Saturday, April 5, 2025

संबंध मूल्य और जीवन मूल्य ही मानव मूल्य

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
मनुष्य जिस तीव्र गति से उन्नति कर रहा है, उसी गति से उसके संबंध पीछे छूटते जा रहे हैं. भौतिक सुख-सुविधाओं की बढ़ती इच्छाओं के कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं. माता-पिता बड़ी लगन से अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं. उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं. परिवार में लड़कियां हैं, तो वे विवाह के पश्चात ससुराल चली जाती हैं और लड़के नौकरी की खोज में बड़े शहरों में चले जाते हैं. इस प्रकार वृद्धावस्था में माता-पिता अकेले रह जाते हैं. इसी प्रकार शहरों में उनके बेटे भी अकेले हो जाते हैं.
 
संयुक्त परिवार टूटने के कारण एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं. एकल परिवारों के कारण संबंध टूट रहे हैं. संयुक्त परिवारों में बहुत से रिश्ते होते थे. दादा-दादी, ताया-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, नाना-नानी, मामा-मामी, मौसी-मौसा तथा उनके बच्चे अर्थात बहुत से भाई-बहन. बच्चे बचपन से ही इन सभी संबंधों को जानते थे, परन्तु अब एकल परिवारों में माता-पिता और उनके दो या एक बच्चे ही हैं. संयुक्त परिवार टूटने के अनेक कारण हैं. रोजगार के अतिरिक्त परिवार के सदस्यों में बढ़ते मतभेद, कटुता एवं स्वार्थ आदि के कारण भी एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति नितांत अकेला पड़ता जा रहा है. संयुक्त परिवार में समस्याएं सांझी होती थीं. व्यक्ति किसी कठिनाई या समस्या होने पर परिवार के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श कर लेता था. इस प्रकार उसे समस्या का समाधान घर में ही मिल जाता था.

संयुक्त परिवार के बहुत से लाभ हैं. परिवार के प्रत्येक सदस्य की सुरक्षा का दायित्व सबका होता है. किसी भी सदस्य की समस्या पूरे परिवार की होती है. यदि किसी को पैसे आदि की आवश्यकता है, तो पैसे बाहर किसी से मांगने नहीं पड़ते. परिवार के सदस्य ही मिलजुल कर सहयोग कर देते हैं. परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण घर और बाहर के कार्यों का विभाजन हो जाता है. प्रत्येक सदस्य अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य कर लेता है तथा अन्य कार्यों से मुक्त रहता है. ऐसे में उसे अपने लिए पर्याप्त समय मिल जाता है. इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार में रसोई एक होने के कारण खर्च भी कम हो जाता है. उदाहरण के लिए दो या तीन एकल परिवार यदि संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं, तो उन्हें अधिक सामान की आवश्यकता होगी. थोक में अधिक सामान लेने पर वह सस्ता पड़ता है. इसी प्रकार तीन के बजाय एक ही फ्रिज से काम चल जाता है. ऐसी ही और भी चीजें हैं. परिवार के किसी सदस्य के बीमार होने पर उसकी ठीक से देखभाल हो जाती है. परिवार के सदस्य साथ रहते हैं, तो उनमें भावनात्मक लगाव भी बना रहता है. इसके अतिरिक्त बच्चों का पालन-पोषण भी भली-भांति आसानी से हो जाता है. उनमें अच्छे संस्कार पैदा होते हैं. वे यह भी सीख जाते हैं कि किस व्यक्ति के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए. इसमें बड़ों का सम्मान करना, अपनी आयु के लोगों के साथ मित्रवत व्यवहार करना तथा छोटों से स्नेह रखना आदि सम्मिलित हैं.      

आज परिस्थितियां पृथक हैं. मनुष्य किसी भी कठिनाई या किसी संकट के समय स्वयं को अकेला ही पाता है. यदि परिवार में महिला का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो तब भी उसे घर का सारा कार्य स्वयं करना पड़ता है, जबकि संयुक्त परिवार में अन्य महिलाएं होने के कारण उसे आराम करने का समय मिल जाता था. साथ ही उसकी भी उचित प्रकार से देखभाल भी हो जाती थी.    

एकल परिवार में अकेले पड़ जाने के कारण व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है. अवसाद एक मानसिक रोग है. इस अवस्था में व्यक्ति स्वयं को निराश अनुभव करता है. वह स्वयं को अत्यधिक लाचार समझने लगता है. ऐसी स्थिति में प्रसन्नता एवं आशा उसे व्यर्थ लगती है. वे अपने आप में गूम रहने लगता है. वह किसी से बात करना पसंद नहीं करता. हर समय चिड़चिड़ा रहता है. यदि कोई उससे बात करने का प्रयास करता है, तो वे क्रोधित हो जाता है. कभी वह उसके साथ असभ्य अथवा उग्र व्यवहार भी करता है. मनोचिकित्सकों के अनुसार अवसाद के भौतिक कारण भी होते हैं, जिनमें आनुवांशिकता, कुपोषण, गंभीर रोग, नशा, कार्य का बोझ, अप्रिय स्थितियां आदि प्रमुख हैं. अवसाद की अधिकता होने पर व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता है. अवसाद के कारण आत्महत्या करने के अप्रिय समाचार सुनने को मिलते रहते हैं. ऐसे विचलित करने वाले समाचार भी मिलते हैं कि अमुक व्यक्ति ने सपरिवार आत्महत्या कर ली या परिवार के सदस्यों की हत्या करने के पश्चात स्वयं भी आत्महत्या कर ली.   
कोरोना काल में जहां संयुक्त परिवारों के लोग एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहे, वहीं एकल परिवारों के लोग अवसाद का शिकार होने लगे. ‘द लैंसेट पब्लिक हेल्थ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों में अवसाद एवं घबराहट की शिकायतें देखने को मिल रही है. सात दिन या उससे अधिक समय तक कोरोना वायरस संक्रमण से पीड़ित रहे लोगों में अवसाद एवं घबराहट की दर उन लोगों की तुलना में अधिक थी, जो संक्रमित रोगी कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए अर्थात वे अपने परिजनों के मध्य ही रहे. रिपोर्ट के अनुसार सार्स-कोव-2 संक्रमण वाले ऐसे रोगी जो अस्पताल में भर्ती हुए उनमें 16 महीने तक अवसाद के लक्षण देखे गए, परन्तु जिन रोगियों को अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ा, उनमें अवसाद और घबराहट के लक्षण दो महीने के भीतर ही कम हो गए. सात दिनों या उससे अधिक समय तक बिस्तर पर रहने वाले लोगों में 16 महीने तक अवसाद और घबराहट की समस्या 50 से 60 प्रतिशत अधिक थी.

