भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है

Saturday, September 12, 2009

पूज्य भागवत जी के जनम दिवस पर समर्पित


जग प्रपंच से मोह नहीं है तभी कहलाते हो मोहन
भारत चिन्मय आदि शक्ति है परम भागवत त्वं स्वोहम


केशव माधव मधुकर रज्जू दिब्य सुदर्शन की माला
राष्ट्र देवी के सुभ्र चरणों में शोभित मोहन मणि माला


अमिय पियो शत् शरद जियो बैभव का पावन शिखर चढो
भारत को जगत गुरु करने हम साथ तुम्हारे तीब्र बढो

Wednesday, June 3, 2009

वामपंथ की वास्तविकता

लेखक -कुलदीप नैयर
वामपंथ की वास्तविकता साठ के दशक तक यह कहा जाता था कि कोई भी लड़का या लड़की जो बीस वर्ष की आयु तक भी वामपंथी नहीं हुआ तो उसके बारे में किसी चिकित्सक से परामर्श किया जाना चाहिए। इस तरह की भावनाओं का हृदय में संजोना फैशन नहीं था, बल्कि यह एक आदर्शवाद का भाग था। छात्र यह महसूस करते थे कि धनी और निर्धन के बीच अंतर अनुचित है और उन्हें किसी न किसी ढंग से इस व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन करना चाहिए। आज वे आकर्षक नौकरी अथवा सुख-सुविधायुक्त जीवन में रुचि रखते है।

वाम शब्द वर्जित हो गया है, क्योंकि कारपोरेट क्षेत्र उसे विध्वंसक प्रवृत्तियों का व्यक्ति मानता है जिस पर वामपंथी होने का संदेह हो। निर्धनों की समस्याओं पर विचार-विमर्श करने वाले इने-गिने अध्ययन केंद्र हैं, किंतु पूंजी का सृजन कैसे जल्दी से जल्दी हो सकता है, इस विषय में चर्चा करने के लिए अनेक संगोष्ठियां आयोजित होती हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठन हंै, जो जन सेवा की मशाल को जलता रख रहे हैं, किंतु समाज में समग्र बदलाव के लिए विकल्पों पर काम करने के लिए उनके पास बहुत ही कम समय है। उनकी राह में मुख्य बाधा सामंती सोच अथवा धनी जन की हठवादिता है। धनिक ही तो लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी नियंत्रण किए हुए हैं। 1941 से 1946 तक मैं लाहौर में पढ़ रहा था। तब तक अधिसंख्य मुस्लिमों की कल्पना में पाकिस्तान के विचार का समावेश हो चुका था। इसके बावजूद हम सभी स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य भी थे, जो सेक्युलर और वामपंथी समर्थक संगठन था। हमारी धार्मिक पहचान अथवा विभाजन के मुद्दे पर मतभेदों के बावजूद आजाद हिंद फौज के सैनिकों और अधिकारियों की रिहाई की मांग के समर्थन में हमारा समवेत स्वर निकला था। आजाद हिंद फौज के जिन तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर अभियोग चला था उनमें से एक हिंदू, एक मुस्लिम और एक सिख था, यह हर समुदाय के लिए चुनौती थी। फेडरेशन की पताका तले छात्र सड़कों पर उतर पड़े थे। ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा था और आईएनए के लोगों को रिहा करना पड़ा था।

