Saturday, October 7, 2023

भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्य

 

 

                      


 डॉ . सौरभ मालवीय 

भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहां की संस्कृति सबसे प्राचीन है। जिस समय विश्व के अनेक देश असभ्य थे, उस समय भी भारत की संस्कृति अपने उच्च स्थान पर विराजमान थी। भारत एक ऐसा देश है, जहां कण-कण का महत्त्व है। यहां के लोगों की मान्यता है कि कण-कण में ईश्वर का वास है। यहां पर्वतों, वृक्षों, पौधों, नदियों, कुंओं एवं पशुओं आदि को पूजा जाता है। यहां पूर्वजों को पूजने की परम्परा है। उनके चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। नारी को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। नारी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। कन्याओं को देवी मानकर नवरात्रि में उनकी पूजा की जाती है। ये सब संस्कारों के कारण ही होता है। मनुष्य के जैसे संस्कार होते हैं वह उन्हीं के अनुसार व्यवहार करता है।

 

वास्तव में हमारी प्राचीन गौरवशाली संस्कृति में संस्कारों का विशेष महत्त्व है। बालकों को बाल्यकाल से ही संस्कार दिए जाते हैं, जो उनके मन एवं मस्तिष्क में रच बस जाते हैं। उदाहरण के लिए मातृवत् परदारेषुअर्थात् पराई स्त्री को मां के समान समझो। यह एक अति उत्तम संस्कार है। ऐसे संस्कारों से उनके चरित्र का निर्माण होता है। वे अपने परिवार की महिलाओं के साथ-साथ अन्य महिलाओं का भी मान-सम्मान करते हैं। उनके लिए उनके मन में आदर और सत्कार का भाव पैदा होता है। ऐसी स्थिति में वे वासना जैसे अवगुण से बचे रहते हैं। इसी प्रकार बालकों को सिखाया जाता है कि परद्रव्याणि लोष्ठवत्अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझो। ऐसे उत्तम संस्कार के कारण उनके मन में लालच उत्पन्न नहीं होता तथा वह परोपकारी बन जाते हैं। इसी प्रकार उन्हें सिखाया जाता है कि आत्मवत् सर्वभूतेषुअर्थात् सभी को अपने समान या अपनी आत्मा से जुड़ा समझो। इस संस्कार के कारण समस्त प्राणियों के लिए उनके मन में दया भाव पैदा होता है। इसी प्रकारवसुधैव कुटुम्बकम्सनातन धर्म का मूल संस्कार है। यह महा उपनिषद सहित अनेक ग्रन्थों में लिखा हुआ है। इसका अर्थ है कि धरती ही परिवार है। इस संस्कार के कारण व्यक्ति पूरे विश्व को अपना परिवार मानता है तथा इसमें निवास करने वाले सभी मानवों के प्रति वह बन्धुत्व की भावना रखता है।

  

वास्तव में किसी भी समाज को चिरस्थायी प्रगत और उन्नत बनाने के लिए कोई कोई व्यवस्था देनी ही पड़ती है और संसार के किसी भी मानवीय समाज में इस विषय पर भारत से अधिक चिंतन नहीं हुआ है। कोई भी समाज तभी महान बनता है, जब उसके अवयव श्रेष्ठ हों। उन घटकों को श्रेष्ठ बनाने के लिए यह अत्यावश्यक है कि उनमें दया, करुणा, आर्जव, मार्दव, सरलता, शील, प्रतिभा, न्याय, ज्ञान, परोपकार, सहिष्णुता, प्रीति, रचनाधर्मिता, सहकार, प्रकृति प्रेम, राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि के प्रति अगाध श्रद्धा हो। मनुष्य में इन्हीं सारे सद्गुणों के आधार पर जो समाज बनता है, वह चिरस्थायी होता है। यह एक महत्वपूर्ण चिंतनीय विषय सहस्रों वर्ष पूर्व से मानव के सम्मुख था कि आखिर किस विधि से सारे उत्तम गुणों का आह्वान एक-एक व्यक्ति में किया जाए कि यह समाज राष्ट्र और विश्व महान बन सके।

संस्कार क्या है?

