Sunday, April 24, 2016

राष्ट्रीय संविमर्श


भोपाल (मध्य प्रदेश) पुनरुत्थान विद्यापीठ और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में  22 और 23 अप्रैल को भोपाल में राष्ट्रीय संविमर्श का आयोजन किया गया. इसका विषय था- अध्ययन और अनुसंधान में प्रमाण का भारतीय अधिष्ठान.  इस विषय पर पुनरुत्थान विद्यापीठ अहमदाबाद की कुलपति आदरणीया इन्दुमति काटदरे जी ने व्यख्यान दिया. इस कार्यक्रम का संचालन भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक डॊ. सौरभ मालवीय ने किया.

कार्यक्रम की एक झलक

Tuesday, April 12, 2016

भारतीय नववर्ष


-सौरभ मालवीय
नव रात्र हवन के झोके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत् पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनन्दन करते हैं॥

इस सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ठ काल गणना का श्री गणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तद्नुसार हमारे सौरमण्डल की आयु चार अरब 32 करोड वर्ष हैं। आधुनिक विज्ञान भी, कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। यही नहीं हमारी इस पृथ्वी की आयु भी, 15 मार्च को, एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 16 वर्ष पूरी हो गयी। इतना ही नहीं, श्री मद्भागवद पुराण, श्री मारकडेय पुराण और ब्रह्यम पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते है। इस खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार हमारी पृथ्वी 14 मनवन्तरो में से सातवें वैवस्वत मनवन्तर की 28 वें चतुरयुगी के अन्तिम चरण कलयुग भी। आज 51 सौ 11 वर्ष में प्रवेश कर लिया।
जिस दिन सृष्टि का प्रारम्भ हुआ वो आज ही का पवित्र दिन है। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मन्दिर में चैत्रा पर्व की परम्परा बन गयी।

भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिया जिस नक्षत्र में पड़ती है उसी के नाम पर पड़ा। जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं इस लिए इसे चैत्र महीनें का नाम हुआ। श्री मद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर ये उसी समय से कलियुग का प्रारम्भ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलिय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ। वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारम्भ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकण्ड पर हुआ था। डॉ. बेली महोदय, स्वयं आश्चर्य चकित है कि अत्यंत प्रागैतिहासिक काल में भी भारतीय ऋणियों ने इतनी सूक्ष्तम् और सटिक गणना कैसे कर ली। क्रान्ती वृन्त पर 12 हो महीने की सीमायें तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किये गये और नाम भी तारा मण्डलों के आकृतियों के आधार पर रखे गये। जो मेष, वृष, मिथून इत्यादित 12 राशियां बनी।

चूंकि सूर्य क्रान्ति मण्डल के ठी केन्द्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है। प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है संयोग से यह अधिक मास अगले महीने ही प्रारम्भ हो रहा है।

भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अन्तर नहीं पड़ता जब कि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365।2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते है। इस प्रकार प्रतयेक चार वर्ष में फरवरी महीनें को लीपइयर घोषित कर देते है फिर भी। नौ मिनट 11 सेकण्ड का समय बच जाता है तो प्रत्येक चार सौ वर्षो में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है। अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अन्तरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकण्ड स्लो कर दिया गया फिर भी 22 सेकण्ड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है जहां की सी जी एस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किये जाते हैं। रोमन कैलेण्डर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था। जिसे में जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया उसके 1 ) सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया चूंकि ये दोनो राजा थे इस लिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गये। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान है जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। यदि नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेण्डर का नौवा महीना सितम्बर कहते है, दसवा महीना अक्टूबर कहते है, इग्यारहवा महीना नवम्बर और बारहवा महीना दिसम्बर कहते है। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमूच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।

सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया। जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है। जबकि बाइविल केवल 2) हजार वर्ष पुराना मानता है। चीनी कैलेण्डर 1 ) करोड़ वर्ष पुराना मानता है। जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 11 वर्षो की है। चालडियन कैलेण्डर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते है। सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिध्दान्त और सिध्दान्त शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है।

संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है। इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है। एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते है क्योंकि भारत में जब 31 दिसम्बर की रात को 12 बजता है तो ब्रीटेन में सायं काल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता। और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है। सन सनाती हुई ठण्डी हवायें कितना भी सूरा डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती है। ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यन्त दुस्कर रहता है। वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यन्त मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गन्धर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी देव व्‍यष्टि से समष्टि तक सब प्रसन्न हो कर उस परम् शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते है।

दिवस सुनहली रात रूपहली उषा साझ की लाली छन छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली। शीतल मन्द सुगन्ध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते है। ऐसे ही शुभ वातावरण में जब मध्य दिवस अतिशित न धामा की स्थिति बनती है तो अखिल लोकनायक श्री राम का अवतार होता है। आइये इस शुभ अवसर पर हम भारत को पुन: जगतगुरू के पद पर आसीन करने में कृत संकल्प हो।
अरूण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा॥

आया बैसाखी का पावन पर्व


डॊं सौरभ मालवीय
बैसाखी ऋतु आधारित पर्व है. बैसाखी को वैसाखी भी कहा जाता है. पंजाबी में इसे विसाखी कहते हैं. बैसाखी कृषि आधारित पर्व है. जब फ़सल पक कर तैयार हो जाती है और उसकी कटाई का काम शुरू हो जाता है, तब यह पर्व मनाया जाता है. यह पूरी देश में मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा में इसकी धूम अधिक होती है. बैसाखी प्रायः प्रति वर्ष 13 अप्रैल को मनाई जाती है, किन्तु कभी-कभी यह पर्व 14 अप्रैल को भी मनाया जाता है.

