Wednesday, July 15, 2026

बलिदान की बेला में पीछे नहीं हटेंगे

    


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के विदेशमंत्री के रूप में 3 से 4 अक्टूबर, 1977 को आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ के बत्तीसवें अधिवेशन को संबोधित किया. इस अवसर पर उन्होंने कहा- 
अध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधिगण
भारतवर्ष में हाल ही में एक ऐतिहासिक और अहिंसात्मक क्रांति हुई. गत मार्च में हुए चुनावों में भारतीय जनता ने मानव की दुर्दम्य आत्मशक्ति का परिचय दिया और एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज में अपनी आस्था की पुष्टि की. उन्होंने लोकतंत्र को नष्ट करने के तामसी तथा निरंकुश शक्तियों के धूर्ततापूर्ण प्रयत्नों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया. हमारे देश की 60 करोड़ की जनता के लिए मार्च की यह क्रांति स्पष्टतया दूरगामी महत्व रखती है, साथ ही समस्त संसार के स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों के लिए यह उतनी ही महत्वपूर्ण है.

हमारी जनता ने निर्भय होकर उन मूलभूत सिद्धांतों, जीवन-मूल्यों तथा आकांक्षाओं को परिपुष्ट किया, जिन पर लगभग 30 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की आधारशिला रखी गई थी. भारत के लोगों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और मूलभूत मानव-अधिकार पुन: प्राप्त कर लिए. मैं भारतीय जनता की ओर से राष्ट्र संघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूं. महासभा के इस बत्तीसवें दिन अधिवेशन के अवसर पर मैं संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूं. हमारा विश्वास है कि राष्ट्र संघ विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखने और राष्ट्रों के बीच सहयोग के माध्यम से समानता, न्याय और समता पर आधारित शांतिपूर्ण प्रगति को प्रोत्साहित करने का उपकरण बनेगा.

जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले छह माह भर हुए हैं. फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं. भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं. जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था, वह अब दूर हो गया है. ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं, जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा. लेकिन हम केवल इन उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं है. हमारी संसद में 22 जुलाई, 1977 को विधिवत इस बात की पुष्टि कर दी गई है कि भारत के लोग शांतिमय और वैध तरीकों से देश में एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक क्रांति लाने के लिए कृत-संकल्प हैं, जो लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रदीप्त हो, समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित हो और नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की आधारशिला पर सुदृढ़ रूप से स्थित हो.
 
अध्यक्ष महोदय, मैं भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ में नया हूं, मेरा देश नया नहीं है. इस संस्था की स्थापना के समय से ही भारत का इससे निकट संबंध रहा है. इस सम्मान्य सभा को संबोधित करते हुए मुझे गौरव का अनुभव हो रहा है. अपने देश में 20 वर्ष से अधिक राष्ट्रीय संसद का सदस्य होने के नाते, विश्व के देशों की इस सभा में पहली बार भाग लेते हुए, मुझे विशेष उल्लास हो रहा है.

अध्यक्ष महोदय, आपको अध्यक्ष पद पर आसीन देखकर मुझे और भी अधिक प्रसन्नता हो रही है, क्योंकि आप एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं, जो भारत के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है, और जिसके साथ हमारे मैत्री-संबंध हैं. भारत सरकार की ओर से और अपनी ओर से भी मैं संयुक्त राष्ट्र महासभा के बत्तीसवें अधिवेशन के सर्वानुमति से अध्यक्ष चुने जाने पर आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूं. आपका चुनाव न केवल आपके विस्तृत राजनयिक अनुभवों और निजी विशिष्टताओं के प्रति आदर का द्योतक है, बल्कि आपके देश यूगोस्लाविया तथा उसके द्वारा शांति और स्थायित्व की शक्तियों को जो बल प्रदान किया जा रहा है, उसके प्रति भी सम्मान का सूचक है. मैं आश्वासन देना चाहता हूं कि आपको अपने पद का दायित्व निभाने में हमारा पूरा सहयोग मिलेगा.

पदमुक्त अध्यक्ष महामान्य शर्ली अमरसिघे का भी हार्दिक अभिनंदन करते हुए मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है. वे हमारे निकट पड़ोसी देश श्रीलंका के विशिष्ट प्रतिनिधि हैं और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के इकत्तीसवें अधिवेशन का बड़ी कुशलता और योग्यता के साथ संचालन किया है.

अन्य प्रतिनिधि मंडलों के साथ मैं भी संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डॊक्टर कुर्ट वाल्डहाइम को हार्दिक बधाई देना चाहूंगा. वे अपनी बुद्धिमता, धैर्य और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के साथ अपने जटिल दायित्व को निभा रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय सदभाव और विश्व-कल्याण को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं. 

महासचिव ने बहुत विचारप्रेरक रिपोर्ट महासभा के सम्मुख प्रस्तुत की है. मैं उसके लिए उन्हें विशेष रूप से बधाई देना चाहूंगा. इस रिपोर्ट में उन्होंने साफ-साफ शब्दों में हमारा ध्यान भविष्य में आने वाली चुनौतियों की ओर आकर्षित किया है. उन्होंने कहा है कि संयुक्त  राष्ट्र संघ में अतुलनीय संभावनाएं हैं, लेकिन किसी हद तक यह भी अपने अभिन्न व्यक्तित्व और सही भूमिका की खोज में है.

