Thursday, September 24, 2015

मानवता के कल्याण का विचार है एकात्म मानवदर्शन


दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती वर्ष पर विशेष, जयंती 25 सितंबर 
डॉ. सौरभ मालवीय
मनुष्य विचारों का पुंज होता है और सर्व प्रथम मनुष्य के चित्त में विचार ही  उभरता है। वही विचार घनीभूत होकर संस्कार बनते है और मनुष्य के कर्म रूप में परिणीति हो कर व्यष्टि और समष्टि सबके हित का कारक बनते है।  यदि विचारों की परिपक्वता अपूर्ण रह गई तो परिणाम विपरीत होने लगतेहै।  भारतीय महर्षियों ने विचारों की अनन्त उचाई छूने का प्रयास किया और इस विचार यात्रा में पाया गया कि सबसे उत्तम धर्म वही होगा जिसमें मनुष्यों के खिलने की समग्र संभावनाओं के द्वार खुले हो जिसे जो होना है वह हो और दूसरे के होने में बाधक न हो वल्कि साधक हो।  इस प्रकार के सः अस्तित्व की विचार सारणी इस धरा-धाम पर सबकी संभावनाओं के द्वार खोलती है। और इस प्रक्रिया में टकराहट की कल्पना भी नही सः अस्तित्व सहज धर्म बन जाता है और सूत्रवद्धता सबके मूल में स्थापित हो जाती है।
ऋषियों की यह चिंतन शैली भारत के जन मन में घुल हुआ है,भारत की मानसिकता इसी प्रकार के समग्र सोच पर विकसित है।  परोपकार ,अहिंसा ,करुणा ,क्षमा,दया ,आर्जव ,मृदुता,प्रतिभा इत्यादि अनेको प्रकार के फल इसी चिंतन वृक्ष पर सदियों से सदाबहार रूप में लदे रहते है। लम्बे गुलामी के कारण हमारी चिंतन धारा में भी गतिरोध पैदा हुआ और उस जीवन वृक्ष से नवीन सपने ढहता गया।  इस दौरान एक अपूर्ण विचार भी हम पर थोपने का प्रयास हुआ. सामान्यतः ऐसा होता ही है बिजेता चाहे जितना भी पतित विचार या जीवन शैली का हो अपनी उन चिंजो को विजितों पर लादता ही है उसी में कुछ चाटुकार वृति के लोग विजेताओं के इस नए धर्म का गला फाडू स्वागत करने लगते है पश्चिम के चिंतको में एक अत्यंत ही प्रमुख नाम रेन्डेकार्ट ने यहाँ तक घोषणा कर दिया कि ईश्वर मर गया है विश्व में ईश्वर नाम को कोई चीज ही नहीं है।  फेडरिकमित्से,कारलायल आदि विचारकों ने खण्डसह सोच को प्राथमिकता दी उनके कारण यह चिंतन ही पैदा नहीं हो पाया कि प्रकृति में कही एक सूत्रता भी है इस विचार ने अपनी पूरी ऊर्जा यह बताने में लगा दिया की व्यक्ति और समाज दो है। साधन और साध्य दो है।  सृष्टि और परमेष्ठी दो है।  देश और राष्ट्र दो है।  राष्ट्र और विश्व दो है इत्यादि।  इन द्वंदों के बीच वो यह भी कहते गए कि इनके लक्ष्य पूर्ति में विरोधाभाष भी है।  इस तरह के अपूर्ण चिंतन शैली का भयंकर परिणाम यह हुआ की हीगेल नाम के विचारक ने यह विचार दिया की आगे बढे हुए लोग अनैतिक हो जाते है जो पीछे वालों की नैक्तिक्ता पर पलते है इसी प्रकार की अपूर्ण शैली पर कार्ल मार्क्स ने बुजुर्वा और सर्वहारा शब्द गढ़े। उन्मादी मानसिकता के इस सोच ने विश्व में राष्ट्र ,परिवार ,ग़ाँव ,देश इत्यादि संस्थाओ और भावनात्मक सम्वन्धों को मिटा कर एक नई रेखा खीचंनी शुरू की लगभग ६० वर्षो के भीतर अधिक से अधिक धरती को अपनी छतरी के नीचें ढका लेकिन क्या परिणाम हुआ ये सारे के सारे देश टूट गए वहा का समाज जीवन नष्ट भ्रस्ट हो गया वे लोग अब पेरोस्ट्राइका और ग्लासमोस्ट की छाँव खोज रहे है।

