Saturday, May 23, 2026

भारत केंद्रित शिक्षा व्यवस्था : विद्या भारती का उद्देश्य
















डॉ. सौरभ मालवीय
झांसी,सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, चिरगांव में आज दिनांक 23 मई 2026 से भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत द्वारा नव चयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का शुभारंभ हुआ, जो 6 जून 2026 तक चलेगा। इस प्रशिक्षण वर्ग में कानपुर प्रांत के विभिन्न शिशु मंदिर एवं विद्या मंदिरों के लगभग 60 आचार्य एवं आचार्याएं सहभाग कर रहे हैं।
 उद्घाटन सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. सौरभ मालवीय का प्रेरक पाथेय प्राप्त हुआ। डॉ. मालवीय क्षेत्रीय विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के मंत्री तथा अखिल भारतीय प्रचार विभाग के सह-प्रभारी हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, चिरगांव के प्रबंधक एवं रसायन विज्ञान के प्रवक्ता श्री राजेंद्र सिंह ने की। प्रस्ताविकी भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री श्री रजनीश जी ने प्रस्तुत की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि 15 दिवसीय यह प्रशिक्षण वर्ग आचार्य एवं आचार्याओं को विद्या भारती का कुशल एवं समर्पित कार्यकर्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अपने उद्बोधन में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि “भारत” शब्द सुनते ही सुंदरता, श्रेष्ठता, पवित्रता, प्रकाश और प्रभाव का भाव मन में जागृत हो जाता है। इसी कारण हम भारत को माता के रूप में संबोधित करते हैं। उन्होंने कहा कि विश्व के संघर्षपूर्ण वातावरण में भारत शांति और संतोष का पर्याय है। इस स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा को आत्मसात करना आवश्यक है, जो प्राचीन वैज्ञानिक धरोहर और आधुनिक चरित्र निर्माण का अद्वितीय संगम है।
उन्होंने कहा कि स्वार्थ की बढ़ती प्रवृत्ति ने भारत को भी प्रभावित किया है, जिससे हमारी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर प्रभाव पड़ा है। इसी पीड़ा ने हमें शिक्षक बनने की प्रेरणा दी है। किसी भी राष्ट्र और समाज के निर्माण में शिक्षा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके लिए विद्या भारती के आलोक में भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना आवश्यक है।
डॉ. मालवीय ने श्रवण कुमार की कथा और भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों को भारतीय जीवन मूल्यों का प्रतीक बताते हुए कहा कि श्रीराम सम्राट होते हुए भी वनवासी बन जाते हैं। यही त्याग, मर्यादा और कर्तव्यबोध भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है। इसी परंपरा ने संघर्षों के बीच भी भारत को अपनी संस्कृति से विचलित नहीं होने दिया।
उन्होंने विद्या भारती के व्यापक मिशन पर प्रकाश डालते हुए “सा विद्या या विमुक्तये” की व्याख्या की तथा कहा कि आचार्य के पास अनेक कार्य दिखाई देते हैं, किंतु मूल रूप से उसका एक ही उद्देश्य है — आदर्श आचार्य बनना। इसके लिए आधुनिकता, ज्ञान और तकनीक से युक्त होना आवश्यक है। साथ ही उत्तम आचरण आचार्य जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर है।
कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री आनंद जी ने कराया तथा मंच संचालन सरस्वती विद्या मंदिर, खागा के प्रधानाचार्य श्री गजेंद्र सिंह ने किया। इस अवसर पर संकुल प्रमुख एवं प्रधानाचार्य श्री छत्रसाल स्वर्णकार जी सहित विभिन्न विद्यालयों के प्रधानाचार्य, विद्यालय समिति के पदाधिकारी तथा प्रांत के पदाधिकारी उपस्थित रहे। 

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