जनता सरकार शांति, गुटनिरपेक्षता और सब देशों के साथ मैत्री की नीति का दृढ़ता से अनुसरण कर रही है. गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय संप्रभुता का विस्तार है. इसका मूल तत्व तटस्थता न होकर स्वाधीनता है, जो उपनिवेशवाद के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय संघर्ष और दासता तथा दमन से मानव-चेतना की मुक्ति का सहज परिणाम है. हम राष्ट्रों की सच्ची स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं. हमारी मान्यता है कि हर देश को अपने सर्वोत्तम हितों के अनुकूल नीति अनुसरण करने की तथा प्रत्येक समस्या पर गुणों के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

नई सरकार ने शासन संभालते ही न केवल गुटनिरपेक्षता के मार्ग पर चलते रहने की, अपितु उसके मौलिक तथा सकारात्मक रूप को पुन: प्रतिष्ठित करने की घोषणा की. यह संतोष का विषय है कि वास्तविक गुटनिरपेक्षता पर हमारे द्वारा दिए गए जोर और इस नीति को उत्साह और गतिशीलता से आगे बढ़ाने के हमारे निर्णय को सही मानो में देखा और समझा गया है.

अध्यक्ष महोदय,’वसुधैव कुटुम्बकम’ की परिकल्पना बहुत पुरानी है. भारतवर्ष में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि संसार एक परिवार है. अनेकानेक प्रयत्नों और प्रयोगों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के  रूप में इस स्वप्न के अब साकार होने की संभावना है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता लगभग विश्वव्यापी हो गई है और वह 400 करोड़ लोगों का, जो विभिन्न जातियों, रंगों और समुदायों के हैं, प्रतिनिधित्व करता है. फिर भी यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ केवल सरकारी प्रतिनिधि मंडलों का मिलनमंच मात्र न रहे. हमें इस लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए कि किस प्रकार राष्ट्रों की यह महासभा मानवता के सामूहिक विवेक और इच्छा शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव की संसद का रूप ले चुकी है. 

संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र केवल राष्ट्रों की ओर से या राष्ट्रों के लिए किया गया आह्वान मात्र नहीं है. यह तो संसार के समस्त लोगों द्वारा किया गया सदघोष है कि अपनी भावी पीढ़ी को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाए और सच्ची स्वतंत्रता के वातावरण में एक नई विश्व-व्यवस्था की रचना की जाए.

यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा. आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए अधिक महत्व रखती है. अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज, वस्तुत: हर नर, नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में यत्नशील हैं. संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समस्त मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलंबित सामूहिक कृति तथा सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके.

स्वयं अपने इतिहास और राजनीतिक अनुभव से हमने सीखा है कि वास्तविक सत्ता सरकारों में नहीं, जनता में निहित है, और जो उनकी इच्छा और समर्थन पर आश्रित है. आज से 30 वर्ष पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनता ने हथियार उठाए बिना बड़ी हिम्मत से एक शक्तिशाली साम्राज्य का सामना किया और उससे देश को मुक्ति दिलाई. इस वर्ष के प्रारंभ में हमारी जनता ने एक स्वार्थांध सत्ता के उन सब प्रयत्नों पर सफलतापूर्वक पानी फेर दिया, जिनके द्वारा उनकी मूलभूत स्वतंत्रता को छीना जा रहा था. 

इस घटना से हमारे कई विदेशी मित्र-बंधुओं को आश्चर्य हुआ. परंतु मुझे तो स्पष्ट है कि हमारे लोगों द्वारा प्रदर्शित महान राजनीतिक साहस की प्रेरणा हमारी प्रकृति और परंपरा से मिली है. सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केंद्र बिंदु व्यक्ति रहा है. हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्राह्मांड और सृष्टि का मूल- व्यक्ति और उसका संपूर्ण विकास है.

हमारी सदा मान्यता रही है कि ईश्वर के अनेक रूप हो सकते हैं. हर भारतवासी को, भले ही वह कहीं जन्मा हो या कोई भी आस्था रखता हो, अपने उद्धार और मुक्ति का मार्ग ढूंढने की स्वतंत्रता रही है. साथ ही हमारे मनीषियों ने वैदिक युग से लेकर अब तक सदा ही हमें अपने साथी मानवों के प्रति करुणा और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है. गांधी जी ने इस तत्व का सार उनके प्रिय शब्द ’अंत्योदय’ में व्यक्त किया है. ’अंत्योदय’ का अभिप्राय है : निम्नतम और निर्धनतम वर्गों के हितों की रक्षा और कल्याण, जिसके लिए प्रत्येक समाज को संलग्न रहना चाहिए.

मेरा विश्वास है कि हमारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में निरंतर सर्वोच्च स्थान मनुष्य, उसके सुख और कल्याण तथा मानव की आधारभूत एकता को मिलना चाहिए. मेरा अभिप्राय किसी आकृतिहीन मानव से नहीं है, जो अतीत काल में निरंकुशता को थोपने का बहाना रहा है, मेरा मतलब जीते-जागते मानव से है. उसकी संवेदनाएं और अपेक्षाएं, उसका सुख और दुख हमारे प्रयत्नों का केंद्र बिंदु होना चाहिए.

