Wednesday, September 9, 2026

श्रमिक कल्याण की योजनाएं : श्रमिक लाभान्वित होंगे


केंद्र सरकार श्रमिकों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। सरकार का श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय प्रत्येक श्रमिक को नौकरी की सुरक्षा, न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के प्रति कृतसंकल्प है। श्रम कानूनों का अनुपालन कराने में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के साथ-साथ श्रम मंत्रालय ने सामाजिक सुरक्षा एवं रोज़गार की गुणवत्ता को बढ़ाने वाले प्रावधानों के जरिए प्रत्येक श्रमिक के सम्मान को बनाए रखने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार देश के विकास रणनीति के केन्द्र में रोजगार को लाने, मेक इन इंडिया के माध्यम से औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने, कौशल विकास के माध्यम से रोजगार को बढ़ाने और स्टार्ट अप इंडिया के जरिए नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक व्यापक रणनीति पर काम कर रही है।

सरकार को सफलता भी मिली है और सरकार की कई उपलब्धियां भी उल्लेखनीय हैं। भुगतानशुदा मातृत्व अवकाश को 12 हफ्तों से बढ़ाकर 26 सप्ताह करने के लिए 1 अप्रैल, 2017 से मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम-2017 को लागू किया जा चुका है। इस अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि 50 अथवा उससे अधिक कर्मचारी वाले संस्थानों में अनिवार्य रूप से क्रेच की सुविधा अथवा घर पर रहकर काम करने की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। पहली बार इस अधिनियम में कमिशनिंग मां और दत्तक मां दोनों के लिए 12 सप्ताह तक भुगतानशुदा मातृत्व अवकाश का प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम से लगभग 18 लाख महिला कर्मचारी लाभान्वित हो चुकी हैं।

बाल श्रम (निषेध और नियमन) संशोधन अधिनियम-2016 को 1 सितंबर, 2016 को लागू किया गया था। यह संशोधन 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम पर रखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के साथ 30 अगस्त, 2017 को अधिसूचित खतरनाक कारोबार और व्यवसाय की अनुसूची के अनुसार खतरनाक कारोबार एवं व्यवसाय में किशोरों अर्थात 14 से 18 आयु वर्ग के बच्चे को रोजगार पर रखने पर भी प्रतिबंध लगाता है। श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय ने इस अधिनियम में कई संशोधन कर बाल श्रम (निषेध और नियमन) संशोधन नियम-2017 को 2 जून, 2017 को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया है। अतः अब भारत ने बाल श्रम पर दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) सम्मेलन 138 और 182 को अंगीकार कर लिया है।
बाल मजदूर मुक्त भारत के उद्देश्य को हासिल करने के क्रम में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने संशोधित बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम-1986 के प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक मानक परिचालन तंत्र (एसओपी) तैयार किया है। पेंसिलः संशोधित बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम-1986 और राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) योजना के प्रावधानों के प्रभावशाली तरीके से कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के क्रम में इनकी बेहतर निगरानी और रिपोर्टिंग प्रणाली के लिए 26 सितंबर, 2017 को एक ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया। अब तक देश के कुल 710 ज़िलों में से 431 ज़िलों के जिला नोडल अधिकारी इस पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं। बाल एवं किशोर श्रमिकों के शैक्षणिक पुनर्वास के उद्देश्य से जारी एनसीएलपी योजना के बेहतर कार्यान्वयन के लिए एनसीएलपी की सभी चालू परियोजना सोसायटियों को इस पोर्टल पर पंजीकृत किया जाता है।

बीड़ी, चलचित्र और गैर कोयला खान श्रमिकों के लिए गृह अनुदान को 40 हजार से बढ़ाकर डेढ लाख रुपये किया जा चुका है। वर्ष 2017 में 25.5 करोड़ रुपये की लागत से 15,705 मकानों को स्वीकृति दी जा चुकी है। पुनर्निर्मित बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना के अंतर्गत 6413 बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए 15 दिसंबर, 2017 तक 664.50 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई है। इसके अतिरिक्त सर्वेक्षण करने, जागरूकता निर्माण और मूल्यांकन अध्ययन करने के उद्देश्य से वर्ष 2017-18 में 107.25 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई है।

केन्द्रीय स्तर पर कृषि, गैर कृषि, निर्माण सहित लगभग सभी क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गैर कृषि क्षेत्र श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी सी श्रेणी के क्षेत्रों में 250 रुपये से बढ़कर 350 रुपये, बी श्रेणी में 437 रुपये और ए श्रेणी में 523 रुपये हो गई है। इस संबंध में 27 फरवरी, 2017 को एक अधिसूचना (संशोधित) जारी की जा चुकी है।

मजदूरी का भुगतान (संशोधन) अधिनियम-2017 वर्तमान में प्रभावी अधिनियम नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों को नकद अथवा चेक अथवा सीधे कर्मचारी के खाते में मजदूरी का भुगतान करने में सक्षम बनाता है। इसके साथ ही अधिनियम में प्रावधान है कि उपयुक्त सरकारें अधिकृत राजपत्र में अधिसूचना जारी कर यह अनिवार्य कर सकती हैं कि कोई भी उद्योग अथवा अन्य संस्थान अपने कर्मचारियों को केवल चेक अथवा बैंक खाते में सीधे भुगतान के माध्यम से ही वेतन देगा। इस संबंध में केन्द्र के अंतर्गत आने वाले रेलवे, वायु परिवहन सेवाएं, खनन और तेल क्षेत्रों के लिए 25 अप्रैल, 2017 को अधिसूचना जारी की जा चुकी है। इससे श्रमिकों के औपचारिकीकरण की दिशा में आने वाले बदलाव में सहायता मिलेगी।

