लेखक -एस.शंकर
कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग ने दूसरी बार केंद्र की सत्ता संभालते ही संकेत दिया है कि वह अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के कल्याण के लिए बहुत कुछ करने जा रही है। कांग्रेस इस चुनाव में मुस्लिमों से मिले समर्थन से उत्साहित है लिहाजा वह अगले कुछ महीनों में उन्हें अनेक तरह की सुविधाएं देने की योजना बना रही है। संप्रग ने पिछले कार्यकाल में भी मुस्लिमों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक प्रगति के नाम पर सच्चर कमेटी का गठन किया था। मुस्लिमों की तरक्की के प्रयास करने में कुछ भी अनुचित नहीं, लेकिन कांग्रेस की ओर से यह काम जिस तरीके से करने की कोशिश की जाती है उससे यही संकेत मिलता है कि मुसलमानों के उत्थान के नाम पर वोट बैंक की राजनीति की जा रही है।
किसी गैर-मुस्लिम देश में मुसलमानों के लिए जितने विशेषाधिकार भारत में हैं वैसा विश्व में कहींनहीं, जैसे हज के लिए सरकारी अनुदान और बेरोक एक साथ चार पत्नियों की छूट। कट्टर इस्लामी ईरान में भी कोई अकारण चार शादियां नहीं रचा सकता। इसी तरह शिया मुसलमानों को जितने अधिकार यहां हैं उसकी वे सऊदी अरब में कल्पना भी नहीं कर सकते। वहां उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं और वे दूसरे दर्जे के हीन नागरिक हैं। भारत में मुसलमानों को यह विशेषाधिकार मुख्यत: कांग्रेस के सौजन्य से प्राप्त हुआ। मुस्लिम चाह पूरी करने के लिए 1946 में एक अलग देश की मांग मान लेना भी कांग्रेस की ही देन थी। ऐसा विश्व इतिहास में कहीं नहीं हुआ। समय बीतता गया। कांगेस मुस्लिमों को और विशेष सुविधाएं देती गई। 1980 का दशक बीतते शाह बानो और सलमान रुश्दी मामलों ने घोषणा की कि मुस्लिम नेता कांग्रेस से वह मनमानी भी पूरी करा सकते हैं जो किसी मुस्लिम देश में भी उन्हें सरलता से नहीं मिलेगी। केवल पिछले पांच सालों का हिसाब करें तो कांग्रेस ने मुस्लिमों को अनगिनत विशेष उपहार दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा निरस्त कर दिया। फिर भी उसे वही सुविधा दी जा रही है। निजी शिक्षा संस्थानों में आरक्षण पर मुस्लिम संस्थानों को छूट दे दी गई। धनी मुसलमानों को भी हज सब्सिडी दी गई। पोटा हटाने के निर्णय के पीछे भी मुस्लिमों का विशेष ख्याल रखने की मंशा थी। मदरसों के प्रमाणपत्र को केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मान्यता दी गई। अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने मुसलमानों को आरक्षण देने का वायदा किया है। यह भी संविधान, सेक्युलरिज्म और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध है। मजे की बात है कि इतना कुछ पाकर भी मुस्लिम नेता कांग्रेस से सदैव नाराज रहे हैं।
कांग्रेस को वोट देते हुए भी उनकी भंगिमा सदैव शिकायती रही। वस्तुत: हर मुस्लिम नेता हमेशा दोहराता है कि मुसलमानों का वोट-बैंक रूप में इस्तेमाल हो रहा है, किंतु संपूर्ण इतिहास कुछ और है। पिछले सौ वषरें से मुस्लिम नेता कांग्रेस से तरह-तरह की मांगें रखते गए हैं। उसे कांग्रेस किसी न किसी झूठी उम्मीद में मानती गई। गांधीजी मुस्लिमों के समक्ष कांग्रेस को वैचारिक, राजनीतिक, भावनात्मक रूप से निरंतर झुकाते गए। स्वतंत्र भारत में भी वही हुआ। मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस व अन्य दलों का भी इस्तेमाल कर इस्लामी ताकत ही बढ़ाई। आज पश्चिम बंगाल का कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री भी आतंकवादियों द्वारा मदरसों के दुरुपयोग को रोक नहीं पाता, बल्कि डांट खाकर चुप हो रहता है। 1946 में कांग्रेस ने देश का विभाजन इस दुराशा में स्वीकार कर लिया था कि कम से कम मुस्लिम समस्या से मुक्ति मिलेगी।
स्वयं नेहरू ने इसकी घोषणा की थी, किंतु समस्या पहले से अधिक विकट हो गई। कांग्रेस द्वारा झुक-झुक कर चढ़ावे के बावजूद मुस्लिम नेता उसे हमेशा खरी-खोटी सुनाते रहे हैं, लेकिन जब कांग्रेस कमजोर पड़ी तो वही मुस्लिम कम्युनिस्ट और सपा व राजद सरीखे क्षेत्रीय दलों की ओर भी मुड़ गए। भाजपा ने भी सत्ता में आकर धारा 370 हटाने जैसे आधारभूत मुद्दों को किनारे कर हज यात्रा और मदरसों को अनुदान बढ़ाकर तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों की अनदेखी कर वही कार्य किया। तब, कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है? असम में दशकों से कांग्रेस ने इस्लामी मांगें पूरी कीं। बांग्लादेश के घुसपैठियों को भारतीय नागरिक बनाया। घुसपैठ बेरोक चलती रहे, इसके लिए ऐसा कानून (आईएमडीटी एक्ट) बनाया जिसमें घुसपैठियों को निकालना असंभव हो जाए। यह कानून बीस साल से घुसपैठियों को ढाल प्रदान करता रहा। उसका लाभ उठाकर पाकिस्तानी आईएसआई असम को भारत से काट लेने के षड्यंत्र में लग गई। इसीलिए उस कानून को रद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत सख्त और विस्तृत टिप्पणियां कीं। फिर भी कांग्रेस ने किसी तरह उस कानून को बनाए रखना चाहा ताकि मुसलमान खुश रहें। असम में कांग्रेस का इस्तेमाल कर चुकने के बाद वहां मुस्लिम नेता उसे अंगूठा दिखा अपनी एकछत्र सत्ता बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। यहां मुस्लिम नेताओं की मांगों, आंदोलन, अभियान, बहस आदि में मात्र इस्लामी एजेंडा बढ़ाने की चाह दिखती है। जिस आवेश और एकजुटता से वे खुमैनी, बोस्निया, अफगानिस्तान या इराक के लिए सड़कों पर उतर पड़ते हैं वह अपने देश के लिए कभी नहीं देखी जाती। सड़क, बिजली, पानी जैसे मुद्दे भी मुस्लिम नेताओं की प्राथमिकताएं नहीं हैं। वे तो आधुनिक प्रगति को ही इस्लाम-विरुद्ध मानते हैं! यह कहना पूरी तरह सही नहीं कि कांग्रेस ने मुसलमानों का वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। सही तस्वीर यह है कि मुस्लिम नेताओं ने भी उसका इस्तेमाल कर इस्लामी एजेंडा बढ़ाया। वह भी इस अंदाज में कि वे खुद को लुटा हुआ बताकर हिंदू बुद्धिजीवियों की सहानुभूति अलग से बटोरते हैं। यह हैरत की बात है कि मुस्लिम नेता अपनी नाराज भंगिमा से सभी दलों को प्रेरित कर रहे हैं कि वे इस्लामी विस्तार में मदद करें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभार -जागरण
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