अध्यक्ष महोदय, हम विश्व शांति के, ऐसी शांति के, जो जीवंत है, प्रबल समर्थक हैं. विश्व शांति हमारे सारे प्रयत्नों की आधारशिला है. शांति की परिभाषा केवल युद्ध न होना मात्र नहीं है. विश्व शांति का ताना-बाना किसी समय भी छिन्न-भिन्न हो सकता है. उसका संरक्षण तो केवल उन सामूहिक प्रयत्नों से हो सकता है, जो राष्ट्रों के बीच विद्यमान भारी असमानता और असंतुलन को दूर कर सकें, एक राष्ट्र पर दूसरे राष्ट्र के प्रभुत्व और शोषण का अंत कर सकें और संसार के समस्त लोगों को बराबरी के आधार पर अवसर और अधिकार प्रदान कर सकें.

नि:संदेह हर देश अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण और संवर्धन करना चाहता है. पर कोई देश सबसे अलग-थलग होकर चहारदीवारी के भीतर नहीं रह सकता.  हमें यह समझना होगा कि विश्व के देशों में पारस्परिक निर्भरता के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है. इसी में विश्व मानव कल्याण है. इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सब अपने-अपने राष्ट्रीय क्षितिजों के पार दृष्टि दौड़ाएं. पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव-प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है.

जब भारत ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वातंत्र्य संग्राम छेड़ा था, तब से विश्व एक लंबा रास्ता तय कर चुका है. एक एशियाई देश के नाते हमने वियतनाम के बहादुर लोगों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झेले गए अपार कष्टों और अनगिनत बलिदानों को बड़ी संवेदना के साथ देखा. उनकी अंतत: सफलता मानव की आत्मशक्ति की ज्वलंत परिचायक तथा दासता के विरुद्ध उसके अदम्य प्रतिरोध के प्रति श्रद्धांजलि है.

हमें प्रसन्नता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वियतनाम के पुनर्निमाण और वहां के लोगों के पुनर्वासन के लिए अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर सहायता देने की योजना बनाई है. भारत वियतनाम को अपनी ओर से यथासंभव और भरसक सहायता देने के लिए तत्पर है.

भारत, वियतनाम समाजवादी गणराज्य के संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश का सहर्ष स्वागत करता है. नये अफ्रीकी राज्य जिबूटी का भी हम हार्दिक अभिनंदन करते हैं. इन दोनों देशों की सदस्यता से संयुक्त राष्ट्र संघ और भी विश्वव्यापी हो गया है. इन दोनों देशों के साथ भारत के मधुर मैत्री संबंध हैं और हम आशा करते हैं कि भविष्य में हमारे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी. 

इस अवसर पर मैं साइप्रस के दिवंगत राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोस के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूं. स्वर्गीय आर्चशिप एक विश्वनेता थे और वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे. उन्होंने साइप्रस की आजादी का सृजन तो किया ही, साथ ही उसके अस्तित्व के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त किया.

अध्यक्ष महोदय, महासभा के समक्ष जो कार्यसूची है, उसमें संसार की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं सम्मिलित हैं. मैं इनमें से कुछ ऐसे विशिष्ट प्रश्नों का उल्लेख करना चाहूंगा, जिनका तात्कालिक महत्व है, और जिनको हमारे इस सामूहिक विचार-विनिमय में प्राथमिकता दी जानी चाहिए. 

हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या दक्षिणी अफ्रीका में मानव अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए हो रहे महान संघर्ष की है. भारत ने सदैव ही राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अनावश्यक रक्तपात और हिंसा का विरोध किया है. हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो. पराधीनता के अंधकारपूर्ण काल में भी भारत कतिपय आधारभूत सिद्धांतों पर दृढ़ था. ये सिद्धांत थे औपनिवेशिक दमन का तीव्र विरोध और रंगभेद के  प्रत्येक हनन की पूर्ण अस्वीकृति. इन सिद्धांतों के प्रति स्वतंत्र भारत की श्रद्धा आज भी अधिक गहरी हो गई है.

अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है. प्रश्न यह है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा से रहने के अपहरणीय अधिकार हैं या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहे. नि:संदेह रंगभेद के सभी रूपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए. रंगभेद निश्चित रूप से समाप्त होना चाहिए. इसका अस्तित्व मानवता पर कलंक और संयुक्त राष्ट्र संघ पर एक गहरा आक्षेप है.

भारत चाहता है कि जिम्बाब्वे की समस्या का शांतिपूर्ण ढंग से अतिशीघ्र समाधान हो. भारत ने इसी संदर्भ में आंग्ल-अमेरिकी प्रस्तावों के उन विधायक अंशों का स्वागत किया है, जो एक विशिष्ट समयावधि में वास्तविक बहुमत शासन की स्थापना की ओर इंगित करते हैं. आशा है कि इस विषय पर हाल ही में सुरक्षा परिषद में स्वीकृत प्रस्ताव से युद्ध-विराम होगा और अंततोगत्वा समस्या का समाधान निकलेगा. यह अधिकांश इस बात पर निर्भर है कि रियान-ह्यूझान का अवैधानिक शासन अपना दुराग्रह और अकड़ त्यागने और विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है या नहीं ?

