Monday, September 29, 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठा भाग-2



प्रो. ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंचनिष्ठाएं हैं:
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
लोकतंत्र
हमारे संविधान ने राजसत्ता के संचालन के लिए लोकतांत्रिक पध्दति स्वीकार की है। लोकतंत्र मतदाता की इच्छा का आदर करने वाला तन्त्र है। भिन्न भिन्न देशों में यद्यपि निर्वाचन की भिन्न भिन्न पद्धतियों का प्रचलन है, किन्तु उन सबमें समान तत्व है लोक की सामूहिक इच्छा के आधार पर सरकार का चुना जाना। भाजपा लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्ठा रखती है, तानाशाही को अस्वीकार करती है और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के पक्ष में है।


लोकतंत्र के प्रति भाजपा की निष्ठा पार्टी के त्रिवार्षिक संगठनात्मक चुनाव में अभिव्यक्त हुई है। पार्टी के कार्यकर्ता स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय अधयक्ष तक का चुनाव करते हैं। हर तीन वर्ष के बाद विभिन्न इकाइयों- स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के अधयक्ष बदल जाते हैं। संगठन की पुनर्रचना या नवीकरण होता है।

भाजपा ने समय-समय पर तानाशाही का और लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्तियों का विरोध किया है। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और सब प्रकार की स्वतंत्रताओं को स्थगित कर दिया तो भारतीय जनसंघ ने लोकतन्त्र की पुन:स्थापना के लिए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई। कांग्रेस ने निर्वाचित राज्य सरकारों को गिराने के लिए जब-जब राज्यपाल के पद का दुरूपयोग किया, हमने उसका कड़ा प्रतिकार किया है।

लोकतंत्र जनादेश पर आधारित राज्य व्यवस्था है। संसद और विधान मंडल, स्वतन्त्र प्रैस, स्वतन्त्र न्यायपालिका, स्वायत्ता निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं लोकतन्त्र के सुचारू संचालन के लिए ज़रूरी है। कांग्रेस ने समय-समय पर इन लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाने का प्रयत्न किया है और इनका अवमूल्यन किया है। भाजपा ने ऐसे सभी प्रसंगों में लोकतान्त्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए आवाज़ उठाई है।


लोकतन्त्र में असहमति का सम्मान किया जाता है। सत्तापक्ष बहुमत में होने पर भी विपक्ष के विचारों का सम्मान करता है। विपक्ष के लिए भी रचनात्मक भूमिका निभाना ज़रूरी है। लोकतन्त्र में प्रतिशोध, टकराव और असहिष्णुता के लिए स्थान नहीं है। नीतिभेद रहते हुए भी दलों के बीच सहिष्णुता लोकतन्त्र को पुष्ट करती है।

निष्पक्ष चुनाव लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण तत्तव है। बाहुबल और धानबल का इस्तेमाल कर जनादेश को हाइजैक कर लेना लोकतन्त्र को कमज़ोर करता है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में बाहुबल, अपराधीकरण और पैसे का प्रभाव बढ़ने से लोकतन्त्र विकृत हो गया है।

जाति और पंथ आधारित राजनीति लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्ति है। कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने जाति आधारित और साम्प्रदायिक राजनीति का अनुसरण कर सामाजिक विभाजन को तीव्र किया है। वोट बैंक की राजनीति के चलते सामाजिक और राष्ट्रीय एकता कमज़ोर हुई है। भाजपा ने इन दलों की नकारात्मक प्रवृत्तियों को बराबर बेनकाब किया है।

लोकतंत्र के लिए लोकशिक्षण और लोक संस्कार का बहुत महत्व है। राजनीतिक दलों का यह कर्तव्य है कि वे लोक शिक्षण और लोक संस्कार द्वारा ऐसे लोकमत का पुरस्कार करें जिसकी नींव पर टिका लोकतंत्र स्वस्थ और मज़बूत हो सके। श्री दीनदयाल उपाध्‍याय ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए लोक शिक्षण को बहुत महत्व दिया है।

राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेन्द्रीकरण के बिना आम आदमी को सच्चे लोकतंत्र की अनुभूति नही हो सकती। सत्ता का केन्द्रीकरण लोकतंत्र की प्रकृति से मेल नहीं खाता। नीचे की इकाइयों को अधिक अधिकार देकर प्रभावी करना होगा। भारतीय जनसंघ और भाजपा ने पंचायती राज को मज़बूत बनाने का आग्रह रखा है। गांधी जी की ग्राम स्वराज्य की कल्पना भी राजसत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है।

Sunday, September 28, 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठाएं भाग-1



प्रो. ओमप्रकाश कोहली
भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो। ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित करेंगे। प्रस्तुत है पहला भाग-

भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती जनसंघ अन्य राजनैतिक दलों से अपनी अलग पहचान रखते हैं। यह पहचान राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के प्रति उनके आग्रह के कारण है। जहां साधारणतया अन्य राजनैतिक दलों का उद्देश्य राजसत्ता प्राप्त करना है, वहीं भारतीय जनता पार्टी सत्ता को वृहत उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन मानती है। वह वृहत् उद्देश्य है सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्रचना। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जो स्वप्न देखा गया था वह अभी अधूरा पड़ा है। अधूरे सपने को पूरा करना भारतीय जनता पार्टी अपना उद्देश्य मानती है। सामाजिक- राष्ट्रीय पुनर्रचना के उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है जब पार्टी उच्च निष्ठाओं, सिध्दान्तों और आग्रहों को लेकर चले।

भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंच निष्ठाएं हैं:
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
भारत जैसे विशाल और विविधतायुक्त देश को बांधाने वाले तत्‍व क्या हैं? क्या एक शासन सत्ता देश को एक सूत्र में बांध सकती हैं?क्या संपूर्ण देश में एक संविधान और शासन होना एकता की गारंटी हो सकती है? क्या सुस्पष्ट भौगोलिक सीमाओं में बंधा होना अथवा भौगोलिक इकाई होना एकता की गारंटी हो सकती है? ये तत्व राष्ट्र की एकता के पोषक या सहायक तो हो सकते हैं राष्ट्रीय एकता के मूल अधिष्ठान नहीं हो सकते। मूल अधिष्ठान तो इस विविधातायुक्त देश में रहने वाले जन की प्रकृति चिति, या जीवन-पध्दति है जिसे आमतौर पर संस्कृति कहा जाता है। दीनदयाल उपाध्‍याय जी का कथन है कि 'व्यक्ति की भांति राष्ट्र की भी अपनी आत्मा होती है। उस आत्मा के अस्तित्व के कारण ही सारा राष्ट्र एकात्म बनता है। राष्ट्र की उस आत्मा को हमारे शास्त्रकारों ने ''चिति'' कहा है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक ''चिति'' होती है। ''चिति'' ही राष्ट्रीयता का चिह्न है। इसी ''चिति'' के कारण प्रत्येक राष्ट्र की संस्कृति को भिन्न व्यक्तित्व प्राप्त होता है। साहित्य, कला, धर्म, भाषा, सब इसी ''चिति'' की अभिव्यक्तियां हैं।' जाति, पंथ, भाषा आदि की विविधता होते हुए भी समान संस्कृति विविधतायुक्त भारत को एक सूत्र में बांधाने वाला तत्‍व है। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद की कल्पना न कोरी राजनीतिक कल्पना है, न संवैधानिक कल्पना, न भौगोलिक कल्पना यह सांस्कृतिक कल्पना है। इस कल्पना पर आधारित राष्ट्रवाद ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। भारतीय जनता पार्टी के कार्य के विभिन्न आयाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