एक दूसरी विचार शैली ने पूंजीवाद का एक ऐसा नँगा रूप खड़ा कर दिया की वहा हर व्यक्ति एक दूसरे को ग्राहक समझने लगा हर आदमी अपने मॉल  बढ़िया बता कर हर दूसरे को बेचा रहा है भले ही उसकी कोई सार्थकता न हो।  इस भयंकर परिस्थिति में यह सोचने का विषय है कि मनुष्य केवल व्यापारिक सम्बन्धो के कारण जी रह है या मनुष्य का बल पूंजी है ? क्या मनुष्य केवल रोटी है ?  जब इसकी जड़ो की ओर हम जाते है तो दिखाई देता है कि यह ओरिजिन ऑफ़ स्पेसिज तथा स्पेंसर वे तीन जीवन दिखाई देते है जिसमे कहा गया है कि सर्वाइकल ऑफ फिटेस्ट ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर और स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस ही मूल है यह बितण्डावाद इतना गहरा हो गया है की पूरा विश्व ही त्राहिमाम कर रहा है।  युग पुरुष महामनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सन १९६२ में श्री बद्रीशाह कुलधारिया की एक पुस्तक दैशिकशास्त्र पढ़ा पंडित जी ने दैशिकशास्त्र के जीवन मूल्यों के गुण सूत्र तो लाखो साल पुरानी परम्परा से चली आरहे श्री बद्रीशाह के अमृत वर्षा ने जीवन मूल्यों को फलने फूलने का अवसर दिया उसी शुभअवसर का अमृत फल एकात्म मानव दर्शन है।  जिसमे मनुष्य के परम स्वातंत्रय की घोषण है इस महामंत्र को पंडित जी ने सन १९६४ में मुंबई के भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में प्रस्तुत किया था।  इस एकात्म मानव दर्शन में व्यष्टि से समष्टि तक सब एक ही सूत्र में गुंथित है व्यक्ति का विकास हो तो समाज विकसित होगा समाज विकसित होगा तो राष्ट्र की उन्नति होगी राष्ट्र के उन्नति से विश्व का कल्याण होगा।  इस सूत्र को पंडित दीनदयाल जी ने श्रीमदभागवत से ग्रहण किया था जिसकी मूल धारणा स्ट्रिगल फार एजिस्टेंस नहीं वल्कि अस्तित्व के लिए सहयोग है।  उपनिषदों से किये हुए अमृत ने पंडित जी ने कहा कि जीवन उपभोग नहीं वल्कि तेन भुञ्जितः है सम्पूर्ण विश्व सुखी होगा।  सर्वाइकल ऑफ़ फिटेस्ट यह जीवन मंत्र नहीं हो सकता अपितु सबका सहयोग और सबका विकास जीवन दृष्टि है। ,एक्सपोलाइटेशन ऑफ़ नेचर यह पूरी तरह से मानव जाती को डूबा देगा।  जब की एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता दीनदयाल जी कहते है प्रकृति के सहयोग से अपना अस्तित्व बचाये रख सकते है प्रकृति गाय है गाय हमारी माता है हम उस माँ का दूध पिएंगे तो हम भी सुखी और स्वास्थ्य रहेंगे और प्रकृति माँ भी सुखी रहेंगी लेकिन यदि गाय का खून पिएंगे तो गाय भी मर जाएगी और हम भी मर जायेंगे।  यह उच्चतम मूल्य पूरी दृष्टि से हमें एकात्म हो जाने की प्रेरणा देती है यही एकात्म मानव दर्शन है जो इस धरती को एक नई दिशा देगा और सबका कल्याण होगा।

