Monday, February 2, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय'
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम समुन्नत संस्कृतियों में से एक है। इसकी सुदीर्घ परंपरा में अनेक मनीषी विद्वानों, मंत्र द्रष्टा ऋषियों तथा तत्ववेत्ता मुनियों के जीवनानुभवों के शाश्वत निष्कर्षों की संचित निधि जुड़ी है। इसकी वरेण्यता आप्त ऋषियों ने 'सा संस्कृति विश्ववारा' कहकर रेखांकित की है। इसी संस्कृति के आचरित चरित्र ने सर्व मानवों को प्रशिक्षित कर संस्कारित किया है। प्रमाण में यह श्लोक उध्दृत कर सकते हैं-

एतद्येश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना,
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।

संस्कृति सभ्यता नहीं है। सभ्यता जहां आचरण का बाह्य पक्ष है, वहां संस्कृति जीवन का आंतरिक सौन्दर्य है। जीवन जीने की दृष्टि है। शाश्वत मूल्यों की मंजूषा है। औदात्य की प्रतिष्ठा है। पवित्रता की लेखनी से लिखा जागतिक कर्मों का पावन संविधान है। उच्चासन पर विराजमान सारस्वत मूर्ति संतों का संभाषण है। अभ्युदय का विज्ञान तथा नि:श्रेयस का ज्ञान है। नैर्ष्कम्य का उपनिषद तथा जीवन मुक्ति का आरण्यक है। माधुर्य की भागवत ही नहीं, कर्म की गीता भी है। जीवन का सत ही नहीं, सृष्टि का ऋण भी है। सुख का श्वास ही नहीं, सिध्दि का विन्यास भी है। नवजागरण का शंखनाद ही नहीं, प्रगति एवं समृध्दि का पांचजन्य भी है। अत: गुणात्मक है। सर्व श्रध्देय है। इसके विपरीत सभ्यता सभाओं में बैठने की शिष्टता का मानदंड भर है। सृष्टि व्यवहार का औचित्य है। संस्कृति जहां आध्यात्मिक मूल्य है, वहां सभ्यता विज्ञानात्मक संचेतना है। संस्कृति जहां शाश्वत सत्यों को सहेजे है, वहां सभ्यता यांत्रिक परिणामात्मक उपयोगी सत्यों को सहेजे है। दोनों के वैभिन्य के बीच अंतर्बाह्यता की तथा आध्यात्मिक एवं भौतिकता की अति सूक्ष्म झीनी-सी पारदर्शी पट्टिका है, जिसे सरलता से पृथक करना कठिन है।

जब हम राष्ट्र के आगे सांस्कृतिक शब्द का प्रयोग करते हैं, तब तत्काल हमारा ध्यान, राष्ट्र जनों के उन जीवन-मूल्यों की ओर जाता है जो शाश्वत ही नहीं, राष्ट्र जीवन को अहम् से वयम् की ओर तथा सयम् से ओम तत्सत् की ओर ले जाने वाले हैं। राष्ट्र जीवन को पूर्ण एवं सार्थक बनाने वाले हैं। राष्ट्रजनों की अंतश्चेतना को विकसित एवं सृदृढ़ बनानेवाले हैं। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था जनित निष्ठा ही राष्ट्रजनों को राष्ट्रीय बनाती है। इस तरह राष्ट्रीयता का मूल स्वरूप राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। निश्चित भू भाग तथा निश्चित निष्ठावान जन तो भौतिक उपकरण हैं। संस्कृति ही आध्यात्मिक, गुणात्मक तथा शाश्वत जीवन-मूल्य है, जिनका अनुसरण करती प्रजा उसे राष्ट्र का रूप प्रदान करती है। मातृभूमि के प्रति भक्ति तथा जन के प्रति आत्मीयता का भाव सांस्कृतिक मूल्य हैं। यही तीनों मिलकर राष्ट्र को राष्ट्र बनाती हैं। राष्ट्र किन्हीं संप्रदायों तथा जन-समूहों का समुच्चय न होकर, एक जीवमान इकाई है। ऐसे राष्ट्र पुरूष का सजीव व्यक्तित्व है, जिसमें भूमि, जन एवं संस्कृति की जीवंत एकता का सतत निवास वर्तमान रहता है। दशम मंडल में ऋग्वेद के ऋषि से शिष्य पूछता है कि राष्ट्र पुरूष के जो विविध रूप दिए गए हैं वे कितने प्रकार से व्यकल्पित किए जा सकते हैं? मंत्र है-

यत् पुरूषं व्यवर्धु: कति धा व्यकल्पन्
मुखं किमस्य कौ बाहु का ऊरू पादा उच्यते? 10-8-11
तब ऋग्वेद का ऋषि उत्तार देता है-
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:
उरू तदस्य यद्वैश्य पद्मयां शूद्रो अजायत्। (10-9-92)

अर्थात् राष्ट्र पुरूष का मुख ब्राह्मण, बाहु राजन्य, उरू वैश्य तथा पादशूद्र है। चारों वर्णों के संघात से ही राष्ट्र प्रमुख का निर्माण होता है। इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध ही होगा। कर्म निष्ठा ही चारों के लिए मुक्ति प्रदाता बनती है। इस मंत्र के आशय को इस प्रकार भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि समाज जीवन में चार प्रकार की मनुष्य प्रवृत्तिायां कार्यरत हैं, बुध्दि, सूक्ति, अर्थ तथा श्रम शक्ति। बुध्दि ज्ञान का पथ प्रशस्त करती है। शक्ति सीमाओं की रक्षा करती है आंतरिक अराजकता का शमन करती है। अर्थ औद्यौगिक एवं व्यापारिक विकास का हेतु है तथा श्रम विकास की योजनाओं की सम्पूर्ति का एकमेव साधन है।

स्वीकृत सांस्कृतिक जीवन दृष्टि ही एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से पृथक करती है। प्रत्येक राष्ट्र उसकी स्वीकृत जीवन दृष्टि से ही पहिचाना जाता है। पृथकता की यह स्वीकृति तथा इसका सैध्दांतिक पक्ष ही राष्ट्रवाद को जन्म देता है। कोई भी विचार तभी वाद का रूप लेता है जब उसके आचरण कर्ता उस विचार को जीवन का एक अंग बना लेते हैं। राष्ट्र को सामने रखकर जब कोई सिध्दांत या चिंतन निरूपित होता है, तब वह विचार राष्ट्रवाद के नाम से अभिहित किया जाता है। राष्ट्रवादी हर कार्य को राष्ट्र की तात्कालिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित एवं व्यवहारित करता है। फिर चाहे वह प्रश्न राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा का हो या जन के मौलिक अधिकारों की संरक्षा का या संस्कृति की गरिमापूर्ण मर्यादा को सुरक्षित रखने का। राष्ट्रवादी पहले अपने राष्ट्र का हित देखता है। उसके पश्चात् ही नीति निर्धारित करता है तथा आवश्यक संरक्षात्मक कदम उठाता है।

यहां यह प्रश्न उपस्थित हो आना स्वाभाविक है। जब राष्ट्र की परिभाषा में संस्कृति शब्द समाहित है तब राष्ट्रवाद के आगे अतिरिक्त सांस्कृतिक शब्द लगाने की क्यों आवश्यकता पड़ी। सच में यह एक गंभीर प्रश्न है तथा गहराई से विवेचन की अपेक्षा रखता है। संस्कृत शब्द में 'ठक्' प्रत्यय लगकर 'कितिच' सूत्रानुसार सांस्कृतिक शब्द बनता है। इसे हम संस्कृति का भाववाचीकरण कह सकते हैं। सांस्कृतिक शब्द अपनी परिधि की व्यापकता में संस्कृति के सभी उपादानों एवं उपकरणों को समेटे होता है। हम जानते हैं संस्कृति शब्द 'कृ' धातु से 'सम' उपसर्ग पूर्वक 'सुट्' आगम करके 'क्तिन' प्रत्यय के योग से निष्पन्न है। 'सम' उपसर्ग जहां भी जुड़ता है वह वहां संस्कारित अथवा सुन्दरीकृत का अर्थ देता है। 'सम' के सभी अर्थ पश्चात्वर्ती शब्द को विशेषित करते हैं। विद्वान उसके दो ही अर्थ मुख्य रूप से ग्रहण करते हैं। एक तो संस्कारित सम्यक कृति और दूसरा संभूय कृति के रूप में। संघश: कृति सम्भूय कृति कहलाती है। इस तरह संस्कृति संस्कार युक्त सम्भूय कृति है। संस्कार, सामाजिक विद्रूपताओं के साथ मनीषियों के बौध्दिक संघर्ष का सुपरिणाम है। मनुष्य उन पर विजय के पश्चात जिन तात्विक एवं सात्विक निष्कर्षों पर पहुंचता है, वे निष्कर्ष ही शनै:-शनै: संस्कृति बनते चलते हैं। मानवीय जीवन मूल्य बन जाते हैं। कह सकते हैं मानव के जीवनानुभवों का नवनीत ही संस्कृति है। समाज से संघर्ष का क्रम निरंतर बना ही रहता है। इस कारण संस्कृति में नैरंतर्य बना रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित रहेगा कि संस्कृति की स्वीकृत जीवन-दृष्टि में कहीं कोई बदलाव नहीं आता। ऐसे निष्कर्ष संस्कृति के आचरण पक्ष के उपादानों एवं उपकरणों में अभिवृध्दि ही करते हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सांसकृतिक परंपरा के शाश्वत मूल्यों से जब तक जुड़ा चलता है, तब तक वह जीवंत एवं समुन्नत बना रहता है। स्खलन उसकी गरिमा तथा प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाता है। मर्यादाओं को नष्ट ही नहीं करता, उपेक्षा तथा तिरस्कार का भाव जगा, परिणामगत दुर्बलताओं को स्वीकारने में भी संकोच नहीं करता। हम जानते हैं सांस्कृतिक स्खलन के कारण ही विश्व के अनेक राष्ट्र मिट गये। इकबाल ने कहा भी है-

यूनान मिश्र रोमां सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाकी नामोनिशा हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।

यह जो 'कुछ बात है' यह हमारी सांस्कृतिक निष्ठा ही है। अपनी सनातन संस्कृति के साथ अटूट जुड़ाव ही है। इसी से अनेकों झंझावातों के बीच भारत-तरणी विपत्तिा समुद्र को पार करने में सक्षम एवं समर्थ सिध्द हुई है। इसकी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय जीवन का अपनी मूल्यवान आध्यात्मिक संस्कृति को जड़ से दृढ़ता से पकड़े रहना ही है। इसी सत्य को बार-बार उजागर करने के हेतु से मनीषियों को राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जोड़ने की आवश्यकता अनुभव हुई है। एक और भी कारण हो सकता है। जब राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जुड़ जाता है तब वह सोच का एकमेव सांस्कृतिक अधिष्ठान भी निर्धारित कर देता है। तब मनीषि, जीवन के समस्त व्यवहारों में संस्कृति को सामने रखकर ही नीति निर्धारित नही ंकरते, आचरण तक भी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही तय करते हैं। तब लक्ष्य का ही नहीं, साधनों की पवित्रता का भाव भी सामने रहता है। इसी कारण तो महाभारत में धर्मराज का यह कथन 'अश्वत्थामा हतौ नरो वा कुंजरौ' कभी अभिशंसित नहीं हुआ। यह किसी अपवाद को सहन नहीं करता। तीसरा कारण यह भी हो सकता है राष्ट्र के उपादान तत्व भू और जन के साथ संस्कृति अपनी पृथक सत्ताा के साथ अलग विचार की अपेक्षा रखती है। जब सांस्कृतिक शब्द राष्ट्रवाद के आगे जुड़ जाता है तब किसी अवमूल्यन, किसी गिरावट अथवा किसी अपवाद के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहता। तब राष्ट्र हित चिंतन की एकमात्र कसौटी सांस्कृतिक बोध ही रह जाती है। राष्ट्रवाद की अवधारणा का एक मात्र निकष सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अवस्थित विचार ही रह जाता है। इस तरह यह जोड़ निरर्थक नहीं सार्थक ही कहा जाएगा। इसका परिणामात्मक लाभ भी राष्ट्र को मिला है। इसी बल पर आज भारत विपत्तियों की भारी चट्टानों के बोझ को शीश से उतार फेंकने में, पराधीनता की बेड़ियों को काटने में, धर्मांधता की आंधी को रोकने में तथा मतांतरण के षडयंत्रों को उध्वस्त करने में पूरी तरह सफल हो, विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आने का व्यग्र खड़ा है।

