Wednesday, August 19, 2026

परम्परागत खेती विकास योजना : जैविक खेती से लहलहाएंगी फसलें

देश में प्राचीन काल से ही जैविक खेती की जाती रही है। भारत परम्परागत रूप से विश्व का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है। अब भी देश के बहुत बड़े भू–भाग में परम्परागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। जैविक खादों पर आधारित पारम्परिक खेती को जैविक खेती कहा जाता है। बदलते समय के साथ कृषि भूमि कम होने लगी और बढ़ती जनसंख्या का भार सीमित कृष क्षेत्र पर आ गया। ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक उत्पादन लेने की होड़ लग गई। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा। इससे उत्पादन तो बढ़ गया, परंतु दिनों-दिन भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। निसंदेह रासायनिक उर्वरकों के कारण उत्पादन बढ़ा, किन्तु इस तरह अधिक समय तक खेती नहीं की जा सकती। इसे देखते हुए पारम्परिक जैविक खेती और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज विश्व भर में जैविक खाद्य के लिए मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। जैविक खेती की तकनीक को बढ़ावा मिलने से देश इन खाद्य पदार्थों के विशाल निर्यात की संभावनाओं को साकार कर सकता है। इस सबको ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू की है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का एक सविस्तारित घटक है। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत जैविक खेती को क्लस्टर पद्धति और प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा वर्ष 2015-16 से एक नई परम्परागत कृषि विकास योजना का शुभारम्भ किया गया है। इस योजना का उद्देश्य जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण और विपणन को प्रोत्साहन करना है। इस योजना के अंतर्गत सम्मिलित घटक सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली या प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली को सुदृढ़ता प्रदान करने के तारतम्य में हैं। इसी दिशा में भारत सरकार कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा क्षेत्रीय परिषद के रूप में राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र गाजियाबाद से पंजीयन करवाकर, प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली लागू करने संबंधी कार्यवाही के लिए जिला आतमा (एटीएम) समितियों को अधिकृत किया गया है। योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये एवं तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। इन रुपयों का इस्तेमाल किसानों को जैविक खेती के बारे में बताने के लिए होने वाली बैठक, एक्सपोजर विजिट, प्रशिक्षण सत्र, ऑनलाइन पंजीकरण, मृदा परीक्षण, जैविक खेती व नर्सरी की जानकारी, लिक्विड बायोफर्टीलाइजर, लिक्विड बायो पेस्टीसाइड उपलब्ध कराने, नीम तेल, बर्मी कंपोस्ट और कृषि यंत्र आदि उपलब्ध कराने पर किया जाएगा। वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन एवं उपयोग, बायोफर्टीलाइजर और बायोपेस्टीसाइड के बारे में प्रशिक्षण, पंच गव्य के उपयोग और उत्पादन पर प्रशिक्षण आदि इसके साथ ही जैविक खेती से पैदा होने वाले उत्पाद की पैकिंग एवं परिवहन के लिए भी अनुदान दिया जाएगा।

इस योजना का उद्देश्य प्रमाणित जैविक खेती के माध्यम से वाणिज्यिक जैविक उत्पादन को बढ़ावा देना है। उपज को कीटनाशक मुक्त करके उपभोक्ता को पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। जैविक खेती से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और व्यापारियों को भी बाजार उपलब्ध होगा। इसके साथ ही यह योजना उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधन जुटाने के लिए भी किसानों को प्रेरित करेगी। किसान प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करके भरपूर और उन्नत फसल उगा सकेंगे। 

