<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053</id><updated>2012-01-28T21:34:03.873+05:30</updated><category term='हिन्दू संस्कृति पर माओवादी हमला'/><category term='ABVP'/><category term='CPM'/><category term='लेबल: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><category term='बंगलादेशी घुसपैठिये'/><category term='लेबल:  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><category term='सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><category term='Nationalism'/><category term='Hindutva'/><category term='भाजपा'/><title type='text'>सुमन सौरभ</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>120</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-599908594989624063</id><published>2012-01-28T21:08:00.001+05:30</published><updated>2012-01-28T21:34:03.894+05:30</updated><title type='text'>हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;नमस्‍कार।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;div&gt;जैसा कि आपको विदित होगा गत वर्ष अक्‍टूबर महीने में मैंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता विभाग में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्‍त की। मेरे शोध का विषय है- ''हिंदी समाचार पत्रों में सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद की प्रस्‍तुति का अध्‍ययन।''&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;इस संबंध में प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर शोध-सारांश प्रकाशित हुआ है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;कृपया इसका अवलोकन करें।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;a href="http://www.pravakta.com/study-of-the-presentation-of-cultural-nationalism-in-hindi-newspapers" style="color: #1155cc;" target="_blank"&gt;http://www.pravakta.com/study-&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;of-the-presentation-of-&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;cultural-nationalism-in-hindi-&lt;wbr&gt;&lt;/wbr&gt;newspapers&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;सादर;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: rgba(255, 255, 255, 0.917969); color: #222222; font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; text-align: -webkit-auto;"&gt;सौरभ&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote style="background-color: white; border-left-color: rgb(221, 221, 221); border-left-style: solid; border-left-width: 5px; color: #777777; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; margin-bottom: 0px; margin-left: 10px; margin-right: 30px; margin-top: 15px; padding-left: 20px;"&gt;&lt;span style="color: #993300;"&gt;&lt;strong&gt;डॉ. सौरभ मालवीय चर्चित मीडिया शख्सियत हैं। उनके व्‍यक्तित्‍व के कई आयाम हैं। अपने छात्र जीवन से ही एक्टिविस्‍ट रहे डॉ. मालवीय प्राध्‍यापक व मीडिया एक्टिविस्‍ट के रूप में मशहूर हैं। उन्‍होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (मा.च.रा.प.वि.वि.), भोपाल से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के पश्‍चात् यहीं से पत्रकारिता विभाग में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्‍त की। उन्‍हें (मा.च.रा.प.वि.वि.), भोपाल में अध्‍ययन करने और यहीं अध्‍यापन करने का अनुपम सौभाग्‍य प्राप्‍त है। वर्तमान में आप विश्‍वविद्यालय के प्रकाशन अधिकारी का दायित्‍व संभाल रहे हैं। डॉ. मालवीय ने मा.च.रा.प.वि.वि. के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला के निर्देशन में अपना शोध कार्य पूरा किया। उनके शोध का विषय है – ”हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन।” डॉ. मालवीय का यह शोध बहुचर्चित रहा क्‍योंकि उन्‍होंने मीडिया में साम्‍यवाद और समाजवाद के वर्चस्‍व की तस्‍वीर को तथ्‍यों के साथ प्रस्‍तुत किया एवं राष्‍ट्रवादी पत्रकारिता की जरूरत को रेखांकित किया। अपने शोध में डॉ. मालवीय ने बताया कि भारत में मीडिया की जड़ें तभी सही मायने में सशक्‍त हो पाएंगीं जब इसमें राष्‍ट्रवाद का स्‍वर प्रखर होगा। &amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: transparent;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote style="background-color: white; border-left-color: rgb(221, 221, 221); border-left-style: solid; border-left-width: 5px; color: #777777; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; margin-bottom: 0px; margin-left: 10px; margin-right: 30px; margin-top: 15px; padding-left: 20px;"&gt;&lt;span style="color: #993300;"&gt;&lt;strong&gt;हमें डॉ. मालवीय के मित्र होने का सौभाग्‍य प्राप्‍त है। वे ‘प्रवक्‍ता’ के भी नियमित कंट्रीब्‍युटर हैं। उन्‍होंने जब मुझे अपने शोध सारांश से अवगत कराया तो मैं इससे प्रवक्‍ता के पाठकों को अवगत कराने के लोभ का संवरण नहीं कर पाया। प्रस्‍तुत डॉ. मालवीय के शोध का सारांश.(संजीव)&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-V_-ymQO7_vk/TyQWffcvMyI/AAAAAAAAAOA/kkMIzQFUA_g/s1600/bharat.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/-V_-ymQO7_vk/TyQWffcvMyI/AAAAAAAAAOA/kkMIzQFUA_g/s1600/bharat.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;1- इस शोध का उद्देश्य हिन्दी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विषयवस्तु का तुलनात्मक अध्ययन करना है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;2- पूंजीवाद उत्पादक शक्तियों के स्वामित्व और संचालन की वह पध्दति है जिसके तहत उत्पादक शक्तियों और व्यक्तियों को अपनी क्षमता तथा प्रतिभा के अनुसार पूंजी उत्पादन, संग्रहण, विनियोग और व्यापार पर सामान्यत: कोई प्रतिबन्ध नहीं होता।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;3- समाजवाद वह सामाजिक व्यवस्था है जिसके अंतर्गत जीवन और समाज के सभी साधनाें पर संपूर्ण समाज का स्वामित्व होता है – जिसका उपयोग पूर्ण समाज के कल्याण और विकास की भावना को लक्ष्य करके किया जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;4- साम्यवाद का ध्येय समाज में सर्वहारा और शोषित वर्ग के बीच पूंजी, अवस्था, व्यवस्था और अवसरों की समान उपलब्धता सुनिश्चित करना है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;5- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वह परिकल्पना है जिसमें राष्ट्र की रचना का आधार आर्थिक या राजनैतिक न होकर सांस्कृतिक होता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;6- इस शोध कार्य में कुल 13 राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों और दो प्रमुख राष्ट्रीय पत्रिका सहित कुल 15 पत्र और पत्रिकाओं का अध्ययन किया गया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;7- शोध विधि के रूप में अन्तर्वस्तु विश्लेषण और रेण्डम सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;8- पूंजीवाद पर सर्वाधिक लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुए हैं। पत्र में इन्हें सर्वाधिक 46 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुआ है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;9- साम्यवाद पर सर्वाधिक लेख दैनिक जागरण में प्रकाशित हुए हैं। पत्र में इन्हें 25 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुआ है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;10- समाजवाद पर सर्वाधिक 46 प्रतिशत लेख जनसत्ता में प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;11- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से सम्बंधित सर्वाधिक लेखों को दैनिक जागरण में स्थान मिला है। पत्र ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को 33 प्रतिशत स्थान दिया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;12- पूंजीवाद पर सर्वाधिक सम्पादकीय इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया में समान रूप से 36-36 प्रतिशत प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;13- साम्यवाद पर सर्वाधिक सम्पादकीय दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुए हैं पत्र में इन्हें 21 प्रतिशत स्थान दिया गया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;14- समाजवाद से संबंधित सर्वाधिक संपादकीय दैनिक हिन्दुस्तान, जनसत्ता और पायनियर में 36-36 प्रतिशत प्रकाशित हुए है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;15- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित सम्पादकीय दैनिक जागरण में (20 प्रतिशत) प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;16- पूंजीवाद से संबंधित सर्वाधिक संपादक के नाम पत्र (36 प्रतिशत) इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुए।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;17- साम्यवाद से संबंधित संपादक के नाम पत्र को सर्वाधिक स्थान दैनिक ट्रिब्यून में 21 प्रतिशत मिला है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;18- समाजवाद से संबंधित सर्वाधिक संपादक के नाम पत्र दैनिक हिन्दुस्तान, टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू तथा इंडियन एक्सप्रेस ने 35-35 प्रतिशत प्रकाशित किया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;19- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित सर्वाधिक संपादक के नाम पत्र 20 प्रतिशत दैनिक जागरण में प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;20- अध्ययन के अनुसार पूंजीवाद से संबंधित सर्वाधिक चित्र इंडियन एक्सप्रेस में 36 प्रतिशत स्थान पाये हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;21- साम्यवाद से संबंधित सर्वाधिक चित्रों व स्थान दैनिक ट्रिब्यून (21 प्रतिशत) मिला है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;22- समाजवाद से संबंधित चित्रों को सर्वाधिक स्थान टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस 35-35 प्रतिशत प्राप्त हुआ है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;23- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित सर्वाधिक चित्रों को 18 प्रतिशत स्थान साप्ताहिक पत्रिका इंडिया टुडे में मिला है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;24- पूंजीवाद से संबंधित सर्वाधिक विश्लेषणात्मक समाचार इंडियन एक्सप्रेस में 36 प्रतिशत प्रकाशित हुए है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;25- साम्यवाद से संबंधित सर्वाधिक विश्लेषणात्मक समाचार इंडियन एक्सप्रेस हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक ट्रिब्यून, पंजाब केसरी तथा दैनिक हिन्दुस्तान में 20-20 प्रतिशत संख्यात्मक रूप से स्थान प्राप्त हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;26- समाजवाद से संबंधित सर्वाधिक विश्लेषणात्मक समाचार इंडियन एक्सप्रेस में 36 प्रतिशत प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;27- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित सर्वाधिक विश्लेषणात्मक समाचार साप्ताहिक पत्रिका इंडिया टुडे में 18 प्रतिशत प्रकाशित हुए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;28- शोध से प्राप्त निष्कर्ष के अनुसार एक चौथाई पाठक राजनीतिक समाचारों में तुलनात्मक तौर पर अधिक रूचि रखते हैं, जबकि शेष पाठकों की रूचि प्रान्तीय और स्थानीय समाचारों में है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;29- शोध अध्ययन के अनुसार केवल 10 प्रतिशत पाठकों की रूचि विचार प्रधान समाचारों में नहीं है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;30- शोध अध्ययन के अनुसार लगभग एक तिहाई पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित समाचारों को पढ़ना चाहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;31- पत्रों व पत्रिकाओं में पाठकों की अभिरूचि के अनुसार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित खबरों को गुणात्मक तौर पर पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;32- शोध का एक अन्य रोचक पक्ष है कि 30 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा से परिचित नहीं हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;33- शोध के अनुसार लगभग दो तिहाई पाठकों का मानना है कि पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित समाचारों को वर्तमान से अधिक महत्व मिलना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;34- शोध का निष्कर्ष यह है कि जिस मात्रा में पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित पाठय सामग्री और विषयवस्तु को पढ़ना चाहते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में अपेक्षात्या काफी कम संख्या में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित समाचार, विश्लेषण, लेख, चित्र संपादकीय व संपादक के नाम पत्र प्रकाशित होते हैं। यह असंतुलन इस शोध में बार-बार उभर कर सामने आया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में एक अन्योन्याश्रित संबंध है। ऊपर किए गए विश्लेषण से भी यह साफ हो जाता है कि राष्ट्रवाद वास्तव में सांस्कृतिक ही होता है। राष्ट्र का आधार संस्कृति ही होती है और पत्रकारिता का उद्देश्य ही राष्ट्र के विभिन्न घटकों के बीच संवाद स्थापित करना होता है। देश में चले स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही भारतीय पत्रकारिता का सही स्वरूप विकसित हुआ था और हम देख सकते हैं कि व्यावसायिक पत्रकारिता की तुलना में राष्ट्रवादी पत्रकारिता ही उस समय मुख्यधारा की पत्रकारिता थी। स्वाधीनता के बाद धीरे-धीरे इसमें विकृति आनी शुरू हो गई। पत्रकारिता का व्यवसायीकरण बढ़ने लगा। देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में भी काफी बदलाव आ रहा था। स्वाभाविक ही था कि पत्रकारिता उससे अछूती नहीं रह सकती थी। फिर देश में संचार क्रांति आई और पहले दूरदर्शन और फिर बाद में इलेक्ट्रानिक चैनलों पदार्पण हुआ। इसने जहां पत्रकारिता जगत को नई ऊंचाइयां दीं, वहीं दूसरी ओर उसे उसके मूल उद्देश्य से भी भटका दिया। धीरे-धीरे विचारों के स्थान पर समाचारों को प्रमुखता दी जाने लगी, फिर समाचारों में सनसनी हावी होने लगी और आज समाचार के नाम पर केवल और केवल सनसनी ही बच गई है।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;भाषा और तथ्यों की बजाय बाजार और समीकरणों पर जोर बढ़ गया है। ऐसे में यदि पत्रकारिता में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उपेक्षा हो रही है तो यह कोई हैरानी का विषय नहीं है। जैसा कि ऊपर किए गए अध्ययन में हम देख सकते हैं कि देश के प्रमुख मीडिया संस्थान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति उदासीन बने हुए हैं। कई मीडिया संस्थान तो विरोध में ही कमर कसे बैठे रहते हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ पाठकों को पसंद हो। ऊपर प्रस्तुत सर्वेक्षण के परिणामों में हमने देखा है कि पाठकों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति पर्याप्त रूचि है लेकिन वे न केवल विवश हैं, बल्कि आज के बाजार केंद्रित पत्रकारिता जगत में उनकी बहुत सुनवाई भी नहीं है। एक समय था जब पाठकों की सुनी जाती थी। यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है। 15-16 वर्ष पूर्व ही इंडिया टूडे द्वारा अश्लील चित्रों के प्रकाशन पर पाठकों द्वारा आपत्ति प्रकट किए जाने पर उन चित्रों का प्रकाशन बंद करना पड़ा था। परंतु इन 15-16 वर्षों में परिस्थितियां काफी बदली हैं। आज पाठकों की वैसी चिंता शायद ही कोई मीडिया संस्थान करता हो।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;बहरहाल एक ओर हम जहां यह पाते हैं कि आज के मीडिया जगत में काफी गिरावट आई है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्वर कमजोर पड़ा है तो दूसरी ओर आशा की नई किरणें भी उभरती दिखती हैं। आशा की ये किरणें भी इस संचार क्रांति से ही फूट रही हैं। आज मीडिया जगत इलेक्ट्रानिक चैनलों से आगे बढ़ कर अब वेब पत्रकारिता की ओर बढ़ गया है। वेब पत्रकारिता के कई स्वरूप आज विकसित हुए हैं, जैसे ब्लाग, वेबसाइट, न्यूज पोर्टल आदि। इनके माध्यम से एक बार फिर देश की मीडिया में नए खून का संचार होने लगा है। इस नए माध्यम का तौर-तरीका, कार्यशैली और चलन सब कुछ परंपरागत मीडिया से बिल्कुल अलग और अनोखा है। जैसे, यहां कोई भी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पत्रकारिता कर सकता है। वह ब्लाग बना सकता है और वेबसाइट भी। हालांकि इन नए माध्यमों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रभाव का अध्ययन किया जाना अभी बाकी है लेकिन अभी तक जो रूझान दिखता है, उससे कुछ आशा बंधती है। पत्रकारिता की इस नई विधा को परंपरागत पत्रकारिता में भी स्थान मिलने लगा है और इसकी स्वीकार्यता बढ़ने लगी है। परिवर्तन तो परंपरागत मीडिया में भी होना प्रारंभ हो गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रभाव समाचारों और विचारों में झलकने लगा है। नई-नई पत्र-पत्रिकाएं इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए शुरू हो रही हैं। स्थापित पत्र-पत्रिकाएं में भी ऐसे स्तंभ और स्तंभकारों को स्थान मिलने लगा है। आशा यही की जा सकती है कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी जड़ों से कट कर नहीं रह सकता, वैसे ही पत्रकारिता भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से कट कर नहीं रह पाएगी और शीघ्र ही वह स्वाधीनता से पहले के अपने तेवर में आ जाएगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;आज पत्रकारिता एक अत्यंत प्रबल माध्यम बन चुका है। विश्व में कोई भी समाज इसको दुर्लक्षित नहीं कर सकता। हम यदि इस अत्यंत सबल माध्यम में भारत का चिरन्तन तत्व भर सकें तो भारत की मृत्युंजयता साकार हो उठेगी। साथ ही साथ हम राष्ट्र ऋण से भी स्वयं को उऋण करने का प्रयास कर सकते हैं। अपनी भावी पीढ़ी को हम यदि गौरवशाली अतीत का भारत बतायेंगे तो वही पीढ़ी भविष्य के सर्वसत्ता सम्पन्न भारत का निर्माण करेगी और हमारी भारतमाता परमवैभव के सिंहासन साधिकार विराजमान होगी। जगद्गुरूओं का देश भारत फिर मानवता को जाज्वल्यमान आलोक देगा इसी में जन-जन का कल्याण सन्निहित है क्योंकि जो संस्कृति अभी तक दुर्जेय सी बनी है, जिसका विशाल मन्दिर आदर्श का धनी है। उसकी विजय ध्वजा ले हम विश्व में चलेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;संस्कृति सुरभि पवन बन हर कुंज में बहेंगे॥&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;तेरी जनम-जनम भर हम वन्दना करेंगे&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हम अर्चना करेंगे॥&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हे जन्मभूमि भारत, हे कर्मभूमि भारत&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हे वन्दनीय भारत अभिनन्दनीय भारत।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;तेरे लिये जनमभर हम साधना करेंगे&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: white; font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;हम अर्चना करेंगे॥&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-599908594989624063?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/599908594989624063/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=599908594989624063' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/599908594989624063'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/599908594989624063'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-V_-ymQO7_vk/TyQWffcvMyI/AAAAAAAAAOA/kkMIzQFUA_g/s72-c/bharat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-2123305746230040298</id><published>2011-10-20T19:18:00.001+05:30</published><updated>2011-10-20T19:23:10.817+05:30</updated><title type='text'>सांस्कृतिक राष्ट्रवाद</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-DBqsPzK8wJs/TqAns4cuG-I/AAAAAAAAAM4/XiVSwfuzxkM/s1600/sourabh-1.png"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 138px; height: 166px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-DBqsPzK8wJs/TqAns4cuG-I/AAAAAAAAAM4/XiVSwfuzxkM/s400/sourabh-1.png" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5665571983252659170" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;आ. बंधुवर, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;सादर नमस्‍कार।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255);font-family:Georgia,Georgia;font-size:15;"  &gt;माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल ने आज मेरे शोधकार्य ‘हिंदी समाचार-पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन’ विषय पर डाक्टर आफ फिलासिफी की (पीएचडी) उपाधि प्रदान की है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255);font-family:Georgia,Georgia;font-size:15;"  &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;जीवन का बस एक ही लक्ष्‍य है कि सांस्‍कृतिक-राष्‍ट्रवादी धारा भारत  की मुख्‍यधारा बने और इसमें अकादमिक रूप से भी युगानुकूल परिवर्तन होता रहे। इस दिशा में मैंने एक गिलहरी की सी भूमिका निभाने की कोशिश की है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर इस संबंध में समाचार प्रकाशित हुआ है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;&lt;a href="http://www.pravakta.com/archives/31442" target="_blank"&gt;http://www.pravakta.com/&lt;wbr&gt;archives/31442&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;आपकी शुभकामनाओं का आकांक्षी- &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;डॉ. सौरभ मालवीय &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family:Georgia, Georgia;"&gt;&lt;span style="line-height: 25px;font-size:15;" &gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-2123305746230040298?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/2123305746230040298/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=2123305746230040298' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2123305746230040298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2123305746230040298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-DBqsPzK8wJs/TqAns4cuG-I/AAAAAAAAAM4/XiVSwfuzxkM/s72-c/sourabh-1.png' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-3977885892258839981</id><published>2011-09-25T08:47:00.002+05:30</published><updated>2011-09-25T08:51:55.387+05:30</updated><title type='text'>‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-BBYdhZjSagM/Tn6d7C2bk3I/AAAAAAAAAMw/lexgXwkkdeU/s1600/ptrapakch.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 266px; height: 190px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-BBYdhZjSagM/Tn6d7C2bk3I/AAAAAAAAAMw/lexgXwkkdeU/s400/ptrapakch.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5656131819726934898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 255); font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;strong&gt;सौरभ मालवीय&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;p&gt;                                                                    &lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पितर हमारे किसी भी कार्य में अदृश्य रूप से सहायक की भूमिका अदा करते। क्योंकि अन्ततः हम उन्हीं के तो वंशज हैं। ज्योतिष विज्ञान की मान्यता के अनुसार वे हमारे सभी गतिविधियों पर अपनी अतिन्द्रीय सामर्थ के अनुसार निगाह रखे रहते हैं। यदि हम अपना भाव भावात्मक लगाव उनसे जोड़ सके तो वे हमारी अनेक सहायता करते हैं जो हरदम कल्पनातीत होती है। विज्ञान भी इन बातों को स्वीकार करता है कि मनुष्य जो कुछ भी कार्य कर रहा है वह केवल मनुष्य की सामर्थ में ही नहीं है अपितु कुछ ऐसे भी कार्य हैं जो होने लायक नहीं है और हो जाते हैं। पिछली शताब्दी में विज्ञान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वेन्जीन की अंतर-संरचना की खोज सपने में हुई थी। केकुले नाम के एक प्रख्यात वैज्ञानिक के तीन वर्ष का परिश्रम काम नहीं आ रहा था और एक दिन सपने में उसने एक सापीन को उसकी पूछ अपने मुंह में डाले हुए देखा और उसे सपने में किसी ने कहा बेटे मैं तुम्हारे परिश्रम से अत्यंत प्रसन्न हूं। यही तो वेन्जीन की संरचना है और उसके बाद केकुले की नींद खुल गई अब वह अत्यंत हल्कापन और आन्नद अनुभव कर रहे थे। उन्हें लगा की सपने में बोलने वाला वह पुरूष उन्हीं के वंश परम्परा का कोई हैं। आज रसायन विज्ञान में जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है उस सबका आधार वेन्जीन की संरचना है। इसी प्रकार सिलाई मशीन के लिए भी आयुवान होने बहुत परिश्रम किया था। फिर भी सफलता तो उसे सपने में ही मिली थी। यह भी कोई संयोग नहीं था, बल्कि उसके पूर्वजों का अदृश्य सहयोग था। भारत के दर्शन में भगवान वेद व्यास ने लिखा है कि ब्यतिरेस्त्दभावा भवित्वानंतूफ्लदिवत (उत्तरमीमांसा-3,54) अर्थात शरीर से आत्मा भिन्न है क्योंकि शरीर के विद्यमान होते हुए भी उसमें आत्मा अस्पृत रहती है। आत्मा की अतिसूक्ष्म गति है जो लोकान्तरों तक भी जा सकती है और अपने संकल्प के अनुसार शरीर भी धारण करती रहती है। जर्मन वैज्ञानिक हेकल ने अपने शोध ग्रन्थ दी रीडल ऑफ दी इनवर्ष में इसी सिद्धांत को प्रतिपादित किया है। वे अन्त में यह भी लिखते हैं कि मनुष्य बिना इन्द्रियों की सहायता के भी बाह्य जगत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। भारत में जो कर्मकाण्ड तय किये गये हैं वह अत्यंत गहन अनुभव के बाद प्रयोग में आये हैं। अब तो विज्ञान भी यह स्वीकार कर रहा है कि पूनःर्जन्म होता है और पूनःर्जन्म में अधिकांशतः अपने पितरों की आत्मायें भी अवतरित होती रहती है। क्योंकि किसी सत्यकर्म के करने पर प्रसन्न होती है या पापकर्म के कारण दुख भी होता है। प्रत्येक व्यक्ति की कुछ इच्छाएं भी होती हैं किसी कारण बस यदि शरीर पूर्ण हो जाये तो भी वे इच्छाएं सूक्ष्म तरंगों के रूप में आत्मा के साथ जुड़ी रहती है। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम श्राद्ध इत्यादि का प्रक्रम करते हैं। अनेक भूगोल विज्ञानी भी शरद ऋृतु के आश्विनकृष्ण पक्ष में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति कितनी अनुकूल होती है कि पितर अपने वंशजों से अपना पाथेय चाहते हैं। इस प्रक्रिया को श्राद्ध कहा जाता है। श्राद्ध शब्द का अर्थ श्राद्ध भाव से जुड़ा हुआ है। इसलिए यह कर्म अत्यंत श्राद्ध के साथ संपादित होना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऋृग्वेद में ऐसा लिखा है कि। अग्निष अग्निष्वातः पितरएतगच्छातः। सदः सदः सदतः सूप्रणीतयः।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हिमांद्री रत्नाकर में श्राद्ध उसी तिथि को सम्पन्न करने को कहा गया है जिस तिथि में पूर्वज की मृत्यु हुई हो वे लिखते हैं – यातिथिर्थस्यमासस्य मृताहेतूप्रवर्तते पितर की दिश दक्षिण मानी जाती है हाथ की हथेलियों में अंगुष्ठ भाग की ओर पितरों का स्थान माना जाता है। अतएव अपने पितरों के लिए श्रद्धापूर्ण ढंग से श्राद्ध संपन्न करना चाहिए। जिसे अपने पितर के तिथि का ज्ञान न हो उसे अमावस्या के दिन श्राद्ध करना मान्य है। भगवान मनु कहते हैं कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होते हैं पौरूषवान, निरोगी, प्रतिष्ठिावान और लम्बी आयु वाला व्यक्ति पैदा नहीं होता है। न तत्रबीरा जायत्रे निरोगी न शतायुसः न च। श्रीयोधीगच्छित यंत्र श्राद्धं-विर्वत्रितम्।। भारत में पिण्डदान के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान अल्गू नदी के तट पर गया भूमि में है। इस पवित्र नदी का पौराणिक नाम निरंजना भी है यह इतना पवित्र स्थान है कि स्वयं भगवान विष्णु अपना चरण चिन्ह दे गये हैं। इस भूमि की ऊर्जा और महत्ता का अनुमान मानवता ने हरदम श्रेष्टतम लगाया है । भगवान बुद्ध आचार्य शाम्वत्यकास्यप, मतंग ऋृषि, संजयवेल्किपुत्र और महावीर स्वामी समेत लाखों महापुरूषों ने इस पवित्र स्थान का यशोगान किया है। इसके इतर अग्नि तीर्थ कुमारी अन्तरीय (कन्याकुमारी) तीन समुद्रों से घिरी हुई पवित्र भूमि रामेश्वरम् प्रभाव क्षेत्र (सोमनाथ)श्री क्षेत्र नासीक, ब्रह्म क्षेत्र कुरूक्षेत्र, कमल क्षेत्र पुष्कर और पवित्र धाम श्रीबद्रीनारायण भी श्राद्धकर्म के लिए प्रस्सत भूमि है। इसमें आनन्दवन काशी और व्रह्म कपाल वद्रीधाम तो जीवित व्यक्ति द्वारा स्वयं के श्रृाद्ध के लिए उपयुक्त माना जाता है। श्राद्ध कर्म प्रकाश में आचार्य और संतों के लिए भी श्राद्ध करने का विचार है। जिस व्यक्ति के जन्मपत्री में काल सर्प दोष हो उसे अवश्य ही श्रद्धापूर्ण ढ़ंग से यह कार्य सम्पन्न करना चाहिए। पितृ क्षेत्र से ग्रस्त व्यक्ति कभी स्थायी तौर पर सफलता नहीं पाता है। पितृदोष समन के लिए अरूणाचल प्रदेश के तेजू जिले में लोहित नदी तट पर स्थित परशुराम कुण्ड और हिमक्त क्षेत्र लेह स्थित सिन्धु तट भी उत्तम माना गया है। सामान्य रूप से पितृश्राद्ध हेतु उत्तम ब्राह्मणों को दान, मान, आदि से तृप्त कर के भेजना चाहिए गाय, कुत्ता, कौवा और का भोजन उत्तम माना जाता है। हमें श्रृद्धापूर्ण ढंग से अपने पितरों के लिए अपनी सामथ्र्य के अनुसार श्राद्ध तरपण आदि कर्म करने चाहिए। यूं तो प्रत्येक शुभ कर्म में पितरों का आहन्वान, नानदीमुख श्राद्ध एवं विसर्जन, सविधि सम्पन्न करना चाहिए। यह नित्य कर्म न हो सके तो नैमित्रिक रूपेण (महालय पक्ष) में अवश्य ही होना चाहिए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;&lt;strong&gt;सर्वमातृ, पितृ चरण कमलेभ्योनमः।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Arial; font-size: 12px; line-height: 18px; background-color: rgb(240, 240, 240); "&gt;&lt;b&gt;संप्रति : प्रकाशन अधिकारी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल, मो. +919907890614&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 15px; line-height: 25px; background-color: rgb(255, 255, 255); "&gt;&lt;hr /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="chitikaAdBeacon-14"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-3977885892258839981?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/3977885892258839981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=3977885892258839981' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3977885892258839981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3977885892258839981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html' title='‘‘श्रद्धा भाव है श्राद्ध’’'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-BBYdhZjSagM/Tn6d7C2bk3I/AAAAAAAAAMw/lexgXwkkdeU/s72-c/ptrapakch.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-2859220501342604745</id><published>2011-09-17T17:28:00.003+05:30</published><updated>2011-09-17T17:33:52.207+05:30</updated><title type='text'>गंगा और भारत</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;आ. बंधुवर, &lt;br /&gt;नमस्‍कार।&lt;br /&gt;प्रवक्‍ता डॉट कॉम पर आज के बौ‍द्धिक विमर्श से गायब 'गंगा और भारत' विषय पर मैंने एक लेख लिखा है।