जब तक स्मिथ सरकार हटा नहीं दी जाती और जब तक लंबे समय से त्रस्त जनता को स्वाधीनता की पुन: प्राप्ति नहीं हो जाती, हम यह कैसे आशा कर सकते हैं कि स्वतंत्रता के सेनानी अपने हथियार रख देंगे. भारत जिम्बाब्वे में अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत देशभक्त शक्तियों के प्रति अपने ठोस समर्थन की पुन: पुष्टि करता है, जो भारी बने रहने के निष्फल प्रयास में रियान-ह्यूझान विश्व जनमत की जानबूझकर अवहेलना करता रहता है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने समस्त अधिकारों का प्रयोग कर अवैधानिक और अल्पमतीय सत्ता और उसके समर्थक दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध अनिवार्य प्रतिबंधों को अधिक व्यापक करना पड़ेगा. इसी से अवैधानिक शासन का अंत निकट आएगा और जिम्बाब्वे के लोगों को अपने भाग्य का स्वयं फैसला करने का अपहरणीय अधिकार प्राप्त होगा.

नामीबिया में भी, जिसे अंतर्राष्ट्रीय राज्य क्षेत्र का दर्जा मिला हुआ है,  संयुक्त राष्ट्र संघ की सत्ता, विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को समान तथा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. 

अभी यह देखना बाकी है कि पाश्चात्य देशों के प्रयत्न दक्षिण अफ्रीकी सरकार को कहां तक नामीबिया छोड़ने के लिए तैयार करते हैं, जिससे कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव कार्यान्वित हो सकें. वालविस बे को, जो नामीबिया का एक भाग है, अपने राज्य क्षेत्र में स्थित केप प्रांत में शामिल करने के दक्षिण अफ्रीका के निर्णय की हम निंदा करते हैं. इसी तरह नामीबिया के एक क्षेत्र का अणु परीक्षण के लिए कथित उपयोग करने की योजना की भी हम भर्त्सना करते हैं.

हम पूर्ण रूप से स्वापो (दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका जन संस्था) के साथ हैं और सभी देशों को उसके प्रातिनिधिक स्वरूप को स्वीकार करने की अपील करते हैं. हम नामीबिया की जनता से अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह अपना सशक्त संघर्ष छोड़ दे. यदि आजादी हासिल करने का एक यही उपाय रह जाता है. किंतु हम समस्या का समाधान केवल स्वापों के प्रयत्नों  और संघर्ष पर ही नहीं छोड़ सकते. इस कार्य में संयुक्त राष्ट्र संघ ने दक्षिण अफ्रीकी प्रशासन को नामीबिया से पूर्ण रूप से हट जाने के लिए बाध्य करने की अपनी समर्थता का निश्चय ही अभी तक पूरा उपयोग नहीं किया है.

जबकि दक्षिण अफ्रीका में हम उपनिवेशवाद और रंगभेद के निकृष्टम रूप का सामना कर रहे हैं, पश्चिम एशिया में विश्व शांति को और भी अधिक विस्फोटक खतरा है. यहां भी कुछ मूलभूत सिद्धांतों का प्रश्न है. सर्वप्रथम किसी को भी आक्रमण के फलों का उपयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती. दूसरे किसी भी जनमसूह को अपने ही देश में रहने के अपहरणीय अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. तीसरे, सीमा संबंधी सभी विवाद शक्ति प्रयोग से नहीं, बल्कि बातचीत के जरिये सुलझाए जाने चाहिए.

इस दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट है कि इजराइल ने बल प्रयोग द्वारा जिन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कब्जा किया है, उसे मान्यता नहीं दी जा सकती. आक्रमण समाप्त होना ही चाहिए. यह भी आवश्यक है कि फिलिस्तीन के अरब लोगों को, जिन्हें बलपूर्वक अपने घरों से उजाड़ दिया गया है, पुन: अपने देश में लौटने के अपहरणीय अधिकार का उपयोग करने दिया जाए. इस क्षेत्र के सभी लोगों और राज्यों को अपने पड़ोसियों के साथ शांति और मेल-मिलाप से रहने का अधिकार है. इस भूखंड की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए यह एक आवश्यक शर्त है. हाल में इजराइल ने वैस्ट बैंक और गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र संघ को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए.

यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता, तो इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं. यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का शीघ्र ही पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पी.एल.ओ. को प्रतिनिधित्व दिया जाए.

साइप्रस की स्थिति का भी समाधान बाकी है. हमें अब भी आशा है कि द्विपक्षीय सामुदायिक वार्ताएं पुन: प्रारंभ होंगी और समस्या का ऐसा हल निकलेगा जो साइप्रस गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता, सार्वभौमिकता और गुटनिरपेक्षता के अनुरूप होगा.

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक समस्याओं का महत्व अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है. समानता और न्याय पर आधारित एक नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को विश्व समाज में मान्यता मिल गई है. अब इसे मूर्त रूप देने की दिशा में शीघ्र आगे बढ़ना है, जिससे विश्व के सभी नर-नारियों को अधिक न्यायसंगत और समुचित अवसर तथा अपने श्रम के लिए लाभ प्राप्त हो.

अध्यक्ष महोदय, मैं पहले इस बात का उल्लेख कर चुका हूं कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने में अनेक अंतर्विरोध और चुनौतियां हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के  30 वर्ष बाद आज हमें, पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है कि दरिद्रता के सागर में कोई एक राष्ट्र या राष्ट्र समूह समृद्धि का द्वीप बनकर नहीं रह सकता. 