परम्परागत कृषि विकास योजना पहली व्यापक योजना है, जिसका कार्यान्वयन प्रति 20 हैक्टेयर के क्लस्टर आधार पर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। किसान हित समूहों को जैविक खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। क्लस्टर के अंतर्गत किसानों को अधिकतम एक हैक्टेयर तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। जैविक खेती का काम शुरू करने के लिए 50 या उससे अधिक ऐसे किसान एक क्लस्टर बनाएंगे, जिनके पास 50 एकड़ भूमि होगी। इस तरह तीन वर्षों के दौरान जैविक खेती के तहत 10 हजार क्लस्टर बनाए जाएंगे, जो पांच लाख एकड़ के क्षेत्र को कवर करेंगे। प्रमाणीकरण पर व्यय के लिए किसानों पर कोई भार या दायित्व नहीं होगा। फसलों की बुआई के लिए, बीज खरीदने और उपज को बाजार में पहुंचाने के लिए हर किसान को तीन वर्षों में प्रति एकड़ 20 हजार रुपये दिए जाएंगे। परम्परागत संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा और जैविक उत्पादों को बाजार के साथ जोड़ा जाएगा। यह किसानों को शामिल करके घरेलू उत्पादन और जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण को बढ़ाएगा। 

उल्लेखनीय है कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती हो रही है, जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। नवंबर, 2017 तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 किसान समूहों का गठन कर लिया गया है, 2500 किसान हित समूह लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है। 

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार विश्व के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है। बेहद गहरी समझ के साथ वे इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं। आज, वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर ऐसा न करने का निर्णय किया है। इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशकों में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं, जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसंख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गई है, जिसमें हम रासायनिक उर्वरक, कीट-रोग नाशी एवं अन्य रसायनों का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान्न उत्पन्न करने की समस्या पनप गई है।

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के अनुसार परम्परागत खेती विकास योजना के अधीन 29 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र की वार्षिक कार्य योजना 7186 क्लस्टर विकसित करने के लिए कुल 511.76 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है, जिसमें से वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यो को 226 करोड़ रूपये निर्मुक्त किए गए। वर्ष 2016-17 के दौरान उपयोग में लाए जाने के लिए 2814 कलस्टरों के निर्माण के लिए 10 हजार कलस्टरों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केन्द्रीय प्रोयोजित योजना के रूप में परम्परागत कृषि विकास योजना के लिए वर्ष 2016-17 के लिए 297 रूपये की राशि आवंटित की गई।

उत्तर प्रदेश में परम्परागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारंभ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। केन्द्र सरकार की परम्परागत खेती विकास योजना के अंतर्गत पथम चरण में बुंदेलखंड के सभी जिलों समेत उत्तर प्रदेश के 15 जिलों को इसमें शामिल किया गया है। पहले चरण में यह योजना तीन वित्तीय वर्ष के लिए बनाई गई है। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए गैर सरकारी संगठन का चयन किया गया है। क्लस्टर को जैविक खेती की पूरी जानकारी के साथ-साथ बेहतर क्रियान्वयन की तकनीक और तमाम संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पूरे प्रदेश में 28,750 एकड़ भूमि का चयन किया गया और 575 क्लस्टर बनाए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए  जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये व तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की मदद प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। 
किसानों के जैविक उत्पादों के विपणन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पांच लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केन्द्र खुलवा रही है। इस योजना के तहत वर्ष 2015-16 में केन्द्र ने उत्तर प्रदेश को 2052.20 करोड़ की राशि दी, लेकिन इसमें से खर्च केवल 1075.692 करोड़ रुपये हुए। वर्ष 2016-17 में केन्द्र अब तक इस मद में उत्तर प्रदेश को 1270.64 करोड़ रुपये दे चुका है।

कृषि मंत्री के अनुसार वर्ष 2016 में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत उत्तराखंड में गंगा की धारा से लेकर पश्चिम बंगाल तक 1657 ग्राम पंचायतों में नमामि गंगे परियोजना के तहत परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1657 क्लस्टर में जैविक खेती विकसित की जाएगी। इस परियोजना के अंतर्गत कृषि मंत्रालय क्लस्टर निर्माण के साथ एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और माइक्रो सिचाई तकनीक पर प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराएगा। 

यदि हम इन रासायनिक आदानो के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करें, तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक पदार्थों का बड़ा भाग मिट्टी, भू-जल, हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है। ये रसायन छिडकाव के समय वायु के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर, पानी के अन्य स्रोतो को भी प्रदूषित कर देते हैं। रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, और मानवों पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं। धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।

निसंदेह जैविक खेती से न केवल भूमि की उर्वरता बनी रहेगी, अपितु खाद्यान्न भी विषैले होने से बच जाएंगे.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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