यह सिखों का प्रसिद्ध पर्व है. जब मुगल शासक औरंगजेब ने अन्याय एवं अत्याचार की सभी सीमाएं तोड़कर  श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चांदनी चौक पर शहीद किया था, तब इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की थी. सिखो के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव का जन्म इसी महीने में हुआ था. सिख इसे सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं. गोविंद सिंह जी ने निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को एक ही पात्र से अमृत छकाकर पांच प्यारे सजाए, जिन्हें पंज प्यारे भी कहा जाता है. ये पांच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे. सब अलग-अलग जाति, कुल एवं अलग स्थानों के थे. अमृत छकाने के बाद इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया गया.
इस दिन श्रद्धालु अरदास के लिए गुरुद्वारों में जाते हैं. आनंदपुर साहिब में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाता है. प्रात: चार बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है. फिर दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाया जाता है. इसके पश्चात गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बिठाया जाता है. इस अवसर पर पंज प्यारे पंजबानी गाते हैं. दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है. प्रसाद लेने के बाद श्रद्धालु गुरु के लंगर में सम्मिलत होते हैं. इस दिन श्रद्धालु कारसेवा करते हैं. दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंज प्यारों के सम्मान में शबद और कीर्तन गाए जाते हैं.
शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फ़सल की की खुशियां मनाते हैं और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है.

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है. हिन्दुओं के लिए भी बैसाखी का बहुत महत्व है. पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना इसी दिन की थी.  इसी दिन अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था. राजा विक्रमादित्य ने विक्रमी संवत का प्रारंभ इसी दिन से किया था, इसलिए इसे विक्रमी संवत कहा जाता है. बैसाखी के पावन पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है. महादेव और दुर्गा देवी की पूजा की जाती है. इस दिन लोग नये कपड़े पहनते हैं. वे घर में मिष्ठान बनाते हैं. बैसाखी के पर्व पर लगने वाला बैसाखी मेला बहुत प्रसिद्ध है. जगह-जगह विशेषकर नदी किनारे बैसाखी के दिन मेले लगते हैं. हिंदुओं के लिए यह पर्व नववर्ष की शुरुआत है. हिन्दू इसे स्नान, भोग लगाकर और पूजा करके मनाते हैं.

Monday, April 11, 2016

संवाद का स्वराज विषय पर राष्ट्रीय व्याख्यान सम्पन्न


इंदौर (मध्य प्रदेश).माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय भोपाल तथा इंदौर प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में आज इंदौर प्रेस क्लब सभागृह में संवाद का स्वराज विषय पर राष्ट्रीय व्याख्यान कार्यक्रम सम्पन्न हुआ. यह कार्यक्रम केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश के कुलपति डॉ. कुलदीपचन्द अग्निहोत्री के मुख्य आतिथ्य में तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला की अध्यक्षता में हुआ. इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय भोपाल के कुलाधिपति एवं सचिव श्री लाजपत आहूजा तथा इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री प्रवीण खारीवाल विशेष रूप से मौजूद थे.
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए डॉ.कुलदीपचन्द अग्निहोत्री ने कहा कि स्वस्थ एवं स्वच्छ वातावरण में हुआ संवाद ही स्वराज की पहचान है. संवाद के पीछे षड़यंत्र हो तो गड़बड़ होती है. अंग्रेजों ने भारत में आर्य एवं अनार्य के रूप में विघटन पैदा करने की कोशिश की. भारत की विविधता को नयी अवधारणा से प्रस्तुत किया. इससे भारत के संबंध में विकृत मानसिकता पैदा हुई. उन्होंने हमारे देश की विविधता के आधार पर देश को बांटने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि विकृत मानसिकता वालों से सावधान रहने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि देशहित में चर्चा होना संवाद का स्वराज है. हमें देश को बांटने वाले तथा तोड़ने वालों की हर चुनौतियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए.
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए प्रो. कुठियाला ने कहा कि शब्द ब्रम्ह है. अब शब्द को ब्रम्ह में नहीं भ्रम में बदला जा रहा है. शब्द सर्वशक्तिमान है. शब्द से विचार बनता है और यह विचार व्यवहार रूप में दिखाई देते हैं. उन्होंने कहा कि संवाद, उद्देश्यपरक होना चाहिए. संवाद से सहमति बनना चाहिए. और सहमति के आधार पर परिणाम भी मिलना चाहिए, तभी संवाद की सर्थकता होती है. संवाद को आडम्बर नहीं बनने देना चाहिए. व्यर्थ का संवाद नहीं करना चाहिए. राष्ट्रीय हित में संवाद होना चाहिए. संवाद को विवाद नहीं बनने देना चाहिए. संवाद की प्रकृति विविधता भरी है. जिस तरह प्रकृति में विविधता है, उसी तरह संवाद में भी विविधता होती है. उन्होंने कहा कि विचार से ही अभिव्यक्ति बनती है. अभिव्यक्ति के माध्यम अलग-अलग होते हैं. उन्होंने कहा कि विचारों की अभिव्यक्ति में दायित्व का बोध होना चाहिए. संवाद जब दायित्वविहीन हो जाते हैं तब समाज टूटने लगता है. सकारात्मक संवाद बढ़ने से नकारात्मक संवाद अपने आप समाप्त हो जाते हैं.
कार्यक्रम में कुलाधिपति एवं सचिव श्री लाजपत आहूजा ने विषय का प्रतिपादन किया. उन्होंने कहा कि संवाद की परम्परा हमारी सदियों पुरानी परंपरा है. संवाद का स्वराज हमारी विशेष पहचान है. सहिष्णुता हमारी प्रकृति में है.
कार्यक्रम में इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार श्री शशीन्द्र जलधारी ने कविता का वाचन किया. कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय भोपाल द्वारा प्रकाशित पुस्तिका का विमोचन किया. कार्यक्रम का संचालन श्री सौरव मालवीय ने किया.

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है