दो दशकों से भी अधिक  समय से अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर विचार-विनिमय हो रहा है. परंतु विकास दशक के लिए जो स्वरूप लक्ष्य निश्चित किए गए थे, उनकी या तो अवहेलना कर दी गई है या उन्हें पीछे धकेल दिया गया है. बढ़ी हुई विषमताओं को कम करने के लिए विकसित देशों से संसाधनों और तकनीकी ज्ञान का पर्याप्त स्थानांतरण नहीं हुआ. 

इस वर्ष पेरिस में हुए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग सम्मेलन में इन सभी समस्याओं पर विस्तृत रूप से विचार-विमर्श हुआ था. यद्यपि इन 18 महीनों के प्रदीर्घ विचार-विनिमय के फलस्वरूप कुछ प्रगति हुई, किंतु पेरिस सम्मेलन का परिणाम, कुल मिलाकर अत्यंत निराशाजनक रहा है.

एक विशेष कोष कायम किया जाएगा और ओ.डी.ए. (अधिकृत विकास सहायता) के लिए दिए गए कुल आश्वासनों की भी पुष्टि कर दी गई है. लेकिन संसाधनों और तकनीक के स्थानांतरण तथा कर्ज के बोझ से बचने की गंभीर समस्याओं का हल निकलना अभी बाकी है. यद्यपि वस्तुओं के एकीकृत कार्यक्रम के अंतर्गत सामान्य कोष पर सिद्धांतत: सहमति हो गई है, किंतु इसे व्यवहार में मूर्त रूप देना अभी शेष है.

ऐसे तर्क और विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो विकासशील देशों के सम्मुख खड़े गंभीर संकट का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं करते. संभवत: इसका कारण यह है कि विकसित देश अपनी स्वयं की समस्याओं और कठिनाइयों में उलझे हुए हैं. कई स्थितियों में तो जो एक हाथ से दिया जा रहा है, उसे दूसरे हाथ से वापस लिया जा रहा है.

प्राय: यह दावा किया जाता है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति निर्धनता को दूर करने और उन्नति के लाभों को समस्त संसार में उपलब्ध करने की क्षमता रखती है, किंतु सत्य तो यह है कि विकासशील देशों को सही ढंग की तकनीक न मिलने के कारण धनी और निर्धन देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है.

निस्संदेह युद्धोपरांत की शताब्दियों में अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य का कई गुना विस्तार हुआ है, परंतु उसका लाभ अधिकांशत:  विकसित देशों को मिला है और उन्हीं देशों के लोगों के आर्थिक विकास तथा जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक हुआ है.

विकासशील  देशों के लिए विभिन्न व्यापार संबंधी प्रतिबंधों को शिथिल करने तथा निर्यातों के लाभकारी मूल्यों को सुरक्षित रखने की समस्याएं आज भी उसी स्थिति में हैं, वो ऊर्जा के संकट के तुरंत बाद थीं. तेल आयातक देशों की आर्थिक समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि कर्ज के बोझ को निरंतर बढ़ाने के अतिरिक्त उनके सम्मुख कोई अन्य उपचार नहीं दिखाई देता.

इसमें संदेह नहीं कि विकसित देशों की अपनी आंतरिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें अपने दृष्टिकोणों और नीतियों को तात्कालिक तथा संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठाना आवश्यक है. यह पूछा जा सकता है कि क्या विकसित देशों के आर्थिक ढांचे की समस्याओं के समाधान का युक्तिसंगत और प्रबुद्ध रास्ता यह नहीं है कि इन देशों से विकासशील  देशों में विशिष्ट मात्रा में वित्तीय और प्रौद्योगिक क्षमता का स्थानांतरण किया जाए ? समृद्ध देशों की बेरोजगारी और आर्थिक उथल-पुथल का समुचित समाधान संसार के तीन अरब लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होने पर ही हो सकता है.

भारत ने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय विचार-विमर्शों में उत्साह और ईमानदारी से भाग लिया है. हमारी मान्यता रही है कि संसार के आर्थिक रोगों का निवारण संघर्ष की भावना को बल देने से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की नई भावना को जागृत करने से होगा. 

अध्यक्ष महोदय, इस संबंध में मैं आपके सम्मुख महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना चाहता हूं, जिसका उन्होंने कई दशकों पहले सुझाव दिया था. जैसा आप जानते हैं, वे सचमुच में एक विश्व-मानव थे. दो दिन पूर्व ही उनका 108वां जन्मोत्सव मनाया गया था. उन्हें कुछ विशिष्ट सिद्धांतों पर आधारित विश्व अर्थव्यवस्था के संबंध में स्पष्ट बोध था. संक्षिप्त रूप से, उनके विचार भी मेरी राय में इस प्रकार थे-
-सब लोगों को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार है, भले ही उनकी अर्थव्यवस्था का रूप, उत्पादकता का स्तर तथा भौगोलिक स्थिति कुछ भी हो.
-राष्ट्रों के बीच पारस्परिक निर्भरता शोषण-रहित होनी चाहिए. असमान लोगों के बीच वास्तविक पारस्परिक निर्भरता नहीं हो सकती, अंत: असमानता को दूर करने के लिए कार्रवाई होनी चाहिए.
-विकासशील देशों को स्वावलंबन और सामूहिक निर्भरता की नीति का पालन करना चाहिए. यह एक ऐसी व्यापक रणनीति का अंश होना चाहिए, जिसका उद्देश्य विकसित देशों से संसाधनों और तकनीक का स्थानांतरण कराना होगा. 
-संसार के लोग, भले ही पृथक राष्ट्रों में बंटे हों, एक ही परिवार हैं. एक सुसंबद्ध विश्व अर्थव्यवस्था की मांग है कि सीमाओं से परे न केवल वस्तुओं, पूंजी के साधनों और तकनीक का आदान-प्रदान हो, बल्कि आदमियों का भी आवागमन होता रहे.
-आर्थिक व्यूह रचना का लक्ष्य मात्र जी.ए.पी. बढ़ाना न होकर, रोज़गार में वृद्धि करना हो.
-उपभोग में असंयम के विरुद्ध एक विश्वव्यापी आंदोलन की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा असंयम मनुष्य को गिराता है और उसे शेष समाज से दूर ले जाता है.
-न केवल विकसित, बल्कि विकासशील देशों को भी अपने देश की आम जनता और आभिजात्य वर्ग के बीच की खाई को भरना चाहिए. न्यायसंगत  विश्व अर्थव्यवस्था का आधार हर देश में एक न्यायोचित अर्थव्यवस्था की रचना हो सकता है.