मनोचिकित्सकों के अनुसार अवसाद से निकलने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने परिजनों एवं मित्रों के साथ समय व्यतीत करे. किसी भी समस्या या संकट के समय परिजनों से बात करे. स्वयं को अकेला न समझे. सकारात्मक विचारों वाले व्यक्तियों से बात करे. परिजनों को भी चाहिए कि वे अवसादग्रस्त लोगों में सकारात्मक विचार पैदा करने का प्रयास करें, उन्हें अकेला न छोड़ें, क्योंकि ऐसे लोग आसानी से अपराध की ओर अग्रसर हो सकते हैं. उन्हें उनकी किसी भी नाकामी के लिए तानें न दें, अपितु उनको प्रोत्साहित करें तथा उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएं.

वास्तव में आज तकनीकी ने समस्त संसार के लोगों को जितना समीप कर दिया है, उतना ही एक-दूसरे से दूर भी कर दिया है. मोबाइल के माध्यम से व्यक्ति क्षण भर में विदेश में बैठे व्यक्ति से भी बात कर लेता है. परन्तु मोबाइल के कारण ही लोगों को परिवार के सदस्यों से बात करने का समय नहीं मिल पाता. प्रत्येक स्थान पर लोग अपने मोबाइल के साथ व्यस्त दिखाई देते हैं. परिणामस्वरूप व्यक्ति का अकेलापन बढ़ता जा रहा है. व्यक्ति व्यक्ति से दूर होता चला जा रहा है. आवश्यकता है सामूहिक संवाद की प्रत्यक्ष संवाद मन से भाव से विचार से हमे जोड़ता है दुख :सुख में सहायक होकर साथ होने की अनुभूति प्रदान करता है।

Friday, April 4, 2025

वक्फ संशोधन विधेयक, 2025: हितधारक जुड़ाव के माध्यम से सुधार

 वक्फ संशोधन विधेयक-2025 को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और शासन में कमियों को दूर करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ पेश किया गया था। इन संशोधनों का उद्देश्य अधिक स्पष्टता प्रदान करना, समावेशिता सुनिश्चित करना और वक्फ संपत्तियों के बेहतर उपयोग के लिए प्रशासनिक ढांचे को बेहतर करना है।

8 अगस्त, 2024 को वक्फ बोर्ड के काम को सुव्यवस्थित करने और वक्फ संपत्तियों के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लोकसभा में दो विधेयक, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 पेश किए गए थे।
मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 का प्राथमिक उद्देश्य  मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923 को निरस्त करना है, जो एक औपनिवेशिक युग का कानून है और आधुनिक भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए पुराना और अपर्याप्त हो गया है। निरसन का उद्देश्य  वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में एकरूपता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, इस प्रकार इस निरर्थक कानून के निरंतर अस्तित्व के कारण होने वाली विसंगतियों और अस्पष्टताओं को समाप्त करना है।
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करना है, ताकि वक्फ संपत्तियों के विनियमन और प्रबंधन में मुद्दों और चुनौतियों का निवारण किया जा सके। संशोधन विधेयक भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना चाहता है। इसका उद्देश्य है:
पिछले अधिनियम की कमियों को दूर करना और अधिनियम का नाम बदलने जैसे परिवर्तनों को पेश करके वक्फ बोर्डों की दक्षता में वृद्धि करना
वक्फ की परिभाषाओं को अद्यतन करना
पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार
वक्फ अभिलेखों के प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ाना।



इस विधेयक के विशिष्ट पहलू:
09 अगस्त, 2024 को संसद के दोनों सदनों द्वारा अपनाए गए अलग-अलग प्रस्तावों के माध्यम से उक्त विधेयक को विधेयक की  जांच करने और रिपोर्ट बनाने के जनादेश के साथ एक संयुक्त समिति को भेजा गया था।  संयुक्त समिति में लोक सभा के 21 सदस्य और राज्य सभा के 10 सदस्य शामिल थे।
विधेयक के महत्व और इसके व्यापक निहितार्थों को ध्यान में रखते हुए, समिति ने विधेयक के प्रावधानों पर आम जनता और विशेषज्ञों/हितधारकों और विशेष रूप से अन्य संबंधित संगठनों से विचार प्राप्त करने के लिए ज्ञापन आमंत्रित करने का निर्णय लिया था ।
 पहली बैठक 22 अगस्त, 2024 को हुई  और बैठकों के दौरान जिन प्रमुख संगठनों/हितधारकों से परामर्श किया गया, वे थे:
 