देश में ऐसी बहुत सी शक्तियां है जिनकी मान्यता उक्त मान्यता से भिन्न है। वे मानते हैं कि भारत बहुसंस्कृतियों वाला देश है, इसलिए यह बहुराष्ट्रीयताओं का देश है। कांग्रेस के कुछ तत्तवों और वामपंथी तत्वों के ऐसे ही विचार है। भारतीय जनता पार्टी को यह विचार सर्वथा अस्वीकार्य है।

हम इस वास्तविकता की उपेक्षा नहीं कर सकते कि द्विराष्ट्रवाद की संकल्पना ने देश का विभाजन किया। जिन्ना, मुसलिम लीग और उसके अनुयायियों की यह मान्यता थी कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएं हैं और इसलिए ये दोनों समुदाय अलग-अलग राष्ट्र हैं। केवल एक भौगोलिक इकाई का हिस्सा होने मात्र से वे एक राष्ट्र नहीं हो जाते। इसमें से द्विराष्ट्र - हिन्दू राष्ट्र - मुस्लिम राष्ट्र - का विचार बल पकड़ता गया। परिणाम हुआ देश का विभाजन। देश के विभाजन ने हिन्दू-मुसलिम समस्या का समाधान नहीं किया। द्विराष्ट्रवादी या बहुराष्ट्रवादी सोच स्वतंत्रता के बाद भी जारी है जो बार-बार मुस्लिम तुष्टीकरण, अल्पसंख्यकवाद और वोट बैंक की राजनीति के रूप में प्रतिबिंबित होती है। भारतीय जनता पार्टी इस सोच का बराबर विरोध करती है और अपनी सोच को आग्रहपूर्वक स्थापित करती है कि भारत एक संस्कृति वाला एक राष्ट्र है जिसमें जाति, पंथ, भाषा आदि बहुविधा विविधता दिखायी पड़ती है।

कभी-कभी राष्ट्र और राज्य दोंनों का पर्यायवाची रूप में प्रयोग किया जाता है। यह सही नहीं है। राज्य एक राजनैतिक संकल्पना है और राष्ट्र सांस्कृतिक संकल्पना है। राज्य नहीं है तो भी राष्ट्र का अस्तित्‍व हो सकता है। लंबे समय तक यहूदी दुनिया के अलग-अलग देशों में बिखरे हुए थे और उनका अपना राज्य नहीं था । तो क्या यह माना जाये कि यहूदी राष्ट्रीयता नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं। यहूदी राष्ट्रीयता की यह भावना ही आगे चलकर उनके राज्य इज़रायल के रूप में मूर्त हुई। यदि किसी जन या मानव समुदाय से उसका राज्य छिन जाये, वह किसी विदेशी सत्ता के अधीन हो जाये तो इससे उस समुदाय की राष्ट्रीयता नष्ट नहीं हो जाती। वह भावना के रूप में समुदाय के लोगों को बराबर सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती रहती है।

इतिहास में ऐसे दृष्टांत भी मिलते हैं जब विभिन्न राष्ट्रीयताओं वाले मानव समुदायों को एक राज्य सत्ता के अंतर्गत बांधने का प्रयत्न किया गया। इससे एक राज्य तो अस्तित्तव में आ गया, पर समान राष्ट्रीयता के अभाव में आगे चलकर विखंडित हो गया। सोवियत संघ इसका उदाहरण है। सोवियत संघ के अंतर्गत अनेक राष्ट्रीयता वाले मानव समुदाय या इकाइयां सम्मिलित की गई थी किन्तु समान राष्ट्रीयता या समान संस्कृति के अभाव में वे एक नहीं रह पाये।भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रहित को पार्टी हित से ऊपर रखती है। राष्ट्रहित को क्षति पहुंचाने वाली प्रवृत्तियों के विरूध्द भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता आंदोलन किया है। ऐसी प्रवृत्तियां जो राष्ट्र की एकता को कमज़ोर करती है, विभाजनकारी है, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, राष्ट्र के स्वाभिमान को कमज़ोर करती हैं और राष्ट्र की अस्मिता तथा उसके प्रतीकों, मानदंडों और चिन्हों के प्रति उपेक्षा का भाव रखती हैं, भाजपा उन्‍हें निर्मूल करने के लिए बराबर आंदोलन करती रही है। आंदोलन के विषय बदलते रहे हैं लेकिन उनके पीछे प्रेरणा या दृष्टि बराबर राष्ट्रहित पोषण की रही है। फिर चाहे आंदोलन का विषय कश्मीर की अखंडता हो, बेरूवाड़ी का हस्तांतरण हो, वंदे मातरम् गान या सरस्वती वंदना के विरोध की मानसिकता हो, अयोध्‍या में राम मंदिर का निर्माण हो, समान नागरिक संहिता हो, आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो, वोट की राजनीति हो, जातिवाद की विभाजनकारी प्रवृत्ति हो या ऐसे ही अन्य अनेक विषय हों। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की प्रेरणा से ही जनसंघ या भाजपा इन विषयों पर आंदोलन में प्रवृत्त हुए। ऐसे तत्तव और प्रवृत्तियां जो हमारी एकता को चुनौती देती हैं, भारतीय जनता पार्टी के आंदोलन के प्रिय विषय रहे हैं। बहुराष्ट्रवाद की सोच, क्षेत्रवाद, जातिवाद, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, माओवाद, नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरवाद, राष्ट्रीय सम्प्रभुता को चुनौती, देश पर चीन का आक्रमण, पाकिस्तानी आक्रमण, बांग्लादेशी घुसपैठ आदि समय-समय पर सार्वजनिक क्षितिज पर उभरने वाले विषयों पर भाजपा के लाखों-लाख कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया और राष्ट्रहित के रक्षण और संवर्धन के लिए अनुकरणीय त्याग किया। राष्ट्र के लिए क्या हितकर और वांछनीय है और क्या अहितकर और अवांछनीय है यह विवेक भाजपा नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं में सदैव जागृत करता रहता है।