&lt;br /&gt;गंगा और भारत&lt;br /&gt;&lt;a style="BACKGROUND-COLOR: rgb(255,255,0)" href="http://www.pravakta.com/archives/30054" target="_blank"&gt;http://www.pravakta.com/archives/30054&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यहां आपका ध्‍यान और मार्गदर्शन अपेक्षित है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गंगा शब्द का अर्थ तीव्रगामनी होता है लेकिन भारत में इस शब्द का अर्थ एक पवित्र नदी के रूप में है। इसका अर्थ पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति का साधन है यू तो संसार में हजारों नदियां हैं और भारत में भी एक सौ तेरह विपुल जल वाली नदियां है परन्तु भारतीय आस्था में गंगा को केवल नदी नहीं माना है इसे तो ब्रम्हद्रव, सूरसरी, त्रृपठगा, मंदाकिनी, पूर्णयसलीला, अमृत धारा, पावनपात, पतीतपावनी, कलमशनाषीनी, आनन्ददायिनी, शिवप्रिया, सकलदोषनिवारिणी यहां तक कि जगत जननी भी माना गया है। नदियों पर तो मानव की सभ्यता विकसित हुई है। सरस्वती, शतद्रु, चन्द्रभागा, तृष्णा, नील, दजला, फारात, गोदावरी, इरावती, वित्तसा, हडसन, टेम्स, सुधा, हवाग्रहो, यागयटीसी क्यांग, मीकांग इत्यादि नदियों ने मानवता की उत्थान और पतन की हजारों काहानियों देखी है। और कृतज्ञ मानवता ने इन नदियों के सम्मान में अपनी सारी प्रतिभा लगाकर के गीत गाये है।&lt;br /&gt;लेकिन गंगा के महत्व के लिए एक ही यह बात काफी है कि विश्‍व की समग्र नदियों पर जितना लेखन वाचन हुआ है उसके हजार गुना से भी ज्यादा केवल गंगा पर हुआ है। भारत में गंगा को मोक्षदायिनी कहा गया है पुराण कथाओं के अनुसार भगवान शिव की लीला भूमि कैलाश मानसरोवर के तीन दिशाओं से तीन धाराएं निकली। पूर्व वाली धारा ब्रम्हपुत्र हो गयी, पश्चिम वाहिनी धारा सिंधु के सम्मान से गौरवान्वित हुई। उत्तर में तो साक्षात् शिव स्वयं कैलाश पर विराजमान है एवं दक्षिणी धारा पतित पावनी मां गंगा के नाम से जग विख्यात हो गयी। मान सरोवर से गो मुख तक अदृश्‍य ग्‍लेशियरों से गुजरती हुई यह देव धारा गोमुख में दृश्‍यमान होती है। तब तक यह शिव द्रव अनेक प्रकार के खनिज लवणों को अपने भीतर समाहित कर लेती है। जिसमें वैज्ञानिक दृष्टि से सल्फर और वैकटियोफाच भी प्रचुर होता है इसी के कारण यह पावन गंगा जल अनन्त काल तक शुद्ध बना रहता है। धरती का यह एक मात्र ऐसा जल है जिसमें यह गुण पाया जाता है आखिर हो भी क्यों न देव देवभगवान शिव के ऊपर जो विराजमान रहती है उन्ही की कृपा से इस पावन भागीरथी की यह विशिष्टता के प्रति संसार विनत है।&lt;br /&gt;गोमुख से गंगा सागर तक 2525 कि.मी. लम्बे इस पावन धारा के सान्निध्य में भारत के 29 बड़े शहर 23 महानगर पालिकायें और 48 नगर पालिकायें बसी हुई है। दो विश्‍वविख्यात कुम्भ मेले लगते है हिमालय और गंगा के सायुज्य में आज तक लाखों-लाख महामानवों ने इतनी तपस्यायें की है कि वह पूरा वातावरण पवित्र वैचारिक तरंगों से आवेशित हो गया है। इसी कारण गंगा के सानिध्य में पहुचते ही एक विशेष प्रकार की आत्मिक आनन्द कि अनुभूति होती है। यह अनुभूति शब्दों में अवार्णनिय है। इसे साक्षात् जिया जा सकता है अनुभव किया जा सकता है और पीया जा सकता है। यह भाव इतना घनीभूत हो गया है कि केवल गंगा नाम के जप से भी लाखो-लाख लोग पुरूषार्थ को प्राप्त करते है। यह बात लोक विख्यात हो गयी है कि -&lt;br /&gt;गंगा-गंगा जो नर कहही।&lt;br /&gt;भूखा नंगा कभऊ न रहही।।&lt;br /&gt;भगवान शिव का पूजन करते समय गंगा जी का स्मरण अनिवार्य माना गया है। ”हर-हर गंगे भवभय भंगे” यह मंत्र दिव्य फल दायी है। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण ऋषियों ने समाज में यह व्यवस्था बना दी की पावन गंगा का दर्शन, स्पर्शन, प्राशन और मंज्जन चारो पाप निवारणी है। भारतीय संस्कृति में जिन लोगों को गंगा उपलब्ध नहीं है वे मंत्र के द्वारा पवित्र गंगा को स्मरण करते है। और उस अभिमंत्रित जल के प्रयोग से कृतपूर्ण अनुभव करते है मरते समय भी यह अंतिम साध होती है कि एक बूंद गंगा जल प्राप्त हो जाये। भारत में गंगा केवल नदी नहीं अपितु पवित्रता का ब्राण्ड़ नेम बन गयी है। गोदावरी और कावेरी को दक्षिण की गंगा कहते है तो ब्रम्हमपुत्र को पूर्व की गंगा।&lt;br /&gt;इण्डोनेशिया की एक पवित्र नदी को भी गंगा ही कहा जाता है मारीशस के एक बड़े सरोवर का गंगा नाम रखा है और उस सरोवर के तट पर स्थित षिव मंदिर को मारीसेश्‍वर महादेव का नाम दिया गया है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार मीकांग नदी मां गंगा का अपभ्रंश है। भारतीय संस्कृति में गंगा चिनमय मानी जाती है। हम यदि पवित्र गंगा जल को अपने घर में एक बोतल में रखे और आस्था के साथ पूजन करें तो बरसात के दिनों में जब गंगा में बाढ़ आती है तो अपने घर वाले उस बोतल का जल स्तर भी ऊंचा हो जाता है। इसीलिए यह गंगा चिनमय है।&lt;br /&gt;प्रत्येक भारतीय के घर गंगा कायिक, मानसिक और वाचिक किसी न किसी रूप में सर्वतो भावेन विराजमान रहती है। गंगा के समक्ष पवित्र भाव से जो भी याचना की जाती है वह सभी मनोकामना पूर्ण होती है। परम पूज्य गोस्वामी जी ने तो गंगा को ”वरदायिनी वरदान” कहा है। गंगा के इस 2500 हजार कि. मी. के प्रवास में 1000 से भी अधिक छोटी बड़ी नदियां मिलती है।&lt;br /&gt;अंतिम स्थल गंगा सागर के पावन तट पर सांख्य दर्शन के प्रणेता भगवान कपिल मुनि का आश्रम है मकर सक्रांति के अवसर पर लाखों-लाख लोग पवित्र गंगा सागर में स्नातकूत होते है। गंगा की महिमा सर्व विधि देवोपम है। इसकी तलहटी में 40 हजार प्रकार की वनस्पतियां पायी जाती है। विश्‍व की किसी भी नदी के तलहटी में इतने प्रकार की वनस्पति नहीं पायी जाती। जहां-जहां भगवान शंकर का निवास स्थान है वहां मां गंगा अपना प्रवाह बदल देती है उत्तर काशी और काशी में उत्तर वाहीन हो जाती है। गंगा भारत की जीवन रेखा है गंगा का अस्तित्व ही भारत है। यदि गंगा भारत में न रहें तो भारत मर जायेगा दुर्भाग्य से हमारी यह पावन देव नदी बड़े गन्दे नाले के रूप में बदलती जा रही है। भारत सरकार भी अनेक प्रयत्न इसकी सफाई के लिए की और लगभग 6 हजार करोड़ रूपये खर्च भी हो गये फिर भी गंगा का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। सहारनपुर मेरठ, कानपुर, प्रयाग, काशी, बरौनी और हावड़ा में गंगा बड़ी दयनीय है। पूरा सरकारी बजट नेताओं और अधिकारियों के मकड़जाल द्वारा सोख लिया जाता है। मां गंगा इन्हें सद्बुद्धि दे कि वे इस राष्ट्रीय माता के प्रति अपना दायित्व समझे। हे मां तुमारी कीर्ति तो तीनों लोकों और 14 हो भुवन में निरंतर गूंज रही है तुम तो उनको भी तारोगी जो तुम्हें लूट रहे हैं या दुखी कर रहे हैं। तुम्हारा तो संकल्प ही है कि -&lt;br /&gt;काहु ते न तारे जीन गंगा तुम तारे।&lt;br /&gt;जेते तुम तारे ते ते नभ में न तारे है।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काशी विश्‍वनाथ शम्भो, हर-हर महादेव गंगे।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-2859220501342604745?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/2859220501342604745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=2859220501342604745' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2859220501342604745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2859220501342604745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='गंगा और भारत'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-5593909764779299525</id><published>2011-07-15T12:23:00.002+05:30</published><updated>2011-07-15T12:29:07.030+05:30</updated><title type='text'>इण्डिया की मीडिया और भारत की मीडिया</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-5TjeiU9CaVU/Th_lB5kmu2I/AAAAAAAAAMM/y_Q2lFBCt48/s1600/media.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 264px; height: 191px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-5TjeiU9CaVU/Th_lB5kmu2I/AAAAAAAAAMM/y_Q2lFBCt48/s400/media.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5629469880033393506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 14px; line-height: 24px; "&gt;&lt;p&gt;                                               &lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;&lt;strong&gt;सौरभ मालवीय&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज सम्पूर्ण विश्व विज्ञान की प्रगति और संचार माध्यमों के कारण ऐसे दौर में पहुंच चुका है कि मीडिया अपरिहार्य बन गई है। बड़ी-बड़ी और निरंकुश राज सत्ताएं भी मीडिया के प्रभाव के कारण धूल चाट रही है वरना किसको अनुमान था कि लीबिया के कर्नल मुअम्मद अल गद्दाफी भी धूल चाट लेंगे। मिश्र, यमन और सूडान में जो जन विद्रोह हुए वह कल्पनातीत ही था। सर्व शक्ति संपन्न अमेरिका के ग्वांतानामो और अबू गरीब जेल में जो अमानुषिक यंत्रणा दी जाती है वह मीडिया के द्वारा ही तो जाना गया। आस्टे्रलिया के जूलियस असाँत्जे की विकीलीक्स में विश्व राजनीतिक संबंधों पर पुर्नविचार के लिए बाध्य हो गया। कुल मिलाकर यह अघोषित सत्य हो गया है कि मीडिया को दरकिनार करके जी पाना अब असंभव है। लोकतांत्रिक देशों में तो मीडिया चतुर्थ स्तंभ के रूप में ही जाने जाते हैं। इस खबर पालिका को कार्यपालिका, विधायिका, न्यायापालिका के समकक्ष ही रखा जाता है। खबर पालिका के अभाव में वह लोकतंत्र लंगड़ा व तानाशाह भी हो जाता है। बहुत पहले प्रयाग के एक शायर अकबर इलाहाबादी ने खबर पालिका की ताकत को राज सत्ता की तोपों से भी ज्यादा शक्तिशाली माना था। उनका यह शेर खबर पालिका में ब्रम्ह बाक्य बन गया कि&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;&lt;strong&gt;”खींचों न कमाने व न तलवार निकालो।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;&lt;strong&gt;जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो॥”&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इन सारी बुलंदियों के बीच खबर पालिका को एक मिशन बनकर उभरना चाहिए। खबर पालिका से जुड़े लोग स्वयं निर्मित एवं स्वयं चयनित होते हैं। ऐसे में राष्ट्र और समाज के प्रति उनका उत्तरदायित्व और गहरा हो जाता है। यदि वह अपने इस कर्तव्य बोध को ठीक से न समझे तो उनके पतीत होने की संभावना पग-पग बनी रहती है। भारत के दुर्भाग्य से भारत में दो प्रकार की खबर पालिका है जो समानांतर जी रही हैं। एक भारत का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पहुंच भारत की भाषा और बोली में 90 प्रतिशत जनता तक है लेकिन 90 प्रतिशत यह लोग कम शिक्षित और चकाचौंध से दूर रहने वाले ही हैं। दूसरी मीडिया जो इंडिया का प्रतिनिधित्व करती है वह 3 प्रतिशत से भी कम लोगों की है लेकिन वह तीसरे पेज पर छाये रहने वाले लोगों के बूम से चर्चित रहती है। यह तीसरे पेज वाले लोग स्वयंभू शासक है और उन्होंने मान लिया है कि भारत पर शासन करने, इसकी दशा और दिशा तय करने और भारतियों को हांकने की मोरूसी लाठी उन्हीं के पास है और यह लोग खबरों को मनमाने ढंग से तोड़ते-मरोड़ते और प्लाटिंग करते रहते हैं। पिछले साल संपन्न हुए कामन बेल्थ खेलों के दौरान और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की अनियमित्ता में नीरा राड़िया के सामने इस इंडिया के अनेक मीडियाकर नंगे पाये गये। कहां पत्रकारिता का आदर्श गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू विष्णु पराडकर, पूर्णचन्द्र गुप्त, महावीर प्रसाद आदि और कहां आज सर्व सुविधायुक्त जमाने में नीरा राडिया का आदर्श। यह तो होना ही था। जब पत्रकार अपने आदर्शों से चूकता है तो वह पूरी व्यवस्थाओं को लेकर डूबता है। पहले ऐसे पत्रकार ‘पीत पत्रकार’ की सूची में जाति भ्रष्ट होते थे। अब तो इन कुजातियों को एक अवसर ही ‘पेड न्यूज’ में दे दिया गया है। लेकिन बात सबसे अधिक तब अखरती है जब पत्रकार दलाल पत्रकारिता और सुपारी पत्रकारिता के स्तर पर पतित होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर समूह की यह स्थिति है कि इनमें से किसी एक के बराबर भी पूरे भारत की सारी प्रिंट मीडिया मिलकर भी नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य है भारत का कि 2 प्रतिशत लोगों के लिए छपने वाले अंग्रेजी समाचार पत्र भारत का नेतृत्व संभालने का दाबा करते हैं। दृश्य पत्रकारिता में अनेक ऐसे ग्रुप आ गये हैं जो अपने राजनैतिक आका की जी-हजूरी को अपना धर्म मानते हैं। अन्यथा सन टीवी और मलयालम मनोरमा का उदय भी कैसे होता? यह तो भला हो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का कि इन लोगों का कुकर्म सामने आ गया। उत्तर भारत के समाचारपत्रों में भी एक-दो छोड़कर ऐसा कोई समाचार समूह नहीं है जो अपने राजनैतिक देवताओं की जी-हजूरी न बताता हो। सहारा समूह, नेशनल हेराल्ड, ऐशियन ऐज, नई दुनिया, टाईम्स ग्रुप आदि की स्वामी भक्ति के आगे तो शर्म भी शर्मशार होने लगी है। ‘इंडिया एक्सप्रेस’ ने जब-जब सहास किया, तब-तब सत्ताधारियों ने उसकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह तो रामनाथ गोयनका और अरूण शौरी की इतनी प्रभुत्य तपस्या थी कि उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा। आज भी सत्ता समर्थक मीडिया को सरकारी विज्ञापनों से मालामाल कर दिया जाता है और सत्य समर्थक मीडिया पर सरकारी पुलिसिया रौब के डंडे फटकारे जाते हैं, उनका जीना दुभर कर दिया जाता है। उन्हें संसदीय या विधानसभाई कार्यवाहियों के प्रवेश पत्र भी नहीं दिये जाते हैं, जबकि सरकारी भौपूओं को देश-विदेश की असमिति यात्राओं सहित फ्लेटस और अनन्यान्य प्रकार की सभी सुविधाओं से सजाकर दामाद जी जैसी आवभगत की जाती है।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-5593909764779299525?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/5593909764779299525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=5593909764779299525' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5593909764779299525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5593909764779299525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='इण्डिया की मीडिया और भारत की मीडिया'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-5TjeiU9CaVU/Th_lB5kmu2I/AAAAAAAAAMM/y_Q2lFBCt48/s72-c/media.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-7107131149996255022</id><published>2011-06-09T14:12:00.002+05:30</published><updated>2011-06-09T14:16:13.525+05:30</updated><title type='text'>भारतीय समाज और गाय</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-2CNAnNpMO10/TfCIA9ZC7nI/AAAAAAAAAME/OrEgvvqVnEA/s1600/cow.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 243px; height: 166px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-2CNAnNpMO10/TfCIA9ZC7nI/AAAAAAAAAME/OrEgvvqVnEA/s400/cow.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5616138285391998578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 255); font-family: Georgia, Georgia; font-size: 14px; line-height: 24px; "&gt;&lt;strong&gt;सौरभ मालवीय&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 14px; line-height: 24px; "&gt;&lt;p&gt;मानवता ने जब भी चेतना को प्राप्त किया तो उसने सर्व शक्ति सम्पन्न को मातृ रूपेण ही देखा है। इसी कारण भारत में ऋषियों ने गऊ माता, गंगा माता, गीता माता, गायत्री माता और धरती माता को समान रूपेण्ा प्रथम पूज्यनीय घोषित किया है। इन पंचमातृकाओं में गाय ही सर्वश्रेष्ठ है और सबकी केन्द्रीय भू-शक्ति है। पौराणिक कथानुसार जब-जब धरती पर विपत्ति आती है तो यह धरणी गाय का भी स्वरूप धारण करती है। परमपिता परमेश्वर के बाद अपनी विपत्ति के निवारण के लिए गाय माता की ही पूजन अर्चन किया जाता है। भारतीय समाज में यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्रकृति की प्रतिनिधि है इसलिये इसकी रक्षा और पूजन कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। सर्व शक्तिमान परमात्मा अपने अन्यान्य शक्तियों के साथ इस धरती पर प्रकट होते हैं। परम पूज्यनीय गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज लिखते हैं -&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center; "&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 0); "&gt;&lt;strong&gt;”बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center; "&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 0); "&gt;&lt;strong&gt;निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अर्थात ब्राम्हण (प्रबुध्द जन) धेनु (गाय) सूर(देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरीत होते हैं। वह परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण हैं कि वह सबका आश्रय है। गाय में 33 कोटि देवी देवताओं का वास रहता है। इस लिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है। गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते है। गाय सरलता शुध्दता और सात्विकता की मूर्ति है। गऊ माता की पीट में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते है, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते है। सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं। मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते है। अपितु हमने माँ इस लिए कहा है कि गाय की ऑंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखो से अधिक आकर्षक होता है अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं। ऋषियों का ऐसा मनतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से ऑंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है। श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी। स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगती में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है। गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है। इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं। उपयोगिता के आधार पर गाय से ज्यादा उपयोगी प्राणी घोड़ा रहा है और घोड़ों के ही कारण बड़ी-बड़ी राज सत्ताएं बनती या बिगड़ती रही है। ऐसा एक भी प्रमाण संसार में नहीं मिलेगा कि गायों के कारण कोई साम्राज्य बना है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दूध के दृष्टि से भी भैंस, बकरी और ऊंट के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता लेकिन इन सारी बातों के बावजूद घोड़ा, हाथी, खच्चर, ऊंट और बकरी एवं भैंस भारतीय चेतना में गाय के पासंग में भी नहीं टिकते और केवल भारत के ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी गाय की महत्ता स्वीकारी गई है। प्राचीनतम काल में निर्मित मिश्र के पीरामिडों पर बछड़ों को दूध पिलाते गाय का चित्र अंकित है। संसार में दूग्ध उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण देश डेनमार्क समूल नाम धेनुमार्क था। भाषा विज्ञानियों के मतानुसार यह धेनुमार्क ही तद्भव होकर डेनमार्क बन गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अठारहवीं शताब्दी में प्रकाशित एक मानचित्र में डेनमार्क की राजधानी कोपेन हेगेन की स्पेलिंग ब्वूचमद भ्महमद लिखा गया है। बैलों के एक बड़े व्यापारी फोर्ड ने 12वीं शताब्दी ब्रिटेन में एक बड़ा मेला प्रारंभ किया उसी के नाम पर उस स्थान का नाम आस्फोर्ड हो गया। न्यूजीलैण्ड की एक वनवासी जाती मावरी भाषा बोलती है उन जनजातियों में गाय की पूजा की जाती है। गाय को मावरी में ”आक” कहते हैं। इसी आक के आधार पर न्यूजीलैण्ड की राजधानी का नाम आकलैण्ड पड़ा। इस प्रकार गाय की महिमा पूरे धरती पर गायी जाती है और गाय मानव जीवन में अत्यन्त उपयोगी है, गाय का दुध अमतृ के समान है इससे प्राप्त दूध, घी, मख्खन मनुष्य शरीर को पुष्ट (बलवान) बनाता है। गाय के मूत्र से विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाई जाती हैं, इसके मूत्र में कैंसर, टी.वी. जैसे गंभीर रोगो से लड़ने की क्षमता होती है और पेट के सभी विकार दूर होते हैं। गाय ही एक मात्र ऐसी प्राणी है जो ऑक्सीजन ग्रहण्ा करती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, यूरिया और यूरिक एसिट होता है। दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्वि होती है जो हृदय रोगों के लिए लाभकारी है। गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ सर्दी, खांसी, जुकाम का नाश हो जाता है। गौमूत्र का एक पाव नित्य प्रात: खाली पेट सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है। गाय की उपस्थिति का पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;परन्तु दुर्भाग्य है हम लोंगों का भारत जैसे पवित्र देश में गोमांस अब एक महत्वपूर्ण व्यापार बन गया है। स्थिति की भयंकरता का अनुमान स्वयं लगा सकते है कि देश के 37 हजार आधुनिक कत्लखानों में 28 सौ गायें प्रति मिनट कटती है। जहाँ 1991 में प्रति दो भारतीय पर एक गोवंश था। अब वह 2001 में प्रति दस भारतीय पर एक गाय बची है। 1991 से 1996 तक 27 आधुनिक कत्तल खाने खोलने के लिए 75 प्रतिशत तक की सरकारी छूट दी गई। सन 1981 तक पूरे भारत का गोमांस निर्यात 39 हजार टन वार्षिक था। अब यह बढ़कर लगभग 5 लाख टन वार्षिक हो गया है। देश की सेकुलर नीति के कारण श्रीकृष्ण, नंदकिशोर गोपाल के इस देश में आज तक समग्र रूपेण्ा गोवध बन्दी का कानून नहीं बनाया जा सका और वोट बैंक की राजनीति के दुष्चक्र में राजस्थान और पश्चिम बंगाल की सीमा गायों की तस्करी का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया। अब गो भक्त जनता का आग्रह इतना तीव्र होना चाहिए कि गाय की हत्या मनुष्य की हत्या जैसा मानकर के कानून बनाया जाय अन्यथा यह भारत विपत्ति के ऐसे जाल में फसता जा रहा है जहां से निकलने का कोई उपाय नहीं है। यदि भारत में गाय नहीं बची तो भारत का विनाश भी नहीं रोका जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-7107131149996255022?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/7107131149996255022/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=7107131149996255022' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/7107131149996255022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/7107131149996255022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='भारतीय समाज और गाय'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-2CNAnNpMO10/TfCIA9ZC7nI/AAAAAAAAAME/OrEgvvqVnEA/s72-c/cow.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-153915116795667930</id><published>2011-01-31T14:09:00.000+05:30</published><updated>2011-01-31T14:12:27.189+05:30</updated><title type='text'>आदिवासी कुंभ से क्या हासिल होगा आरएसएस को</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Georgia, Georgia; font-size: 14px; line-height: 24px; "&gt;&lt;p style="text-align: center; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(153, 51, 0); "&gt;आदिवासियों के मूल सवालों को आखिर कौन उठाएगा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;संजय द्विवेदी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a rel="attachment wp-att-19301" href="http://www.pravakta.com/story/19300/rss-10" style="text-decoration: none; "&gt;&lt;img class="alignright size-large wp-image-19301" title="rss" src="http://www.pravakta.com/wp-content/uploads/2011/01/rss-151x300.jpg" alt="" width="151" height="300" style="padding-top: 4px; padding-right: 4px; padding-bottom: 4px; padding-left: 4px; max-width: 100%; border-top-style: none; border-right-style: none; border-bottom-style: none; border-left-style: none; border-width: initial; border-color: initial; float: right; margin-top: 2px; margin-right: 4px; margin-bottom: 4px; margin-left: 0px; display: inline; " /&gt;&lt;/a&gt;मध्यप्रदेश के ईसाई समुदाय एक बार फिर आशंकित है। ये आशंकाएं जायज हैं या नाजायज यह तो नहीं कहा जा सकता किंतु ईसाई संगठनों के नेताओं ने पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा 10,11,12 फरवरी को मंडला में आयोजित किए जा रहे मां नर्मदा सामाजिक कुंभ को लेकर अपनी आशंकाएं जतायी हैं। इस आयोजन में लगभग 20 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसके चलते ही वहां के ईसाई समुदाय में भय व्याप्त है। मंडला वह इलाका है जहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है, ईसाई संगठनों को आशंका है इस आयोजन के बहाने संघ परिवार के लोग उनके लोगों को आतंकित कर सकते हैं, या उन्हें पुनः स्वधर्म में वापसी के लिए दबाव बना सकते हैं।जाहिर तौर इससे इस क्षेत्र में एक सामाजिक तनाव फैलने का खतरा जरूर है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह भी सवाल काबिलेगौर है कि आखिर इस कुंभ के लिए मंडला का चयन क्यों किया गया। इसके उत्तर बहुत साफ हैं एक तो मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके धर्मांतरित लोगों की संख्या बहुत है। किंतु ईसाई संगठनों की चिंताओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। संघ परिवार ने इस आयोजन के ताकत झोंक दी है किंतु इतने बड़े आयोजन में जहां लगभग २० लाख लोगों के आने की संभावना है आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उनकी जमीनों,जंगलों और जड़ों से उनका विस्थापन। इसी के साथ नक्सलवाद की आसुरी समस्या समस्या उनके सामने खड़ी है। इस बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर धर्मांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या ही बेहतर होता कि संघ परिवार इस महाआयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल,जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेते। किंतु लगता है कि धर्मांतरण जैसे सवालों को उठाने में उसे कुछ ज्यादा ही आनंद आता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मान्तरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कुछ उन प्राथमिक चिंताओं में है जो उसके प्रमुख एजेंडे पर है। यह दुख कहीं-कहीं हिंसक रूप भी ले लेता है, तो कहीं गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी देता है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवाभारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आपको आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे ।बात सिर्फ सेवा को लेकर लगी होड़ की होती तो शायद इस पूरे चित्र हिंसा को जगह नहीं मिलती । लेकिन ‘धर्म’ बदलने का जुनून और अपने धर्म बंधुओं की तादाद बढ़ाने की होड़ ने ‘सेवा’ के इन सारे उपक्रमों की व्यर्थता साबित कर दी है। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी सेवाभावना के साथ जबरिया धर्मान्तरण का लोभ भी जुड़ा है। किंतु विहिप और संघ परिवार इनके तर्कों को खारिज करता है। आज धर्मान्तरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं। और तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर धर्मान्तरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेंघालय, नागालैंड के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्या के नाते उत्पन्न परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को इन बातों के लिए आधार मौजूद कराया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि ‘हिंदू मानस’ में एक भय का वातारण बनाती है। इन निष्कर्षों की स्वीवकार्यता का फलितार्थ हम उड़ीसा की ‘दारा सिंह परिघटना’ के रूप में देख चुके हैं। दारा सिंह इसी हिंदूवादी प्रतिवादी प्रतिक्रिया का चरम है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धर्मान्तरण की यह प्रक्रिया और इसके पूर्वापर पर नजर डालें तो इतिहास के तमाम महापुरुषों ने अपना धर्म बदला था। उस समय लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शों, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गों की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहा भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना, एक लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है, उसके द्वारा की गई हिंसा के ग्लानि से उपजा फैसला है। बाद के दिनों में बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारना एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्रह्माण पुजारी बन गए। कुछ पादरी ब्राह्मण पुजारियों की तरह कहने लगे । इस तरह भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा । सो यह टकराव का कारण नहीं बना । लेकिन सन 1981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिए । सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से संतप्त जनों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थों में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही । इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक-जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय के आसपास महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया । 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया । लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते । लेकिन मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण की कुछेक घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया । संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की, जिसमें दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इससे बिहार के झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में जमीनी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी । जिसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष रूप में सामने आई । कुछ समय पहले इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए चर्चों में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजमुन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वाचल के राज्यों में आईएसआई प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे एकाध उदाहरण भी देश के सद्भाव व सह अस्तित्व की विरासत को चोट पहुंचाने के लिए काफी होते हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाए ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में जहां साक्षरता के हालात बदतर हैं, लोग भावनात्मक नारों के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज धर्मान्तरण के कारकों एवं कारणों का हल स्वयं में ही खोजे। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है। कोई भी व्यक्ति का यह हक उससे ले नहीं सकता, लेकिन इस प्रश्न से पीड़ित जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंडपूर्ण बहुरूपिएपन के खिलाफ शुरू करें। समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ यह जंग जितनी तेज होती जाएगी। धर्मान्तरण जैसे प्रश्न जिनके मूल में अपमान ,तिरस्कार, उपेक्षा और शोषण है, स्वतः समाप्त करने के बजाए वंचितों के दुख-दर्द से भी वास्ता जोड़ना जाहिए। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर बतौर चुनौती इसे स्वीकारना भी चाहिए। जाहिर है इस लड़ाई को दारा सिंह के तरीके से नहीं जीता जा सकता । इसके दो ही मंत्र हैं सेवा और सद्भाव। २० लाख लोगों को मंडला में जुटाकर आरएसएस अगर आदिवासियों के मूल सवालों पर बात नहीं करता तो अकेले धर्मांतरण का सवाल इस कुंभ को सार्थक तो नहीं बनाएगा। &lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-153915116795667930?