इसी संदर्भ में एक और प्रश्न अंतर्राष्ट्रीयतावादियों ने उठा, राष्ट्रवाद के आगे प्रश्नवाचक लगाने का दुस्साहस किया है। अंतर्राष्ट्रीयतावादी तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी राष्ट्रवाद का नाम सुनते ही नाक भौंह सिकोड़ते हुए कानों में अंगुलियां नहीं, शीशा डाल लेते हैं। मानों राष्ट्रवाद का शब्द प्रयोग, कोई एक बड़ा अपराध हो। ऐसा सोचने वाले स्वयं वर्गवादी हैं। 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' यह कहने वाले स्वयं द्वैतवादी हैं। जो श्रमिक नहीं हैं उन्हें वे शोषक की संज्ञा देते हुए शत्रुवत मान, उनके विनाश तक की भयंकर कामना लिए होते हैं। समाज तक से उनका बहिष्कार तथा तिरस्कार का भाव लिए होते हैं। जबकि राष्ट्रवादी सोच वाला मानव मात्र के हित को अपने राष्ट्र हित से पृथक नहीं मानता। वे भूल जाते हैं, राष्ट्रवादी भारत के मंत्र द्रष्टा ऋषियों ने ही गाया है 'माता भूमि पुत्रोहम् पृथिव्या:। इन्होंने ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' जैसे विश्वात्मक वैश्विक मंत्र दिए हैं। इन मंत्रों की पृष्ठभूमि में वही भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा कार्यरत है जिसका अधिष्ठान अध्यात्म है। सारी सृष्टि एक ही चेतन सत्ताा का विस्तार है। कहीं कोई भेद नहीं है। कोई द्वैत नहीं है। यह अभेदात्मक अद्वैत दृष्टि ही उपर्युक्त वैश्विक सोच की नींव में है। दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने वाले रूस और चीन आज भी अलग-अलग राष्ट्र हैं। ये बहुत समय तक सीमा संघर्ष में उलझे भी रहे हैं। इनने अपनी प्रादेशिकता का त्याग कब किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को ही लें। यह राष्ट्रों का संघ है। राष्ट्रों की सापेक्षता स्वीकार कर चला है। अपने को अंतर्राष्ट्रीय कहने वाले भूल जाते हैं कि इस शब्द प्रयोग में ही राष्ट्रों की उपस्थिति अनिवार्य है। सारा विश्व राष्ट्रों में बंटा है। हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति है। हर राष्ट्र की अपनी भाषा है। जिन राष्ट्रों ने परकीय भाषा एवं संस्कृति अपना रखी है, वे पूर्व में उस राष्ट्र के प्रमुख में पराधीन रह चुके हैं वे राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होकर भी सांस्कृतिक एवं भाषाई दृष्टि से आज भी पराधीन ही हैं। जिन राष्ट्रों की अपनी भाषा संस्कृति नहीं होती निश्चय ही वे राष्ट्र कहलाने के योग्य पात्र नहीं है।

कई राष्ट्रों की संस्कृति को संप्रदायों ने संकुचित कर कट्टरतावादी रूप दे दिया है। कट्टरता ने गर्हित हिंसा तक के सामने अपना घृणित एवं गर्हित चेहरा उजागर कर दिया है। इससे उनका घृणा भरा आत्मघाती रूप सामने आया है। इससे मानवता का उदारचरित प्रभावित हुआ है। आज सांप्रदायिक कट्टरता ने आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर, जन जीवन को भयाक्रांत कर दिया है। सांप्रदायिकता तब और भयावह हो जाती है जब वह अपने चिंतन को ही अंतिम मान कर चलती है। तब वह दूसरों के प्रति कहर ढाने लगती है। विष विमन करती हुई दूसरे राष्ट्रों को खंडित तक करने को तुल जाती है। आज इस सांप्रदायिक कट्टरता की आग से विश्व का कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं बचा है। सांप्रदायिक कट्टरता धर्म के उदार चरित्र को भूल आज रक्त से सड़कें रंगने में लगी है। यह संस्कृति नहीं, विकृति है अपकृति है। भारत के ऋषियों ने इस कट्टरता का विरोध करते हुए यही कहा है-

अयं निज: परोवेति गणना लघु चेहसाम्
उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।

उपर्युक्त श्लोक के संदर्भित परिप्रेक्ष्य में तो राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द प्रयोग और भी आवश्यक हो जाता है। यह शब्द प्रयोग राष्ट्रवाद के विरूध्द उद्धोषित लघु चेतस घोषणाओं को जड़ से निर्मूल कर, चिंतन को उदार सहिष्णु मान-संपदा से परिपुष्ट कर देता है। प्रकाश का नंदादीप बन मानवता का पथ प्रशस्त करता है। तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवता का पर्याय, औदात्य का कल्पतरू तथा सर्व हित की चिंतामणि बन जाता है।

भारतीय साहित्य के अवलोकन से हमें इस सत्य के दर्शन होते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही सदा सर्वदा साहित्य का आदर्श रहा है। क्या संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य, पाली साहित्य, अपभ्रंश साहित्य और क्या लोकभाषा साहित्य, सभी ने संस्कृति और राष्ट्रीयता को ही अपना कथ्य बनाया है। प्रगतिवाद जनवाद के नाम से जो अभारतीय चिंतन भारतीय साहित्य में साम्य का नारा लेकर अनुप्रविष्ट हुआ, ऐसे समाज ने कुछ काल के भ्रम के बाद ही नकार दिया। समाज को वह नग्न यथार्थ कहे, या भोगा हुआ यथार्थ कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से किया जाता यह सीधा आक्रमण भारतीय समाज को भी गले नहीं उतरा। उस साहित्य के लेखकों को पाठकों की खोज के उपाय अपनी बैठकों में सोचने पड़ रहे हैं। इसी तरह से भारतीय समाज ने अस्तित्ववादी, क्षणवादी आधे-अधूरे पाश्चात्य दर्शन को भी कभी स्वीकार नहीं किया है। भले ही इन्होंने प्रयोगवाद, नई कविता आदि के नाम लेकर कितने ही बड़े नाटक क्यों न हों। इनके समकालीन प्रयास समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।

इसका कारण भी है। साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है। संस्कृति साहित्य में लिपटी रहती है। कभी कथानक के रूप में, तो कभी शिल्प के रूप में। वही साहित्य श्रेष्ठता अर्जित करता है जो संस्कृति को अधिकाधिक आत्मसात् किये होते हैं। संस्कृति विहीन साहित्य की कल्पना शशक श्रृंगवत है। संस्कृति भी वही जीवित रहती है जिसका विपुल परिमाण में साहित्य उपलब्ध होता है। जिस संस्कृति का साहित्य नहीं होता, वह संस्कृति कालांतर में अकाल काल कवलित हो जाती है।

मानवता को उजागर करनेवाला साहित्य ही है। साहित्य मनुष्य और समाज की मनोभावनाओं को शब्द के स्तर पर प्रभासित करता हुआ, मानवीय आदर्श की प्रतिष्ठापना करता है। साहित्य के शब्द-शब्द में भावोद्रेक की अप्रतिम शक्ति होती है। यह व्यक्ति को उसकी वास्तविक स्थिति से परिचित करा, उन उदात्ता विश्वासों से जोड़ता है जो उसे महामानव बनाते हैं। सामाजिक धरातल पर मानव का यह उदात्ता की ओर आरोहण है। व्यक्ति के धरातल पर जीवन प्रवृत्तियों का उन्नयत भी साहित्य ही करता है। साहित्य मानवीय संवेदना जगा, मानव संबंधों में सघनता उपजाता है। यह मनुष्य के भीतर चल रहे आंतरिक संघर्ष को तीव्र कर स्वस्थ एवं सही पथ पर अग्रसर करता है। साहित्य की परिधि में जहां सामाजिक संबंधों का नैकटय आता है वहीं सांस्कृतिक परंपरा की पहचान को नवीनतम रूपों से ग्रहण करने की प्रेरणा भी आती है।

साहित्य सृजन इस तरह एक सांस्कृतिक कर्म है। यह संस्कृति को अक्षुण्ण रखता है। संस्कृति साहित्य को अनुप्राणित करती है। साहित्य की जीवनीशक्ति के मूल में उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा ही होती है। साहित्य, संस्कृति का संवाहक होकर भी सदैव संस्कृत्योन्मुख रहता है। संस्कृति विमुख साहित्य की स्थिति उस रोगी की तरह होती है जिसे मृत्यु-मुख में जाने से कोई उपचार नहीं रोक पाता। जब भी साहित्य संस्कृति विमुख हुआ है, वह या तो दिग्भ्रम की स्थिति जीने लगता है अथवा मृत्यु का ग्रास बना है।

संस्कृति की प्रभविष्णुता अति सूक्ष्म किंतु अति तीव्र होती है। ऐसे समय में वह साहित्य को ही नहीं समय को भी नियंत्रित करती है। संस्कृति की यह प्रभविष्णुता कभी प्रत्यक्ष दिखती है तो कभी नहीं। प्रत्यक्षता की स्थिति में इसे सांस्कृतिक शक्तियां बलशाली हुई समय-रथ की वल्गा थामें दिखाई देती है। आज समय साहित्य के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा है। ऐसी स्थिति में तो साहित्य को समय से आगे निकलने का सामर्थ्य अर्जित करना ही चाहिए। इस हेतु उसे अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अंगद चरण जमा खड़ा होना है। तभी वह प्रतिगामी शक्तियों के चेहरों पर चढ़े मुखौटों को हटाने की शक्ति स्वयं में जगा सकेगा। इन दिनों प्रतिभागी शक्तियों ने विश्व-अराजकता के कर्णणारों के साथ दुरभि संधि कर रखी है। ऐसे प्रयासों को कुंठित कर विश्वमंच पर साहित्य को सत्यं शिवं सुंदरम् से अभिमंडित अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक छवि उपस्थित करनी है। इस सांस्कृतिक समर में भारत को साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी ध्येय े रूप में अंगीकार कर आलोक की नवीनतम दीपशिखा के साथ विश्वमंच पर खड़ा होना है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपनाव आज राजनीति के लिए जितना आवश्यक है उससे कम साहित्य के लिए नहीं है। साहित्य का इतिहास अथ से आज तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही इतिहास है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ध्येय वाक्य के रूप में जब तक अंगीकार नहीं करेंगे, भारत वैभव के उन्नतम शिखरों का स्पर्श कदापि नहीं कर सकेगा। कालजयी साहित्य नहीं लिखा जा सकेगा। वर्तमान के संकटापन्न इस काल में यदि प्रतिगामी शक्जियों को दुर्बल समझ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दुर्लक्ष्य किया तो निश्चय ही यह स्थिति भारत को महंगी पड़ सकती है। इसलिए राजनीति और साहित्य दोनों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को दृष्टि-पथ में रख, औपनिषदिक मंत्र 'चरैवेति चरैवेति' का घोष गुंजाते हुए त्वर गति से आगे बढ़, भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है।
(लेखक सुप्रसिध्द साहित्यकार हैं।)