संस्कार शब्द का मूल अर्थ है- शुद्धीकरण अर्थात् संस्कार शुद्धीकरण की एक प्रक्रिया है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि किसी दोषयुक्त वस्तु को दोष रहित करना ही संस्कार है अर्थात् जिस प्रक्रिया से वस्तु को दोष रहित किया जाए, उसमें अतिशय का आदान करना ही संस्कारकहलाता है। संस्कार मन:शोधन की एक प्रक्रिया है। संस्कार को सजावट से जोड़कर भी देखा जा सकता है अर्थात् किसी वस्तु को सजाना ही संस्कार है। संस्कार ही मनुष्य को देव तुल्य बनाते हैं। संस्कारवान मनुष्य मान-सम्मान एवं यश प्राप्त करता है।  

 

गौतम धर्मसूत्र के अनुसार- “संस्कार उसे कहते हैं, जिससे दोष हटते हैं और गुणों की वृद्धि होती है।

मनु स्मृति के अनुसार-

वैदिकै: कर्ममि: पुण्यैनिषेकादिद्वि जन्मानाम

कार्य: शरीर संस्कार: पावन: प्रेत्य चेह ।।

अर्थात् मनुष्य के जीवन को नियमित पवित्र एवं गुणवान बनाने के लिए भारतीय वैदिक ऋषियों ने जीवन को धार्मिक कृत्यों से संबद्ध कर दिया है। मानव के जन्म से पूर्व से मृत्यु के पश्चात तक होने वाले धार्मिक कृत्यों को संस्कार कहा जाता है।         

 

आयुर्वेद के जनक महर्षि आचार्य चरक के अनुसार-

संस्कारोहि गुणान्तराधानम् उच्चते

अर्थात् यह प्रभाव भिन्न है। मनुष्य के दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया का नाम संस्कार है।

 

अंगिरा ऋषि के अनुसार-

चित्रकर्म यथाडेनेकैरंगैसन्मील्यते षनैः।

ब्राह्ण्यमपि तद्वास्थात्संस्कारैर्विधिपूर्व कैः।।

अर्थात् जिस प्रकार किसी चित्र में विविध रंगों के योग से शनै- शनै निखार लाया जाता है, उसी प्रकार विधिपूर्वक संस्कारों के सम्पादन से मनुष्य को ब्रह्ण्यता प्राप्त होती है।

 

पद्मपुराण में भगवान वेद व्यास मानवीय संस्कारों के महत्वपूर्ण तत्वों का उल्लेख करते हुए कहते हैं-

चात्मानं प्रशंसेद्वा परनिन्दां वर्जयेत्।

वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयन विवर्जयेत्।।

अर्थात् स्वयं की प्रशंसा करने वाला, भगवान की निंदा करने वाला, वेदों को मानने वाला इसकी निंदा करने वाला तथा दूसरों की सदैव निंदा करने वाले का शीघ्र ही विनाश हो जाता है।

 

प्राचीन गौरवशाली भारत के ऋषि-मुनियों के अनुसार जीवात्मा अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर ही नई योनि में जन्म लेती है आर्थात पूर्व जन्म के संस्कारों के अनुरूप ही जीव नया शरीर धारण करता है। इसलिए जीवात्मा सर्वथा संस्कारों की दास होती है। मीमांसा दर्शनकार के अनुसार- कर्मबीज संस्कार: अर्थात् संस्कार ही कर्म का बीज है तथा तन्न्मित्ता सृष्टि:अर्थात् वही सृष्टि का आदि कारण है।

 

भारतीय ऋषियों ने इस संबंध में गहन चिंतन-मनन किया। आयुर्वेद के वंदनीय पुरुष आचार्य चरक कहते हैं-

संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते

अर्थात् यह प्रभाव भिन्न है। मनुष्य के दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया का नाम संस्कार है।

