लेखक -कुलदीप नैयर
वामपंथ की वास्तविकता साठ के दशक तक यह कहा जाता था कि कोई भी लड़का या लड़की जो बीस वर्ष की आयु तक भी वामपंथी नहीं हुआ तो उसके बारे में किसी चिकित्सक से परामर्श किया जाना चाहिए। इस तरह की भावनाओं का हृदय में संजोना फैशन नहीं था, बल्कि यह एक आदर्शवाद का भाग था। छात्र यह महसूस करते थे कि धनी और निर्धन के बीच अंतर अनुचित है और उन्हें किसी न किसी ढंग से इस व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन करना चाहिए। आज वे आकर्षक नौकरी अथवा सुख-सुविधायुक्त जीवन में रुचि रखते है।
वाम शब्द वर्जित हो गया है, क्योंकि कारपोरेट क्षेत्र उसे विध्वंसक प्रवृत्तियों का व्यक्ति मानता है जिस पर वामपंथी होने का संदेह हो। निर्धनों की समस्याओं पर विचार-विमर्श करने वाले इने-गिने अध्ययन केंद्र हैं, किंतु पूंजी का सृजन कैसे जल्दी से जल्दी हो सकता है, इस विषय में चर्चा करने के लिए अनेक संगोष्ठियां आयोजित होती हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठन हंै, जो जन सेवा की मशाल को जलता रख रहे हैं, किंतु समाज में समग्र बदलाव के लिए विकल्पों पर काम करने के लिए उनके पास बहुत ही कम समय है। उनकी राह में मुख्य बाधा सामंती सोच अथवा धनी जन की हठवादिता है। धनिक ही तो लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी नियंत्रण किए हुए हैं। 1941 से 1946 तक मैं लाहौर में पढ़ रहा था। तब तक अधिसंख्य मुस्लिमों की कल्पना में पाकिस्तान के विचार का समावेश हो चुका था। इसके बावजूद हम सभी स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य भी थे, जो सेक्युलर और वामपंथी समर्थक संगठन था। हमारी धार्मिक पहचान अथवा विभाजन के मुद्दे पर मतभेदों के बावजूद आजाद हिंद फौज के सैनिकों और अधिकारियों की रिहाई की मांग के समर्थन में हमारा समवेत स्वर निकला था। आजाद हिंद फौज के जिन तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर अभियोग चला था उनमें से एक हिंदू, एक मुस्लिम और एक सिख था, यह हर समुदाय के लिए चुनौती थी। फेडरेशन की पताका तले छात्र सड़कों पर उतर पड़े थे। ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा था और आईएनए के लोगों को रिहा करना पड़ा था।
विभाजन के बाद भी समग्र उपमहाद्वीप में वामपंथी सोच कायम रही, हालांकि पूर्वी पाकिस्तान और भारत के मुकाबले पश्चिमी पाकिस्तान में वह कमजोर पड़ी थी। 1950 में जब केरल में कम्युनिस्ट विजयी हुए तो ऐसा सोचा गया था कि मानो चीन के क्षेत्र युन्नान का ही उदय हो गया और अब देश भर में लालिमा व्याप्त हो जाएगी, किंतु अब लगभग 50 वर्ष बाद लोकसभा में उनका संख्या बल मात्र एक दर्जन के करीब है। पश्चिम बंगाल और केरल में कम्युनिस्टों का सूपड़ा साफ हो जाने से उनकी सरकारों की असफलता पर ध्यान केंद्रित हुआ है। इस बारे में वास्तविक चर्चा अभी भी नहीं हो रही है कि एक विचारधारा के रूप में साम्यवाद के प्रभाव का भारत में तथा अन्यत्र भी क्यों Oास हो रहा है? नि:संदेह शीत युद्ध में पश्चिमी देशों की विजय इतनी चकित करने वाली रही कि सोवियत संघ के विखंडन के बाद कोई सुसंगठित वाम संगठन ही नहीं रह गया। कम्युनिस्ट चीन घोर राष्ट्रवादी हो गया है और उससे विचारधारा पर आधारित संवाद को पुनर्जीवित करने की आशा ही नहीं संजोई जा सकती। उसकी ऊर्जा तो अपना प्रभाव क्षेत्र बनाने में ही लग रही है। वहां वामपंथ के बारे में बात ही कौन करेगा? बुद्धिजीवी और विचारकों में अपना ध्यान लोकतंत्र पर केंद्रित करने की प्रवृत्ति हावी है। वाम, यह शब्द ही अभी भी सही-सही पारिभाषिक शब्दावली की खोज से नदारद है। नया मुहावरा है सुधार, जो किसी भी क्रांतिकारी सोच के सर्वथा विपरीत भाव है। इसी वजह से नई वैश्विक आर्थिक नीतियों को अविकसित और कम विकसित के शोषण के तरीकों के रूप में देखा जा रहा है। वित्तीय मंदी धनी व्यक्तियों और राष्ट्रों के अपने साधनों के बाहर रहन-सहन और अपनी फिजूलखर्ची की कीमत गरीबों द्वारा चुकाए जाने की आशा संजोने की परिणति है।