Friday, January 30, 2009

साहित्य और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


प्रो. चमनलाल गुप्त
हिंदी साहित्य चिंतन की परंपरा भारतीय चिंतन परंपरा का ही अंश है जो अत्यधिक समृध्द और प्राचीन है। भारत जैसी अविच्छिन्न साहित्यिक परंपरा कम ही राष्ट्रों के पास है। भारत के सांस्कृतिक प्रवाह से निरंतर पुष्ट होती हुई साहित्यधारा कभी विरल तो कभी विशाल नदी का रूप धारण कर भारतीय जनमानस को आप्लावित करती रही है। भारतीय संस्कृति प्राचीन, निरंतर प्रवाहशील, नित-नवीन और फिर भी सनातन रूप से विद्यमान रहनेवाली अद्भुत संस्कृति है। इस संस्कृति का बाह्य रूप स्थान समय और युगीन संदर्भों में बदलता रहा है, अपने को युगानुकूल एवं ग्राह्य बनाता रहा है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह ऊपर से बदलता रहा परंतु भीतर से वह शांत सुस्थिर रहा, अपने स्वरूप को बनाए रहा।
साहित्य और संस्कृति के विकास की दिशा और खोज का विषय एक ही है। साहित्य एक स्तर पर मनुष्य के ऐन्द्रिय बोध को संस्कारित एवं परिष्कृत करता है। उसे शब्द के भीतर छुपे सूक्ष्म भाव और अर्थ से ही परिचित नहीं करवाता, उसकी नाद शक्ति से आंदोलित भी करता है। साहित्य, भाषापरक अभिव्यक्ति है परंतु वह भाषेतर सूक्ष्म भावों और विचारों को व्यंजित करता है। संस्कृत साहित्य के महान विद्वान प्रोफेसर सिलवां लेवी ने भारत वर्ष की संपूर्ण चिंतन धारा को एक शब्द में समेटते हुए कहा है कि संपूर्ण साहित्य साधना का लक्ष्य है 'रस' की प्राप्ति। 'रस' जो शब्द और अर्थ के 'साहित्य' अर्थात् साथ-साथ रहने के भाव से जुड़ा है परंतु जिसे कहा नहीं जा सकता, अनुमित नहीं किया जा सकता, जो लक्षित भी नहीं होता बल्कि व्यंग्य होता है और समान हृदय वाले, अनुभवी सहृदय द्वारा ही ग्रहीत होता है। धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में जिसे सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म कहा गया उसे ही साहित्य में रस कहकर उसकी प्रकृति 'ब्रह्मानंद सहोदर' स्वीकार की गई। मैक्समूलर ने भारतीय अध्यात्म साधना का लक्ष्य सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति मानते हुए उसे सांसारिकता से परे अतीत अथवा वियाण्ड (Beyond) की खोज माना है। साहित्य और संस्कृति दोनों ही मनुष्य को जड़ से मुक्त कर चेतन की ओर ले जाते हैं, उसकी सुप्त चेतना को जागृत कर परम तत्व की ओर अग्रसर करते हैं। साहित्य और संस्कृति मनुष्य को बेहतर मनुष्य और बेहतर मनुष्य को देवत्व प्रदान करने का साधन है।

साहित्य और संस्कृति दोनों का संबंध किसी एक समाज से रहता है जो किसी भूखंड विशेष पर स्थिर रहता है। देश, देश में रहने वाले जन और उस जन के सामाजिक, आर्थिक जीवन से संस्कृति का स्वरूप निर्मित होता है। देश एक भौगोलिक इकाई है जिसका निर्माण प्राकृतिक तत्वों से होता है। पर्वत, नदियां, मरुस्थल अथवा घने वन आदि इसके निर्णायक होते हैं। राज्य एक प्रशासनिक इकाई है। एक देश में अनेक राज्यों का निर्माण्ा हो सकता है, होता है। देश के लिए भौगोलिक एकता और राज्य के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक एकता अनिवार्य तत्व है। राष्ट्र इन दोनों की अपेक्षा अधिक व्यापक और सूक्ष्म इकाई है जिसका आधार सांस्कृतिक अथवा भू-सांस्कृतिक हुआ करता है। किसी विशेष भूखंड पर रहने वाले लोग अपने लौकिक और परलौकिक सुख और समृध्दि के लिए, जीवन यापन और मुक्ति साधना के लिए जो जीवन पध्दति, मूल्य चेतना, सौंदर्य बोध और चिंतन-मनन की प्रणालियां विकसित करते हैं वे ही उसकी संस्कृति के वाहक और परिचायक कहे जा सकते हैं। देश एक स्थूल एवं दृश्य इकाई है, राज्य एक प्रशासनिक परिकल्पना है, परंतु फिर भी उसकी निश्चित सीमाएं रहती हैं। राज्य, देश की अपेक्षा सूक्ष्म इकाई है। राष्ट्र, देश और राज्य की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म एवं भावात्मक इकाई है। जिसका आधार मूलत: जन की सौंदर्य बोधात्म, भावात्म एवं वैचारिक एकता है जिसे संक्षेप में सांस्कृतिक एकता कह सकते हैं।

आज भी सुनने को मिल जाता है कि भारत राष्ट्र का निर्माण 1947 में हुआ था फिर हम राष्ट्र नहीं हैं बल्कि राष्ट्र बनने जा रहे हैं। (we are a nation in the making) यदि हम आजादी से पहले राष्ट्र नहीं थे तो क्या थे?

पश्चिम में राष्ट्र राज्य की कल्पना की गई और राजनीतिक इकाई राज्य को ही राष्ट्र का पर्याय मान लिया गया। 'संयुक्त राष्ट्र संघ' मूलत: 'संयुक्त राज्य संघ' है जिसमें संप्रभुता संपन्न अथवा स्वायत्ताशासी राज्य, सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। एक सोवियत रूस, राष्ट्र के रूप में उसका सदस्य था। सोवियत रूस के अनेक टुकड़े होकर स्वतंत्र राज्य बन गए और आज उनमें से अधिकतर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बनकर राष्ट्र कहलाते हैं। इंडोनेशिया से तैमूर टूट कर नया राष्ट्र बन गया है। राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं हो सकता। भारत सदा से ही राजनीतिक रूप से बंटा रहा परंतु सांस्कृतिक दृष्टि से इसमें एकता रही है। सांस्कृतिक एकता ही युगों से हमारी एकता का आधार रही है। भारत एक राजनीतिक इकाई के रूप में मनु, रघु, राम, युधिष्ठिर, अशोक अथवा विक्रमादित्य जैसे कुछ एक चक्रवर्ती शासकों के काल में भले ही एक रहा हो परंतु अधिकांश समय अनेक गणों, राज्यों अथवा सियासतों में बंटा रहा जो आपस में प्राय: लड़ते-भिड़ते भी रहते थे। इस देश का साधारण जन सदा ही राजनीतिक सीमाओं के पार सोचता था क्योंकि उसके लिए संस्कृति ही राष्ट्र का आधार थी। किसी भी पुण्य कार्य के लिए शुध्द जल की प्राप्ति देश की सातों प्रमुख नदियों के जल को मिलाकर ही होती थी और वह गाता था -

'गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेस्मिन सन्निधिं कुरू'॥

इसी प्रकार सात मोक्षदायक पुरियां, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बावन शक्ति पीठ, चारधाम, चार महाकुंभ क्षेत्र, रामायण, महाभारत, श्रीमदभगवत जैसे ग्रंथ आदि हमारी एकता के मूलाधार थे। भारत की एकता और अखंडता का आधार सांस्कृतिक एकता रही है इसलिए यह स्वाभाविक है कि भारतीय राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाए। हिंदुओं के लिए चारों धामों की यात्रा अर्थात् भारत भूमि की भारत माता की परिक्रमा पुण्यदायी और मोक्ष देने वाली मानी गई। यही हमारी राष्ट्रभक्ति है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोध छद्म धर्म निपरेक्षवादी और भौतिकवादी-साम्यवादी अपने-अपने कारणों अथवा स्वार्थों से करते हैं। भारत के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संस्कृति निरंतर विकसनशील, बहुलवादी, उदार, विभिन्न मतों, पंथों, धर्मों, पूजा-पध्दतियों, जीवन-शैलियों, विचारधाराओं और आस्थाओं और विश्वासों को अपने में समेट कर चलने में समर्थ रही है। ऋग्वेद में कहा गया 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात् परमसत्ता एक ही है जिसे विद्वान विभिन्न नामों से पुकारते हैं। यही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो विभिन्न धर्मों को एक ही सत्य तक पहुंचने का मार्ग घोषित करती रही है। इसी संस्कृति में कहा गया 'अपनी भिन्न-भिन्न रूचि के अनुसार सीधे या टेढ़े मार्ग पर श्रध्दापूर्वक चले हुए सभी साधक, हे प्रभु, तुम तक उसी प्रकार पहुंचेंगे, जिस प्रकार उत्तार, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम किसी भी दिशा की ओर बहने वाली नदियां समुद्र तक पहुंच जाती हैं।' (शिवमहिम्नस्तोत्र) संत विनोबा भावे ने इसीलिए भारतीय संस्कृति को 'भी वाद' कहा था क्योंकि इसमें अपने मत के साथ दूसरों के मतों को भी स्वीकृति है। सभी धर्म और संस्कृतियां उनकी नजर में 'ही वाद' से ग्रस्त हैं अर्थात् वे अपने मार्ग के सिवा अन्य सभी मार्गों को व्यर्थ और गलत मानती हैं। जब कुछ धर्मनिरपेक्षवादी भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकास से अन्य पंथों, धर्मों अथवा संस्कृतियों के विनाश की आशंका जताते हैं तो वे भूल जाते हैं कि भारतीय संस्कृति के साथ-साथ इन सबका अस्तित्व इसी धरती पर सदियों से बना रहा है, बना रहेगा। भारतीय संस्कृति सहिष्णु भी है और गुणों को स्वीकारने वाली सारग्राही भी यही इसकी दीर्घजीविता का रहस्य भी है। साम्यवादी विचारक अपने भौतिकवादी दुराग्रहों के कारण संस्कृति के आदर्शपरक, आध्यात्मिक मूल्यों को अस्वीकार करते हुए भारतीय सांस्कृतिक चेतना को संकीर्ण सांप्रदायिक कहकर नकार देते हैं। भारत को वे राष्ट्र ही नहीं मानते। उनकी दृष्टि में संस्कृति सामाजिक-आर्थिक मूल से उपजी बाह्य रचना है जिसका जीवन मूलभूत भौतिक ढांचे अर्थात् उत्पादन के साधन और उत्पादन के संबंधों पर निर्भर करता है। भारतीय धर्म साधना उनके लिए आदिम युग की अज्ञता है और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का आध्यात्मिक अंश उन्हें निरर्थक प्रतीत होता है। जिस समाजवादी, भौतिकवादी संस्कृति पर वे गर्व करते थे उसके खंडहर पूरे पूर्वी युरोप और टूटे-बिखरे सोवियत गणराज्य में वे देख कर भी नहीं देख पा रहे। उनकी शुध्द भौतिकतावादी तथा कथित विज्ञान परक संस्कृति दो सौ वर्ष में ही भरभरा कर गिर पड़ी जबकि भारतीय संस्कृति सदियों से अपने स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए और अपने बाहरी रूप को समय, स्थान और परिस्थिति के अनुरूप बदलते हुए आगे बढ़ती रही है। परम तत्व की खोज और उस सच्चिदानंद स्वरूप तक पहुंचने की ललक भारतीय संस्कृति के ऐन्द्रिय बोध को सूक्ष्म सौंदर्यबोध में बदलती रही, भावबोध को उदार विश्व-बंधुत्व का गीत सुनाती रही और बौध्दिक चिंतन-मनन को षडदर्शन और ज्ञान-विज्ञान की ऊंचाइयों से भी आगे ब्रह्मांड की सूक्ष्म एकता में बांधती रही। भारतीय धर्म-साधना मानववाद की साधना है जो मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाकर परम तत्व तक पहुंचाने का साधन बनती है, भारतीय सांस्कृतिक चिंतन, मनुष्य मात्र के उत्थान का चिंतन है। इसमें सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान हो ही नहीं सकता। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का विरोधी एक तीसरा वर्ग भी है जो पश्चिम की चिंतन परंपरा से अभिभूत है। पश्चिमी राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र-राज्य' की परिकल्पना फलीभूत हुई इसलिए राष्ट्र एक राजनीतिक इकाई ही माना गया। हिटलर, मुसोलिनी जैसे राष्ट्रवादी नायकों के उभरने से राजनीतिक राष्ट्रवाद का विस्तारवादी, फासीवादी चेहरा सामने आया। पश्चिम में राष्ट्रवाद युध्द और हिंसा के साथ-साथ कट्टरवाद का पर्याय बन गया। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' में ये लोग सांस्कृतिक कट्टरवाद अथवा आधिपत्य जमाने की लालसा देखते हैं और इसका विरोध करते हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना जिन उदार मानवीय और सार्वभौम तत्वों से निर्मित हुई है उसमें सार्वभौमिक आकर्षण मौजूद है परंतु भारतीय संस्कृति का अतीत साक्षी है कि इसका प्रचार कही भी, कभी भी आग और तलवार के बल पर नहीं किया गया।