भारतीय जनता पार्टी जिस समान संस्कृति को राष्ट्रीयता का अधिष्‍ठान मानती है उसे हिन्दुत्व, भारतीयता और इंडियननैस किसी भी नाम से जाना जा सकता है। राष्ट्रीयता का यह बोध ही हिन्दुत्व है, यही भारतीयता है और यही हमारी जीवन पध्दति है।राष्ट्रीय दृष्टिकोण को मजबूत करने के लिए राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक है। जो कुछ है वह राष्ट्र का है, मेरा नहीं। 'राष्ट्राय स्वाहा, राष्ट्राय इद्म न मम्।'
सांस्कृतिक समानता राष्ट्रीय एकता का आधारभूत तत्‍व होता है। एकता के अन्य पोषक तत्व हैं : भौगोलिक सान्निध्‍य, समान अतीत, भाषायी समानता, आध्‍यात्मिक एकता। ये सभी तत्‍व मिलकर किसी मानव समुदाय का एक राष्ट्र बनाते हैं। आतंरिक रूप से धर्म, भाषा, जाति जैसे विभाजक तत्वों के सक्रिय रहते हुए भी मानव समुदायों को उक्त तत्‍व एकरूपता प्रदान करते हैं। राजनैतिक समुदायों को एकता प्रदान करने वाली भावना उसकी राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद ही राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय सम्मान, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सम्प्रभुता का स्रोत हैं।राष्ट्रीयता की भावना को मज़बूत करने में समान इतिहास एक पोषक तत्‍व होता है। समान परम्पराएं मानव समुदाय को एक राष्ट्र का रूप देती हैं। समान विचारों एवं अनुभूतियों से युक्त होकर एक निश्चित भूभाग में रहने वाला मानव समुदाय राष्ट्र के रूप में ढलता है। राष्ट्र एक ऐसा मानव समुदाय है जिसकी एक स्वतंत्र राजनैतिक इकाई होना वांछित होने पर भी अनिवार्य नहीं है। राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। इसे राष्ट्र की चिति या अस्मिता कहते हैं। भारतीय संस्कृति की पहचान उसके आध्‍यात्मिक रूझान के कारण है। आध्‍यात्मिकता हमारी चिति का वैशिष्टय हैं। राष्ट्रीयता वह भावनात्मक बंधान है जो किसी मानव समुदाय को एक जन में रूपातंरित करता हैं।

संक्षेप में, भारतीय जनता पार्टी एक देश, एक जन और एक संस्कृति की अवधारणा में अविचल विश्वास रखने वाला राजनीतिक दल है। जब कभी राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचती है तो भाजपा स्वाभाविक रूप में उद्वेलित होती है और राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचाने वाले तत्‍वों का प्रबल विरोध करती है। भारतीय जनता पार्टी यह मानती है कि हमारी एक राष्ट्रीय जीवन पध्दति है जो न केवल अक्षुण्ण रहनी चाहिए बल्कि उसका सतत् पोषण और संवर्धन होते रहना चाहिए। हमारे सभी कार्यकलापों का उद्देश्य राष्ट्र का संरक्षण, कल्याण और अभ्युदय है। हमारी सीमाएं सुरक्षित रहनी चाहिए, क्षेत्रीय एकता बनी रहनी चाहिए और हमें अपनी ऐतिहासिक परम्पराओं और विरासत का स्वाभिमान रहना चाहिए। ये सब बातें राष्ट्रीय हित की अवधारणा का अंग है।

