Monday, April 3, 2017

गाय की रक्षा पर बहस क्यों ?

डॊ. सौरभ मालवीय
वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में गाय का विशेष महत्व है. दुख की बात है कि भारतीय संस्कृति में जिस गाय को पूजनीय कहा गया है, आज उसी गाय को भूखा-प्यासा सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया है. लोग अपने घरों में कुत्ते तो पाल लेते हैं, लेकिन उनके पास गाय के नाम की एक रोटी तक नहीं है. छोटे गांव-कस्बों की बात तो दूर देश की राजधानी दिल्ली में गाय को कूड़ा-कर्कट खाते हुए देखा जा सकता है. प्लास्टिक और पॊलिथीन खा लेने के कारण उनकी मृत्यु तक हो जाती है. भारतीय राजनीति में जाति, पंथ और धर्म से ऊपर होकर लोकतंत्र और पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए. गाय की रक्षा, सुरक्षा बहस का मुद्दा आख़िर क्यों बनाया जा रहा है?

धार्मिक ग्रंथों में गाय को पूजनीय माना गया है. श्रीकृष्ण को गाय से विशेष लगाव था. उनकी प्रतिमाओं के साथ गाय देखी जा सकती है.
बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राह्मण (प्रबुद्ध जन) धेनु (गाय) सूर (देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरित होते हैं. परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण है कि वह सबका आश्रय है. गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास रहता है. इसलिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है. गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते हैं. गाय सरलता शुद्धता और सात्विकता की मूर्ति है. गऊ माता की पीठ में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते हैं. सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.

गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं. मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते हैं, अपितु हमने मां इसलिए कहा है कि गाय की आंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखों से अधिक आकर्षक होता है. अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं. ऋषियों का ऐसा मंतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से आंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है. श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी. स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगति में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है. गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है. इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं. धर्मग्रंथों में सभी गाय की पूजा को महत्वपूर्ण बताया गया है. हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश और देवी पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है.

परोपकारय दुहन्ति गाव:
अर्थात यह परोपकारिणी है. गाय की सेवा करने से से परम पुण्य की प्राप्ति होती है. मानव मन की कामनाओं को पूर्ण करने के कारण इसे कामधेनु कहा जाता है.
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट नमो नम: स्वाहा।।
ॐ सर्वदेवमये देवि लोकानां शुभनन्दिनि।
मातर्ममाभिषितं सफलं कुरु नन्दिनि।।

उल्लेखनीय यह भी है कि ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों के अशुभ फल से मुक्ति पाने के लिए गाय से संबंधित उपाय ही बताए जाते जाते हैं. हिन्दू मान्यता के अनुसार गाय ईश्वर का श्रेष्ठ उपहार है. भारतीय परम्परा के पूज्य पशुओं में गाय को सर्वोपरि माना जाता है. गाय से संबंधित गोपाष्‍टमी भारतीय संस्‍कृति का एक महत्‍वपूर्ण पर्व है. यह कार्तिक शुक्ल की अष्टमी को मनाया जाता है, इस कारण इसका नाम गोपाष्टमी पड़ा. इस पावन पर्व पर गौ-माता का पूजन किया जाता है. गाय की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. गोवर्धन के दिन गोबर को जलाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है. धार्मिक प्रवृत्ति के बहुत लोग प्रतिदिन गाय की पूजा करते हैं. भोजन के समय पहली रोटी गाय के लिए निकालने की भी परंपरा है.

भारत में प्राचीन काल से ही गाय का विशेष महत्व रहा है. मानव जाति की समृद्धि को गौ-वंश की समृद्धि की दृष्टि से जोड़ा जाता है. जिसके पास जितनी अधिक गायें होती थीं, उसे समाज में उतना ही समृद्ध माना जाता था. प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं की अपनी गौशालाएं होती थीं, जिनकी व्यवस्था वे स्वयं देखते थे. विजय प्राप्त होने, कन्याओं के विवाह तथा अन्य मंगल उत्सवों पर गाय उपहार स्वरूप या दान स्वरूप दी जाती थीं.

गोहत्या को पापा माना जाता है, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है.
गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम्।
यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥

भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते।
कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

गाय संसार में प्राय: सर्वत्र पाई जाती है. एक अनुमान के अनुसार विश्व में कुल गायों की संख्या 13 खरब है. गाय से उत्तम प्रकार का दूध प्राप्त होता है, जो मां के दूध के समान ही माना जाता है. जिन बच्चों को किसी कारण वश उनकी माता का दूध नहीं मिलता, उन्हें गाय का दूध पिलाया जाता है.
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में गाय की 30 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें सायवाल जाति, सिंधी, कांकरेज, मालवी, नागौरी, थरपारकर, पवांर, भगनाड़ी, दज्जल, गावलाव, हरियाना, अंगोल या नीलोर और राठ, गीर, देवनी, नीमाड़ी, अमृतमहल, हल्लीकर, बरगूर, बालमबादी, वत्सप्रधान, कंगायम, कृष्णवल्ली आदि प्रजातियों की गाय सम्मिलित हैं. गाय के शरीर में सूर्य की गो-किरण शोषित करने की अद्भुत शक्ति होती है. इसीलिए गाय का दूध अमृत के समान माना जाता है. गाय के दूध से बने घी-मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है. गाय का गोबर उपले बनाने के काम आता है, जो अच्छा ईंधन है. गोबर से जैविक खाद भी बनाई जाती है. इसके मूत्र से भी कई रोगों का उपचार किया जा रहा है. यह अच्छा कीटनाशक भी है.