Tuesday, September 8, 2015

भारतीयता की प्रतिनिधि भाषा हिन्दी


डाॅ. सौरभ मालवीय
भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा और हिन्दी भाषा को लेकर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा भम्र की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। सच तो यह है कि हिन्दी भारत की आत्मा, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी हुई है।हिन्दी के अब तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाने के कारणों के बारे में समान्यतः आम भारतीय की सहज समझ यही होगी कि दक्षिण भारतीय नेताओं के विरोध के चलते ही हिन्दी देश की प्रतिनिधि भाषा होने के बावजूद राष्ट्रभाषा के रूप में अपना वाजिब हक नहीं प्राप्त कर सकी,जबकि हकीकत ठीक इसके विपरीत है । मोहनदास करमचंद गांधी यानि महात्मा गांधी सरीखा ठेठ पश्चिमी भारतीय और राजगोपालाचारी जैसा दक्षिण भारतीय नेता का अभिमत था की हिन्दी में ही देश की राष्ट्रभाषा होने के सभी गुण मौजूद है । वर्धा के राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की अध्यक्षा करते हुये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने साफ शब्दों मे कहा था कि देश कि बहुसंख्यक आबादी न सिर्फ लिखती-पढ़ती है बल्कि भाषाई समझ रखती है, इसलिए हिन्दी को ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए । उनका मानना था कि आजादी के बाद अगर हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाया जाता है तो देश की बहुसंख्यक जनता को आपत्ति नहीं होगी साथ ही सी. राजगोपालाचारी और खाँ अब्दुल गफार खाँ भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप मे अधिष्ठापित होना देखना चाहते थे । अखंड भारत और हर उस मुद्दे की तरह राष्ट्रभाषा के रूप मे हिन्दी को लेकर यदि राष्ट्रीय स्वीकार्यता नहीं बन पाई तो उसके पीछे अंग्रेजी से ज्याद अंग्रेजीवादी सोच वाले भारतीय नेता अधिक जिम्मेदार थे । दरअसल इन नेताओं का विभाजन जाति,क्षेत्र,भाषा के आधार पर न कर के उनके सोच के धरातल (मैकाले पद्धति )पर एक समूह मे रखा जाना चाहिए ।
मौजूदा समय मे विस्तार,प्रसार और प्रभावी बाजारू उपस्थिति को देखते हुये ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता जिसके आधार पर कहा जा सके कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं होना चाहिए – सिवाय राजनीतिक कुचक्र के । भारत का दुर्भाग्य यह रहा है कि सहृदयता के नाम पर कुछ प्रतिनिधि भारतीय ही उसकी स्मिता की जड़ो मे मट्टे डालने का कम करते आए है । हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिलने के पीछे भी इसी तरह के सोच वाले नेताओं की प्रमुख भूमिका रही है । दुर्भाग्यवस उसी मानसिकता के लोगों का बाहुल्य आज भी कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक निर्णायक स्थिति में है । बोली की दृष्टि से संसार की सबसे दूसरी बड़ी बोली हिन्दी हैं। पहली बड़ी बोली मंदारीन है जिसका प्रभाव दक्षिण चीन के ही इलाके में सीमित है चूंकि उनका जनघनत्व और जनबल बहुत है। इस नाते वह संसार की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है पर आचंलिक ही है। जबकि हिन्दी का विस्तार भारत के अलावा लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है लेकिन किसी भाषा की सबलता केवल बोलने वाले पर निर्भर नहीं होती वरन उस भाषा में जनोपयोगी और विकास के काम कितने होते है इस पर निर्भर होता है। उसमें विज्ञान तकनीकि और श्रेष्ठतम् आदर्शवादी साहित्य की रचना कितनी होती है। साथ ही तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस भाषा के बोलने वाले लोगों का आत्मबल कितना महान है। लेकिन दुर्भाग्य है इस भारत का कि प्रो. एम.