अध्यक्ष महोदय, संसार में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे नंबर का देश होने के नाते भारत की समस्याएं भी बहुत जटिल हैं. हमारी प्रगति उल्लेखनीय है, लेकिन हमारे सम्मुख कई चुनौतियां विद्यमान हैं. एक ऐसे देश के नाते जिसने लोकतंत्र में अपनी आस्था पुन: व्यक्त की है और जो सहमति के अधार पर शासन चलाना चाहता है, हमारा काम और भी अधिक क्लिष्ट हो गया है.

हमें गत कुछ  दशकों तथा सदियों से जो अनेकानेक समस्याएं विरासत में मिली हैं, उन्हें हल करने के लिए हमारे पास न तो कोई जादू की छड़ी है और न कोई तुरत-फुरत समाधान. लेकिन हमें आशा और विश्वास है कि हम सफल होंगे. स्वतंत्रता के विगत 30 वर्षों में हमारे लोगों ने अपनी परंपरागत प्रतिभा के बल पर विज्ञान और तकनीक द्वारा प्रस्तुत नये अवसरों के महत्व को समझा है और राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रगति के इन नवीन उपकरणों का प्रयोग करने की क्षमता दिखाई है.

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की उपयोगिता को समझते हुए भी, हमारा प्रयास यही रहा है कि अपनी राष्ट्रीय प्रगति और आर्थिक स्वावलंबन के लिए हम अपने ही प्रयत्नों पर निर्भर रहें. हमारी नई सरकार नई प्राथमिकताओं के निश्चित करने और नियोजन तथा नीतियों में जो विकृतियां आ गई थीं, उन्हें दूर करने के लिए तत्पर है. आर्थिक क्षेत्र में अपने विकास के लिए हम औद्योगिक देशों की आंख मूंदकर नकल नहीं करना चाहते. हम ऐसे एकात्मक नियोजन की ओर बढ़ना चाहते हैं, जिसका केंद्रबिंदु मानव हो. हम अपना ध्यान ग्रामीण विकास पर अधिक केंद्रित करना चाहते हैं, क्योंकि हमारे देश की बहुसंख्यक जनता गांवों में रहती है और उसका जीवन वहीं बीतेगा. हम आभिजात्य वर्ग के उपभोगवाद पर आधारित बहुलता नहीं चाहते. मनुष्य का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके पास क्या है, बल्कि उसकी कसौटी यह है कि वह कैसा है ? हम बेरोजगारों को रोजगार देना चाहते हैं और पिछड़े वर्गों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृतसंकल्प हैं. नगरों की ओर दौड़ने की प्रवृत्ति को उलटने या कम से कम रोकने की हमारी योजना है. विकासशील देशों के लिए यह एक बहुत बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है. कई दशक पहले गांधी जी ने इस बारे में चेतावनी दी थी.  

अधिक सुहाने प्रभात के लिए जूझते हुए भी भारत अपने आर्थिक और तकनीकी अनुभव में अपने बराबर विकासशील देशों को सहभागी बनाने के लिए सदैव तत्पर रहा है. हम अपनी विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में अन्य विकासशील देशों के हजारों  छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. हमारा विश्वास है कि यह विविधतापूर्ण प्रशिक्षण उन देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास में सहायक होगा. हम विकासशील देशों के बीच परस्पर लाभकारी सहयोग बनाने पर जोर दे रहे हैं और इससे हम केवल अपने लिए किसी प्रकार के राजनीतिक या आर्थिक लाभ की कामना नहीं करते. 

अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व नहीं चाहता. जनता सरकार सभी देशों के साथ स्नेह, सहयोग और समझदारी के सेतु निर्माण करने के लिए सक्रिय है. सर्वप्रथम हमारा ध्यान नजदीकी देशों के साथ संबंध सुदृढ़ करने की ओर गया है. यह मैत्री संदेश लेकर हाल ही में नेपाल, बर्मा और अफगानिस्तान गया था. पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को हम सुदृढ़ करना चाहते हैं, जिससे न केवल स्थायी शांति कायम हो, बल्कि लाभदायक सहयोग में भी वृद्धि हो.