संख्या  
प्रमुख संगठन/हितधारक
 
ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलमा, मुंबई;
 
नागरिक अधिकारों के भारतीय मुस्लिम (आईएमसीआर), नई दिल्ली
 
मुत्ताहेदा मजलिस-ए-उलेमा, जम्मू-कश्मीर (मीरवाइज उमर फारूक)
 
जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया
 
अंजुमन ए शितेवाली दाऊदी बोहरा समुदाय
 
चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना
 
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज, दिल्ली
 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी), दिल्ली
 
अखिल भारतीय सूफी सज्जादानशीं परिषद (एआईएसएससी), अजमेर
 
 मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, दिल्ली -
 
मुस्लिम महिला बौद्धिक समूह - डॉ. शालिनी अली, राष्ट्रीय संयोजक
 
जमीयत उलमा-ए-हिंद, दिल्ली
 
शिया मुस्लिम धर्मगुरु और बौद्धिक समूह
 
दारूल उलूम देवबंद
 
संयुक्त संसदीय समिति ने छत्तीस बैठकें आयोजित कीं, जिनमें उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों, राज्य वक्फ बोर्डों और विशेषज्ञों/हितधारकों के प्रतिनिधियों/सुझावों को सुना। समिति को  भौतिक और डिजिटल दोनों माध्यमों से कुल 97,27,772 ज्ञापन प्राप्त हुए।
वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 की व्यापक समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए, संयुक्त समिति ने भारत के विभिन्न शहरों में व्यापक अध्ययन दौरे किए।
26.09.2024 से 01.10.2024: मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु
09.11.2024 से 11.11.2024: गुवाहाटी, भुवनेश्वर
18.01.2025 से 21.01.2025: पटना, कोलकाता और लखनऊ
समिति ने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जिसमें 284 हितधारकों, 25 राज्य वक्फ बोर्डों, 15 राज्य सरकारों, 5 अल्पसंख्यक आयोग और 20 मंत्रियों/सांसदों/विधायकों/विधान परिषद सदस्यों के साथ बातचीत शामिल थी। इन यात्राओं ने समिति के सदस्यों को हितधारकों के साथ जुड़ने, जमीनी वास्तविकताओं की जांच करने और क्षेत्र-विशिष्ट जानकारी एकत्र करने की अनुमति दी।
वक्फ (संशोधन) विधेयक में 44 खंड हैं और वक्फ संशोधन विधेयक पर संयुक्त समिति (जेसीडब्ल्यूएबी) ने 19 खंडों में परिवर्तन की सिफारिश की है।
संयुक्त समिति ने 31 जनवरी 2025 को लोकसभा के माननीय अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंपी और रिपोर्ट 13 फरवरी 2025 को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखी गई।
प्रस्तुत सिफारिशों का एक उदाहरण:
अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम महाज, उनके उत्थान के लिए काम करने वाली संस्था ने वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संयुक्त समिति के समक्ष अपने सुझाव प्रस्तुत किए।
एक अपीलीय प्रणाली की शुरूआत
वक्फ अभिलेखों का बेहतर प्रबंधन
अतिक्रमण और दुरुपयोग के लिए सख्त दंड
अनियमितताओं में शामिल बोर्ड के सदस्यों की अयोग्यता
वक्फ संपत्ति राजस्व का उचित उपयोग
निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों को सशक्त बनाना
 
समाहार
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट वक्फ संपत्तियों के संतुलित, पारदर्शी और कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। व्यापक परामर्श, अध्ययन दौरों और विचार-विमर्श के माध्यम से, समिति ने विधायी ढांचे को मजबूत करते हुए हितधारकों द्वारा उठाई गई प्रमुख चिंताओं को दूर करने की मांग की है। विधेयक में प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य एक अधिक समावेशी और जवाबदेह प्रणाली बनाना है जो समाज की उभरती जरूरतों के अनुरूप हो।

Thursday, April 3, 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025: विधेयक के लाभ

 

वक्फ क्या है
'वक्फ' की अवधारणा इस्लामी कानूनों और परंपराओं में निहित है। यह एक मुस्लिम द्वारा मस्जिद, स्कूल, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक संस्थानों के निर्माण जैसे धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए किए गए दान को संदर्भित करता है। वक्फ की एक और परिभाषित विशेषता यह है कि यह अविभाज्य है - जिसका अर्थ है कि इसे बेचा, उपहार या विरासत में नहीं दिया जा सकता तथा उस पर कोई बोझ नहीं डाला जा सकता। एक बार वक्फ के रूप में नामित होने के बाद, स्वामित्व वक्फ (वाकिफ) करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को हस्तांतरित हो जाता है, जिससे यह अपरिवर्तनीय हो जाता है। चूंकि अल्लाह हमेशा के लिए है, इसलिए 'वक्फ संपत्ति' भी हमेशा के लिए है।
लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों का समाधान करना
वक्फ (संशोधन) विधेयक का उद्देश्य निम्नलिखित मुद्दों का समाधान करना है -
1. वक्फ संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी
2. वक्फ भूमि अभिलेखों का अधूरा सर्वेक्षण और म्यूटेशन
3. महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों के लिए अपर्याप्त प्रावधान
4. अतिक्रमण सहित बड़ी संख्या में लंबे समय से चल रहे मुकदमे। वर्ष 2013 में 10,381 मामले लंबित थे, जो अब बढ़कर 21,618 हो गए हैं।
5. किसी भी संपत्ति को अपनी जांच के आधार पर वक्फ की संपत्ति घोषित करने की वक्फ बोर्डों की अतार्किक शक्ति।
6. सरकारी भूमि को वक्फ घोषित करने से जुड़े कई विवाद।
7. वक्फ संपत्तियों के उचित लेखा-जोखा और लेखा-परीक्षण का अभाव।
8. वक्फ प्रबंधन में प्रशासनिक अक्षमता।
9. ट्रस्ट संपत्तियों के साथ अनुचित व्यवहार।
10. केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में हितधारकों का कम प्रतिनिधित्व।
 