एम. जोशी के शोध ग्रन्थ के बाद भौतिक विज्ञान में एक भी दरजेदार शोधग्रंथ हिन्दी में नहीं प्रकाशित हुआ। जबकि हास्यास्पद बाद तो यह है कि अब संस्कृत के शोधग्रंथ भी देश के सैकड़ों विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में प्रस्तुत हो रहे है।
भारत में पढ़े लिखे समाज में हिन्दी बोलना दोयम दर्जे की बात हो गयी है और तो और सरकार का राजभाषा विभाग भी हिन्दी को अनुवाद की भाषा मानता है।संसार के अनेक देश जिनके पास लीप के नाम पर केवल चित्रातक विधिया है वो भी विश्व में बडे शान से खडे है जैसे जापानी, चीनी, कोरियन, मंगोलिन इत्यादि, तीसरी दुनिया में छोटे-छोटे देश भी अपनी मूल भाषा से विकासशील देशो में प्रथम पक्ति में खड़े है इन देशों में वस्निया, आस्ट्रीया, वूलगारिया, डेनमार्क, पूर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, वेलजियम, क्रोएशिया, फिनलैण्ड फ्रांस, हंग्री, निदरलैण्ड, पोलौण्ड और स्वीडन इत्यादि प्रमुख है।
भारत में अंग्रेजी द्वारा हिन्दी को विस्थापित करना यह केवल दिवास्वपन है क्योंकि भारतीय फिल्मों और कला ने हिन्दी को ग्लोबल बना दिया है और भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के नाते भी विश्व वाणिज्य की सभी संस्थाएं हिन्दी के प्रयोग को अपरिहार्य मान रही है। हमें केवल इतना ही करना है कि हम अपना आत्मविश्वास जगाये और अपने भारत पर अभिमान रखे। हम संसार में श्रेष्ठतम् भाषा विज्ञान बोली और परम्पराओं वाले है। केवल हीन भाव के कारण हम अपने को दोयम दर्जे का समझ रहे है वरना आज के इस वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत का भाषा विज्ञान कम्प्यूटर के लिए सर्वोत्तम पाया गया है।
कुछ वर्ष पहले देश के एक उच्च न्यायालय ने चर्चित फैसला सुनाया था जिसके अनुसार हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा नहीं सिर्फ राजभाषा बताया गया था । आजादी के लगभग सात दसक बाद भी राष्ट्रभाषा का नही होना दुखद है। जब देश का एक राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक है यहा तक कि राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी एक है। ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश की अपनी राष्ट्र भाषा क्यों नहीं होनी चाहिए ? भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी की पिछलग्गू भाषा के रूप में क्यों बने रहना चाहिए ? 10 सितंबर से 13 सितंबर तक भोपाल मे आयोजित हो रहे विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान विद्वानों को अन्य जवलंत मुद्दों के साथ इन पर भी विचार करना चाहिए साथ ही इस दौरान हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान के साथ ही सभी विषयों की व्यवहारिक भाषा के रूप में विकसित करने के उपायों के साथ ही उसे अनुवाद के स्थान पर मौलिक भाषा के रूप मे अधिष्ठापित करने के उपाय पर भी विचार होना चाहिए । हिन्दी को लेकर कार्यपालिका और प्रभावी ताकतों की सोच को कैसे बदला जाए कि वे उसे मौलिक भाषा के रूप में स्थान दिलाने के लिए प्रभावी और सर्व सम्मति नीति बनाए।

भारत की राष्‍ट्रीयता हिंदुत्‍व है