Thursday, June 9, 2011

भारतीय समाज और गाय


डॉ. सौरभ मालवीय
मानवता ने जब भी चेतना को प्राप्त किया तो उसने सर्व शक्ति सम्पन्न को मातृ रूपेण ही देखा है। इसी कारण भारत में ऋषियों ने गऊ माता, गंगा माता, गीता माता, गायत्री माता और धरती माता को समान रूपेण्ा प्रथम पूज्यनीय घोषित किया है। इन पंचमातृकाओं में गाय ही सर्वश्रेष्ठ है और सबकी केन्द्रीय भू-शक्ति है। पौराणिक कथानुसार जब-जब धरती पर विपत्ति आती है तो यह धरणी गाय का भी स्वरूप धारण करती है। परमपिता परमेश्वर के बाद अपनी विपत्ति के निवारण के लिए गाय माता की ही पूजन अर्चन किया जाता है। भारतीय समाज में यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्रकृति की प्रतिनिधि है इसलिये इसकी रक्षा और पूजन कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। सर्व शक्तिमान परमात्मा अपने अन्यान्य शक्तियों के साथ इस धरती पर प्रकट होते हैं। परम पूज्यनीय गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज लिखते हैं -
”बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राम्हण (प्रबुध्द जन) धेनु (गाय) सूर(देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरीत होते हैं। वह परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण हैं कि वह सबका आश्रय है। गाय में 33 कोटि देवी देवताओं का वास रहता है। इस लिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है। गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते है। गाय सरलता शुध्दता और सात्विकता की मूर्ति है। गऊ माता की पीट में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते है, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते है। सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं। मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते है। अपितु हमने माँ इस लिए कहा है कि गाय की ऑंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखो से अधिक आकर्षक होता है अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं। ऋषियों का ऐसा मनतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से ऑंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है। श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी। स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगती में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है। गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है। इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं। उपयोगिता के आधार पर गाय से ज्यादा उपयोगी प्राणी घोड़ा रहा है और घोड़ों के ही कारण बड़ी-बड़ी राज सत्ताएं बनती या बिगड़ती रही है। ऐसा एक भी प्रमाण संसार में नहीं मिलेगा कि गायों के कारण कोई साम्राज्य बना है।
दूध के दृष्टि से भी भैंस, बकरी और ऊंट के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता लेकिन इन सारी बातों के बावजूद घोड़ा, हाथी, खच्चर, ऊंट और बकरी एवं भैंस भारतीय चेतना में गाय के पासंग में भी नहीं टिकते और केवल भारत के ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी गाय की महत्ता स्वीकारी गई है। प्राचीनतम काल में निर्मित मिश्र के पीरामिडों पर बछड़ों को दूध पिलाते गाय का चित्र अंकित है। संसार में दूग्ध उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण देश डेनमार्क समूल नाम धेनुमार्क था। भाषा विज्ञानियों के मतानुसार यह धेनुमार्क ही तद्भव होकर डेनमार्क बन गया।
अठारहवीं शताब्दी में प्रकाशित एक मानचित्र में डेनमार्क की राजधानी कोपेन हेगेन की स्पेलिंग ब्वूचमद भ्महमद लिखा गया है। बैलों के एक बड़े व्यापारी फोर्ड ने 12वीं शताब्दी ब्रिटेन में एक बड़ा मेला प्रारंभ किया उसी के नाम पर उस स्थान का नाम आस्फोर्ड हो गया। न्यूजीलैण्ड की एक वनवासी जाती मावरी भाषा बोलती है उन जनजातियों में गाय की पूजा की जाती है। गाय को मावरी में ”आक” कहते हैं। इसी आक के आधार पर न्यूजीलैण्ड की राजधानी का नाम आकलैण्ड पड़ा। इस प्रकार गाय की महिमा पूरे धरती पर गायी जाती है और गाय मानव जीवन में अत्यन्त उपयोगी है, गाय का दुध अमतृ के समान है इससे प्राप्त दूध, घी, मख्खन मनुष्य शरीर को पुष्ट (बलवान) बनाता है। गाय के मूत्र से विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाई जाती हैं, इसके मूत्र में कैंसर, टी.वी. जैसे गंभीर रोगो से लड़ने की क्षमता होती है और पेट के सभी विकार दूर होते हैं। गाय ही एक मात्र ऐसी प्राणी है जो ऑक्सीजन ग्रहण्ा करती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, यूरिया और यूरिक एसिट होता है। दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्वि होती है जो हृदय रोगों के लिए लाभकारी है। गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ सर्दी, खांसी, जुकाम का नाश हो जाता है। गौमूत्र का एक पाव नित्य प्रात: खाली पेट सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है। गाय की उपस्थिति का पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है।
परन्तु दुर्भाग्य है हम लोंगों का भारत जैसे पवित्र देश में गोमांस अब एक महत्वपूर्ण व्यापार बन गया है। स्थिति की भयंकरता का अनुमान स्वयं लगा सकते है कि देश के 37 हजार आधुनिक कत्लखानों में 28 सौ गायें प्रति मिनट कटती है। जहाँ 1991 में प्रति दो भारतीय पर एक गोवंश था। अब वह 2001 में प्रति दस भारतीय पर एक गाय बची है। 1991 से 1996 तक 27 आधुनिक कत्तल खाने खोलने के लिए 75 प्रतिशत तक की सरकारी छूट दी गई। सन 1981 तक पूरे भारत का गोमांस निर्यात 39 हजार टन वार्षिक था। अब यह बढ़कर लगभग 5 लाख टन वार्षिक हो गया है। देश की सेकुलर नीति के कारण श्रीकृष्ण, नंदकिशोर गोपाल के इस देश में आज तक समग्र रूपेण्ा गोवध बन्दी का कानून नहीं बनाया जा सका और वोट बैंक की राजनीति के दुष्चक्र में राजस्थान और पश्चिम बंगाल की सीमा गायों की तस्करी का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया। अब गो भक्त जनता का आग्रह इतना तीव्र होना चाहिए कि गाय की हत्या मनुष्य की हत्या जैसा मानकर के कानून बनाया जाय अन्यथा यह भारत विपत्ति के ऐसे जाल में फसता जा रहा है जहां से निकलने का कोई उपाय नहीं है। यदि भारत में गाय नहीं बची तो भारत का विनाश भी नहीं रोका जा सकता है।
संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614

ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

5 टिप्पणियाँ:

हमारीवाणी said...

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tarkvaageesh said...

yeh to acchi baat hai....hamare poorvaj bhi to gaumaans khaate the

http://navkislaya.blogspot.com/

जीवन का उद्देश said...

सर्वशक्तिमान परमेशवर के बाद मानव ही सब चीज़ों से उत्तम है, दुनिया की हर एक चीज़ो पर शासण करता है
तो फिर वह अपने से कम्जोर, कमबुद्धी वाली चीजों के सामने क्यों झुके ?

अलंकार said...

गाय श्वसन में oxygen लेती है और oxygen ही निकालती है......भाई क्या आप सही हैं, या गप ही सुनी है ?

Ramkishore Gupta said...

New jankari gay oxygen leti hai aur oxygen hi nikalti hai.

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है