नतीजा यह है कि दुनिया पहले से भी अधिक निर्धन हो गई है। इसके बावजूद फ्रांस में ओसबोर्न जैसे स्कूलों में उपजा ज्वार, अमेरिका का मैकारथिज्म के खिलाफ विलंबित संघर्ष और थियेन मन चौक में चीनी सेनाओं द्वारा युवाओं का निर्मम दमन, ये सभी आशा जगाने वाले प्रकरण हैं। ये सभी इस बात के परिचायक है कि लोगों में स्वतंत्र रहने की दुर्जेय इच्छा है। खुद भारत में समाज में आमूल-चूल परिवर्तन करने के मकसद से चला नक्सली आंदोलन भी आकांक्षाओं की चिंगारी धधकना ही है, किंतु हिंसा के तत्व का समावेश एक लोकतांत्रिक बदलाव के स्वप्न में बाधक बन रहा है। बंदूक उसकी विचारधारा बन गई है और कट्टरता वाहन। भारत पश्चिम की नकल कर रहा है, जबकि इसे महात्मा गांधी के दर्शन में राह खोजनी चाहिए, जिन्होंने कहा था कि किसी भी देश की प्रगति का आकलन इस प्रयास से किया जाना चाहिए कि उसने निर्धनतम व्यक्ति को उभार कर इस स्थिति में लाने के लिए कितना प्रयास किया है कि वह धनी और ताकतवर के समक्ष भी सिर उठा सके। गांधी ने ही यह चेतावनी भी दी थी कि गलत साधनों से सही परिणाम नहीं मिल सकते।
आज भारतीय राजनीति का संकट बदलाव का संकट है। यह राज्य व्यवस्था और उसके ढांचे के आधार के बीच बढ़ते हुए फासले को दर्शाता है। पिछले कुछ दशकों के दौरान राजनीतिक और आर्थिक, दोनों प्रक्रियाओं ने वंचित सामाजिक वर्ग को सक्रिय राजनीतिक समुदाय में ला दिया है। खासतौर पर उत्तर-भारत में मध्यवर्ती कृषक जातियों ने कृषि की नई तकनीक का इस्तेमाल कर अपने आर्थिक हालात सुधारे हैं। वे अब ऐसी किसी राजनीतिक व्यवस्था को सहन करने को तैयार नहीं हैं जिसका झुकाव परंपरागत तौर पर संपन्न जन के प्रति हो। दलित भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। इसका श्रेय अवसरों की सुलभता और राजनीतिक दलों द्वारा उनका समर्थन जुटाने के प्रयासों को जाता है। वे अभी बेहतरी के लिए बदलाव की मांग उभार रहे हैं। इसके साथ ही साथ सिद्धांतपरक और उद्देश्यपूर्ण राजनीति की मांग भी बढ़ती जा रही है। जनहित एक ऐसा मुद्दा है जिसकी विश्व भर में वामपंथियों ने अनदेखी सी की है, जबकि वे उसका रखवाला होने का दम भरते हैं।
उनके नेत्रों पर चढ़े विचारधारा के चश्मों ने उन्हें यह देखने ही नहीं दिया कि साम्यवाद अथवा अन्य कोई भी वाद अपने में ही लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तो व्यक्ति है। इस सामान्य जन का उपयोग विचारधारा से संबद्ध उद्देश्यों के लिए तो नहीं किया जा सकता।
व्यक्ति भावनाओं से शून्य नहीं होता, न ही वह मशीन का पुर्जा मात्र है। वामपंथी चिंतन ने व्यक्ति को उस दिशा से वंचित रखा जिसे जीवन का नैतिक और अध्यात्मिक पक्ष कहा जाता है। यह मानव चिंतन का आधारभूत तथ्य है। इसके अभाव में मानवीय व्यवहार के स्तरों और मूल्यों का क्षरण होता है। जब उपभोक्तावाद और वाणिज्यवाद समाज पर हावी हो जाते हैं तो वे देखभाल की भावना को कुचल देते हैं। संवेदनशीलता के अंगार तो अभी भी जल रहे हैं। जरूरत है इस अग्नि को और अधिक तेज करने की। लोकतंत्र का ढांचा मात्र ही पर्याप्त नहीं है, उसकी भावना और आत्मा को भी समझना होगा। जब तक आदर्शवाद नहीं लौटेगा तब तक शोषण के विरुद्ध चेतना भी प्रखर नहीं हो सकेगी। जो लोग उदार विचारधारा और सोच को बढ़ाना चाहते हैं वे वास्तविकताओं से अछूते भी तो नही रह सकते। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
साभार -जागरण