मजदूरी भुगतान अधिनियम-1936 अधिनियम के खंड 1 के उपखंड (6) में प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए केन्द्र सरकार ने 29 अगस्त, 2017 को जारी राजपत्रित अधिसूचना के माध्यम से मजदूरी की सीमा को 18 हजार रुपये से बढ़ाकर 24 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया है।
नकदरहित मजदूरी सुनिश्चित करने के लिए श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय ने नवंबर 2016 से अप्रैल 2017 तक श्रमिकों के बैंक खाते खुलवाने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाया। देशभर में 1,50,803 शिविर लगाए गए, जिनमें नकद रहित मजदूरी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 49,66,489 श्रमिकों के बैंक खाते खोले गए।

ईपीएफओ द्वारा भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। सरकार ने पंजीकरण से छूट गए कर्मचारियों को पंजीकृत करने के लिए जनवरी 2017 में कर्मचारी पंजीकरण अभियान (ईईसी)की शुरुआत की थी। इसके अंतर्गत नियोक्ताओं को प्रशासनिक शुल्क में छूट, नाममात्र क्षति एक रुपया प्रति वर्ष और यदि कर्मचारी का अंश जमा नहीं किया गया है तो उस पर छूट आदि दी गई थी। इस अभियान के अंतर्गत जनवरी 2017 से जून 2017 के बीच करीब 1.01 करोड़ अतिरिक्त कर्मचारियों को ईपीएफओ के साथ पंजीकृत किया गया।
12 दिसंबर, 2017 तक ईपीएफ खाते को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित करने की सुविधा देने वाला संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को जारी किया गया यूनिवर्सल खाता संख्या (यूएएन) 12,26,13,675 कर्मचारियों को लाभांवित कर रहा है। इसके अतिरिक्त 2,56,59,988 कर्मचारियों के खातों को आधार से जोड़ने का कार्य पूरा कर लिया गया है। इन खातों के संबंध में कर्मचारियों के लिए ऑनलाइन और मोबाइल सेवाएं भी उपलब्ध हैं। ईपीएफओ के सदस्यों की आवास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से ईपीएफओ ने 12 अप्रैल, 2017 को एक आवास योजना भी अधिसूचित की, जिसके तहत सदस्यों को अपनी भविष्य निधि से धन निकालने की अनुमति है।
 
मल्टिपल बैंकिंग प्रणाली के अंतर्गत केवल भारतीय स्टेट बैंक के बजाय संस्थानों के पास अब 13 अलग-अलग बैंकों के माध्यम से प्रत्यक्ष भुगतान करने का विकल्प उपलब्ध है। इनमें एसबीआई, इलाहाबाद बैंक, इंडियन बैंक, पीएनबी, यूबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, कोटेक महिन्द्रा बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक और आईडीबीआई बैंक शामिल हैं।
नियोक्ता बिना किसी झंझट के अपने अंशदान का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से कर सकते हैं। अंशदान सदस्य के खाते में चार दिन के भीतर जमा कर दिया जाता है। नाम, जन्म तिथि और लिंग परिवर्तन आदि के लिए भी ऑनलाइन सुविधा शुरू की गई है। पेंशनभोगियों की सुविधा के लिए डिजिटल जीवन प्रमाणपत्र की शुरुआत की गई। छूट वाले प्रतिष्ठानों के लिए ऑनलाइन रिटर्न फाइल करने की सुविधा है।
ई-कोर्ट मैनेजमेंट प्रणाली के माध्यम से श्रमिकों एवं संस्थानों से जुड़े मामलों के लिए ऑनलाइन प्रोसेसिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। सभी 120 ईपीएफओ कार्यालयों को देशभर में सहज इंटरफेस के लिए राष्ट्रीय डेटा केन्द्र पर समेकित डेटाबेस में तब्दील कर दिया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय कर्मचारियों के हित का भी ध्यान रखा गया है। विदेशों में भारतीय पेशेवरों, कौशल कर्मियों आदि के हितों की रक्षा करने के लिए 19 देशों के साथ द्विपक्षीय सामाजिक सुरक्षा समझौता (एसएसए) किया गया है, ईपीएफओ इसकी नोडल कार्यान्वयन एजेंसी है। कवरेज प्रमाणपत्र बनाने के लिए ऑनलाइन सेवा शुरू की जा चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय कर्मचारियों के दावों का निपटान भारत में कार्य के अंतिम दिन ही किया जा रहा है। वर्ष 2017 में ही भारत ब्राजील के बीच बातचीत के लिए प्रशासनिक प्रबंधों को अंतिम रूप दे दिया गया।

ईएसआईसी द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इसके अंतर्गत सामाजिक सुरक्षा के दायरे में कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी की गई है।
31 मार्च, 2017 के अनुसार ईएसआईसी योजना के अंतर्गत कवर बीमित व्यक्तियों की संख्या बढ़कर 3.19 करोड़ हो गई है, और इस योजना के अंतर्गत आने वाले लाभार्थियों की संख्या 12.40 करोड़ पहुंच गई है। ईएसआईसी अधिनियम के अंतर्गत 1 जनवरी, 2017 से इस योजना का लाभ उठाने के लिए कर्मचारियों की मजदूरी की अधिकतम सीमा को 15 हजार रुपये से बढ़ाकर 21 हजार रुपये किया गया है। 30 नवंबर, 2017 तक ईएसआईसी योजना 325 जिलों में पूर्ण रूप से, 85 जिलों में आंशिक रूप से और 93 जिला मुख्यालयों में लागू हो चुकी है। साथ ही 1,14,352 अतिरिक्त फैक्टरी एवं संस्थानों को इस योजना के दायरे में लाया गया। 31 मार्च, 2017 तक इस योजना के अंतर्गत कवर होने वाली फैक्टरी एवं संस्थानों की कुल संख्या 8,98,138 थी, जबकि पिछले वर्ष मार्च 2016 के अंत तक यह संख्या मात्र 7,83,786 थी।