विभाजन के बाद भी समग्र उपमहाद्वीप में वामपंथी सोच कायम रही, हालांकि पूर्वी पाकिस्तान और भारत के मुकाबले पश्चिमी पाकिस्तान में वह कमजोर पड़ी थी। 1950 में जब केरल में कम्युनिस्ट विजयी हुए तो ऐसा सोचा गया था कि मानो चीन के क्षेत्र युन्नान का ही उदय हो गया और अब देश भर में लालिमा व्याप्त हो जाएगी, किंतु अब लगभग 50 वर्ष बाद लोकसभा में उनका संख्या बल मात्र एक दर्जन के करीब है। पश्चिम बंगाल और केरल में कम्युनिस्टों का सूपड़ा साफ हो जाने से उनकी सरकारों की असफलता पर ध्यान केंद्रित हुआ है। इस बारे में वास्तविक चर्चा अभी भी नहीं हो रही है कि एक विचारधारा के रूप में साम्यवाद के प्रभाव का भारत में तथा अन्यत्र भी क्यों Oास हो रहा है? नि:संदेह शीत युद्ध में पश्चिमी देशों की विजय इतनी चकित करने वाली रही कि सोवियत संघ के विखंडन के बाद कोई सुसंगठित वाम संगठन ही नहीं रह गया। कम्युनिस्ट चीन घोर राष्ट्रवादी हो गया है और उससे विचारधारा पर आधारित संवाद को पुनर्जीवित करने की आशा ही नहीं संजोई जा सकती। उसकी ऊर्जा तो अपना प्रभाव क्षेत्र बनाने में ही लग रही है। वहां वामपंथ के बारे में बात ही कौन करेगा? बुद्धिजीवी और विचारकों में अपना ध्यान लोकतंत्र पर केंद्रित करने की प्रवृत्ति हावी है। वाम, यह शब्द ही अभी भी सही-सही पारिभाषिक शब्दावली की खोज से नदारद है। नया मुहावरा है सुधार, जो किसी भी क्रांतिकारी सोच के सर्वथा विपरीत भाव है। इसी वजह से नई वैश्विक आर्थिक नीतियों को अविकसित और कम विकसित के शोषण के तरीकों के रूप में देखा जा रहा है। वित्तीय मंदी धनी व्यक्तियों और राष्ट्रों के अपने साधनों के बाहर रहन-सहन और अपनी फिजूलखर्ची की कीमत गरीबों द्वारा चुकाए जाने की आशा संजोने की परिणति है।

नतीजा यह है कि दुनिया पहले से भी अधिक निर्धन हो गई है। इसके बावजूद फ्रांस में ओसबोर्न जैसे स्कूलों में उपजा ज्वार, अमेरिका का मैकारथिज्म के खिलाफ विलंबित संघर्ष और थियेन मन चौक में चीनी सेनाओं द्वारा युवाओं का निर्मम दमन, ये सभी आशा जगाने वाले प्रकरण हैं। ये सभी इस बात के परिचायक है कि लोगों में स्वतंत्र रहने की दुर्जेय इच्छा है। खुद भारत में समाज में आमूल-चूल परिवर्तन करने के मकसद से चला नक्सली आंदोलन भी आकांक्षाओं की चिंगारी धधकना ही है, किंतु हिंसा के तत्व का समावेश एक लोकतांत्रिक बदलाव के स्वप्न में बाधक बन रहा है। बंदूक उसकी विचारधारा बन गई है और कट्टरता वाहन। भारत पश्चिम की नकल कर रहा है, जबकि इसे महात्मा गांधी के दर्शन में राह खोजनी चाहिए, जिन्होंने कहा था कि किसी भी देश की प्रगति का आकलन इस प्रयास से किया जाना चाहिए कि उसने निर्धनतम व्यक्ति को उभार कर इस स्थिति में लाने के लिए कितना प्रयास किया है कि वह धनी और ताकतवर के समक्ष भी सिर उठा सके। गांधी ने ही यह चेतावनी भी दी थी कि गलत साधनों से सही परिणाम नहीं मिल सकते।

आज भारतीय राजनीति का संकट बदलाव का संकट है। यह राज्य व्यवस्था और उसके ढांचे के आधार के बीच बढ़ते हुए फासले को दर्शाता है। पिछले कुछ दशकों के दौरान राजनीतिक और आर्थिक, दोनों प्रक्रियाओं ने वंचित सामाजिक वर्ग को सक्रिय राजनीतिक समुदाय में ला दिया है। खासतौर पर उत्तर-भारत में मध्यवर्ती कृषक जातियों ने कृषि की नई तकनीक का इस्तेमाल कर अपने आर्थिक हालात सुधारे हैं। वे अब ऐसी किसी राजनीतिक व्यवस्था को सहन करने को तैयार नहीं हैं जिसका झुकाव परंपरागत तौर पर संपन्न जन के प्रति हो। दलित भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। इसका श्रेय अवसरों की सुलभता और राजनीतिक दलों द्वारा उनका समर्थन जुटाने के प्रयासों को जाता है। वे अभी बेहतरी के लिए बदलाव की मांग उभार रहे हैं। इसके साथ ही साथ सिद्धांतपरक और उद्देश्यपूर्ण राजनीति की मांग भी बढ़ती जा रही है। जनहित एक ऐसा मुद्दा है जिसकी विश्व भर में वामपंथियों ने अनदेखी सी की है, जबकि वे उसका रखवाला होने का दम भरते हैं।