भारतीय साहित्य अपने सांस्कृतिक मूलाधार का ऋणी रहा है। 'हिंदी साहित्य की भूमिका' पुस्तक में पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य पर प्राचीन संस्कृत साहित्य के प्रभाव को रेखांकित करते हुए महाभारत और रामायण को असंख्य महाकाव्यों, उपन्यासों, नाटकों, कहानियों का प्रेरक सिध्द किया है। रामायण और महाभारत तो निश्चय ही संपूर्ण भरतीय वांगमय के उपजीव्य ग्रंथ रहे हैं। बौध्द, जैन साहित्य जो पालि, प्राकृत, अपभ्रंश अथवा अन्य देशज् भाषाओं में रचा गया हमारी सांस्कृतिक चेतना का अंग है। हम जाने अनजाने में बुध्द के मध्यम मार्ग के अनुयायी हैं और उसकी करुणा हमारे रक्त में प्रवाहित है। जैनों की अहिंसा संस्कार बन हमारे जीवन को पोषित करती है। साहित्य में जैन और बौध्द साहित्य विद्रोह और विरोध का साहित्य है, परंतु उसे भी भारतीय संस्कृति ने आदर पूर्वक स्वीकार किया है। भगवान बुध्द और वृषभ हमारे यहां विष्णु के अवतार स्वीकार कर लिए गए। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की विशिष्टता यही है कि भारतीय संस्कृति ने यहां पर विजेता बनकर आई जातियों को भी आत्मसात कर लिया और उनकी संस्कृति के सकारात्मक, जीवंत तत्वों को अपने में समेट लिया।

भारत में इस्लाम का प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे पूर्व जो आक्रांता आए वे इतने संगठित और सुसंस्कृत न थे कि भारत की समृध्द परंपराओं को चुनौती दे सकते। इस्लाम नवीन चिंतन और समाज-दृष्टि से संपन्न सांस्कृतिक दृष्टि लेकर आया। इस्लाम के आने पर भारतीय संस्कृति को एक नए प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ा। हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'संक्षेप में चुनौती का स्वरूप सामाजिक अधिक था, धार्मिक और दार्शनिक कम।' कई कारणों से भारतीय संस्कृति में पतनशीलता आ चुकी थी और उसकी पाचन शक्ति क्षीण हो चुकी थी। पहले धक्के से एक बार लड़खड़ाने के पश्चात फिर एकाएक भक्ति आंदोलन के रूप में भारतीय संस्कृति के प्रवाह ने इस्लामी संस्कृति को भीतर तक भिगो दिया और अपनी भीतरी गंदगी को उठा कर तटों पर फेंक दिया। इस साहित्यिक सांस्कृतिक आंदोलन में से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुन: स्थापित हुआ। इस महान सांस्कृतिक क्रांति में संपूर्ण भारतवर्ष ने भाग लिया। शिवकुमार मिश्र के शब्दों में -

'इस आंदोलन में पहली बार राष्ट्र के एक विशेष भूभाग के निवासी तथा कोटि-कोटि साधारण जन ही शिरकत नहीं करते, समग्र राष्ट्र की शिराओं में इस आंदोलन की ऊर्जा स्पंदित होती है, एक ऐसा जबर्दस्त ज्वार उफनाता है कि उत्तार, दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सब मिलकर एक हो जाते हैं और सब एक दूसरे को प्रेरणा देते हैं, एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं और मिलजुलकर भक्ति के एक ऐसे विराट नद की सृष्टि करते हैं उसे प्रवाहमान बनाते हैं, जिसमें अवगाहन कर राष्ट्र के कोटि-कोटि जनसाधारण जन सदियों से तप्त अपनी छाती शीतल करते हैं, अपनी आध्यात्मिक तृषा बुझाते हैं, एक नया आत्मविश्वास, जिंदा रहने की, आत्मसम्मान के साथ जिंदा रहने की, एक शक्ति पाते हैं।' भक्ति काव्य भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूर्तरूप था। हिंदी साहत्य ने इससे कबीर का सिंहनाद प्राप्त किया जिसने निर्गुण साधना और समतावादी जीवनदृष्टि को अपने काव्य में स्थापित किया। तुलसी का रामचरित मानस आदर्श राम राज्य की परिकल्पना लेकर आया। तुलसी ने क्रूर मुस्लिम राज को राक्षस राज के मिथक में बदल दिया। सूर की रागात्मक आशावादी दृष्टि जीवन में प्यार जगाने लगी और जायसी ने पद्मावत के माध्यम से भारतीय संस्कृति की गरिमा को स्वीकार किया। यह अद्भुत तथ्य है कि भयंकर संघर्षों के बीच रचा गया भक्ति साहित्य पूरी तरह असांप्रदायिक या धर्म निरपेक्ष है। यह भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का प्रभाव है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विस्फोट पुन: पुनर्जागरण काल में देखा जा सकता है। राजा राममोहन राय जिस औपनिषदिक ज्ञान को लेकर समाज सेवा की ओर अग्रसर हुए वह शुध्द भारतीय था। स्वामी विवेकानंद ने जिस वेदांत और अद्वैतवाद के आगे पश्चिम को झुकने के लिए विवश किया वह शुध्द भारतीय-सांस्कृतिक चिंतन था। विवेकानंद 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के प्रखरतम विचारक और अजेय योध्दा थे। उनकी धर्म साधना, उनका प्रचार, उनकी दार्शनिकता, उनकी तपस्या, उनके जीवन के सारे क्रिया-कलाप जिस स्रोत से जीवन शक्ति पाते थे वह था राष्ट्रवाद। भारत में रहकर भारतीय शिष्यों के बीच उन्होंने अपने समाज की कमियों को रेखांकित किया, रूढियों पर प्रहार किया, विवशताओं पर आंसू बहाए परंतु पश्चिम में खड़े होकर उन्होंने भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता का सिंहनाद किया और भारत को धर्म-आध्यात्म के क्षेत्र में विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया। कभी भूलकर भी भारत की बुराई विदेश में नहीं की और ऐसा करने वालों को मुहतोड़ जवाब दिया। यह कार्य किसी विरक्त संन्यासी का नहीं, कर्मठ देशभिमानी योध्दा का था जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मजबूत धरती पर स्वतंत्र भारत की नींव रखना चाहता था। महर्षि अरविन्द हो या स्वामी दयानन्द या फिर शरच्चंद्र जैसा साहित्यकार सभी राष्ट्रवाद से प्रेरित थे। भारत का संपूर्ण स्वाधीनता संग्राम अमर बलिदानियों का सुलगता हुआ इतिहास और अहिंसावादियों की आंसुओं में डूबी कहानियां सभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रत्यक्ष रूप है। भारत माता का चित्र, वंदेमातरम् का नारा और तिरंगे की आन के लिए प्राणोत्सर्ग, राष्ट्रीयता के परिचायक हैं। संपूर्ण भारतीय साहित्य में असंख्य साहित्यकारों ने अनेकानेक भाषाओं में भारतीय संस्कृति का यशोगान किया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुनर्जागरण अथवा नवजागरण के युग का सत्य था, स्वाधीनता संग्राम का सत्य था इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य पराजित हुआ, हमें आजादी मिली।

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात,् स्वाधीन भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान संवारने की जगह भुलाने की कोशिश की। भारतीय संस्कृति को सामूहिक या सामाजिक संस्कृति कहकर उसे कोई विशिष्ट पहचान देने से परहेज किया। 'वोट बैंक' की राजनीति हावी हुई और भारत की सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक स्वार्थ का अजगर निगलने लगा। साहित्यकार सत्ताा से आतंकित हुए या आकर्षित या फिर आजादी के पश्चात् दिग्भ्रमित, धीरे-धीरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राह छोड़ तात्कालिक यथार्थ, कंकड़-पत्थर बटोरने लगे। साहित्य क्रमश: समाज से दूर जा रहा है, उसकी प्रेरणा का स्रोत नहीं बन पा रहा। आज के साहित्यकार जातीय अस्मिता के प्रतीक न बन कर तुच्छ स्वार्थों की पहरेदारी कर रहे हैं।

इस संक्रांति बेला में राष्ट्रवादी संगठनों का चाहे वे किसी भी क्षेत्र में क्रियाशील क्यों न हों यह दायित्व बनता है कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा उठायें, भारतीय संस्कृति के सर्व-समवेशी, सामाजिक रूप की रक्षा करते हुए भी उसकी मूल पहचान को न मिटने दें क्योंकि इससे अलग भारत की कोई पहचान न थी, न है और न हो सकती। वैश्वीकरण के दौर में जहां अस्मिता का संघर्ष और तेज होगा वहां पुन: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से सशक्त भारत, अपराजेय भारत को गढ़ने का काम भारतीय साहित्यकार करते हैं तो साहित्य लेखन को सार्थक करेंगे।
(लेखक हि.प्र. विश्वविद्यालय, शिमला में प्राध्यापक है)

Thursday, January 29, 2009

भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम द्विराष्ट्रवाद


डॉ. महेशचन्द्र शर्मा
भारत विभाजन की दुर्घटना तो 1947 में हुई लेकिन इस दुर्घटना के मूल में तथाकथित हिन्दू-मुस्लिम द्वैत है।
हिन्दू यह सम्प्रदायवाची नहीं वरन् राष्ट्रवादी शब्द है। मजहबांरित भारतीयों को जब अहिन्दू के रूप में परिभाषित किया गया तब इन मजहबों के समानान्तरण हिन्दू शब्द का प्रयोग होने लगा लेकिन हिन्दू नाम का इस देश में कोई सम्प्रदाय नहीं है। सभी भारतीय सम्प्रदाय हिन्दू समाज के अंग हैं, मजहबांरित भारतीयों को भी हिन्दू समाज का वैसा ही अंग होना चाहिये जैसे सभी भारतीय साम्प्रदायों को मानने वाले लोग हैं। दुर्भाग्य से इस राष्ट्रीय एकात्मता के विचार को सम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता है। इसे मुस्लिम-ईसाई विरोधी हिन्दू साम्राज्यवाद बताया जाता है।