Thursday, August 14, 2008

सबक सीखने से इनकार


ए.सूर्यप्रकाश
सबक सीखने से इनकार मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टर विचारों वाले नेता अपने फरमान का पालन न करने वाले लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के बारे में कैसी भी राय क्यों न बनाएं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि चटर्जी ने खुद को विट्ठलबाई पटेल और जीवी मावलंकर जैसे उन चमकते पूर्ववर्तियों की पंक्ति में खड़ा कर लिया है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे और साथियों की धौंसपट्टी में नहीं आए। लोकतंत्र और संविधान को महत्व देने वाले प्रत्येक नागरिक को सोमनाथ चटर्जी द्वारा एक अगस्त को जारी किए गए चार पेज के विस्तृत बयान को जरूर पढ़ना चाहिए।
इससे पता चलेगा कि हम लोकसभा के स्पीकर की स्वतंत्रता का हनन करने के कितना करीब पहुंच गए थे। यदि वह कामरेडों की धमकियों और उनकी राजनीतिक चालों का सामना न करते तो एक अहम संवैधानिक पद की निष्पक्षता और गरिमा को क्षति पहुंचा बैठते। अस्पष्ट जनादेश, वोट बैंक की चिंता और नोटों की महिमा के इस हताशापूर्ण दौर में स्पीकर यदि अपनी पार्टी के आलाकमान के हाथों की कठपुतली बन जाते तो लोकतंत्र के ताबूत में एक और कील ठुक जाती। सोमनाथ चटर्जी ने तभी अपने इरादे साफ कर दिए थे जब उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापसी के पत्र के साथ सांसदों की सूची में अपना नाम शामिल करने के माकपा के निर्णय पर ऐतराज जताया था।
सोमनाथ चटर्जी ने मा‌र्क्सवादियों को उस असाधारण घटनाक्रम की याद दिलाई जिसमें स्पीकर के रूप में उनका नाम प्रस्तावित करते समय 18 नामांकन पत्र भरे गए थे। इन्हें भरने वालों में सत्ताधारी गठबंधन ही नहीं, बल्कि प्रमुख विपक्षी दल और उसके सहयोगी भी शामिल थे। दुर्भाग्य से न तो इन तथ्यों ने और न ही स्पीकर की निष्पक्षता की परंपरा ने उन लोगों पर कोई प्रभाव छोड़ा जो माकपा को चलाते हैं। इसलिए उन्होंने मान लिया कि सोमनाथ चटर्जी की प्राथमिक वफादारी पार्टी के प्रति होनी चाहिए, इसके अलावा कहीं नहीं। संभवत: उन्होंने स्पीकर के पद की संवैधानिक मान्यता को भी अपनी राजनीतिक विचारधारा के चश्मे से देखने की कोशिश की। सौभाग्य से सोमनाथ चटर्जी ने माकपा की इस कोशिश को चुनौती दी और अपने पूर्व कामरेडों को संवैधानिक धर्म के बुनियादी उसूल सिखाए। उन्होंने घोषणा की कि स्पीकर की किसी दल से संबद्धता नहीं होती और इसलिए कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या अधिसत्ता राष्ट्रपति को दी गई सूची में उनका नाम नहीं डाल सकती। उन्होंने कहा, पार्टी को यह महसूस करना चाहिए था कि एक स्पीकर होने के नाते मैं किसी दल का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न ही स्पीकर के कार्यो के संबंध में पार्टी मुझे कोई निर्देश ही दे सकती है।
मैं इस बात को पूरी जोरदारी के साथ दोहराना चाहता हूं। यह कहना पर्याप्त होगा कि माकपा ने जो कुछ किया वह किसी ऐसे व्यक्ति या संस्थान का ही कार्य हो सकता है जिसने लोकतांत्रिक तौर-तरीके न सीखे हों। सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पार्टी को चुनौती देकर एकदम सही किया। उनके समक्ष अनेक अनुकरणीय पूर्ववर्ती हैं, जो पद का सम्मान करते हुए नुकसान उठाने को मजबूर हुए। देश में विधायी सदनों के लिए मार्गदर्शक पुस्तक प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर आफ पार्लियामेंट के रचयिता एसएल शकधर और एमएन कौल ने पूर्व स्पीकरों द्वारा प्रतिपादित कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों को लिपिबद्ध किया है। इस सूची में पहला नाम है केंद्रीय विधायी सभा के चुने हुए पहले स्पीकर विट्ठलभाई जे. पटेल का। यह विधायी सभा भारत की स्वतंत्रता की घोषणा तक कायम रही। वह स्वराज पार्टी के सदस्य थे। 1925 में स्पीकर के रूप में अपना चुनाव किए जाने पर उन्होंने अपनी पार्टी से नाता तोड़ दिया। अगली बार वह निर्दलीय के रूप में चुनाव में उतरे और उन्होंने इस पर जोर दिया कि स्पीकर को दलगत राजनीति से परे होना बेहद जरूरी है। उन्हें निर्विरोध चुन लिया गया और जनवरी 1927 में वह फिर से स्पीकर बन गए। स्वतंत्र भारत के पहले स्पीकर जीवी मावलंकर ने एक अवसर पर कहा कि हमारे राजनीतिक और संसदीय जीवन के वर्तमान हालात में भारतीय स्पीकर के लिए पूरी तरह अंग्रेज स्पीकर जैसा बनना आसान नहीं होगा, फिर भी उसे निश्चित तौर पर पार्टी मामलों और विवादों के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए। दलगत राजनीति से स्पीकर को बिल्कुल अलग-थलग करने के लिए उन्होंने राजनीतिक दलों को सुझाव दिया कि एक स्वस्थ परंपरा कायम करते हुए सदन के स्पीकर को निर्विरोध चुना जाना चाहिए।
इस परंपरा को कायम किए बिना स्पीकर को पूरी तरह गैर-राजनीतिक मानना विरोधाभासी संभावनाओं की अपेक्षा करने के समान होगा। स्पीकर की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पीठासीन अधिकारियों ने अनेक संगोष्ठियों में यथार्थवादी रुख अपनाया। इसकी शुरुआत 1951 में आयोजित एक संगोष्ठी से हुई। इसका यह प्रभाव हुआ कि 1957 में स्पीकर के रूप में किसी भी राजनीतिक दल ने अनंतसयनम आयंगर का विरोध नहीं किया। आयंगर ने कांग्रेस संसदीय दल से इस्तीफा देकर इस परंपरा का मान बढ़ाया। हालांकि उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था। बाद के वर्षो में चौथी लोकसभा के स्पीकर चुने जाने पर नीलम संजीव रेड्डी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उनके उत्तराधिकारी जीएस ढिल्लन ने कांग्रेस संसदीय दल से उनके इस्तीफे की घोषणा की। यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि सोमनाथ चटर्जी ने स्पीकर चुने जाने के बाद भी माकपा से संबंध विच्छेद नहीं किया इसलिए स्पीकर पद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्वराज पार्टी से संबंध तोड़ने वाले विट्ठलभाई पटेल के समान नहीं हो सकती। इस दलील में कुछ दम हो सकता है, किंतु इससे माकपा को स्पीकर को आंखें दिखाने का अधिकार नहीं मिल जाता। पूर्व में अनेक स्पीकरों ने अपनी पार्टी कांग्रेस से औपचारिक रूप से नाता नहीं तोड़ा था। इनमें जीवी मावलंकर, शिवराज पाटिल और पी संगमा शामिल हैं, किंतु उनकी तरफदारी में यह कहा जा सकता है कि वे अपने शासनकाल में साफ तौर पर पार्टी के अनुशासन और पार्टी की अंदरूनी राजनीति से मुक्त रहे। उनके साथ व्यवहार में कांग्रेस ने भी संवैधानिक रूप से सही रुख अपनाया और ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे उनकी गरिमा पर आंच आती। भविष्य में स्पीकर और उसकी पार्टी के बीच संबंध तनावपूर्ण होने से बचाने के लिए सोमनाथ चटर्जी ने सुझाव दिया कि स्पीकर को अस्थाई रूप से अपने पार्टी से इस्तीफा दे देना चाहिए। एक समय ठीक यही विट्ठलभाई पटेल ने किया था और मजे की बात है कि दलबदल विरोधी कानून में पीठासीन अधिकारियों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
सोमनाथ चटर्जी के उत्तराधिकारी उनकी सलाह मान सकते हैं। हालांकि तब तक इस बात से छुटकारा नहीं मिलेगा कि जो राजनेता लोकतांत्रिक तौर-तरीके अपनाने के आदी नहीं हैं और जो विचारधारा के कारण पूंजीवादी लोकतांत्रिक संस्थानों से नफरत करते हैं वे संभवत: इन स्वस्थ परंपराओं का पालन नहीं कर सकते। जिस अंदाज में माकपा ने भारतीय संसद के पहले कम्युनिस्ट स्पीकर के साथ व्यवहार किया और प्रत्युत्तर में सोमनाथ चटर्जी ने अपने पूर्व कामरेडों को यह सीख दी कि जब तक वे लोकतांत्रिक मैदान में खेल रहे हैं तब तक उन्हें इसके नियम-कायदे और संवैधानिक तौर-तरीकों का पालन करना होगा उससे यह मुद्दा केंद्रीय भूमिका में आ गया है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Tuesday, August 12, 2008

भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे : रिपोर्ट


नई दिल्ली : एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के अधिकतर मुसलमानों के पूर्वज अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के हिंदू थे, जिन्होंने कालांतर में इस्लाम धर्म अपना लिया और मुसलमान बन गए। आंध्र प्रदेश के मुस्लिम समुदाय में 'सामाजिक और शैक्षणिक वर्ग की पहचान' पर तैयार की गई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के 85 फीसदी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे जो अनुसूचित जातियों या पिछड़े तबकों से संबंध रखते थे। इन लोगों ने विभिन्न समयों पर इस्लाम ग्रहण कर लिया।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सलाहकार पी.एस. कृष्णन द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में मुसलमानों और देश में उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति की तस्वीर पेश की गई है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं का मुसलमान बनना समय समय पर चलता रहा... खासकर मध्यकाल में इसने और अधिक गति पकड़ ली। कृष्णन की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदुओं में जातिवाद की कठिन व्यवस्था ने इन लोगों के मुसलमान बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन लोगों ने छुआछूत और भेदभाव से बचने के लिए इस्लाम को अपनाया। उनके लिए इस्लाम कबूल करना एक राहत की बात थी। दक्षिण भारत में कुछ समुदायों के लोगों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। आंध्र प्रदेश में 98 प्रतिशत ईसाई हिंदू अनुसूचित जाति मूल के हैं। पंजाब में इन लोगों ने सिख धर्म अपनाया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के हिंदुओं ने अन्य मजहबों को अपनाया, लेकिन हर जगह पिछड़ापन उनके साथ रहा। यह पिछड़ापन आज भी जारी है और अधिकतर मुसलमान गरीब हैं। कृष्णन ने कहा कि बहुत से शासकों ने मुसलमानों के पिछड़ेपन को महसूस किया और उन्हें मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की। सबसे पहले कोल्हापुर के महाराज ने 1902 में मुसलमानों के लिए आरक्षण शुरू की, जबकि मैसूर के महाराजा ने यह कदम 1921 में उठाया। इसी तरह बम्बई प्रेज़िडंसी और बाद में मद्रास प्रेज़िडंसी ने भी आरक्षण की पेशकश की।

रिपोर्ट में मुसलमानों के 14 ऐसे समुदायों की पहचान की गई है जिन्हें पिछड़ी श्रेणी में सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। कृष्णन ने यह रिपोर्ट विभिन्न क्षेत्रों के दौरे और भारत की सामाजिक व्यवस्था पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर तैयार की है।
साभार नवभारत टाईम्स

Monday, January 28, 2008

राष्ट्रीय एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति


बलबीर पुंज
हिंदुत्व की सही परिभाषा और उस के विस्तृत अर्थ को यदि एक बार समझ लिया जाए तो कई भ्रांतियां खत्म हो जाएंगी।
यदि पंथनिरपेक्षता भारत की आत्मा है, तो हिंदू राष्ट्र इसकी काया हैं। देश के जिस भाग में भी हिंदू विचार पध्दति का क्षय हुआ, वहां पंथनिरपेक्ष व्यवस्था की भी उतनी ही क्षति हुई। देश की एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति है। इसलिए हमारे देश के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा ही दी जा सकती है।