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/153915116795667930/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=153915116795667930' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/153915116795667930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/153915116795667930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/01/blog-post_31.html' title='आदिवासी कुंभ से क्या हासिल होगा आरएसएस को'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-6236679418726757235</id><published>2011-01-15T20:53:00.002+05:30</published><updated>2011-01-15T20:59:42.398+05:30</updated><title type='text'>मां नर्मदा सामाजिक कुंभ</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/TTG80PtG_1I/AAAAAAAAAL0/5cW3GbXVw5s/s1600/Maa-Narmada1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5562434620534226770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 288px; CURSOR: hand; HEIGHT: 224px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/TTG80PtG_1I/AAAAAAAAAL0/5cW3GbXVw5s/s400/Maa-Narmada1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा क्षिप्रा, गोदावरी, कावेरी जैसी पवित्र नदियों के किनारे ही सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान से आलोकित करने वाली सनातन संस्कृति ने जन्म लिया। इन नदियों के तटों पर ही आयोजित होने वाले कुम्भों में देश के कोने-कोने से संत व प्रबुद्धजन एकत्र होकर काल, परिस्थिति का समग्र विश्लेषण करने के साथ समाज का मार्गदर्शन करते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;आज देश के सामने अनेक संकट खड़े हो गए हैं। आतंकवाद, अलगाववाद चरम सीमा पर है। विधर्मी मतान्तरण का कुचक्र चला रहे हैं। समाज को अपनी आस्थाओं के प्रति दृढ़ बनाना आज की आवश्यकता है। समाज में समरसता निर्माण हो तभी संपूर्ण राष्ट्र की एकता संभव है। इन सभी विषयों को ध्यान में रखकर मां नर्मदा के पावन तट पर मां नर्मदा सामाजिक कुंभ 10 से 12 फरवरी 2011 माघ शुल्क सप्तमी, अष्टमी एवं नवमीं को संपन्न होगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;विस्तार क्षेत्र&lt;br /&gt;इस कुंभ में मध्यभारत, महाकोशल, मालवा, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, काशी, गुजरात, विदर्भ, आंध्रप्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश आदि प्रांतों से 20 से 30 लाख के बीच लोगों के आने की संभावना है। कुंभ के लिए जनजागरण करने हेतु दिसंबर मास से गांव-गांव में नर्मदा गाथा सुनाने का कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस जागरण कार्यक्रम में मंडला का महत्व, मां नर्मदा की महिमा, रानी दुर्गावती की बलिदान की गाथा, गोड वंश का गौरवशाली इतिहास आदि बताया जा रहा है। इस सामाजिक कुंभ में देश के प्रख्यात संत महात्मा और महापुरूषों का सान्निध्य मिलेगा वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय पदाधिकारी एवं स्वयंसेवक विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;प्रमुख उपस्थिति&lt;br /&gt;इस धार्मिक आयोजन में मुख्य रूप से रा. स्व. संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी, निवर्तमान सरसंघचालक श्री कुप्प. सी. सुदर्शन, सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी, श्री दत्ता होसबोले, श्री गोविंदगिरी महाराज (आचार्य किशोर जी व्यास), जगद्गुरू बदरीपीठ श्री वासुदेवानंद सरस्वती, पूज्य दीदी मां ऋतंभरा जी, भारतमाता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद जी, आचार्य महामंडलेश्वर श्यामदासजी महाराज-जबलपुर, म.म. सुखदेवानंदजी- अमरकंटक, जगद्गुरू राजराजसेवाश्रम- हरिद्वार रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवानंद, साध्वी निरंजनज्योति – कानपुर, बाल्मीकि संत श्री मानदासजी – हरिद्वार, युगपुरूष म.म. स्वामी परमांद गिरी- हरिद्वार, स्वामी गिरीशानंद – जबलपुर म.म. मैत्रेयगिरीजी महाराज – मंगलोर, ऐश्वर्यानंद सरस्वती- इंदौर, रामहृदयदास- चित्रकूट, योगी आदित्यनाथ- गोरखपुर म.म. शान्तिस्वरूपानंद गिरी उज्जैन, शंभूनाथ महाराज गुजरात, दशनामी पचायती महानिर्मोही अखाड़ा के प्रमुख महामंडलेश्वर आचार्य सुखदेवानंद जी- अमरकंटक सहित अनेक संत उपस्थित रहेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कुंभ के तीन उद्देश्य रहेंगे&lt;br /&gt;धर्म का दृढ़ीकरण, विकास के साथ सामाजिक समरसता और राष्ट्र की एकता और अखंडता इनके बारे में अलख जगाना। जनजागृति के लिए 30 लाख मां नर्मदा चित्र घर-घर स्थापित किए जाएंगे तथा पांच लाख स्टीकर्स कुंभ मं सहभागी लोगों के लिए प्रवेशिका रहेंगी। कुल 8 लाख प्रवेशिका छपेगी जिसमें 4 लाख मप्र को, 2 लाख छत्तीसगढ़ को, विदर्भ आंध्रप्रदेश, गुजरात आदि को मिलाकर 1 लाख प्रवेशिका बटेंगी।&lt;br /&gt;गांव-गांव में प्रचार के लिए 20 हजार सीडी एवं कैसेट बने हैं, उसमें से 10 हजार कैसेट का वितरण हो चुका है, डॉक्युमेंटरी फिल्म चल रही है।&lt;br /&gt;संगठन रचना &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;प्रत्येक ब्लॉक, तालुका तथा जिला स्तर पर कुंभ आयोजन समिति का गठन किया गया है, केन्द्रीय कुंभ आयोजन समारोह समिति उसके पश्चात् प्रांत, जिला तालुका ब्लॉक तथा गांव स्तर पर कुंभ समारोह समिति का गठन हुआ है जो सभी को साथ लेकर चल सकता है ऐसे व्यक्ति को समिति का संयोजक तथा उसका साथ देने वाले को सह-संयोजक बनाया गया है। ब्लॉक स्तर पर कोष प्रमुख, प्रचार, प्रमुख सामग्री संग्रह प्रमुख यातायात प्रमुख, संस्कृति प्रशासन संपर्क जाति बिरादरी प्रमुख, महिला प्रमुख, युवा प्रमुख, परावर्तन प्रमुख गांव स्तर पर 11 लोगों की समिति जिसमें संघ के विभिन्न संगठनों के सदस्य रहेंगे। इस समिति में अधिकतम सदस्यों की संख्या 11 से 21 तक रहेगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कुंभ की तैयारी&lt;br /&gt;संपूर्ण कुंभ क्षेत्र को मंडला महारानी दुर्गावती का नाम दिया है। चार भव्य प्रवेशद्वार रहेंगे। तीन बड़े मंडप-स्वामी लक्ष्मणानंदजी के नाम पर, महिलाओं के लिए रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर और युवाओं के लिए हनुमानजी क नाम पर बनाए जाएंगे। स्वामी लक्ष्मणानंद कहते थे कि ईसाई मिशनरी हमें मार डालेंगे क्योंकि हम अपने हिंदुओं को जगाने का काम करते हैं। मेरे मरने के बाद भी हिन्दुत्व का बचाव कार्य जारी रहेगा। रानी लक्ष्मीबाई ने विदेशी आक्रमणकारियों के साथ लड़कर उनको उखाड़ फेंकने का संदेश दिया। हनुमानजी हर समस्या से मार्ग निकालने, धैर्य साहस तथा ज्ञान से काम करने का संदेश देते हैं। मंडला के समीप महारजपुर के पास कुल 3500 एकड़ जमीन क्षेत्र पर कुल 45 नगर बनेंगे। प्रत्येक नगर में 5 हजार लोगों के रहने, भोजन आदि की व्यवस्था रहेगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;भोजन विभाग&lt;br /&gt;स्नान के लिए नर्मदा पर घाट बनाए गए हैं। हर स्नान घाट पर गोताखोरों की व्यवस्था, महिलाओं के कपड़े बदलने की व्यवस्था की गई है। भोजनालयों में 2 से 3 लाख लोगों का भोजन बनेगा। भोजन बनाने के लिए गुजरात से 1400 तथा वितरण करने हेतु 600 से 2 हजार लोग आएंगे तथा भोजन पंक्ति में परोसा जाएगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;स्वास्थ्य विभाग&lt;br /&gt;संपूर्ण कुंभ क्षेत्र में 20 बेड का सुसज्जित आकस्मिक सेवा से परिपूर्ण आईसीयू एम्बुलेंस आदि की सुविधाओं के साथ अस्पताल रहेगा।&lt;br /&gt;एक मध्यवर्ती भंडार होगा तथा सुरक्षा की दृष्टि से एक केंद्रीय नियंत्रण कक्ष रहेगा। साथ ही तीन उपनियंत्रण कक्ष होंगे। सुरक्षा के लिए 3 से 5 हजार पुलिसकर्मी भी कुंभ स्थल पर रहने वाले हैं। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;प्रदर्शनी&lt;br /&gt;सारे कुभ में 10 प्रदर्शनियां लगने वाली हैं। उनके विषय-रानी दुर्गावती, पर्यावरण एवं मां नर्मदा, सीख, गुरूपुत्रों की बलिदान गाथा, राष्ट्रीय एकता विधर्मियों के कुटिल हथकंडे विश्वमंगल गौमाता, जलसंरक्षण, सामाजिक सुरक्षा, महाराणा प्रताप, अयोध्या राममंदिर इत्यादि। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;व्यवस्था विभाग&lt;br /&gt;कुंभ की संपूर्ण व्यवस्था निर्बाध रूप से चले इस हेतु 10 विभागों की रचना की गई है। ये विभाग हैं-विश्वकर्मा (निर्माण), वरूण (जल, ध्वनि तथा विद्युत) नारद (प्रचार और प्रसार), हनुमान (सुरक्षा एवं चिकित्सा), अन्नपूर्ण (भोजन), साधन संग्रह, केशव (सभी संघ के वरिष्ठ अधिकारी, वीआईपी तथा वीवीआईपी व्यवस्था) प्रचार धर्मजागरण, गरूड़ विभाग (यातायात)। एक हैलिपैड बनाया गया है तथा तीन प्रमुख वाहन पार्किंग स्थल रहेंगे, जहां 1 हजार बड़े तथा 1 हजार छोटे वाहन पार्क किए जा सकेंगे। इसके अलावा प्रत्येक नगर में पार्किंग की व्यवस्था रहेगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम विशेष&lt;br /&gt;3 फरवरी से 9 फरवरी तक कुंभ स्थान पर श्री अतुल कृष्ण जी भारद्वाज के श्रीमुख से श्री राम कथा प्रारंभ होगी, पूज्य कन्हैयालालजी महाराज के संचालन में वृंदावन के श्री भुवनेश्वर महाराज रासलीला रात्रि 7.30 से, प्रदर्शनी का उद्धाटन 8 फरवरी को होगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;9 फरवरी को देशभर के वंशावली लेखकों का सम्मेलन, 10 फरवरी को कुंभ का विधिवत उद्धाटन होगा। तीन दिन चलने वाले इस कुंभ में धर्म सभा, युवा सम्मेलन, संत सम्मेलन, महिला सम्मेलन, मां नर्मदा की आरती और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। प्रस्ताव तथा उद्धोषणा पत्र भी अंतिम दिन जारी रहेगा। कुंभ के उद्धाटन पर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;कुंभ के लिए सामग्री&lt;br /&gt;महाराष्ट्र से चीनी, मुंबई 50 लाख लॉकेट बनाकर दिए हैं। जबलपुर से 6 लाख परिवारों से प्रति रविवार 1 किलो चावल और आधा किलो दाल का संग्रह होगा। महाकौशल से 20 लाख परिवारों से संपर्क होगा। 1 किलो चावल, आधा किलो दाल और एक रूपया घर-घर से किया जाएगा। छत्तीसगढ़ से चावल तथा दाल और ब्रज प्रांत से 15 ट्रक आलू प्राप्त होंगे। भोजन बनाने और वितरण में गुजरात से दो हजार लोग आएंगे। प्रचार साहित्य बनाने में छत्तीसगढ़ की सराहनीय भूमिका रही जिसके तहत 30 हजार सीडीज और 20 लाख पत्रक युगबोध प्रकाशन, रायपुर से प्राप्त हुई है। मध्यप्रदेश सरकार ने मंडला को पवित्र नगरी घोषित करते हुए यहां के विकास के लिए विशेष बजट देकर सहयोग दिया है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-6236679418726757235?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/6236679418726757235/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=6236679418726757235' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6236679418726757235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6236679418726757235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/01/blog-post_15.html' title='मां नर्मदा सामाजिक कुंभ'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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दिग्विजयी हो यह अभिनन्दन करते है&lt;br /&gt;सौरभ मालवीय &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-6797504661223965874?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/6797504661223965874/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=6797504661223965874' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6797504661223965874'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6797504661223965874'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title=''/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/TS1fuDmCuvI/AAAAAAAAALs/swDfpXgcBto/s72-c/vivekanand.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-5208601708176281023</id><published>2010-10-07T16:16:00.003+05:30</published><updated>2010-10-07T16:21:46.919+05:30</updated><title type='text'>अयोध्या की समस्या के मूल में संवादहीनता</title><content type='html'>&lt;strong&gt; प्रो बृज किशोर कुठियाला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ ने राम जन्मभूमि का जो निर्णय दिया उससे पूरे देश की जनता ने राहत की सांस ली है। फैसले से पूर्व का तनाव सभी के चेहरों और व्यवहार में था। परन्तु इस राहत के बाधित होने की संभावनाएं बनती नज़र आ रही हैं। 60 वर्ष से अधिक की नासमझी और विवेकहीनता के कारण एक छोटा सा विवाद पहाड़ जैसी समस्या बन गया है। उसी तरह की विवेकहीनता यदि आज भी रही तो सुलझी हुई समस्या फिर से उलझ जाएगी। कारण अनेक हो सकते हैं, परन्तु एक मुख्य कारण हमारे राष्ट्रजीवन में बढ़ती हुई संवादहीनता है। उच्च न्यायालय के निर्णय से तीन मुख्य पक्ष उभर कर आये हैं। एक पक्ष ने उच्चतम न्यायालय जाने की घोषणा की है। देश से अनेक प्रतिक्रियाएं आई हैं। परन्तु एक भी प्रतिक्रिया में यह सुझाव नहीं है तीनों पक्ष आपस में वार्ता करे। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री तीनों की मुख्य जिम्मेदारी बनती है, उनमें से किसी ने भी न तो संवाद बनाने का प्रयास किया न ही संवाद का सुझाव दिया।     प्रबंधन शास्त्र का एक मूलभूत सिद्धान्त है कि समुचित संवाद से संस्थाओं और समूहों का स्वास्थ्य सुन्दर बना रहता है। छोटी-बड़ी संस्थाओं के लिए न केवल मिशन और उद्देश्यों के निर्धारण में वार्ता के महत्व को बताया गया है परन्तु तत्कालीन उद्देश्य भी यदि चर्चाओं के कारण आम सहमति से बने तो संस्थाएं विकासोन्मुख होती है। राष्ट्र जैसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक व्यवस्था में भी संवाद की अनिवार्यता सर्वमान्य है। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में औपचारिक य अनौपचारिक संवाद शून्य से थोड़ा ही अधिक है। यही कारण है कि छोटी-छोटी समस्याएं विकराल रूप ले लेती हैं। उदाहरण के लिए कश्मीर घाटी के मुसलमानों और उसी घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के बीच पूर्ण संवादहीनता है। माओवादियों और सरकार के बीच वार्ता के छूट-मुट प्रयासों में कोई गंभीरता नज़र नहीं आती। यहा तक की देश को चलाने वाली मुख्य राजनीतिक पार्टियों में अधिकतर संवाद संसद और विधानसभाओं में ही बनता है जहां कोशिश एक दूसरे के दोष ढूंढने की होती है, न की वार्ता के द्वारा समस्याओं का हल ढूंढने की।अयोध्या का मसला भी संवादहीनता का ही परिणाम है। मुगलों के कार्यकाल में ढांचा बनाते समय स्थानीय लोगों से वार्ता नहीं की। अयोध्या के मुस्लिमों और हिन्दुओं में इस विषय पर वार्ता का कोई दृष्टान्त नहीं है। अग्रेंजों ने जो वार्ताएं की वे समस्या को सुलझाने की नहीं थी बल्कि एक पक्ष के मन में दूसरे के प्रति बैर-भाव को बढ़ाने की थी। 1949 में मूर्तियां रखने में कोई वार्ता नहीं हुई। ताला लगाने और ताला खोलने के समय संबंधित पक्षों से परामर्श नहीं हुआ। एक समय ऐसा भी आया जब सारा देश अयोध्या की बात कर रहा था परन्तु सभी अपना-अपना बिगुल बजा रहे थे। सरकारी तौर पर कुछ वार्ताओं के नाटक तो हुए परन्तु कुल मिलाकर ऐसा परामर्श जिससे उलझन को मिटाना ही है, कभी नहीं हुआ। ढांचा गिरने के बाद भी विषय संबंधित शोर बहुत हुआ परन्तु संवाद शून्य रहा।   अन्य समस्याओं की तरह अयोध्या विषयक समाचार, विश्लेषण, टिप्पणियां और चर्चाएं मीडिया में अनेक आईं परन्तु उनके कारण से समाज में कोई संवाद बना हो ऐसा नहीं हुआ। टेलीविजन पर हुई चर्चाएं एक ओर तो पक्षधर होती है दूसरी ओर वार्ताओं में मतप्रकटीकरण और विवाद बहुत होता है परन्तु ऐसी कोई चर्चा नहीं होती जिसके अन्त में सभी एक मत होकर समस्या के हल की ओर चलते हों। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता है जब टेलीविजन की वार्ता में किसी ने माना हो कि वह गलत था और उस चर्चा के परिणामस्वरूप अपना मत परिवर्तन करेगा। प्रबंधन शास्त्र में दिये गये चर्चा के द्वारा आम सहमति बनाने के संभी सिद्धान्तों की मीडिया में अवेहलना होती है। शंकराचार्य के वर्गीकरण के अनुसार टेलीविजन की चर्चाएं न तो संवाद हैं, न ही वाद-विवाद वे तो वितण्डावाद का साक्षात उदाहरण हैं।     इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अत्यन्त विवेकपूर्ण व व्यावहारिक फैसला देकर यह सिद्ध किया है कि देश की न्यायापालिका कम से कम समस्याओं का समाधान सुझाने में तो सक्षम है। परन्तु दिए गए सुझावों का क्रियान्वयन तो मुख्यतः केन्द्र सरकार को और कुछ हद तक राज्य सरकार को और देखा जाए तो सभी राजनीतिक दलों को करना है। निर्णय के बाद की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि ऐसा प्रयास होने वाला नहीं है। जैसे कबूतर बिल्ली को देखकर आंख मूंद लेता है मानों बिल्ली है ही नहीं वैसे ही केन्द्र सरकार ने यह मन बना लिया है कि उच्चतम न्यायालय की शरण में ही किसी न किसी पक्ष को जाना है और कोई भी कार्यवाही करने के लिए तुरन्त कुछ करना नहीं है। क्या राष्ट्र की चिति इतनी कमजोर है कि तीनों पक्षों को बिठाकर आम सहमति न बन सके। संवाद शास्त्र का भी सिद्धान्त है कि संवादहीनता अफवाहों व गलतफहमियों को जन्म देती है जिससे संबंध खराब होते हैं और परिणामस्वरूप नई समस्याएं जन्म लेती है और पुरानी और उलझती है। इसी सिद्धान्त का दूसरा पहलू यह भी है ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे संवाद से सुलझाया न जा सके। इसलिए न केवल संवाद होना चाहिये परन्तु संवाद में ईमानदारी और समाजहित भी निहित होना चाहिए।  आज देश में ऐसी अनेक प्रयास होने चाहिए जो विभिन्न वर्गों, पक्षों और समुदायों में लगातार संवाद बनाए रखें। संवादशील समाज में समस्याओं की कमी तो होगी परन्तु यदि समस्याएं बनती भी है तो गंभीर और ईमानदार संवाद से उनको अधिक उलझने से बचाया जा सकता है। व्यक्तिगत जीवन में हम संवाद की सहायता से जीवन को आगे बढ़ाते हैं तो राष्ट्रजीवन में भी ऐसा क्यों न करे, क्योंकि सुसंवादित समाज ही सुसंगठित समाज की रचना कर सकता है। देखना यह है कि रामलला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को एक मंच पर लाने की पहल कौन करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-5208601708176281023?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/5208601708176281023/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=5208601708176281023' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5208601708176281023'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5208601708176281023'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अयोध्या की समस्या के मूल में संवादहीनता'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-4608329829420983938</id><published>2010-06-28T19:10:00.000+05:30</published><updated>2010-06-28T19:12:33.100+05:30</updated><title type='text'>स्‍वतंत्रता संग्राम में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की भूमिका</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: lucida, verdana, sans-serif; font-size: 12px; line-height: 15px; "&gt;&lt;hr /&gt;&lt;div id="textchange" style="text-align: left; line-height: 25px; font-size: 15px; "&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;a rel="attachment wp-att-10815" href="http://www.pravakta.com/?attachment_id=10815" style="font-family: tahoma, lucida, verdana, sans-serif; font-size: 12px; font-weight: normal; color: rgb(0, 102, 204); text-decoration: none; "&gt;&lt;img class="alignright size-full wp-image-10815" title="2007122657200401" src="http://www.pravakta.com/wp-content/uploads/2010/06/20071226572004015.jpg" alt="" width="350" height="233" style="border-top-style: none; border-right-style: none; border-bottom-style: none; border-left-style: none; border-width: initial; border-color: initial; text-decoration: none; border-width: initial; border-color: initial; padding-top: 4px; padding-right: 4px; padding-bottom: 4px; padding-left: 4px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 2px; margin-left: 7px; float: right; font-weight: bold; display: inline; " /&gt;&lt;/a&gt;संघ संस्‍थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार&lt;/strong&gt; जन्‍मजात देशभक्‍त और प्रथम श्रेणी के क्रांतिकारी थे। वे युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्‍लवी संगठनों में डॉ. पाण्‍डुरंग खानखोजे, श्री अरविन्‍द, वारीन्‍द्र घोष, त्रैलौक्‍यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे। रासबिहारी बोस और शचीन्‍द्र सान्‍याल द्वारा प्रथम विश्‍वयुद्ध के समय 1915 में सम्‍पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्‍यभारत के प्रमुख थे। उस समय स्‍वतंत्रता आंदोलन का मंच कांग्रेस थी। उसमें भी उन्‍होंने प्रमुख भूमिका निभाई। 1921 और 1930 के सत्‍याग्रहों में भाग लेकर कारावास का दण्‍ड पाया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;1925 की विजयादशमी पर संघ स्‍थापना करते समय डॉ. हेडगेवार जी का उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता ही था। संघ के स्‍वयंसेवकों को जो प्रतिज्ञा दिलाई जाती थी उसमें राष्‍ट्र की स्‍वतंत्रता प्राप्ति के लिए तन-मन-धन पूर्वक आजन्‍म और प्रामाणिकता से प्रयत्‍नरत रहने का संकल्‍प होता था। संघ स्‍थापना के तुरन्‍त बाद से ही स्‍वयंसेवक स्‍वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने लगे थे।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;क्रान्तिकारी स्‍वयंसेवक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;संघ का वातावरण देशभक्तिपूर्ण था। 1926-27 में जब संघ नागपुर और आसपास तक ही पहुंचा था उसी काल में प्रसिद्ध क्रान्तिकारी राजगुरू नागपुर की भोंसले वेदशाला में पढते समय स्‍वयंसेवक बने। इसी समय भगतसिंह ने भी नागपुर में डॉक्‍टर जी से भेंट की थी। दिसम्‍बर 1928 में ये क्रान्तिकारी पुलिस उपकप्‍तान सांडर्स का वध करके लाला लाजपत राय की हत्‍या का बदला लेकर लाहौर से सुरक्षित आ गए थे। डॉ. हेडगेवार ने राजगुरू को उमरेड में भैया जी दाणी (जो बाद में संघ के अ.भा. सरकार्यवाह रहे) के फार्म हाउस पर छिपने की व्‍यवस्‍था की थी।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे देश में उसका बहिष्‍कार हुआ। नागपुर में हडताल और प्रदर्शन करने में संघ के स्‍वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में थे।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;महापुरूषों का समर्थन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;1928 में विजयादशमी उत्‍सव पर भारत की असेम्‍बली के प्रथम अध्‍यक्ष और सरदार पटेल के बडे भाई श्री विट्ठल भाई पटेल उपस्थित थे। अगले वर्ष 1929 में महामना मदनमोहन मालवीय जी ने उत्‍सव में उपस्थित हो संघ को अपना आशीर्वाद दिया। स्‍वतंत्रता संग्राम की अनेक प्रमुख विभूतियां संघ के साथ स्‍नेह संबंध रखती थीं।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;शाखाओं पर स्‍वतंत्रता दिवस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;31 दिसम्‍बर, 1929 को लाहौर में कांग्रेस ने प्रथम बार पूर्ण स्‍वाधीनता को लक्ष्‍य घोषित किया और 16 जनवरी, 1930 को देश भर में स्‍वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्‍चय किया गया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;डॉ. हेडगेवार ने दस वर्ष पूर्व 1920 के नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्‍वतंत्रता संबंधी प्रस्‍ताव रखा था, पर तब वह पारित नहीं हो सका था। 1930 में कांग्रेस द्वारा यह लक्ष्‍य स्‍वीकार करने पर आनन्दित हुए हेडगेवार जी ने संघ की सभी शाखाओं को परिपत्र भेजकर रविवार 26 जनवरी, 1930 को सायं 6 बजे राष्‍ट्रध्‍वज वन्‍दन करने और स्‍वतंत्रता की कल्‍पना और आवश्‍यकता विषय पर व्‍याख्‍यान की सूचना करवाई। इस आदेश के अनुसार संघ की सब शाखाओं पर स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;सत्‍याग्रह&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;6 अप्रैल, 1930 को दांडी में समुद्रतट पर गांधी जी ने नमक कानून तोडा और लगभग 8 वर्ष बाद कांग्रेस ने दूसरा जनान्‍दोलन प्रारम्‍भ किया। संघ का कार्य अभी मध्‍यभारत प्रान्‍त में ही प्रभावी हो पाया था। यहां नमक कानून के स्‍थान पर जंगल कानून तोडकर सत्‍याग्रह करने का निश्‍चय हुआ। डॉ. हेडगेवार संघ के सरसंघचालक का दायित्‍व डॉ. परांजपे को सौंप स्‍वयं अनेक स्‍वयंसेवकों के साथ सत्‍याग्रह करने गए।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;जुलाई 1930 में सत्‍याग्रह हेतु यवतमाल जाते समय पुसद नामक स्‍थान पर आयोजित जनसभा में डॉ. हेडगेवार के सम्‍बोधन में स्‍वतंत्रता संग्राम में संघ का दृष्टिकोण स्‍पष्‍ट होता है। उन्‍होंने कहा- ‘स्‍वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के बूट की पालिश करने से लेकर, उनके बूट को पैर से निकाल कर उससे उनके ही सिर को लहुलुहान करने तक के सब मार्ग मेरे स्‍वतंत्रता प्राप्ति के साधन हो सकते हैं। मैं तो इतना ही जानता हूं कि देश को स्‍वतंत्र कराना है।‘’&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;डॉ. हेडगेवार के साथ गए सत्‍याग्रही जत्‍थे मे आप्‍पा जी जोशी (बाद में सरकार्यवाह) दादाराव परमार्थ (बाद में मद्रास में प्रथम प्रान्‍त प्रचारक) आदि 12 स्‍वयंसेवक थे। उनको 9 मास का सश्रम कारावास दिया गया। उसके बाद अ.भा. शारीरिक शिक्षण प्रमुख (सर सेनापति) श्री मार्तण्‍ड राव जोग, नागपुर के जिलासंघचालक श्री अप्‍पाजी हळदे आदि अनेक कार्यकर्ताओं और शाखाओं के स्‍वयंसेवकों के जत्‍थों ने भी सत्‍याग्रहियों की सुरक्षा के लिए 100 स्‍वयंसेवकों की टोली बनाई जिसके सदस्‍य सत्‍याग्रह के समय उपस्थित रहते थे।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;8 अगस्‍त को गढवाल दिवस पर धारा 144 तोडकर जुलूस निकालने पर पुलिस की मार से अनेक स्‍वयंसेवक घायल हुए।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;विजयादशमी 1931 को डाक्‍टर जी जेल में थे, उनकी उनुपस्थिति में गांव-गांव में संघ की शाखाओं पर एक संदेश पढा गया, जिसमें कहा गया था- ‘’देश की परतंत्रता नष्‍ट होकर जब तक सारा समाज बलशाली और आत्‍मनिर्भर नहीं होता तब तक रे मना ! तुझे निजी सुख की अभिलाषा का अधिकार नहीं।‘’&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;जनवरी 1932 में विप्‍लवी दल द्वारा सरकारी खजाना लूटने के लिए हुए बालाघाट काण्‍ड में वीर बाघा जतीन (क्रान्तिकारी जतीन्‍द्र नाथ) अपने साथियों सहित शहीद हुए और श्री बाला जी हुद्दार आदि कई क्रान्तिकारी बन्‍दी बनाए गए। श्री हुद्दार उस समय संघ के अ.भा. सरकार्यवाह थे।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;संघ पर प्रतिबन्‍ध&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;संघ के विषय में गुप्‍तचर विभाग की रपट के आधार पर मध्‍य भारत सरकार (जिसके क्षेत्र में नागपुर भी था) ने 15 दिसम्‍बर 1932 को सरकारी कर्मचारियों को संघ में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;डॉ. हेडगेवार जी के देहान्‍त के बाद 5 अगस्‍त 1940 को सरकार ने भारत सुरक्षा कानून की धारा 56 व 58 के अन्‍तर्गत संघ की सैनिक वेशभूषा और प्रशिक्षण पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;1942 का भारत छोडो आंदोलन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;संघ के स्‍वयंसेवकों ने स्‍वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारत छोडो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। विदर्भ के अष्‍टी चिमूर क्षेत्र में समानान्‍तर सरकार स्‍थापित कर दी। अमानुषिक अत्‍याचारों का सामना किया। उस क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक स्‍वयंसेवकों ने अपना जीवन बलिदान किया। नागपुर के निकट रामटेक के तत्‍कालीन नगर कार्यवाह श्री रमाकान्‍त केशव देशपांडे उपाख्‍य बाळासाहब देशपाण्‍डे को आन्‍दोलन में भाग लेने पर मृत्‍युदण्‍ड सुनाया गया। आम माफी के समय मुक्‍त होकर उन्‍होंने वनवासी कल्‍याण आश्रम की स्‍थापना की।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;देश के कोने-कोने में स्‍वयंसेवक जूझ रहे थे। मेरठ जिले में मवाना तहसील पर झण्‍डा फहराते स्‍वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, अनेक घायल हुए।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;आंदोलनकारियों की सहायता और शरण देने का कार्य भी बहुत महत्‍व का था। केवल अंग्रेज सरकार के गुप्‍तचर ही नहीं, कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी के आदेशानुसार देशभक्‍तों को पकडवा रहे थे। ऐसे में जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली दिल्‍ली के संघचालक लाला हंसराज गुप्‍त के यहां आश्रय पाते थे। प्रसिद्ध समाजवादी श्री अच्‍युत पटवर्धन और साने गुरूजजी ने पूना के संघचालक श्री भाऊसाहब देशमुख के घर पर केन्‍द्र बनाया था। ‘पतरी सरकार’ गठित करनेवाले प्रसिद्ध क्रान्तिकर्मी नाना पाटील को औंध (जिला सतारा) में संघचालक पं. सातवलेकर जी ने आश्रय दिया।&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 255); "&gt;स्‍वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघ की योजना&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 6px; margin-left: 10px; "&gt;ब्रिटिश सरकार के गुप्‍तचर विभाग ने 1943 के अन्‍त में संघ के विषय में जो रपट प्रस्‍तुत की वह राष्‍ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है, जिसमें सिद्ध किया है कि संघ योजनापूर्वक स्‍वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ रहा है।&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-4608329829420983938?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/4608329829420983938/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=4608329829420983938' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/4608329829420983938'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/4608329829420983938'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='स्‍वतंत्रता संग्राम में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की भूमिका'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-891428809294306093</id><published>2010-05-25T18:16:00.001+05:30</published><updated>2010-05-25T18:22:40.648+05:30</updated><title type='text'>सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ</title><content type='html'>लेखक- नरेन्द्र मोहन&lt;br /&gt;हिन्दुत्व एक ऐसी भू-सांस्कृतिक अवधारणा है, जिसमें सभी के लिए आदर है, स्थान है और सह-अस्तित्व का भाव भी। इस सह-अस्तित्व प्रधान सांस्कृतिक चेतना ने उसे अत्यंत उदार, सहिष्णु और लचीला भी बनाया। बात तब बिगड़ी जब विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृतियों ने इस अति सहिष्णु संस्कृति की उदारता का लाभ उठा कर इसकी जड़ें ही काटनी प्रारंभ कर दीं। हिन्दुत्व की इस अति-सहिष्णुता को उसकी कायरता माना गया तथा उसके जो भी मूल तत्व थे उन्हें नष्ट-भ्रष्ट करने की हर संभव चेष्टा की गई। अभी भी इस हेतु तरह-तरह के षडयंत्र रचे जा रहे हैं।आक्रमणकारियों के समक्ष पलायन करने की नीति का सह-अस्तित्व, सहिष्णुता के दर्शन और सिध्दांत से कुछ भी लेना देना नहीं है। सह-अस्तित्व व सहिष्णुता और 'आत्मवत्' दर्शन के जो भी शत्रु हैं उनसे मोर्चा लेने, युध्द करने तथा उन्हें पराजित करने का कर्त्तव्य-कर्म तो हिन्दुत्व का आधारस्तंभ अनादि काल से रहा है और रहेगा। जब-जब आक्रमणकारी शत्रुओं से युध्द करने में हिन्दुत्व से चूक हुई तब-तब न केवल अपमान सहना पड़ा है, बल्कि पराधीनता में भी रहना पड़ा है।आज हिन्दुत्व को राजनीति से जोड़ा जा रहा है। उसे एक राजनीतिक अथवा साम्प्रदायिक अवधारणा कह कर लांछित और अपमानित किया जा रहा है। दुख की बात यह है कि यह लांछन अभारतीय तो लगा ही रहे हैं, पर हम भारतवासी भी स्वयं लगा रहे हैं। स्वाधीनता के पहले हिन्दुत्व के प्रति अपमानजनक भाव रखने वालों की संख्या कम थी और केवल दुराग्रही व आक्रमणकारी संस्कृतियों के प्रति तुष्टिकरण का भाव रखने वाले ही 'हिन्दू' शब्द को साम्प्रदायिक बताते थे पर स्वाधीनता के बाद तो 'हिन्दुत्व' को गाली देना और उसका अपमान करना एक बौध्दिक फैशन बन गया और विडंबना यह है कि अपमान, लांछन व तिरस्कार के इस विष को बिना किसी प्रतिकार के 'प्रगतिवाद' के नाम पर सहन किया जा रहा है।लगभग दो हजार वर्षों की दासता ने यही सिखाया है कि विदेशी संस्कृतियां हमारा सहयोग नहीं करना चाहतीं, वे हमें तोड़ कर तथा धवस्त करके हम पर शासन करना चाहती है। विदेशी संस्कृतियां चाहती हैं कि भारत अपनी अस्मिता भुला दे, उसे छोड़ दें, अत: हमें विदेशी प्रचार के उनके प्रलोभनों के प्रति सावधान रहना होगा।भारत की मूर्छा धीरे-धीरे टूट रही है और यह एक शुभ लक्षण है। 'हिन्दुत्व' के प्रति जो भ्रम उत्पन्न किए गए हैं उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने नकार दिया है। &lt;br /&gt; भारत के कुछ राजनीतिक दल अज्ञानवश आज भी हिन्दुत्व के प्रति शंकालु हैं। उन्हें हिन्दुत्व की ऊर्जा, उसका तप और उसका सर्वकल्याणकारी भाव ही नहीं दिखाई देता। ऐसे राजनीतिज्ञों से न तो डरने की आवश्यकता होती है और न ही चिन्तित होने की। हाल के वर्षों में वोट बैंक की राजनीति के दुष्प्रभाव में आकर हिन्दुत्व पर जितने अपमानजनक प्रहार किए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। इन प्रहारों से भारत का आत्मविश्वास तो टूट ही रहा है, साथ ही नई पीढ़ी के भ्रमित होने की संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। नई पीढ़ी को भ्रमित करने में पश्चिम से आये सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का भी बहुत बड़ा हाथ है। यद्यपि पहले की तरह आज का विश्व राजनीति उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद से पीड़ित नहीं है, पर आने वाली शताब्दी में आर्थिक, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की समस्याओं से मानवता को जूझना ही होगा। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीन धाराएं इस समय विश्व में प्रबलता से चल रही हैं-पहली धारा ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित, पोषित और समर्थित, दूसरी, इस्लामी रूढ़िवादिता से संचालित, पोषित और समर्थित। इस्लाम के अनेक पक्षधार अत्यधिक आक्रामक व दुराग्रही हो चुके हैं। वे इतने अधिक असहिष्णुता-प्रधान हैं कि समस्त विश्व का इस्लामीकरण करने के लिए प्रतिबध्द हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की तीसरी धारा 'साम्यवादी विचारधारा' अर्थात् वामपंथी विचारधारा है। यह चुनौती प्रत्यक्ष कम प्रच्छन्न अधिक है।राष्ट्रीय अज्ञान व विभ्रम की यह स्थिति आज हर स्तर पर है और सर्वाधिक उस वर्ग में है जो राजनीति से जुड़ा हुआ है। राजनीति से जुड़ा यह वर्ग भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्तवों से न केवल अनभिज्ञ है वरन वह भारत के सांस्कृतिक व्यक्तित्व को पश्चिमी विचारकों की ही दृष्टि से देखना चाहता है।&lt;br /&gt; निस्संदेह भारतीय संस्कृति के संदर्भ में सर्वाधिक विभ्रम अंग्रेज इतिहासकारों ने फैलाया है। ऐसा इसलिए किया गया जिससे भारतीय जनमानस हमेशा-हमेशा के लिए अंग्रेजियत की दासता स्वीकार कर ले तथा भारत पर अंग्रेजी सत्ता का प्रभुत्व बना रह सके। भारतीय एकता और अखंडता को सबसे बड़ा खतरा उस अंग्रेजियत से है जिसका एकमात्र लक्ष्य भारतीय संस्कृति को लांछित करना और भारत को मानसिक स्तर पर विभाजित रखना रहा। यद्यपि रानाडे, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, डा0 केशवराम बलिराम हेडगेवार और महात्मा गांधी सरीखे नेताओं ने अंग्रेजों की कुटिलता की कड़ी से कड़ी भर्त्सना की पर कुल मिलाकर भारतीय राजनीति का मन संशयग्रस्त ही रहा और रह-रह कर यह विचार ज्वार-भाटे की तरह उठता और गिरता रहा कि भारत की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है भी या नहीं। भारत की अपनी एक संस्कृति है, इसका सबसे प्रबल विरोध उस समय प्रारंभ हुआ जब मुस्लिम लीग की स्थापना की गयी। उन्नीसवीं व बीसवीं शताब्दी के भारतीय राजनीतिज्ञों से सबसे बड़ी भूल यह हुई कि उन्होंने 'हिन्दू' के संदर्भ में उस परिभाषा को ग्रहण कर लिया जो अंग्रेजों द्वारा बनाई गई थी। 'हिन्दू' शब्द एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा की उपज है, यह यथार्थ पता नहीं कैसे भारत में निरन्तर उपेक्षित होता चला गया और यह मान्यता प्रगाढ़ता से भारतीय मन पर छा गई कि 'हिन्दू' एक वैसा ही मजहब है जैसे कि इस्लाम या ईसाइयत।आश्चर्य की बात यह है कि जो भूल इस्लामी आक्रमणकारियों ने भ्रमवश की थी और जिस भूल को अपनी निहित स्वार्थों के कारण अंग्रेजों ने सैध्दांतिक व वैचारिक जामा पहना दिया उसे हम भारतीयों ने भी धीरे-धीरे बिना प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया और परिणामत: सांस्कृतिक स्तर पर नए विभ्रम को जन्म दिया।अंग्रेजी दासता के दौरान भारतीय संस्कृति की इतनी अधिक दुर्दशा कर दी गई कि उसकी सांस्कृतिक व आध्‍यात्मिक शब्दावली तक को भ्रष्ट किया गया और इस शब्दावली के राजनीतिक अर्थ निकाले गए। उदाहरणस्वरूप 'धर्म' शब्द का जैसा मनमाना अर्थ अंग्रेजों ने किया उसके पीछे उनके स्वयं के निहित स्वार्थ थे। उन दिनों यह भी स्थापित करने का प्रयास किया गया कि भारत कभी एक राष्ट्र था ही नहीं, वह तो अंग्रेजों ने आकर इसे राजनीतिक एकता प्रदान कर दी।&lt;br /&gt; प्राचीन भारत की साहित्यिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों को पश्चिम का उच्छिष्ट सिध्द करने के प्रयत्न किए गए और समूचे भारतीय जीवन को आत्मगौरव शून्य एवं आत्मविस्मृत बनाने की दुरभिसंधि रची गयी। एक राष्ट्र के नाते हमारे पहचान के जितने तत्व हो सकते थे अंग्रेज उन्हें पूर्णत: नष्ट या विकृत करने का प्रयत्न करते रहे।मजेदार मामला यह है कि जब भारत का संविधान रचा गया तब न तो भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्वों की ओर ही गंभीरता से निहारा गया और न भारतीय मूल्यों, आदर्शों व श्रेष्ठ परंपराओं तथा भारतीय मन की अभिलाषाओं को ही समझने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान को बनाया गया तो भारत की जनता के लिए, लेकिन भारत की जनता के मन में क्या है, कहां बसती है, उसकी आस्थाएं किस पर हैं, उसका विश्वास क्या रहा है, किन मूल्यों की रक्षा के लिए लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक उसने विदेशी आक्रमणकारियों से संघर्ष किया, यह सब जानने की चेष्टा ही नहीं की गई।ब्रिटिश साम्राज्यवाद को स्थायित्व प्रदान करने के निमित्त मैकाले ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के सहयोग से संस्कृति पर प्रहार करने में जो सफलता प्राप्त कर ली उस आघात से भारत आज भी नहीं उबर पा रहा है। जीवन की विश्वात्म धारणा को प्रतिपादित करने वाला भारत, जिसका कभी विश्वास रहा, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' पर वह दुष्प्रचार का शिकार होकर स्वयं ही अपने मूल्य छोड़ बैठा और सांस्कृतिक रूप से बिखर गया। यह सांस्कृतिक बिखराव आज भी राजनीति में हर स्तर पर हमें दिखाई दे रहा है।ऐसा नहीं है कि भारत की संविधान सभा में भारतीय संस्कृति एकात्म भाव तथा राष्ट्रीयता के पक्षधार नहीं थे, पर वे कुल मिला कर मौन ही रहे। जब 7 और 8 दिसम्बर, 1948 को संस्कृति से जुड़े अनुच्छेद पर संविधान सभा में चर्चा हो रही थी तब केवल लोकनाथ मिश्र ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मान्यता देने का सुझाव दिया था पर उसका उग्र विरोध मुस्लिम सदस्यों द्वारा हुआ और अंतत: 'भारत एक सांस्कृतिक इकाई है तथा उसे अपनी सांस्कृतिक धारोहर की रक्षा करनी है', यह भाव इस विरोधा के कारण भारतीय संविधान का अंग न बन सका।प्राकृतिक अनेकता में मानसिक एकता के जो सूत्र विद्यमान रहते हैं उनसे ही राष्ट्र का और उसकी संस्कृति का निर्माण होता है। इस मानसिक एकता से ही अंतत: राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण भी होता है और इस राष्ट्रीय चरित्र में विभिन्न मूलवंशों के लोग सहभागी और सहयोगी होते हैं। इस सामूहिक अस्मिता के अभाव में राष्ट्र की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। इस सामूहिक अस्मिता का जन्म भारत में कहां से हुआ? यह अस्मिता किन प्रतीकों व आदर्शों से जुड़ी है? कौन हैं इस सामूहिक अस्मिता के प्रेरणास्रोत आज इस प्रश्नों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए और भी महत्वपूर्ण तथा तात्कालिक हो चुकी है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद उन्तीस में यह प्रतिपादित करके कि हर व्यक्ति को अपनी एक पृथक वैयक्तिक संस्कृति है-एक प्रकार से बिखराव व बिखंडन के बीज बो दिए गए हैं। सिध्दांतत: किसी भी व्यक्ति का कोई भी अधिकार राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकता। हर नागरिक को अंतत: राष्ट्रीय हितों को ही सर्वोच्चता प्रदान करनी होगी।अपने राष्ट्र की संस्कृति के रहस्य को भारत के राजनीतिज्ञ इसलिए नहीं समझ सके, क्योंकि वैयक्तिक स्तर पर वे न तो अज्ञात में छलांग लगाने के लिए तैयार थे और न अपने उन राजनीतिक स्वार्थों व पूर्वाग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार थे जो उन्होंने यूरोपीय प्रभाव के कारण प्राप्त किए थे।&lt;br /&gt; स्वतंत्रता के उपरांत भी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव आया हो, यह नहीं कहा जा सकता। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उस समय यदि पं। नेहरू चाहते तो भारतीय संस्कृति को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकते थे और भारत की जो गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा है उसकी रक्षा भी कर सकते थे, पर वे स्वयं के राजनीतिक स्वार्थों और यूरोपीय प्रभाव से इतने अधिक जुड़े रहे कि अगर यह कहा जाए कि इसके दुष्प्रभाव से भटक गए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।यह बात एक बात बहुत स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि भारत एक राष्ट्र है और इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है। अगर भारत के राजनीतिज्ञ इस सत्य का साक्षात्कार करने से इंकार करेंगे तो राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता संकट में पड़ सकती है। संकट में इसलिए पड़ सकती है क्योंकि फिर वे समस्त तत्वहीन और श्रीहीन हो जाएंगे जिन पर इस राष्ट्र का एकत्व आश्रित होता है। राजनीति का पहला कर्त्तव्य यह है कि वह राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित हो। यदि राजनीति राष्ट्रीय एकत्व के प्रति समर्पित नहीं है और उसे राष्ट्र की प्रभुसत्ता और अखंडता की चिंता नहीं है तब फिर ऐसी राजनीति कलह को ही जन्म देगी। भारत की सांस्कृतिक एकता का अर्थ यह नहीं है कि भारत में अनेक संस्कृतियां हैं बल्कि इसका अर्थ यह है कि इस राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति है और यह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेकता को प्रश्रय देती है।अंग्रेजों ने इस झूठ को सौ बार दोहराया कि मजहब के आधार पर देश को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक बनाया जा सकता है, लेकिन अंग्रेजों ने अपने देश में ऐसा नहीं किया। इंग्लैण्ड में तो ईसाइयों के अनेक पंथ है, लेकिन विभिन्न पंथों को मानने वाले अंग्रजों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच विभाजित नहीं किया गया। सच बात तो यह है कि राष्ट्रीयता का संबंध उपासना पध्दति की विभिन्नता से नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीयता उपासना पध्दति से कहीं अधिक विशाल, उदात्त और श्रेष्ठ है। हिन्दुत्व पंथ नहीं है, मजहब नहीं है, वह पंथ या मजहब हो ही नहीं सकता।&lt;br /&gt; मजहब या पंथ के उसमें कोई गुण ही नहीं हैं। जिसमें अनंत जीवन दर्शन, अनंत पंथ, अनंत जीवन-शैलियां, अनंत उपासना-पध्दतियां समाहित हो, उसे कोई किसी एक परिभाषा से कैसे बांधोगा? हिन्दुत्व का सारा प्रयास सामंजस्य एवं एकरसता प्राप्त करना है, सभी सुखी हों, सभी का कल्याण हो, सभी की समृध्दि हो, सभी में मित्रता हो, सभी एक दूसरे के सहयोगी बनें, कोई किसी से द्वेष न करे। ये सारे प्रयास हमें वर्तमान में ही करने होंगे।हिन्दुत्व वर्तमान मेंसत्य का साक्षात्कार ही हिन्दुत्व का प्राणतत्व है और यह साक्षात्कार हमें वर्तमान में करना होता है। अतीत के गुण गाकर हम सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकते। अतीत में क्या था, यह तो इतिहास की बात हो गई, पर क्या होना चाहते हैं, किनकी नकल करना चाहते हैं यह हुई कल्पना की बात। कोई भी समाज इतिहास के कल्पना लोक में जीकर विश्व को नेतृत्व नहीं दे सकता और भविष्य की कोरी कल्पनाओं के आधार पर भी किसी भी समाज ने उन्नति नहीं की है। हिन्दुत्व का आधार है 'चरैवेति'। हिन्दुत्व में ठहराव नहीं है। यह ठीक है कि किन्हीं कारणों से हिन्दुत्व नीचे गहरी खाई में जा गिरा है और यह संभवत: इसलिए हुआ होगा क्योंकि यह प्रकृति का नियम है, लेकिन अब यह कालचक्र उत्कर्ष की ओर बढ़ रहा है। उचित यह होगा कि भारतीय समाज यह समीक्षा करें कि उसके उत्कर्ष में क्या सहायक है और क्या अवरोधक?हिन्दुत्व किन्हीं कारणों से जो भटकावग्रस्त हुआ है, उससे समाज में कलह बढ़ी है, विघटन बढ़ा है, विद्वेष बढ़ा है और दुष्कर्म बढ़ा है तथा उत्कर्ष के स्थान पर पतन हुआ है। हिन्दुत्व का सनातन प्रवाह, जो हमारी राष्ट्रीय चेतना की मुख्यधारा है, उसे शक्तिवान बनाने के स्थान पर यदि कोई उसे प्रदूषित कर रहा है अथवा किसी कारणवश वह प्रवाह प्रदूषणग्रस्त होता चला जा रहा है, तो हमें प्रदूषण की इस सत्यता को स्वीकार करना ही होगा। कपोतवृति अपनाकर हम यथार्थ की उपेक्षा तो कर सकते हैं पर यथार्थ के सत्य को नष्ट नहीं कर सकते।ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज ने जिसे आज 'हिन्दू समाज' कहकर संबोधिात किया जाता है उसने समय-समय पर स्वयं की दुर्बलताओं को दूर करने के लिए संघर्ष नहीं किया। समाज सुधारकों का भी जन्म हुआ, पर जो भी आज तक हुआ है, वह बहुत ही आधार अधूरा है। न तो हमने अंधाविश्वास पर पूर्णत: विजय पाकर बुध्दि व विवेक की सत्ता पुन: स्थापित की है और न पाखंड का ही पूर्ण परित्याग कर अपनी कथनी-करनी के भेद को ही मिटाया है। जाति-प्रथा व वर्ण व्यवस्था में आज सर्वाधिक सहारा मनुस्मृति का लिया जाता है और यह जाने समझे बिना कि मनुस्मृति के नाम जो ग्रंथ बाजारों में बिकता है, वास्तव में क्या है। यह निर्विवादित रूप से सिध्द हो चुका है कि आज जिस ग्रंथ को 'मनुस्मृति' के रूप में जाना जाता है, वह किसी व्यक्ति ने नहीं लिखा, इस ग्रंथ को एक कालखंड में भी नहीं लिखा गया और समय-समय पर स्वयं के स्वार्थों की रक्षा के लिए इसमें ऐसे विचारों को भी जोड़ दिया गया जो परस्पर विरोधी है। क्या यह स्वयं में एक क्रूर व्यंग्य नहीं है कि जिस 'मनुस्मृति' का आधार लेकर आज जन्म आधारित जाति व वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है, उसी व्यवस्था का विधान है कि कर्म के बदलते ही वर्ण भी बदल जाता है।हिन्दुत्व की इस दुर्बलता को कैसे सुधारा जाए, यह एक बहुत बड़ी समस्या है। अब यदि भारत का पूरा का पूरा मन नहीं बदलता तो उसके जीवन-दर्शन में जो भारी गिरावट आ गई है उसे ठीक नहीं किया जा सकता। पर राष्ट्र एवं समाज का मन बदलने के लिए जैसे प्रयास होने चाहिए, उस ओर ध्‍यान देने की चेष्टा नहीं की जा रही है। भारतीय जीवन दर्शन के मन में जो दुर्बलताएं आ गयी हैं उन्हें दूर करने का काम समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर करना होगा। केवल कानून बना देने से भारतीय समाज स्वयं को पतन के गर्त से बाहर नहीं निकाल सकेगा। (लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक थे)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-891428809294306093?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/891428809294306093/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=891428809294306093' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/891428809294306093'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/891428809294306093'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/05/blog-post_25.html' title='सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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मंदारीन है जिसका प्रभाव दक्षिण चीन के ही इलाके में सीमित है चूंकि उनका जनघनत्व और जनबल बहुत है। इस नाते वह संसार की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है पर आचंलिक ही है। जबकि हिन्दी का विस्तार भारत के अलावा लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है लेकिन किसी भाषा की सबलता केवल बोलने वाले पर निर्भर नहीं होती वरन उस भाषा में जनोपयोगी और विकास के काम कितने होते है इस पर निर्भर होता है। उसमें विज्ञान तकनीकि और श्रेष्ठतम् आदर्शवादी साहित्य की रचना कितनी होती है। साथ ही तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस भाषा के बोलने वाले लोगों का आत्मबल कितना महान है। लेकिन दुर्भाग्य है इस भारत का कि प्रो। एम.एम. जोशी के शोध ग्रन्थ के बाद भौतिक विज्ञान में एक भी दरजेदार शोधग्रंथ हिन्दी में नहीं प्रकाशित हुआ। जबकि हास्यास्पद बाद तो यह है कि अब संस्कृत के शोधग्रंथ भी देश के सैकड़ों विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में प्रस्तुत हो रहे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में पढ़े लिखे समाज में हिन्दी बोलना दोयम दर्जे की बात हो गयी है और तो और सरकार का राजभाषा विभाग भी हिन्दी को अनुवाद की भाषा मानता है। परन्तु अब तो संवैधानिक न्यायायिक संस्थायें (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्याय) भी यह कह रहे है कि हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा नहीं है जबकि संसार के अनेक देश जिनके पास लीप के नाम पर केवल चित्रातक विधिया है वो भी विश्व में बडे शान से खडे है जैसे जापानी, चीनी, कोरियन, मंगोलिन इत्यादि, तीसरी दुनिया में छोटे-छोटे देश भी अपनी मूल भाषा से विकासशील देशो में प्रथम पक्ति में खड़े है इन देशों में वस्निया, आस्ट्रीया, वूलगारिया, डेनमार्क, पूर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, वेलजियम, क्रोएशिया, फिनलैण्ड फ्रांस, हंग्री, निदरलैण्ड, पोलौण्ड और स्वीडन इत्यादि प्रमुख है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात भारत में अंग्रेजी द्वारा हिन्दी को विस्थापित करने की तो यह केवल दिवास्वपन है क्योंकि भारतीय फिल्मों और कला ने हिन्दी को ग्लोबल बना दिया है और भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के नाते भी विश्व वाणिज्य की सभी संस्थाएं हिन्दी के प्रयोग को अपरिहार्य मान रही है। हमें केवल इतना ही करना है कि हम अपना आत्मविश्वास जगाये और अपने भारत पर अभिमान रखे। हम संसार में श्रेष्ठतम् भाषा विज्ञान बोली और परम्पराओं वाले है। केवल हीन भाव के कारण हम अपने को दोयम दर्जे का समझ रहे है वरना आज के इस वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत का भाषा विज्ञान कम्प्यूटर के लिए सर्वोत्तम पाया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-5795133354286064452?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/5795133354286064452/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=5795133354286064452' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5795133354286064452'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5795133354286064452'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html' title='हिंदी भारत की आत्‍मा है'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-2534996245378510353</id><published>2010-05-12T08:56:00.000+05:30</published><updated>2010-05-12T08:58:34.136+05:30</updated><title type='text'>पहली पत्नी को लावारिस छोड़कर दूसरी शादी करना अवैध</title><content type='html'>विधि संवाददाता, इलाहाबाद : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा अपनी विवाहित पत्‍‌नी व बच्चों को लावारिस छोड़कर दूसरी शादी करने को कुरान की भावनाओं के विपरीत माना है। साथ ही कहा कि कोई भी मुस्लिम कुरान की भावनाओं की अनदेखी नही कर सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद प्रसाद व न्यायमूर्ति आर चन्द्रा की खण्डपीठ ने दिलवार हबीब सिद्दीकी की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। न्यायालय ने खुशबू जायसवाल को वापस नारी निकेतन भेज दिया तथा उसे उसके माता पिता को सुपुर्द करने का निर्देश नारी निकेतन प्राधिकारी को दिया है। न्यायालय ने विवेचक को यथाशीघ्र विवेचना पूरी करने को कहा है। न्यायालय ने कहा कि बिना मुस्लिम धर्म स्वीकार किये बगैर मुस्लिम व्यक्ति से विवाह करना अनुचित है जबकि प्रश्नगत प्रकरण में याची ने खुशबू जायसवाल नामक लड़की से विवाह किया था। जबकि नैनी थाना इलाहाबाद में दर्ज प्राथमिकी मे कहा गया था कि याची ने खूशबू का अपहरण कर लिया है। न्यायालय ने कहा कि याची ने स्वच्छ मानसिकता से याचिका दाखिल नही की है इसलिए साम्या का सिद्धान्त लागू नही होता है। याची ने अपना पूर्व विवाह व बच्चों के बारे में याचिका में जानबूझ कर जिक्र नही किया था। इस आधार पर न्यायालय ने प्राथमिकी को निरस्त करने से इंकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया था।&lt;br /&gt;साभार&lt;br /&gt;जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-2534996245378510353?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/2534996245378510353/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=2534996245378510353' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2534996245378510353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/2534996245378510353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='पहली पत्नी को लावारिस छोड़कर दूसरी शादी करना अवैध'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-3020099036161931808</id><published>2010-04-06T14:21:00.002+05:30</published><updated>2010-04-06T14:35:21.761+05:30</updated><title type='text'>अरुण यह मधुमय देश हमारा</title><content type='html'>&lt;a onclick="resizeText(1)"&gt;&lt;/a&gt;मित्र ,संजीव सिन्हा ने आम आदमी के मंच प्रवक्ता डाट काम पे २० मार्च को हमारे एक छोटे से प्रयास को जगह दिया वो आप तक पंहुचा रहा हूँ &lt;br /&gt;&lt;a onclick="resizeText(-1)"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नव रात्र हवन के झोके, सुरभित करते जनमन को।&lt;br /&gt;है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥&lt;br /&gt;नव सम्वत् पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।&lt;br /&gt;हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनन्दन करते हैं॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.pravakta.com/?attachment_id=8086" rel="attachment wp-att-8086"&gt;&lt;/a&gt;इस सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ठ काल गणना का श्री गणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तद्नुसार हमारे सौरमण्डल की आयु चार अरब 32 करोड वर्ष हैं। आधुनिक विज्ञान भी, कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। यही नहीं हमारी इस पृथ्वी की आयु भी, कल 15 मार्च को, एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 10 वर्ष पूरी हो गयी। इतना ही नहीं, श्री मद्भागवद पुराण, श्री मारकडेय पुराण और ब्रह्यम पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते है। इस खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार हमारी पृथ्वी 14 मनवन्तरो में से सातवें वैवस्वत मनवन्तर की 28 वें चतुरयुगी के अन्तिम चरण कलयुग भी। आज 51 सौ 11 वर्ष में प्रवेश कर लिया।&lt;br /&gt;जिस दिन सृष्टि का प्रारम्भ हुआ वो आज ही का पवित्र दिन है। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मन्दिर में चैत्रा पर्व की परम्परा बन गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिया जिस नक्षत्र में पड़ती है उसी के नाम पर पड़ा। जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं इस लिए इसे चैत्र महीनें का नाम हुआ। श्री मद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर ये उसी समय से कलियुग का प्रारम्भ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलिय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ। वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारम्भ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकण्ड पर हुआ था। डॉ. बेली महोदय, स्वयं आश्चर्य चकित है कि अत्यंत प्रागैतिहासिक काल में भी भारतीय ऋणियों ने इतनी सूक्ष्तम् और सटिक गणना कैसे कर ली। क्रान्ती वृन्त पर 12 हो महीने की सीमायें तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किये गये और नाम भी तारा मण्डलों के आकृतियों के आधार पर रखे गये। जो मेष, वृष, मिथून इत्यादित 12 राशियां बनी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूंकि सूर्य क्रान्ति मण्डल के ठी केन्द्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है। प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है संयोग से यह अधिक मास अगले महीने ही प्रारम्भ हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अन्तर नहीं पड़ता जब कि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365।2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते है। इस प्रकार प्रतयेक चार वर्ष में फरवरी महीनें को लीपइयर घोषित कर देते है फिर भी। नौ मिनट 11 सेकण्ड का समय बच जाता है तो प्रत्येक चार सौ वर्षो में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है। अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अन्तरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकण्ड स्लो कर दिया गया फिर भी 22 सेकण्ड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है जहां की सी जी एस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किये जाते हैं। रोमन कैलेण्डर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था। जिसे में जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया उसके 1 ) सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया चूंकि ये दोनो राजा थे इस लिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गये। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान है जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। यदि नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेण्डर का नौवा महीना सितम्बर कहते है, दसवा महीना अक्टूबर कहते है, इग्यारहवा महीना नवम्बर और बारहवा महीना दिसम्बर कहते है। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमूच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया। जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है। जबकि बाइविल केवल 2) हजार वर्ष पुराना मानता है। चीनी कैलेण्डर 1 ) करोड़ वर्ष पुराना मानता है। जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 11 वर्षो की है। चालडियन कैलेण्डर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते है। सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिध्दान्त और सिध्दान्त शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है। इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है। एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते है क्योंकि भारत में जब 31 दिसम्बर की रात को 12 बजता है तो ब्रीटेन में सायं काल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता। और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है। सन सनाती हुई ठण्डी हवायें कितना भी सूरा डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती है। ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यन्त दुस्कर रहता है। वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यन्त मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गन्धर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी देव व्‍यष्टि से समष्टि तक सब प्रसन्न हो कर उस परम् शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिवस सुनहली रात रूपहली उषा साझ की लाली छन छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली। शीतल मन्द सुगन्ध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते है। ऐसे ही शुभ वातावरण में जब मध्य दिवस अतिशित न धामा की स्थिति बनती है तो अखिल लोकनायक श्री राम का अवतार होता है। आइये इस शुभ अवसर पर हम भारत को पुन: जगतगुरू के पद पर आसीन करने में कृत संकल्प हो।&lt;br /&gt;अरूण यह मधुमय देश हमारा&lt;br /&gt;जहां पहुंच अनजान क्षितिज को&lt;br /&gt;मिलता एक सहारा&lt;br /&gt;अरूण यह मधुमय देश हमारा॥&lt;br /&gt;-सौरभ मालवीय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-3020099036161931808?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/3020099036161931808/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=3020099036161931808' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3020099036161931808'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3020099036161931808'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='अरुण यह मधुमय देश हमारा'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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दिब्य सुदर्शन की माला&lt;br /&gt;राष्ट्र देवी के सुभ्र चरणों में शोभित मोहन मणि माला &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;अमिय पियो शत् शरद जियो बैभव का पावन शिखर चढो&lt;br /&gt;भारत को जगत गुरु करने हम साथ तुम्हारे तीब्र बढो &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-9176166389257958665?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/9176166389257958665/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=9176166389257958665' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/9176166389257958665'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/9176166389257958665'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='पूज्य भागवत जी के जनम दिवस पर समर्पित'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/Sqs1tdgZYnI/AAAAAAAAAJ0/DmRYKiEJaMY/s72-c/mohan+ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-934777192831527201</id><published>2009-06-03T14:54:00.002+05:30</published><updated>2009-06-03T15:01:13.008+05:30</updated><title type='text'>वामपंथ की वास्तविकता</title><content type='html'>लेखक -कुलदीप नैयर&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वामपंथ&lt;/strong&gt; की वास्तविकता साठ के दशक तक यह कहा जाता था कि कोई भी लड़का या लड़की जो बीस वर्ष की आयु तक भी वामपंथी नहीं हुआ तो उसके बारे में किसी चिकित्सक से परामर्श किया जाना चाहिए। इस तरह की भावनाओं का हृदय में संजोना फैशन नहीं था, बल्कि यह एक आदर्शवाद का भाग था। छात्र यह महसूस करते थे कि धनी और निर्धन के बीच अंतर अनुचित है और उन्हें किसी न किसी ढंग से इस व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन करना चाहिए। आज वे आकर्षक नौकरी अथवा सुख-सुविधायुक्त जीवन में रुचि रखते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वाम शब्द वर्जित हो गया है, क्योंकि कारपोरेट क्षेत्र उसे विध्वंसक प्रवृत्तियों का व्यक्ति मानता है जिस पर वामपंथी होने का संदेह हो। निर्धनों की समस्याओं पर विचार-विमर्श करने वाले इने-गिने अध्ययन केंद्र हैं, किंतु पूंजी का सृजन कैसे जल्दी से जल्दी हो सकता है, इस विषय में चर्चा करने के लिए अनेक संगोष्ठियां आयोजित होती हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठन हंै, जो जन सेवा की मशाल को जलता रख रहे हैं, किंतु समाज में समग्र बदलाव के लिए विकल्पों पर काम करने के लिए उनके पास बहुत ही कम समय है। उनकी राह में मुख्य बाधा सामंती सोच अथवा धनी जन की हठवादिता है। धनिक ही तो लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी नियंत्रण किए हुए हैं। 1941 से 1946 तक मैं लाहौर में पढ़ रहा था। तब तक अधिसंख्य मुस्लिमों की कल्पना में पाकिस्तान के विचार का समावेश हो चुका था। इसके बावजूद हम सभी स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य भी थे, जो सेक्युलर और वामपंथी समर्थक संगठन था। हमारी धार्मिक पहचान अथवा विभाजन के मुद्दे पर मतभेदों के बावजूद आजाद हिंद फौज के सैनिकों और अधिकारियों की रिहाई की मांग के समर्थन में हमारा समवेत स्वर निकला था। आजाद हिंद फौज के जिन तीन वरिष्ठ अधिकारियों पर अभियोग चला था उनमें से एक हिंदू, एक मुस्लिम और एक सिख था, यह हर समुदाय के लिए चुनौती थी। फेडरेशन की पताका तले छात्र सड़कों पर उतर पड़े थे। ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा था और आईएनए के लोगों को रिहा करना पड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; विभाजन के बाद भी समग्र उपमहाद्वीप में वामपंथी सोच कायम रही, हालांकि पूर्वी पाकिस्तान और भारत के मुकाबले पश्चिमी पाकिस्तान में वह कमजोर पड़ी थी। 