इकट्ठा करके रावण पर विजय पाई. सोने की लंका पर अधिकार कर लिया. लेकिन उन्होंने लंका को अपने राज्य में नहीं मिलाया. लंका का शासन विभीषण को दे दिया. हमारे बहुत से राजनेताओं को यह पता नहीं है कि विभीषण कौन था ? मैं नाम नहीं ले रहा हूं, मैं इशारा कर रहा हूं, आप समझ जाएंगे- श्री वी.पी. सिंह का जब कांग्रेस से झगड़ा हो गया और वह कांग्रेस से निकल आए- तो उस समय कांग्रेस के जो सर्वेसर्वा थे- वह एक दिन अपने मित्रों के साथ बैठे हुए थे- और मित्रों में से किसी ने कहा कि वी. पी. सिंह तो विभीषण बन गए. तो उस नेता ने पूछा कि यह विभीषण कौन है ? उन्हें पता नहीं था. मैं उन्हें दोष नहीं देता. लेकिन भगवान राम ने विभीषण को राज्य सौंप दिया. और वापस अयोध्या चलने की तैयारी करने लगे, तो वानरों ने कहा, प्रभु सोने की लंका छोड़कर कहां जा रहे हो. चौदह साल भटकते हो गए. आपके साथ जंगलों की ख़ाक छानी, और बलशाली रावण से लड़े, अब तो अपना राज है, अब अयोध्या एक तो बहुत दूर है फिर वहां क्या परिस्थिति होगी, पता नहीं, स्वागत होगा कि नहीं होगा ? चौदह वर्ष का काल बड़ा लंबा काल होता है. और लंका सुनिश्चित है, अयोध्या की स्थिति अनिश्चित है. क्यों जाएं वहां ? यहीं बस जाते, उचित है, पर ऐसा था नहीं. अब प्रभु रामचंद्र ने लक्ष्मण से कहा- अपी स्वर्णमयी लंका, नमे लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमी़श्च स्वर्गादपि गरियसी. सोने की लंका मेरे मन को नहीं भायी. यह मुझे पसंद नहीं है. जननी जन्मभूमि- स्वर्ग से भी मुझे प्रिय है. पृथ्वी को माता के रूप में देखना अर्थवेद का वचन है. पृथ्वी हमारी माता है. हम उसके पुत्र हैं. और अगर वंदेमातरम के रूप में हम उसी मां का वंदन करते हैं- वंदेमातरम- उसमें मूर्ति पूजा कहां से आती है ? इस्लाम भी अपने ढंग से आदर व्यक्त करता है. जो हज के लिए जाते हैं, वहां जो पवित्र पत्थर है, उसे चूमते हैं, माथा टेकते हैं. नमाज़ पढ़ने के लिए भी धरती चाहिए. नमाज़ धरती पर ही पढ़ी जा सकती है. आसमान में नहीं, धरती पर माथा रखकर- मुझे ऐसे बहुत मुस्लिम लोग मिले हैं, जो इतनी बार नमाज़ पढ़ते हैं कि माथे पर निशान बन गया. हम उनकी भावना को समझते हैं. उन्हें हमारी भावना समझनी चाहिए. यह मूर्ति पूजा नहीं है. आखिर मजारों पर चादर चढ़ाई जाती है, क्या वह एक ढंग की पूजा नहीं होती. आदर का प्रकटीकरण नहीं है ? मुस्लिम देशों में और तरह की रीतियां प्रचलित हैं. हम उसकी आलोचना नहीं करते, हम सर्व-धर्म-समभाव में विश्वास करते हैं. कोई अगर अपने मार्ग से ईश्वर तक पहुंचना चाहता है, तो उसका स्वागत है. यह बात अलग है कि मार्ग के बारे में प्रामाणिकता चाहिए, उत्सर्ग चाहिए. लोगों का हृदय जीतने का प्रयास चाहिए. बल प्रयोग से नहीं, जोर जबरदस्ती से नहीं. लेकिन वंदेमातरम में मूर्ति पूजा है, इसलिए हम उसका गायन नहीं कर सकते, यह हास्यास्पद है. इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता. उस समय स्वीकार किया गया, वह गलती की गई थी. अब हम उस गलती का परिमार्जन कर रहे हैं. लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा, मुस्लिम लीग ने अंतत: लोकसभा में अपने विरोध को वापस ले लिया. बाद में सबने स्वीकार किया. मैं और दलों की चर्चा नहीं करता, वह निर्णय कर रहे थे- उधर ही देखकर. वह टालना चाहते थे. यह भी राजनीति का मुद्दा बन गया. दोस्तों कभी-कभी इस स्थिति पर बड़ा दुख होता है. देशभक्ति राजनीति का मुद्दा हो जाए, भारत माता के प्रति आदर व्यक्त करना, यह संकुचित स्वार्थ से जुड़ जाए, शायद इस तरह की वृत्ति अपनाने का यह हम दुष्परिणाम भुगत रहे हैं. लेकिन अंत में हुआ, अब वंदेमातरम से संसद के सत्र की समाप्ति होती है. सामूहिक रूप से वंदेमातरम का गान.