उनके नेत्रों पर चढ़े विचारधारा के चश्मों ने उन्हें यह देखने ही नहीं दिया कि साम्यवाद अथवा अन्य कोई भी वाद अपने में ही लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तो व्यक्ति है। इस सामान्य जन का उपयोग विचारधारा से संबद्ध उद्देश्यों के लिए तो नहीं किया जा सकता। व्यक्ति भावनाओं से शून्य नहीं होता, न ही वह मशीन का पुर्जा मात्र है। वामपंथी चिंतन ने व्यक्ति को उस दिशा से वंचित रखा जिसे जीवन का नैतिक और अध्यात्मिक पक्ष कहा जाता है। यह मानव चिंतन का आधारभूत तथ्य है। इसके अभाव में मानवीय व्यवहार के स्तरों और मूल्यों का क्षरण होता है। जब उपभोक्तावाद और वाणिज्यवाद समाज पर हावी हो जाते हैं तो वे देखभाल की भावना को कुचल देते हैं। संवेदनशीलता के अंगार तो अभी भी जल रहे हैं। जरूरत है इस अग्नि को और अधिक तेज करने की। लोकतंत्र का ढांचा मात्र ही पर्याप्त नहीं है, उसकी भावना और आत्मा को भी समझना होगा। जब तक आदर्शवाद नहीं लौटेगा तब तक शोषण के विरुद्ध चेतना भी प्रखर नहीं हो सकेगी। जो लोग उदार विचारधारा और सोच को बढ़ाना चाहते हैं वे वास्तविकताओं से अछूते भी तो नही रह सकते। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
साभार -जागरण

Saturday, May 30, 2009

लड़कियों के गायब होने के चलते गरमाया धर्मातरण का मुद्दा


ओमप्रकाश तिवारी,
जागरण
मुंबई महाराष्ट्र के उत्तरी हिस्से में हिंदुओं के ईसाई बनने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। लेकिन पिछले वर्ष पुणे में इस्लाम स्वीकार करने की एक घटना अब पुलिस विभाग के लिए सिरदर्द बनती दिख रही है, क्योंकि इस घटना में इस्लाम स्वीकार करनेवाली कुछ युवतियों के गायब होने की रिपोर्ट उनके अभिभावकों ने दर्ज कराई है । धर्मातरण की यह घटना पिछले वर्ष अक्टूबर माह की है। पुणे के पूर्वी हिस्से में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान आ़जम कैम्पस में मुस्लिमों के एक सम्मेलन के दौरान छह युवतियों एवं तीन युवकों ने इस्लाम ग्रहण किया था । इस सम्मेलन का आयोजन प्रसिद्ध इस्लामी वक्ता डा। जाकिर नाईक की संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन ने किया था। तीन दिन चले इस सम्मेलन के अंतिम दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान उक्त नौ लोगों ने अपनी मर्जी से इस्लाम ग्रहण करने एवं कलमा पढ़ने की इच्छा जताई। इसके बाद उसी समारोह के दौरान उन्हें इस्लाम धर्म में दीक्षित कर दिया गया। इस्लाम ग्रहण करनेवाले इन युवक-युवतियों की उम्र 17 से 25 वर्ष के बीच बताई जाती है । कुछ हिंदू संगठनों द्वारा इस घटना की रिपोर्ट पुलिस को दिए जाने पर राज्य एवं केंद्रीय खुफिया ब्यूरो ने घटना की जांच उसी समय शुरू कर दी थी। लेकिन अब इनमें से कुछ धर्मातरित युवतियों के गायब होने के कारणयह मामला फिर तूल पकड़ने लगा है। लड़कियों के गायब होने की सूचना पुलिस को उनके अभिभावकों द्वारा ही दी गई है। खुफिया विभाग से जुड़े मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस प्रकार के धर्मातरण अक्सर युवावर्ग द्वारा विवाह के लिएकिए जाते हैं। चूंकि पुणे में शिक्षा के लिएदेश भर से युवा आते हैं। इसलिए धर्मातरण के लिए प्रेरित करनेवाली संस्थाएं यहां आसानी से सफलता हासिल कर लेती हैं। पुलिस विभाग इस आशंका से भी चिंतित है कि कहीं युवतियों को धर्मातरित कर नए नाम एवं परिचय के साथ विदेश तो नहीं ले जाया जा रहा है।

Tuesday, May 26, 2009

विशेष सुविधाओं का सच

लेखक -एस.शंकर

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग ने दूसरी बार केंद्र की सत्ता संभालते ही संकेत दिया है कि वह अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के कल्याण के लिए बहुत कुछ करने जा रही है। कांग्रेस इस चुनाव में मुस्लिमों से मिले समर्थन से उत्साहित है लिहाजा वह अगले कुछ महीनों में उन्हें अनेक तरह की सुविधाएं देने की योजना बना रही है। संप्रग ने पिछले कार्यकाल में भी मुस्लिमों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक प्रगति के नाम पर सच्चर कमेटी का गठन किया था। मुस्लिमों की तरक्की के प्रयास करने में कुछ भी अनुचित नहीं, लेकिन कांग्रेस की ओर से यह काम जिस तरीके से करने की कोशिश की जाती है उससे यही संकेत मिलता है कि मुसलमानों के उत्थान के नाम पर वोट बैंक की राजनीति की जा रही है।