वास्तव में गाय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की बजाय राजनीति से जोड़ दिया गया है, जिसके कारण इसे जबरन बहस का विषय बना दिया गया. गाय सबके लिए उपयोगी है. इसलिए गाय पर बहस करने की बजाय इसके संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह सड़कों पर विचरती गायों के लिए गौशालाओं का निर्माण कराए. 

Thursday, March 23, 2017

भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य दृष्टिकोण


सौरभ मालवीय
अनादिकाल से ही भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है। प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दांव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गये। आत्मा ओर परमात्मा के गूढ़तर समबन्ध के इस सत्य शोधकों ने कभी भी अन्तिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया। अपना अन्तिम अनुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण 'नेति-नेति' कहकर अपने आगत पीढ़ियों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे। ''नेति-(न+इति, यह अन्तिम नहीं है) नेति'' कहने वालों ने यह उद्धोष ही कर दिया था कि ''आत्मा दीपो भव'' (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयं का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो। इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुध्द ने भी कहा था कि ''किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है अपितु उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखा और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना। उपर्युक्त श्रुति सूत्र को ही उन्होंने पालि भाषा में ''अप्प दीपो भव'' कहा था। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना ही भारतीय संस्कृति की वैचारिक पध्दति रही है।

सनातनकाल से ही ऋषियों, द्रष्टाओं और योगियों द्वारा परीक्षित सत्य ''अद्वैत सिध्दांत'' ही रहा है। वेद, उपनिषद, पुराण, आगम, निगम, शास्त्र, श्रुति, स्मृति, ब्राह्मण, आरण्यक इत्यादि ग्रन्थ अद्वैत दर्शन को ही प्रतिपादित निरूपित करते रह हैं एवं तदनुरूप ही सामाजिक जीवन, संचालित भी होता रहा है। ज्ञाता, ज्ञेय में इतना लीन हो जाय कि केवल ज्ञान ही बच जाय यही अद्वैत का लक्षण था। वैसे ही द्रष्टा, दृश्य और दर्शन, कर्ता, कर्म और कृत्य तथा सेवक सेव्य और सेवा आदि अवस्थाओं में द्वैधी भाव का विलोपन ही अद्वैतवाद है।
चिरकाल से चली आ रही इस -

ब्रह्म सत्य जगन्मिथात्येयोरूपो विनिश्चयम्।
सोऽयं नित्यानित्यवस्तु विवेक: समुदाहत:॥
विवेक चूडामणि
(ब्रह्म ही अन्तिम सत्य है और यह जग मिथ्या या झूठ का भ्रम है इस प्रकार का अविनाशी और नश्वर का विवेक ही उत्तम (अद्वैत) है)

जीवन शैली में अनापश्यक कुछ कर्मकाण्डों के जुड़ जाने पर कुछ रूढियां उत्पन्न हो गयीं और जन-जीवन उन्हीं रूढियों में उलझकर मूल उद्देश्य से भटक गया था। इन्हीं रूढियों के विरोध में कुछ शरीरवादियों ने एक लोकलुभावन विचार दिया, जिसे अल्पांश में ही सही पर जन-समर्थन भी मिला। यह चार्वाक मत था।

भाषा विज्ञानियों के अनुसार चार्वाक शब्द का मूल ''चारू+वाक्'' है, जिसका अर्थ है सुन्दर वाणी। कहां भारतीय जीवन का उद्देश्य परमात्म तत्त्व की प्राप्ति था और कहां चार्वा की चिन्तन It drink and be marry तक ही सीमित था। चार्वाकियों की मूल विचारधारा ही यह थी कि

''यावज्जीवेत् सुखंजीवेत ऋणंकृत्वा घृतं पिवेत।
भस्मीभूतसय देहस्य पुनरागमनं कुत:॥
(जब तक जीना है सुख से जियो, यदि अर्थाभाव है तो कर्ज लेकर भी भोग विलास करो क्योंकि इस नाशवान शरीर का आवागमन अर्थात् पुनजर्न्य कहां है ?) विशुध्द देहवादी चिन्तन।

परन्तु विराट हिन्दू समाज ने कभी भी चार्वाकियों के विरूध्द कोई ''फतवान्न जारी नहीं किया अपितु दर्शन के विचार से चार्वाक मत को भी अध्ययन अध्यापन और शोध का विषय मान लिया गया।
चूंकि सत्य सनातन अद्वैत मत ही मूल था अतएवं सभी अद्वैत से छिटककर ही अपना वैचारिक अभियान चला रहे थे। इन्हीं अभियानों में आज के 2500 वर्षों पूर्व महात्मा बुध्द ने एक अत्यंत सबल विचार बहाया। फलस्वरूप अद्वैत मत की जड़ें हिल गयी और जन-जन शून्यवाद स्थापित हो गया। कर्मकांडों और रूढियों से त्रस्त समाज बौध्द मत की खुली हवा में श्वासोच्छ्वास लेने लगा था। परन्तु भारतीययों के अन्तर्प्रज्ञा में अनुस्यूत वैचारिक स्वातन्त्र्य, बौध्दमत को भी सामी सोच वाला (Semitic) नहीं बनने दिया। बुध्दवाद में भी धर्म, विनय, मात्तिका, अभिधम्म, निकाय (अट्ठारह प्रकार के), वैभाषिक, भैरवी चक्र, स्थविरवाद, स्वस्तिवाद, महायान (नागार्जुन का), हीनयान, सौतांत्रिक, योगाचार, माध्यमिक, वज्रयान, वज्रयानों में भी कमरीपा, पनहीपा, ओखरीपा इत्यादि अनेक भेद उत्पन्न हो गये। अपने जीवन काल के अस्सी वर्षों तक बोलते रहे। भारत के सांस्कृतिक केन्द्र काशी (वाराणसी) के लगभग 400 किमी लम्बे और 150 किमी चौड़े भू-भाग में उस समय चालीस हजार लोग बौध्द मत के परिव्राजक बन चुके थे। अनुमान है कि उस समय उस क्षेत्र (अंग, बंग लिच्छवी, वैशाली, पाटलिपुत्र, कुशीनारा, काशी, श्रावस्ती, कोशल आदि) की जनसंख्या लगभग दो लाख थी।