राजबली पाण्डेय के अनुसार- “वास्तव में संस्कार-व्यंजक तथा प्रतीकात्मक अनुष्ठान है। उनमें बहुत से अभिनयात्मक उद्गार और धर्म, वैज्ञानिक मुद्रायें एवं इंगित पाई जाती है।"

आचार्य जैमिनी के अनुसार- " संस्कार वह प्रक्रिया है जिसके करने से पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य को करने के योग्य हो जाता है।"

 

वास्तव में संस्कार मानव जीवन को परिष्कृत करने वाली एक आध्यात्मिक विधा है। संस्कारों से संपन्न होने वाला मानव सुसंस्कृत, चरित्रवान, सदाचारी और प्रभुपरायण हो सकता है अन्यथा कुसंस्कार जन्य चारित्रिक पतन ही मनुष्य और समाज को विनाश की ओर ले जाता है। वही संस्कार युक्त होने पर सबका लौकिक और पारलौकिक अभ्युदय सहज सिद्ध हो जाता है। संस्कार सदाचरण और शास्त्रीय आचार के घटक होते हैं। संस्कार, सुविचार और सदाचार के नियामक होते हैं। इन्हीं तीनों की सुसंपन्नता से मानव जीवन को अभिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्व सर्वोपरि माना गया है, इसी कारण गर्भाधान से मृत्यु पर्यंत मनुष्य पर सांस्कारिक प्रयोग चलते ही रहते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति सदाचार से अनुप्रमाणित रही है। प्राकृतिक पदार्थ भी जब बिना सुसंस्कृत किए प्रयोग के योग्य नहीं बन पाते हैं, तो मानव के लिए संस्कार कितना आवश्यक है यह समझ लेना चाहिए। जब तक मानव बीज रूप में है तभी से उसके दोषों का अहरण नहीं कर लिया जाता, तब तक वह व्यक्ति आर्षेय नहीं बन पाता है और वह मानव जीवन से राष्ट्रीय जीवन में कहीं भी हव्य-कव्य देने का अधिकारी भी नहीं बन पाता। मानव जीवन को पवित्र चमत्कारपूर्ण एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए संस्कार अत्यावश्यक हैं। गहरे अर्थों में संस्कार धर्म और नीति समवेत हो जाते हैं। इसीलिए संस्कार की ठीक-ठाक परिभाषा कर पाना सम्भव ही नहीं है। संस्कार शब्दातीत हो जाते हैं, क्योंकि वहां व्यक्ति क्रिया और परिणाम में केवल परिणाम ही बच जाता है। व्यक्ति के अहंकारों का क्रिया में लोप हो जाता है। एक तरह से व्यक्ति मिट ही जाता है तो जब व्यक्ति मिट ही जाता है, तो परिभाषा कौन करेगा। अब वह व्यक्ति समष्टि बन जाता है। वह निज के सुख- दुख हानि- लाभ, जीवन- मरण, यश अपयश के बारे में काम चलाऊ से अधिक विचार ही नहीं करता। उसका तो आनंद परहित परोपकार और समाज एवं सृष्टि को संवारने में ही निहित हो जाता है और संस्कारों की उपर्युक्त क्रिया ही चरित्र, सदाचार, शील, संयम, नियम, ईश्वर प्रणिधान, स्वाध्याय, तप, तितिक्षा, उपरति इत्यादि के रूप में फलित होती है।

 

संस्कारों से अनुप्राणित व्यक्ति की सत्य की खोज एक सनातन यात्रा बन जाती है। और वह प्राप्त सत्य केवल एक भीतरी आनंद देता है, जिसकी ऊर्जा से आपलावित होकर व्यक्ति समाज और मानवता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। उस सत्य की व्याख्या नहीं की जा सकती। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि वे शब्द छोटे पड़ जाते और जो अनुभूति है वह इतनी विराट है कि अनादि, अनंत। इस अनंत को मानव शब्दों में कैसे पकड़ सकता है, वहां तो सबकुछ अद्वैत हो जाता है।नारद भक्ति सूत्रमें आता है कि सत्य एक है, वह अद्वैत है। साधारण ढंग से देखने पर दर्शक, दृश्य और द्रष्टा या ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान तीन दिखाई देते हैं। थोड़ी और गहराई में दो ही बच जाते हैं, परन्तु सत्य तो यह है कि वह केवल अद्वैत है। वहां ज्ञाता और ज्ञेय दोनों मिट जाते हैं। केवल ज्ञान बच जाता है।