प्रत्येक कर्मचारी तक इस कवरेज का विस्तार करने के लिए ईएसआईसी ने नियोक्ता के अनुकूल “स्कीम फॉर प्रोमोटिंग रजिस्ट्रेशन ऑफ एम्प्लोयर एंड एम्प्लोयी (एसपीआरईई)” नामक नई योजना की शुरुआत की। इस योजना के अंतर्गत 30 जून, 2017 तक कुल 1,02,013 नियोक्ता और 1,30,78,766 कर्मचारियों को ईएसआईसी के दायरे में लाया गया।

बीमित व्यक्तियों और नियोक्ताओं का सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया गया है। ईएसआईसी केन्द्र सरकार का पहला ऐसा संगठन था, जिसने व्यावसायिक परिदृश्य को सरल बनाने और लेनदेन लागत कम करने को प्रोत्साहित करने के लिए औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के ई-बिज़ पोर्टल के माध्यम से अपनी सेवाओं को एकीकृत किया।
आधार संख्या के माध्यम से बीमित व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के लिए उस व्यक्ति की बीमा संख्या से आधार लिंक करने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसने विभिन्न प्रकार के लाभों को प्रेषित की दिशा में बीमित व्यक्ति और लाभार्थियों के पहचान की प्रक्रिया को सरल किया। इस प्रक्रिया ने बीमित व्यक्ति और उनके आश्रितों को पहचान कार्ड लेने के लिए ईएसआईसी के कार्यालयों के चक्कर लगाने से बचाया।

इसके अतिरिक्त मजदूरी विधेयक 2017 का मसौदा 10 अगस्त, 2017 को लोकसभा में पेश किया जा चुका है। यह पिछले चार श्रम विधेयकों के प्रासंगिक प्रावधानों को तर्कसंगत, एकीकृत और सरल बनाने का कार्य करता है, जिनमें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम-1948, मजदूरी का भुगतान अधिनियम-1936, बोनस का भुगतान अधिनियम-1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम-1976 सम्मिलित है। 
ईपीएफओ और ईएसआईसी पंजीकरण के लिए एकीकृत पंजीकरण आवेदन फॉर्म की सुविधा शुरू की गई। ईपीएफओ और ईएसआईसी के एकीकृत रिटर्न की सुविधा भी प्रारंभ की गई। 12 दिसंबर, 2017 तक एलआईएन आवंटित संस्थानों की कुल संख्या 22,92,586 है। श्रम कानूनों के लिए 16 हजार से अधिक एकल रिटर्न को भरा गया। 

रोजगार सृजन को सुविधाजनक बनाने के लिए कई प्रमुख कदम उठाए गए। राष्ट्रीय करियर सेवा परियोजना नियोक्ता, प्रशिक्षकों और बेरोजगारों को एक मंच पर लाती है। 31 अक्टूबर, 2017 तक 3.92 करोड़ नौकरी की खोज करने वाले और 14.86 लाख नियोक्ताओं को इसमें पंजीकृत किया जा चुका है और इस पोर्टल के माध्यम से 7.73 लाख नौकरियों को बढ़ावा देने एवं उनको सृजित करने की दिशा में कार्य चल रहा है। नौकरी ढ़ूंढ़ने वालों के पंजीकरण विस्तार करने के लिए डाक विभाग के साथ मिलकर एनसीएस को आगे बढ़ाया जा रहा है और डाक घरों के माध्यम से भी पंजीकरण किए जा रहे हैं। युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की पहुंच बढ़ाने और उन्हें समृद्ध करने के उद्देश्य से अग्रणी जॉब पोर्टल, प्लेसमेंट संगठनों और प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ 22 रणनीतिक समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। सरकार ने सरकारी नौकरियों की जानकारी को एनसीएस पोर्टल पर पोस्ट करने को अनिवार्य कर दिया है।
व्यावसायिक मार्गदर्शन एवं परामर्श और कंप्यूटर पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए 25 राष्ट्रीय करियर सेवा केन्द्र स्थापित किए गए हैं। वर्ष 2017-18 के दौरान, नवंबर 2017 तक लगभग 1,11,146 उम्मीदवारों को व्यावसायिक मार्गदर्शन, 8,109 उम्मीदवारों को सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस पाठ्यक्रम, 1,300 उम्मीदवारों को विशेष कोचिंग योजना पाठ्यक्रम और 3,000 उम्मीदवारों को कंप्यूटर पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण दिया गया है। 25 एनसीएस (एनसीएस एससी/एसटी) को एनसीएस परियोजना के साथ एकीकृत किया जा चुका है।
आर्थिक पुनर्वास की प्रक्रिया में दिव्यांगों को सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण, व्यावसायिक मार्गदर्शन, और करियर काउंसलिंग देने के लिए 21 राष्ट्रीय करियर सेवा केन्द्र (एनसीएससीडीए) स्थापित किए जा चुके हैं। वर्ष 2017-18 के दौरान, 35,415 दिव्यांगों का मूल्यांकन कर उनका रोजगारोन्मुखी कौशल के प्रति मार्गदर्शन किया गया और लगभग 6,440 लोगों को विभिन्न संगठनों में रोजगार दिया गया।
गुणवत्तापरक रोजगार सेवाएं प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने 100 आदर्श करियर केन्द्र स्थापित करने को स्वीकृति दी है। इन केन्द्रों को राज्यों और विभिन्न संस्थानों के सहयोग से स्थापित किया जा रहा है। 762 रोजगार अधिकारियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इसके अतिरिक्त 30 नवंबर, 2017 तक 725 जॉब फेयर का आयोजन किया गया।