वक्फ विधेयक का आधुनिकीकरण
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं।
 
I.      वक्फ संपत्ति के रूप में घोषित गैर-मुस्लिम संपत्तियां - वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य विरासत स्थलों और व्यक्तिगत संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा करते हुए वक्फ संपत्ति प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है। विभिन्न राज्यों में वक्फ संपत्ति के दावों को लेकर विवाद देखे गए हैं, जिससे कानूनी लड़ाई और सामुदायिक चिंताएं पैदा हुई हैं। सितंबर 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों में कुल 5973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है। इसके कुछ उदाहरण:
●      तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गांव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गांव पर दावे के कारण अपनी ज़मीन नहीं बेच पा रहा था। इसके चलते वह अपनी बेटी की शादी हेतु लिए गए ऋण को चुकाने के लिए अपनी ज़मीन बेच नहीं सका।
●     गोविंदपुर गांव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के अगस्त 2024 में पूरे गांव पर किए गए दावे के कारण सात परिवार प्रभावित हुए।  यह मामला पटना उच्च न्यायालय में चल रहा है।
●     केरल: सितंबर 2024 में एर्नाकुलम जिले के करीब 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।
●          कर्नाटक: 2024 में वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ जमीन के रूप में नामित करने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद उठे। हालांकि, सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी।
●     उत्तर प्रदेश: राज्य वक्फ बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें उठाई गई हैं।
इसके अलावा, वक्फ (संशोधन) विधेयक पर गठित संयुक्त समिति को वक्फ बोर्डों द्वारा संपत्तियों के गैरकानूनी दावे के बारे में कुछ शिकायतें प्राप्त हुए, जो इस प्रकार हैं:
●      कर्नाटक (1975 और 2020): 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें खेत, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।
●      पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की जमीन पर दावा किया है।
इसके अतिरिक्त, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने सितंबर 2024 में अपनी प्रस्तुति के दौरान संयुक्त संसदीय समिति को सूचित किया कि भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में 108 संपत्तियां, दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में 130 संपत्तियां और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया और मुकदमेबाजी में लाया गया।
II. मुस्लिम महिलाओं और कानूनी उत्तराधिकारियों के अधिकार- विधेयक में स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) और वित्तीय स्वतंत्रता कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर मुस्लिम महिलाओं, विशेष रूप से विधवाओं और तलाकशुदा महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार करने का भी प्रयास किया गया है। इसके अतिरिक्त, विधेयक का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं के लाभ के लिए निम्नलिखित लक्ष्य प्राप्त करना है-
● वक्फ प्रबंधन में पारदर्शिता - भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए वक्फ रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण।
● कानूनी सहायता और सामाजिक कल्याण - पारिवारिक विवादों और उत्तराधिकार अधिकारों के लिए कानूनी सहायता केंद्रों की स्थापना।
● सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान - सांस्कृतिक संरक्षण और अंतर-धार्मिक संवाद को मजबूत करना।

महिलाओं की भागीदारी पारदर्शिता सुनिश्चित करती है और वक्फ संसाधनों को इस दिशा में निर्देशित करती है:
● मुस्लिम लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति
● स्वास्थ्य सेवा और मातृत्व कल्याण
● महिला उद्यमियों के लिए कौशल विकास और माइक्रोफाइनेंस सहायता
● फैशन डिजाइन, स्वास्थ्य सेवा और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण
● उत्तराधिकार विवादों और घरेलू हिंसा मामलों के लिए कानूनी सहायता केंद्रों की स्थापना
● विधवाओं के लिए पेंशन योजनाएं
III. गरीबों का उत्थान
वक्फ धार्मिक, धर्मार्थ और सामाजिक कल्याण की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, खासकर वंचितों के लिए। हालांकि, कुप्रबंधन, अतिक्रमण और पारदर्शिता की कमी के कारण इसका प्रभाव अक्सर कम हो जाता है। गरीबों के लिए वक्फ के कुछ प्रमुख लाभ:
1. पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए डिजिटलीकरण
● एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल वक्फ संपत्तियों की पहचान करेगा, जिससे बेहतर निगरानी और प्रबंधन सुनिश्चित होगा।
● ऑडिटिंग और अकाउंटिंग उपायों से वित्तीय कुप्रबंधन को रोका जा सकेगा और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि फंड का इस्तेमाल केवल कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए किया जाए।
2. कल्याण और विकास के लिए राजस्व में वृद्धि
● वक्फ भूमि के दुरुपयोग और अवैध कब्जे को रोकने से वक्फ बोर्डों के राजस्व में वृद्धि होगी, जिससे उन्हें कल्याणकारी कार्यक्रमों का विस्तार करने में मदद मिलेगी।
● स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आवास और आजीविका सहायता के लिए धन आवंटित किया जाएगा, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ होगा।
● नियमित ऑडिट और निरीक्षण, वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देंगे और वक्फ प्रबंधन में जनता का विश्वास मजबूत करेंगे।
IV. प्रशासनिक चुनौतियों का समाधान-
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025  में निम्नलिखित उपायों के जरिये व्यवस्था में सुधार करने का लक्ष्य है:
● संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाना।
● वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच तालमेल को सुव्यवस्थित करना।
● हितधारकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना।
 