अनेकानेक राजे, महाराजों द्वारा पालित-पोषित बौध्द धर्म (जन धर्म) को समूल उखाड़ने के लिए प्रख्यात दार्शनिक आचार्य कुमारिल भट्ट ने बौध्दिक दिग्विजय का दिव्य अभियान चलाया। एक वार्ता के दौरान आचार्य कुमारिल भट्ट काशी नरेश की कन्या को वचन दिया था कि -

''मा रोदिर्वरारोहे भट्टाचार्योडिस्म भूतले''
(एक बार काशी नरेश की पुत्री वैदकि धर्म के उध्दार के लिए रोते हुए आचार्य श्री से अपना दु:ख कहा था इसी पर आचार्य श्री कुमारिल भट्ट ने कहा कि मत रोओ! अभी कुमारिल भट्ट इस भूतल पर है)

आचार्य श्री कुमारिल भट्ट अद्वैत स्थापना का जो अखण्डदीप प्रज्ज्वलित किया था उसी के प्रकाश में आचार्य शंकर ने बौध्द मत के जड़ में मट्ठा डाल दिया। सुदूर दक्षिण (केरल प्रान्त के कांलडी ग्राम) से चलकर उस साधनहीन विचारक ने यान्धाता क्षेत्र में पूज्य आचार्य श्री गौड़पाद से दीक्षित होकर सम्पूर्ण सांस्कृतिक भारत को मंथ डाला। आनन्दगिरि और माध्वाचार्य प्रणीत ''शंकर दिग्विजय'' के अनुसार शंकराचार्य ने अवन्तिका से  द्वार का, पुरूषपुर (पेशावर), साकला (स्यालकोट, मिनांडर की राजधानी, कपिश क्षेत्र (कुभापार हिन्दुकुश भाग) खैबर दर्रा तक, अमरनाथ, शंकराचार्य पर्वत, मार्तण्ड, बदरीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, नन्दनवन, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, काण्ठमण्डपम (काठमाडू), मिथिला,परशुराम कुंड, कामरूप, उत्कल, कलिंग, पुरी, कन्याकुमारी, श्री शैलभ होकर समग्र भारतमाता की प्रदक्षिणा पूर्ण की। अपने बत्तीस वर्ष की अल्पायु में भगवत्पाद शंकर ने ''शरीरक भाष्य'' (ब्रह्मसूत्र) समेत लगभग अठहत्तर पुस्तकें गद्य और पद्य में लिखी। उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य पर आचार्य वाचस्पति मिश्र (मिथिला, बिहार) ने अद्वितीय ग्रन्थ ''भामति'' लिखा।

पूज्य शंकराचार्य ने भारत की सांस्कृतिक रक्षा हेतु देश के चारों कोनों पर चार मठ (द्वारका पश्चिममाम्नाय, बदरी उत्तरामनाथ, पुरी पूर्वान्नाय और शगेरी दक्षिणाम्राय स्थापित किये। बावन (52) मणियों की स्थापना की। दशनामी समप्रदाय बनाए। बारह छावनियों का सृजन किया। समाज में व्याप्त अनेकानेक कुरीतियों को दूर करते हुए अपने प्रचंड बौध्दिक तेज से पुन: अद्वैत मत को प्रतिष्ठित किया। उनके ही जीवन काल में भारत से बौध्दमत उखड़ गया। लुम्बिनी, गया राजगृह वैशाली, काशी (सारनाथ) और कुशीनगर में एक भी व्यक्ति (स्थानीय) बौध्द नहीं बच गया। इन सबके बावजूद शंकराचार्य ने सवयं ही महात्मा बुध्द को भगवान् विष्णु के दशावतारों में एक ''सकृपावतंश'' (नौवां अवतार) घोषित किया और कहा

''वनजौ वनजौ खर्व: त्रिरामी सकृपोडकृप:।
अवतारा: दशैवैते कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्॥

(जल के दो अवतार मत्स्य और कूर्म (कच्छप), वन के दो अवतार नृसिंह और वाराह) शूकर वामानावतार, तीन राम, परशुराम, श्रीराम, बलराम, सकृपावतार (बुध्द) और कल्कि अवतार ये ही दशावतार है। श्रीकृष्ण भगवान तो साक्षात् श्री मन्नारायण परमात्मा है।