आनंदमठ में जिस तरह से उसका उल्लेख है- आनंदमठ संन्यासियों के विद्रोह की कहानी है. प्राय: सभी देशों में और विशेष करके भारत जैसे देश में राजनीतिक परिवर्तन से पहले, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण होता है. राजनीतिक परिवर्तन के पहले समाज की मानसिकता को तैयार करने के लिए साधु, संत, संन्यासी निकल पड़ते हैं. उस समय हथियार उठाकर जो लोग अंग्रेजों से लड़ना चाहते थे, उनके लिए भी रास्ता खुला हुआ था. आनंदमठ की कहानी भी बड़ी रोमांचक कहानी है. मैं आपसे कहूंगा कि आनंदमठ अवसर मिले तो पढ़िए. भारत की सभी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ है. उससे परिस्थिति का थोड़ा सा परिचय मिलता है. आज वंदेमातरम को बड़े प्रभावशाली ढंग से गाया जाता है. एक अल्प गायन भी होता है. सामूहिक गायन भी होता है, मगर हमें सामूहिक गायन को अपने देश में प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है- मिलकर गाएं. केवल वंदेमातरम नहीं, वंदेमातरम तो गाना ही चाहिए, बल्कि अन्य गीत भी गाने चाहिए. हम मिलकर गीत गाने में कुछ पीछे हैं. और देशों में जब भीड़ इकट्ठी होती है- लोग गाना शुरू कर देते हैं. वे गीत उनके जीवन से, उनकी धरती से, उनकी प्रकृति से, उनकी संस्कृति से जुड़े होते हैं. लाखों लोग एक साथ गाना शुरू कर देते हैं. हमें भी कुछ गीतों को प्रचलित करना चाहिए, लोकप्रिय बनाना चाहिए. एक कंठ से गीत गूंजे. हमारे राष्ट्रीय संकल्प को प्रकट करें. वंदेमातरम मन:स्पर्शी गीत है- मातृभूमि की वंदना- किस तरह से वह हरी-भरे रहनी चाहिए, किस तरह से यह दुष्टों का दमन करने में समर्थ है, किस तरह से यह भूमि हमारे लिए धर्म है, विद्या है, सब कुछ है- स्वामी विवेकानंद ने इसी बात को अपने भाषण में प्रकट किया था, जब उन्होंने कहा था-थोड़े समय के लिए हम और देवी-देवताओं को भूल जाएं और भारत माता को याद रखें- भारत माता को. इससे बड़ा देवता कोई नहीं है. इससे बड़ा आराध्य कोई नहीं है. और जब भारत माता की चर्चा करते हैं, उसमें धरती आती है, वह हमें धारण करती है. यह धरित्री है. यह वसुंधरा है. कभी हम प्रकृति के साथ ज्यादती करते हैं, तो प्रकोप भी हमें देखने को मिलता है. लेकिन इस पर टिके हुए हैं- वह हमारा पालन पोषण करती है- यह आधार है- इसलिए यह धरती की रक्षा- यह धरती पवित्र है, यह धरती पावन है. सवेरे उठ कर हम धरती पर पांव रखते हैं- पादेन स्पर्शम- क्षमा करना मैंने पैर रख दिया, मां मुझे क्षमा करना. धरती के बारे में ऐसी पवित्र भावना और इसलिए धरती का पूरा संरक्षण, उसे समृद्ध बनाना, हरी-भरी बनाना. धरती के बांटने का सवाल ही पैदा नहीं होता. और होना नहीं चाहिए. वह ऐसी एक मूल है, पता नहीं कब तक वह हमसे अपनी कीमत चुकाने के लिए कहती