किसी गैर-मुस्लिम देश में मुसलमानों के लिए जितने विशेषाधिकार भारत में हैं वैसा विश्व में कहींनहीं, जैसे हज के लिए सरकारी अनुदान और बेरोक एक साथ चार पत्नियों की छूट। कट्टर इस्लामी ईरान में भी कोई अकारण चार शादियां नहीं रचा सकता। इसी तरह शिया मुसलमानों को जितने अधिकार यहां हैं उसकी वे सऊदी अरब में कल्पना भी नहीं कर सकते। वहां उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं और वे दूसरे दर्जे के हीन नागरिक हैं। भारत में मुसलमानों को यह विशेषाधिकार मुख्यत: कांग्रेस के सौजन्य से प्राप्त हुआ। मुस्लिम चाह पूरी करने के लिए 1946 में एक अलग देश की मांग मान लेना भी कांग्रेस की ही देन थी। ऐसा विश्व इतिहास में कहीं नहीं हुआ। समय बीतता गया। कांगेस मुस्लिमों को और विशेष सुविधाएं देती गई। 1980 का दशक बीतते शाह बानो और सलमान रुश्दी मामलों ने घोषणा की कि मुस्लिम नेता कांग्रेस से वह मनमानी भी पूरी करा सकते हैं जो किसी मुस्लिम देश में भी उन्हें सरलता से नहीं मिलेगी। केवल पिछले पांच सालों का हिसाब करें तो कांग्रेस ने मुस्लिमों को अनगिनत विशेष उपहार दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा निरस्त कर दिया। फिर भी उसे वही सुविधा दी जा रही है। निजी शिक्षा संस्थानों में आरक्षण पर मुस्लिम संस्थानों को छूट दे दी गई। धनी मुसलमानों को भी हज सब्सिडी दी गई। पोटा हटाने के निर्णय के पीछे भी मुस्लिमों का विशेष ख्याल रखने की मंशा थी। मदरसों के प्रमाणपत्र को केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मान्यता दी गई। अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने मुसलमानों को आरक्षण देने का वायदा किया है। यह भी संविधान, सेक्युलरिज्म और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध है। मजे की बात है कि इतना कुछ पाकर भी मुस्लिम नेता कांग्रेस से सदैव नाराज रहे हैं।

कांग्रेस को वोट देते हुए भी उनकी भंगिमा सदैव शिकायती रही। वस्तुत: हर मुस्लिम नेता हमेशा दोहराता है कि मुसलमानों का वोट-बैंक रूप में इस्तेमाल हो रहा है, किंतु संपूर्ण इतिहास कुछ और है। पिछले सौ वषरें से मुस्लिम नेता कांग्रेस से तरह-तरह की मांगें रखते गए हैं। उसे कांग्रेस किसी न किसी झूठी उम्मीद में मानती गई। गांधीजी मुस्लिमों के समक्ष कांग्रेस को वैचारिक, राजनीतिक, भावनात्मक रूप से निरंतर झुकाते गए। स्वतंत्र भारत में भी वही हुआ। मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस व अन्य दलों का भी इस्तेमाल कर इस्लामी ताकत ही बढ़ाई। आज पश्चिम बंगाल का कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री भी आतंकवादियों द्वारा मदरसों के दुरुपयोग को रोक नहीं पाता, बल्कि डांट खाकर चुप हो रहता है। 1946 में कांग्रेस ने देश का विभाजन इस दुराशा में स्वीकार कर लिया था कि कम से कम मुस्लिम समस्या से मुक्ति मिलेगी।