प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना (पीएमआरपीवाई) के अंतर्गत नये रोजगार सृजित करने के क्रम में नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना को लागू कर रही है। 9 अगस्त, 2016 को शुरू हुई योजना के तहत ईपीएफओ में पंजीकरण कराने वाले सभी नए कर्मचारियों को केंद्र सरकार कर्मचारी पेंशन योजना अंशदान के रूप में पहले तीन वर्षों तक 8.33 प्रतिशत का योगदान देगी। यह योजना प्रतिमाह 15 हजार रुपये तक की आय वालों पर लागू है। इस योजना के लिए एकमुश्त 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान बजट में किया गया है। वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में नवंबर 2017 तक सभी नए कर्मियों के लिए केंद्र सरकार संपूर्ण 12 प्रतिशत नियोक्ता अंशदान (8.33 फीसदी ईपीएस एवं 3.67 प्रतिशत ईपीएफ) का भुगतान कर रही है। 21,841 संगठन पीएमआरपीवाई योजना के अंतर्गत पंजीकृत हुए और 13,74,626 लाभार्थियों को ईपीएस अंशदान की प्रतिपूर्ति की गई। अब तक इस योजना पर लगभग 178 करोड़ रुपये का व्यय किया जा चुका है।
निसंदेह, श्रमिक कल्याण की इन योजनाओं से श्रमिकों को लाभ होगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

पुस्तक भेंट



 सुखद भेंट।
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री माननीय श्री ब्रजेश पाठक जी के निज आवास पर आत्मीय भेंट का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान अपनी पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ उन्हें सादर भेंट की।

Tuesday, September 8, 2026

स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना : गंगा का प्रदूषण कम होगा


देश के दस शहरों में स्मार्ट गंगा सिटी योजना शुरू की गई है। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती और केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडु ने 13 अगस्त, 2016 को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से देश के दस प्रमुख शहरों में स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना का प्रारंभ किया। इस योजना के लिए उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा पांच शहरों मथुरा, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी को चुना गया है. इसके साथ ही उत्तराखंड से ऋषिकेश और हरिद्वार, बिहार से पटना, झारखंड से साहिबगंज और पश्चिम बंगाल से बैरकपुर भी इस योजना में शामिल हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने सीवेज उपचार के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए हाइब्रिड एन्यूटी आधारित सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी मॉडल पर कार्य के लिए प्रथम चरण में इन शहरों का चयन किया है। नमामि गंगा अभियान के अंतर्गत चलने वाली इस परियोजना का उद्देश्य इन सभी शहरों में गंगा में गिरने वाले सीवर एवं अन्य प्रदूषित जल को रोकना है। सीवर का पानी गंगा में न जाए इसके लिए एसटीपी के निर्माण पर बल दिया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत सीवेज उपचार के बुनियादी ढांचे का हाइब्रिड एन्यूटी आधार पर सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी के माध्यम से निर्माण किया जाएगा और इन शहरों में गंदे पानी का शोधन करके उसे छोड़ा जाएगा।

इस अवसर पर केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने उज्जैन से समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम की सफलता के लिए केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय का सहयोग बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि गंगा कार्य योजना की असफलता से सबक लेकर अब हमारा मंत्रालय हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर जा रहा है। पहले इस काम का खर्चा केंद्र और राज्य सरकार 70:30 के अनुपात में उठाते थे, लेकिन इस बार इस पूरे कार्यक्रम का सारा खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। कार्यक्रम के सुचारू कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए जिला स्तर पर भी निगरानी समितियों का गठन किया जाएगा। देश की कई बड़ी कंपनियों के अलावा कई विदेशी कंपनियों ने भी हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर हमारे साथ काम करने की इच्छा जताई है। पहले चरण में दस शहरों को शामिल किया गया है, लेकिन धीरे-धीरे इसमें बाकी के शहर भी शामिल किए जाएंगे। इन शहरों में यह कार्यक्रम करते समय इन शहरों की नदियों की जैव विविधता और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत का पूरा ध्यान रखा जाएगा। 

समारोह को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद से संबोधित करते हुए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडु ने स्थानीय निकायों से कहा कि वे इस कार्यक्रम की सफलता के लिए अपना भरपूर सहयोग दें। उनका मंत्रालय नमामि गंगे कार्यक्रम से बहुत घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर यह कार्यक्रम तेजी से सफलता हासिल करेगा। इस कार्यक्रम की सफलता के लिए जन भागीदारी उतनी ही जरूरी है, जितना सरकारी प्रयास। इस अवसर पर केंद्रीय जल संसाधन के विशेष सचिव डॉ. अमरजीत सिंह ने कहा कि गंगा में गिरने वाले 7300 एमएलडी अपशिष्ट में से 4200 एमएलडी के उपचार के बारे में कार्रवाई शुरू हो गई है। बाकी के 3100 एमएलडी के बारे में सर्वेक्षण का काम चल रहा है। 

इस योजना से प्रदूषित पानी को गंगा में गिरने से रोका जा सकेगा। इससे गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने में सहायता मिलेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

नमामि गंगे योजना : निर्मल होगी गंगा


भारतीय संस्कॄति में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। किन्तु दुख की बात यह है कि सबके पाप धोने वाली यह पवित्र नदी दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। इस नदी को साफ करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई बार प्रयास हुए. समय समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं चलाई गईं। केंद्र सरकार ने वर्ष 1984 में गंगा सफाई की एक व्यापक कार्ययोजना बनाई। इसके लिए आठ हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया, किन्तु सफलता नहीं मिली। 