संस्कृत की निम्न दो पंक्तियों में वीर सावरकर ने हिन्दुत्व का निचोड़ संसार के सामने रखा है-आसिंधु सिंधु पर्यंता यस्य भारतभूमिका:।पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृत:॥प्रत्येक वह जो सिंधु से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वह हिंदू है। 'पितृभू' और 'पुण्यभू' शब्दों के विशिष्ट अर्थ हैं। पितृभू का अर्थ है- अपने पूर्वजों की कर्मभूमि और पुण्यभूमि का अर्थ है - जो जिस दर्शन को मानते हैं, उस दर्शन का प्रतिपादन करने वाले दार्शनिकों के कार्य, निवास एवं संस्कृति द्वारा पवित्र बनी भूमि।इस चिंतन पर सर्वोच्च न्यायालय की भी मुहर लगी हैं। संविधान निर्माताओं ने भी हिंदू धर्म को पूजा पध्दति नहीं माना बल्कि उसे जीवनशैली माना। इसलिए धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की गारंटी देते हुए अनुच्छेद 25 में स्पष्ट कर दिया गया कि खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदू के अंतर्गत सिख, जैन अथवा बौध्द मत सम्मिलित हैं। कमिश्नर संपत्ति कर मद्रास एवं अन्य बनाम स्व। आर. श्रीधारन एल. आर. (1976) सप्ली एस. जी. आर. 478 में संविधान पीठ ने निर्णय दिया था कि ''हिंदू अपने में भिन्न-भिन्न प्रकार के विश्वास, श्रध्दा बिंदुओं और पूजा-पध्दतियों को संजोए हुए है। शास्त्री यज्ञ पुरूषदास एवं अन्य बनाम मूलदास भद्रदास एवं अन्य (ए. आई. आर. 1966 ए. जी. 1119) में मुख्य न्यायाधाीश ने भी माना था कि सिंधु नदी के तट पर विकसित सभ्यता से प्रारंभ हुआ समाज हिंदू है न कि पूजा पध्दति।1977 में पांच न्यायाधीशों की एक खंडपीठ जिसमें न्यायमूर्ति एम. एच. बेग और आर. एस. सरकारिया शामिल थे, ने पुन: हिंदुत्व को परिभाषित किया। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटानिका से उध्दरण लेते हुए खंडपीठ ने कहा '' हिंदुत्व किसी भी पूजा-पध्दति को स्वीकारने या नकारने की बजाय सभी मान्यताओं व पूजा-पध्दतियों को अंगीकार करती है।'' खंडपीठ ने आगे यह भी कहा कि एक हिंदू चाहे वह किसी भी जाति या मजहब को मानने वाला क्यों न हो, अपनी रूचि से किसी भी पूजा-पध्दति को अपना सकता है। इस तरह हिंदुत्व एक सभ्यता और विभिन्न धर्मों का समुच्चय है, जहां कोई एक संस्थापक या पैगंबर नहीं है। ईसाई या इस्लाम मजहब कबूल कर लेने के बावजूद उस व्यक्ति विशेष की पहचान एक हिंदू के रूप में बनी रहती है। अदालत के अनुसार हिंदू इस देश में रहने वालों के लिए प्रयुक्त होता है, चाहे वे किसी भी मजहब या संप्रदाय से जुड़े क्यों न हों। यह हमारी पहचान है।डा. इस्माइल फारूखी एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य 1994 (6) एस. सी. सी. पृ. 360 (अयोधया का मुकदमा) में न्यायमूर्ति भरूचा और न्यायमूर्ति अहमदी ने कहा - '' सामान्यत: हिंदुत्व एक जीवन दर्शन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह सहिष्णु है। इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी, बौध्द, जैन, सिख आदि मत के लोग इसीलिए इस देश में संरक्षण प्राप्त कर सके।'' महात्मा गांधी ने भी 'हिंदू धर्म' नामक पुस्तक के पृष्ठ 34 पर लिखा है- हिंदुत्व ही हमारी राष्ट्रीयता का आधार था।हिंदू दर्शन में अनंत काल से विचार-विमर्श और श्रेष्ठ चिंतन के आदान-प्रदान की दीर्घ परंपरा रही है। यदि वेदों पर भी कोई तर्कसंगत वाद-विवाद उठता है और कोई नया मान्य पंथ उभरता है तो निस्संदेह हिंदू दर्शन में उसे स्थान मिलता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वेदों के साथ साम्य नहीं रखने वाली बौध्द, जैन आदि धाराएं पल्लवित होने से पहले ही सूख जातीं। अनिश्वर व अज्ञेयवादी बौध्द मत के प्रवर्तक बुध्द को भी हमने ईश्वर के अवतार रूप में ही पूजा। यही नहीं, जब भारत की धरती पर ईसाई, यहूदी, पारसी और प्रारंभ के मुसलमान आए तो हिंदू सभ्यता ने बांह फैलाकर उनका स्वागत किया। महाभारत में उल्लेख है: ''अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्म सनातन:॥ समस्त प्राणियों के प्रति मन, वाणी और कर्म से द्रोह भाव नहीं रखना, सबके प्रति अनुग्रह, सबके प्रति उदारता; सनातन धर्म का यही संदेश है।हिंदू संस्कृति अत्यंत प्राचीन है और अपने मूल्यों के कारण सतत् बनी हुई है। इसी उदार भाव के कारण हिंदू संस्कृति भौगोलिक सीमाओं में कैद न होकर चंहुओर फैली। आज कई देशों के लोक व्यवहारों में और उनके साहित्य में हिंदू संस्कृति के चिन्ह मिलते हैं। 1919 में प्रकाशित 'पीपुल्स ऑफ फिलीपाइन्स' नामक पुस्तक में प्रो. क्रोवर ने लिखा है, ''फिलीपाइन के धार्मिक लोगों के विचार, रीति-रिवाज, नाम, शब्द, कला, कौशल आदि पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। अमेरिका के प्राचीन निवासी रेड इंडियन के जीवन और उनकी प्राचीन संस्कृति के अधययन से अब कई पाश्चात्य विद्वान भी स्वीकार करने लगे हैं कि यहां किसी समय भारतीय संस्कृति का जोर था। इनके बीच अग्नि संस्कार, सूर्योपासना प्रचलित था। दक्षिण अमेरिका में कई जगह शिवलिंग भी मिले हैं। स्याम देश में हिंदू संस्कृति की छाप अनूठी है। बिना किसी दबाव या प्रभाव के हिंदू संस्कृति का ओज आज भी व्यापक है। तभी आज भी दुनिया भर से लोग आध्‍यात्मिक शांति की तलाश में भारत आते हैं।''हिंदुत्व हमारी राष्ट्रीयता का आधार है। राष्ट्र किसी भौगोलिक सीमा का नाम नहीं, बल्कि संस्कृति सूचक एक विशेष शब्द है। राष्ट्र कोई भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भूगोल पर आधारित भावनात्मक इकाई है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति, उसके आचार-विचार भिन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक राष्ट्र की प्रकृति भी भिन्न होती है। यही उसका वैशिष्टय है। हमारे देश की विशिष्टता हमारी सनातन संस्कृति है। हमारे राष्ट्र जीवन की मूल प्रकृति आध्‍यात्मिक होते हुए भी हमने जीवन के अन्य पक्षों को गौण नहीं माना। मूल प्रकृति में बदलाव आने से विकृतियां आनी स्वाभाविक हैं। अतीत काल में हमारी अनंत भौतिक समृध्दि से आकृष्ट होकर ही हमारे यहां कई विदेशी आक्रमणकारी आए, वहीं हमारी वृत्तियां धार्म, आधयात्मिक या परमात्म चिंतन में ही लगी रहीं। हमारी चेतना व्यष्टि से समष्टि की ओर प्रवाहित होती रही। यही हिंदू राष्ट्र की अमरता का स्रोत है।जब से हम परतंत्र हुए, हमारी हिंदू चेतना निर्बल होती चली गई। आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू के काल में भी हिंदू राष्ट्रवाद हाशिए पर ही रहा। मैकाले-मार्क्‍स के मानसपुत्रों ने हिंदू शब्द का प्रयोग एक गाली के रूप में किया। वोटों के लिए जमकर तुष्टिकरण की नीति को खूब पोषित किया गया। एक तरफ मुसलमानों में कट्टरपंथी तत्तवों को प्रोत्साहित किया गया, वहीं हिंदू समाज में जातियों को जातियों के विरोधा में खड़ा कर हिंदू समाज को बांटने और कमजोर करने का प्रयास भी हुआ।जैसा कि मैंने ऊपर कहा राष्ट्र जीवन की मूल प्रकृति में बदलाव आने से विकृतियां अवश्यंभावी हैं। अल्पसंख्यकवाद और अन्य संकीर्ण मनोवृत्तियों के कारण क्षेत्रीयता व जातीयता जैसी विकृतियां बढ़ीं और राष्ट्रवाद तिरोहित हो गया। 1980 के आखिर में शुरू हुए अयोध्‍या आंदोलन से हिंदू राष्ट्रवाद की भावना पुनर्जीवित हुई। हिंदुत्व दर्शन में आस्था रखने वाली भारतीय जनता पार्टी को इसीलिए 1998 में सत्ता की कमान थमाई गई। गुजरात की जनता ने दुबारा यह संदेश दिया कि जो इस देश की मुख्य धारा के साथ है, वही उनके साथ चल सकता है। सदियों से हम सखा भाव से सबको आत्मसात करते आए हैं। ''समानशीलव्यसनेषु सख्यम्'' - साथ रहने से लोगों में सख्य भाव उत्पन्न हो जाता है किंतु दुखद पहलू यह है कि देश के कथित हितैषी समाज के लोग द्रोह भाव पाले रखने के लिए लगातार जुटे रहते हैं।छद्म पंथनिरपेक्षी व उन्हें पोषित करने वाले मार्क्‍सवादी राष्ट्र और राज्य शब्द को पर्यायवाची ठहराते हुए राष्ट्रवाद के उभार को गलत अर्थ देने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में राष्ट्र की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। अथर्ववेद में कहा है - ''सानो भूमि: त्विर्षि बलं राष्ट्रे दयातूत्तमे'' (इस राष्ट्र में तेज एवं बल को धारण कर हमारी मातृभूमि वृध्दि करे)। प्राचीन काल से यह मंत्र देश में गुंजायमान है - राष्ट्राय स्वाहा.......इदं राष्ट्राय, इदं न मम्। हम पृथ्वी को मां के रूप में पूजते आए हैं - माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:। स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद ने भी हिंदुत्व की ही कल्पना की थी। महर्षि अरविंद भी इसी विचारधारा को प्रतिपादित करते हैं। ''हमारे राष्ट्रवाद का अर्थ सनातन धर्म है। सनातन धर्म के साथ हिंदू राष्ट्र का जन्म हुआ। यह इसी के साथ पल्लवित-पुष्पित हुआ। जब सनातन धार्म का क्षय होता है तो राष्ट्र का भी क्षय होता है।'' भारत सनातन से हिंदू राष्ट्र है और हिंदू राष्ट्र में किसी एक मजहब या पंथ की अवधारणा कभी नहीं की गई। विचारों की विविधता हिंदुत्व का आधार है। भारत में कभी भी पंथ पर आधारित राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। जब हम भारत में पंथ पर आधारित राज्य की कल्पना का त्याग करते हैं, तो उसका एकमात्र कारण यह है कि भारत एक जीवंत व परंपरागत रूप से हिंदू राष्ट्र है। यदि भारत के इतिहास का अवलोकन करें तो हम पाएंगे कि मुसलमानों के काल को छोड़ दें तो भारत में धर्मनिष्ठ राजा तो बहुत हुए, परंतु पंथ पर आधारित राज्य कभी नहीं रहा। इसका एकमात्र अपवाद सम्राट अशोक थे, जिन्होंने कलिंग के युध्द के बाद बौध्द धार्म स्वीकार कर लिया और फिर इस मत को राज्य धर्म घोषित करके राज्य के संसाधानों से इसका प्रचार किया।भारत एक हिंदू राष्ट्र है तभी वह आज एक पंथनिरपेक्ष राज्य है। यदि ऐसा नहीं होता तो 1947 में जब देश का एक भाग मजहबी आधार पर अलग हुआ और अपने को इस्लामिक राज्य घोषित किया तब यह बहुत स्वाभाविक होता कि शेष भारत अपने को हिंदू राज्य के रूप में घोषित कर लेता। न तो ऐसा हुआ और न ऐसा होना संभव था क्योंकि खंडित भारत एक हिंदू बाहुल्य वाला हिस्सा था। हिंदुत्व एक जीवन पध्दति है, जिसमें बहुलतावादी व बहुपंथीय संस्कृति का समावेश है। इसीलिए हिंदू उपासना में किसी एक ईश्वरवाद की बजाए कोटि-कोटि देवी-देवताओं को मान्यता मिली हुई है।मजहबी राज्य की कल्पना इस्लाम, ईसाई और साम्यवाद में ही संभव है। मैं साम्यवाद को भी एक किस्म का असहिष्णु मजहब मानता हूं, क्योंकि इस सिध्दांत को मानने वाले मानव के कल्याण के लिए केवल कार्ल मार्क्‍स-फ्रेडरिक एंजिल्स द्वारा रचित 'दास कैपिटल' को ही एकमात्र विकल्प मानते हैं। विनोबा भावे भी यहूदी, ईसाई व इस्लाम को ''ही वाद'' और भारतीय संस्कृति को ''भी वाद'' बताते हैं। 'ही वाद' अपने पंथ को ही एकमात्र सच्चा पंथ मानता है। जबकि सनातन धर्म हमें ''आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:'' सब दिशाओं से शुभ ज्ञान के लिए अपने को खुला रखने का संदेश देता है। इसलिए हमारी यह भूमि इतनी पवित्र मानी जाती है और हम उसे माता के रूप में पूजते हैं। वैदिक ऋषि को भी इस श्रेष्ठता का भान था। तभी तो वेदों में कहा गया: ''जनं विभ्रति बहुधा विवचस, नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्'' - अनेक भाषाओं को बोलने वाले, अनेक पंथों का अनुसरण करने वाले जनों को हमारी धारती धारण करती है।अस्तु यह कहा जा सकता है कि यदि पंथनिरपेक्षता भारत की आत्मा है, तो हिंदू राष्ट्र इसकी काया हैं। देश के जिस भाग में भी हिंदू विचार पध्दति का क्षय हुआ, वहां पंथनिरपेक्ष व्यवस्था की भी उतनी ही क्षति हुई। देश की एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति है। इसलिए हमारे देश के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा ही दी जा सकती है।
 (लेखक प्रसिध्द स्तंभकार है)

