Tuesday, August 12, 2008

भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे : रिपोर्ट


नई दिल्ली : एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के अधिकतर मुसलमानों के पूर्वज अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के हिंदू थे, जिन्होंने कालांतर में इस्लाम धर्म अपना लिया और मुसलमान बन गए। आंध्र प्रदेश के मुस्लिम समुदाय में 'सामाजिक और शैक्षणिक वर्ग की पहचान' पर तैयार की गई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के 85 फीसदी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे जो अनुसूचित जातियों या पिछड़े तबकों से संबंध रखते थे। इन लोगों ने विभिन्न समयों पर इस्लाम ग्रहण कर लिया।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सलाहकार पी.एस. कृष्णन द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में मुसलमानों और देश में उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति की तस्वीर पेश की गई है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं का मुसलमान बनना समय समय पर चलता रहा... खासकर मध्यकाल में इसने और अधिक गति पकड़ ली। कृष्णन की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदुओं में जातिवाद की कठिन व्यवस्था ने इन लोगों के मुसलमान बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन लोगों ने छुआछूत और भेदभाव से बचने के लिए इस्लाम को अपनाया। उनके लिए इस्लाम कबूल करना एक राहत की बात थी। दक्षिण भारत में कुछ समुदायों के लोगों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। आंध्र प्रदेश में 98 प्रतिशत ईसाई हिंदू अनुसूचित जाति मूल के हैं। पंजाब में इन लोगों ने सिख धर्म अपनाया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के हिंदुओं ने अन्य मजहबों को अपनाया, लेकिन हर जगह पिछड़ापन उनके साथ रहा। यह पिछड़ापन आज भी जारी है और अधिकतर मुसलमान गरीब हैं। कृष्णन ने कहा कि बहुत से शासकों ने मुसलमानों के पिछड़ेपन को महसूस किया और उन्हें मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की। सबसे पहले कोल्हापुर के महाराज ने 1902 में मुसलमानों के लिए आरक्षण शुरू की, जबकि मैसूर के महाराजा ने यह कदम 1921 में उठाया। इसी तरह बम्बई प्रेज़िडंसी और बाद में मद्रास प्रेज़िडंसी ने भी आरक्षण की पेशकश की।

रिपोर्ट में मुसलमानों के 14 ऐसे समुदायों की पहचान की गई है जिन्हें पिछड़ी श्रेणी में सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। कृष्णन ने यह रिपोर्ट विभिन्न क्षेत्रों के दौरे और भारत की सामाजिक व्यवस्था पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर तैयार की है।
साभार नवभारत टाईम्स

3 टिप्पणियाँ:

फ़िरदौस खान said...

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हिन्दुस्तान के ज़्यादातर मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे. इस्लाम एक विचारधारा का नाम है, जिसमें कलमे का सबसे ज़्यादा महत्व है. कलमा हमें बताता है कि अल्लाह एक है और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) उसके पैग़म्बर हैं. जिस व्यक्ति ने कलमा पढ़ लिया वो मुसलमान है. मुसलमानों की एक खासियत यह भी है कि वो किसी भी मुल्क में रहें, किसी भी संस्कृति में पले-बढ़े हों, कोई भी ज़बान बोलते हों, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल पर उनका यकीन अटल रहता है...एक मुस्लिम बच्चा कितना ही पढ़ लिख ले, भले ही वो अमेरिका से बड़ी से बड़ी डिग्री ले आए. जब वो घर में दाखिल होगा तो अपने वाल्देन (माता-पिता) को सलाम ही करेगा. यही हमारी तहज़ीब है. हमारे पूर्वज हिंदू थे, इसे मानने में कोई बुराई मुझे तो नज़र नहीं आती...
मैं एक मुस्लिम हूं, मुझे इस पर फख्र है...मेरे पूर्वज हिन्दू थे इस पर मैं मुझे नाज़ है, क्यूंकि उनकी बदौलत ही आज मैं मुसलमान हूं...
जो लोग इस लेख को ग़लत नज़रिए से देख रहे हैं उनसे सिर्फ़ इतना कहना चाहूंगी-
मेरी ज़िन्दगी का मकसद
तेरे दीन की सरफराजी
मैं इसलिए मुसलमां
मैं इसलिए नमाज़ी

Umesh said...

हिंसा और लोभ लालच के बल पर हिन्दुओ को मुसलमान बनाया गया था । भारत पर करीब 800 वर्षो तक मुसल्मानो का निरंकुश शासन रहा । ईस दौरान तलवार के बल ईसलाम अपने को फैलाता रहा । मै ईस बात से असहमत हुं की पीछडे वर्गो मे धर्म परिवर्तन ज्यादा हुआ । यह धर्म परिवर्तन शहरी और अभिजात्य वर्ग मे भी हुआ था जो राज्य की सुविधा प्राप्त करने हेतु मुसल्मान बन गए थे । प्राचिन भारत मे अस्पर्श्यता और छुआछुत नही थी, यह मध्ययुग मे हिन्दु विरोधियो द्वारा सुनियोजित षड्यंत्र के तहत फैलाई गई थी ।

Anonymous said...

फिरदौस जी ने लिखा है कि मुसलमानों की एक खासियत यह भी है कि वो किसी भी मुल्क में रहें, किसी भी संस्कृति में पले-बढ़े हों, कोई भी ज़बान बोलते हों, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल पर उनका यकीन अटल रहता है...

...लेकिन वह उस मुल्‍क की वंदना करने से परहेज करता है... उस मुल्‍क के साथ समरस होने से परहेज करता है... उस मुल्‍क में तलवार के बल पर मजहब परिवर्तन कराता है(इसमें कोई दोमत नहीं कि इस्‍लाम तलवार और राज्‍यसत्‍ता के बल पर फैला। इसके प्रणेता जो मदीना के शासक भी थे, ने शुरू से ही इसे अपने राज्‍य और अपने व्‍यक्तिगत प्रभाव के विस्‍तार का माध्‍यम बनाया।)... उस मुल्‍क की संस्कृति को ध्‍वस्‍त करता है...और अपने अल्‍लाह और रसूल के मुताबिक सभी इंसानों को दो भागों में बाँटता है -एक जो अल्लाह को मानते हैं और दूसरे जो अल्लाह को नहीं मानते हैं यानी काफ़िर हैं। और काफिरों को जला दो, मिटा दो। इसी सिद्धांत ने आज इस्‍लाम को नफरत का पर्याय बना दिया है।

भारत गत बारह दशकों से इस्लामी आतंकवाद से कराह रहा है। कारण कि भारत मुस्लिम पडोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से घिरा है और भारत में मुसलमान 15 प्रतिशत से अधिक है और कुल मिलाकर इन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 57 प्रतिशत होती है। इस्लाम को मानने वाले कहते है कि यह शांति का पाठ पढाता है। लेकिन व्‍यवहार में यह क्‍यों हिंसा का पर्याय हो गया है। भारत ही नहीं, पूरी दुनिया आज इस्‍लाम से क्‍यों त्रस्‍त है, इस पर जरूर व्‍यापक बहस होनी चाहिए।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है