परन्तु किसी भी बौध्द राजा या व्यक्ति ने उनके विपरीत कोई भी अशोभनीय टिप्पणी नहीं की, अपितु जनगण के द्वारा उन्हें जगदगुरू की उपाधि से सम्मानित किया गया। बत्तीस वर्षों में ही वे भारत के पांच हजार वर्षों का सांस्कृतिक जीवन जीये। एक-एक व्यक्ति के वे पूजनीय अर्चनीय महनीय बन गये।
जगद्गुरू शंकर का भी यह अद्वितीय अभियान कोई अन्तिम बिन्दु तो था नहीं। लगभग तीन शताब्दियों पश्चात् एक अन्य दार्शनिक श्री मध्वाचार्य ने उस परम प्रतिष्ठित शंकरमत (अद्वैतवाद) का खंडन कर दिया और एक नवीन विचार द्वैतवाद की स्थापना की। आचार्य श्री मध्व के इस गहन वैचारिक तत्व द्वैतवाद का भी खंडन काशी की एक श्रेष्ठतम विभूति आचार्य श्री मधुसूदन सरस्वती ने अपनी पुस्तक ''सिध्दांत बिन्दु'' में कर दिया और पुन: अद्वैतवाद को स्थापित किया। भक्ति तत्व के प्रेमी श्री मधुसूदन सरस्वती ने ही लिखा कि -

वंशी विभूषित करान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरूण बिम्बाफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु सुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परम किमपि तत्वमहं न जाने॥

हिन्दू संस्कृति के एक अन्यतम उध्दारक पूज्यवर्य श्रीमद गोस्वामी श्री तुलसीदास जी के सम्मान में उनहोंने लिखा कि -

''आनन्द कानने ह्यस्मिन जगमस्तुलसी तरू:।
कविता मंजरी भांति राम भ्रमर भूषिता:॥''

ऐसे सर्वसम्मानित सिध्दांत बिन्दु के तर्कों का भी खंडन एक दार्शनिक ने अपने दिव्य ग्रंथ ''न्यायामृत'' में कर दिया और पुन: द्वैतवाद का श्रेष्ठत्व सिध्द कर दिया। खंडन, मंडन और प्रतिस्थापन की यह अद्भुत शृंखला अनवरत चलती रही एवं भारतीय जन-मानस उन सबको पूजनीय भाव प्रदान करता रहा।

लगभग पांच दशकों में ही द्वैतवाद के न्यायामृत का खंडन ''अद्वैत सिध्दि'' नामक एक अन्य पुस्तिक में कर दिया गया और अद्वैत मत स्थापित हो गया। भगवान की रचना में एक से बढ़कर एक सिध्द महारथी पड़े हुए हैं और अद्वैतसिध्दि के तर्कों का खंडन ''न्यायामृत तरगिंणी'' नामक ग्रन्थ में कर दिया गया। कुछ ही वर्षों बाद द्वेतमत के इस समीचीन तर्कों का भी खंडन ''गौड़ ब्रह्मनंदी'' ग्रन्थ में करके अद्वैत मत का विजयध्वज लहराया गया। परन्तु इस अश्वमेद्य यज्ञ का घोड़ा भी ''न्याय भास्कर'' द्वारा रोक लिया गया और द्वैतमत के इन अद्यतन तर्कों ने बौध्दिक वर्ग को चमत्कृत कर दिया। अन्तत: विचारकों की अनंत शृंखला के एक महारथी ने ''न्यायेन्दु शेखर'' में न्यायभास्कर की अजेयता भी खंडित कर दी और अद्वैतवाद को शीर्षस्थ बना दिया। इस प्रकार द्वैत और अद्वैत के इस वैचारिक अभियान में हिन्दू समाज बौध्दिक उत्कर्ष और बहुआयामी सम्भावनाओं को आत्मसात करते हुए आनंदित होता रहा।

अद्वैत की मुख्यधारा के इतर भी अनेक विचार आये। द्वैताद्वैतवाद, त्रेतावाद, विशिष्टाद्वैतवाद, एकेश्वरवाद बहुदेववाद, ज्ञानाश्रयी, कर्माश्रयी, प्रेमाश्रयी, शक्तवाद, सौर्यवाद, शैववाद, वैष्णववाद, रामाश्रयी, कृष्णाश्रयी, सखीवाद, श्री वैष्णवी, वल्लभी इत्यादी अनेक विचार स्रो प्रस्फुटित हुए और सबके सब हिन्दुत्व की महागाथा में मिलकर भारतीय समाज को पवित्र करते रहे। किसी भी मतावलम्बी ने कभी भी अपने विपरीतवादियों को वैयक्तिक स्तर पर कुछ भी क्षुद्र टिप्पणी नहीं की। यही भारत का सर्वसमावेशक चित्त रहा है।
इसके विपरीत ईसाई मत में जिसने भी स्वतंत्र बौध्दिक प्रयास किया तो उसे मृत्योन्मुखी ही कर दिया गया। स्वयं जीसस क्राइस्ट को भी क्रास में बड़ी-बड़ी कीलें ठोककर फांसी इसीलिए दी गयी कि वे योरूसलम में तत्कालीन पुजारियों और पुरोहितों तथा रूढियों का विरोध कर रहे थे। उन्हीं पुरोहितों ने राजा पाइलेट पाण्टियस से मिलकर जीसस क्राइस्ट को क्रूरतम मृत्यु दण्ड दिलवाया। उसी परम्परा में कुछ ही शताब्दि बाद ''टालोमी'' नामक अत्यंत मेधावान खगोलविद को विषपान करने का आदेश दिया गया। टालोमी की केवल यही गलती थी कि उसने कह दिया था कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसकी प्रदक्षिणा करती है, जबकि बाइबिल में लिखा है कि धरती स्थिर है और सूर्य धरती का चक्कर लगाता है। केवल टालोमी ही नहीं अपितु ईसा के लगभग डेढ़ हजार वर्षों में गैलिली गैलिलियों तक शताधिक वैज्ञानिकों और विचारकों की ऐसी जघन्यतम हत्याएं की गयी कि समग्र समाज ही जड़वत हो गया। वैचारिक प्रतिबन्धों के कारण आत्म चिंतन का कोई द्वार हीं नहीं खुल सका। ईसाई मत के मानने वाले स्वयंघोषित ये सभ्य सोलहवी शताब्दी एक तो स्त्रियों को मानव मानते ही नहीं थे। क्योंकि बाइबिल में लिखा है कि स्त्रियों की उत्पत्ति पुरूष की पसली (वक्ष की अस्थि) से हुई है वह तो केवल पुरुषों के उपभोग की वस्तु है। और तो और महिलाओं में भी विचार क्षमता है यह बात उन आत्ममुग्ध ईसाईयों ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्वीकार की और 1911 में उन्हें मताधिकार दिया गया। लगभग दो सौ वर्षों तक (1094 से 1292 तक) उनका धर्मयुध्द (क्रूसेड) चलता रहा, जिसमें लाखों अबोध बालकों की भी क्रूरतम हत्याएं की गयी।