1950 में जब केरल में कम्युनिस्ट विजयी हुए तो ऐसा सोचा गया था कि मानो चीन के क्षेत्र युन्नान का ही उदय हो गया और अब देश भर में लालिमा व्याप्त हो जाएगी, किंतु अब लगभग 50 वर्ष बाद लोकसभा में उनका संख्या बल मात्र एक दर्जन के करीब है। पश्चिम बंगाल और केरल में कम्युनिस्टों का सूपड़ा साफ हो जाने से उनकी सरकारों की असफलता पर ध्यान केंद्रित हुआ है। इस बारे में वास्तविक चर्चा अभी भी नहीं हो रही है कि एक विचारधारा के रूप में साम्यवाद के प्रभाव का भारत में तथा अन्यत्र भी क्यों Oास हो रहा है? नि:संदेह शीत युद्ध में पश्चिमी देशों की विजय इतनी चकित करने वाली रही कि सोवियत संघ के विखंडन के बाद कोई सुसंगठित वाम संगठन ही नहीं रह गया। कम्युनिस्ट चीन घोर राष्ट्रवादी हो गया है और उससे विचारधारा पर आधारित संवाद को पुनर्जीवित करने की आशा ही नहीं संजोई जा सकती। उसकी ऊर्जा तो अपना प्रभाव क्षेत्र बनाने में ही लग रही है। वहां वामपंथ के बारे में बात ही कौन करेगा? बुद्धिजीवी और विचारकों में अपना ध्यान लोकतंत्र पर केंद्रित करने की प्रवृत्ति हावी है। वाम, यह शब्द ही अभी भी सही-सही पारिभाषिक शब्दावली की खोज से नदारद है। नया मुहावरा है सुधार, जो किसी भी क्रांतिकारी सोच के सर्वथा विपरीत भाव है। इसी वजह से नई वैश्विक आर्थिक नीतियों को अविकसित और कम विकसित के शोषण के तरीकों के रूप में देखा जा रहा है। वित्तीय मंदी धनी व्यक्तियों और राष्ट्रों के अपने साधनों के बाहर रहन-सहन और अपनी फिजूलखर्ची की कीमत गरीबों द्वारा चुकाए जाने की आशा संजोने की परिणति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नतीजा यह है कि दुनिया पहले से भी अधिक निर्धन हो गई है। इसके बावजूद फ्रांस में ओसबोर्न जैसे स्कूलों में उपजा ज्वार, अमेरिका का मैकारथिज्म के खिलाफ विलंबित संघर्ष और थियेन मन चौक में चीनी सेनाओं द्वारा युवाओं का निर्मम दमन, ये सभी आशा जगाने वाले प्रकरण हैं। ये सभी इस बात के परिचायक है कि लोगों में स्वतंत्र रहने की दुर्जेय इच्छा है। खुद भारत में समाज में आमूल-चूल परिवर्तन करने के मकसद से चला नक्सली आंदोलन भी आकांक्षाओं की चिंगारी धधकना ही है, किंतु हिंसा के तत्व का समावेश एक लोकतांत्रिक बदलाव के स्वप्न में बाधक बन रहा है। बंदूक उसकी विचारधारा बन गई है और कट्टरता वाहन। भारत पश्चिम की नकल कर रहा है, जबकि इसे महात्मा गांधी के दर्शन में राह खोजनी चाहिए, जिन्होंने कहा था कि किसी भी देश की प्रगति का आकलन इस प्रयास से किया जाना चाहिए कि उसने निर्धनतम व्यक्ति को उभार कर इस स्थिति में लाने के लिए कितना प्रयास किया है कि वह धनी और ताकतवर के समक्ष भी सिर उठा सके। गांधी ने ही यह चेतावनी भी दी थी कि गलत साधनों से सही परिणाम नहीं मिल सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आज भारतीय राजनीति का संकट बदलाव का संकट है। यह राज्य व्यवस्था और उसके ढांचे के आधार के बीच बढ़ते हुए फासले को दर्शाता है। पिछले कुछ दशकों के दौरान राजनीतिक और आर्थिक, दोनों प्रक्रियाओं ने वंचित सामाजिक वर्ग को सक्रिय राजनीतिक समुदाय में ला दिया है। खासतौर पर उत्तर-भारत में मध्यवर्ती कृषक जातियों ने कृषि की नई तकनीक का इस्तेमाल कर अपने आर्थिक हालात सुधारे हैं। वे अब ऐसी किसी राजनीतिक व्यवस्था को सहन करने को तैयार नहीं हैं जिसका झुकाव परंपरागत तौर पर संपन्न जन के प्रति हो। दलित भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। इसका श्रेय अवसरों की सुलभता और राजनीतिक दलों द्वारा उनका समर्थन जुटाने के प्रयासों को जाता है। वे अभी बेहतरी के लिए बदलाव की मांग उभार रहे हैं। इसके साथ ही साथ सिद्धांतपरक और उद्देश्यपूर्ण राजनीति की मांग भी बढ़ती जा रही है। जनहित एक ऐसा मुद्दा है जिसकी विश्व भर में वामपंथियों ने अनदेखी सी की है, जबकि वे उसका रखवाला होने का दम भरते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; उनके नेत्रों पर चढ़े विचारधारा के चश्मों ने उन्हें यह देखने ही नहीं दिया कि साम्यवाद अथवा अन्य कोई भी वाद अपने में ही लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तो व्यक्ति है। इस सामान्य जन का उपयोग विचारधारा से संबद्ध उद्देश्यों के लिए तो नहीं किया जा सकता। &lt;strong&gt;व्यक्ति भावनाओं से शून्य नहीं होता, न ही वह मशीन का पुर्जा मात्र है। वामपंथी चिंतन ने व्यक्ति को उस दिशा से वंचित रखा जिसे जीवन का नैतिक और अध्यात्मिक पक्ष कहा जाता है। यह मानव चिंतन का आधारभूत तथ्य है। इसके अभाव में मानवीय व्यवहार के स्तरों और मूल्यों का क्षरण होता है। जब उपभोक्तावाद और वाणिज्यवाद समाज पर हावी हो जाते हैं तो वे देखभाल की भावना को कुचल देते हैं। संवेदनशीलता के अंगार तो अभी भी जल रहे हैं। जरूरत है इस अग्नि को और अधिक तेज करने की। लोकतंत्र का ढांचा मात्र ही पर्याप्त नहीं है, उसकी भावना और आत्मा को भी समझना होगा। जब तक आदर्शवाद नहीं लौटेगा तब तक शोषण के विरुद्ध चेतना भी प्रखर नहीं हो सकेगी। &lt;/strong&gt;जो लोग उदार विचारधारा और सोच को बढ़ाना चाहते हैं वे वास्तविकताओं से अछूते भी तो नही रह सकते। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)&lt;br /&gt;साभार -जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-934777192831527201?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/934777192831527201/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=934777192831527201' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/934777192831527201'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/934777192831527201'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='वामपंथ की वास्तविकता'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-1248301586626755065</id><published>2009-05-30T13:05:00.002+05:30</published><updated>2009-05-30T13:09:13.076+05:30</updated><title type='text'>लड़कियों के गायब होने के चलते गरमाया धर्मातरण का मुद्दा</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ओमप्रकाश तिवारी,&lt;br /&gt;जागरण&lt;br /&gt; मुंबई महाराष्ट्र के उत्तरी हिस्से में हिंदुओं के ईसाई बनने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। लेकिन पिछले वर्ष पुणे में इस्लाम स्वीकार करने की एक घटना अब पुलिस विभाग के लिए सिरदर्द बनती दिख रही है, क्योंकि इस घटना में इस्लाम स्वीकार करनेवाली कुछ युवतियों के गायब होने की रिपोर्ट उनके अभिभावकों ने दर्ज कराई है । धर्मातरण की यह घटना पिछले वर्ष अक्टूबर माह की है। पुणे के पूर्वी हिस्से में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान आ़जम कैम्पस में मुस्लिमों के एक सम्मेलन के दौरान छह युवतियों एवं तीन युवकों ने इस्लाम ग्रहण किया था । इस सम्मेलन का आयोजन प्रसिद्ध इस्लामी वक्ता डा। जाकिर नाईक की संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन ने किया था। तीन दिन चले इस सम्मेलन के अंतिम दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान उक्त नौ लोगों ने अपनी मर्जी से इस्लाम ग्रहण करने एवं कलमा पढ़ने की इच्छा जताई। इसके बाद उसी समारोह के दौरान उन्हें इस्लाम धर्म में दीक्षित कर दिया गया। इस्लाम ग्रहण करनेवाले इन युवक-युवतियों की उम्र 17 से 25 वर्ष के बीच बताई जाती है । कुछ हिंदू संगठनों द्वारा इस घटना की रिपोर्ट पुलिस को दिए जाने पर राज्य एवं केंद्रीय खुफिया ब्यूरो ने घटना की जांच उसी समय शुरू कर दी थी। लेकिन अब इनमें से कुछ धर्मातरित युवतियों के गायब होने के कारणयह मामला फिर तूल पकड़ने लगा है। लड़कियों के गायब होने की सूचना पुलिस को उनके अभिभावकों द्वारा ही दी गई है। खुफिया विभाग से जुड़े मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस प्रकार के धर्मातरण अक्सर युवावर्ग द्वारा विवाह के लिएकिए जाते हैं। चूंकि पुणे में शिक्षा के लिएदेश भर से युवा आते हैं। इसलिए धर्मातरण के लिए प्रेरित करनेवाली संस्थाएं यहां आसानी से सफलता हासिल कर लेती हैं। पुलिस विभाग इस आशंका से भी चिंतित है कि कहीं युवतियों को धर्मातरित कर नए नाम एवं परिचय के साथ विदेश तो नहीं ले जाया जा रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-1248301586626755065?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/1248301586626755065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=1248301586626755065' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/1248301586626755065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/1248301586626755065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/05/blog-post_30.html' title='लड़कियों के गायब होने के चलते गरमाया धर्मातरण का मुद्दा'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-8106948462481028048</id><published>2009-05-26T14:15:00.002+05:30</published><updated>2009-05-26T14:22:53.012+05:30</updated><title type='text'>विशेष सुविधाओं का सच</title><content type='html'>लेखक -एस.शंकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग ने दूसरी बार केंद्र की सत्ता संभालते ही संकेत दिया है कि वह अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के कल्याण के लिए बहुत कुछ करने जा रही है। कांग्रेस इस चुनाव में मुस्लिमों से मिले समर्थन से उत्साहित है लिहाजा वह अगले कुछ महीनों में उन्हें अनेक तरह की सुविधाएं देने की योजना बना रही है। संप्रग ने पिछले कार्यकाल में भी मुस्लिमों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक प्रगति के नाम पर सच्चर कमेटी का गठन किया था। मुस्लिमों की तरक्की के प्रयास करने में कुछ भी अनुचित नहीं, लेकिन कांग्रेस की ओर से यह काम जिस तरीके से करने की कोशिश की जाती है उससे यही संकेत मिलता है कि मुसलमानों के उत्थान के नाम पर वोट बैंक की राजनीति की जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; किसी गैर-मुस्लिम देश में मुसलमानों के लिए जितने विशेषाधिकार भारत में हैं वैसा विश्व में कहींनहीं, जैसे हज के लिए सरकारी अनुदान और बेरोक एक साथ चार पत्नियों की छूट। कट्टर इस्लामी ईरान में भी कोई अकारण चार शादियां नहीं रचा सकता। इसी तरह शिया मुसलमानों को जितने अधिकार यहां हैं उसकी वे सऊदी अरब में कल्पना भी नहीं कर सकते। वहां उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं और वे दूसरे दर्जे के हीन नागरिक हैं। भारत में मुसलमानों को यह विशेषाधिकार मुख्यत: कांग्रेस के सौजन्य से प्राप्त हुआ। मुस्लिम चाह पूरी करने के लिए 1946 में एक अलग देश की मांग मान लेना भी कांग्रेस की ही देन थी। ऐसा विश्व इतिहास में कहीं नहीं हुआ। समय बीतता गया। कांगेस मुस्लिमों को और विशेष सुविधाएं देती गई। 1980 का दशक बीतते शाह बानो और सलमान रुश्दी मामलों ने घोषणा की कि मुस्लिम नेता कांग्रेस से वह मनमानी भी पूरी करा सकते हैं जो किसी मुस्लिम देश में भी उन्हें सरलता से नहीं मिलेगी। केवल पिछले पांच सालों का हिसाब करें तो कांग्रेस ने मुस्लिमों को अनगिनत विशेष उपहार दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा निरस्त कर दिया। फिर भी उसे वही सुविधा दी जा रही है। निजी शिक्षा संस्थानों में आरक्षण पर मुस्लिम संस्थानों को छूट दे दी गई। धनी मुसलमानों को भी हज सब्सिडी दी गई। पोटा हटाने के निर्णय के पीछे भी मुस्लिमों का विशेष ख्याल रखने की मंशा थी। मदरसों के प्रमाणपत्र को केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मान्यता दी गई। अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने मुसलमानों को आरक्षण देने का वायदा किया है। यह भी संविधान, सेक्युलरिज्म और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध है। मजे की बात है कि इतना कुछ पाकर भी मुस्लिम नेता कांग्रेस से सदैव नाराज रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कांग्रेस को वोट देते हुए भी उनकी भंगिमा सदैव शिकायती रही। वस्तुत: हर मुस्लिम नेता हमेशा दोहराता है कि मुसलमानों का वोट-बैंक रूप में इस्तेमाल हो रहा है, किंतु संपूर्ण इतिहास कुछ और है। पिछले सौ वषरें से मुस्लिम नेता कांग्रेस से तरह-तरह की मांगें रखते गए हैं। उसे कांग्रेस किसी न किसी झूठी उम्मीद में मानती गई। गांधीजी मुस्लिमों के समक्ष कांग्रेस को वैचारिक, राजनीतिक, भावनात्मक रूप से निरंतर झुकाते गए। स्वतंत्र भारत में भी वही हुआ। मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस व अन्य दलों का भी इस्तेमाल कर इस्लामी ताकत ही बढ़ाई। आज पश्चिम बंगाल का कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री भी आतंकवादियों द्वारा मदरसों के दुरुपयोग को रोक नहीं पाता, बल्कि डांट खाकर चुप हो रहता है। 1946 में कांग्रेस ने देश का विभाजन इस दुराशा में स्वीकार कर लिया था कि कम से कम मुस्लिम समस्या से मुक्ति मिलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; स्वयं नेहरू ने इसकी घोषणा की थी, किंतु समस्या पहले से अधिक विकट हो गई। कांग्रेस द्वारा झुक-झुक कर चढ़ावे के बावजूद मुस्लिम नेता उसे हमेशा खरी-खोटी सुनाते रहे हैं, लेकिन जब कांग्रेस कमजोर पड़ी तो वही मुस्लिम कम्युनिस्ट और सपा व राजद सरीखे क्षेत्रीय दलों की ओर भी मुड़ गए। भाजपा ने भी सत्ता में आकर धारा 370 हटाने जैसे आधारभूत मुद्दों को किनारे कर हज यात्रा और मदरसों को अनुदान बढ़ाकर तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों की अनदेखी कर वही कार्य किया। तब, कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है? असम में दशकों से कांग्रेस ने इस्लामी मांगें पूरी कीं। बांग्लादेश के घुसपैठियों को भारतीय नागरिक बनाया। घुसपैठ बेरोक चलती रहे, इसके लिए ऐसा कानून (आईएमडीटी एक्ट) बनाया जिसमें घुसपैठियों को निकालना असंभव हो जाए। यह कानून बीस साल से घुसपैठियों को ढाल प्रदान करता रहा। उसका लाभ उठाकर पाकिस्तानी आईएसआई असम को भारत से काट लेने के षड्यंत्र में लग गई। इसीलिए उस कानून को रद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत सख्त और विस्तृत टिप्पणियां कीं। फिर भी कांग्रेस ने किसी तरह उस कानून को बनाए रखना चाहा ताकि मुसलमान खुश रहें। असम में कांग्रेस का इस्तेमाल कर चुकने के बाद वहां मुस्लिम नेता उसे अंगूठा दिखा अपनी एकछत्र सत्ता बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। यहां मुस्लिम नेताओं की मांगों, आंदोलन, अभियान, बहस आदि में मात्र इस्लामी एजेंडा बढ़ाने की चाह दिखती है। जिस आवेश और एकजुटता से वे खुमैनी, बोस्निया, अफगानिस्तान या इराक के लिए सड़कों पर उतर पड़ते हैं वह अपने देश के लिए कभी नहीं देखी जाती। सड़क, बिजली, पानी जैसे मुद्दे भी मुस्लिम नेताओं की प्राथमिकताएं नहीं हैं। वे तो आधुनिक प्रगति को ही इस्लाम-विरुद्ध मानते हैं! यह कहना पूरी तरह सही नहीं कि कांग्रेस ने मुसलमानों का वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। सही तस्वीर यह है कि मुस्लिम नेताओं ने भी उसका इस्तेमाल कर इस्लामी एजेंडा बढ़ाया। वह भी इस अंदाज में कि वे खुद को लुटा हुआ बताकर हिंदू बुद्धिजीवियों की सहानुभूति अलग से बटोरते हैं। यह हैरत की बात है कि मुस्लिम नेता अपनी नाराज भंगिमा से सभी दलों को प्रेरित कर रहे हैं कि वे इस्लामी विस्तार में मदद करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)&lt;br /&gt;साभार -जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-8106948462481028048?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/8106948462481028048/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=8106948462481028048' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8106948462481028048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8106948462481028048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='विशेष सुविधाओं का सच'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-5306707509970236561</id><published>2009-05-05T14:23:00.001+05:30</published><updated>2009-05-05T14:29:41.403+05:30</updated><title type='text'>क्वात्रोची के साथ कांग्रेस</title><content type='html'>लेखक -राजीव सचान&lt;br /&gt;कांग्रेस के लिए परम आदरणीय, प्रात: स्मरणीय श्रद्धेय श्री ओट्टावियो क्वात्रोची के संदर्भ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि उन्हें परेशान करना अच्छी बात नहीं। इस पर देश को चकित होना चाहिए कि कांगे्रसजनों की ओर से यह मांग क्यों नहीं की जा रही है कि श्रीमान क्वात्रोची को इतने वर्षाें तक परेशान करने के लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें मुआवजा दिया जाए? क्या इस देश में ऐसा कोई कांग्रेसी नहीं जो क्वात्रोची को हर्जाना दिलाने के लिए जनहित याचिका दायर कर सके? वे कांग्रेसजन कहां हैं जिन्होंने सोनिया गांधी को देवी के रूप में प्रदर्शित किया था? ऐसे कांग्रेसजन आगे आएं और क्वात्रोची फैन क्लब की स्थापना करें। वे ऐसी सभाएं आयोजित करें जिनमें जनता को यह बताया जाए कि इटली के एक सीधे सरल व्यवसायी जिसे कुछ अज्ञानी लोग दलाल कह रहे हैं, को भारत की गैर कांग्रेसी सरकारों ने किस तरह तंग किया और फिर भी इस भले आदमी ने सिर्फ इतना कहा कि उसे इस देश की न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं? क्या ऐसे उदार, सहनशील व्यक्ति को कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार कोई पुरस्कार नहीं दे सकती-पद्मश्री, पद्म विभूषण वगैरह? यदि भारत सरकार चुनाव के ठीक बीच में उनके खिलाफ प्रभावी रेड कार्नर नोटिस वापस ले सकती है तो उनके लिए किसी सम्मान-पुरस्कार की घोषणा क्यों नहीं कर सकती? क्वात्रोची के संदर्भ प्रधानमंत्री का यह कथन उनकी संवेदनशीलता को प्रकट करता है कि उन्हें परेशान करना अच्छा नहीं। इसके पहले उन्होंने संदिग्ध आतंकियों के संदर्भ में यह कहकर अपनी संवेदनशीलता प्रकट की थी कि उनकी रातों की नींद उड़ गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; प्रधानमंत्री को संवेदनशील होना ही चाहिए, लेकिन क्या केवल संदिग्ध आतंकियों और दलालों के प्रति? क्वात्रोची को सीबीआई की क्लीन चिट पर मनमोहन सिंह ने तर्क दिया है कि उसके खिलाफ रेड कार्नर नोटिस के बावजूद मलेशिया और अजर्ेंटीना से उसका प्रत्यर्पण नहीं किया जा सका और संबंधित देश यह कहते हैं कि आपके पास उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं। ऐसी ही स्थिति दाऊद इब्राहिम और अन्य अनेक भगोड़े आतंकियों के संदर्भ में भी है? यदि इन्हें भारत नहीं लाया जा पा रहा है तो क्या यह मान लिया जाए कि उनके खिलाफ सबूत नहीं हैं? क्या इन्हें भी परेशान नहीं किया जाना चाहिए? क्या इनके खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस भारत को असहज स्थिति में डालते हैं? सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री यह कैसे तय कर सकते हैं कि भारत के पास क्वात्रोची के खिलाफ सबूत नहीं हैं? क्वात्रोची को पाक-साफ बताने के लिए कांग्रेसजनों की ओर से यह तर्क भी दिया जा रहा है कि 18-20 साल हो गए हैं और हम वहीं का वहीं खड़े हैं। इस तर्क के आधार पर वे सारे मामले बंद कर देने चाहिए जो 18-20 साल से चल रहे हैं। कांग्रेसजन बताएं कि अयोध्या मामले की जांच कर रहे लिब्रहान आयोग का क्या किया जाना चाहिए, जिसे 48 बार विस्तार दिया जा चुका है? सीबीआई की ओर से क्वात्रोची को दी गई क्लीन चिट पर मनमोहन सिंह की मोहर इसलिए और चकित करती है, क्योंकि जब लंदन स्थित उसके खातों पर लगी रोक हटाई गई थी तो उन्होंने कहा था कि मामले की जांच कराई जाएगी। आखिर यह क्यों न मान लिया जाए कि कांग्रेस की तरह प्रधानमंत्री भी क्वात्रोची को बचाना चाहते हैं? जब से कुछ दलों ने प्रधानमंत्री को कमजोर बताने का अभियान छेड़ा है तब से कांग्रेस ने ऐसा माहौल बना दिया है, मानो प्रधानमंत्री की आलोचना करना ईश्वर की निंदा करना हो। पता नहीं मनमोहन सिंह कितने मजबूत प्रधानमंत्री हैं, लेकिन सभी को स्मरण होगा कि 2004 में उनके सत्ता में आते ही जब झारखंड के राज्यपाल ने कांग्रेस के इशारे पर शिबू सोरेन को मनमाने तरीके से मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी तो बहुत दिनों तो यह आभास ही नहीं हुआ था कि कोई प्रधानमंत्री पद पर आसीन है? ऐसा ही आभास तब हुआ था जब राजस्थान गुर्जर आंदोलन के कारण धधक रहा था और जम्मू अमरनाथ भूमि मसले पर। इसी तरह तब भी प्रधानमंत्री परिदृश्य से बाहर थे जब महाराष्ट्र में राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतीयों को मार-पीटकर भगा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह संभव है कि मनमोहन सिंह के अतिरिक्त जो अन्य राजनेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं वे उनके मुकाबले उन्नीस यानी कमजोर हों, लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि प्रधानमंत्री पद के लिए और किसी को दावेदारी ही नहीं करनी चाहिए? नि:संदेह भारतीय संविधान राज्यसभा सदस्य को प्रधानमंत्री बनने की अनुमति प्रदान करता है, लेकिन क्या इसके आधार पर यह मान लिया जाए कि इस पद के दावेदार को लोकसभा चुनाव न लड़ने की छूट प्रदान कर दी जाए? क्या यह अस्वाभाविक और आश्चर्यजनक नहीं कि देश की जनता अपने जनप्रतिनिधियों को इसलिए चुनने जा रही है ताकि वे प्रधानमंत्री का चयन कर सकें, लेकिन कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार जनप्रतिनिधि बनने के लिए तैयार नहीं? मनमोहन सिंह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने करीब पांच वर्ष तक यह पद धारण किया और इस दौरान राज्यसभा सदस्य बने रहे। वह अगले पांच वर्ष तक के लिए भी राज्यसभा सदस्य के जरिए ही इस पद को धारण करना चाहते हैं। संविधान निर्माताओं ने प्रधानमंत्री के सीधे निर्वाचन की व्यवस्था नहीं बनाई, लेकिन क्या उन्होंने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब यह पद धारण करने के आकांक्षी निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं बनेंगे? पता नहीं किस आधार पर अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग यह हवा बनाने में लगा हुआ कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं? यह शायद इसलिए है, क्योंकि जिस तरह मनमोहन सिंह लोक से विमुख हैं उसी तरह अंग्रेजी मीडिया भी है। यदि प्रधानमंत्री लोक से विमुख नहीं होते तो उन्हें यह अहसास कहीं अच्छी तरह होता कि देश की आम जनता बदनाम और भगोड़े क्वात्रोची के बारे में कैसी राय रखती है? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-5306707509970236561?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/5306707509970236561/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=5306707509970236561' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5306707509970236561'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/5306707509970236561'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/05/blog-post_05.html' title='क्वात्रोची के साथ कांग्रेस'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-8705393795161094916</id><published>2009-05-03T21:18:00.002+05:30</published><updated>2009-05-03T21:28:12.000+05:30</updated><title type='text'>राहुल का ड्रामा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/Sf29fmshbRI/AAAAAAAAAJs/SDExxaKqnA8/s1600-h/rahul.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5331625884537416978" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 383px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/Sf29fmshbRI/AAAAAAAAAJs/SDExxaKqnA8/s400/rahul.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;                                      युवराज की सच्चाई सामने है&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-8705393795161094916?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/8705393795161094916/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=8705393795161094916' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8705393795161094916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8705393795161094916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='राहुल का ड्रामा'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/Sf29fmshbRI/AAAAAAAAAJs/SDExxaKqnA8/s72-c/rahul.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-619238932654984389</id><published>2009-04-28T18:56:00.002+05:30</published><updated>2009-04-28T19:01:28.348+05:30</updated><title type='text'>काले धन पर बेरुखी</title><content type='html'>लेखक -बलबीर पुंज&lt;br /&gt;डा. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार स्विस बैंकों में जमा हजारों करोड़ रुपये का धन वापस भारत लाने में रुचि क्यों नहीं ले रही है? क्या कारण है कि जब विश्व के अधिकांश देश स्विस बैंकों में जमा अपने-अपने देश का काला धन वापस पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो भारत सरकार पिछले एक साल से इस विषय में या तो मौन है या बहानेबाजी पर उतारू है। यह स्थापित सत्य है कि पिछले 60 वषरें में भारत की अकूत संपत्ति भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और करचोर व्यापारियों के द्वारा स्विस बैंकों में जमा की गई है। कांग्रेस भाजपा पर विदेशों में जमा काले धन की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगा रही है। अमेरिका स्थित ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी (जीएफआई) के ताजा अनुमान के अनुसार भारत से प्रतिवर्ष 1,35,000 करोड़ रुपये (27 अरब डालर) स्विस बैंक आदि में जमा कराया जाता है। 160 विकासशील देशों की सूची में भारत का स्थान पांचवां है। जीएफआई के अनुसार 2002 से 2006 के बीच भारत से औसतन 1,13,500 करोड़ रुपये से 1,36,500 करोड़ रुपये (22.7 अरब से 27.3 अरब डालर) प्रतिवर्ष काला धन विदेशी बैंकों में जमा होता रहा। जीएफआई के अनुसार विकासशील देशों से इसी अवधि में प्रतिवर्ष एक खरब डालर काला धन विदेशों में जमा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वास्तव में राशि का आकार महत्वपूर्ण नहीं है। काले धन की राशि यदि एक रुपया भी हो तो देश से चुराकर ले जाए गए धन की वापसी क्या नहीं होनी चाहिए? आर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनोमिक कार्पोरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने अप्रैल 2009 के शुरू में प्रकाशित लेखाजोखा में उल्लेख किया था कि स्विस बैंकों समेत टैक्स चोरी के अन्य स्वर्ग में 25 लाख करोड़ से लेकर 70 लाख करोड़ रुपये की धनराशि है। जर्मन के वित्त मंत्रालय ने एलटीजी बैंक से जो सूची प्राप्त की है उसमें करीब 100 भारतीयों के भी नाम शामिल हैं। कांग्रेस यह प्रश्न कर रही है कि भाजपा ने अपने कार्यकाल में उक्त धन को वापस लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? यह प्रश्न उतना ही बेतुका है, जैसे कोई यह पूछे कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने मोबाइल फोन और कंप्यूटर लाने का प्रयास क्यों नहीं किया? आज से एक वर्ष पूर्व तक पश्चिमी देशों में बैंक सीक्रेसी को व्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता था, किंतु अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले और वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते परिस्थितियां बदलीं और विकसित देशों में इस पर पुनर्विचार प्रारंभ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; लालकृष्ण आडवाणी ने पिछले साल अप्रैल माह में ही डा. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर समुचित कदम उठाने की अपील की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री की ओर से जो जवाब आया उससे सरकार द्वारा कदम उठाने का संकेत मिला था, किंतु धन वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ करने की जगह सरकार ने जर्मनी स्थित भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर यह निर्देश दिया कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीयों का नाम उजागर करने के लिए जर्मनी सरकार पर दबाव नहीं डाला जाए। क्यों? वैश्विक मंदी के कारण जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। दुनिया भर के बैंक कंगाली के कगार पर हैं और यूरोपीय देशों के नेता इसमें स्विस बैंक जैसे टैक्स चोरी के स्वर्ग की गोपनीय कार्यप्रणाली का बड़ा योगदान मानते हैं। यूरोपीय देशों ने जी-20 के मंच से टैक्स चोरों के पनाहगाहों में जमा की गई राशि अपने देश वापस लाने का ऐलान किया। 2008 की तीसरी तिमाही में जर्मन सरकार ने कर चोरों को संरक्षण देने के कारण स्विट्जरलैंड को ब्लैक लिस्ट करने के लिए ओईसीडी पर दबाव डाला। उधर अमेरिका ने विधिक मुकदमे के द्वारा स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े बैंक-यूबीएस से करीब 300 अमेरिकी करचोरों के नाम जानने में सफलता प्राप्त की। फरवरी माह में बर्लिन में आयोजित जी-20 की बैठक में यूरोपीय देशों ने यह निर्णय लिया कि अप्रैल में लंदन में होने वाली बैठक में टैक्स चोरी के ठिकानों के खिलाफ वैश्विक मुहिम छेड़ी जाएगी। जी-20 की बैठक के लिए लंदन रवाना होने से पूर्व आडवाणी ने प्रधानमंत्री से कहा कि बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने के लिए भारत को जी-20 द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; प्रधानमंत्री ने सलाह अनसुनी कर दी। कांग्रेस ने कहा कि जी-20 ऐसे मामलों को उठाने का उपयुक्त मंच नहीं है, जबकि सत्य यह है कि जी-20 की लंदन बैठक का मुख्य एजेंडा ही काला धन और टैक्स चोरी के ठिकाने थे। कांग्रेस इस मामले में झूठ क्यों बोल रही है? फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने तो बैंकों की गोपनीयता और टैक्स चोरी के ठिकाने खत्म करने के लिए यदि कुछ नहीं किया गया तो जी-20 के बहिष्कार की धमकी दे रखी थी। कांग्रेस नीत सरकार काले धन की वापसी के प्रश्न पर इतनी घबराई हुई क्यों है? उसकी विवशता क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें बोफोर्स दलाली कांड को याद करना होगा। अस्सी के दशक में रिलायंस घोटाले के सिलसिले में एक अंग्रेजी दैनिक की ओर से एस. गुरुमूर्ति को जानकारी जुटाने का भार सौंपा गया था। इस विषय में हाल में गुरुमूर्ति ने अपने एक लेख में लिखा है, मैंने देश से बाहर जमा कराए गए काले धन का पता लगाने के लिए अमेरिकी जासूसी फर्म-फेयरफैक्स से संपर्क किया। मैंने भारत सरकार से फेयरफैक्स को जांच कार्य सौंपने का निवेदन किया। स्विस सूत्रों के अनुसार तब काले धन के रूप में करीब 300 अरब डालर स्विस बैंकों में जमा थे, किंतु 13 मार्च, 1987 को मुझे सीबीआई ने फर्जी आरोपों में गिरफ्तार कर लिया। बाद में आरोप बेबुनियाद साबित हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पूरे देश को पता लग गया कि सरकार ने मुझे निशाना क्यों बनाया? सरकार को अंदेशा था कि इस जांच से सत्ताधारी परिवार की बोफोर्स दलाली और काली कमाई का भी खुलासा हो जाएगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विनोद पांडेय, भूरे लाल जैसे ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को हटाने के साथ जांच की हामी भरने वाले तत्कालीन वित्तमंत्री वीपी सिंह को भी हटा दिया था। 1984 की सहानुभूति लहर में विपक्ष का सूपड़ा साफ करने वाले राजीव गांधी को 1989 के चुनाव में शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा, जिसमें भ्रष्टाचार ही बड़ा चुनावी मुद्दा था। काले धन के मामले से कांग्रेस को बोफोर्स का भूत जिंदा होने का अंदेशा है। राजग के काल में क्वात्रोच्चि का खाता सील कराया गया था, जिसे संप्रग सरकार के काल में हटवा दिया गया। क्वात्रोच्चि बोफोर्स लूट का माल निकालने में सफल रहा। एक अनुमान के अनुसार स्विस बैंकों में जमा राशि हमारे कुल बजट का तीन गुना हिस्सा है। इस काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। आज भारत पर 220 अरब डालर का विदेशी कर्ज है, हम उससे छुटकारा पा सकते हैं। आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए हमें वित्तीय कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। काले धन की वापसी की राह में रोड़े अटका कर कांगे्रस वस्तुत: अपने दामन पर लगे बोफोर्स जैसे दागों को स्वयंसत्यापित कर रही है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-619238932654984389?