Friday, June 5, 2026

भारतीय ज्ञान परम्परा राष्ट्र निर्माण का आधार : डॉ. सौरभ मालवीय

  






कसया, कुशीनगर। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से सम्बद्ध जन शिक्षा समिति गोरक्ष प्रांत द्वारा आयोजित प्रांतीय नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग के चतुर्थ दिवस का आयोजन महर्षि अरविन्द सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, केशव नगर, कसया (कुशीनगर) में उत्साह एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित इस विशेष सत्र में भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय जीवन-दृष्टि, शिक्षा की भूमिका तथा राष्ट्र निर्माण में आचार्य के दायित्वों पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पत्रकारिता विशेषज्ञ डॉ. सौरभ मालवीय ने प्रशिक्षणार्थी आचार्यों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम का परिचय आजमगढ़ संभाग के संभाग निरीक्षक श्री दिवाकर राम त्रिपाठी ने प्रस्तुत किया। अतिथियों का स्वागत विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री धर्मेन्द्र कुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम का संचालन श्री अशोक कुमार मिश्र (प्रधानाचार्य, सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, लुचुई सहजनवां, गोरखपुर एवं प्रांत प्रचार संयोजक) ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश निरीक्षक, जन शिक्षा समिति गोरक्ष प्रांत, आदरणीय श्री जियालाल जी ने की।

अपने उद्बोधन में डॉ. मालवीय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल शिक्षा की पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र दृष्टि है। भारतीयता, ज्ञान और परम्परा का अद्भुत समन्वय ही भारतीय ज्ञान परम्परा की विशेषता है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, कर्तव्य, करुणा और लोकमंगल की चेतना से युक्त एक जीवन-दर्शन है।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में माता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। मनुष्य के जीवन का पहला शब्द “माँ” होता है और यही मातृभाव आगे चलकर मातृभूमि के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण का आधार बनता है। इसी कारण भारतभूमि को “भारत माता” कहा जाता है।

ज्ञान की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान केवल सूचना या जानकारी का संग्रह नहीं है, बल्कि यह विवेक विकसित करने की प्रक्रिया है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। जो मानवता, धर्म और लोककल्याण के अनुकूल हो, वही वास्तविक ज्ञान है। भारतीय ज्ञान परम्परा व्यक्ति को कर्तव्यबोध, आत्मानुशासन, सेवा, समर्पण और राष्ट्रनिष्ठा का मार्ग दिखाती है।

डॉ. मालवीय ने भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में कर्तव्य और मर्यादा सर्वोपरि हैं। श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राज्य का त्याग कर वनवास स्वीकार किया तथा लंका विजय के पश्चात भी “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का संदेश देकर मातृभूमि के प्रति अपने समर्पण को अभिव्यक्त किया। यह भारतीय जीवन-दर्शन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।

उन्होंने कहा कि भारत की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है। यहाँ व्यक्ति केवल स्वयं के सुख के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त करता है। भारतीय संस्कृति पशु-पक्षियों, वृक्षों, नदियों और सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा करुणा का भाव विकसित करती है।

विश्व पर्यावरण दिवस के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण भारतीय जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, पशु-पक्षियों के प्रति दया तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्परा रही है।

परोपकार की भावना को भारतीय संस्कृति का मूल तत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को छाया देते हैं, नदियाँ निरंतर बहकर जीवन का पोषण करती हैं और प्रकृति का प्रत्येक तत्व लोकमंगल के लिए कार्य करता है। मनुष्य को भी अपने जीवन को सेवा और परोपकार के लिए समर्पित करना चाहिए। उन्होंने राजा शिबि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए भारतीय न्याय-दृष्टि की करुणामूलक परम्परा को रेखांकित किया।

शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. मालवीय ने कहा कि किसी भी राष्ट्र, समाज अथवा राज्य को उसकी मूल पहचान, संस्कृति और जीवन मूल्यों के साथ सुरक्षित एवं सशक्त बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। शिक्षा ही समाज को स्थायित्व प्रदान करती है तथा नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, महापुरुषों और ज्ञान परम्परा से जोड़ती है।

उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि चरित्रवान, संस्कारित, उत्तरदायी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है। इसी उद्देश्य को लेकर विद्या भारती देशभर में शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही है। विद्या भारती की शिक्षा व्यवस्था भारतीयता, संस्कार, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना पर आधारित है, जो विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।

कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन में आदरणीय जियालाल जी ने कहा कि आचार्य समाज निर्माण की आधारशिला हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल तत्वों को आत्मसात कर ही शिक्षक भावी पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, संस्कार और चरित्र निर्माण की दिशा प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने सभी प्रशिक्षणार्थी आचार्यों से भारतीय शिक्षा-दर्शन को अपने जीवन एवं शिक्षण कार्य में उतारने का आह्वान किया।

सत्र के अंत में उपस्थित आचार्यों ने भारतीय ज्ञान परम्परा, पर्यावरण संरक्षण तथा संस्कारयुक्त शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम के माध्यम से उपस्थित सभी शिक्षकों एवं प्रशिक्षणार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया तथा प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का संदेश दिया गया। 

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