रही बात इस्लाम की तो उसके सपने में भी वैचारिक स्वतंत्रता का सवाल ही नहीं उठता। लगभग 1400 वर्षों पुरानी मान्यता में भी युगानुकूल सोच के लिए कोई स्थान नहीं है। मिश्र के एक उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार विजेता ''नकीब महफूज'' को तेइस बार सजा-ए-मौत का फतवा जारी किया गया है। इस भय से उसकी जिन्दगी मौत से भी बदतर हो गई है वे अब एक जिन्दा लाश बन गए हैं। ईरान के एक विख्यात लेखक ''रहमान हतीफी'' के हाथ की नसों को परवर दीगार अल्लाह के सिपाहे-सयाबों ने चीर दिया और पैर बांधकर सड़क पर फेंक दिया। असहय पीड़ा झेलते हुए तड़प-तड़पकर अल्लाह के प्यारे हो गए। ''मेंहदी शेकरी'' को एक कविता लिखने के कारण जारी कत्ल के फतवे में उनकी दोनों आंखों में इस्लामी रहनुमाओं ने गोली मार दी और अपने को जन्नत-ए-हूर के काबिल घोषित किया। पिछले दस वर्षों में ही केवल इरान में 60 कवियों और लेखकों के क्रूरतम ढंग से दोजख रसीद कर दिया गया। ब्रिटिश मूल के मुस्लिम लेखक ''अनवर शेख'' एक महत्वपूर्ण शोधग्रन्थ लिखने के कारण अपमान और दहशतगर्दी के साये में जिन्दगी जी रहे हैं। उनकी रचना ''इटरनिटी'' पर जारी फतवे को कब कोई इस्लाम पर दीन-ओ-इमान रखने वाला जेहादी अमल में ला दे कहा नहीं जा सकता सैटनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूशदी की कहानी तो प्रसिध्द ही है। रूशदी के माफीनामे के बावजूद भी फरमान-ए-मौत के फतवे अभी वापस नहीं हुए हैं और कोई भी अल्लाह का बन्दा उसे तामील कर सकता है। बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की लज्जा से इस्लाम इतना लज्जित हुआ कि नसरीन की आजादी ही बन्धक बन गयी है। अपनी पुस्तक ''द्विखण्डित'' में उन्होंने इस्लामी इस्लामी अलिमो, फाजिलो, हाजियो, गाजियो की करतूत का जो वर्णन किया है उसे पढ़ने पर पाठकों को ही लज्जा आती है। पाकिस्तानी लेखिका ''तहमीना दुर्रानी'' ने अपनी पुस्तक ''ब्लासफेमी'' में पाकिस्तानी जमींदारों नजूलियो और मुल्लाओं के कुकृत्य का इतना लोमहर्षक वर्णन किया है कि इस सत्य को वे पचा नहीं पाए और तहमीना सजा-ए-मौत के खौफ में निर्वासित पड़ी हुई है। एक उदारवादी कानून मंत्री ''इकबाल हैदर'' ने एक विवादास्पद कानून ''शतिम-ए-रसूल'' में आंशिक तब्दीली की राय जाहिर की परन्तु सदन ने इंकार कर दिया। लेकिन पाकी परवर दीगार के पाक बन्दों ने खुदा के रसूल में अखलाक रखते हुए फरमाने मौत सुना दिया और एक दीनी इल्हाम वाले बन्दे ने उन्हें इनाम-ए-कत्ल से उनका जनाजा सजा दिया। एक अन्य पाकिस्तानी नागरिक जो तहे दिल से इस्लाम में यकीन रखता था लेकिन उसकी तहेदिली मुल्लाओं को नागवार लगी और उसके विरूध्द फतवा निकल गया। इखवान-उल-मुसलामीन वालों ने उनके हाथ और पैर की हव्यिों के सभी जोड़ तोड़ दिये उसके बाद सरेआम पत्थरों से मारकर बेहाल कर दिया। इतने पर भी उन्हें सब्र नहीं हुआ और उन्हें मोटर साइकिल में बांधकर दो घंटे तक गुजरावाला की गलियों में घसीटा गया। कुरान और इस्लाम पर एहतराम रखने वाले हजारों लोग इस वाकये के चश्मदीद थे पर यह घटना किसी को भी नागवार नहीं लगी। अन्त में ''हहफीज सज्जाद तारीक'' की लाख को जानवरों की दावत के लिए अधजला ही खुले मैदान कर दिया गया। अभी कुछ ही दिनों पूर्व की बात है विश्वविख्यात चित्रकार वान गाग के पुत्र ''थिपो'' को धर्मान्ध जाहिलों ने गोली मार दी। वे पश्चिमी सिने जगत के सम्मानित हस्ताखर थे। इन जाहिल जालिमों की नजर में वे अपनी फिल्मों से शातिम-ए-रसूल कर रहे थे।