V. पिछड़े वर्गों और मुस्लिम समुदायों के अन्य संप्रदायों का सशक्तिकरण: विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को बेहतर वक्फ शासन और निर्णय लेने के लिए विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों को प्रतिनिधित्व देकर अधिक समावेशी बनाना है-
● विधेयक में राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों में बोहरा और अघाखानी समुदायों से एक-एक सदस्य को शामिल करने का प्रावधान है।
● साथ ही, बोर्ड में शिया और सुन्नी सदस्यों के अलावा पिछड़े वर्गों से संबंधित मुसलमानों का प्रतिनिधित्व होगा।
● नगर पालिकाओं या पंचायतों से दो या अधिक निर्वाचित सदस्यों को शामिल करना, वक्फ मामलों में स्थानीय शासन को मजबूत करना।
● बोर्ड/केंद्रीय वक्फ परिषद में पदेन सदस्यों को छोड़कर दो गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे।
निष्कर्ष:
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 वक्फ प्रशासन के लिए एक धर्मनिरपेक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था तय करता है। जहां वक्फ संपत्तियां धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं, उनके प्रबंधन में कानूनी, वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियां शामिल होती हैं जिनके लिए सुव्यवस्थित शासन की आवश्यकता होती है। वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद (सीडब्ल्यूसी) की भूमिका धार्मिक नहीं बल्कि नियामक है, जो कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करती है और सार्वजनिक हितों की रक्षा करती है। यह विधेयक हितधारकों को सशक्त बनाकर और शासन में सुधार करके देश में वक्फ प्रशासन के लिए एक प्रगतिशील और निष्पक्ष ढांचा तैयार करता है।

वक्फ संशोधन विधेयक- 2025


वक्फ संशोधन विधेयक-2025: भारत में वक्फ का इतिहास
'वक्फ' को मुस्लिम कानून द्वारा पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी चल या अचल संपत्ति के किसी भी व्यक्ति द्वारा स्थायी समर्पण के रूप में परिभाषित किया गया है।

परिचय
भारत में वक्फ कानून का विकास वक्फ संपत्तियों को विनियमित और संरक्षित करने के चल रहे प्रयासों को दर्शाता है, जो महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक महत्व रखते हैं। 1954 के वक्फ अधिनियम से शुरू होकर, वक्फ संपत्तियों को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे में उभरती चुनौतियों का समाधान करने और बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए वर्षों में कई संशोधन हुए हैं। हाल ही में वक्फ संशोधन विधेयक 2025 का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, शासन संरचनाओं में सुधार करना और वक्फ संपत्तियों को दुरुपयोग से बचाना है। इन कानूनी सुधारों ने वक्फ संपत्तियों के प्रशासन को आकार दिया है और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया है।

भारत में वक्फ संपत्तियों का प्रशासन वर्तमान में वक्फ अधिनियम, 1995 द्वारा शासित है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा अधिनियमित और विनियमित किया जाता है। वक्फ प्रबंधन में शामिल प्रमुख प्रशासनिक निकायों में शामिल हैं:
केंद्रीय वक्फ परिषद (सीडब्ल्यूसी) – अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत एक सलाहकार निकाय जो देश भर में वक्फ प्रशासन पर मार्गदर्शन और निरीक्षण प्रदान करता है। इसका वक्फ संपत्तियों पर सीधा नियंत्रण नहीं है, लेकिन नीतिगत मामलों पर सरकार और राज्य वक्फ बोर्डों को सलाह देता है।

राज्य वक्फ बोर्ड (एसडब्ल्यूबी) – ये बोर्ड वक्फ संपत्तियों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं और वक्फ अधिनियम के अनुसार उनके प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग के लिए जिम्मेदार हैं। प्रत्येक राज्य का अपना वक्फ बोर्ड होता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र में वक्फ संपत्तियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता है।

वक्फ ट्रिब्यूनल – वक्फ संपत्तियों से संबंधित विवादों, प्रश्नों और अन्य मामलों के निर्धारण के लिए स्थापित विशेष न्यायिक निकाय।
यह संरचित प्रशासनिक सेटअप वक्फ संपत्तियों के बेहतर शासन को सुनिश्चित करता है और वक्फ से संबंधित विवादों के त्वरित समाधान की सुविधा प्रदान करता है, जिससे प्रणाली अधिक कुशल और पारदर्शी हो जाती है।
वर्षों से, वक्फ संपत्तियों को नियंत्रित करने वाला भारत का कानूनी और प्रशासनिक ढांचा पारदर्शिता, दक्षता और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विधायी अधिनियमों के माध्यम से विकसित हुआ है।