रहेगी. धरती मां और उस पर निवास करने वाली उसकी संतति, विशाल परिवार, अलग-अलग भाषाओं में अपने को अभिव्यक्त करता हुआ- अलग-अलग रहन-सहन की पद्धति अपनाता हुआ, अलग-अलग प्रकार के मौसमों में जीवन-यापन के तरीके ढूंढता हुआ, हजारों साल से इस देश में, इस मां की संतति के रूप में जो विद्यमान समाज है, उसका भी स्मरण करना है. उसके विकास का उसकी रक्षा का, उसके अच्छे दिनों की कल्पना करते हैं. धरती और धरती पर निवास करने वाला जन्म और जन्म के साथ-साथ रहते-रहते, सहते-सहते, जीवन के मीठे और कड़वे फल साथ-साथ चखते-चखते, प्रकृति से लड़ते-लड़ते, परकीयों का सामना करते-करते, सृष्टि के सारे रहस्यों को भेदने की दिशा में निरंतर अन्वेषण करते-करते, भारत माता की संतति ने एक संस्कृति का निर्माण किया है. और जब हम मां की वंदना करते हैं, इस धरती की वंदना करते हैं, इस धरती पर निवास करने वाली उसकी संतति की वंदना करते हैं, और उस संतति ने जीवन की जो पद्धति विस्तृत की है, हम उसकी रक्षा करने का भी अभिवचन देते हैं, हम उस संस्कृति से लाभान्वित होने की एक तरह की घोषणा करते हैं.
वंदेमातरम मात्र गीत नहीं है. यह तो एक राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगी. यह राजनीतिक परिवर्तन से परे है. इसे सत्ता के संघर्ष के कारण खंडित नहीं होने देना चाहिए. यह एक यथार्थ है, एक सपना भी है. अगर आने वाली पीढ़ी को हम उसकी कल्पना का और हमारे सपनों का भारत नहीं दे सके. तो भी हम वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा मंत्र दे जाएंगे. वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा देश दे जाएंगे, एक ऐसी पद्धति दे जाएंगे, जिसके बल पर खड़े होकर वह सैकड़ों साल के संकल्प को साकार करेंगे. मित्रों, मैं तो आनंदमठ का पाठक हूं. आनंदमठ और उस समय लिखे गए अन्य उपन्यास, संघर्ष के काम में किस तरह से उपन्यास, कविता, गीत एक नये जीवन से भर जाते. लोगों में जूझने की प्रेरणा देते. उस समय अंग्रेज बंगाल को नहीं बांट सके और बाद में उन्होंने भारत को बांट दिया. यह हृदय को चुभने वाला घाव है. आज राष्ट्रीय एकता और अखंडाता के लिए जो समस्या पैदा हो रही है, कहीं ना कहीं उनके मूल में वह देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन है. हमारी सुरक्षा अगर संकट में है, तो वंदेमातरम का गीत हमें प्रेरणा देता है. हमारे मन में यह विश्वास पैदा करता है कि अगर विभाजित जर्मनी एक हो सकते हैं, अगर दो कोरिया को मिलाकर एक कोरिया बनाने की फिर से बात हो सकती है, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो नरसों, ऐसा वक्त जरूर आने वाला है कि भारत फिर से एक होगा. जो हमसे अलग-अलग चले गए हैं, उनकी भी समझ में आएगा. थोड़ा समय लगेगा.