यह एक अशास्त्रीय एवं राष्ट्रविघातक प्रस्थापना है। इस द्वैत का समुचित भाष्य अभी तक नहीं हो सका है। क्या यह राष्ट्रीय द्वैत है, यह उपासना पध्दति का द्वैत है, यह माजहबिक द्वैत है या यह सांस्कृतिक और सामाजिक द्वैत है? क्या यह तथाकथित द्वैत एक नैसर्गिक वास्तविकता है, क्या यह द्वैत तथ्यात्मक वास्तविकता है या यह द्वैत एक कृत्रिम राजनैतिक दुरभिसंधि है?जिन्होंने भारत में मुसलमानों को पृथक राष्ट्रीयता माना उन्होंने द्वि-राष्ट्रवाद अवधारणा प्रस्तुत की। यह एक अवैज्ञानिक विचार है। यदि मजहबों से राष्ट्रीयता बनती तो भारत में तथा विश्व में कहीं भी राष्ट्र संज्ञा का विकास ही नहीं हो पाता। साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग के द्वारा इसे प्रस्तुत एवं पोषित करवाया लेकिन सौभाग्य से भारत में कोई भी इस अवधारणा का समर्थक नहीं है। राष्ट्रीयता तत्तवत: भू-सांस्कृतिक अवधारणा है।

सांस्कृतिक रूप से मुसलमान भारतीय जीवन पध्दति एवं संस्कृति से पृथक नहीं है। राष्ट्रीय संदर्भ में यह द्वैत एक अवास्तविकता है।सम्प्रदाय के संदर्भ में यहां कुछ मूलभूत विचारों को समझना जरूरी है। भारत में सम्प्रदाय एक प्रवाही तत्व है, यहां सिमेटिक या सामी सम्प्रदायों के समान संस्थाबध्द सम्प्रदाय नहीं हुआ करते न ही यहां सम्प्रदायांतरण (कनवर्जन) की कोई संस्थाबध्द परंपरा है। सम्प्रदायाधारित संस्थाबध्द मतान्तरण के लिए विदेशी तत्व है। भारत में सदैव ही विविध मत पंथ रहे हैं। यदि पंथों के हिसाब से भारतीय समाज की बहुलता का अध्‍ययन किया जाये तो यहां दो चार नहीं वरन् सैकड़ों सम्प्रदाय होंगे। विविध सम्प्रदायों के गुरूओं अथवा मसीहाओं की संख्या भी सैकड़ों हजारों में होगी। अत: मुस्लिम एक सम्प्रदाय तथा बाकी सब भारतीय दूसरा सम्प्रदाय, इस प्रकार का द्वैत स्थापित करना भी नितांत बचकानी प्रक्रिया है। सामी तरीके की नहीं वरन् भारतीय प्रकार की कुछ संस्थाबध्द सम्प्रदायों की मलिका भी भारत में है।

भारत को तथाकथित हिन्दू व मुसलमान नाम के दो सम्प्रदायों में बांटना किसी भी प्रकार तर्कसंगत नहीं है। सामी मजहबों में भी ईसाई बड़ी संख्या में रहते हैं, थोड़े ही क्यों न हों यहूदी व पारसी भी भारत में रहते हैं, तो क्या ईसाई, पारसी, यहूदी ये अलग-अलग राष्ट्रीयतायें हैं?मुस्लिम, ईसाई, यहूदी व पारसी वे मजहब हैं जो भारत के बाहर से आये हैं, सम्प्रदायों के संदर्भ में स्वागतशील भारत ने इनका स्वागत किया था। ऐतिहासिक कारणों से अनेक भारतीयों ने मतांतरण कर इस्लाम व ईसाइयत को अपने मजहब के रूप में स्वीकार कर लिया, परिणामत: जो मतांतरित नहीं हुये उन सभी भारतीयों को एक सम्प्रदाय कहना, एक तथ्यात्मक भूल है। जो भारतीय मजहबांतरित नहीं हुये वे हिन्दू मजहब के धारक हैं तथा जो मजहबांतरित हो गये वे मुसलमान या ईसाई हैं, यह नितांत ही गलत समाजशास्त्रीय विभाजन है। वे भारतीय जो मजहबांतरित हो गये वे अल्पसंख्यक हैं तथा जो मजहबांतरित नहीं हुये वे बहुसंख्यक हैं, यह विभाजन भी न केवल गलत है वरन् दुर्भाग्यपूर्ण भी है। हर प्रकार से हिन्दू व मुसलमान के नाम का द्वैत अवास्तविक है तथा गलत अवधारणाओं पर टिका है। यह द्वैत ही मुस्लिम पृथकतावाद का पिता है, जिसने कृत्रिम रूप से देश को बंटवाया तथा आज भी वह पृथकतावाद देश में साम्प्रदायिक विद्वेष के रूप में विद्यमान है।वास्तव में हिन्दू यह सम्प्रदायवाची नहीं वरन् राष्ट्रवादी शब्द है।
मजहबांरित भारतीयों को जब अहिन्दू के रूप में परिभाषित किया गया तब इन मजहबों के समानान्तरण हिन्दू शब्द का प्रयोग होने लगा लेकिन हिन्दू नाम का इस देश में कोई सम्प्रदाय नहीं है। सभी भारतीय सम्प्रदाय हिन्दू समाज के अंग हैं, मजहबांरित भारतीयों को भी हिन्दू समाज का वैसा ही अंग होना चाहिये जैसे सभी भारतीय साम्प्रदायों को मानने वाले लोग हैं। दुर्भाग्य से इस राष्ट्रीय एकात्मता के विचार को सम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता है। इसे मुस्लिम-ईसाई विरोधी हिन्दू साम्राज्यवाद बताया जाता है। यह एक अशास्त्रीय एवं राष्ट्रविघातक प्रस्थापना है। जब तक भारत में इस प्रस्थापना का सम्मान रहेगा, विभाजनवादी विद्वेष एवं पृथकतावाद यहां पलता रहेगा। मुस्लिम पृथकतावाद को इसी प्रस्थापना ने पोषित किया तथा भारत का विभाजन करवाया। आज भी यही प्रस्थापना पृथकतावादी सम्प्रदायवाद को परिपोषित कर रही है।इस प्रस्थापना को भारत में सेक्युलरिज्म कहा जाता है। जो अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता का पोषण करती है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि वह समाज को सदैव आलोकित करती रहती है। भारत के सभी सम्प्रदाय आपस में गुंथे हुये हैं। उनमें भारत ने पृथकतावाद नहीं पनपने दिया। ऐसा नहीं है कि भारत के विविधा सम्प्रदायों में कभी कटुता नहीं आई, लेकिन भारत के सांस्कृतिक महापुरूषों ने उन्हें समन्वय की राह दी, पृथकता का पोषण नहीं किया, वरन् विविधाता के सम्मान का सृजन किया। परिणामत: सभी सम्प्रदाय भारत की सर्वव्यापी संस्कृति के अंग बने। इस्लाम का भी समुचित भारतीयकरण हुआ था, लेकिन साम्राज्यवादियों ने उसे पृथक्करण की तरफ धाकेला तथा पाश्चात्य शिक्षित भारतीयों के भोले मन ने उसे सेक्युलरिज्म का अवधारणात्मक बाना पहना दिया। परिणामत: सनातनी हिन्दू हो सकता है, जैनी हिन्दू हो सकता है, सिक्ख भी हिन्दू हो सकता है, शैव, शाक्त एवं वैष्णव भी हिन्दू हो सकते हैं, लेकिन यदि मुसलमान व ईसाई भी हिन्दू हो जायेंगे तो उनके पृथक अस्तित्व का क्या होगा, इससे तो सेक्युलरवाद का समापन हो जायेगा। अत: सेक्युलरवाद की रक्षा के लिए आवश्यक है कि पृथकतावादी साम्प्रदायिकता जिन्दा रहे तथा एकात्मवादी राष्ट्रीयता को बहुमतवाद या बहुमतीय सम्प्रदाय की साम्राज्यवादिता कहा जाये।इन स्थापनाओं ने राष्ट्रीयता के संदर्भ में हमें सम्भ्रमित किया। अत: हमने द्वि-राष्ट्रवाद का विरोध करते हुए भी विभाजत द्वि-राष्ट्र को स्वीकार कर लिया। साम्प्रदायिकता के विरोध के नाम पर हम साम्प्रदायिक पृथकतावाद का पोषण करते हैं, राष्ट्रीय एकात्मता को बहुमतवाद कहते हैं। राष्ट्रवाद की तुलना हम पाश्चात्य फासीवाद व नाजीवाद से करते हैं।

हिन्दू-मुसलमान के अतार्किक द्वैत को स्वीकार करते हैं। इस अतार्किक द्वैत की स्थापना के कारण सैंकड़ों भारतीय सम्प्रदायों की अस्मिता को ही नकारते हैं तथा मजहबांतरित सामी-धर्मियों की पृथकता को रेखांकित करते हैं। राष्ट्रीय संस्कृति के आह्वान से उन्हें विमुख करते हैं।इन स्थापनाओं का निश्चित परिणाम होगा पुन: भारत विभाजन की यत्र-तत्र मांग उठेगी। कश्मीर में हम इसी पृथकतावाद को भोग रहे हैं। प्रासंगिक रूप से इस विषय पर दीनदयालजी के दो संदर्भों को हमें स्मरण करना चाहिये। प्रथम संदर्भ 1951 में जनसंघ के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने प्रस्ताव रखा था, जिसमें उन्होंने आह्वान किया है:''हिन्दू समाज का राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य है कि भारतीय जनजीवन के तथा अपने उन अंगों के भारतीयकरण का महान कार्य अपने हाथ में ले जो विदेशियों द्वारा स्वदेशपराभिमुख तथा प्रेरणा के लिये विदेशाभिमुख बना दिया गया है। हिन्दू समाज को चाहिए कि उन्हें स्नेहपूर्वक आत्मसात कर ले। केवल इसी प्रकार साम्प्रदायिकता का अंत हो सकता है और राष्ट्र का एकीकरण तथा दृढ़ता निष्पन्न हो सकती है।''द्वितीय संदर्भ है जब उन्होंने विभाजित भारत के द्वि-राष्ट्रों के महासंघ निर्माण के लिये डा0 राम मनोहर लोहिया के साथ साझा वक्तव्य दिया :''हमारा मत है कि हिन्दुस्तान की पृथकता कृत्रिम है। दोनों सरकारों के संबंध बिगड़ने का एक कारण उनकी टूटी दृष्टि व टूटी-फूटी बातचीत है। हम चाहते हैं कि दोनों सरकारें टुकड़े-टुकड़े में बातचीत न करके खुले मन से बात करें। इसमें समस्याओं का निराकरण हो सकेगा और पारस्परिक सद्भावना पैदा होकर ''हिन्द पाक महासंघ'' किसी न किसी रूप में बनने का क्रम शुरू हो सकेगा।''हमारी भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का अधिष्ठान अखंड भारत है। भारत-पाक व बांग्लादेश के परिसंघ के रूप में उसे स्वीकार किया जा सकता है।

भारत की पृथकतावादी साम्प्रदायिकता की पूंजीभूत सम्प्रभुता का नाम है पाकिस्तान और बांग्लादेश। भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीयता में इन्हें विगलित करने की शक्ति है। भारत के मुसलमान भारत की राष्ट्रीयता अर्थात हिन्दुत्व के अभिन्न अंग हैं क्योंकि हिन्दुत्व एक मजहब निरपेक्ष संज्ञा है।हिन्दू के अधिष्ठान पर भारत में थियोक्रेटिक स्टेट की स्थापना की बात अज्ञानमूलक है क्योंकि हिन्दुत्व के पास मुस्लिम या ईसाई के समान कोई पांथिक पुस्तक नहीं है, न कोई एक मसीहा तथा पैगम्बर। अत: भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही भारतीय एकात्मता को प्रतिबिम्बित करने वाला समाजशास्त्रीय सत्य है। हमें इसका साक्षात्कार करना चाहिये।
(लेखक प्रसिध्द चिंतक हैं एवं पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर गहन शोध कर चुके हैं)