उल्लेखनीय है कि पहले गंगा सफाई अभियान का दायित्व वन तथा पर्यावरण मंत्रालय का था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्मल गंगा के लिए अलग से एक मंत्रालय बनाया, जिसका नाम जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण रखा गया। इस नये मंत्रालय के अंतर्गत केंद्र सरकार ने जून, 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम को स्वीकृति दी। उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर स्थित वाराणसी से संसद के लिए मई, 2014 में निर्वाचित होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, मां गंगा की सेवा करना मेरे भाग्य में है।
उन्होंने कहा कि हम सब का जीवन गंगा से जुडा हुआ है। अगर आज मां गंगा न होती तो पता नहीं हमारा पूरा भू-भाग वहां की कैसी भयंकर स्थिति होती। लेकिन उस गंगा को कभी बचाने के लिए हमने प्रयास नहीं किए, हमने उदासीनता बरती। गंगा को बचाना हमारी भावी पीढ़ियों को बचाना है। गंगा को निर्मल करेंगे, तो गंगा को अविरल करने से कोई रोक नहीं पाएगा और इसलिए सरकार अरबो-खरबो रुपया खर्च करके गंगा की सफाई पर लगी है और यह सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है, एक बार नदियों के प्रति फिर से वही एक बार वही श्रद्धाभाव जगेगा, नदियों को बचाने की पहल चलेगी, हिन्दुस्तान की हर नदियों के प्रति जागरूकता आएगी। भारत में, भविष्य में पानी के संकट से अगर बचना है तो यही मार्ग है जिसको हमने गंभीरता से लेना होगा और इसलिए गंगा सफाई का जो अभियान चल रहा है, गंगोत्री से ले करके बंगाल सागर तक जो भी राज्य इसके साथ जुडे हैं उनके अलग-अलग भाग करके गंगा गंदी न हो, सबसे पहली प्राथमिकता उस पर दी गई है। गंगा में जाने वाले गंदे पानी को, केमिकल वाले पानी को रोकने की दिशा में अभियान चला है। आज बिहार में एक साथ अनेक विद्, इस प्रोजेक्टों का भी शिलान्यास हो रहा है, जो आने वाले दिनों में मां गंगा को हम जैसी श्रद्धाभाव रखते हैं, उसी रूप में देखने को मिलेगा और जब मां गंगा हमारे सपनों के अनुरूप होगी, तब छठ पूजा का आनंद ही कुछ और होगा, वो भक्ति का भाव भी कुछ और होगा। गंगा नदी का न केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है बल्कि देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या गंगा नदी पर निर्भर है। यदि हम इसे साफ करने में सक्षम हो गए, तो यह देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या  के लिए एक बड़ी मदद साबित होगी। अतः गंगा की सफाई एक आर्थिक एजेंडा भी है।
केंद्र सरकार ने गंगा नदी के प्रदूषण को समाप्त करने और नदी को पुनर्जीवित करने के लिए ‘नमामि गंगे’ नामक एक एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन का शुभारंभ किया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नदी की सफाई के लिए बजट को चार गुना करते हुए पर वित्तीय वर्ष 2019-2020 तक नदी की सफाई पर 20 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की केंद्र की प्रस्तावित कार्य योजना को स्वीकृति दे दी और इसे 100 प्रतिशत केंद्रीय हिस्सेदारी के साथ एक केंद्रीय योजना का रूप दिया।
यह समझते हुए कि गंगा संरक्षण की चुनौती बहु-क्षेत्रीय और बहु-आयामी है और इसमें कई हितधारकों की भी भूमिका है, विभिन्न मंत्रालयों के बीच एवं केंद्र-राज्य के बीच समन्वय को बेहतर करने एवं कार्य योजना की तैयारी में सभी की भागीदारी बढ़ाने के साथ केंद्र एवं राज्य स्तर पर निगरानी तंत्र को बेहतर करने के प्रयास किए गए हैं। कार्यक्रम के कार्यान्वयन के प्रारंभिक स्तर की गतिविधियों (तत्काल प्रभाव दिखने के लिए), मध्यम अवधि की गतिविधियों (समय सीमा के पांच वर्ष के भीतर लागू किया जाना है), और लंबी अवधि की गतिविधियों (10 वर्ष के भीतर लागू किया जाना है) में विभाजित किया गया है।

प्रारंभिक स्तर की गतिविधियों के अंतर्गत नदी की उपरी सतह की सफाई से लेकर बहते हुए ठोस कचरे की समस्या को हल करने; ग्रामीण क्षेत्रों की सफाई से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों की नालियों से आते मैले पदार्थ (ठोस एवं तरल) और शौचालयों के निर्माण; शवदाह गृह का नवीकरण, आधुनिकीकरण और निर्माण ताकि अधजले या आंशिक रूप से जले हुए शव को नदी में बहाने से रोका जा सके, लोगों और नदियों के बीच संबंध को बेहतर करने के लिए घाटों के निर्माण, मरम्मत और आधुनिकीकरण का लक्ष्य निर्धारित है। 
मध्यम अवधि की गतिविधियों के अंतर्गत नदी में नगर निगम और उद्योगों से आने वाले कचरे की समस्या को हल करने पर ध्यान दिया जाएगा। नगर निगम से आने वाले कचरे की समस्या को हल करने के लिए अगले पांच वर्षों में 2500 एमएलडी अतिरिक्त ट्रीटमेंट कैपेसिटी का निर्माण किया जाएगा। लंबी अवधि में इस कार्यक्रम को बेहतर और टिकाऊ बनाने के लिए प्रमुख वित्तीय सुधार किए जा रहे हैं। परियोजना के कार्यान्वयन के लिए वर्तमान में कैबिनेट हाइब्रिड वार्षिकी आधारित पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर विचार किया जा रहा है। अगर यह स्वीकृत हो जाता है, तो विशेष प्रयोजन वाले वाहन सभी प्रमुख शहरों में रियायत का प्रबंधन करेगा, प्रयोग किए गए पानी के लिए एक बाजार बनाया जाएगा और परिसंपत्तियों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जाएगी।