लगभग आधे से अधिक विश्व पर ओर पौन शताब्दी से अधिक काल तक शासन करने वाली साम्यवादी पध्दति में भी वैचारिक स्वतंत्रता का कोई अस्तित्व ही नहीं है। संसार के सबसे बड़े भवनों वाले विश्वविद्यालय मास्कों विद्यापीठ (तैंतीस तल वाले) में भी अध्ययन अध्यापन की परिसीमा साम्यवादी ही है। कोई भी विषय साम्यवादी ढांचे में ही सोचना या बोलना होता है। राजनीतिक स्तर पर भ्ज्ञी केवल एक ही विचारधारा वाला संगठन रहेगा उसके इतर सोचने वाले जार निकोलाई की गति प्राप्त करेंगे। साम्याद से अलग सोच वाले के साथ इतना क्रूरतम दर्ुव्यवहार किया गया कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें संसार के सर्वाधिक ठंडे साइबेरिया के बर्फानी क्षेत्र में ले जाकर उन्हीं बन्दियों से उनकी कब्रें खुदवाकर और उनको निर्वस्त्र करके गोली मारी जाती थी। उन अभागे कैदियों के वस्त्र दूसरे अभागों के काम आते थे। उनकी कब्रों को भी अगले दल के कैदी ही भरते थे। इस प्रकार यह हत्याओं का चक्रीय क्रम चलता रहा। विश्व प्रसिध्द नोबेल पुरस्कार अस्वीकार करने वालों में सर्वाधिक रूसी नागरिक रहे हें क्योंकि साम्यवादी सोच उन्हें राजकीय स्तर पर ऐसा करने को बाध्य करती थी। ट्राट्सकी और बोरिस एल। पास्टरनाक जिस शरीरिक और मानसिक त्रासदी से गुजरे वह अत्यंत शर्मसार करता है। डा. जिवागो के लेखक के साथ अन्यतम दर्ुव्यवहार हुआ एक संगठन के तानाशाही आचरण ने समग्र समाज को कुंठित कर दिया। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को के.जी.बी. का एजेंट लगता था। आज की बौध्दिक यप से सुधारवादी कहना साम्यवाद और एजिल का अपमान उतनी बड़ी गाली नहीं जिना सुधारवादी होना। इतना ही नहीं ग्लासनोश्त और पेरेस्त्रोइका के जनक और रूसी राजनीति के शीर्षपुरूष डॉ. मिखइल गोर्वाचोव अपनी पत्नी डॉ. रईसा समेत न्यूयार्क के विश्वविद्यालय में अध्यापन करते है। उन्हें साम्यवादी शिक्षा संस्थानों में घुटन अनुभव हो रही थी। लगभग तीन करोड़ पुस्तकों वाले संसार के सबसे बड़े ग्रन्थागार में भी प्रतिगामी लेखकों के लिए स्थान नहीं है।

ये साम्यवादी विचारों वाले बुर्जुआ भी ''बाबा वाक्य प्रमाणम्'' के अनुसार मान लिये है कि घोर दरिद्रय और अहंकारी जिद्दी चित्त वाले कार्ल मार्क्स ने जो कुछ भी कहा है वह अन्तिम सत्य है। उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन परिवर्ध्दन अक्षम्य अपराध है।

जर्मनी में तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक वातावरण के कारण कार्ल मर्ाक्स को किसी विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य नहीं मिला क्योंकि उनके पिता एक यहूदी पुजारी थे और उन दिनों जर्मनी में यहूदियों के विरोध में सारा देश उग्र हो गया था। कार्ल मार्क्स ने इसे धार्मिक मामला माना और घोषित कर दिया कि धर्म अफीम से भी ज्यादा खतरनाक बात है। बस मार्क्स के इसी धार्मिक समझ पर साम्यवाद टिका है।

अनवर शेख, सलमान रूशदी और तहमीना दुर्रानी समेत अनेक लेखकों ने तो खुली चर्चा की मांग भी की थी परन्तु इस्लाम में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। चौदह सदी पूर्व अत्यन्त तपिश और रेतीले वातावरण में जो बात लिख दी गयी उसके औचित्यानौचित्य पर चर्चा की इस्लाम और अल्लाह की तौहीन माना जाता है। जो बातें कुरान या बाइबिल में भौगोलिक, स्थानीय जीवन व्यवहार और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के बारे में भी लिखी गयी उनमें देशकाल में परिवर्तन पर भी तदनुरूप बदलाव अधार्मिक माना जाता है। उच्चतापमान वनस्पति विहीन वातावरण औश्र अल्प जलीय क्षेत्र में जो नियम मुसिलम समाज के लिये बने थे वे ही नियम इस्लामवादियों को हजारों नदियों वाले एवं सदाबहारी वनाच्छादित भारत में या अतीव शीतकारी दक्षिणी रूस में भी मानने होंगे अन्यथा यह कुफ्र होगा और वे बन्दे अल्लाह की नियमत के हकदार नहीं होंगे।