भारत में वक्फ इतिहास का अवलोकन
भारत में वक्फ संपत्तियों के शासन को प्रशासन में सुधार और कुप्रबंधन को रोकने के उद्देश्य से कई विधायी अधिनियमों के माध्यम से विनियमित किया गया है:
मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम, 1913: इस अधिनियम ने मुसलमानों के अपने परिवारों और वंशजों के लाभ के लिए वक्फ बनाने के अधिकार को स्पष्ट और पुष्टि की, जिसमें अंतिम धर्मार्थ उद्देश्य शामिल हैं:
वक्फ प्रबंधन को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाने का उद्देश्य।
तथापि, अधिनियम के कार्यान्वयन के दौरान यह महसूस किया गया कि यह अधिनियम वक्फ के प्रशासन में सुधार करने में कारगर सिद्ध नहीं हुआ।
मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923: वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में उचित लेखांकन और पारदर्शिता सुनिश्चित करके उनके प्रबंधन में सुधार के लिए पेश किया गया।
मुसलमान वक्फ विधिमान्य अधिनियम, 1930: इसने 1913 के अधिनियम को पूर्वव्यापी प्रभाव प्रदान किया, जिससे पारिवारिक वक्फ की कानूनी वैधता को बल मिला।
वक्फ अधिनियम, 1954: वक्फ संपत्तियों के व्यवस्थित प्रशासन, पर्यवेक्षण और संरक्षण के लिए पहली बार राज्य वक्फ बोर्डों (एसडब्ल्यूबी) की स्थापना की गई:
आजादी के बाद ही वक्फ को मजबूत किया गया है।
1954 के वक्फ अधिनियम ने वक्फ के केंद्रीकरण की दिशा में एक मार्ग प्रदान किया।
सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया, एक वैधानिक निकाय 1964 में भारत सरकार द्वारा 1954 के इस वक्फ अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था।
यह केंद्रीय निकाय विभिन्न राज्य वक्फ बोर्डों के तहत काम की देखरेख करता है जिन्हें वक्फ अधिनियम, 1954 की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किया गया था।
वक्फ अधिनियम, 1954 (1959, 1964, 1969 और 1984) में संशोधन: इन संशोधनों का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में और सुधार करना था।
वक्फ अधिनियम, 1995: इस व्यापक अधिनियम ने वर्ष 1954 के अधिनियम और इसके संशोधनों को निरस्त कर दिया:
वक्फ अधिनियम, 1995 को भारत में वक्फ संपत्तियों (धार्मिक बंदोबस्ती) के प्रशासन को नियंत्रित करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
यह वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कर्तव्यों का भी प्रावधान करता है।
यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट के बदले कार्य करता है।
एक ट्रिब्यूनल का निर्णय पार्टियों पर अंतिम और बाध्यकारी होगा. कोई मुकदमा या कानूनी कार्यवाही किसी भी सिविल कोर्ट के तहत नहीं होगी। इस प्रकार, वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर बनाया गया।

वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:
तीन सदस्यीय वक्फ ट्रिब्यूनल का गठन, जिसमें मुस्लिम कानून और न्यायशास्त्र का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति शामिल है।
राज्य वक्फ बोर्डों में दो महिला सदस्यों को शामिल करना।
वक्फ संपत्तियों की बिक्री और उपहार पर प्रतिबंध, अलगाव की गुंजाइश को कम करना।
वक्फ संपत्तियों के लिए लीज अवधि 3 साल से बढ़ाकर 30 साल करना, बेहतर उपयोग को प्रोत्साहित करना।
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025, और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024
प्रस्तावित विधेयक वक्फ प्रशासन का आधुनिकीकरण करने, मुकदमेबाजी को कम करने और वक्फ संपत्तियों के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक व्यापक विधायी प्रयास है।
प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 की कमियों को दूर करना और 2013 (संशोधन) अधिनियम द्वारा पेश की गई विसंगतियों को दूर करना है।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा योजनाएं
कौमी वक्फ बोर्ड तरक्कियाती योजना (क्यूडब्ल्यूबीटीएस) और शहरी वक्फ सम्पत्ति विकास योजना (एसडब्ल्यूएसवीवाई) अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (एमओएमए), भारत सरकार के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है। ये दो योजनाएं राज्य वक्फ बोर्डों के स्वचालन और आधुनिकीकरण के लिए हैं।
क्यूडब्ल्यूबीटीएस के अंतर्गत, वक्फ संपत्तियों के अभिलेखों के कम्प्यूटरीकरण और डिजिटीकरण के लिए जनशक्ति की तैनाती और वक्फ बोर्डों के प्रशासन को बेहतर करने के लिए सीडब्ल्यूसी के माध्यम से राज्य वक्फ बोर्डों को सरकारी सहायता अनुदान (जीआईए) प्रदान किया जाता है।
एसडब्ल्यूएसवीवाई के अंतर्गत, वक्फ संपत्तियों पर वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य परियोजनाएं विकसित करने के लिए वक्फ बोर्डों/वक्फ संस्थाओं को ब्याज मुक्त ऋणों के आगे संवितरण के लिए केन्द्रीय वक्फ बोर्ड को अनुदान प्रदान किया जाता है।
2019-20 से 2023-24 तक क्यूडब्ल्यूबीटीएस और एसडब्ल्यूएसवीवाई के तहत क्रमशः 23.87 करोड़ रुपये और 7.16 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

भारत में वक्फ संपत्तियों का अवलोकन :
WAMSI पोर्टल पर उपलब्ध डेटा के अनुसार, 30 राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों और 32 बोर्डों ने रिपोर्ट किया है कि वहां 8.72 लाख संपत्तियां हैं, जो 38 लाख एकड़ से अधिक भूभाग को कवर करती हैं। 8.72 लाख संपत्तियों में से 4.02 लाख उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ हैं। शेष वक्फ संपत्तियों के लिए, स्वामित्व अधिकार स्थापित करने वाले दस्तावेज़ (डीड्स) WAMSI पोर्टल पर 9279 मामलों के लिए अपलोड किए गए हैं और केवल 1083 वक्फ डीड अपलोड किए गए हैं।