Thursday, January 15, 2009

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हमारा मूल विचार है


हृदयनारायण दीक्षित
हिन्दुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर राष्ट्रीय अन्तर्मंथन जारी है। भारत के राष्ट्रजीवन के लिए यह देवासुर संग्राम जैसा सागरमंथन है। भारत सनातन काल से तत्तव खोजी, सत्य अभीप्सु राष्ट्र है। तर्क, प्रतितर्क, विचार विमर्श हमारे राष्ट्रजीवन की सनातन परम्परा है। तर्क-प्रतितर्क की लोकतंत्री व्यवस्था को जन्म देने का स्वयंभू दावा करने वाला पश्चिमी जगत भी जानता है कि लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है। पश्चिम का जनतंत्र राजतंत्र की प्रतिक्रिया से आया। भारतीय लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है और स्वभाव हिन्दुत्व का प्राण है।

आज हिन्दुत्व के आयामों पर मजेदार बहस जारी है। मसलन अटल बिहारी वाजपेयी का हिन्दुत्व क्या है? लालकृष्ण आडवाणी और वाजपेयी के हिन्दुत्व में फर्क क्या है? नरेन्द्र मोदी और विनय कटियार के हिन्दुत्व की दिशा क्या है? क्या अशोक सिंहल और प्रवीण तोगड़िया का हिन्दुत्व किसी और तरह का है? यो प्रागदर्शन में बहस के ये आयाम राजनीतिक हैं। पर हमारे राष्ट्रजीवन में ऐसी बहसें सनातन काल से जारी हैं। महात्मा गांधी, वीर सावरकर, योगी अरविन्द और लोकमान्य तिलक के भी हिन्दुत्व दृष्टिकोण अपने समय अलग-अलग दिखाई पड़े रहे थे। हिन्दुत्व पर डॉ। राममनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय के भी दृष्टिकोण राष्ट्रीय बहस का विषय बने।

भारतीय दर्शन के इसके भी पहले के सम्मानित कालखण्ड में उपनिषद प्रतीतियों और ऋग्वैदिक मंत्र अभिव्यक्तियों के बीच भी इसी किस्म की इन्द्रधानुषी रंग वाली भिन्नताएं रही। द्वैत, विशिष्ट द्वैत और अद्वैत जैसी प्रतीतियां उगीं। वर्ण व्यवस्था से देखें तो अब्राह्मण ऋषि ऐतरेय ने ऐतरेय ब्राह्मण गाया। अब्राह्मण ऋषि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र रचा। अब्राह्मण ऋषि व्यास ने महाभारत गीता की सर्जना की। अब्राह्मण ऋषि वाल्मीकी ने रामायण की रचना की। यों ब्राह्मण कभी जाति नहीं थे। समग्रता/टोटेलिटी/सत्य के पर्याय ''ब्रह्म'' नामक तत्व के अध्‍ययन की एक शाखा का नाम ब्राह्मण था। इसी शाखा के ग्रंथ ''ब्राह्मण'' कहलाये। सो हिन्दू प्रतीति की दृष्टि से ऐतरेय, विश्वामित्र व्यास और रविदास ब्राह्मण थे।

भारतीय समाज व्यवस्था के विकार के चलते इन्हें शूद्र कहने की हाहाहूती गलती हुई। सो हिन्दुत्व का सीधा मतलब है तर्क-प्रतितर्क सोच-विचार और सतत् प्रवाही बहस का अनुसंधानपरक अधिष्ठान। डॉ। अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म पर बेशक उत्तेजक सवाल उठाये। उनके सवाल हिन्दू समाज की जाति-वर्ण आधारित व्यवस्था की सहज पीड़ा से आये। लेकिन यह हिन्दुत्व का कमाल है कि उसकी ही कोख से डॉ. अम्बेडकर जैसा अग्निधर्मा विद्रोही पैदा हुआ। उसी की कोख से बुध्द जैसा परिपूर्ण ज्ञानी। बुध्द ने भी हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज की तमाम मान्यताओं को काटा। स्वामी दयानन्द ने भी। लेकिन सारा कमाल हिन्दुत्व का है। यहां ज्ञान की यात्रा लगातार जारी ही रहती है। विश्व ज्ञान का प्राचीनतम एनसाइक्लोपीडिया, ऋग्वेद कहता है ''हे परमात्मा, श्रेष्ठ विचार सभी दिशाओं से हमारे पास आयें।'' एतदर्थ हिन्दुत्व की सनातन धारा में सद्विचारों के स्वागत की परम्परा है। हिन्दू आदिकाल से सत्य, शिव और सुन्दर की शोधा यात्रा पर है।

इस्लाम में तर्क असंभव है। सांस्कृतिक धारा के कारण भारत तर्क की धरती है। इस्लाम अव्वल से आखिर तक सब कुछ जान लेने और अपनी ही जानकारियों को श्रेष्ठ मानने का दावा करता है। इस्लाम असहमति पर आक्रमक रहा है। हिन्दुत्व की इस धरती पर ज्ञान की यात्रा और नित्य नई उपलब्धियों के वसंतोत्सव खिलते ही रहते हैं। इस्लाम में डॉ। अम्बेडकर जैसा आग्नेय व्यक्तित्व पैदा नहीं हो सका। चार्वाक जैसा मनमौजी ऋषि समूह भी इस्लाम नहीं पैदा कर सका। स्वामी दयानन्द जैसा रूढ़ि विरोधी महान संत भी इस्लाम नहीं दे सका। ऐसे तमाम सात्विक क्रांतिकारी इस्लाम दे भी नहीं सकता। क्योंकि इस्लाम में तर्क, विचार, शोध, मनन और सतत् चिंतन की परम्परा नहीं है। इस्लाम में तर्क परम्परा होती तो निश्चित ही सलमान रूश्दी, तसलीमा नसरीन, पाकिस्तान लेखिका तहमीना दुर्रानी जैसे प्रख्यात विद्वानों के तर्क भी आदरपूर्वक सुने जाते। तब मौलाना बुखारी हमीद दलवाइ, शाहवल्लीउल्ला, शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी के इस्लामी दृष्टिकोण का मूल्यांकन होता। जिन्ना और अब्दुल कलाम आजाद के इस्लाम को भी अलग-अलग व्याख्या का विषय बनाया जाता।

हिन्दू जीवन रचना और हिन्दुत्व की अवधारणा का कमाल है कि हिन्दुत्व की सनातन बहस में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिस्सा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने बाकायदा सुनवाई की। दुनिया के इतिहास में किसी पंथ, मजहब, रिलीजन या सेक्ट को किसी भी देश के न्यायालय में कभी प्रश्नगत नहीं किया गया। क्या विश्व के किसी भी देश की अदालत ''इस्लाम क्या है'' जैसे आस्था भरा प्रश्न पर कड़वी दलीलें सुन सकती है? हिन्दू बहुसंख्यक इस हिन्दुस्थान की सबसे बड़ी अदालत ने हिन्दुत्व के पक्ष और प्रतिपक्ष में तीखे पैने तर्क सुने। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसम्बर 1995 को तिरसठ पेजी फैसले में कहा कि हिन्दुत्व का अर्थ है ''भारतीय जन की जीवन शैली।'' यही जीवन शैली हमारी संस्कृति है और हमारे सांस्कृतिक राष्ट्र की मुख्यधारा।

भारतीय लोगों की इस तार्किक जीवन शैली का विकास अचानक नहीं हुआ। हिन्दू संस्कृति की सदा प्रवाहित गंगा से ही इस परिवर्तनकामी, सदा गतिशील और प्रगतिशील राष्ट्रीय राष्ट्रजीवन का विकास हुआ। यूरोप में राष्ट्र की कोई जन्मतिथि नहीं है। सृष्टि की पहली किरण के साथ प्रज्ञा रूपी मन (मनन-सोच विचार) जन्मा। यही प्रज्ञा प्राण ही हिन्दुत्व है। पवित्र हिन्दू भूमि इस प्रज्ञा की धारक है। हिन्दुत्व गंगोत्तरी है। इसी का गंगा-प्रवाह हिन्दू संस्कृति है। हिन्दू संस्कृति की यह गंगा कूड़ा करकट किनारे करती रहती है, पर अमृत जल का प्रवाह जारी रहता है। सो संस्कृति ही इस राष्ट्र का प्राण है। संस्कृति ही इस राष्ट्र की धारक है। संस्कृति ही इसकी नियामक है। सो यही भारतीय राष्ट्रीयता है। भारत राष्ट्र सदा से एक भू-सांस्कृतिक अवधाारणा है। राजनीतिक इकाई नहीं।

सवाल यह है कि भारत का प्राण हिन्दू संस्कृति नहीं तो आखिरकार है क्या? सेकुलरिज्म हमारी राष्ट्रीयता नहीं है। यह हमारी संस्कृति का एक आयाम है। हिन्दू संस्कृति स्वभाव से ही ''आध्‍यात्मिक पंथनिरपेक्ष'' है। राजनीति और राज्य व्यवस्था में पंथनिरपेक्षता की वकालत करना आसान है। हिन्दू दर्शन अध्‍यात्म में भी पंथनिरपेक्ष और तार्किक है। वैदिक काल के ऋषि तर्क करते थे और उपनिषद काल तर्क काल है ही। फिर तो बहस का ही वातायन बना। सूत-शौनक, शंकर-पार्वती, यम-नचिकेता, अष्टावक-जनक, अर्जुन-कृष्ण और तुलसी की रामकथा में काक भुसुण्डी और गरूड़ जैसे पक्षी भी बहस करते हैं। इसी पंथनिरपेक्षी-आध्‍यात्मिकता और सदा लोकतंत्री जन-गण-मन व्यवस्था वाली सनातन संस्कृति से यह राष्ट्र है। इसलिए सांस्कृतिक राष्ट्र भाव ही भारत का मूल विचार है।

पं। दीनदयाल उपाध्‍याय लिखते हैं, ''राष्ट्र केवल भौतिक निकाय नहीं हुआ करता। राष्ट्र में रहने वाले लोगों के अंत:करण में अपनी भूमि के प्रति श्रध्दा की भावना का होना राष्ट्रीयता की पहली आवश्यकता है।''स्वराष्ट्र के प्रति पुलक स्वाभाविक है। क्योंकि स्व हमारा स्वभाव है। हमारे स्व का आदर्श हमारी संस्कृति है। स्वदेश और विदेश में आधारभूत फर्क है। स्वदेश में आत्मीयता है। विदेश में परायापन है। यह तत्व राष्ट्रजीवन के अंतस् में सहज प्रवाहित रहते हैं। त्याग, प्रेम, बंधुत्व हमारा स्वभाव है। यह स्वसंस्कृति से आया। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरूषार्थ हमारे राष्ट्रजीवन में रचे बसे हैं। भारत ने भोग की जगह त्याग अपनाया। भोग रोग है। त्याग योग है। भारत उपयोग पर धयान देता है। पश्चिम उपभोग पर।साधारण सा प्रतीत होने वाला एक असाधारण प्रश्न भारत के लोकजीवन में अक्सर उठता है, किसी भी अनुष्ठान की शुरूआत का उत्सव कैसे प्रारम्भ करे? दारू के गिलासों को टकराकर चियर्स बोलते हुए या एक नारियल फोड़कर? समष्टि/भगवत्ता के प्रति अनुग्राही होते हुए हाथ जोड़कर या सीना तानकर? उत्सव धर्म ज्योति प्रतीक दीपक को जलाकर अपना कोई अनुष्ठान प्रारम्भ करे? या कैंची से फीता काटकर? दीपक प्रज्ज्वलन और नारियल का समर्पण भारत के सनातन मन को आह्लाद देता है। यह भारत के सनातन चित्त की सत्य, शिव और सुंदरतम सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां है। श्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने एक आलेख (जेन्टिलमैन 13 जनवरी- 97) में उक्त सवाल उठाते हुए ''सेकुलरिज्म'' की अच्छी खबर ली थी। आलेख में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद होने वाले जलसे में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की उपस्थिति का विवरण देते हुए श्री आडवाणी ने लिखा सेकुलरिज्म से अभिभूत पं. नेहरू को राष्ट्रपति का ऐसे कार्यक्रम के लिए समय देना नागवार लगा। इस्लामी आक्रांताओं ने भारत के हजारों मंदिर हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने की खातिर ही ढहाये थे। मंदिर भारतीय संस्कृति की शिखर अभिव्यक्तियां ही तो हैं। मंदिर और मस्जिद एक नहीं है। दोनों के अलग-अलग मतलब है। अलग-अलग मकसद।लेकिन