औद्योगिक प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए बेहतर प्रवर्तन के माध्यम से अनुपालन को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। गंगा के किनारे स्थित ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को गंदे पानी की मात्रा कम करने या इसे पूर्ण तरीके से समाप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन निर्देशों के कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना पहले से ही तैयार कर चुका है और सभी श्रेणी के उद्योगों को विस्तृत विचार-विमर्श के साथ समय-सीमा दे दी गई है। सभी उद्योगों को गंदे पानी के बहाव के लिए रियल टाइम ऑनलाइन निगरानी केंद्र स्थापित करना होगा।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत इन गतिविधियों के अलावा जैव विविधता संरक्षण, वनीकरण, और पानी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित प्रजातियों, जैसे गोल्डन महासीर, डॉल्फिन, घड़ियाल, कछुए, ऊदबिलाव आदि के संरक्षण के लिए कार्यक्रम पहले से ही शुरू किए जा चुके हैं। इसी तरह ‘नमामि गंगे’ के अंतर्गत जलवाही स्तर की वृद्धि, कटाव कम करने और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति में सुधार करने के लिए 30 हजार हेक्टेयर भूमि पर वन लगाए जाएंगे। व्यापक स्तर पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए 113 रियल टाइम जल गुणवत्ता निगरानी केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
लंबी अवधि के अंतर्गत ई-फ़्लो के निर्धारण, बेहतर जल उपयोग क्षमता, और सतही सिंचाई की क्षमता को बेहतर बना कर नदी का पर्याप्त प्रवाह सुनिश्चित किया जाएगा। इसका उल्लेख करना आवश्यक है कि गंगा नदी की सफ़ाई इसके सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व और विभिन्न उपयोगों के लिए इसका दोहन करने के कारण अत्यंत जटिल है। विश्व में कभी भी इस तरह का जटिल कार्यक्रम कार्यान्वित नहीं किया गया है और इसके लिए देश के सभी क्षेत्रों और हरेक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। विभिन्न तरीके हैं जिसके माध्यम से हम सभी गंगा नदी की सफ़ाई में अपना योगदान दे सकते हैं:
विशाल जनसंख्या और इतनी बड़ी एवं लंबी नदी गंगा की गुणवत्ता को बहाल करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। सरकार ने पहले ही बजट को चार गुना कर दिया है, लेकिन अभी भी आवश्यकताओं के हिसाब से यह पर्याप्त नहीं होगा। स्वच्छ गंगा निधि बनाई गई है, जिसमें आप सभी गंगा नदी को साफ़ करने के लिए धनराशि का योगदान कर सकते हैं।
हममें से अधिकांश को यह पता नहीं है कि हमारे द्वारा इस्तेमाल किया गया पानी और हमारे घरों की गंदगी अंततः नदियों में ही जाती है यदि उसका सही से निपटान न किया गया हो। सरकार पहले से ही नालियों से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रही है, लेकिन नागरिक कचरे और पानी के उपयोग को कम कर सकते हैं। उपयोग किए गए पानी, जैविक कचरे एवं प्लास्टिक की रिकवरी और इसके पुनः उपयोग से इस कार्यक्रम को काफ़ी लाभ मिल सकता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारी समिति ने गंगा को स्वच्छ बनाने के अभियान में तेजी लाने के लिए लगभग 19 अरब रुपये लागत वाली परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की थी। कार्यकारी समिति की 2 मार्च, 2017 को हुई बैठक में स्वीकृत की गई 20 परियोजनाओं में से 13 उत्तराखंड से सम्बद्ध हैं, जिनमें नए मलजल उपचार संयंत्रों की स्थापना, मौजूदा सीवर उपचार संयंत्रों का उन्नयन और हरिद्वार में मलजल नेटवर्क कायम करने जैसे कार्य शामिल हैं। इन सभी पर लगभग 415 करोड़ रुपये की लागत आएगी। हरिद्वार देश के सर्वाधिक पवित्र शहरों में से एक है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। अनुमोदित योजना का लक्ष्य न केवल शहर के 1.5 लाख स्थानीय निवासियों द्वारा, बल्कि विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस पवित्र स्थान की यात्रा करने वाले लोगों द्वारा उत्सर्जित मलजल का उपचार भी करना है। इन सभी परियोजनाओँ के लिए केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण वित्त पोषण किया जाएगा। यहं तक कि इन परियोजनाओं के प्रचालन और रख-रखाव का खर्च भी केंद्र सरकार वहन करेगी।

उत्तराखंड में अनुमोदित अन्य परियोजनाओं में से चार परियोजनाएं अलकनंदा नदी का प्रदूषण दूर करने से संबंधित है, ताकि नीचे की ओर नदी की धार का स्वच्छतर प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके।  इसमें गंदे पानी के नालों को नदी में जाने से रोकने के लिए उनका मार्ग बदलना, बीच मार्ग में अवरोधक संयंत्र लगाना और साथ ही चार महत्वपूर्ण स्थानों जोशीमठ, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और कीर्तिनगर में नये लघु एसटीपीज़ लगाना शामिल है, जिन पर लगभग 78 करोड़ रुपये की लागत आएगी। इनके अलावा गंगा का प्रदूषण दूर करने के लिए ऋषिकेश में 158 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली एक बड़ी परियोजना का अनुमोदन किया गया है। गंगा जैसे ही पर्वत से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है, तो वहीं ऋषिकेश से नगरीय प्रदूषक गंगा में मिलने शुरू हो जाते हैं। गंगा को इन प्रदूषकों से छुटकारा दिलाने के लिए ऋषिकेश में यह सर्व-समावेशी परियोजना शुरू करने को हरी झंडी दिखाई गई है। इससे न केवल सभी शहरी नालों को ऋषिकेश में गंगा में जाने से रोका जा सकेगा, बल्कि उत्सर्जित जल को उपचार के माध्यम से फिर से इस्तेमाल योग्य भी बनाया जाएगा। ऋषिकेश संबंधी इस विशेष परियोजना में लक्कड़घाट पर 26 एमएलडी क्षमता के नये एसटीपी का निर्माण किया जाएगा, जिसके लिए ऑनलाइन निगरानी प्रणाली की भी व्यवस्था है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 665 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से उत्कृष्ट प्रदूषक मानकों के साथ 564 एमएलडी क्षमता के अत्याधुनिक ओखला मलजल उपचार संयंत्र के निर्माण की परियोजना भी अनुमोदित की गई है। यह संयंत्र मौजूदा एसटीपी फेज़- I, II, III और IV का स्थान लेगा। इसके अलावा पीतमपुरा और कोंडली में 100 करोड़ रुपये से अधिक अनुमानित लागत वाली नई मलजल पाइप लाइनें बिछाने की दो परियोजनाएं भी स्वीकृत की गई हैं, ताकि रिसाव रोका जा सके।