(14 मार्च, 2025 के अनुसार)

Tuesday, April 1, 2025

ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ शमन

 

केन्द्र की मोदी सरकार संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा की बेहतर पूर्व चेतावनी और पूर्वानुमान के लिए प्रौद्योगिकियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने पर विशेष बल दे रही है। सरकार संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा की बेहतर पूर्व चेतावनी और पूर्वानुमान के लिए प्रौद्योगिकियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करती है। केन्द्र सरकार ने विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी देने के लिए नोडल एजेंसियां नामित की हैं। आधुनिक प्रौद्योगिकियों के उपयोग को प्रोत्साहन देने और प्राकृतिक आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली को सुदृण करने के लिए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने वर्ष 2024-2026 की अवधि के लिए "मिशन मौसम" नामक एक बहुआयामी परिवर्तनकारी दृष्टिकोण शुरू किया है। इसका लक्ष्य भारत को "मौसम के प्रति तैयार और जलवायु अनुकूल" राष्ट्र बनाना है।

गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि पूर्व चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना तैयारी उपायों के लिए पूर्वापेक्षित है तथा यह आपदा प्रबंधन के सम्पूर्ण चक्र का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नवंबर 2016 में नई दिल्ली में आयोजित आपदा जोखिम न्यूनीकरण (एएमसीडीआरआर) पर एशियाई मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर) पर दस सूत्री रूपरेखा प्रस्तुत की थी। सर्व-समावेशी रूपरेखा में अनेक घटक सम्मिलित हैं, जैसे आपदा जोखिम प्रबंधन प्रयासों की दक्षता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना और आपदा जोखिम में कमी लाने के लिए स्थानीय क्षमता और पहल पर निर्माण करना।

राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम प्रशमन परियोजना (एनसीआरएमपी) के अंतर्गत तटीय राज्यों में पूर्व चेतावनी प्रणालियां स्थापित की गई हैं, जो हाल के चक्रवातों के दौरान तटीय समुदाय में सतर्कता फैलाने में बहुत सहायक सिद्ध हुई हैं।
सभी चेतावनी एजेंसियों, [भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी), केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस), रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (डीजीआरई), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई)] के एकीकरण के माध्यम से गगन और एनएवीआईसी आदि के उपग्रह प्राप्तकर्ता, एसएमएस, टीवी, रेडियो, भारतीय रेलवे, तटीय सायरन, सेल प्रसारण, इंटरनेट (आरएसएस फ़ीड और ब्राउज़र अधिसूचना) जैसे विभिन्न प्रसार माध्यमों का उपयोग करके सभी 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए भारत के नागरिकों को आपदाओं से संबंधित भू लक्षित प्रारंभिक चेतावनियों/अलर्ट के प्रसार के लिए 354.83 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 'सामान्य चेतावनी प्रोटोकॉल (सीएपी) आधारित एकीकृत चेतावनी प्रणाली' शुरू की गई है।

सामान्य चेतावनी प्रोटोकॉल (सीएपी) प्रणाली में, विभिन्न आपदाओं से संबंधित अलर्ट आईएमडी, सीडब्ल्यूसी, आईएनसीओआईएस, डीजीआरई और एफएसआई जैसी चेतावनी प्रदाता एजेंसियों द्वारा जारी किए जाते हैं और संबंधित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के एसडीएमए द्वारा संचालित किए जाते हैं। चेतावनी क्षेत्रीय भाषाओं में भू लक्षित क्षेत्रों को भेजे जाते हैं। चेतावनी को अनुमोदन/संपादित करने और प्रसार के लिए मीडिया चुनने के लिए आपदा प्रबंधकों के लिए एक वेब-आधारित डैशबोर्ड है। हाल की आपदाओं में इस प्रणाली का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। सीएपी का उपयोग करते हुए अब तक 4500 करोड़ से अधिक एसएमएस चेतावनी प्रसारित की गई हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने नागरिकों को सतर्क/पूर्व चेतावनी संदेशों के तेजी से प्रसार में सुधार करने के लिए अखिल भारतीय, एक सिरे से दूसरे सिरे तक सुरक्षित और अभेद्य आपदा ग्रेड सेल प्रसारण प्रणाली (सीबीएस) के लिए एक परियोजना भी शुरू की है।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के अंतर्गत चंडीगढ़ स्थित रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (डीजीआरई) भी हिमस्खलन शमन प्रौद्योगिकियों के अध्ययन और विकास के लिए नोडल एजेंसी है। डीजीआरई ने 72 हिम मौसम विज्ञान वेधशालाएं और 45 स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्ल्यूएस) स्थापित किए हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) सभी प्रभावित/संभावित प्रभावित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को चक्रवातों सहित नियमित और सटीक मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी बुलेटिन जारी करता है।
आईएमडी बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में विकसित होने वाले चक्रवातों की निगरानी के लिए उपग्रहों, राडारों और पारंपरिक और स्वचालित मौसम स्टेशनों से गुणवत्ता टिप्पणियों के एक सूट का उपयोग करता है। इसमें इन्सैट 3डी, 3डीआर और स्कैटसैट उपग्रह, तट के साथ डॉप्लर मौसम रडार (डीडब्ल्यूआर) और तटीय स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्ल्यूएस), उच्च पवन गति रिकॉर्डर, स्वचालित वर्षा गेज (एआरजी), मौसम संबंधी ब्वॉय और जहाज शामिल हैं।
एनडीएमए क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी आयोजित करता है, जागरूकता कार्यशालाएं आयोजित करता है और समुदाय आधारित जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को बढ़ावा देता है और अंतिम छोर तक संपर्क सुनिश्चित करने के लिए निगरानी और सतर्कता प्रणाली के लिए प्रशिक्षण भी देता है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (डब्ल्यूआईएचजी) ग्लेशियरों की निगरानी करता है और उन कारकों का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है जो खतरों और उससे जुड़े डाउनस्ट्रीम जोखिमों को तेज़ करते हैं ताकि प्रारंभिक चेतावनी क्षमताओं और आपदा तैयारियों को काफी हद तक बढ़ाया जा सके। डब्ल्यूआईएचजी ने उत्तराखंड (2015) और हिमाचल प्रदेश (2018) के लिए ग्लेशियल झील सूची तैयार की है, जिसमें उत्तराखंड में 1,266 झीलें (7.6 वर्ग किमी) और हिमाचल प्रदेश में 958 झीलें (9.6 वर्ग किमी) की पहचान की गई है।

केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) 902 हिमनद झीलों और जल निकायों की निगरानी करता है ताकि हिमनद झीलों और जल निकायों के जल फैलाव वाले क्षेत्रों में सापेक्ष परिवर्तन का पता लगाया जा सके और उन क्षेत्रों की पहचान की जा सके जो इसके निगरानी महीनों के दौरान पर्याप्त रूप से विस्तारित हुए हैं।
केंद्र सरकार ने 150.00 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय पर चार राज्यों अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड में कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओएफ) जोखिम शमन परियोजना (एनजीआरएमपी) को स्वीकृति दे दी है।

एनजीआरएमपी का उद्देश्य विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में जो ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए अतिसंवेदनशील हैं, हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ से जुड़े जोखिमों को कम करना है। एनजीआरएमपी परियोजना के उद्देश्यों में जीएलओएफ और इसी प्रकार की घटनाओं के कारण होने वाली जनहानि को रोकना और आर्थिक हानि तथा महत्वपूर्ण अवसंरचना को हुई क्षति को कम करना, अंतिम छोर तक संपर्क के आधार पर पूर्व चेतावनी और निगरानी क्षमताओं को सुदृढ़ करना, स्थानीय स्तर की संस्थाओं और समुदायों के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से स्थानीय स्तरों पर जीएलओएफ जोखिम न्यूनीकरण और न्यूनीकरण में वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ करना तथा जीएलओएफ जोखिम को कम करने के लिए स्वदेशी ज्ञान और वैज्ञानिक अत्याधुनिक न्यूनीकरण उपायों का उपयोग आदि सम्मिलित हैं। 

सरकार द्वारा अनुमोदित एनजीआरएमपी का एक घटक जीएलओएफ निगराने और पूर्व चेतावनी प्रणाली (ईडब्ल्यूएस) है जिसमें सुदूर संवेदन आंकड़े, निगरानी, चेतावनी/प्रसार के लिए सामुदायिक भागीदारी शामिल है।
सिक्किम में दो स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्ल्यूएस) स्थापित किए गए हैं और सी-डैक, इसरो और अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, अहमदाबाद के सहयोग से ईडब्ल्यूएस की और तैनाती की योजना बनाई गई है ताकि किसी भी जीएलओएफ घटना के मामले में स्थानीय समुदायों को पूर्व चेतावनी दी जा सके।

केन्द्रीय जल आयोग ने ग्लेशियल झीलों के जोखिम सूचकांक के मानदंडों को अंतिम रूप दे दिया है जिसमें ऐसी झीलों की विफलता की संभावना और जीएलओएफ की स्थिति में होने वाली संभावित क्षति के आधार पर उनकी पहचान करने और उनकी रैंकिंग करने के लिए एक संरचित दृष्टिकोण का प्रस्ताव किया गया है।

एनडीएमए के अंतर्गत आपदा जोखिम न्यूनीकरण संबंधी एक समिति (सीओडीआरआर), जिसमें छह हिमालयी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं, ने इन झीलों का सीधे आकलन करने और ईडब्ल्यूएस/अन्य संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक उपायों की स्थापना के संदर्भ में व्यापक न्यूनीकरण रणनीतियां तैयार करने के लिए अभियान भेजने के लिए उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों के एक समूह की पहचान की है।

अक्टूबर, 2023 में तीस्ता-III जलविद्युत बांध दुर्घटना के बाद, सीडब्ल्यूसी ने जीएलओएफ के लिए कमजोर सभी मौजूदा और निर्माणाधीन बांधों की डिजाइन की समीक्षा करने का निर्णय लिया है ताकि संभावित अधिकतम बाढ़/मानक संभावित बाढ़ और जीएलओएफ के संयोजन के लिए उनकी पर्याप्त स्पिलवे क्षमता सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त उन सभी नए बांधों के लिए जीएलओएफ अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है जिनके जलग्रहण क्षेत्र में ग्लेशियल झीलें हैं।
स्रोत PIB 

Monday, March 31, 2025

शक्तिपीठ पाटन देवी माता

  




भारतीय नव वर्ष के पावन अवसर पर शक्तिपीठ पाटन देवी माता (तुलसीपुर) दर्शन का सौभाग्य मिला


संत चरण

 

संत चरण
आध्यात्मिक शिक्षा से व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में असंख्य लोगों के मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत आदरणीय सर्वदेव जी का सानिध्य सुख 
भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है