स्वयं नेहरू ने इसकी घोषणा की थी, किंतु समस्या पहले से अधिक विकट हो गई। कांग्रेस द्वारा झुक-झुक कर चढ़ावे के बावजूद मुस्लिम नेता उसे हमेशा खरी-खोटी सुनाते रहे हैं, लेकिन जब कांग्रेस कमजोर पड़ी तो वही मुस्लिम कम्युनिस्ट और सपा व राजद सरीखे क्षेत्रीय दलों की ओर भी मुड़ गए। भाजपा ने भी सत्ता में आकर धारा 370 हटाने जैसे आधारभूत मुद्दों को किनारे कर हज यात्रा और मदरसों को अनुदान बढ़ाकर तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों की अनदेखी कर वही कार्य किया। तब, कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है? असम में दशकों से कांग्रेस ने इस्लामी मांगें पूरी कीं। बांग्लादेश के घुसपैठियों को भारतीय नागरिक बनाया। घुसपैठ बेरोक चलती रहे, इसके लिए ऐसा कानून (आईएमडीटी एक्ट) बनाया जिसमें घुसपैठियों को निकालना असंभव हो जाए। यह कानून बीस साल से घुसपैठियों को ढाल प्रदान करता रहा। उसका लाभ उठाकर पाकिस्तानी आईएसआई असम को भारत से काट लेने के षड्यंत्र में लग गई। इसीलिए उस कानून को रद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत सख्त और विस्तृत टिप्पणियां कीं। फिर भी कांग्रेस ने किसी तरह उस कानून को बनाए रखना चाहा ताकि मुसलमान खुश रहें। असम में कांग्रेस का इस्तेमाल कर चुकने के बाद वहां मुस्लिम नेता उसे अंगूठा दिखा अपनी एकछत्र सत्ता बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। यहां मुस्लिम नेताओं की मांगों, आंदोलन, अभियान, बहस आदि में मात्र इस्लामी एजेंडा बढ़ाने की चाह दिखती है। जिस आवेश और एकजुटता से वे खुमैनी, बोस्निया, अफगानिस्तान या इराक के लिए सड़कों पर उतर पड़ते हैं वह अपने देश के लिए कभी नहीं देखी जाती। सड़क, बिजली, पानी जैसे मुद्दे भी मुस्लिम नेताओं की प्राथमिकताएं नहीं हैं। वे तो आधुनिक प्रगति को ही इस्लाम-विरुद्ध मानते हैं! यह कहना पूरी तरह सही नहीं कि कांग्रेस ने मुसलमानों का वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। सही तस्वीर यह है कि मुस्लिम नेताओं ने भी उसका इस्तेमाल कर इस्लामी एजेंडा बढ़ाया। वह भी इस अंदाज में कि वे खुद को लुटा हुआ बताकर हिंदू बुद्धिजीवियों की सहानुभूति अलग से बटोरते हैं। यह हैरत की बात है कि मुस्लिम नेता अपनी नाराज भंगिमा से सभी दलों को प्रेरित कर रहे हैं कि वे इस्लामी विस्तार में मदद करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभार -जागरण

Tuesday, May 5, 2009

क्वात्रोची के साथ कांग्रेस

लेखक -राजीव सचान
कांग्रेस के लिए परम आदरणीय, प्रात: स्मरणीय श्रद्धेय श्री ओट्टावियो क्वात्रोची के संदर्भ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि उन्हें परेशान करना अच्छी बात नहीं। इस पर देश को चकित होना चाहिए कि कांगे्रसजनों की ओर से यह मांग क्यों नहीं की जा रही है कि श्रीमान क्वात्रोची को इतने वर्षाें तक परेशान करने के लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें मुआवजा दिया जाए? क्या इस देश में ऐसा कोई कांग्रेसी नहीं जो क्वात्रोची को हर्जाना दिलाने के लिए जनहित याचिका दायर कर सके? वे कांग्रेसजन कहां हैं जिन्होंने सोनिया गांधी को देवी के रूप में प्रदर्शित किया था? ऐसे कांग्रेसजन आगे आएं और क्वात्रोची फैन क्लब की स्थापना करें। वे ऐसी सभाएं आयोजित करें जिनमें जनता को यह बताया जाए कि इटली के एक सीधे सरल व्यवसायी जिसे कुछ अज्ञानी लोग दलाल कह रहे हैं, को भारत की गैर कांग्रेसी सरकारों ने किस तरह तंग किया और फिर भी इस भले आदमी ने सिर्फ इतना कहा कि उसे इस देश की न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं? क्या ऐसे उदार, सहनशील व्यक्ति को कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार कोई पुरस्कार नहीं दे सकती-पद्मश्री, पद्म विभूषण वगैरह? यदि भारत सरकार चुनाव के ठीक बीच में उनके खिलाफ प्रभावी रेड कार्नर नोटिस वापस ले सकती है तो उनके लिए किसी सम्मान-पुरस्कार की घोषणा क्यों नहीं कर सकती? क्वात्रोची के संदर्भ प्रधानमंत्री का यह कथन उनकी संवेदनशीलता को प्रकट करता है कि उन्हें परेशान करना अच्छा नहीं। इसके पहले उन्होंने संदिग्ध आतंकियों के संदर्भ में यह कहकर अपनी संवेदनशीलता प्रकट की थी कि उनकी रातों की नींद उड़ गई है।