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/619238932654984389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=619238932654984389' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/619238932654984389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/619238932654984389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/04/blog-post_28.html' title='काले धन पर बेरुखी'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-7284905051593146868</id><published>2009-04-24T14:43:00.002+05:30</published><updated>2009-04-24T14:52:17.346+05:30</updated><title type='text'>झूठी कहानी की सच्चाई</title><content type='html'>लेखक -शंकर शरण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले सात वर्र्षो से मीडिया में मानो एक धारावाहिक चल रहा है, जिसमें गोधरा, बेस्ट बेकरी, जाहिरा शेख, नरेंद्र मोदी, नरोड़ा पटिया, अरुंधती राय, मानवाधिकार आयोग और तीस्ता सीतलवाड़ आदि शब्द बार-बार सुनने को मिलते हैं। नाटक के आरंभ से ही नरेंद्र मोदी को खलनायक के रूप में पेश किया गया, किंतु जैसे-जैसे नई परतें खुलती गईं, पात्रों की भूमिकाएं बदलती नजर आईं। नवीनतम कड़ी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसने गुजरात दंगे पर सबसे अधिक सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को जघन्य हत्याओं और उत्पीड़न की झूठी कहानियां गढ़ने, झूठे गवाहों की फौज तैयार करने, अदालतों में झूठे दस्तावेज जमा करवाने और पुलिस पर मिथ्या आरोप लगाने का दोषी बताया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; चूंकि नई सच्चाई सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से आई है अत: तीस्ता और उनके शुभचिंतक मौन रहकर इसे दबाने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह अब तक जो अभियोजक थे अब वे आरोपी के रूप में कठघरे में दिखाई देंगे। वैसे इन वषरें में गुजरात दंगों से संबंधित हर नया पहलू इसी तरह बदलता रहा है। जाहिरा शेख का बार-बार गवाही-पलटना, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उतावलापन दिखाना, तहलका के पासे उलटा पड़ना, नानावती आयोग की वृहत रिपोर्ट, तीस्ता के अत्यंत निकट सहयोगी रईस खान द्वारा तीस्ता के भय से पुलिस सुरक्षा की मांग करने से लेकर अरुंधती राय द्वारा कांग्रेस नेता अहसान जाफरी की बेटी के दुष्कर्म-हत्या की लोमहर्षक झूठी कथा लिखने और लालू प्रसाद यादव द्वारा नियुक्त मुखर्जी आयोग द्वारा गोधरा को महज दुर्घटना बताने तक सभी कडि़यों ने प्रकारांतर में एक ही चीज दिखाई कि गुजरात सरकार पर लगाए गए आरोप मनगढ़ंत थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बेस्ट बेकरी मामला मात्र जाहिरा शेख के बयान बदलने से चर्चित हुआ। मानवाधिकार आयोग ने उसी जाहिरा की छह सौ पन्नों की याचिका पर गुजरात हाई कोर्ट पर सार्वजनिक रूप से लांछन लगाया। उन पन्नों को देखने की भी तकलीफ नहीं की, जिन पर कहीं भी जाहिरा के दस्तखत तक नहीं थे! पर चूंकि उसे तीस्ता ने जमा किया था इसलिए आयोग अधीर होकर सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगा बैठा कि बेस्ट बेकरी की सुनवाई गुजरात से बाहर हो। इस प्रकार आयोग ने न केवल अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया, बल्कि गुजरात की न्यायपालिका पर कालिख भी पोती। यहां तक कि गुहार सुनते हुए स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात हाई कोर्ट और वहां के मुख्यमंत्री के विरुद्ध कठोर टिप्पणियां कर दीं। किस आधार पर? एक ऐसे व्यक्ति के बयान पर, जो स्व-घोषित रूप से एक बार शपथ लेकर अदालत में झूठा बयान दे चुका था। इस प्रकार हमारे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक ही गवाह के एक बयान को मनमाने तौर पर गलत और दूसरे को सही मान लिया। इसी आधार पर गुजरात हाईकोर्ट की खुली आलोचना की, जिसने बेस्ट बेकरी केआरोपियों को दोषमुक्त किया था। उस निर्णय को सच्चाई का मखौल बताकर सर्वोच्च न्यायपालकों ने नरेंद्र मोदी को भी राजधर्म निभाने या गद्दी छोड़ देने की सलाह दे डाली। साथ ही मामला मुंबई हाई कोर्ट को सौंप दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सब तब किया जब जाहिरा की मां और ननद ने कहा था कि सारा खेल तीस्ता करवा रही है और जाहिरा ने पैसे लेकर बयान बदला है। जाहिरा के वकील ने भी यही कहा था। फिर भी, सच्चाई की अनदेखी कर केवल कुछ उग्र, साधन-संपन्न मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से प्रभावित होकर हमारे न्यायपालकों ने अपने को हास्यास्पद स्थिति में डाल लिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह देखकर अपने को विचित्र स्थिति में पाया कि जाहिरा के नाम पर प्रस्तुत किए गए भारी-भरकम दस्तावेजों में जाहिरा के दस्तखत ही नहीं हैं। यह सब तो अब स्पष्ट हो रहा है। इस बीच तीस्ता भारतीय न्यायपालिका को दुनिया भर में बदनाम कर चुकी थीं और उन्हें न्यूरेनबर्ग ह्यूमन राइट अवार्ड, ग्राहम स्टेंस इंटरनेशनल अवार्ड फार रिलीजियस हारमोनी, पैक्स क्रिस्टी इंटरनेशनल पीस प्राइज, ननी पालकीवाला अवार्ड से लेकर पद्मश्री तक कई देशी-विदेशी पुरस्कार मिल चुके हैं। न्यायाधीशों ने जाहिरा शेख को झूठे बयान देने के लिए सजा दी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी संसद की यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आन इंटरनेशनल रिलीजस फ्रीडम के सामने भी तीस्ता ने मनगढ़ंत गवाही दी थी। क्या हमारे न्यायाधीश उन सारी झूठी गवाहियों की असल सूत्रधार को कोई सजा देंगे? तीस्ता को इसलिए सजा मिलनी चाहिए ताकि आगे न्यापालिका और मीडिया का दुरुपयोग कर अपना उल्लू साधने वालों को चेतावनी मिले। गुजरात हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में वही बातें लिखी थीं जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट के विशेष जांच दल ने जांच में सही पाया है। हाईकोर्ट ने कहा था कि जाहिरा का कुछ लोगों को बदनाम करने का षड्यंत्र दिखता है और यह भी कि वह कुछ समाज-विरोधी और देश-विरोधी तत्वों के गंदे हाथों में खेल रही हैं। हाईकोर्ट ने ऐसे लोगों और कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा पूरे राज्य प्रशासन और न्यायपालिका को निशाना बनाने तथा एक समानांतर जांच चलाने की भी आलोचना की थी, पर उस निर्णय को निरस्त करके सर्वोच्च न्यायालय ने कठोर टिप्पणियां कर दीं। उसी से देश-विदेश में गुजरात हाई कोर्ट की छवि धूमिल हुई। क्या आज गुजरात हाईकोर्ट के वे न्यायाधीश सही नहीं साबित हुए, जिन्हें पक्षपाती समझ कर उन न्यायिक मामलों को राज्य से बाहर ले जाया गया था? आशा की जा सकती है कि अपने ही द्वारा गठित विशेष जांच दल की इस रिपोर्ट के बाद सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करेगा। गुजरात धारावाहिक की अंतिम कडि़यां आनी अभी बाकी हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)&lt;br /&gt;साभार -जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-7284905051593146868?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/7284905051593146868/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=7284905051593146868' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/7284905051593146868'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/7284905051593146868'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/04/blog-post_24.html' title='झूठी कहानी की सच्चाई'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-9210322308197663507</id><published>2009-04-05T14:36:00.002+05:30</published><updated>2009-04-05T14:47:39.742+05:30</updated><title type='text'>पंथनिरपेक्षता के बहाने</title><content type='html'>वरुण गाँधी पर रासुका की कार्यवाही को राजनीति के गिरते स्तर का प्रमाण मान रहे है -संजय गुप्ता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वरुण गांधी की ओर से पीलीभीत में दिए गए भाषण पर जैसी राजनीति हो रही है उससे यह साफ है कि चुनाव के समय मतदाताओं का धु्रवीकरण करने की कोशिश तेज हो जाती है। वैसे तो नेहरू-इंदिरा परिवार के वंशज और संजय गांधी के बेटे वरुण गांधी के खून में कांगे्रसियत भरी हुई है, लेकिन कांग्रेस में उनके लिए कोई स्थान नहीं रह गया है-ठीक वैसे ही जैसे उनकी मां मेनका गांधी के लिए नहीं है। वरुण गांधी ने राजनीति करने के लिए अपनी मां की तरह देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का दामन पकड़ा, जो कांग्रेस की कट्टर विरोधी है। वरुण गांधी पीलीभीत में भाजपा के उम्मीदवार हैं। ऐसा लगता है कि उनके मन में यह धारणा घर कर गई है कि भाजपा मुसलमानों की विरोधी है और हिंदुओं का नेतृत्व करने के लिए मुस्लिम समुदाय को नीचा दिखाने के लिए तैयार रहती है, जबकि यह यथार्थ से कोसों दूर है।&lt;br /&gt;भाजपा घोषित रूप से यह दावा करती है कि वह देश के हर नागरिक को समान दृष्टि से देखती है और इसीलिए समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है। इस बार भी उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही है। भाजपा को मुस्लिम विरोधी मानने के पीछे कारण यह है कि वह इस पर बल देती रहती है कि मुस्लिम समाज का उत्थान करने के लिए उसे मजहबी आधार पर विशेष सुविधाएं देना सामाजिक समरसता के विपरीत है। भाजपा की ऐसी छवि बनने का एक अन्य कारण उससे जुड़े कुछ नेताओं की ओर से समय-समय पर ऐसे भाषण दिया जाना है जिनसे यह प्रतीत होता है कि वे मुस्लिम विरोधी हैं। वरुण गांधी ने पीलीभीत में भाषण देते हुए अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता का ही परिचय दिया। उन्होंने कथित रूप से मुसलमानों के हाथ काटने की भी बात कर डाली। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि हिंदुओं की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन यह कार्य किसी अन्य समुदाय को लांछित करके नहीं किया जा सकता। हिंदुओं को अपनी रक्षा के लिए स्वयं को सशक्त बनाना होगा और वह भी इस तरह से कि राष्ट्र भी सबल-समर्थ बने। वरुण गांधी के विवादास्पद भाषण पर हंगामा मचना ही था।&lt;br /&gt; चुनावी माहौल के कारण निर्वाचन आयोग ने तत्काल सक्रियता दिखाई। चूंकि प्रथम दृष्टया यह प्रमाणित हुआ कि उन्होंने वास्तव में आपत्तिजनक भाषण दिया इसलिए निर्वाचन आयोग ने उन्हें दोषी पाते हुए भाजपा को यह सलाह दी कि वह वरुण को चुनाव मैदान में न उतारे। निर्वाचन आयोग की इस पहल के बाद पहले सुस्ती दिखा रही उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपनी सक्रियता दिखाई और आश्चर्यजनक रूप से उन पर रासुका लगा दिया। उत्तर प्रदेश सरकार की इस कार्रवाई का औचित्य समझना कठिन है, क्योंकि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल का नहीं है। भारत में समाज को जाति अथवा समुदाय के आधार पर बांटकर राजनीति करने का एक सिलसिला लंबे समय से कायम है।&lt;br /&gt; चुनाव के दौरान न जाने कितने राजनेता जानबूझकर इस या उस जाति अथवा समुदाय के खिलाफ तीखी टिप्पणियां करते रहते हैं। निश्चित रूप से वरुण गांधी ने अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता का प्रदर्शन करते हुए कुछ ज्यादा ही तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, लेकिन इसके आधार पर उन्हें राष्ट्रद्रोही की श्रेणी में खड़ा करना उचित नहीं। वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं और न ही उनके खिलाफ ऐसे मुकदमे चल रहे हैं जिनके आधार पर उन्हें दागी, बाहुबली या सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले मजहबी नेता की संज्ञा दी जा सके। रासुका तो ऐसे लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाना चाहिए जो वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने वरुण गांधी पर रासुका का इस्तेमाल इसलिए किया ताकि मुस्लिम समाज को ये संदेश दिया जा सके कि वह उनकी सबसे बड़ी हितैषी है और जो भी उसके विरोध में खड़ा होगा उससे सख्ती से निपटा जाएगा। स्पष्ट है कि एक तरह से बिना आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किए समाज को बांटने की वैसी ही राजनीति की जा रही है जैसी वरुण गांधी ने उतावलेपन में आकर करने की कोशिश की। पहले समाजवादी पार्टी भी वरुण गांधी पर हमलावर थी, लेकिन उन पर रासुका के इस्तेमाल के बाद जब उसे यह महसूस हुआ कि इससे मुस्लिम समाज का झुकाव बसपा के प्रति हो सकता है तो उसने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना शुरू कर दी। उत्तर प्रदेश सरकार के अप्रत्याशित फैसले के बाद वरुण गांधी ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो, भाजपा वरुण पर रासुका लगाने को एक चुनावी मुद्दा बनाने के लिए तत्पर है। भाजपा यह प्रचारित करने की कोशिश कर रही है कि वरुण पर रासुका का इस्तेमाल केवल मुसलमानों को गोलबंद करने के लिए किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल का स्मरण करते हुए वरुण गांधी की तुलना जिस तरह जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी से कर दी उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। वरुण को तो राजनीति में आए चंद दिन ही हुए हैं और अभी वे राजनीति का क ख ग। सीख रहे हैं।&lt;br /&gt; आखिर वह एक आपत्तिजनक भाषण देकर जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी के समकक्ष कैसे खड़े हो सकते हैं? वरुण गांधी के भाषण के उपरांत उनकी गिरफ्तारी को भारतीय राजनीति की सबसे विस्फोटक घटना अर्थात आपातकाल से जोड़ना भाजपा की चुनावी राजनीति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वरुण गांधी पर रासुका का इस्तेमाल करना भारतीय राजनीति के गिरते स्तर का परिचायक है। यह किसी से छिपा नहीं कि हमारे देश में कभी संकीर्ण राजनीतिक कारणों से राजनीतिक विरोधियों पर बेवजह रासुका लगाया जाता है और कभी ऐसे ही कारणों से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने तत्वों के खिलाफ सामान्य कार्रवाई करने से भी इनकार किया जाता है। राजनीतिक दल कथित पंथनिरपेक्षता के नाम पर या तो बहुसंख्यक समाज अर्थात हिंदुओं की भावनाओं पर चोट करते हैं अथवा अल्पसंख्यक समुदायों की अनुचित मांगों का भी समर्थन करते हैं। खुद को पंथनिरपेक्ष घोषित करने वाले दलों को तब सांप सूंघ जाता है जब अल्पसंख्यक समुदाय के नेता खुलेआम वैसे ही भाषण देते हैं जैसा वरुण गांधी ने पीलीभीत में दिया।&lt;br /&gt; इस पर आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस उस मजहबी नेता के भी साथ है जो जार्ज बुश का सिर लाने वाले को 25 करोड़ रुपये दे रहे थे और उन नेताओं के साथ भी जिन्होंने तस्लीमा नसरीन पर हमला करने को जायज ठहराया था। ऐसा ही हाल वाम दलों और अन्य तथाकथित पंथनिरपेक्ष दलों का भी है। इसमें दो राय नहीं कि वरुण गांधी ने उतावलेपन में आकर एक बड़ी भूल की है। उनके इस उतावलेपन और आपत्तिजनक भाषण की निंदा की जानी चाहिए, लेकिन उन्हें देशद्रोही साबित करने की कोशिश अनुचित है। उन पर रासुका लगाने और इस कार्रवाई का समर्थन करने वाले राजनीतिक दल जानते बूझते हुए समाज को बांटकर राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश में हैं। मतदाताओं को इस तरह के सभी राजनीतिक दलों से सावधान रहना होगा। मौजूदा माहौल में मतदाताओं को इसका आकलन करना चाहिए कि विश्व में चल रहे भयंकर मंदी के भंवर से देश की नैया बचाने और उसे आर्थिक संपन्नता की ओर ले जाने में कौन राजनीतिक दल सक्षम हैं?&lt;br /&gt;साभार -जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-9210322308197663507?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/9210322308197663507/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=9210322308197663507' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/9210322308197663507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/9210322308197663507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/04/blog-post_05.html' title='पंथनिरपेक्षता के बहाने'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-116325941932096570</id><published>2009-04-03T19:51:00.004+05:30</published><updated>2009-04-03T20:29:58.601+05:30</updated><title type='text'>भाजपा घोषणा पत्र, लोकसभा चुनाव-2009</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SdYkBah0jGI/AAAAAAAAAJk/zjuOSFfa5nk/s1600-h/bjp_11.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5320479616504466530" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SdYkBah0jGI/AAAAAAAAAJk/zjuOSFfa5nk/s200/bjp_11.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;अंत्योदय:गरीब प्रथम&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;सभी बीपीएल परिवारों को प्रतिमाह 35 किलो चावल या गेहूं दो रुपए प्रति कि0 के दर से मिलेगा। यह खाद्य कूपन के बदले सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा निजी दुकानों पर उपलब्ध होगा।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;अधिकतम 4 प्रतिशत ब्याज दर पर कृषि ऋण सुनिश्चित किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;वर्तमान के सभी कृषि ऋण को माफ किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;कृषि आय बीमा योजना लागू की जायेगी जिसके द्वारा दाम एवं उत्पाद दोनों का बीमा किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पांच वषो± में 3।5 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि को सिंचित किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;शहरी गरीबों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे जिसके अंतर्गत गरीब विक्रेताओं को 4 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराये जायेंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को `कार्मिक बैंक´ की स्थापना कर सुरक्षाघेरा उपलब्ध कराया जायेगा।&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा कर मजदूरी अधिनियम को कड़ाई से लागू किया जायेगा।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;अर्थव्यवस्था का विकास, समृद्ध भारत&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 आधारभूत संरचना संबंधी परियोजनाओं में भारी निवेश के माध्यम से रोजगार सृजन : प्रतिदिन 15 कि।मी। नया राजपथ बना राजपथ विकास को पुनर्जीवित करना, 500 से अधिक जनसंख्या वाले गांवों को पक्की सड़क से जोड़ पूर्ण ग्रामीण सड़क संपर्क स्थापित करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;निजी उद्योग एवं सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने हेतु कार्यक्रम लागू करना। निम्न कर, निम्न ब्याज दर व्यवस्था सुनिश्चित करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;तीन लाख रुपया प्रतिवर्ष तक आय वालों को व्यक्तिगत आय कर से मुक्त करना। महिलाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा 3।5 लाख रुपया प्रतिवर्ष होगी। इससे 3।5 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;निगमित क्षेत्रों तथा व्यापार से होने वाली आय को छोड़कर सभी बैंक जमा रािशयों पर मिलने वाले ब्याज की आय को पूरी तरह कर मुक्त करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;नियोजक एवं कर्मचारी दोनों के उत्पीड़न का माध्यम एफबीटी (थ्तपदहम ठमदमपिज ।बजद्ध को निरस्त करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;सीएसटी को समाप्त करना तथा जीएसटी की सीमा 12-14 प्रतिशत रखना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;नियामक संस्थाओं पर कड़ी निगाह रखना ताकि जनता को स्टॉक मार्केट में धोखाधड़ी करने वाली कम्पनियों से बचाया जा सके। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;प्रतिवर्ष दस लाख गृह इकाई का निर्माण, मरणासन्न भवन निर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करना। गृह ऋण पर ब्याज दर नीचे लाना ताकि शहरी घर सस्ते हों। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;विदेशी बैंकों में जमा भारतीय धन की पहचान कर वापस लाने के लिए कड़े कदम उठाना। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से अनुमानित 25,00,000 करोड़ से 75,00,000 करोड़ रुपए की धनराशि वापस लाने से पूरे देश में पूर्ण उर्जा एवं सड़क संपर्क स्थापित किया जा सकेगा तथा गांवों में स्तरीय विद्यालय खोले जा सकेंगे। इतनी बड़ी धनराशि, यदि वापस लाया जा सका तब इसका अर्थ होगा कि ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार के लिए प्रत्येक भारतीय ग्राम को चार करोड़ रुपए का आवंटन उपलब्ध होना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा( 50 स्थलों का चयन कर आधारभूत संरचना एवं संपर्क का विकास। पांच वषो± में विदेशी पर्यटकों की संख्या दुगुनी करना ताकि पर्यटन उद्योग में रोजगार का सृजन हो। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;घरेलू खुदरा व्यापार की सहायता के लिए खुदरा क्षेत्र में सीधा विदेशी निवेश (एफ।डी.आई.) पर रोक। &lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;आंतरिक तथा बाह्य शत्रुओं के विरूद्ध युद्ध&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 राष्ट्र को इसके शत्रुओं से सुरक्षा के प्रति भाजपा की गहरी निष्ठा सर्वज्ञात है। हमारी प्राथमिकता आतंकवादियों चाहे वे सीमा पार के हों अथवा देश के भीतर के विरूद्ध कड़े कदम उठाना है। पोटा के समान एक बेहतर कानून लागू किया जायेगा। सूचना तंत्र में आमूल चूल परिवर्तन किए जायेंगे। जल सुरक्षा को बढ़ाकर भारत के 4000 कि।मी। तट को पूर्ण रूप से सुरक्षित बनाया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;हम अवैध अप्रवासी जो देश के भीतर आतंकवाद के स्रोत बन गये हैं की व्यवस्थित ढंग से पहचान कर निर्वासित करेंगे। भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का कार्य जिसे वोट बैंक राजनीति के कारण यूपीए सरकार ने जानबूझकर अनदेखा किया को त्वरित गति से पूरा करेंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;अत्यधिक सफल एवं लोकप्रिय छत्तीसगढ़ मॉडल का उपयोग करते हुए पूरे देश में माओवादी गुटों के विरूद्ध अविराम युद्ध चलाया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;सीमापार आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देशों के खतरनाक क्रियाकलापों को रोकने इन पर दबाव बनाने एवं इन्हें अलग-थलग करने के लिए दबाव कूटनीति का उपयोग किया जायेगा। यह सुनिश्चित किया जायेगा कि भारत में अलगाववादी गुटों के विदेशी स्रोतों को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाय। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;भारत के हर नागरिक के लिए व्यापक राष्ट्रीय पहचान पत्र लागू किया जायगा।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;जय जवान&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 सैन्य बलों एवं अर्ध सैनिक बलों के सभी सदस्यों को आयकर मुक्त किया जायेगा। इससे लगभग 20 लाख लोगों को लाभ पहुचेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;सैन्य बलों के लिए पृथक वेतन आयोग के गठन के लिए कदम उठाये जायेंगे। बेहतर वेतन के लिए वर्तमान में लागू वेतन संरचना का पुन: अवलोकन किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;समान पद-समान पेंशन लागू किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पूर्व सैनिकों के पुनर्वास तथा उन्हें लाभप्रद रोजगार के साथ पुननिZयोजित करने हेतु राज्य सरकारों को बेहतर कार्यक्रम लागू करने हेतु प्रेरित किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;ऊर्जा की बचत-ऊर्जा की बढ़त &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 पांच वषो± में नये विद्युत गृहों के निर्माण में साथ चल रही परियोजनाओं के त्वरित निष्पादन के द्वारा 1,25,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली का सृजन। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;नदी विद्युत परियोजनाओं, सौर तथा वायु शक्ति जैसे नवीकृत किये जा सकने वाले ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देकर आयातित जिवाश्म इ±धन पर निर्भरता कम करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;तेल उत्पादक देशों में आक्रामक कूटनीति तथा व्यावसायिक कदमों के द्वारा ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;सशक्त महिला - सुदृढ़ राष्ट्र&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 मध्य प्रदेश भाजपा सरकार की अत्यधिक सफल `लाडली लक्ष्मी´ कार्यक्रम को पूरे देश में लागू करना ताकि विद्यालय जाने वाली बालिका को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित एवं उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए धनराशी सीधा हस्तांतरित किया जा सके। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;राजस्थान की पूर्व भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तावित भामाशाह कार्यक्रम जिसके अंतर्गत प्रत्येक वयस्क महिला को बैंक खाता खोलने के लिए 1,500 रूपए देने का प्रावधान है एवं जिसे फिंगरप्रिंट के माध्यम से बायेमेट्रिक कार्ड के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है को पूरे देश में लागू करने का मार्ग प्रशस्त करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पूरे देश में बीपीएल परिवारों की विद्यालय जाने वाली प्रत्येक बालिका को साइकिल देना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;स्व-सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं में उद्यमता को बढ़ावा देने हेतु विशेष कार्यक्रम लागू करना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;विद्यायिका में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के लिए भाजपा कृतसंकल्प है तथा इसे जल्द से जल्द लागू करने का प्रयास किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;28 लाख आंगनवाड़ी कर्मचारियों और मददगारों जो कि समिन्वत बाल विकास योजना (प्ब्क्ैद्ध की रीढ़ के वेतन को दुगुना किया जाएगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;भाजपा विश्वास करती है कि भारतीय महिला के सभी वगो± का पूर्ण सशक्तिकरण संविधान के नीति निर्देशक तत्व में विर्णत तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा बार-बार कहे गये समान नागरिक संहिता के निर्माण के बिना नहीं हो सकता है। जनता के सभी वगो± से विचार विमर्श के माध्यम से ऐसी संहिता बनाने को भाजपा प्रतिबद्ध है।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;युवा भारत - राष्ट्र के स्तंभ &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;1 भारत के युवा जो जनसंख्या में 50 प्रतिशत हैं को यूपीए ने हताशा, निराशा एवं बेरोजगारी दिया है। शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में भारी व्यवसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं रोजगार सृजन के माध्यम से भाजपा आशा का संचार करेगी। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में युवा प्रतिभा की पहचान एवं उन्नयन के लिए पूरे देश में `राष्ट्रीय ज्ञान उद्भवन कार्यक्रम का तंत्र स्थापित किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;युवा प्रतिभा उत्कृष्ट शिक्षा एवं रोजगार प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें इसके लिए सस्ता एवं पहुंच के अंतर्गत अध्ययन ऋण चार प्रतिशत ब्याज दर पर उपलब्ध कराया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा 1।2 करोड़ सूचना प्रोद्यौगिकी संबंधित रोजगार प्रतिवर्ष उपलब्ध करायेगी। कम्प्यूटर के दाम में भारी कमी की जायेगी ताकि यह सभी वगो± को सुलभ हो। पांच वषो± में सभी शैक्षिक संस्थानों में इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;अजा/अजजा/पिछड़ा तथा वंचित वगो± के युवाओं के वेब आधारित प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान देते हुए कला विकास के लिए विशेष प्रावधान किए जाएंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;खेल के लिए आधारभूत संरचना विशेषकर शैक्षिक संस्थानों में सृजित करने हेतु 5000 करोड़ रूपए के आवंटन के माध्यम से युवा खेल प्रतिभा के विकास के लिए एक आक्रमक परियोजना शुरू करना। प्रशिक्षित प्रशिक्षक नियुक्त करना( अंतर्राष्टिªय पदक विजेताओं को रोजगार उपलब्ध कराना। विद्यालय पाठ्यक्रम में खेल एक अनिवार्य विषय होगा।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;जनता का स्वास्थ्य - राष्ट्र का धन&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;स्वच्छ जल के अधिकार को मूलभूत अधिकार बनाने के लिए भाजपा प्रतिबद्ध है। प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने हेतु एक व्यापक कार्यक्रम लागू किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;निजी अस्पतालों तथा नसि±ग गृहों पर नजर रखने के लिए एक नियामक प्राधिकरण की स्थापना की जायेगी ताकि गलत कार्य रोके जा सकें। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;2014 तक सभी के लिए स्वास्थ्य उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक परियोजना। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पूरे देश में डायल 108 पर घर पर एम्बुलेंस की व्यवस्था अनिवार्य किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;नये एम्स की स्थापना की परियोजना को पुनर्जिवित करना जिसे मूलत: एनडीए सरकार ने शुरू किया था परन्तु यूपीए द्वारा इसकी उपेक्षा की गई। अगले पांच वषो± में इन सभी छह आधुनिकतम अस्पतालों का त्वरित गति से निर्माण किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;जच्चा बच्चा की देख रेख में लिए जननी सुरक्षा योजना को सुदृढ़ किया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;आयुर्वेद, यूनानी आदि वैकल्पिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए निवेश किए जाएंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;जनसंख्या स्थिरिकरण भारत की समृद्धि की कुंजी है। इस दिशा में प्रगति के लिए भाजपा विभिन्न वगो± से विचार-विमर्श कर कार्यक्रम लागू करेगी।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;वंचितों को&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt; सुविधा&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;भाजपा &lt;/span&gt;सबके कल्याण के साथ समान अवसरों वाले समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी राज्य सरकारें अ।जा.,अ.ज.जा. तथा अल्पसंख्यकों के लिए अनेक कार्यक्रम विशेषकर शिक्षा, रोजगार, प्रशिक्षण, गरीबी दूर करने तथा उद्यमता को बढ़ावा देने के लिए लागू किए हैं। इन कार्यक्रमों में सुधार कर इनमें से अत्यधिक सफल को पूरे देश में लागू किया जायेेगा। इसके अलावा पिछड़े क्षेत्रों विशेषकर उत्तर-पूर्व, दुर्गम वनों तथा पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जायेेगी। शिक्षा एवं रोजगार कोटा अजा, अजजा, तथा पिछड़ा वर्ग के अलावा आर्थिक रूप से पिछड़े वगो± के लिए लागू किया जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;वरिष्ठ नागरिक&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;सभ्यता के मूल्यों के संवर्धन तथा राष्ट्र निर्माण में वरिष्ठ नागरिकों के महत्व को समझते हुए भाजपा यात्रा सुविधा के लिए उम्र सीमा 65 से 60 वर्ष करने को प्रतिबद्ध है( इनके लिए गैर भेदभाव पूर्ण बीमा योजनाओं तथा ब्याज दर घटाने की संभावनाओं की तलाश की जायेगी। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पेंशन से होने वाली आय के बारे में वरिश्ठ नागरिकों को कर से पूरी छूट दी जाएगी। &lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;उचित पर्यावरण का निर्माण&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;जलवायु परिवर्तन तथा ``ग्लोबल वार्मिंग´´ को रोकने के लिए गैर प्रदूषण तकनीकों को प्राथमिकता दी जायेगी। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;हिमालय के ग्लेशियरों जिनसे उत्तर भारत की बड़ी नदियां निकलती हैं को पिघलने से रोकने के कार्यक्रमों को महत्व दिया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;वनों एवं वानिकी को सुरक्षा एवं बढ़ावा दिया जायेगा।4। राष्ट्रीय पशु बाघ को बचाने के लिए उचित कदम उठाये जाएंगे तथा वन जीवन के संकटग्रस्त जंतुओं की सुरक्षा की जायेगी। भारत की विशाल परन्तु संकटग्रस्त जैव-विविधता को सुरक्षित रखने पर जोर दिया जायेगा।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;सभ्यता की रक्षा &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;अयोध्या में विराट राम मिन्दर के निर्माण के लिए भाजपा प्रतिबद्ध है। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;भाजपा किसी को पवित्र रामसेतु को छूने नहीं देगी। सेतु समुद्रम के लिए हम रामसेतु से अलग एक नये रास्ते का विकास करेंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;पवित्र गंगा सहित अन्य सभी बड़ी नदियों की सफाई हमारी प्राथमिकता होगी। स्थानीय समुदायों को इस विशाल कार्य में भागीदार बनाया जायेगा। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;भाजपा के लिए गोरक्षा आस्था का विषय है। हम इसका निरंतर अनुपालन करेंगे। &lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;जब तक धारा 370 कानून के रूप में विद्यमान है राष्ट्र की पूर्ण अखंडता संभव नहीं है। भाजपा इस पर अटूट विश्वास करती है कि भारतीय एकता को सुनिश्चित करने के लिए इस प्रावधान को हटाया जाये।