पटना में कर्मालिचक और झारखंड में राजमहल में 335 करोड़ रुपये से अधिक लागत से मलजल निकासी संबंधी कार्यों का भी कार्य समिति की बैठक में अनुमोदन किया गया। वाराणसी में, जहां वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री आते हैं, गंगा के प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल वाली 151 करोड़ रुपये की परियोजना का भी कार्यकारिणी की बैठक में अनुमोदन किया गया। 

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) प्रौद्योगिकी का उपयोग करके गंगा कायाकल्प कार्य को पूरा करने के उद्देश्य से 1767 में गठित भारत के सबसे पुराने विभाग, भारतीय सर्वेक्षण विभाग को अपने साथ जोड़ा है। इस परियोजना को कार्यकारी समिति की बैठक में स्वीकृत किया गया था और इसकी अनुमानित लागत 86.84 करोड़ रुपये है। एनएमसीजी का लक्ष्य राष्ट्रीय/राज्य/स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण तथा इसका कार्यान्वयन है। परियोजना में डिजीटल इलिवेशन मॉडल (डीईएम) प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है, जो सटीक आंकड़ा संग्रह सुनिश्चित करता है। यह नदी-बेसिन प्रबंधन योजना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। डीईएम प्रौद्योगिकी पूरे क्षेत्र की स्थलाकृति की पहचान करता है। इससे नीति निर्माता आसानी से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं। इस प्रकार यह नीति निर्माण प्रक्रिया को सहायता प्रदान करता है। इस तकनीक से महत्त्वपूर्ण स्थानों की पहचान की जा सकती है। भौगोलिक सूचना प्रणाली प्रौद्योगिकी का उपयोग विकेंद्रीकरण भी सुनिश्चित करेगा। संग्रह किये गए आंकड़ों तथा सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी पोर्टल व मोबाईल एप के माध्यम से स्थानीय लोगों के साथ साझा की जा सकती है। स्थानीय लोग अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इस प्रकार यह आपसी संवाद सुलभ करेगा तथा एक पारदर्शी मंच साबित होगा। प्रभावी निर्वहन प्रबंधन के लिए औद्योगिक, व्यावसायिक और सभी अन्य प्रकार की संस्थाओं से निकलने वाले सीवेज की मैपिंग की जाएगी। भौगोलिक सूचना प्रणाली प्रौद्योगिकी से नदी के दोनों किनारों पर प्रस्तावित उच्च क्षमता वाली संरक्षित क्षेत्रों के नियमन में सहायता मिलेगी।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन में गंगा बेसिन राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सुदृढ़ बनाने से संबंधित एक परियोजना को स्वीकृति दी है, ताकि वे समय-समय पर जल की गणवत्ता सत्यापित कर सकें। प्रदूषण मूल्यांकन और जल गुणवत्ता निगरानी के लिए प्रयोगशालाओं में आधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे तथा प्रशिक्षित विज्ञानकर्मियों को नियुक्त किया जाएगा। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सुदृढ़ बनाने की परियोजना की अनुमानित लागत पांच वर्षों के लिए 85.97 करोड़ रुपये है।
पश्चिम बंगाल में हुगली-चिनसुरह और महेशतला नगरपालिकाओं में सीवेज अवसंरचना को विकसित करने के लिए 358.43 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इन दोनों परियोजनाओं के पूरे होने से 56 एलएलडी सीवेज पानी सीधे गंगा में बहने से रुक जाएगा।
महेशतला एक प्रमुख शहर है और यह वृहत कोलकाता का एक हिस्सा है। महेशतला परियोजना में पृथक सीवर नेटवर्क (27 किलोमीटर), एक एसटीजी (26 एमएलडी), मौजूदा बुनियादी ढांचे की मरम्मत कार्य और 15 वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव आदि शामिल हैं। इनकी कुल लागत 198.43 करोड़ रुपये है। 160 करोड़ रूपये की लागत से हुगली-चिनसुरह परियोजना में एक एसटीजी का निर्माण (29.3 एमएलडी), 20 किलोमीटर सीवर लाइन का निर्माण, दो पंपिंग स्टेशनों का निर्माण, मौजूदा बुनियादी ढांचे का मरम्मत कार्य तथा 15 वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव आदि शामिल हैं। ये दोनों परियोजनाएं पीपीपी मॉडल आधारित हाइब्रिड एन्यूटी के अंतर्गत स्वीकृत की गई हैं। 531.24 करोड़ रुपये की लागत वाली ये चार नई परियोजनाएं राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की ग्यारहवीं कार्यकारी समिति की बैठक में स्वीकृत की गई थीं। 

गंगा की सफाई का दायित्व केवल सरकार का ही नहीं है, अपितु सबको इसे स्वच्छ रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Sunday, September 6, 2026

'श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध' का अवलोकन





मेरे द्वारा लिखित पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का उत्तर प्रदेश सरकार के माननीय कैबिनेट मंत्री श्री स्वतंत्रदेव सिंह जी द्वारा आत्मीयता एवं रुचिपूर्वक अवलोकन।