प्रधानमंत्री को संवेदनशील होना ही चाहिए, लेकिन क्या केवल संदिग्ध आतंकियों और दलालों के प्रति? क्वात्रोची को सीबीआई की क्लीन चिट पर मनमोहन सिंह ने तर्क दिया है कि उसके खिलाफ रेड कार्नर नोटिस के बावजूद मलेशिया और अजर्ेंटीना से उसका प्रत्यर्पण नहीं किया जा सका और संबंधित देश यह कहते हैं कि आपके पास उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं। ऐसी ही स्थिति दाऊद इब्राहिम और अन्य अनेक भगोड़े आतंकियों के संदर्भ में भी है? यदि इन्हें भारत नहीं लाया जा पा रहा है तो क्या यह मान लिया जाए कि उनके खिलाफ सबूत नहीं हैं? क्या इन्हें भी परेशान नहीं किया जाना चाहिए? क्या इनके खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस भारत को असहज स्थिति में डालते हैं? सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री यह कैसे तय कर सकते हैं कि भारत के पास क्वात्रोची के खिलाफ सबूत नहीं हैं? क्वात्रोची को पाक-साफ बताने के लिए कांग्रेसजनों की ओर से यह तर्क भी दिया जा रहा है कि 18-20 साल हो गए हैं और हम वहीं का वहीं खड़े हैं। इस तर्क के आधार पर वे सारे मामले बंद कर देने चाहिए जो 18-20 साल से चल रहे हैं। कांग्रेसजन बताएं कि अयोध्या मामले की जांच कर रहे लिब्रहान आयोग का क्या किया जाना चाहिए, जिसे 48 बार विस्तार दिया जा चुका है? सीबीआई की ओर से क्वात्रोची को दी गई क्लीन चिट पर मनमोहन सिंह की मोहर इसलिए और चकित करती है, क्योंकि जब लंदन स्थित उसके खातों पर लगी रोक हटाई गई थी तो उन्होंने कहा था कि मामले की जांच कराई जाएगी। आखिर यह क्यों न मान लिया जाए कि कांग्रेस की तरह प्रधानमंत्री भी क्वात्रोची को बचाना चाहते हैं? जब से कुछ दलों ने प्रधानमंत्री को कमजोर बताने का अभियान छेड़ा है तब से कांग्रेस ने ऐसा माहौल बना दिया है, मानो प्रधानमंत्री की आलोचना करना ईश्वर की निंदा करना हो। पता नहीं मनमोहन सिंह कितने मजबूत प्रधानमंत्री हैं, लेकिन सभी को स्मरण होगा कि 2004 में उनके सत्ता में आते ही जब झारखंड के राज्यपाल ने कांग्रेस के इशारे पर शिबू सोरेन को मनमाने तरीके से मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी तो बहुत दिनों तो यह आभास ही नहीं हुआ था कि कोई प्रधानमंत्री पद पर आसीन है? ऐसा ही आभास तब हुआ था जब राजस्थान गुर्जर आंदोलन के कारण धधक रहा था और जम्मू अमरनाथ भूमि मसले पर। इसी तरह तब भी प्रधानमंत्री परिदृश्य से बाहर थे जब महाराष्ट्र में राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को मार-पीटकर भगा रहे थे।

यह संभव है कि मनमोहन सिंह के अतिरिक्त जो अन्य राजनेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं वे उनके मुकाबले उन्नीस यानी कमजोर हों, लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि प्रधानमंत्री पद के लिए और किसी को दावेदारी ही नहीं करनी चाहिए? नि:संदेह भारतीय संविधान राज्यसभा सदस्य को प्रधानमंत्री बनने की अनुमति प्रदान करता है, लेकिन क्या इसके आधार पर यह मान लिया जाए कि इस पद के दावेदार को लोकसभा चुनाव न लड़ने की छूट प्रदान कर दी जाए? क्या यह अस्वाभाविक और आश्चर्यजनक नहीं कि देश की जनता अपने जनप्रतिनिधियों को इसलिए चुनने जा रही है ताकि वे प्रधानमंत्री का चयन कर सकें, लेकिन कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार जनप्रतिनिधि बनने के लिए तैयार नहीं? मनमोहन सिंह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने करीब पांच वर्ष तक यह पद धारण किया और इस दौरान राज्यसभा सदस्य बने रहे। वह अगले पांच वर्ष तक के लिए भी राज्यसभा सदस्य के जरिए ही इस पद को धारण करना चाहते हैं। संविधान निर्माताओं ने प्रधानमंत्री के सीधे निर्वाचन की व्यवस्था नहीं बनाई, लेकिन क्या उन्होंने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब यह पद धारण करने के आकांक्षी निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं बनेंगे? पता नहीं किस आधार पर अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग यह हवा बनाने में लगा हुआ कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं? यह शायद इसलिए है, क्योंकि जिस तरह मनमोहन सिंह लोक से विमुख हैं उसी तरह अंग्रेजी मीडिया भी है। यदि प्रधानमंत्री लोक से विमुख नहीं होते तो उन्हें यह अहसास कहीं अच्छी तरह होता कि देश की आम जनता बदनाम और भगोड़े क्वात्रोची के बारे में कैसी राय रखती है? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