हिन्दुत्व के अधिष्ठान में बहस है। बाकी में नहीं। हिन्दुत्व को हिन्दुज्म कहने वाले गलती पर है। इज्म विचार होता है। हिन्दुत्व विचार नहीं है। यह समग्रता का स्वीकार है। अंग्रेजी अनुवाद की त्रुटिवश हिन्दुत्व को हिन्दुज्म कहा जाता है। साजिशन इसे उग्र या फंडामैंटलिस्ट जैसी संज्ञाएं दी जा रही है। इसे हिन्दूनेस कहना ठीक होगा। इसी राष्ट्रीय अधिष्ठान के दृष्टिकोण से हिन्दुत्व पर जारी बहस का स्वागत है। ध्‍यान रहे इस बहस में सबका आदर है। तर्क चलें। विचार और विमर्श चले। अब कुतर्क नहीं चल सकते। क्योंकि हिन्दुत्व के उपासक जाग गये हैं। बेशक बहस जारी रहे। इसी में से अपने इस सांस्कृतिक राष्ट्र का भविष्य खिलेगा।
(लेखक प्रसिध्द विचारक हैं)

Monday, January 12, 2009

विवेकानंद की विचारधारा



जगमोहन
इतिहास के इस मोड़ से हम कहां जाएंगे? भारत का भविष्य क्या है? आजादी के साठ सालों के दौरान अपना पुरुत्थान करने और विश्व समुदाय में विशिष्ट स्थान पाने का मौका गंवाने के बाद क्या इससे सबक लेते हुए हम नई शुरुआत करेंगे? जब भी मैं खुद से ये सवाल करता हूं, तो मेरे जेहन में इसका सबसे बेहतर जवाब यही आता है कि भारत को आज स्वामी विवेकानंद जैसी आध्यात्मिक और बौद्धिक विभूति की आवश्यकता है। एक विशाल प्रकाश स्तंभ की तरह विवेकानंद ही समुद्री तूफान में डमगम करती भारत की नैया को पार लगा सकते हैं। शोषणकारी पूंजीवाद और उपभोक्तावाद के गुरुओं द्वारा देश की सोच को बंधक बना लिए जाने के बाद विवेकानंद की दृष्टि और उत्साह ही देश को आध्यात्मिक खुदकुशी से बचा सकता है। बहुत कम लोगों को यह अहसास है कि विवेकानंद उन प्रमुख शिल्पियों में से एक थे जिन्होंने नई सांस्कृतिक धारा से बंजर भारतीय भूमि को सिंचित किया। इस उर्वर भूमि पर मनुष्यता की नई फसल लहलहाई। इन्हीं लोगों ने देश को आजादी दिलाई।


विवेकानंद ने घोषित किया, इस देश की धरा पर सर्वप्रथम आत्मा की नश्वरता का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ-एक कृपालु ईश्वर, जो तमाम लोगों और प्रकृति में प्रत्यक्ष है॥हम ऐसे ही देश के बच्चे हैं। इन प्रेरक शब्दों ने साम्राज्यवादी शासन से उपजे आत्मसंशय को मिटाकर जनता में आत्म सम्मान और आत्मबल का संचार किया, जिसकी बदौलत महात्मा गांधी और तिलक जैसे युगपुरुष पैदा हुए। भारत की जो हैसियत होनी चाहिए थी वह आज उसकी छायामात्र है। भारत को तो विश्व में जीवनदायी विचारों का प्रवाह करना चाहिए था, लेकिन यह दूसरों के मूढ़ भौतिकवाद से निर्देशित हो रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था आमजन की भलाई के लिए होनी चाहिए थी, लेकिन यह अमीरों के उपभोक्तावाद को स्थापित कर रहा है और गरीबों के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है। इसे विविधता में एक्य की अपनी समृद्ध परंपरा का निर्वहन करना चाहिए था, लेकिन यह टकराव और विभ्रम का शिकार होकर अलग-थलग हो गया है। यह सब कैसे हुआ? 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, जब भारतीय क्षितिज पर सामाजिक और सांस्कृतिक पतन के बादल मंडरा रहे थे, भारतीय जन को निर्मल करने के लिए विवेकानंद गतिशील लक्ष्य के साथ उठ खड़े हुए।


मुख्य दोषियों को इंगित करते हुए उन्होंने कहा, भारत के उच्च वर्ग, क्या तुम सोचते हो कि जिंदा हो? तुम दस हजार साल पुरानी ममी मात्र हो॥माया संसार में वास्तविक भ्रम हो। तुम अपने आपको शून्य में विलीन करके गुम हो जाओ। अपने स्थान पर एक नए भारत को जन्म लेने दो। अगर आज कोई विवेकानंद प्रकट होते तो वह उच्च वर्ग से कहते, आपने देश के साथ विश्वासघात किया है। आपने संविधान के लक्ष्यों में निहित प्रेरणा का गला घोंट दिया। आप प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थानों की स्थापना करते रहे, किंतु लोगों में उस चेतना और प्रेरणा का संचार नहीं कर पाए जो उन्हें जीवन और अर्थ प्रदान करती हैं। आपने ऐसे शरीर बनाए हैं जिनमें आत्मा ही नहीं है। त्याग और तपस्या में निहित प्राचीन भाव की श्रेष्ठता की अवहेलना कर दी है और शक्ति व संपदा के नए ईश्वरों की अर्चना शुरू कर दी है। महान अतीत से आपको रत्न चुनने चाहिए थे और पत्थरों को बाहर फेंकना चाहिए था, किंतु आपने ठीक उलटा किया। पत्थर चुन लिए और रत्न फेंक दिए। आप बंदर के मरे हुए बच्चे की भांति देश की छाती से चिपक गए हैं।


आप काफी नुकसान पहुंचा चुके हैं। जाओ, भारत माता के लिए निकल जाओ। विवेकानंद जानते थे कि स्वस्थ भारत के निर्माण में आध्यात्मिक परंपरा को अहम भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा था-प्रत्येक व्यक्ति की तरह देश के जीवन का भी एक ध्येय होता है। अगर कोई देश अपनी राष्ट्रीय जीवनशक्ति गंवा देता है तो वह राष्ट्र मर जाता है। विवेकानंद की धर्म की अवधारणा मनुष्यता की आराधना के चारों ओर घूमती है। उनके लिए जीव ही शिव है। गरीब, बीमार और जरूरतमंदों की सेवा ही ईश्वर की असली सेवा है। विवेकानंद ने व्यावहारिक वेदांत की वकालत की है। वह कहा करते थे कि तोला भर काम बीस हजार टन बड़ी-बड़ी बातों के बराबर है। कुछ आश्रमवासियों ने उनसे सवाल किया कि जन सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना संन्यासी परंपरा से तादात्मय कैसे बैठाएगी? उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से जवाब दिया, आपकी भक्ति और मुक्ति की चिंता कौन करता है? धार्मिक ग्रंथों के रचियताओं की चिंता कौन करता है? अगर मैं अपने देशवासियों को कर्म-योग के रास्ते पर लाकर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा कर सकूं तो मैं हजार नर्क भी खुशी-खुशी भोगने के लिए तैयार हूं। मैं राम-कृष्ण या फिर किसी और का अनुयायी नहीं हूं।


मैं केवल उनका भक्त हूं जो भक्ति या मुक्ति की परवाह किए बिना दूसरों की सहायता करते हैं। एक बार विवेकानंद ने खुद अपने वर्ग पर ही सवाल उठा दिए, हम संन्यासियों ने किया क्या है? जनता के लिए हमने क्या किया है? उन्होंने ईसाई मिशनरियों को भी आड़े हाथों लिया, नास्तिकों की आत्मा को बचाने के लिए ईसाई मिशनरियों को भेजने वाले ईसाइयों, तुम उन्हें भुखमरी से बचाने की कोशिश क्यों नहीं करते। एक भूखे मनुष्य को पंथ का पाठ पढ़ाना उसका अपमान है। निर्विवाद रूप से विवेकानंद 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरू में प्रस्फुटित भारतीय पुनर्जागरण के सबसे चमकदार सितारे थे। पुनर्जागरण के प्रभाव में सोया हुआ विशाल भारत जाग कर खड़ा हो गया, किंतु दुर्भाग्य से कुछ कदम सही बढ़ाने के बाद वह गलत दिशा में मुड़ गया। पतन के इस दौर में एक और विवेकानंद की बेहद जरूरत है-ऐसा विवेकानंद जो भटके हुए भारत को सही रास्ता दिखाए। वह लापरवाही, निर्दयता, भ्रष्टाचार और मिथ्याभिमान की वर्तमान संस्कृति के स्थान पर देखभाल, समर्पण, सहिष्णुता और भाईचारे की भावना जागृत करे। तभी भारत अपनी वास्तविक नियति को तलाश सकता है।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)

Saturday, November 8, 2008

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ऋषि श्रीलालकृष्ण आडवाणी



-डॉ. सौरभ मालवीय
`माई कंट्री माइ लाइफ´ बस नाम ही काफी है लेखक के उदात्त चित्त को समझने के लिए। राष्ट्रीय संवेदना से इतना एकाकार कि लेखक का जीवन ही देश का जीवन बन गया या राष्ट्र जीवन ही लेखक का प्राण तत्व हो गया। अनादिकाल के ऋषियों से लेकर प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण, आचार्य चाणक्य, स्वामी विवेकानंद, योगी अरविन्द, हेडगेवार आदि समेत श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपनाम श्री गुरुजी तक लाखों महापुरुषों ने राष्ट्र को ऐसे ही जिया है। इनकी साधना से प्रकाशित होने पर ही भारत नाम धन्य होता है। पश्चिमोत्तर भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्र कराची के इस दिव्य प्रतिभाशाली पुत्र ने भारत को काल्पनिक स्वप्न में या मुंह में चांदी की चम्मच के साथ, नहीं जिया है, अपितु कांग्रेस की कापुंसता के कारण खंडित और आहत भारत माता की साक्षात पीड़ा से गुजरकर भारत को जिया है। भारत द्वेष की कुंठा से त्रस्त पश्चिमी इतिहास बोध की आंखों से वे न तो भारत जानते हैं न ही किसी एडविना के बांह पाश की क्रीड़ा भूमि भारत मानते हैं। इन्हीं कारणों से उनमें छत्रपति शिवाजी के समान अदम्य जीवट भर गया है जो वामपंथ के खोखले शब्द जालों और कांग्रेसियों द्वारा शैतानी छवि गढ़ने पर भी अपने भरपूर आत्मविश्वास से चमचमाता रहता है। उन्हें अपने हिन्दूपन पर भी गर्व है, क्योंकि वह `एक्सीडेंटल´ नहीं है, परंपरागत रूपेण श्रेष्ठ है।