&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-116325941932096570?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/116325941932096570/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=116325941932096570' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/116325941932096570'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/116325941932096570'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/04/2009.html' title='भाजपा घोषणा पत्र, लोकसभा चुनाव-2009'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SdYkBah0jGI/AAAAAAAAAJk/zjuOSFfa5nk/s72-c/bjp_11.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-3727331928611665588</id><published>2009-04-01T17:23:00.003+05:30</published><updated>2009-04-01T17:42:40.379+05:30</updated><title type='text'>वंशवाद की विरासत</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SdNZyrDzK_I/AAAAAAAAAJc/DMmGyYCId8M/s1600-h/rahul.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;राहुल गाँधी के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हाशिये पर जाता देख रहे &lt;span class=""&gt;है -&lt;/span&gt;कुलदीप नैयर &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने कहा है कि ऊपर कोई स्थान रिक्त नहीं है। उनके कहने का मतलब है कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं और अगली बार भी रहेंगे। उनका मकसद इस विवाद को समाप्त करना है कि प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस का अगला प्रत्याशी कौन होगा, किंतु शर्मा पार्टी के इतने जूनियर नेता हैं कि उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। ऐसी घोषणा तो सोनिया गांधी की ओर से की जानी चाहिए, जो पार्टी की अध्यक्ष हैं और जिनका पार्टी पर कड़ा नियंत्रण है। यह सच है कि उन्होंने भी एक-दो बार कहा है कि कांग्रेस मनमोहन सिंह को ही चुनाव में आगे करेगी, फिर भी जिस जोरदारी के साथ वह अपने बेटे राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के महासचिव के रूप में आगे लाई हैं उससे कोई भी धोखे में नहीं रह सकता। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि राहुल गांधी ही उनका स्थान लेंगे। कांग्रेस के मुखपत्र संदेश के नवीनतम अंक में कहा गया है कि राहुल गांधी में अगला प्रधानमंत्री होने की पूरी क्षमता है। हल में कांग्रेस के एक अधिवेशन में तमाम वक्ताओं ने एक सुर से कहा कि कि वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। सोनिया गांधी भी वहां मौजूद थीं। यदि वह इन वक्ताओं को रोकना चाहतीं तो रोक सकती थीं, किंतु पार्टी के सदस्यों को राहुल गांधी का प्रशस्ति गान करने दिया गया, बावजूद इसके कि कांग्रेस में राहुल गांधी का कार्यकाल इतना छोटा है कि महीनों की गणना उंगलियों पर की जा सकती है। शुक्र है कि जब राहुल गांधी को अपना प्रधानमंत्री बनाने के लिए कांग्रेसजन एक-दूसरे से होड़ कर रहे थे तब मनमोहन सिंह वहां नहीं थे। इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण वह तरीका है जो राहुल गांधी को आगे करने के लिए पार्टी ने अपनाया है। सारे देश में पोस्टर देखे जा सकते हैं, जिनमें राहुल गांधी की बड़ी सी तस्वीर है और कांग्रेस को वोट दो लिखा है। अधिक समय नहीं हुआ है जब पोस्टरों में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की फोटो भी छपती थी। इस औपचारिकता को अब छोड़ दिया गया है। भारतीय राजनीति के जानकार पुष्टि करेंगे कि विगत चार दशकों से कांग्रेस निर्लज्जता से वंशवादी कार्ड चल रही है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जवाहर लाल नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन कराया था, तब इंदिरा गांधी लगभग 38 वर्ष की थीं। यही आयु अब राहुल गांधी की है। नेहरू चाहते थे कि इंदिरा उनका स्थान लें। लाल बहादुर शास्त्री ने मुझे बताया था नेहरू के मन में हमेशा इंदिरा को आगे लाने की बात रहती थी, परंतु अनेक दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों की मौजूदगी के कारण उस समय नेहरू अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर पाए। जब इंदिरा गांधी के समक्ष अपना उत्तराधिकारी चुनने का अवसर आया तो उन्होंने एक झटके में फैसला ले लिया। वह अपने बाद अपने दो बेटों में एक को प्रधानमंत्री पद पर आसीन कराना चाहती थीं। उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को चुना और आपातकाल थोपने के बाद सरकार का प्रभार उन्हें सौंप दिया। जब विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु हो गई तो उन्होंने राजीव गांधी का चयन करने में जरा भी देर नहीं लगाई, जिन्हें संजय गांधी के जीवनकाल में एक राजनीतिक नौसिखिया मानकर किसी भी राजनीतिक परिचर्चा से अलग रखा जाता था। राजीव गांधी के संकोच और उनकी पत्नी सोनिया की अनिच्छा के बावजूद इंदिरा गांधी नहीं मानीं। राजीव गांधी को भी कांग्रेस का महासचिव ही बनाया गया था। कांग्रेसी इस वंश से इतने सम्मोहित हैं कि इसका जो भी नया सदस्य राजनीति में कदम रखता है, ये पलक-पांवड़े बिछा देते हैं। जब सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका कुछ समय के लिए राजनीति में आई थीं तब भी कांग्रेसजनों ने ऐसा ही किया। सोनिया गांधी ने ही प्रियंका को पीछे हटा लिया और यह संकेत दिया कि राहुल ही उनके उत्तराधिकारी हैं। देश भर में चुनाव अभियान चलाने के लिए उन्हीं का चयन किया गया है। यह एक खुला रहस्य है कि लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों के चयन में भी उनकी महती भूमिका रही है। वह युवाओं को आगे लाने के नाम पर पुराने और तपे-तपाए कांग्रेसजनों को पीछे धकिया रहे हैं। मनमोहन सिंह कहीं भी परिदृश्य में नहीं हैं। जब सोनिया और राहुल प्रत्याशियों का चुनाव कर रहे हैं तो वे मनमोहन सिंह के प्रति निष्ठावान कैसे हो सकते हैं? इससे कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं होगा। लोकसभा में बहुमत पाने के लिए 272 सीटें चाहिए। कांग्रेस के लिए अपनी वर्तमान संख्या 153 कायम रखने में भी मुश्किल आएगी। वह इधर-उधर से सहयोगी जुटाने में लगी है, ताकि चुनाव के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का कुनबा बढ़ाकर वह अपने लिए पर्याप्त समर्थन जुटा सके। हालात अनुकूल नहीं हैं। कांग्रेस सिकुड़ती हुई लगती है। उत्तर प्रदेश में सशक्त मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी अथवा बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ सीटों के बंटवारे पर उसकी पटरी नहीं बैठ सकी। इन दोनों राज्यों में लोकसभा की 120 सीटें हैं। अपनी ऊंची मांग कम करते हुए कांग्रेस महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, पश्चिम बंगाल में तूफानी नेता ममता बनर्जी और झारखंड में दागी शिबू सोरेन के साथ पटरी बैठाने का प्रयास कर रही हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कम्युनिस्टों की कीमत पर केरल में कांग्रेस कुछ लाभान्वित हो सकती है और किसी हद तक पश्चिम बंगाल में भी वह कम्युनिस्टों की ताकत घटा सकती है, किंतु कम्युनिस्ट ही कांग्रेस के स्वाभाविक सहयोगी हैं। अमेरिका से परमाणु करार को लेकर वे कांग्रेस से कितने ही अप्रसन्न क्यों न हों, लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने लगे तो उनके सामने सोनिया को समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। कम्युनिस्टों का आक्रोश मनमोहन सिंह के खिलाफ है, क्योंकि वह पूंजीवाद के पक्षधर लगते हैं, किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वे राहुल को स्वीकार कर लेंगे, जिनकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह सोनिया के बेटे हैं। भारत का शासन चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं है, किंतु आप कांग्रेसियों को कैसे समझा सकेंगे जो यह मान बैठे हैं कि नेहरू वंश का सदस्य ही उनका कल्याण कर सकता है। दक्षिण एशिया में वंश के प्रति प्रेम एक अभिशाप है। पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो के नाती और बेनजीर भुट्टो के पुत्र बिलावल हैं। बांग्लादेश के जनक शेख मुजीबुर्रहमान की पुत्री शेख हसीना एक प्रभावी नेता के तौर पर उभरी हैं। उनका बेटा अभी तक राजनीति में नहींआया है, किंतु कौन जानता है कि वह उभर कर कब सामने आ जाए? दो वर्ष पूर्व किसी ने राहुल गांधी के बारे में भी ऐसा नहीं सोचा था।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;नि:संदेह दक्षिण एशिया के लोग लोकतंत्र से प्यार करते हैं, किंतु हम महाराजाओं और नवाबों के प्रति भी निष्ठावान हैं। हालांकि अब वे नहीं रहे, किंतु उनकी संतान जनता का मान हासिल करती है। यही कारण है कि निर्धन और पिछड़ा होने के बावजूद इस क्षेत्र में कोई क्रांति नहीं हुई। लोकतांत्रिक चुनाव में सत्ता एक समूह से दूसरे समूह की झोली में चली जाती है। करोड़ों लोग इतने दमित हैं कि शासक होने के बारे में सोच भी नहीं सकते। हां, यदि कांग्रेस चुनाव हार जाती है तो बिना किसी परेशानी के मनमोहन सिंह नेता विपक्ष का स्थान पा लेंगे। उनकी निष्ठा अथवा विनम्रता कोई मुद्दा नहीं है। आपको एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जो प्रधानमंत्री अथवा मंत्रियों के समक्ष टोका-टोकी की सार्थकता सिद्ध कर सके। वास्तव में यह स्थान मनमोहन सिंह के लिए रिक्त है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;(लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)&lt;/div&gt;&lt;div&gt;साभार -जागरण &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-3727331928611665588?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/3727331928611665588/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=3727331928611665588' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3727331928611665588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3727331928611665588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='वंशवाद की विरासत'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-511517548864091143</id><published>2009-02-22T14:59:00.004+05:30</published><updated>2009-02-22T15:15:23.458+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दू संस्कृति पर माओवादी हमला'/><title type='text'>पशुपतिनाथ मंदिर पर प्रचण्ड का आघात</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नेपाल के विश्व प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ और नेपाल की सांस्कृतिक पहचान पशुपतिनाथ मंदिर से भारतीय मूल के तीन पुजारियों को निकाल कर नेपाली पुजारियों को नियुक्त करने की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि माओवादी सरकार नेपाल से हिन्दू संस्कृति की पहचान मिटाने पर आमादा है। नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने की पहचान खत्म करने के बाद हिन्दू धर्म और संस्कृति पर एक और माओवादी हमला है जिसकी चारों तरफ तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। यहां तक कि नेपाल की संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक पार्टियां भी इसके विरोध में उतर आईं और इस बहाने सत्ता का नया समीकरण बनाने में जुट गईं हैं। नेपाली कांग्रेस जैसी पार्टी से लेकर पूर्व राजवंश की समर्थक समझी जाने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, नेपाल और हिन्दू गणतंत्र में विश्वास रखने वाली नेपाल जनता पार्टी ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। साथ ही, यह मुद्दा नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा है। सशस्त्र आन्दोलन और जनविद्रोह के सहारे सत्ता पाने में कामयाब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के लिए यह मामला गले की हड्डी बन गया है, जो उससे न निगलते बन रहा है और न उगलते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; माओवादी षड्यंत्र&lt;br /&gt;आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय मूल के भट्ट पुजारी ही पूजा करते आ रहे हैं। राजा के शासन काल में भी भारतीय पुजारी को हटाये जाने की बात उछाली जाती थी। भट्ट पुजारी पर आरोप लगाया जा रहा था कि वे पशुपतिनाथ मंदिर पर चढ़ावे का दुरुपयोग कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा था कि पशुपतिनाथ के चढ़ावे के रूप में जो भारी रकम और गहने भक्तों द्वारा चढ़ाये जाते हैं, उसे वहां के भट्ट पुजारी अपनी निजी सम्पत्ति समझ भारत ले जाते हैं, इसलिए उसे रोकने के लिए भट्ट पुजारियों को हटाया जाए। उल्लेखनीय है कि राजा के शासन काल में राजा ही इसके संरक्षक एवं रानी अध्यक्ष हुआ करती थीं। यह परम्परा राजा ज्ञानेन्द्र के शासन काल तक चलती रही। इसकी देखभाल के लिए पशुपति क्षेत्र विकास कोष भी बनाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नेपाल के गणतंत्र घोषित होते ही नेकपा (माओवादी) सत्ता में आयी और उसने नेपाल की परंपरागत धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं पर आघात करना शुरू कर दिया। ऐसा कर एक ओर वह यह जताना चाहती है कि राजसंस्था के अवशेष के रूप में रही परम्पराओं को मिटाकर पंथनिरपेक्षता को मजबूत कर रही है, दूसरी ओर उसका प्रयास है पंथनिरपेक्षता की आड़ में कम्युनिस्ट शैली की परंपरा को लादना। नेकपा (माओवादी) ने सत्ता में आते ही सबसे पहले पशुपतिनाथ मंदिर से भट्ट पुजारियों को हटाने के लिए पशुपति क्षेत्र विकास कोष का पुनर्गठन किया और माओवादी समर्थकों को उसमें प्राथमिकता दी गई। राजा का शासन समाप्त हो जाने के बाद प्रधानमंत्री ही उसका पदेन अध्यक्ष बना रहे, इसकी व्यवस्था की गई है। इससे भी नेकपा (माओवादी) को भारतीय मूल के पुजारियों को हटाने में सुविधा हुई। सबसे पहले भारतीय मूल के भट्ट पुजारियों को त्यागपत्र देने के लिए परेशान किया गया, माओवादी भ्रातृ संगठन "यंग कम्युनिस्ट लीग" ने धमकी भी दी। बाध्य होकर अपनी जान और पारिवारिक सदस्यों की सुरक्षा हेतु प्रमुख पुजारी महाबलेश्वर सहित तीन भट्ट पुजारियों ने स्वास्थ्य का कारण बताकर संस्कृति मंत्री गोपाल किरांति को त्यागपत्र दे दिया। इन दिनों पशुपतिनाथ मंदिर भी संस्कृति मंत्रालय के ही अन्र्तगत है। संस्कृति मंत्रालय ने तीनों भट्ट पुजारियों का त्यागपत्र 28 दिसम्बर को स्वीकृत किया और नेपाली नागरिक डा। विष्णु प्रसाद दाहाल और शालिगराम ढकाल को नया पुजारी नियुक्त कर डाला। ऐसा कर पुष्पकमल दहल की सरकार ने नेपाली जनता को सन्देश देना चाहा कि नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर से भारतीय पुजारियों को निकाला गया है। लेकिन धार्मिक परंपरा के प्रति आस्थावान नेपाली समाज को यह रास न आया और सरकार के इस निर्णय का विरोध शुरू हो गया। जनता एवं धार्मिक संगठन सड़क पर आ गए। वहीं नेपाली कांग्रेस ने इस मुद्दे को संसद में उठाकर सरकार की खिंचाई शुरू कर दी। भारतीय मूल के भट्ट पुजारियों को निकाले जाने के विरोध में होने वाले प्रदर्शन को नेपाली कांग्रेस के नेता नैतिक समर्थन दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नेपाल में सैकड़ों वर्षों के इतिहास में सभी शासकों ने इस परंपरा को भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से ऊश्पर रखा। परन्तु नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने सरकार में आने के चार महीने के अन्दर ही नेपाली राष्ट्रीयता के नाम पर नेपाल सहित विश्व भर के हिन्दुओं के आस्था केन्द्र पशुपतिनाथ मंदिर में नेपाली पुजारी के नाम पर माओवादियों को नियुक्त कर दिया। प्रधानमंत्री प्रचण्ड और उनकी पार्टी का दावा है कि जब नेपाल में व्यापक स्तर पर राजनीतिक परिवर्तन हुआ है तब सभी क्षेत्रों में परिवर्तन होना ही चाहिए और इसी क्रम में पशुपतिनाथ की पूजा करने के लिए नेपाली पुजारियों को नियुक्त करने की परंपरा शुरू की गई है। लेकिन प्रधानमंत्री की इस थोथी दलील का आम जनता पर कुछ असर पड़ता नजर नहीं आता। आम नेपाली का मानना है कि सुधार का मतलब यह नहीं होता कि प्रचलित सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराओं को मिटा दिया जाए। यदि भट्ट पुजारी चढ़ावे का गलत इस्तेमाल करते थे तो उन पर निगरानी रखने की व्यवस्था होनी चाहिए थी, लेकिन भारतीय मूल के होने के कारण ही उन पुजारियों को निकालना उचित नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ज्ञानेन्द्र भी विरोध&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; में नेपाल के गणतंत्र घोषित होने के बाद राजा से नागरिक बने ज्ञानेन्द्र शाह भी भारतीय मूल के पुजारियों को हटाये जाने के विरोध में खुलकर सामने आ गए हैं। जबसे नेपाल गणतंत्र घोषित हुआ है, तब से पूर्व राजा सरकार के सारे फैसले सहजता के साथ स्वीकार कर उसका पालन कर रहे थे। किन्तु पशुपतिनाथ मंदिर संबंधी सरकारी फैसले का विरोध करते हुए उन्होंने कहा है कि विश्व भर में हिन्दू धर्म की आस्था, विश्वास और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर को राजनीतिक विवाद से मुक्त रखने के लिए मैं सरकार, श्रद्धालु भक्तजनों और संबंधित पक्षों से अपील करता हूं। 3 जनवरी, 2009 को जारी एक वक्तव्य में पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने आग्रह किया है कि शताÎब्दयों से नेपाल धार्मिक और सामाजिक सद्भाव का जो उदाहरण प्रस्तुत करता आ रहा है, वह धूमिल न हो, इसके लिए सभी को प्रयास करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; प्रमुख पुजारी को जान का खतरा&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; प्रमुख पुजारी महाबलेश्वर का त्यागपत्र स्वीकृत होने पर भी दूसरी व्यवस्था नहीं होने तक उन्हें पूजा करते रहने के लिए कहा गया है। लेकिन महाबलेश्वर इसके लिए तैयार नही हैं। अपने नजदीकी व्यक्तियों को उन्होंने बताया है कि उन्हें अपनी और अपने परिजनों की जान का खतरा है। इसलिए वे जल्द से जल्द सुरक्षित भारत लौटना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सर्वोच्च न्यायालय में&lt;br /&gt;याचिका नाराज लोगों ने सरकार के इस हिन्दू विरोधी फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और न्यायालय ने अन्तरिम आदेश जारी कर कहा है कि जब तक इस विषय पर अन्तिम निर्णय नहीं हो जाता तब तक पुराने पुजारी से ही पशुपतिनाथ की पूजा कराई जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि बहुसंख्यक नेपाली नागरिक और हिन्दू धर्मावलम्बी पशुपतिनाथ को आस्था के देवता के रूप में मानते हैं। इसलिए पशुपतिनाथ की पूजा-अर्चना भी प्रचलित रीतिरिवाज, परम्परा और कानून के अनुसार ही होनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि नये पुजारियों की नियुक्ति, परंपरा से चली आ रही प्रक्रिया और कानून के विरुद्ध होने से उसे खारिज कर पुराने पुजारियों द्वारा पूजा कराने का अन्तरिम आदेश जारी किया जाए। कृष्ण राजभण्डारी सहित पशुपतिनाथ के चार राजभण्डारी और अधिवक्ता द्वय लोकध्वज थापा एवं विनोद फुयांल ने संयुक्त रूप से यह याचिका दायर की थी। दूसरी याचिका भरत जंगम ने दायर की थी। भरत जंगम को राजपरिवार का समर्थक माना जाता है और राजा ज्ञानेन्द्र के शासन काल में इन्हें राजनीतिक नियुक्ति भी मिली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सर्वोच्च अदालत ने अपने अन्तरिम आदेश में इस बात का भी उल्लेख किया है कि अन्तरिम संविधान की धारा 23 में प्रचलित सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपरा की मर्यादा कायम रखते हुए परंपरागत धर्म का अवलम्बन करना और उसकी रक्षा करने का अधिकार नेपाली नागरिकों को है। इस आधार पर पुराने पुजारी द्वारा ही पशुपतिनाथ की पूजा कराई जाए। अदालत का आदेश आने से पूर्व पशुपतिनाथ की पूजा करने के सवाल पर पशुपति विकास कोष और स्थानीय लोगों के बीच विवाद उत्पन्न होने से सुबह पशुपतिनाथ की पूजा नहीं हो पाई और पशुपति क्षेत्र तनावग्रस्त रहा। यह पहला अवसर था जब करीब 7 दिनों तक भगवान पशुपतिनाथ की पूजा नहीं हुई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अदालत की अवमानना&lt;br /&gt;संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर पशुपति विकास कोष किसी भी सूरत में नये पुजारियों द्वारा पशुपतिनाथ की पूजा कराने पर तुला है तो राजभण्डारी नये पुजारियों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। राजभण्डारी बन्धुओं ने पशुपतिनाथ मंदिर के चारों दरवाजों पर ताले भी लगा दिये थे। तब संस्कृति मंत्रालय के निर्देश और माओवादी लड़ाकू दस्ते (वाईसीएल) के सहयोग से पशुपति विकास कोष ने मंदिर का ताला तोड़कर नये पुजारियों के हाथों जबरन पूजा करवाई। सर्वोच्च अदालत द्वारा पुराने पुजारी के हाथों पूजा कराने का अन्तरिम आदेश देने के बावजूद प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल (प्रचण्ड) के साथ ही अन्य माओवादी मंत्री न्यायालय के आदेश को मानने से इनकार करते रहे। प्रधानमंत्री का कहना है कि न्यायालय का अन्तरिम आदेश आने से पहले ही नये पुजारियों की नियुक्ति हो जाने से नये पुजारी के हाथों ही पूजा करायी जाएगी। इस विषय को लेकर जब परंपरागत धर्म संस्कृति संरक्षण समिति ने पशुपति मंदिर के पश्चिमी द्वार पर पत्रकार सम्मेलन करना चाहा तब कोष के पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं ने पत्रकार सम्मेलन करने का प्रयास करने वालों की जमकर पिटाई की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इसके बाद से पशुपति मंदिर के नजदीक नये पुजारी की नियुक्ति के विरोध में धर्म-संस्कृति संरक्षण समिति, हिन्दू स्वयंसेवक संघ, नेपाल और नेपाल जनता पार्टी की संयुक्त अगुआई में विरोध प्रदर्शन जारी है। स्थानीय लोगों की बढ़ती सहभागिता को देख प्रशासन ने पशुपति क्षेत्र के आसपास के इलाके को निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया है। प्रधानमंत्री दहल और उनकी पार्टी अब यह प्रचारित करना चाहती है कि यह विरोध प्रदर्शन भारत एवं नेपाल के हिन्दूवादियों के बहकावे में हो रहा है। साथ ही इस विवाद को नेपाल-भारत विवाद के रूप में भी प्रस्तुत करने का प्रयास हो रहा है। जबकि, बहुसंख्यक नेपाली जनता इसे हिन्दू रीतिरिवाज पर प्रहार मान रही है। हिन्दुत्वनिष्ठ नेपाली समाज का मानना है कि पंथनिरपेक्षता के बहाने माओवादी पार्टी हिन्दू परम्परा को समाप्त करने पर तुली हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दू संस्कृति पर माओवादी हमला  काठमाण्डू  से राकेश मिश्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-511517548864091143?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/511517548864091143/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=511517548864091143' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/511517548864091143'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/511517548864091143'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/02/blog-post_22.html' title='पशुपतिनाथ मंदिर पर प्रचण्ड का आघात'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-8534924752948621849</id><published>2009-02-20T14:51:00.002+05:30</published><updated>2009-02-20T15:07:11.283+05:30</updated><title type='text'>मुक्त पूंजीवाद के परिणाम</title><content type='html'>लेखक -हृद्यानारण दीक्षित&lt;br /&gt;मुक्त पूंजीवाद के परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था गुलाम हो गई है। विश्व बाजारवाद ने राष्ट्र-राज्य के अधिकारों को हड़प लिया है। केंद्र वैश्विक मंदी से नहीं लड़ पाया, लाखों युवकों की रोजी-रोटी छिनी। रोजगार के अवसर घट गए। केंद्र वैश्विक महंगाई से भी नहीं लड़ पाया। केंद्र जान दे रहे हजारों किसानों को आशावादी भी नहीं बना पाया। खाद्यान्न संकट के बादल हैं। इस अर्थव्यवस्था ने कुछेक लाख करोड़पति, अरबपति पैदा किए हैं। सत्यम जैसे घोटाले भी दिए हैं, लेकिन करोड़ों लोगों को पानी भी नसीब नहीं है। रोटी, दवाई, घर और शिक्षा की सामान्य सेवाएं गरीबों के लिए आज भी सपना हैं। बाजारवाद ने सत्यानाश किया। देश छटपटा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; अब भारत को नई अर्थव्यवस्था की दरकार है। गांधीजी ने आज से 100 बरस पूर्व 1909 में हिंद स्वराज्य में भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की सामान्य रूपरेखा बनाई थी। हिंद स्वराज के 100 बरस पूरे हो रहे हैं, लेकिन उसके संदर्भ आज भी प्रासंगिक हैं। इस ग्रंथ के अंत में टालस्टाय, थोरो, मेन आदि की 21 पुस्तकों के संदर्भ हैं। मेन लिखित विलेज कम्युनिटीज के अनुसार प्राचीन जर्मनी के मार्क (ग्राम समाज) भी उतने प्रतिनिधिक और संगठित नहीं थे जितनी कि भारतीय ग्राम पंचायतें। यही स्थिति ऋग्वेद की ग्राम और पुर नामक स्थानीय इकाइयों की भी थी। गांधीजी के अनुसार अंग्रेजों के आने के बाद भारतीय उद्योग का सत्यानाश हो गया। इसके पहले भारत निर्मित माल यूरोप तक बिकता था, फिर सब कुछ उलट गया। भारत का कच्चा माल बाहर जाने लगा और विदेशी वस्तुएं भारतीय बाजार में आने लगीं। इंग्लैंड के मैनचेस्टर में बना कपड़ा भारत में बिकता था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; गांधीजी ने भारतीय आयात निर्यात का अर्थशास्त्र 1919 में समझाया पहले हम हिंदुस्तान की आवश्यकता के लिए कपड़ा तैयार करते थे, निर्यात भी करते थे। आज अपनी आवश्यकता का एक चौथाई माल ही तैयार करते हैं, 3 करोड़ से भी अधिक व्यक्ति भूखों मरते हैं। इस भुखमरी का सबसे बड़ा कारण स्वदेशी के व्रत को भंग करना ही है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वैकल्पिक अर्थव्यवस्था पर बहस चली है। मनमोहन अर्थव्यवस्था पूंजीवादी है। पूंजीवाद का कोई देश नहीं होता। शुभ लाभ ही उसका लक्ष्य होता है। मा‌र्क्सवाद में कोई राष्ट्र नहीं होता, यह व्यक्तिगत क्षमता का विरोधी है। जैसे पूंजीवाद में पूंजीपति ही अर्थव्यवस्था का नियंत्रक होता है, वैसे ही साम्यवाद में सरकार। साम्यवाद सरकारी पूंजीवाद होता है। भारत के लिए दोनों अस्वाभाविक हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने विकास के भारतीय माडल के रूप में गांधीवादी अर्थव्यवस्था का प्रारूप रखा है। गांधीवादी अर्थव्यवस्था का प्रारूप कांग्रेस के लिए स्वागत योग्य होना चाहिए। गांधीजी ने कांग्रेस के माध्यम से संघर्ष किया था। सुखी और समृद्ध भारत उनका सपना था। कृषि विकास, स्वदेशी, स्वावलंबन, विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था और स्वयंपूर्ण ग्राम स्वराज्य उनके लक्ष्य थे, लेकिन कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था के गांधी मार्ग को छोड़ दिया। चरण सिंह ने 1978 में इंडियाज इकोनामिक पालिसी-दि गांधियन ब्लू प्रिंट में लिखा कि कांग्रेस ने केवल गांधी मार्ग ही खारिज नहीं किया, उसने आर्थिक विकास का पूर्णतया विदेशी माडल भी अपनाया। जो बात चरण सिंह ने 1978 में लिखी थी, राजनाथ सिंह ने वही बात 2009 में दोहराई है। भारतीय अर्थव्यवस्था स्वदेशी नहीं, बाजारवादी है। विश्व बाजारवाद का उद्देश्य मुनाफा है। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में मुनाफा कमाने ही आई थी। उसे भारतीय मुनाफाखोरों का सहयोग मिला।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; भारत आर्थिक गुलामी से राजनीतिक गुलामी की तरफ बढ़ा। प्लासी के युद्ध से लेकर आजादी तक की भारतीय अर्थव्यवस्था अंग्रेजी अर्थनीति की डाकाजनी है। फिर 1947 से लेकर 1991 तक नेहरूवादी राजनीति की कोख से निकली अर्थनीति चली। भारत कंगाल हो गया। 1991 में नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने। भारत के पास 2 हफ्ते से ज्यादा के आयात बिल देने का धन नहीं था। इसी साल जुलाई में रुपये का अवमूल्यन हुआ। निर्यात सबसिडी खत्म हुई। उस समय वित्तमंत्री रहे मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने मुक्त बाजारवादी अर्थनीति बनाई और देश मुक्त बाजार बन गया। 1991 से 2009 के 18 बरस बाजारवादी अर्थनीति में गए। नतीजा सामने है। प्रतिष्ठित अमेरिकी कंपनियां अविश्वसनीय हुईं, लेकिन राष्ट्रीय शोक भारतीय अर्थव्यवस्था ने मनाया। फिर सत्यम कंपनी का मामला सामने आया।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; सत्यम कंपनी में जैसी धोखाखड़ी हुई वह बाजारवादी अर्थव्यवस्था में ही मुमकिन है। गांधीवादी अर्थव्यवस्था का आधार स्वदेशी है। उत्पादक का लक्ष्य मुनाफा नहीं है। यहां सबको रोटी, रोजी, दवाई और शिक्षा है। स्थानीय स्तर की जरूरी चीजों का उत्पादन लघु उद्योगों के हाथ होना चाहिए। राष्ट्रीय जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर बड़े उद्योग कर सकते हंै। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के भी कई रूप हैं। पहला व्यापारिक पूंजीवाद है। दूसरा औद्योगिक पूंजीवाद है। मुक्त औद्योगिक उत्पादन में बड़ी पूंजी वाला छोटे उद्योगों का नाश करता है। इस अर्थव्यवस्था के समर्थकों के कुतर्क हैं कि उपभोक्ता की मांग के अनुसार ही उत्पादन होता है, लेकिन मुक्त पूंजीवाद में विज्ञापनबाजी के जरिए कृत्रिम मांग पैदा की जाती है। तीसरा पूंजीवाद महाजनी है। इसमें ढेर सारे लोग, संस्थाएं और बैंक पूंजी लगाते हैं, घर बैठे मुनाफा कमाते हैं। भारत तीनों की गिरफ्त में है। इसने एक नया बिजी नेटवर्क समाज बनाया है। विदेशी पूंजी निवेश की बल्ले-बल्ले हैं। गांधीजी ने अर्थव्यवस्था का मूलमंत्र दिया था सबसे गरीब आदमी की शक्ल याद करो और स्वयं से पूछो कि क्या इससे उसे कुछ लाभ होगा? मनमोहन मार्ग का सिद्धांत है कि बड़े से बड़े औद्योगिक घरानों को देखो, वही कदम ठीक है जिससे उन्हें मुनाफा हो। मनमोहन मार्ग में शोषण है और गांधी मार्ग में स्वराष्ट्र का परमवैभव। भारत उचित मार्ग तय करे।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; (लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं)&lt;br /&gt;साभार-जागरण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-8534924752948621849?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/8534924752948621849/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=8534924752948621849' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8534924752948621849'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8534924752948621849'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/02/blog-post_20.html' title='मुक्त पूंजीवाद के परिणाम'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-8862086064062025297</id><published>2009-02-17T14:37:00.002+05:30</published><updated>2009-02-17T14:44:24.976+05:30</updated><title type='text'>श्रीगुरुजी और राष्ट्र-अवधारणा</title><content type='html'>संस्कृति: राष्ट्र संकल्पना का हृदय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्र यानी लोग या समाज होता है। उसकी विशेषता उस समाज की संस्कृति होती है।&lt;br /&gt;संस्कृति यानी उस समाज के जीवनमूल्य, संस्कृति यानी उस समाज के अच्छे और बुरे नापने के मापदण्ड। संक्षेप में संस्कृति यानी राष्ट्र और राष्ट्रीयता का प्राण। श्री गुरुजी कहते है:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;``हिन्दू राष्ट्र की हमारी कल्पना राजनीतिक एवं आर्थिक अिधकारों का एक गट्ठर मात्र नहीं है। वह तत्त्वत: सांस्कृतिक है। हमारे प्राचीन एवं उदात्त सांस्कृतिक जीवनमूल्यों से उसके प्राणों की रचना हुई है। और हमारी संस्कृति की भावना का उत्कट नवतारुण्य (तमरनअमदंजपवदद्ध ही हमारे राष्ट्रीय जीवन की सही दृष्टि हमें प्रदान कर सकता है तथा आज हमारे राष्ट्र के सम्मुख खड़ी हुई अगणित समस्याओं के समाधान में हमारे सभी प्रयत्नों को सफल दिशानिर्देश भी कर सकता है। ``किन्तु इन दिनों संस्कृति के नवतारुण्य को प्राय: `पुनरुज्जीवनवाद´ और प्रतिक्रियावाद होने की उपािध दी जाती है। प्राचीन पूर्वाग्रहों, मूढ़ विश्वासों, अथवा समाजविरोधी रीतियों का पुनरुज्जीवन प्रतिक्रियात्मक कहा जा सकता है, कारण इसका परिणाम समाज का पाशाणीकरण (विेेपसपेंजपवदद्ध में हो सकता है। किन्तु शाश्वत एवं उत्कर्षकारी जीवनमूल्यों का नवतारुण्य कभी प्रतिक्रियात्मक नहीं हो सकता। इसे केवल प्राचीन होने के कारण प्रतिक्रियात्मक´ नाम देना, बौद्धिक दिवालियापन प्रकट करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अपनी संस्कृति के नवतारुण्य से हमारा आशय उन शाश्वत जीवनादशोZं को पुन: जीवन में उतारने से है, जिन्होंने इन सहस्रों वषो± तक हमारे राष्ट्रजीवन को पोषित किया और अमरता प्रदान की।