यह मेरे लिए अत्यंत सुखद और गौरवपूर्ण क्षण है। पुस्तक के माध्यम से आत्मबोध से राष्ट्रबोध की यात्रा और श्रेष्ठ भारत के निर्माण की भारतीय दृष्टि को समाज के सामने रखने का प्रयास किया गया है।

Saturday, September 5, 2026











लखनऊ। शिक्षक दिवस के अवसर पर महामना सरस्वती विद्या मंदिर में शिक्षक सम्मान एवं समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि शिक्षक केवल विद्यार्थियों को विषय का ज्ञान देने का कार्य नहीं करते, बल्कि वे उनके व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार और चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा मनुष्य को ज्ञान देती है, जबकि शिक्षक उस ज्ञान को जीवन के उद्देश्य से जोड़ने का कार्य करता है। शिक्षक विद्यार्थियों को कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने, चुनौतियों का सामना करने और समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने की प्रेरणा देता है।
डॉ. मालवीय ने कहा कि आज शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक ज्ञान का माध्यम हो सकती है, लेकिन संस्कार, संवेदना, विवेक और जीवन-मूल्यों का निर्माण शिक्षक ही कर सकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संवेदनशील, संस्कारवान और राष्ट्र के प्रति समर्पित हों।
कार्यक्रम में विद्यालय के आचार्यों का सम्मान किया गया। विद्यार्थियों ने शिक्षक दिवस के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। विद्यालय परिवार की ओर से शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके योगदान को सराहा गया।

हज नीति : महिलाएं अकेले हज करेंगी


किसी भी धर्म के लोगों की इच्छा होती है कि वे अपने तीर्थों की यात्रा पर जाएं। केन्द्र सरकार सभी की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें तीर्थ यात्रा पर भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। ये केन्द्र सरकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि इस वर्ष 2018 में जहां रिकॉर्ड संख्या में यात्री हज पर जा रहे हैं, वहीं महिलाएं भी बिना पुरुष साथी के हज पर जा रही हैं। भारत से प्रति वर्ष लगभग 1।70 लाख लोग हज यात्रा पर जाते हैं। सऊदी अरब ने पांच हज़ार और यात्रियों की अनुमति दे दी है। इसलिए इस साल यह संख्या 1.75 लाख हो गई है। 

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामले मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के अनुसार आजादी के बाद पहली बार इस वर्ष भारत से रिकॉर्ड 1,75,025 मुस्लिम तीर्थयात्री हज पर जाएंगे और वह भी बिना किसी अनुदान के। केन्द्र  सरकार भारत का हज कोटा लगातार दूसरे वर्ष बढ़ा पाने में कामयाब हो पाई है।
हज के लिए कुल 3,55,604 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें 1,89,217 पुरुष एवं 1,66,387 महिला आवेदक शामिल थे। इस वर्ष कुल 1,28,002 मुस्लिम तीर्थयात्री भारत की हज समिति के माध्यम से हज पर जाएंगे, जिनमें 47 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। 47,023 हज तीर्थयात्री निजी टूर ऑपरेटरों के माध्यम से हज पर जाएंगे।
इसके अतिरिक्त भारत से पहली बार, मुस्लिम महिलाएं बिना ‘मेहराम‘ (पति, पिता या भाई) के हज यात्रा पर जाएंगी। कुल 1308 महिलाओं ने बिना मेहराम के हज यात्रा के लिए आवेदन किया है और इनमें से सभी महिलाओं को लॉटरी स्स्टिम से छूट दे दी गई है और हज पर जाने की अनुमति दी गई है।

उल्लेखनीय है कि अब किसी मुस्लिम महिला को बिना किसी मेहरम (पति, पिता या भाई) के स्वतंत्र रूप से हज यात्रा की अनुमति होगी। सऊदी अरब 45 और इससे अधिक उम्र की महिलाओं को हज के लिए प्रवेश की अनुमति देता है। 45 साल की उम्र पार चुकी 4 या उससे अधिक मुस्लिम महिलाएं एक साथ हज यात्रा पर जा सकती हैं। इससे पहले कोई भी मुस्लिम महिला मेहरम (पति, पिता या भाई) अर्थात अपने खून के रिश्ते वाले रिश्तेदार के बिना हज पर नहीं जा सकती थी। 

केंद्र सरकार ने हज यात्रा के बारे में नई नीति बनाने के लिए पूर्व सिविल अधिकारी अफजल अमानुल्लाह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है। इस छह सदस्यीय हज समिति ने 2018 से 2022 के लिए एक मसौदा तैयार किया है। इसमें कुछ सुझाव दिए गए हैं, जैसे 45 वर्ष की आयु से अधिक महिला को मेहरम के बिना हज यात्रा करने की अनुमति दी जाए और हज सब्सिडी समाप्त की जाए। इन सुझावों को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात में इस निर्णय की घोषणा की थी। इससे मुस्लिम महिलाओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी। 
  
केंद्र सरकार की पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता एवं किराये में अनुचित बढ़ोतरी रोकने के लिए एयरलाइंस को दिए गए कठोर आदेश से यह सुनिश्चित हुआ है कि हज 2018 के हवाई जहाज के किराये में इस वर्ष उल्लेखनीय कमी आई है।

हज प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन/डिजिटल बनाए जाने से पूरी हज प्रक्रिया पारदर्शी और हज तीर्थयात्रियों के अनुकूल बन गई है। नई हज नीति के अनुसार यात्रियों को देश में बेहतर सुविधाएं दिए जाने पर बल दिया गया है। इसके लिए हज रवानगी स्थलों की संख्या 21 से घटाकर नौ कर दी गई, जिनमें दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरू और कोच्चि शामिल हैं।

केन्द्र सरकार की नई हज नीति के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। अब वे महिलाएं भी हज यात्रा कर सकेंगी, जो अकेली रहती हैं या जिनके परिवार में कोई पुरुष नहीं है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है