विगत 60 वर्षों की राजनीतिक यात्रा में उन्होंने अजेय कीर्ति स्थापित की है। एक दूरगामी षड्यंत्र के अंतर्गत जब हवाला कांड में वे आरोपित हुए तो तत्काल त्यागपत्र देकर निर्दोष होने तक राजनीति में न आने का भीष्म संकल्प कर लिया। भारत के इतिहास में यह अप्रतिम और एकमेव है। स्वतंत्रता के बाद एक ही परिवार ने इस देश को मनमाने ढंग से हांकने का उपक्रम प्रारंभ कर दिया औ इस मार्ग में सर्वाधिक सहायक चाटुकारों की फौज रही जो विभिन्न दृश्य श्रव्य माध्यमों पर अपने अन्नदाता का गुणगान करती रही। फलत: सामान्य देशवासी `हू इज आफटर नेहरू´ और `इंदिरा इज इंडिया´ के बाहर कुछ जान ही नहीं पाया। अन्यथा लोकमान्य तिलक, पंडित मदन मोहन मालवी, राजेंद्र बाबू, सुभाष चंद्र बोस, श्री अरविन्द घोष, डॉण् श्यामाप्रसाद मुखर्जी आचार्य जेबी कृपलानी, पुरुषोत्तम दास टंडन, जयप्रकाश बाबू, अम्बेडकर, निजलिगंप्पा, सरदार बल्लभ भाई पटेल इत्यादि सहस्रावधि महानायक पुस्तकालयों के खंडहर में नहीं समाहित हो गए होते। इसी छलकपट और सामाजिक वंचना के भ्रामक शिकार आडवाणी जी भी बने हैं। इसका सहज अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि संपूर्ण भारतवर्ष में लगभग तीन हजार सरकारी संस्थान और सड़कें केवल गांधी नेहरू वंश के नाम हैं।

प्राइवेट की तो गिनती ही संभव नहीं है। एस प्रसन्न राजन का यह कथन समीचीन है कि-``यह एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो सत्ता से नहीं अपितु सत्ता के लिए या सत्ता कि विरुद्ध संघर्ष से परिभाषित होता रहा है।´´

पूर्वाग्रह ग्रस्त मीडिया का एक ज्वलंत प्रमाण यह है कि 18 नवंबर 2002 को संसद में श्री आडवाणी जी ने कहा था कि-
सन् 1947 में स्वतंत्रता के पश्चात् पाकिस्तान अपने को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया परंतु उस समय भारत में किसी ने यह सुझाव तक नहीं दिया कि भारत भी एक हिन्दू राज्य होना चाहिए।´´

दूसरे दिन देश के सभी समाचार-पत्रों ने समवेत स्वर से लिखा था कि ``भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं-आडवाणी´

इसे क्या समझा जाए? पत्रकारों का अज्ञान, जो राज्य और राष्ट्र का मूलभूत अंतर भी नहीं समझ पाते या उनकी प्रतिभा विदारक मानसिकता।

वरिष्ठ पत्रकार श्री एण् सूर्य प्रकाश ठीक ही कहते हैं कि-``यथार्थ और छवि के बीच की खाई छद्म पंथ-निरपेक्षता और छदम् लोकतांत्रिक परिवेश की उपज है जो नेहरू-गांधी परिवार के शुभचिंतकों की देन है।

मेरी समझ से यह भारत राष्ट्र के ग्रह नक्षत्रों का फेर है जो लाख प्रयास करने के बावजूद भी अंत में बिगड़ता जा रहा है।

जून 2005 में श्री आडवाणी जी जब पाकिस्तान की सरकारी यात्रा पर गए थे तो वहां मुहम्मद अली जिन्ना के मजार पर रखी पुस्तिका में अपना उद्गार व्यक्त करते हुए उन्हें पंथ निरपेक्ष बताया था। वह भी उस संदर्भ के साथ जोकि 11 अगस्त 1947 को मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की संविधान सभा में भाषण दिया था। इसी की पुष्टि में वे एक प्रसिद्ध संत जो रामकृष्ण मिशन से संबद्ध आश्रम कराची के प्रमुख थे उस स्वामी रंगनाथनन्द को भी उद्धृत किया था।

परंतु यह दुर्योग ही था कि गैर तो गैर अपनों ने भी बिना कुछ आगा-पीछा सोचते हुए धरती सिर पर उठा ली। उनमें इतिहास बोध का स्पष्ट अभाव था। वे लोग सच में दया के पात्र हैं। उन्हें जिन्ना का पूर्व चरित्र और भारत विभाजन के गुनाहगारों का कुछ भी ज्ञान नहीं है।

श्री बी .वी कुलकर्णी लिखते हैं कि -जिन्ना स्वयं को जिन्ना भाई सुनकर प्रसन्न होते थे। वे कहते थे कि वह इस्लाम के ऐसे पंथ के अनुयायी हैं जो हिन्दुओं के दशावतारों को मानता है। उनके पंथ में अधिकांशत: उन्हीं सामाजिक परिपाटियों और संपत्ति संबंधी अधिकारों की परंपरा है जो हिन्दू समाज में प्रचलित है। वे मोतीलाल नेहरू से एक बार यहां तक कह दिया था कि ``वह मुल्लाओं की किसी बकवास में विश्वास नहीं करते, यद्यपि उन्हें किसी तरह इन मूर्खो को साथ में चलाना पड़ता है।


श्री अम्बेडकर जिन्ना के बारे में कहते हैं कि-
``उनका निष्ठावान या दीनी मुसलमान का रूप तो कभी नहीं रहा। जब कभी उन्हें विधानसभा की शपथ दिलाई जाती थी तभी वह कुरान को चूमते थे। इसमें भी संदेह है कि कभी उन्होंने उत्सुक्ता या श्रद्धावश किसी मिस्जद में अपने पैर रखे हों। वे कभी मजहबी या राजनीतिक मुस्लिम सम्मेलनों में नहीं देखे गए। अरबी, फारसी और उर्दू का तो उन्हें लेशमात्र भी ज्ञान नहीं था।
जिन्ना सगर्व कहते थे कि राजनीति की शिक्षा उन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी के चरणों में बैठकर ली है।

गोपाल कृष्ण गोखले उनके बारे में कहते थे कि-
``जिन्ना में सत्यभाव है और वह सभी सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से मुक्त है। अत: वे हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य हेतु सर्वोत्तम राजदूत सिद्ध होंगे।´´

जिन्ना ने ही लोकमान्य तिलक जी का मुकदमा स्वयं लड़ा था और उस दौरान वे तिलक जी की राष्ट्र भक्ति से इतना प्रभावित हुए कि उनके चेले बन गए। तिलक जी पर राजद्रोह के मुकदमे में जिन्ना ने सरकार की बोलती बंद कर दी थी।
रोजनी नाडयू ने लिखा है कि-
-``जिन्ना स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि उनकी प्रथम निष्ठा राष्ट्रीय हित के प्रति है।

जिन्ना ने अपनी राष्ट्रवादी प्रवृत्ति के कारण ही खिलाफत आंदोलन का विरोध किया। उन्होंने गांधी जी के 1920 वाले असहयोग आंदोलन का भी विरोध किया था, क्योंकि इसमें मुस्लिम तुष्टिकरण सिद्ध हो रहा था।
जिन्ना के राष्ट्रवादी चित्त से ही आगा खान उनका विरोध करते थे।
-द मेमाइर्स आफ आगा खान पृष्ठ ९४

16 अप्रैल 1932 में रेमजे मैकडोनाल्ड के सांप्रदायिक निर्णय का भी जिन्ना ने भरपूर विरोध किया था, परंतु कांग्रेस ने इसे स्वीकार कर लिया। परिणामत: कांग्रेस से पंडित मदन मोहन मालवीय, श्री बापू जी अणे और पंडित परमानंद ने त्याग पत्र दे दिया और कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी बनाकर राष्ट्र सेवा करने लगे।
-और देश बंट गया पृष्ठ ११६
एक बहुत बढ़िया अवसर इस देश ने खो दिया जो श्री लालकृष्ण आडवाणी ने उठाया था। जिन्ना के पंथ निरपेक्षता पर यदि पूरा राष्ट्र बहस में भिड़ जाता तो इन पाखंडियों की पोल खुल जाती जो स्वयमेव भारत का कर्णधार बने हुए हैं। पूरा विश्व इस सत्य को भी जान जाता कि किन-किन कारणों से जिन्ना पाकिस्तान के प्रति समर्पित हो गए। वह जिन्ना जो सुरेंद्रनाथ बनर्जी , लोकमान्य तिलक और गोखले जी को पूजते थे, जबकि उपयुZक्त नेतागण विशुद्ध हिन्दुत्व के पुरोधा थे।

इस बहस के बहाने स्वातंत्रय समर को भी पूरा खंगाल दिया गया होता और सच्चे मोती रत्न जवाहर देश के समक्ष उपलब्ध होते। नकली मुखौटे वाले नंगे होते और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का धर्माधििष्ठत नैिष्ठक शासन तंत्र स्थापित होता।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इस मंत्रदृष्टा राजनेता की जीवनी यदि भारत के अतीत की समीक्षा में कारगर भूमिका अदा कर सकी तो समर्थ भारत का उदय भी यह संसार विस्फारित नेत्रों से देखेगा और तभी ऋषियों वाले भारत का परम वैभवशाली स्वरूप जगद्गुरु के रूप में प्रस्थापित होगा।वंदे त्वां भूदेविं भारत मातरम् के चरणों में इसी प्रार्थना के साथ कि हे देवी, श्री आडवाणी जी की इच्छाओं वाला स्वरूप धारण करें और सबको आशीष दें।

श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को समर्पित


श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के जन्मदिन पर आप सभी पाठको को समर्पित
भारत को अभिमान तुम्हीं पर
भारतीय संस्कृति तव प्राण।

भारतीय जनता की आशा
राष्ट्र भाव का कर दो त्राण।।

झुलेलाल कृपा पूरित तुम
सिद्ध भारती तेरे द्वार।

अनुपम वाक्, लेखनी, चिन्तन,
या, चाल, चलन, आचार।। 2।।

विद्या, वाणिज केंद्र कराची
पश्चिम के भारत की शान।

सहस्रािब्द तक गर्वित भारत
जिसके कारण बना महान।। 3।।

उसी कराची से पाई थी
तुमने भारत का परिचय।

संस्कृत, संस्कृति, राष्ट्र चिरंतन
अटक-कटक है एक दय।। 4।।

मूढ़ नेतृ के दुरभिसंधि ने
तुमसे छिनी कराची थी।

दोनों हाथ कटे भारत के
घोर दर्द उपजाती थी।। 5।।

चार लाख जन के हत्या की
आंखें तेरी साक्षी हैं।

उनके परिजन के आंसू को
तुमने उर में राखी है।। 6।।

हे जसुमति के लालकृष्ण अब
मांग रहा भारत वरदान।

हमें दिला दो सिंध, कराची
हिगुलाज, लाहौर महान।। 7।।

तक्षशिला चाणक्य षिका,
हिन्दुकुश, खैबर, गंधार।

कुभा, सिंधु का समागान तट,
रेशम पथ, पाणिनि आगार ।। 8।।

तेरे माथे दिव्य कीर्ति बन
यह उपलब्धि आएगी।

सावधान! संघर्ष दोहरा
कुंदन सा चमकाएगी।। 9।।

मल्टीनेशनल, सेकुलर,
माक्र्स, मीडिया पाखंडी।

मुल्ला, माओ, मैकालों को
लाल दिखाओ अब झंडी।।10।।

दििग्वजयी अभियान में तेरे
घर के भेदिये घातक हैं।

इन्हें ठिकाने शीघ्र लगा दो।
बाह्य शत्रु शरणागत हैं।। 11।।

लालकृष्ण के यश सौरभ से
भारत मां हरषाएगी।

पुष्टिकरी नवनीत खिलाकर
नव इतिहास बनाएगी।। 12।।
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है