आखिर सामी सोच वाले लोग विचार-विमर्श या शास्त्रार्थ से घबराते क्यों है ? इसका मूलकारण यही है कि इन्हें अपने विचारों की सत्यता पर जरा भी ेयकीन हीं है। वे जानते है। कि शास्त्रार्थ में उन पाखंडी विचारों की चूलें हिल जाएंगी और व ताश के महल जैसे भरभरा कर बिखर जाएंगे। यदि उन्हें लगता है कि वे ठीक हैं तो उनके अध्येता अराजकता और आतंकवादी फतवों को कूड़ेदान में फेंककर लज्जा, इटरनिटी, ब्लासफेमी, सैटनिक वर्सेज, द्विखण्डित, थियो वानगाग समेत सभी विषयों पर व्यापक प्रत्युत्तर लिखे, विभिन्न संचार माध्यमों पर खुला शास्त्रार्थ करें क्योंकि आज के इस वैज्ञानिक युग में -
''अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फसला।
जिस दिये में जान होगी वह दिया रह जाएगा।''

Saturday, March 11, 2017

होली आई रे

डॊ. सौरभ मालवीय
फागुन आते ही चहुंओर होली के रंग दिखाई देने लगते हैं. जगह-जगह होली मिलन समारोहों का आयोजन होने लगता है. होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं. विदेशी लोग भी होली खेलते हैं. सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष महत्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.

होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है. होली खुशियों का पर्व है, इसे शोक में न बदलें.

Tuesday, February 28, 2017

Dr. Sourabh Malviya


Born in Patnejee  village of  Deorai district of Uttar Pradesh, Dr. Sourabh Malviya has been associated with movements in the field of  the social change and the national constructions from child hood. He has great impact of the teachings and  philosophy of Jatatguru Shankaracharya  and  Dr. Baliram Keshav Hedgewar. He  has his own explicit ground of thoughts. Dr. Malviya has done his Ph D  on the “Cultural Nationalism and Media” which is in itself an experimental  approach.  He continues his expressive writing on national and regional magazines and newspapers beside regular participation in the television and radio discussion. Keeping in view  his aptness in the nationalism and other media concerns, he has been honoured with several awards and the prizes including prestigious MotiBA  Naya Media Samman, Vishnu Prabhakar Patrikarita Samman and Pravakta Dot Com Samman. Dr. Sourabh Malviya is currently Assistant Professor in Makhanlal Chaturvedi National University  of Journalism and Communication, Bhopal, Madhya Pradesh and posted at its Noida Campus.
He can be contact on:

Mobile : 8750820740
Email : malviya.sourabh@gmail.com
drsourabhmalviya@gmail.com
Website : sourabhmalviya.com

C-56/4, Sector 62, NOIDA- 201301
Uttar Pradesh
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Tuesday, January 31, 2017

फिर आया वसंत धरती पर

डॊ. सौरभ मालवीय
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर
कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर की उक्त पंक्तियां वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाती हैं. प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत  ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.

वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है.  माघ माह की अनेक विशेषताएं हैं. इस माह को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है. शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा अत्यंत प्रबल रहता है. गुप्त नवरात्री सिद्धी,साधना,गुप्त साधनाके लिए मुख्य समय है. उत्तरायण सूर्य अर्थात देवताओं का दिन इस समय सूर्य देव पृथ्वी के अत्यधिक निकट रहते हैं. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है.  कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष महत्व है.

प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.

वसंत का धार्मिक महत्व भी है.  वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी.  शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.

मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.
"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।

अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.

पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.

वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.
इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.

वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है.

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।

वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए. जीवन निरंतर चलते रहने का नाम है, यही वसंत हमें बताता है.

Tuesday, January 10, 2017

स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लें युवा

राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी पर विशेष 
-डॊ.सौरभ मालवीय
युवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है. युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं. युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं. युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं.  युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं. उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है. देश के स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया था. परंतु देखने में आ रहा है कि युवाओं में नकारात्मकता जन्म ले रही है.  उनमें धैर्य की कमी है. वे हर वस्तु अति शीघ्र प्राप्त कर लेना चाहते हैं. वे आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम की बजाय शॊर्टकट्स खोजते हैं. भोग विलास और आधुनिकता की चकाचौंध उन्हें प्रभावित करती है. उच्च पद, धन-दौलत और ऐश्वर्य का जीवन उनका आदर्श बन गए हैं. अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने में जब वे असफल हो जाते हैं, तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. कई बार वे मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाते हैं. युवाओं की इस नकारत्मकता को सकारत्मकता में परिवर्तित करना होगा. उन्हें स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लेनी होगी. उल्लेखनीय है कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलाई. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उनके बारे में कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं."