चार दिन पूर्व 30 सितंबर को भारत और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों ने गंगाजल की समस्या पर हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह एक व्यापक समझौता है, जिसमें अल्पकालीन समस्या को हल किया गया है और दीर्घकालीन समस्या के समाधान की नींव रखी गई है. इससे दोनों देशों की समुचित आवश्यकताओं की पूर्ति होगी.

इस समस्या ने हमारे पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधों में पिछले 25 वर्षों से बिगाड़ पैदा कर रखा था. समझौता हमारे इस विश्वास की पुष्टि करता है कि ऐसी जटिल समस्या को, जो दो पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है, ईमानदारी से प्रेरित द्विपक्षीय चर्चा के द्वारा ही हल किया जा सकता है. ऐसे हल के लिए दोनों पक्षों को कुछ न कुछ त्याग करना पड़ता है और आदान-प्रदान के आधार पर आगे बढ़ना होता है.

पिछले एक वर्ष में दक्षिण एशिया के देशों में अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं. फिर भी इन देशों के लोगों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि दक्षिण एशिया पिछले कई दशकों की अपेक्षा आज तनाव से अधिक मुक्त है. यदि सचमुच दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो जाए, तो हम सब, जिन पर विकास का सारा बोझ है, अपने विकास की ओर अधिक ध्यान दे सकेंगे और अपने संसाधनों को विनाश से हटाकर विकास में लगा सकेंगे.

वस्तुत: इसी संदर्भ में हम यह विशेष अपील करते हैं कि हमारे चारों तरफ के हिंद महासागर के विशाल क्षेत्र को बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और सैनिक अड्डों से मुक्त रखा जाए, जिनका उपयोग  आक्रमण के लिए हो सकता है. विस्तृत परिपेक्ष्य में भारत तनावशैथिल्य के प्रयत्नों का स्वागत करता है. भारत चाहता है कि तनावशैथिल्य केवल यूरोप तक सीमित न रहे, बल्कि विश्वव्यापी हो और उसके लाभ विश्व के सब देशों और लोगों को मिलें.

वर्षानुवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में अनगिनत प्रस्ताव पास किए गए हैं, जिनमें पूर्ण निरस्त्रीकरण, विशेषकर आणविक निरस्त्रीकरण की मांग की गई है. अणु शस्त्रों की दौड़ बहुत भयावह स्थिति में पहुंच गई है. विनाशकारी हथियारों के अंबार ने संसार को बड़ी विकट दुविधा में डाल दिया है. हमसे कहा जा रहा है कि युद्ध रोकने के लिए आणविक शस्त्र आवश्यक हैं और यह कि इन शस्त्रों के प्रयोग का डर ही युद्ध की रोकथाम करने में समर्थ हो सकता है. हम इस दावे को स्वीकार नहीं करते.

हमारी धारणा है कि आणविक शस्त्र खतरनाक हैं, भले ही वे एक के पास हों, कुछ देशों के पास हों या कई देशों के पास हों. हम केवल आणविक शस्त्रों के फैलाव के ही विरुद्ध नहीं हैं, वस्तुत: हम तो आणविक शस्त्रों के ही खिलाफ हैं. भारत सदा से ही आणविक शस्त्रों को प्राप्त करने और उन्हें विकसित करने का विरोधी रहा है.

तथ्य तो यह है कि भारत पहला देश था, जिसने संयुक्त राष्ट्र संघ में 20 वर्ष पूर्व समस्त आणविक शस्त्रों के परीक्षण पर रोक लगाने का मसला उठाया था. उस समय बड़ी शक्तियां हमारी बात को सुनने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं.  जब वे तैयार हुईं, तो उन्होंने केवल आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए. यह 15 वर्ष पूर्व की बात है. उस समय विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई और यह उम्मीद बंधी कि पूर्णरूपेण परीक्षण प्रतिबंध संधि पर भी जल्दी ही समझौता हो जाएगा. लेकिन हम अभी भी उसकी राह देख रहे हैं. आंशिक शस्त्र प्रतिबंध लागू करने के बाद, पहले की बजाय अधिक अणुशस्त्र परीक्षण हुए हैं. भूमिगत परीक्षण तो अभी भी जारी हैं. आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है.

भारत न तो आणविक शस्त्र शक्ति है और न बनना चाहता है. नई सरकार ने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुन: घोषणा की है. हमारे प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने कहा है कि यदि विश्व के अन्य सभी देश आणविक शस्त्र बनाने लगें, तब भी भारत आणविक शस्त्रों को बनाने की ओर अग्रसर नहीं होगा. हमने अणु शस्त्रों के फैलाव को रोकने वाली संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, क्योंकि हम उसे एक असमान और भेदमूलक संधि समझते हैं. यह संधि दस वर्ष पूर्व तैयार हुई थी. तब से अब तक ऐसी कोई घटना नहीं घटी, जिसके कारण हमें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई हो.

अध्यक्ष महोदय, भारत ने लगभग  25 वर्ष पूर्व आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग के कार्यक्रम को प्रारंभ किया था. अणुशक्ति के शांतिमय उपयोग में हमारा विश्वास दृढ़ है. हम इस दृष्टिकोण से पूर्णतया सहमत हैं कि आणविक शस्त्रों का फैलाव और आणविक प्रौद्योगिकी का विस्तार दो पृथक चीजें हैं और इनके स्पष्ट अंतर को समझा जाना चाहिए.