तस्या ज्ञान मेव साधनमृत्यके

(नारद भक्ति सूत्र 28)

यह संस्कार वही ज्ञान है, इस त्रिभंग से मुक्त होना ही संस्कार का परिणाम है। ऊपरी तौर पर भी हिन्दू संस्कृति ने इसकी बड़ी सुंदर व्यवस्था रखी ही है। कुंभ मेले में अमृत रसपान हेतु लाखों लोग लाखों वर्षों से एकत्र होते रहते हैं। वहां भी वे दृश्य गंगा और यमुना में स्नान करते हैं, लेकिन अनुभूति तो अदृश्य सरस्वती की होती है। यह सरस्वती ही ज्ञान है। यही संस्कार का सुफल है। यह सरस्वती दृश्यमान नहीं है। अनुभूति जन्य है। इस सरस्वती को व्याख्यायित करना संभव ही नहीं है, केवल कुछ लक्षणों को पकड़ा जा सकता है। यह अद्भुत प्रेम है, जिसमें प्रेमी और प्रेयसी दोनों डूब जाते हैं। केवल प्रेम बच जाता है। यह प्रेम केवल करने से समझ में आता है। शब्दों से इसका स्वाद नहीं मिल पाएगा।

 

प्रेमैव कार्यम् प्रेमैव कार्यम्।।

यही संस्कार है। यूं तो प्रत्येक समाज अपने घटकों को सुसंस्कारित करने का प्रयास करता है। उसके लिए आदर्श भी रखता है। संस्कार की परिधि इतनी व्यापक है कि उसमें श्वास प्रश्वास से लेकर प्रत्येक कर्म समाविष्ट है।

ब्राह्सस्कारसंसकृतः ऋषीणां समानतां सामान्यतां

समानलोकतां सामयोज्यतां गच्छति

दैवेनोत्तरेण संस्कारेणानुसंस्कृतो देवानां समानतां

समानलोकतां सायोज्यतां गच्छति

(हारित संहिता)

संस्कारों से संस्कृत व्यक्ति ऋषियों के समान पूज्य तथा ऋषि तुल्य हो जाता है। वह ऋषि लोक में निवास करता है तथा ऋषियों के समान शरीर प्राप्त करता है और पुनः अग्निष्टोमादि दैवसंस्कारों से अनुसंस्कृत होकर वह देवताओं के समान पूज्य एवं देव तुल्य हो जाता है। वह देवलोक में निवास करता है और देवताओं के समान शरीर को प्राप्त करता है।

अव्याकृत किंतु अनुभव गम्य संस्कारों के फूल जिसके हृदय में खिले हैं और जिसकी पवित्र सुगंध वातावरण को मुग्धकारी बना देती है उन ऋषियों ने लोक कल्याण हेतु संस्कारों के लक्षण कहने का प्रयास किया है। यद्यपि वे अनुभोक्ता अपने आनन्द को शब्दों में परिभाषित तो नहीं कर सकते। फिर भी कुछ संकेत उन्होंने उसी दिशा में दिए हैं, जिससे प्राणी मात्र उसी का अनुसरण कर अपना लौकिक और पारलौकिक उन्नयन कर सके।

 

संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः

प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत च।।

(महाभारत)

जिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन औैर इन्द्रियों पर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुष को इहलोक और परलोक में कहीं भी सिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगती।

 

संस्कारों से ही मानव के आचरण पवित्र होते हैं।

आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः

हीनाचारी पवित्रात्मा