स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था. उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे.  उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की घरेलू महिला थीं. वह बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि के थे. उनके घर में नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा-पाठ होता था. साथ ही नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था. परिवार के धार्मिक वातावरण का उन पर भी प्रभाव गहरा पड़ा. वह वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से अत्यधिक प्रभावित थे. उन्होंने अपने गुरु से ही यह ज्ञान प्राप्त किया कि समस्त जीव स्वयं परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है.

स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया.  पहली बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था. संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी. अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे. भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है. इस दिन देश भर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में कई प्रकार के कार्यक्रम होते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, विभिन्न प्रकार की स्पर्धाएं आयोजित की जाती है, व्याख्यान होते हैं तथा विवेकानन्द साहित्य की प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं.
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था-
 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।'
अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ.'

भारत एक विकासशील और बड़ी जनसंख्या वाला देश है. यहां आधी जनसंख्या युवाओं की है. देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है. यहां के लगभग 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं. यह स्थिति वर्ष 2045 तक बनी रहेगी. विश्व की लगभग आधी जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है. अपनी बड़ी युवा जनसंख्या के साथ भारत अर्थव्यवस्था नई ऊंचाई पर जा सकता है. परंतु इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आज देश की बड़ी जनसंख्या बेरोजगारी से जूझ रही है. भारतीय संख्यिकी विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में बेरोजगारों की संख्या 11.3 करोड़ से अधिक है. 15 से 60 वर्ष आयु के 74.8 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, जो काम करने वाले लोगों की संख्या का  15 प्रतिशत है. जनगणना में बेरोजगारों को श्रेणीबद्ध करके गृहणियों, छात्रों और अन्य में शामिल किया गया है. यह अब तक बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या है. वर्ष 2001 की जनगणना में जहां 23 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, वहीं 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई. बेरोजगार युवा हताश हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में युवा शक्ति का अनुचित उपयोग किया जा सकता है. हताश युवा अपराध के मार्ग पर चल पड़ते हैं. वे नशाख़ोरी के शिकार हो जाते हैं और फिर अपनी नशे की लत को पूरा करने के लिए अपराध भी कर बैठते हैं. इस तरह वे अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं. देश में हो रही 70 प्रतिशत आपराधिक गतिविधियों में युवाओं की संलिप्तता रहती है.

युवाओं के उचित मार्गदर्शन के लिए अति आवश्यक है कि उनकी क्षमता का सदुपयोग किया जाए.  उनकी सेवाओं को प्रौढ़ शिक्षा तथा अन्य सराकारी योजनाओं के तहत चलाए जा रहे अभियानों में प्रयुक्त किया जा सकता है. वे सरकार द्वारा सुनिश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के दायित्व को वहन कर सकते हैं. तस्करी, काला बाजारी, जमाखोरी जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने में उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं. युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाया जाए. राष्ट्र निर्माण का कार्य सरल नहीं है. यह दुष्कर कार्य है. इसे एक साथ और एक ही समय में पूर्ण नहीं किया जा सकता. यह चरणबद्ध कार्य है. इसे चरणों में विभाजित किया जा सकता है. युवा इस श्रेष्ठ कार्य में अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार भाग ले सकते हैं. ऐसी असंख्य योजनाएं, परियोजनां और कार्यक्रम हैं, जिनमें युवाओं की सहभागिता सुनिश्चत की जा सकती है. युवा समाज में समाजिक, आर्थिक और नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे समाज में प्रचलित कुप्रथाओं और अंधविश्वास को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं. देश में दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी ही महिलाओं पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है. महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से तो देश त्रस्त है. नब्बे साल की वॄद्धाओं से लेकर कुछ दिन की मासूम बच्चियों तक से दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी जाती है. डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं होती रहती हैं. अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं. समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पांत की खाई भी बहुत गहरी है. दलितों विशेषकर महिलाओं के साथ अमानवीयता व्यवहार की घटनाएं भी आए दिन देखने और सुनने को मिलती रहती हैं, जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक समान हैं. आतंकवाद के प्रति भी युवाओं में जागृति पैदा करने की आवश्यकता है. भविष्य में देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता होगी. कृषि में उत्पादन के स्तर को उन्नत करने से संबंधित योजनाओं में युवाओं को लगाया जा सकता है. इससे जहां युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं देश और समाज हित में उनका योगदान रहेगा.

यदि युवाओं को कोई उपयुक्त कार्य नहीं दिया गया, तब मानव संसाधनों का भारी राष्ट्रीय क्षय होगा. उन्हें किसी सकारात्मक कार्य में भागीदार बनाया जाना चाहिए. यदि इस मानव शक्ति की क्रियाशीलता को देश की विकास परियोजनाओं में प्रयुक्त किया जाए, तो यह अद्भुत कार्य कर सकती है. जब भी किसी चुनौती का सामना करने के लिए देश के युवाओं को पुकारा गया, तो वे पीछे नहीं रहे. प्राकृतिक आपदाओं के समय युवा आगे बढ़कर अपना योगदान देते हैं, चाहे भूकंप हो या बाढ़. युवाओं ने सदैव पीड़ितों की सहायता में दिन-रात परिश्रम किया. युवा देश के विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है. युवाओं को देश के विकास के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान करना चाहिए. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में युवाओं को सम्मिलित करना अति महत्वपूर्ण है तथा इसे यथाशीघ्र एवं व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए.
महादेवी वर्मा के शब्दों में- ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है,जिसकी तरुणाई सबल होती है, जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरुणाई है.’’

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है