आज फिर से वे धमकियां दे रहे हैं, हथियारों से लड़ाई का खाका खींचा जा रहा है, एक दिन भाषण दिया जाता है हथियारों का, दूसरे दिन उसका खंडन कर दिया जाता है. किसी देश की सरकार को इतना झूठ नहीं बोलना चाहिए. बेनजीर तेरे मन में क्या है ? बेनजीर का मतलब है, जिसकी नजीर नहीं, जिसका कोई उदाहरण नहीं हो, जो अनुपम है, जो बेमिसाल है. वे एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आई थीं, तब विरोधी दल के नेता के नाते आई थीं और कहने लगीं- ’हमने सोचा वाजपेयी साहब चलो आपसे भी मिलते चलें, आप भी अपोजिशन में हैं और इस समय मैं भी अपोजिशन में हूं. बातें और भी हुईं, उनका मैं उल्लेख नहीं करता. फिर आडवाणी जी आ गए. फिर उनके बीच सिंधी में क्या बातें हुईं, ये तो मैं नहीं जानता. सचमुच में यह बड़ी दुर्भाग्य की बात है, दुनिया बदल गई, शीतयुद्ध समाप्त हो गया, साम्यवाद बिखर गया, और हम आपस में झगड़ों में उलझे हुए हैं, हथियारों पर ख़र्च कर रहे हैं, इसकी होड़ लगी है.
मुझे आदिवासी क्षेत्र में जाने का मौका मिला- पीने का पानी नहीं है, कुपोषण के कारण बच्चे मर रहे हैं. लेकिन हम अपनी सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करेंगे. देश की सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि है. लेकिन पड़ोसियों को समझना चाहिए- उन्हें भ्रम पैदा हो गया है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है. प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जो निर्णय नहीं कर सकते- अगर हमने हमला किया तो वह थोड़ी देर निर्णय नहीं कर पाएंगे, हमले का विरोध करना या क्या करना है, नरसिंह राव जी के बारे में मेरी ऐसी राय नहीं है. अगर सीमा पर रणभेदी बजेगी, तो सारा देश सारे मतभेद भूलकर, साथ मिलकर, पड़ोसियों को ऐसा पाठ पढ़ाने के लिए तैयार होगा कि वह अगली बार हमला करने लायक न रहे. अभी कुछ लोग गए थे, पाकिस्तान से लौटकर आए हैं, वहां जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह चिंता पैदा करने वाली हैं. कोई दु:स्साहसपूर्ण कदम उठाया जा सकता है. वे समझ रहे हैं कि इस देश का मनोबल टूट जाएगा, भारत में से आवाज उठेगी- कश्मीर के लिए कब तक लड़ते रहोगे, कब तक खून बहाते रहोगे- ले-देकर समझौता करो- यह गलतफहमी है- यह होगा नहीं, यह हम होने नहीं देंगे. एक बार देश का बंटवारा हो गया. हम लोग राजनीति में नहीं थे- अब हम हैं- और दृढ़ता के साथ खड़े हैं. और केवल हम नहीं, अब सारे देश ने पाठ पढ़ लिया है, सारे देशवासी इकट्ठे हो जाएंगे, सरकार को प्रेरित करेंगे, सरकार को विवश करेंगे- देश की प्रादेशिक अखंडता के साथ और समझौता नहीं होगा. अब और भूदान नहीं होगा. और यह मानसिकता बनाने में वंदेमातरम हमारा पथ प्रदर्शक है. हमें अनुप्राणित करने वाला संदेश है, मैं बधाई देता हूं एक बार फिर से महोत्सव समिति को, डॊक्टर साहब को- वह तो हृदय की चिकित्सा करते हैं, अगर कहा जाए तो वंदेमातरम हमारे राष्ट्र के हृदय की धड़कन को व्यक्त करता है. और यह ऐसा हृदय है, जिसके ऒपरेशन की कभी आवश्यकता नहीं है. यह चिंतन हृदय है. और यह धड़कन शाश्वत है. यह धड़कन काल की सीमाओं को पार कर चलेगी. यह भविष्य को रूप देगी. यह गीत हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहेगा. आपने इस गीत की शताब्दि समारोह का आयोजन किया, ऋषि बंकिमचंद्र को याद किया. मैं आपको बधाई देना चाहता हूं. सचमुच विलेपार्ले के लोग विलक्षण हैं- बहुत अच्छा काम आपने किया है. देश के अन्य भागों में भी इस तरह का अनुष्ठान होना चाहिए- साल भर यह कार्यक्रम चल सकता है. यह हृदय पर संस्कार डालने वाला कार्यक्रम है. और संस्कार सगर सही होते हैं, तो देश थोड़े दिन के लिए भले ही रास्ता भटक जाए, लेकिन अंत में अपना लक्ष्य पाने में जरूर सफल होता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)




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