Thursday, October 25, 2007

देश एक और विभाजन की तरफ़


सौरभ मालवीय
आन्ध्र प्रदेश की तरह तमिलनाडु ने भी मुसलमानों और ईसाइयों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण देने का बिल पास कर दिया है। इस बिल में पिछड़े मुसलमानों और ईसाइयों को आरक्षरण देने का प्रावधान है। तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम। करूणानिधि भगवान श्रीराम के होने का और श्रीराम सेतु के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर रहे है। उन्हें यह समझना चाहिए कि यह देश सनातन है और इस देश की जनता की भावनाओं और आस्थाओं से खिलवाड़ करने वालों को यह समाज कभी माफ नहीं करता है।

23 जुलाई को आन्ध्र प्रदेश भी मुस्लिम आरक्षण विधेयक पारित कर चुका है। इसके तहत पिछड़े मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में दाखिलों में 4 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। मुस्लिम आरक्षण को हाई कोर्ट में चुनौती दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा कामर्सु श्रीतेजा ने दी। लेकिन, उसने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। तब सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा। अदालत ने मुस्लिम आरक्षण पर स्टे लगाते हुए इसके आधार पर कॉलेजों में नए एडमिशन करने पर रोक लगा दी। कोर्ट फिलहाल इस मामले पर सुनवाई कर रहा है।

आखिर धर्म के आधार पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले ये जन-प्रतिनिधि देश को कहां ले जाएंगे।