Sunday, May 3, 2009

राहुल का ड्रामा

युवराज की सच्चाई सामने है

Tuesday, April 28, 2009

काले धन पर बेरुखी

लेखक -बलबीर पुंज
डा. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार स्विस बैंकों में जमा हजारों करोड़ रुपये का धन वापस भारत लाने में रुचि क्यों नहीं ले रही है? क्या कारण है कि जब विश्व के अधिकांश देश स्विस बैंकों में जमा अपने-अपने देश का काला धन वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो भारत सरकार पिछले एक साल से इस विषय में या तो मौन है या बहानेबाजी पर उतारू है। यह स्थापित सत्य है कि पिछले 60 वषरें में भारत की अकूत संपत्ति भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और करचोर व्यापारियों के द्वारा स्विस बैंकों में जमा की गई है। कांग्रेस भाजपा पर विदेशों में जमा काले धन की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रही है। अमेरिका स्थित ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी (जीएफआई) के ताजा अनुमान के अनुसार भारत से प्रतिवर्ष 1,35,000 करोड़ रुपये (27 अरब डालर) स्विस बैंक आदि में जमा कराया जाता है। 160 विकासशील देशों की सूची में भारत का स्थान पांचवां है। जीएफआई के अनुसार 2002 से 2006 के बीच भारत से औसतन 1,13,500 करोड़ रुपये से 1,36,500 करोड़ रुपये (22.7 अरब से 27.3 अरब डालर) प्रतिवर्ष काला धन विदेशी बैंकों में जमा होता रहा। जीएफआई के अनुसार विकासशील देशों से इसी अवधि में प्रतिवर्ष एक खरब डालर काला धन विदेशों में जमा हुआ है।

वास्तव में राशि का आकार महत्वपूर्ण नहीं है। काले धन की राशि यदि एक रुपया भी हो तो देश से चुराकर ले जाए गए धन की वापसी क्या नहीं होनी चाहिए? आर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनोमिक कार्पोरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने अप्रैल 2009 के शुरू में प्रकाशित लेखाजोखा में उल्लेख किया था कि स्विस बैंकों समेत टैक्स चोरी के अन्य स्वर्ग में 25 लाख करोड़ से लेकर 70 लाख करोड़ रुपये की धनराशि है। जर्मन के वित्त मंत्रालय ने एलटीजी बैंक से जो सूची प्राप्त की है उसमें करीब 100 भारतीयों के भी नाम शामिल हैं। कांग्रेस यह प्रश्न कर रही है कि भाजपा ने अपने कार्यकाल में उक्त धन को वापस लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? यह प्रश्न उतना ही बेतुका है, जैसे कोई यह पूछे कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने मोबाइल फोन और कंप्यूटर लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? आज से एक वर्ष पूर्व तक पश्चिमी देशों में बैंक सीक्रेसी को व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता था, किंतु अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले और वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते परिस्थितियां बदलीं और विकसित देशों में इस पर पुनर्विचार प्रारंभ हुआ।

लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले साल अप्रैल माह में ही डा. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर समुचित कदम उठाने की अपील की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री की ओर से जो जवाब आया उससे सरकार द्वारा कदम उठाने का संकेत मिला था, किंतु धन वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ करने की जगह सरकार ने जर्मनी स्थित भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर यह निर्देश दिया कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीयों का नाम उजागर करने के लिए जर्मनी सरकार पर दबाव नहीं डाला जाए। क्यों? वैश्विक मंदी के कारण जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। दुनिया भर के बैंक कंगाली के कगार पर हैं और यूरोपीय देशों के नेता इसमें स्विस बैंक जैसे टैक्स चोरी के स्वर्ग की गोपनीय कार्यप्रणाली का बड़ा योगदान मानते हैं। यूरोपीय देशों ने जी-20 के मंच से टैक्स चोरों के पनाहगाहों में जमा की गई राशि अपने देश वापस लाने का ऐलान किया। 2008 की तीसरी तिमाही में जर्मन सरकार ने कर चोरों को संरक्षण देने के कारण स्विट्जरलैंड को ब्लैक लिस्ट करने के लिए ओईसीडी पर दबाव डाला। उधर अमेरिका ने विधिक मुकदमे के द्वारा स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े बैंक-यूबीएस से करीब 300 अमेरिकी करचोरों के नाम जानने में सफलता प्राप्त की। फरवरी माह में बर्लिन में आयोजित जी-20 की बैठक में यूरोपीय देशों ने यह निर्णय लिया कि अप्रैल में लंदन में होने वाली बैठक में टैक्स चोरी के ठिकानों के खिलाफ वैश्विक मुहिम छेड़ी जाएगी। जी-20 की बैठक के लिए लंदन रवाना होने से पूर्व आडवाणी ने प्रधानमंत्री से कहा कि बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने के लिए भारत को जी-20 द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने सलाह अनसुनी कर दी। कांग्रेस ने कहा कि जी-20 ऐसे मामलों को उठाने का उपयुक्त मंच नहीं है, जबकि सत्य यह है कि जी-20 की लंदन बैठक का मुख्य एजेंडा ही काला धन और टैक्स चोरी के ठिकाने थे। कांग्रेस इस मामले में झूठ क्यों बोल रही है? फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने तो बैंकों की गोपनीयता और टैक्स चोरी के ठिकाने खत्म करने के लिए यदि कुछ नहीं किया गया तो जी-20 के बहिष्कार की धमकी दे रखी थी। कांग्रेस नीत सरकार काले धन की वापसी के प्रश्न पर इतनी घबराई हुई क्यों है? उसकी विवशता क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें बोफोर्स दलाली कांड को याद करना होगा। अस्सी के दशक में रिलायंस घोटाले के सिलसिले में एक अंग्रेजी दैनिक की ओर से एस. गुरुमूर्ति को जानकारी जुटाने का भार सौंपा गया था। इस विषय में हाल में गुरुमूर्ति ने अपने एक लेख में लिखा है, मैंने देश से बाहर जमा कराए गए काले धन का पता लगाने के लिए अमेरिकी जासूसी फर्म-फेयरफैक्स से संपर्क किया। मैंने भारत सरकार से फेयरफैक्स को जांच कार्य सौंपने का निवेदन किया। स्विस सूत्रों के अनुसार तब काले धन के रूप में करीब 300 अरब डालर स्विस बैंकों में जमा थे, किंतु 13 मार्च, 1987 को मुझे सीबीआई ने फर्जी आरोपों में गिरफ्तार कर लिया। बाद में आरोप बेबुनियाद साबित हुए।

पूरे देश को पता लग गया कि सरकार ने मुझे निशाना क्यों बनाया? सरकार को अंदेशा था कि इस जांच से सत्ताधारी परिवार की बोफोर्स दलाली और काली कमाई का भी खुलासा हो जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विनोद पांडेय, भूरे लाल जैसे ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को हटाने के साथ जांच की हामी भरने वाले तत्कालीन वित्तमंत्री वीपी सिंह को भी हटा दिया था। 1984 की सहानुभूति लहर में विपक्ष का सूपड़ा साफ करने वाले राजीव गांधी को 1989 के चुनाव में शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा, जिसमें भ्रष्टाचार ही बड़ा चुनावी मुद्दा था। काले धन के मामले से कांग्रेस को बोफोर्स का भूत जिंदा होने का अंदेशा है। राजग के काल में क्वात्रोच्चि का खाता सील कराया गया था, जिसे संप्रग सरकार के काल में हटवा दिया गया। क्वात्रोच्चि बोफोर्स लूट का माल निकालने में सफल रहा। एक अनुमान के अनुसार स्विस बैंकों में जमा राशि हमारे कुल बजट का तीन गुना हिस्सा है। इस काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। आज भारत पर 220 अरब डालर का विदेशी कर्ज है, हम उससे छुटकारा पा सकते हैं। आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए हमें वित्तीय कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। काले धन की वापसी की राह में रोड़े अटका कर कांगे्रस वस्तुत: अपने दामन पर लगे बोफोर्स जैसे दागों को स्वयंसत्यापित कर रही है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)