हम उन सब कदमों और नीतियों का पहले की तरह विरोध करेंगे, जो आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग में रुकावट डालेंगी, साथ ही हम उन सब कदमों और नीतियों का भी विरोध करेंगे, जो भेदभावपूर्ण हैं. हम अन्य देशों के साथ इस समस्या पर पूर्ण सहयोग देने और चर्चा करने के लिए तैयार हैं कि आणविक शस्त्रों के खतरे को किस प्रकार समाप्त किया जाए.

यह नितांत आवश्यक है कि राजनीतिक दिमाग अपने आपको सैनिक तर्कों से मुक्त रखे. यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति विवेक से काम लेकर आणविक शस्त्रों की होड़ को आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में पलट दे. हमें विश्वास है कि आगामी वर्ष निरस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो अधिवेशन होने वाला है, उसमें आणविक निरस्त्रीकरण की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने की दिशा में ध्यान केंद्रित होगा और निरस्त्रीकरण से ऐसे उपाय ढूंढे जाएंगे, जो एक निश्चित समयावधि में सफलतापूर्वक कार्यान्वित किए जा सकें.

पहले ही अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना में शस्त्रों की निरर्थक दौड़ में विश्व के सीमित संसाधनों के फंसे रहने से देरी हो रही है.  वर्तमान कीमतों के आधार पर संसार का कुल सैन्य खर्च लगभग 400 अरब डॊलर है. इसका 90 प्रतिशत विकसित देश खर्च कर रहे हैं, जो विकासशील देशों को दी जाने वाली अधिकृत विकास सहायता से 20 गुना अधिक है. यदि शस्त्रों पर किए जाने वाले व्यय में पांच प्रतिशत की कमी हो जाए, तो उससे विकासशील देशों को अपने सामान्य आर्थिक लक्ष्य को प्राप्त करने में भारी सहायता मिलेगी. अत: निरस्त्रीकरण न केवल शांति तथा सुरक्षा के लिए बल्कि त्वरित आर्थिक सामाजिक प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण है.

इसमें संदेह नहीं कि हमें काफी कुछ करना अभी बाकी है. हम अकसर इच्छाशक्ति या प्रगति की कमी की शिकायत करते रहते हैं. लेकिन हमें हताश या निराश होने की जरूरत नहीं है. कई विफलताओं के बावजूद भी, संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियां बड़ी प्रभावशाली रही हैं. मैं आई.एल.ओ., डब्ल्यू. एच. ओ., यूनेस्को, यूनीसेफ, एफ.ए.ओ. अंकटाड, यूनीडी और संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य संस्थाओं के काम की प्रशंसा करना चाहता हूं. यदि इन्हें पर्याप्त धनराशि मिले, तो ये संस्थाएं मानव व्यथाओं का निवारण करने और मानव कल्याण को बढ़ावा देने की दिशा में और भी बहुत काम कर सकती हैं. एक उदाहरण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मलेरिया के उन्मूलन के लिए किए गए उपाय हैं. आज मलेरिया पुन: अपना सिर उठा रहा है. इसके निराकरण के लिए डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा बनाए गए कार्यक्रम में लगभग 45 करोड़ डॊलर लगेंगे. यह राशि संसार में प्रतिदिन होने वाले सैन्य खर्च से आधी है. फिर भी धन के अभाव में यह कार्यक्रम पिछड़ रहा है.

अध्यक्ष महोदय, भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विश्व संगठन के रूप में समर्थन, सुदृढ़ीकरण तथा विकास होना चाहिए, जिससे न केवल विश्व शांति को संरक्षण तथा मानव अधिकारों का संवर्धन हो, बल्कि वह आर्थिक सहयोग की वृद्धि और राष्ट्रों के क्रियाकलाप में मेल बैठाने के दायित्व का भी निर्वाह कर सके. यह अंतर्राष्ट्रीय समाज के सम्मुख एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य है.

अंत में मैं पुन: अपने भाषण के मूल विषय पर आना चाहता हूं. हमारे सम्मुख महानतम कार्य मानव कल्याण का है, जो मानवता के सम्मुख समुपस्थित सभी समस्याओं को स्वयं में समाहित करता है. यह कार्य मनुष्य की जाति, रंग, संप्रदाय या राष्ट्रीयता की परिधि से परे है. हमारी सारी समस्याएं- युद्ध और शांति का प्रश्न, आर्थिक और तीव्र गति से समाप्त हो रहे प्राकृतिक संसाधन, सब हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाते हैं. हमारे इस पारस्परिक निर्भर संसार में हममें से प्रत्येक अपने भाई का रखवाला है.

हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय, जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों बना रहेगा- वह है मानव का भविष्य. इस मानव को यह पृथ्वी विरासत में मिली है और उसने इस धरती का विकास किया है और इससे स्वयं पोषण पा रहा है. यदि हम यह अनुभव करते हैं कि मानव की अस्तित्व रक्षा अन्य करोड़ों मानवों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है, जैसी कि पहले कभी नहीं थी, तो हम अपने समय के इस एकमात्र निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि राष्ट्रीय प्रभुसत्ता का अंतर्राष्ट्रीय परस्पर निर्भरता के साथ निश्चित रूप से मेल बैठाना चाहिए.

मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएंगे. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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