´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी संस्कृति की विशेषताओं का विवेचन करते हुए श्री गुरुजी कहते हैं -``प्रथम एवं सर्वािधक मूलभूत पहलू है उस परम सत्य की अनुभूति की आकांक्षा, जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, चाहे उसे कुछ भी नाम दिया गया हो। अथवा सरल ‘ाब्दों में कहा जाय तो ``ईश्वर का साक्षात्कार करना। किन्तु ईश्वर है कहाँ? हम उसे कैसे जान सकते हैं? उसका स्वरूप कैसा है? उसके रूप, गुण क्या हैं? कि हम उसका ध्यान कर सकें और उसको पावें? उसका यह वर्णन कि वह निर्गुण और निराकार है इत्यादि, हमारी समस्याओं को सुलझाता नहीं। पूजा के विविध पंथ भी विकसित हुए हैं। लोग मंदिरों में जाते हैं और सर्वशक्तिमान् का प्रतीक मानकर मूर्तियों पर ध्यान केिन्द्रत करने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु जो कि कर्मशक्ति से पूर्ण है उनको यह सब सन्तुष्ट नहीं करता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color:#e6e6e6;width: 400px;height:100px;border-left: 3px solid red; padding: 5px;"&gt;``अतएव हमारे पूर्वजों ने कहा है ``हमारा समाज ही हमारा ईश्वर है। ``जनता जनार्दन´´ है। भगवान् रामकृष्ण परमहंस ने कहा है -`मनुष्य की सेवा करो´। जनता में जनार्दन देखने की यह अतिश्रेष्ठ दृष्टि ही हमारे राष्ट्रकल्पना का हृदय है। उसने हमारे चिन्तन को परिव्याप्त कर लिया है तथा हमारे सांस्कृतिक दाय की विविध अनुपम कल्पनाओं को जन्म दिया है।´´&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर की सेवा यानी समाज की सेवा। ईश्वर की पूजा यानी जनता जनार्दन की पूजा। इस भाव को यदि हमने हृदयंगम किया तो फिर मनुष्य अपने अिधकारों की बात नहीं करेगा। अपने कर्तव्यों का ध्यान रखेगा। श्री गुरुजी कहते हैं ``आज हम सभी जगह अिधकारों के लिए मचा हुआ कोलाहल सुनते हैं। हमारे सभी राजनैतिक दल समान अिधकारों की बात बोलते हुए लोगों में अहंभाव जागृत कर रहे हैं। कहीं भी कर्तव्य और नि:स्वार्थ भाव की सेवा पर कोई बल नहीं दिया जाता। स्व-केिन्द्रत अिधकार-ज्ञान के वायुमण्डल में सहयोग की भावना, जो समाज की आत्मा होती है, जीवित नहीं रह सकती। इसी कारण आज हम अपने राष्ट्रजीवन में विविध घटकों के बीच संघर्ष देख रहे हैं। केवल हमारी सांस्कृतिक दृष्टि के आत्मसात् करने से ही हमारे राष्ट्रजीवन में सहयोग की सच्ची भावना एवं कर्तव्य की चेतना पुनर्जीवित हो सकती है।´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी संस्कृति की और एक विशेषता, श्री गुरुजी बताते हैं। ``हिमाचल के समान उन्नत&lt;br /&gt;हमारी संस्कृति का एक और शिखर है जिसपर पहुँचने की महत्वाकांक्षा अभी तक संसार में अन्य किसी ने नहीं की है। `एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति´´ वाक्यद्वारा जिस भाव की अभिव्यक्ति की गई है- अथाZत् सत्य एक है, ऋषि उसे विविध प्रकार से बताते हैं - इस प्रकार भाव को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी में कोई ‘ाब्दरचना नहीं है। `सहिष्णुता´ शब्द, जो इस भाव को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में आता है, बहुत नीचा है। वह तो सहन करने मात्र का भाव व्यक्त करने के लिए एक अन्य शब्द है। इसमें एक अहं का भाव है, जो केवल दूसरों के दृष्टिकोण को मात्र सहन करता है, उसके लिए कोई प्रेम या सम्मान नहीं रखता। परन्तु, हमारी शिक्षा अन्य विश्वासों एवं दृष्टिकोणों को इस रूप में सम्मान करने तथा स्वीकार करने की भी रही है कि वे सब एकही सत्य तक पहुँचने के लिए अनेक मार्ग हैं।´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री गुरुजी आगे बताते हैं ``जब हम अपने उदात्त सांस्कृतिक मूल्यों की बात करते हें तो&lt;br /&gt;आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता में पले हुए लोग सोचते हैं कि यह कोई रहस्यात्मक चीज है, कुछ पारलौकिक वस्तु है। किन्तु यह केवल हमारे मानसिक दास्य की वर्तमान गहराई को ही प्रकट करता है, जिसने हमें उन सिद्धान्तों को समझने के सामथ्र्य से भी वंचित कर दिया है, जो कभी हमारे राष्ट्रजीवन का गौरव थे।´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाच, गाना, नाटक, चलचित्र को ही सांस्कृतिक कार्य मानना श्री गुरुजी को मान्य होना&lt;br /&gt;सम्भव ही नहीं था। वे कहते हैं ``आज हम एक दूसरी पराकाष्ठा देखते हैं। नाच, गाना,&lt;br /&gt;चलचित्र तथा नाटकों को ही हम संस्कृति मानने लगे हैं। हम इस प्रकार के `संास्कृतिक कार्यक्रम´ अपने देश में सभी जगह चलते हुए देखते हैं। निस्संशयरूपेण हल्के मनोरंजन का एक दूसरा नाम संस्कृति हो गया है। यह इतनी हास्यासपद और अपमानकारी सीमातक पहुँच गया है कि नैतिक दुश्चरित्रता के कीचड़ में फँसे हुए चलचित्र के कुख्यात नट-नटी हमारे सांस्कृतिक प्रतिनििधमण्डलों में सिम्मलित किये जाते हैं। जिस देश में राम और सीता जैसे आदशZ चरित्र हुए, जिसने भूतकाल में श्रेष्ठतम दार्शनिक एवं ऋषियों और वर्तमान काल में विश्व में सहज सम्मान तथा प्रेमादर प्राप्त करनेवाले रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद जैसे व्यक्तियों को अपने सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते भेजा है, वहाँ से ऐसे व्यक्तियों का हमारे देश के सांस्कृतिक प्रतिनििध के नाते जाना हमारे पतन का एक भयावह दृश्य उपस्थित करता है।´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी इस उन्नत संस्कृति की आवश्यकता केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में भी उसकी उपयोगिता है, इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए श्री गुरुजी बोलते है, ``हमारी सांस्कृतिक दृष्टि को ही, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम और सामंजस्य के लिए सच्चा आधार प्रदान करती है, और जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को पूर्त करती है, आज के इस युद्ध से ध्वस्त हुए विश्व के सामने प्रभावी ढंग से रखने की आवश्यकता है। यदि इस महान् जागतिक लक्ष्य में हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें प्रथम अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। हमें विदेशी वादों (पेउे) की मानसिक Üाृंखलाओं और आधुनिक जीवन के विदेशी व्यवहारों तथा अस्थिर ``फैशनों´´ से अपनी मुक्ति कर लेनी होगा। परानुकरण से बढ़कर राष्ट्र की अन्य कोई अवमानना नहीं हो सकती है। हम स्मरण रखें कि अन्धानुकरण प्रगति नहीं है।´´ (विचार नवनीत-पृष्ठ. 23 से 32)&lt;br /&gt;संकलनकर्ता - मा.गो.वैद्य&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-8862086064062025297?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/8862086064062025297/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=8862086064062025297' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8862086064062025297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/8862086064062025297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/02/blog-post_6510.html' title='श्रीगुरुजी और राष्ट्र-अवधारणा'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-3475728475743167261</id><published>2009-02-17T13:13:00.002+05:30</published><updated>2009-02-17T13:24:49.662+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'/><title type='text'>हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ</title><content type='html'>लेखक - बलबीर पुंज &lt;br /&gt;हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ नागपुर बैठक के बाद राजनीतिक हलके में चुनावी रणनीति के तहत भाजपा के अयोध्या और हिंदुत्व एजेंडे की ओर वापस लौटने की चर्चा चल रही है। यह बहस निरर्थक है, क्योंकि भाजपा ने कभी अयोध्या और हिंदुत्व का मुद्दा छोड़ा ही नहीं था। भाजपा की विचारधारा में हिंदुत्व ही मूल है। भारत के पंथनिरपेक्ष और बहुलवादी चरित्र का मूलाधार भी यही सनातन चिंतन है। हिंदुत्व के बिना भारत मजहब आधारित जिहादी पाकिस्तान का प्रतिरूप होगा। विभाजन के साथ पाकिस्तान ने अपने हिंदू अतीत को नकारा और वहां बचे हिंदुओं को मतांतरण अथवा पलायन के लिए विवश किया। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की राजधानी के रूप में कुख्यात हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वैदिक ऋचाओं के माध्यम से विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाला सिंधु नदी का पावन तट आज आतंकवाद की उपजाऊ भूमि के रूप में उभरा है। हिंदुत्वविहीन पाकिस्तान का एजेंडा जिहादी तय कर रहे हैं। क्यों? हमें जिस बहुलतावादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत पर गर्व है उसका यह स्वरूप संविधान के कारण नहीं है, बल्कि हिंदुत्व की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति के कारण संविधान पंथनिरपेक्ष और सम्मानित है। जिस सभ्यता-संस्कृति में संविधान को क्रियाशील रहना है उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति से साम्य नहीं रखने वाला संविधान कभी भी दीर्घजीवी नहीं रह सकता। इसीलिए पाकिस्तान में पंथनिरपेक्षता और प्रजातंत्र जड़ नहीं पकड़ सके। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय मुस्लिम लीग को छोड़कर प्राय: सभी राजनीतिक दल विभाजन के खिलाफ थे, किंतु कम्युनिस्टों ने जिन्ना को वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए जो मजहब आधारित राष्ट्र की मांग के लिए जरूरी थे। क्यों? इसलिए कि कम्युनिस्ट भारत की मूल प्रकृति व संस्कृति से कटे-छंटे थे। 1962 के चीन के आक्रमण के समय कम्युनिस्ट चीन के साथ थे। जब चीन परमाणु शक्ति से संपन्न हुआ तो कम्युनिस्टों ने तालियां बजाईं, किंतु पोखरण में दूसरे परमाणु परीक्षण से उन्हें बड़ी तकलीफ हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वामपंथियों और भारत के बीच जो असंगति है उसका कारण यही है कि मा‌र्क्स के मानसपुत्रों में हिंदुत्व का अभाव है। दुर्भाग्य से मीडिया के एक बड़े वर्ग में विकृत सेकुलरवाद के प्रति आसक्ति और हिंदू विरोधी मानसिकता हावी है। तकरीबन पिछली दो पीढ़ी नेहरूवादी स्वाधीन भारत में पल कर बड़ी हुई हैं। नेहरूवादी पाश्चात्य उन्मुक्तता इस्लामी कट्टरवाद के लिए सहिष्णुता और हिंदू पहचान के प्रति वैमनस्य का ही नाम था। उनके बाद इंदिरा गांधी के दौर में वामपंथियों का गुट मीडिया और शीर्षस्थ बौद्धिक संस्थानों पर हावी हुआ। वामपंथियों के लिए राष्ट्रवाद कोई मायने नहीं रखता था, इसलिए इस राष्ट्र का गौरव उन्हें आकर्षित नहीं कर सका। जिस मानसिकता ने देश का विभाजन कराया, आजादी के बाद जिसने सांप्रदायिक वैमनस्य के बीज बोए उसके लिए देश की पुरातन मान्यताएं व उसकी गरिमा गौण है। रोम, मिस्त्र, यूनान आदि सभ्यताएं काल के गाल में समा गईं, किंतु हिंदू सभ्यता नित नूतन है। इसीलिए, क्योंकि भारत का सतत अस्तित्व हिंदू दर्शन पर आधारित है। भारत की पहचान किसी एक पंथ या पूजा पद्धति से नहीं जोड़ी जा सकती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदू दर्शन में अनंत काल से विचार-विमर्श और श्रेष्ठ चिंतन के आदान-प्रदान की दीर्घ परंपरा रही है। यूरोप में रोमन साम्राज्य की छत्रछाया में ईसाइयत ने मूर्तिपूजकों के साथ लड़ाई लड़ खुद को स्थापित किया। लिथुआनिया में 14वीं सदी तक मूर्तिपूजन विद्यमान था, किंतु ईसाइयत उसे निगल गई। वह एक बर्बर सामूहिक नरसंहार का दौर था जब श्वेत ईसाइयत लेकर अमेरिका पहुंचे और वहां के निवासियों को ईसाई बनाया। मध्यकाल इस्लामी बर्बरता और हिंसा के बल पर मतांतरण का साक्षी है। इस तरह की असहिष्णुता के लिए हिंदू दर्शन में कभी कोई स्थान नहीं रहा है। हिंदुत्व को फासीवादी और सांप्रदायिक संज्ञा देना वास्तव में भारत के सनातन चरित्र को कमजोर करने का षड्यंत्र है। इस कुप्रचार का लक्ष्य प्रजातांत्रिक और सहिष्णु मूल्यों को कमजोर कर मध्यकालीन कट्टरता को वापस लाना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश इस्लामी जिहाद से त्रस्त हैं। राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए भाजपा यदि इस्लामी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने की मांग करती है, मौत के सौदागरों को मिल रहे स्थानीय समर्थन पर प्रश्न खड़ा करती है तो इसे किस तरह सांप्रदायिकता से जोड़ा जाता है? महात्मा गांधी ने रामराज्य के आधार पर ही एक पंथनिरपेक्ष जनकल्याणकारी राष्ट्र की कल्पना की थी। क्या गांधीजी और भाजपा के राम अलग-अलग हैं? राम तो हिंदुत्व के प्राण हैं। हिंदुत्व केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। पोखरण द्वितीय भी हिंदुत्व एजेंडा का अंग था। भाजपा नीत राजग सरकार के काल में प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, दूरसंचार क्रांति, सर्व शिक्षा अभियान आदि भी उसी एजेंडे से प्रसूत थे। उसी एजेंडे से दीप्त गुजरात आज विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ रहा है। हिंदुत्व भारतीयों को खुशहाल, समृद्ध, शांतिप्रद भारत के लिए प्रेरित करता है, जहां सब के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध हों, जहां सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और शुचिता का महत्व हो। वर्तमान संप्रग सरकार में आधा दर्जन ऐसे मंत्री हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। एक पर हत्या का आरोप है, किंतु वह महत्वपूर्ण पद पर कायम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; श्रीराम ने पिता के आदेश का पालन करने के लिए राजपाट का मोह छोड़ वनवास स्वीकार किया। उसी हिंदुत्व के कारण लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कांड में अपना नाम शामिल होने पर सार्वजनिक जीवन से तब तक के लिए अवकाश ले लिया था जब तक जांच में वह निर्दोष साबित न हो जाएं। क्या हिंदुत्व इस सनातन राष्ट्र की कालजयी सभ्यता का बोधक नहीं है? सेकुलरिस्ट अगर इसी देश में कश्मीरियत को स्वीकार सकते हैं तो समग्र रूप से पूरे हिंदुस्तान की सभ्यता के लिए हिंदुत्व के प्रयोग पर आपत्ति क्यों है? इस देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं तो उन पर समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जा सकती है? एक समुदाय अपने लिए अलग कानून और अदालत की मांग क्यों करता है और उस मांग को सेकुलरिस्टों का समर्थन क्यों मिलता है? हिंदुत्व का अर्थ सर्वधर्म समादर है। यह मजहब के आधार पर किसी समुदाय के लिए विशेष अधिकारों की व्यवस्था नहीं देता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदुत्व के समर्थक क्या कभी ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं जिसमें शंकराचार्य फतवा जारी कर रहे हों और संत न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान हों? भाजपा के हिंदुत्व का जिस सेकुलरवाद के नाम पर विरोध किया जा रहा है उसका भारत में क्या अर्थ है? बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी शिक्षण संस्था चलाने के अधिकार से वंचित रखना और अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम व ईसाइयों को न केवल यह अधिकार देना, बल्कि उनकी संस्थाओं को राज्याश्रय और वित्तीय मदद उपलब्ध कराना, जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बहुल चरित्र को कायम रखने के लिए धारा 370 की व्यवस्था के अंतर्गत शेष भारतीयों की वहां रिहायश पर पाबंदी लगाना, हिंदू तीर्थस्थलों का अधिग्रहण और उन तीर्थस्थलों से हुई आमदनी से हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये हज सब्सिडी के रूब में बांट देना क्या सेकुलरवाद की विकृति को उजागर नहीं करते? इस विकृत सेकुलरवाद का विरोध आज सांप्रदायिकता है। क्यों? &lt;br /&gt;साभार-जागरण &lt;br /&gt;(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-3475728475743167261?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/3475728475743167261/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=3475728475743167261' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3475728475743167261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/3475728475743167261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html' title='हिंदुत्व एजेंडे का अर्थ'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-6653209474251849899</id><published>2009-02-13T13:46:00.002+05:30</published><updated>2009-02-13T13:57:17.145+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बंगलादेशी घुसपैठिये'/><title type='text'>झारखंड में भी हैं बंगलादेशी घुसपैठिये</title><content type='html'>कांग्रेसी नेता और एक दल का प्रदेश अध्यक्ष बने हैं संरक्षक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंबंगलादेश के मुक्ति दिवस (16 दिसम्बर) पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने किशनगंज (बिहार) में एक बार फिर से बंगलादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत की है। इसकी जरूरत झारखंड में भी है क्योंकि झारखंड लम्बे समय से इस समस्या से जूझ रहा है और प्रशासन इस समस्या को सुलझाने की बजाय इससे आंखें चुराता रहा है। इसका कारण यहां की भौगोलिक स्थिति तो है ही, राजनैतिक परिस्थितियों का भी बड़ा हाथ रहा है। झारखंड का राजमहल क्षेत्र बंगलादेश से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है, जहां से पिछले 50 वर्ष से कोयले की तस्करी से लेकर गौ तथा अन्य पशुओं की भी तस्करी होती है और घुसपैठ का रास्ता भी खुला हुआ है। किशनगंज और अररिया क्षेत्र से जितनी घुसपैठ होती है उससे कहीं अधिक घुसपैठ इस राजमहल क्षेत्र से होती है। राज्य की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर ये घुसपैठिये राज्य के मुस्लिमबहुल इलाकों में आसानी से पहुंच जाते हैं। उनको स्थानीय मुस्लिम व आदिवासी नेताओं का संरक्षण मिल जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झारखंड एक तरह से इन बंगलादेशियों के लिए "सुरक्षित क्षेत्र" का काम करता है और इसका एक बड़ा कारण राज्य में बोली जाने वाली स्थानीय भाषाएं हैं, जिन पर बंगला भाषा का बहुत प्रभाव है। उनका उच्चारण भी तब पकड़ में आ पाता है जब कोई विशेष जानकार उनकी बोली का विश्लेपण करे। रांची, जमशेदपुर, धनबाद, देवघर तथा गिरिडीह के कोयला क्षेत्रों में इन बंगलादेशी घुसपैठियों की सघन खोज की जाए तो झारखंड की आबादी का एक बड़ा प्रतिशत इन्हीं लोगों का होगा। इनके पास वाकायदा राशनकार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बैंक की पासबुक तथा वे सब जरूरी कागजात भी मिल जाएंगे जो किसी को भारतीय नागरिक सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हों। इस काम में स्थानीय दलाल, राजनीतिक लोग तथा घूसखोर सरकारी कर्मचारियों का हाथ रहता है। बंगलादेश से आने वाले घुसपैठियों में अधिकतर मुस्लिम होते हैं। वे यहां आकर सामान्यतया प्लास्टिक के सामान की गांव-गांव में फेरियां लगाकर जीवनयापन करते हैं। राज्य के अनेक नगरों में इनकी छोटी-छोटी बस्तियां बन चुकी हैं। बालक प्राय: भीख मांगते हैं और स्त्रियों को वे वेश्यावृत्ति की ओर धकेल देते हैं। इसमें स्थानीय दलाल उनकी मदद करते हैं और कमाई में से एक हिस्सा लेते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगलादेश और भारत के बीच होने वाली तस्करी और घुसपैठ कोई नयी बात नहीं है। कांग्रेस का एक बडा जनजातीय नेता इस काम का मुख्य कर्ताधर्ता माना जाता है। इलाके का बच्चा-बच्चा जानता है उसके विषय में। इस काम में उसके पांच सौ से अधिक लोग लगे हुए हैं। वैसे तो वह चावल, कोयला और पशुओं की तस्करी का धंधा करता है परंतु उसके साथ ही बंगलादेश के लोग भी चले आते हैं और यहीं आकर बस जाते हैं। सांसद और विधायक रह चुका यह नेता आज भी इस क्षेत्र का माफिया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने भी इस सरगना के विरुद्ध कई बार अभियान चलाया, पर कुछ हुआ नहीं। आज तक न तो तस्करी रुकी और न घुसपैठ को ही रोका जा सका। झारखंड इन घुसपैठियों के कारण ही आतंकवादियों के भी निशाने पर है। हाल ही में रांची के एक बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान में शक्तिशाली बम बरामद किया गया था। वह बम यदि फट जाता तो बहुत बड़ा हादसा हो गया होता। पुलिस ने कुछ दिनों तक तो इस घटना को गंभीरता से लिया और जांच का नाटक भी किया, परंतु बाद में न जांच हो सकी और न कोई परिणाम ही निकला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य में जमशेदपुर का एक मुस्लिम माफिया भी इन आतंकवादियों की सहायता करता है। पुलिस ने कई बार उस सरगना को घेरने का प्रयास किया परंतु उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी। आज वह एक राजनैतिक दल का प्रदेश अध्यक्ष है और बड़ी संपत्ति का स्वामी भी। पुलिस उसके विपय में सब जानती है परंतु कुछ कहती नहीं है। इस अपराधी पृष्ठभूमि वाले नेता पर अनेक बार पुलिस ने मामले चलाए और एक बार अमृत बाजार पत्रिका के एक संवाददाता इलियास हुसैन और करीम सिटी कालेज के एक प्रोफेसर कमालुद्दीन की हत्या के आरोप में इसे अभियुक्त भी बनाया था। वह संवाददाता प्रोफेसर के साथ मिलकर कोई बड़ा रहस्योद्घाटन करने वाला था और इसी कारण उन दोनों की हत्या कर दी गयी । इन हत्याओं के लिए जिम्मेदार इस नेता की गिरफ्तारी के लिए पूरा सिंहभूम जिला आंदोलित हो गया था। उसको पकड़ा भी गया और अदालत में मामला भी चलाया गया, पर पुलिस व गवाहों के मुकरने के कारण उसको सजा नहीं हो सकी। उस पर टाटा कारखाने में घुसकर अपने तीन प्रतिद्वंद्वियों को गोली से भून देने का मामला भी टांय-टांय फिस्स हो गया। एक अन्य मामले में पकड़ने गयी पुलिस पर गोली चलाने और एक पुलिसकर्मी की हत्या करने के बाद वह फरार हो गया। दस वर्ष बाद उसके कोलकाता से पकड़ा तो गया और एक वर्ष तक वह जेल में भी रहा, पर जब मामला अदालत में आया तो जांच करने वाले पुलिसकर्मी और गवाह पलट गया। अदालत ने उसको छोड़ दिया। उसके बाद वह राजनीति में आ गया तथा कई राजनैतिक दलों से होता हुआ वह आज एक दल का प्रदेश अध्यक्ष है। अब यह बंगलादेशियों की मदद करता है। राज्य में जनता के लिए मुसीबत बन चुके अपराधियों के लिए हथियार उपलब्ध कराने में भी बंगलादेशी आतंकवादी और घुसपैठियों का हाथ होने की भी कई बार चर्चा की गयी, परंतु कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी।&lt;br /&gt;साभार -पन्चजनय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1933409437416103053-6653209474251849899?l=sumansourabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sumansourabh.blogspot.com/feeds/6653209474251849899/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1933409437416103053&amp;postID=6653209474251849899' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6653209474251849899'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1933409437416103053/posts/default/6653209474251849899'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sumansourabh.blogspot.com/2009/02/blog-post_13.html' title='झारखंड में भी हैं बंगलादेशी घुसपैठिये'/><author><name>sumansourabh</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08562399035985942548</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/S_exOfLiK3I/AAAAAAAAAKo/k2T5OmJN-YM/S220/sm-3.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1933409437416103053.post-1373238589131842331</id><published>2009-02-12T15:16:00.003+05:30</published><updated>2009-02-12T16:38:47.473+05:30</updated><title type='text'>भारत की पहचान है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SZQDFj2sokI/AAAAAAAAAI0/nj70asGctfc/s1600-h/sourabh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 133px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_JBFcb9Ee6kE/SZQDFj2sokI/AAAAAAAAAI0/nj70asGctfc/s200/sourabh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301866055380804162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांस्कृतिक राष्ट्रवाद  प्राचीन अवधारणा है। राष्ट्र वही होगा, जहां संस्कृति  होगी। जहां संस्कृति विहीन स्थिति होगी, वहां राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी है। भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबर्दस्त दौर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने चलाया। इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरन्तर अवरूद्ध होता गया। अब अवरूद्ध मार्ग खुलने लगा है। संस्कृति  से उपजा संस्कार बोलने लगा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो सदियों से चली आ रही है। यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बन्धन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है। भारत की संस्कृति भारत  की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है । उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है। अनादिकाल से यहां का समाज अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न  करके भी एक ही मूल से जीवन रस ग्रहण करता आया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="background-color:#e6e6e6;width: 400px;height:100px;border-left: 3px solid red; padding: 5px;"&gt;भारतीय संस्कृति  की नींव गंगा, गायत्री, गौ, गीता पर खड़ी है। ज्ञान-कर्म-शील-सातत्य इसकी सुदृढ़ दीवारें हों। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की छत का जिसे संरक्षण मिला है तथा इसमें विराजती है, उस विराट की प्रतिमा जो सत्य, सुन्दर, शिव है। कर्म यहां का जीवन है, पूजा है। यहाँ अधिकार की आराधना नहीं, कर्म की ही उपासना होती है। हमने इसे पूजा है, कभी राम के रूप में, कभी —ष्ण के रूप में। भारतीय संस्कृति संश्लेषण की संस्कृति  है, विश्लेषण का विज्ञान नहीं। समन्वय इसका स्वभाव है। टूटना इसका चरित्र नहीं। आस्था इसकी डगर है और विश्वास इसका पड़ाव। न कोई भटकाव है और न कोई विभ्रम।  &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति  की नींव गंगा, गायत्री, गौ, गीता पर खड़ी है। ज्ञान-कर्म-शील-सातत्य इसकी सुदृढ़ दीवारें हों। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की छत का जिसे संरक्षण मिला है तथा इसमें विराजती है, उस विराट की प्रतिमा जो सत्य, सुन्दर, शिव है। कर्म यहां का जीवन है, पूजा है। यहाँ अधिकार की आराधना नहीं, कर्म की ही उपासना होती है। हमने इसे पूजा है, कभी राम के रूप में, कभी —ष्ण के रूप में। भारतीय संस्कृति संश्लेषण की संस्कृति  है, विश्लेषण का विज्ञान नहीं। समन्वय इसका स्वभाव है। टूटना इसका चरित्र नहीं। आस्था इसकी डगर है और विश्वास इसका पड़ाव। न कोई भटकाव है और न कोई विभ्रम।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रचलित राष्ट्रवाद की परिभाषा भूगोल पर आधारित है, देश व राष्ट्र समुद्रों, पर्वतों, नदियों, रेगिस्तानों की सीमाओं से बंधे हो। यूरोपीय विद्वानों के मतानुसार राष्ट्रीयता की भावना सर्वप्रथम 1789 में हुई फ्रेंच जाति के बाद उभरकर सामने आई। पेंनिग्व डिक्शनरी ऑफ सोशियॉलाजी में राष्ट्रीयता की भावना अट्ठारहवीं शताब्दी में सर्वप्रथम यूरोपीय देशों में न्याय राज्य निर्माण होकर वहीं के मानव समूहों को राष्ट्र का स्वरूप प्राप्त हो गया। यूरोप के मानचित्रों पर जर्मन राष्ट्र का प्रादुर्भाव 1871 में हुआ। फिर इटली का एकीकरण हुआ और धीरे-धीरे राष्ट्रीयता की अवधारणा यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गयी। यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी एवं बौद्धिक विस्तार के फलस्वरूप राजनीतिक राष्ट्रीयता के विचार का प्रसार अन्य देशों में भी फैल गया। चूंकि वे शासक थे, इसलिए उनकी बात को यूरोपीय विद्वानों के साथ-साथ गैर यूरोपीय विद्वानों ने भी स्वीकार्य कर लिया। प्रभुसत्ता ने जिस-जिस भूमि पर अधिकार (कब्जा) किया, वो उनका राष्ट्र बनता गया। तिब्बत की राष्ट्रीयता को समाप्त करके चीन ने अपनी प्रभुसत्ता बनाई। इज़राइल और फिलिस्तीन ने कब्जे के आधार पर देश या राष्ट्र को परिभाषित किया। राजनीतिक विचारधारा आधारित राष्ट्र साम्यवाद, पूंजीवाद इत्यादि, जाति आधारित यूरोप को अंग्रेजों हिब्शयों (नीग्रो) पूजा पद्धति आधारित सभी राष्ट्र जिसमें इस्लाम का राजसत्ता का संरक्षण प्राप्त है। इसी प्रकार राष्ट्रपति बुश का ईसाइयों और मुस्लिमों में भी पूजा पद्धति का मतभेद होने के कारण ये राष्ट्र क्रियात्मक नहीं हो पाते। हिन्दू धर्म में भी अनेक विश्वास और पूजा पद्धतियां हैं, जिसके कारण जैनियों का राष्ट्र या सिक्खों का राष्ट्र जैसी कल्पनाएं अव्यवहारिक/संस्कृति आधारित राष्ट्र व पूरे या यूरोप की समान संस्कृति  यूरोपियन संघ बना हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अमेरिका में विभिन्न  जातियों के एक साथ रहने का कारण भी संस्कृति  हो सकता है, क्योंकि पिछले चार सौ वषो की एक विशेष संस्कृति  वहां पर उत्पन्न हुई है, हिन्दु जीवन दर्शन पर आधारित संस्कृति जहां-जहां है, उनको भारतीय या हिन्दू राष्ट्र की कल्पना में सिम्मलित किया जा सकता है, इसमें भौगोलिक सीमाओं का महत्व कम हो जाता, नागरिकता और राष्ट्रीयता में अन्तर कम हो जाता है।भारत एक प्राचीन राष्ट्र है और इसकी राष्ट्रीयता का आधार है संस्कृति &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्, वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित तथाकथित एक ऐसा वर्ग है जो इसे राष्ट्र नहीं मानता। "काफिले आते रहे, कारवां बनता रहा" या । छंजपवद पे उंापदहण् राष्ट्र, राज्य एवं देश को एक ही मानने या इनके अंतर को न समझने के कारण ये तथाकथित प्रगतिशील लोग भ्रमजाल फैलाते रहते हैं। प्रादेशिक राष्ट्रवाद की संकल्पना यूरोप में राज्यों के अभ्युदय के साथ प्रमुखता से उभरी। एक निश्चित भूखंड, उसमें रहने वाला जन, एक शासन एवं उसकी संप्रभुता को राष्ट्र कहा गया। कालांतर में राजनीतिक स्वरूप के कारण राष्ट्र एवं राज्य को समान अथो में प्रयोग में लाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र संघ राष्ट्र शब्द को प्रयोग में लाया। राज्य एवं देश बनते-बिगड़ते रहे एवं संयुक्त राष्ट्र संघ उन्हें मान्यता देता रहा फलत: राष्ट्र एवं राज्य का अंतर समझने में भूल होती रही। मगर पश्चिमी परिभाषा की कसौटी पर भारत एक राष्ट्र नहीं, क्योंकि एक शासन नहीं। अंग्रेजों एक शासन के अंदर इसे लाए। अत: उसे राष्ट्र बनाने का श्रेय दिया गया। इज़रायल भी एक राष्ट्र नहीं, क्योंकि वहां जन (इज़रायली) था ही नहीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक राष्ट्रों को षड्यंत्रपूर्वक तोड़ा गया। जर्मन-पूर्वी एवं पश्चिमी जर्मनी, वियतनाम उत्तरी एवं दक्षिणी वियतनाम, कोरिया-उत्तरी एवं दक्षिणी कोरिया, लेबनान उत्तरी एवं दक्षिणी लेबनान आदि। भारत का विभाजन भी 1947 में द्विराष्ट्रीयता के आधार पर हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हिन्दु एवं मुस्लिम दो राष्ट्रीयता हैं अत:, दो राष्ट्र होने चाहिए। जर्मनी, वियतनाम, कोरिया, लेबनान आदि टूटे अवश्य पर उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता को नहीं छोड़ा पर दुर्भाग्यवश भारत का जो विभाजन हुआ वह एक अलग स्वरूप में हुआ। पूर्वी  हिन्दुस्तान, पश्चिमी हिन्दुस्तान एवं मध्य हिन्दुस्तान - अगर इस रूप में रहता तो हिन्दुस्तानी राष्ट्रीयता जिंदा रहती। पंथ राष्ट्रीयता है तो फिर इस्लाम एवं ईसाई मत वालों का एक ही राष्ट्र होना चाहिए था - यह प्रश्न नहीं उठाया गया। पंथ को राष्ट्रीयता मानने के कारण ही नागालैंड एवं मिजोरम में अलगाववाद ने हिंसक रूप धारण किया। इसी धारणा के कारण पंजाब में भी अलगाववाद उभारने का असफल प्रयास हुआ। सिक्खों ने सवाल किया कि हिन्दू, मुस्लिम सिख, ईसाई-आपस में हैं भाई-भाई। अगर दो भाइयों का बंटवारा 1947 में हो गया तो हमें भी अलग करो। इसी तरह पाकिस्तान भाषा (बंगला-उर्दू) को राष्ट्रीयता मानकर दो भागों में टूट गया। अगर भाषा राष्ट्रीयता है तो फिर सभी अंग्रेजी बोलने वालों का एक राष्ट्र क्यों नहीं ? इंग्लैण्ड एवं आयरलैण्ड आपस में क्यों लड़ते हैं ? भारत में भी एक ऐसा वर्ग है जो भाषा को राष्ट्रीयता मानकर इस देश को बहुराष्ट्रीयता (डनसजप छंजपवदंसपजलए डपग ब्नसजनतमद्ध बहु संस्कृति राज्य कहता है। गुजराती संस्कृति पंजाबी संस्कृति , उड़िया संस्कृति , तेलुगु संस्कृति कéड़ संस्कृति  मराठी संस्कृति , तमिल संस्कृति  आदि शब्दों का प्रयोग करता है और लोग भी अपनी संस्कृति  की पहचानß के नाम पर अलगाववाद के नारे लगाने लगते है