Monday, September 3, 2007

बेजा अधिकारों का अनुच्छेद


अरुण जेटली
अनुच्छेद 370 से यह आशय निकलता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अंग नहीं, बल्कि उसके हमारे देश के साथ बस विशेष संबंध है
भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान एक दुर्भाग्य है। लोगों को तटस्थता से पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या इससे राष्ट्र का भला हुआ है और क्या यह भारत की अखंडता को मजबूती प्रदान करने में सहायक हुआ है? या फिर इसने समस्याओं में इजाफा किया है? पिछले 57 सालों का अनुभव बताता है कि अनुच्छेद 370 की यात्रा अलग दर्जे के बजाय अलगाव की ओर ले जा रही है। अनुच्छेद 370 एक राज्य और भारतीय संघ के बीच एक संवैधानिक अवरोध था और इस रूप में यह बराबर काम करता रहा। उद्यमियों को निवेश से रोककर इसने राज्य के आर्थिक विकास को बाधित कर दिया। 1947-48 में पाकिस्तान ने हमला कर जम्मू-कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था। तब से दो बार 1965 तथा 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो चुके हैं। जब पाकिस्तान को जंच गया कि परंपरागत युद्ध में भारत को हराकर वह पूरे जम्मू-कश्मीर पर कब्जा नहींकर सकता तो आठवें दशक के अंत तक पाकिस्तान ने भारत में आतंकवाद के रूप में छद्म युद्ध शुरू कर दिया, जो अब तक लगातार जारी है। इस प्रयास में वह भारत के और भूभाग पर तो कब्जा नहीं कर पाया, पर अपने एक भाग (पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश है) से हाथ जरूर धो बैठा। अनुच्छेद 370 से आशय निकलता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उसके हमारे देश के साथ बस विशेष संबंध हैं। इससे पाकिस्तान और आतंकवादियों, दोनों को यह संदेश मिला कि इसकी पूर्ण अखंडता को रोका जा सकता है। आतंकवाद के माध्यम से अलग दर्जे की ग्रंथि को स्वतंत्र राष्ट्र की मांग के रूप में स्थापित कर दिया। जिन समस्याओं के समाधान के लिए अनुच्छेद 370 लागू किया गया था उनमें से कोई भी हल नहींहुई। अनुच्छेद लागू करने के बाद के ऐतिहासिक घटनाक्रम से यह बात साफ हो जाती है कि इसके प्रावधान समाधान के बजाय खुद ही समस्या हैं। सुरक्षा, विकास, क्षेत्रीय असंतुलन तथा कश्मीरी पंडितों को फिर से जम्मू-कश्मीर में बसाना कश्मीर की बड़ी समस्याएं हैं। इनके अलावा पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करना और उन्हें मुआवजा देना भी उतना ही अहम है। अब सवाल यह उठता है कि क्या अनुच्छेद 370 इन मूल समस्याओं के निराकरण में सहायक है? क्या और अधिक स्वायत्तता देने के लिए अनुच्छेद में परिवर्तन कर राज्य और राष्ट्र के संबंधों को और कमजोर करने से इन समस्याओं का समाधान संभव होगा? इन सब सवालों का एक ही जवाब है-नहीं। भारतीय संविधान का चरित्र संघीय है। केंद्रीय सूची की सातवींअनुसूची में वर्णित शक्तियां केंद्र और संघीय विधायिका के अधीन आती हैं, जबकि राज्य सूची में वर्णित शक्तियां राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। अनुवर्ती सूची में वर्णित शक्तियां राज्य और राष्ट्र, दोनों के अधिकार क्षेत्र में होती है। जम्मू-कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय सूची को छोटी कर दिया गया है तथा कुछ विशेष अधिकार ही केंद्र ने अपने पास रखे हैं। शेष अधिकार राज्य सूची में डाल दिए हैं। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में अनुवर्ती सूची का भी अस्तित्व नहीं है। यही नहीं केंद्र द्वारा पारित किए गए कानून भी जम्मू-कश्मीर में स्वत: ही लागू नहीं किए जाते। इन्हें लागू कराने के लिए राज्य सरकार की अनुमति की जरूरत पड़ती है। क्या राज्य की समस्याएं हल करने में विधानमंडल की शक्तियों की कमी आड़े आती है? ऐसा नहीं है। अन्य राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर सरकार और विधानमंडल के पास अत्यधिक शक्तियां हैं। भारतीय संविधान का संघीय चरित्र केंद्र के पक्ष में झुका है, किंतु जम्मू-कश्मीर के संबंध में इसका उलटा है। अधिकांश शक्तियां राज्य के पास हैं। क्या इन एकतरफा शक्तियों के कारण देश और देश के बाहर लोगों के एक समूह में अलगाववादी ग्रंथि नहींपनप रही है? जो लोग अनुच्छेद 370 के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने या फिर इसमें और अधिक ढील दिए जाने की वकालत कर रहे हैं, उनकी मंशा राज्य की समस्याओं को दूर करना नहींहै, बल्कि लोगों की भावनाओं को भड़काकर अलग दर्जे के अलगाववाद की नई ग्रंथि विकसित करना है। इतिहास ऐसे लोगों को नहींबख्शेगा। हमें इतिहास के सबक भूलने नहीं चाहिए। अनुच्छेद 370 अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान से संबद्ध है। इस अनुच्छेद के चौतरफा विरोध के जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने संक्रमणकालीन पहलू पर जोर देते हुए कहा था कि यह घिसते-घिसते घिस जाएगा। आने वाली घटनाओं ने जवाहरलाल नेहरू का बयान को झुठला दिया है। ये प्रावधान खत्म नहीं किए गए। अब न केवल इनको स्थायी करने की मांग उठ रही है, बल्कि केंद्र और राज्य के संबंधों को और कमजोर करने की मांग भी उठ रही है। ये सब प्रस्ताव राज्य और राष्ट्र के संबंधों को प्रगाढ़ नहींकरते, बल्कि इसके विपरीत ये इन संबंधों को समग्र रूप में नष्ट कर देते हैं। भेदभाव जम्मू-कश्मीर व अन्य प्रदेशों के बीच ही नहीं, जम्मू-कश्मीर के विभिन्न इलाकों के बीच भी है। जम्मू-कश्मीर में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख प्रमुख इलाके हैं। स्वतंत्रता के बाद से सरकार में जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों की भागीदारी सीमित रही है। कश्मीर घाटी के मुकाबले जम्मू की आबादी अधिक होने के बावजूद राज्य में तैनात 4.5 लाख सरकारी कर्मचारियों में से 3.3 लाख कश्मीर घाटी के हैं। विधानसभा में कश्मीर क्षेत्र से 46 सदस्य और जम्मू क्षेत्र से 37 सदस्य चुने जाते हैं। लद्दाख से चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या कुल चार है। जहां तक विकास कार्यों की बात है, इसमें भी जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के साथ भेदभाव किया जाता है। भेदभाव समाप्त करने के लिए जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के लिए विकेंद्रित शासन पद्धति अपनाई जानी चाहिए। इसका एक विकल्प इन दोनों क्षेत्रों में प्रोविंशियल काउंसिलों का गठन हो सकता है। विकास कार्यों के मद्देनजर इन काउंसिलों के हाथ में वित्त और न्यायिक शक्तियां होनी चाहिए।
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है